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ब्रह्म खण्ड · अध्याय 112

रुद्राक्ष का माहात्म्य

अध्याय 111अध्याय-सूचीअध्याय 113

श्लोक 1 (skanda.3.112.1)

॥ सूत उवाच ॥ अथ रुद्राक्षमाहात्म्यं वर्णयामि समासतः ॥ सर्वपापक्षयकरं शृण्वतां पठतामपि

sūta uvāca atha rudrākṣamāhātmyaṁ varṇayāmi samāsataḥ sarvapāpakṣayakaraṁ śṛṇvatāṁ paṭhatāmapi

सूत जी ने कहा — अब मैं रुद्राक्ष का माहात्म्य संक्षेप में वर्णन करूँगा, जो सुनने और पढ़नेवालों के समस्त पापों का नाश करनेवाला है।

श्लोक 2 (skanda.3.112.2)

अभक्तो वापि भक्तो वा नीचो नीचतरोपि वा ॥ रुद्राक्षान्धारयेद्यस्तु मुच्यते सर्वपातकैः

abhakto vāpi bhakto vā nīco nīcataropi vā rudrākṣāndhārayedyastu mucyate sarvapātakaiḥ

अभक्त हो या भक्त, नीच हो या उससे भी नीच, जो कोई रुद्राक्ष धारण करता है, वह समस्त पातकों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 3 (skanda.3.112.3)

रुद्राक्षधारणं पुण्यं केन वा सदृशं भवेत् ॥ महाव्रतमिदं प्राहुर्मुनयस्तत्त्वदर्शिनः

rudrākṣadhāraṇaṁ puṇyaṁ kena vā sadṛśaṁ bhavet mahāvratamidaṁ prāhurmunayastattvadarśinaḥ

रुद्राक्ष धारण का पुण्य किसके समान हो सकता है? तत्त्वदर्शी मुनियों ने इसे महाव्रत कहा है।

श्लोक 4 (skanda.3.112.4)

सहस्रं धारयेद्यस्तु रुद्राक्षाणां धृतव्रतः ॥ तं नमंति सुराः सर्वे यथा रुद्रस्तथैव सः

sahasraṁ dhārayedyastu rudrākṣāṇāṁ dhṛtavrataḥ taṁ namaṁti surāḥ sarve yathā rudrastathaiva saḥ

जो व्रतधारी सहस्र रुद्राक्षों को धारण करता है, उसे समस्त देवता उसी प्रकार नमस्कार करते हैं, जैसे रुद्र को।

श्लोक 5 (skanda.3.112.5)

अभावे तु सहस्रस्य बाह्वोः षोडश षोडश ॥ एकं शिखायां करयोर्द्वादश द्वादशैव हि

abhāve tu sahasrasya bāhvoḥ ṣoḍaśa ṣoḍaśa ekaṁ śikhāyāṁ karayordvādaśa dvādaśaiva hi

सहस्र के अभाव में, दोनों बाहुओं में सोलह-सोलह, शिखा में एक, दोनों हाथों में बारह-बारह,

श्लोक 6 (skanda.3.112.6)

द्वात्रिंशत्कंठदेशे तु चत्वारिंशत्तु मस्तके ॥ एकैक कर्णयोः षट् षट् वक्षस्यष्टोत्तरं शतम् ॥ यो धारयति रुद्राक्षान्रुद्रवत्सोपि पूज्यते

dvātriṁśatkaṁṭhadeśe tu catvāriṁśattu mastake ekaika karṇayoḥ ṣaṭ ṣaṭ vakṣasyaṣṭottaraṁ śatam yo dhārayati rudrākṣānrudravatsopi pūjyate

कण्ठ-प्रदेश में बत्तीस, मस्तक में चालीस, दोनों कानों में छह-छह, वक्षस्थल में एक सौ आठ — जो इस प्रकार रुद्राक्ष धारण करता है, वह भी रुद्र के समान पूजनीय है।

श्लोक 7 (skanda.3.112.7)

मुक्ताप्रवालस्फटिकरौप्यवैदूर्यकांचनैः ॥ समेतान्धारयेद्यस्तु रुद्राक्षान्स शिवो भवेत्

muktāpravālasphaṭikaraupyavaidūryakāṁcanaiḥ sametāndhārayedyastu rudrākṣānsa śivo bhavet

जो मुक्ता, प्रवाल, स्फटिक, चाँदी, वैडूर्य और स्वर्ण से युक्त रुद्राक्ष धारण करता है, वह शिव बन जाता है।

श्लोक 8 (skanda.3.112.8)

केवलानपि रुद्राक्षान्यथालाभं बिभर्ति यः ॥ तं न स्पृशंति पापानि तमांसीव विभावसुम्

kevalānapi rudrākṣānyathālābhaṁ bibharti yaḥ taṁ na spṛśaṁti pāpāni tamāṁsīva vibhāvasum

जो केवल रुद्राक्षों को भी यथाप्राप्त धारण करता है, उसे पाप स्पर्श नहीं करते, जैसे अन्धकार अग्नि को स्पर्श नहीं करता।

श्लोक 9 (skanda.3.112.9)

रुद्राक्षमालया जप्तो मंत्रोऽनंतफलप्रदः ॥ अरुद्राक्षो जपः पुंसां तावन्मात्रफलप्रदः

rudrākṣamālayā japto maṁtro'naṁtaphalapradaḥ arudrākṣo japaḥ puṁsāṁ tāvanmātraphalapradaḥ

रुद्राक्ष-माला से जपा गया मन्त्र अनन्त फल देनेवाला होता है; रुद्राक्ष-रहित मनुष्यों का जप उतना ही मात्र फल देता है।

श्लोक 10 (skanda.3.112.10)

यस्यांगे नास्ति रुद्राक्ष एकोपि बहुपुण्यदः ॥ तस्य जन्म निरर्थं स्यात्त्रिपुंड्ररहितं यदि

yasyāṁge nāsti rudrākṣa ekopi bahupuṇyadaḥ tasya janma nirarthaṁ syāttripuṁḍrarahitaṁ yadi

जिसके अंग पर बहुत पुण्य देनेवाला एक भी रुद्राक्ष नहीं है, यदि वह त्रिपुण्ड्र-रहित भी है, तो उसका जन्म निरर्थक है।

श्लोक 11 (skanda.3.112.11)

रुद्राक्षं मस्तके बद्ध्वा शिरःस्नानं करोति यः ॥ गंगास्नानफलं तस्य जायते नात्र संशयः

rudrākṣaṁ mastake baddhvā śiraḥsnānaṁ karoti yaḥ gaṁgāsnānaphalaṁ tasya jāyate nātra saṁśayaḥ

जो सिर पर रुद्राक्ष बाँधकर सिर का स्नान करता है, उसे निःसन्देह गंगा-स्नान का फल प्राप्त होता है।

श्लोक 12 (skanda.3.112.12)

रुद्राक्षं पूजयेद्यस्तु विना तोयाभिषेचनम् ॥ यत्फलं लिंगपूजायास्तदेवाप्नोति निश्चितम्

rudrākṣaṁ pūjayedyastu vinā toyābhiṣecanam yatphalaṁ liṁgapūjāyāstadevāpnoti niścitam

जो जल-अभिषेक के बिना ही रुद्राक्ष की पूजा करता है, उसे निश्चय ही लिंग-पूजा का वही फल प्राप्त होता है।

श्लोक 13 (skanda.3.112.13)

एकवक्त्राः पंचवक्त्रा एकादशमुखाः परे ॥ चतुर्दशमुखाः केचिद्रुद्राक्षा लोकपूजिताः

ekavaktrāḥ paṁcavaktrā ekādaśamukhāḥ pare caturdaśamukhāḥ kecidrudrākṣā lokapūjitāḥ

कुछ रुद्राक्ष एकमुखी, कुछ पंचमुखी, कुछ एकादशमुखी, और कुछ चतुर्दशमुखी होते हैं — सभी लोकों द्वारा पूजित हैं।

श्लोक 14 (skanda.3.112.14)

भक्त्या संपूजितो नित्यं रुद्राक्षः शंकरात्मकः ॥ दरिद्रं वापि कुरुते राजराजश्रियान्वितम्

bhaktyā saṁpūjito nityaṁ rudrākṣaḥ śaṁkarātmakaḥ daridraṁ vāpi kurute rājarājaśriyānvitam

शंकर-स्वरूप रुद्राक्ष, भक्तिपूर्वक नित्य पूजित होकर, दरिद्र को भी राजराज-सी लक्ष्मी से युक्त कर देता है।

श्लोक 15 (skanda.3.112.15)

अत्रेदं पुण्यमाख्यानं वर्णयंति मनीषिणः । महापापक्षयकरं श्रवणात्कीर्त्तनादपि

atredaṁ puṇyamākhyānaṁ varṇayaṁti manīṣiṇaḥ mahāpāpakṣayakaraṁ śravaṇātkīrttanādapi

यहाँ बुद्धिमान लोग यह पुण्य आख्यान वर्णन करते हैं, जो श्रवण-कीर्तन मात्र से महापापों का नाश करनेवाला है।

श्लोक 16 (skanda.3.112.16)

राजा काश्मीरदेशस्य भद्रसेन इति श्रुतः ॥ तस्य पुत्रो ऽभवद्धीमान्सुधर्मानाम वीर्यवान्

rājā kāśmīradeśasya bhadrasena iti śrutaḥ tasya putro 'bhavaddhīmānsudharmānāma vīryavān

काश्मीर देश का भद्रसेन नाम से प्रसिद्ध एक राजा था; उसका पुत्र सुधर्मा नाम से बुद्धिमान, बलवान था।

श्लोक 17 (skanda.3.112.17)

तस्यामात्यसुतः कश्चित्तारको नाम सद्गुणः ॥ बभूव राजपुत्रस्य सखा परमशोभनः

tasyāmātyasutaḥ kaścittārako nāma sadguṇaḥ babhūva rājaputrasya sakhā paramaśobhanaḥ

उसके मन्त्री का पुत्र, तारक नाम का सद्गुणी, राजपुत्र का परम सुन्दर सखा था।

श्लोक 18 (skanda.3.112.18)

तावुभौ परमस्निग्धौ कुमारौ रूपसुन्दरौ ॥ विद्याभ्यासपरौ बाल्ये सह क्रीडां प्रचक्रतुः

tāvubhau paramasnigdhau kumārau rūpasundarau vidyābhyāsaparau bālye saha krīḍāṁ pracakratuḥ

वे दोनों कुमार परम स्नेही, रूपसुन्दर, बाल्यावस्था में विद्याभ्यास में रत, साथ ही क्रीड़ा करते थे।

श्लोक 19 (skanda.3.112.19)

तौ सदा सर्वगात्रेषु रुद्राक्षकृतभूषणौ ॥ विचेरतुरुदारांगौ सततं भस्मधारिणौ

tau sadā sarvagātreṣu rudrākṣakṛtabhūṣaṇau viceraturudārāṁgau satataṁ bhasmadhāriṇau

वे दोनों सदा अपने सम्पूर्ण अंगों पर रुद्राक्ष के आभूषण धारण किए, उदार अंगोंवाले, सतत भस्मधारी घूमते थे।

श्लोक 20 (skanda.3.112.20)

हारकेयूरकटककुंडलादिविभूषणम् ॥ हेमरत्नमयं त्यक्त्वा रुद्राक्षान्दधतुश्च तौ

hārakeyūrakaṭakakuṁḍalādivibhūṣaṇam hemaratnamayaṁ tyaktvā rudrākṣāndadhatuśca tau

हार, केयूर, कड़े, कुण्डल आदि स्वर्ण-रत्नमय आभूषणों को त्यागकर, वे दोनों रुद्राक्ष धारण करते थे।

श्लोक 21 (skanda.3.112.21)

रुद्राक्षमालितौ नित्यं रुद्राक्षकरकंकणौ ॥ रुद्राक्षकंठाभरणौ सदा रुद्राक्षकुंडलौ

rudrākṣamālitau nityaṁ rudrākṣakarakaṁkaṇau rudrākṣakaṁṭhābharaṇau sadā rudrākṣakuṁḍalau

नित्य रुद्राक्ष-माला पहने, रुद्राक्ष के कंकणोंवाले हाथ, रुद्राक्ष के कण्ठाभूषणोंवाले, सदा रुद्राक्ष के कुण्डलोंवाले,

श्लोक 22 (skanda.3.112.22)

हेमरत्नाद्यलंकारे लोष्टपाषाणदर्शनौ ॥ बोध्यमानावपि जनैर्न रुद्राक्षान्व्यमुंचताम्

hemaratnādyalaṁkāre loṣṭapāṣāṇadarśanau bodhyamānāvapi janairna rudrākṣānvyamuṁcatām

स्वर्ण-रत्न आदि आभूषणों को ढेले-पत्थर के समान देखते हुए, लोगों द्वारा समझाए जाने पर भी, वे रुद्राक्ष का त्याग नहीं करते थे।

श्लोक 23 (skanda.3.112.23)

तस्य काश्मीरराजस्य गृहं प्राप्तो यदृच्छया ॥ पराशरो मुनिवरः साक्षादिव पितामहः

tasya kāśmīrarājasya gṛhaṁ prāpto yadṛcchayā parāśaro munivaraḥ sākṣādiva pitāmahaḥ

उस काश्मीर राजा के घर में अनायास ही पराशर मुनिवर, साक्षात् पितामह के समान, पधारे।

श्लोक 24 (skanda.3.112.24)

तमर्चयित्वा विधिवद्राजा धर्मभृतां वरः ॥ प्रपच्छ सुखमासीनं त्रिकालज्ञं महामुनिम्

tamarcayitvā vidhivadrājā dharmabhṛtāṁ varaḥ prapaccha sukhamāsīnaṁ trikālajñaṁ mahāmunim

उनकी विधिपूर्वक पूजा करके, धर्मधारियों में श्रेष्ठ राजा ने, सुखपूर्वक बैठे उस त्रिकालज्ञ महामुनि से पूछा —

श्लोक 25 (skanda.3.112.25)

राजोवाच ॥ भगवन्नेष पुत्रो मे सोपि मंत्रिसुतश्च मे ॥ रुद्राक्षधारिणौ नित्यं रत्नाभरणनिःस्पृहौ

rājovāca bhagavanneṣa putro me sopi maṁtrisutaśca me rudrākṣadhāriṇau nityaṁ ratnābharaṇaniḥspṛhau

राजा ने कहा — "हे भगवन्! यह मेरा पुत्र है, और यह मेरे मन्त्री का पुत्र भी; दोनों नित्य रुद्राक्ष धारण करते हैं, रत्नाभूषणों से निःस्पृह।

श्लोक 26 (skanda.3.112.26)

शास्यमानावपि सदा रत्नाकल्पपरिग्रहे ॥ विलंघितास्मद्वचनौ रुद्राक्षेष्वेव तत्परौ

śāsyamānāvapi sadā ratnākalpaparigrahe vilaṁghitāsmadvacanau rudrākṣeṣveva tatparau

"रत्नाभूषण ग्रहण करने के लिए सदा समझाए जाने पर भी, हमारे वचन का उल्लंघन करके, केवल रुद्राक्षों में ही तत्पर रहते हैं।

श्लोक 27 (skanda.3.112.27)

नोपदिष्टाविमौ बालौ कदाचिदपि केनचित् ॥ एषा स्वाभाविकी वृत्तिः कथमासीत्कुमारयोः

nopadiṣṭāvimau bālau kadācidapi kenacit eṣā svābhāvikī vṛttiḥ kathamāsītkumārayoḥ

"इन दोनों बालकों को यह किसी ने कभी नहीं सिखाया; इन कुमारों की यह स्वाभाविक वृत्ति कैसे हुई?"

श्लोक 28 (skanda.3.112.28)

पराशर उवाच ॥ शृणु राजन्प्रवक्ष्यामि तव पुत्रस्य धीमतः ॥ यथा त्वं मंत्रिपुत्रस्य प्राग्वृत्तं विस्मयावहम्

parāśara uvāca śṛṇu rājanpravakṣyāmi tava putrasya dhīmataḥ yathā tvaṁ maṁtriputrasya prāgvṛttaṁ vismayāvaham

पराशर ने कहा — "सुनो, हे राजन्! मैं तुम्हारे बुद्धिमान पुत्र और मन्त्रीपुत्र का पूर्ववृत्तान्त, अत्यन्त आश्चर्यजनक, कहूँगा।

श्लोक 29 (skanda.3.112.29)

नंदिग्रामे पुरा काचिन्महानंदेति विश्रुता॥ बभूव वारवनिता शृंगारललिताकृतिः

naṁdigrāme purā kācinmahānaṁdeti viśrutā babhūva vāravanitā śṛṁgāralalitākṛtiḥ

"पूर्वकाल में नन्दिग्राम में महानन्दा नाम से विख्यात एक वारांगना थी, शृंगार से ललित आकृतिवाली।

श्लोक 30 (skanda.3.112.30)

छत्रं पूर्णेंदुसंकाशं यानं स्वर्णविराजितम् ॥ चामराणि सुदंडानि पादुके च हिरण्मये

chatraṁ pūrṇeṁdusaṁkāśaṁ yānaṁ svarṇavirājitam cāmarāṇi sudaṁḍāni pāduke ca hiraṇmaye

"पूर्णचन्द्र के समान छत्र, स्वर्ण से सुशोभित यान, सुन्दर दण्डवाले चामर, स्वर्णमय पादुकाएँ,

श्लोक 31 (skanda.3.112.31)

अंबराणि विचित्राणि महार्हाणि द्युमंति च ॥ चंद्ररश्मिनिभाः शय्या पर्यंकाश्च हिरण्मयाः

aṁbarāṇi vicitrāṇi mahārhāṇi dyumaṁti ca caṁdraraśminibhāḥ śayyā paryaṁkāśca hiraṇmayāḥ

"विचित्र, बहुमूल्य, चमकते वस्त्र; चन्द्रकिरणों के समान शय्याएँ, और स्वर्णमय पलंग,

श्लोक 32 (skanda.3.112.32)

गावो महिष्यः शतशो दासाश्च शतशस्तथा

gāvo mahiṣyaḥ śataśo dāsāśca śataśastathā

"सैकड़ों गाएँ-भैंसें, और सैकड़ों दासगण भी,

श्लोक 33 (skanda.3.112.33)

सर्वाभरणदीप्तांग्यो दास्यश्च नवयौवना ॥ भूषणानि परार्ध्याणि नवरत्नोज्ज्वलानि च

sarvābharaṇadīptāṁgyo dāsyaśca navayauvanā bhūṣaṇāni parārdhyāṇi navaratnojjvalāni ca

"समस्त आभूषणों से चमकती अंगोंवाली नवयौवना दासियाँ, और अत्यन्त बहुमूल्य, नवरत्नों से उज्ज्वल आभूषण,

श्लोक 34 (skanda.3.112.34)

गन्धकुंकुमकस्तूरीकर्पूरागुरुलेपनम् ॥ चित्रमाल्यावतंसश्च यथेष्टं मृष्टभोजनम्

gandhakuṁkumakastūrīkarpūrāgurulepanam citramālyāvataṁsaśca yatheṣṭaṁ mṛṣṭabhojanam

"गन्ध, कुंकुम, कस्तूरी, कर्पूर, अगुरु का अनुलेपन, चित्रित माला-मुकुट, और यथेच्छ स्वादिष्ट भोजन,

श्लोक 35 (skanda.3.112.35)

नानाचित्रवितानाढ्यं नानाधान्यमयं गृहम् ॥ बहुरत्नसहस्राढ्यं कोटिसंख्याधिकं धनम्

nānācitravitānāḍhyaṁ nānādhānyamayaṁ gṛham bahuratnasahasrāḍhyaṁ koṭisaṁkhyādhikaṁ dhanam

"नाना चित्रित वितानोंवाला, नाना अनाजों से भरा घर, हजारों रत्नों से समृद्ध, करोड़ों की संख्या से अधिक धन —

श्लोक 36 (skanda.3.112.36)

एवं विभवसंपन्ना वेश्या कामविहारिणी ॥ शिवपूजारता नित्यं सत्यधर्मपरायणा

evaṁ vibhavasaṁpannā veśyā kāmavihāriṇī śivapūjāratā nityaṁ satyadharmaparāyaṇā

"इस प्रकार ऐश्वर्य-सम्पन्न वह वेश्या, काम-विहारिणी होते हुए भी, नित्य शिवपूजा में रत, सत्यधर्मपरायण थी।

श्लोक 37 (skanda.3.112.37)

सदाशिवकथासक्ता शिवनामकथोत्सुका ॥ शिवभक्तांघ्र्यवनता शिवभक्तिरतानिशम्

sadāśivakathāsaktā śivanāmakathotsukā śivabhaktāṁghryavanatā śivabhaktiratāniśam

"सदाशिव की कथा में आसक्त, शिव के नाम और कथा के लिए उत्सुक, शिवभक्तों के चरणों में नत, सतत शिवभक्ति में रत।

श्लोक 38 (skanda.3.112.38)

विनोदहेतोः सा वेश्या नाट्यमण्डपमध्यतः॥ रुद्राक्षैभूषयित्वैकं मर्कटं चैव कुक्कुटम्

vinodahetoḥ sā veśyā nāṭyamaṇḍapamadhyataḥ rudrākṣaibhūṣayitvaikaṁ markaṭaṁ caiva kukkuṭam

"मनोरंजन के लिए वह वेश्या अपने नाट्यमण्डप के मध्य में, एक बन्दर और एक मुर्गे को रुद्राक्षों से सजाकर,

श्लोक 39 (skanda.3.112.39)

करतालैश्च गीतैश्च सदा नर्तयति स्वयम् ॥ पुनश्च विहसंत्युच्चैः सखीभिः परिवारिता

karatālaiśca gītaiśca sadā nartayati svayam punaśca vihasaṁtyuccaiḥ sakhībhiḥ parivāritā

"करतालों और गीतों के साथ सदा स्वयं नचाती थी; फिर अपनी सखियों से घिरी होकर जोर से हँसती थी।

श्लोक 40 (skanda.3.112.40)

युग्मम् ॥ रुद्राक्षैः कृतकेयूरकर्णाभरणभूषणः ॥ मर्कटः शिक्षया तस्याः सदा नृत्यति बालवत्

yugmam rudrākṣaiḥ kṛtakeyūrakarṇābharaṇabhūṣaṇaḥ markaṭaḥ śikṣayā tasyāḥ sadā nṛtyati bālavat

"रुद्राक्षों से बने केयूर और कर्णाभूषणों से सुशोभित वह बन्दर, उसकी शिक्षा से सदा बालक की भाँति नाचता था।

श्लोक 41 (skanda.3.112.41)

शिखायां बद्धरुद्राक्षः कुक्कुटः कपिना सह ॥ चिरं नृत्यति नृत्यज्ञः पश्यतां चित्रमावहन्

śikhāyāṁ baddharudrākṣaḥ kukkuṭaḥ kapinā saha ciraṁ nṛtyati nṛtyajñaḥ paśyatāṁ citramāvahan

"शिखा में बँधे रुद्राक्षवाला मुर्गा, उस बन्दर के साथ, नृत्य में निपुण, चिरकाल तक नाचता था, देखनेवालों को आश्चर्य में डालते हुए।

श्लोक 42 (skanda.3.112.42)

एकदा भवनं तस्याः कश्चिद्वैश्यः शिवव्रती॥ आजगाम सरुद्राक्षस्त्रिपुंड्री निर्ममः कृती

ekadā bhavanaṁ tasyāḥ kaścidvaiśyaḥ śivavratī ājagāma sarudrākṣastripuṁḍrī nirmamaḥ kṛtī

"एक बार उसके भवन में कोई शिवव्रती वैश्य आया, रुद्राक्षधारी, त्रिपुण्ड्री, ममतारहित, सिद्ध।

श्लोक 43 (skanda.3.112.43)

स बिभ्रद्भस्म विशदे प्रकोष्ठे वरकंकणम् ॥ महारत्नपरिस्तीर्णं ज्वलंतं तरुणार्कवत्

sa bibhradbhasma viśade prakoṣṭhe varakaṁkaṇam mahāratnaparistīrṇaṁ jvalaṁtaṁ taruṇārkavat

"वह शुद्ध भस्म धारण किए हुए, अपनी कलाई पर एक उत्तम कंकण धारण किए हुए, महारत्नों से जड़ा, नवोदित सूर्य के समान चमकता हुआ।

श्लोक 44 (skanda.3.112.44)

तमागतं सा गणिका संपूज्य परया मुदा। तत्प्रकोष्ठगतं वीक्ष्य कंकणं प्राह विस्मिता

tamāgataṁ sā gaṇikā saṁpūjya parayā mudā tatprakoṣṭhagataṁ vīkṣya kaṁkaṇaṁ prāha vismitā

"उसे आया देखकर, वह गणिका परम हर्ष से उसकी पूजा करके, उसकी कलाई पर स्थित उस कंकण को देखकर आश्चर्यचकित होकर बोली —

श्लोक 45 (skanda.3.112.45)

महारत्नमयः सोऽयं कंकणस्त्वत्करे स्थितः ॥ मनो हरति मे साधौ दिव्यस्त्रीभूषणोचितः

mahāratnamayaḥ so'yaṁ kaṁkaṇastvatkare sthitaḥ mano harati me sādhau divyastrībhūṣaṇocitaḥ

"'यह महारत्नमय कंकण, जो तुम्हारे हाथ पर है, हे साधो! मेरे मन को हरता है — दिव्य स्त्री के आभूषण के योग्य।'

श्लोक 46 (skanda.3.112.46)

इति तां वररत्नाढ्य सस्पृहां करभूषणे ॥ वाक्ष्योदारमतिर्वैश्यः सस्मितं समभाषत

iti tāṁ vararatnāḍhya saspṛhāṁ karabhūṣaṇe vākṣyodāramatirvaiśyaḥ sasmitaṁ samabhāṣata

"इस प्रकार उस कर-भूषण के लिए इच्छुक, श्रेष्ठ रत्नों से समृद्ध उससे, उदारबुद्धि वैश्य ने मुस्कुराते हुए कहा —

श्लोक 47 (skanda.3.112.47)

वैश्य उवाच ॥ अस्मिन्रत्नवरे दिव्ये यदि ते सस्पृहं मनः ॥ तमेवादत्स्व सुप्रीता मौल्यमस्य ददासि किम्

vaiśya uvāca asminratnavare divye yadi te saspṛhaṁ manaḥ tamevādatsva suprītā maulyamasya dadāsi kim

"वैश्य ने कहा — 'यदि इस दिव्य श्रेष्ठ रत्न में तुम्हारा मन इच्छुक है, तो प्रसन्न होकर इसे ग्रहण करो; इसका क्या मूल्य दोगी?'

श्लोक 48 (skanda.3.112.48)

वेश्यो वाच ॥ वयं तु स्वैरचारिण्यो वेश्यास्तु न पतिव्रताः ॥ अस्मत्कुलोचितो धर्मो व्यभिचारो न संशयः

veśyo vāca vayaṁ tu svairacāriṇyo veśyāstu na pativratāḥ asmatkulocito dharmo vyabhicāro na saṁśayaḥ

"वेश्या ने कहा — 'हम तो स्वेच्छाचारिणी हैं, वेश्याएँ पतिव्रता नहीं होतीं; हमारे कुल का उचित धर्म व्यभिचार ही है, इसमें कोई सन्देह नहीं।

श्लोक 49 (skanda.3.112.49)

यद्येतद्रत्नखचितं ददासि करभूषणम्॥ दिनत्रयमहोरात्रं तव पत्नी भवाम्यहम्

yadyetadratnakhacitaṁ dadāsi karabhūṣaṇam dinatrayamahorātraṁ tava patnī bhavāmyaham

"'यदि तुम यह रत्नजड़ित कर-भूषण दे दो, तो तीन दिन-रात के लिए मैं तुम्हारी पत्नी बन जाऊँगी।'

श्लोक 50 (skanda.3.112.50)

वैश्य उवाच ॥ तथास्तु यदि ते सत्यं वचनं वारवल्लभे ॥ ददामि रत्नवलयं त्रिरात्रं भव मद्वधूः

vaiśya uvāca tathāstu yadi te satyaṁ vacanaṁ vāravallabhe dadāmi ratnavalayaṁ trirātraṁ bhava madvadhūḥ

"वैश्य ने कहा — 'हे वारवल्लभे! यदि तुम्हारा वचन सत्य हो तो ऐसा ही हो; मैं रत्नकंकण देता हूँ, तीन रात्रि मेरी वधू बनो।

श्लोक 51 (skanda.3.112.51)

एतस्मिन्व्यवहारे तु प्रमाणं शशिभास्करौ ॥ त्रिवारं सत्यमित्युक्त्वा हृदयं मे स्पृश प्रिये

etasminvyavahāre tu pramāṇaṁ śaśibhāskarau trivāraṁ satyamityuktvā hṛdayaṁ me spṛśa priye

"'इस व्यवहार में चन्द्र और सूर्य प्रमाण हों; तीन बार सत्य कहकर, हे प्रिये! मेरे हृदय को स्पर्श करो।'

श्लोक 52 (skanda.3.112.52)

वेश्योवाच ॥ दिनत्रयमहोरात्रं पत्नी भूत्वा तव प्रभो ॥ सहधर्मं चरामीति सा तद्धृदयमस्पृशत्

veśyovāca dinatrayamahorātraṁ patnī bhūtvā tava prabho sahadharmaṁ carāmīti sā taddhṛdayamaspṛśat

"वेश्या ने कहा — 'तीन दिन-रात तुम्हारी पत्नी बनकर, तुम्हारा ही धर्म अपनाऊँगी' — यह कहकर उसने उसका हृदय स्पर्श किया।

श्लोक 53 (skanda.3.112.53)

अथ तस्यै स वैश्यस्तु प्रददौ रत्नकङ्कणम् ॥ लिंगं रत्नमयं चास्या हस्ते दत्त्वेदमब्रवीत्

atha tasyai sa vaiśyastu pradadau ratnakaṅkaṇam liṁgaṁ ratnamayaṁ cāsyā haste dattvedamabravīt

"फिर उस वैश्य ने उसे रत्नकंकण दिया, और अपना रत्नमय शिवलिंग उसके हाथ में देकर यह कहा —

श्लोक 54 (skanda.3.112.54)

इदं रत्नमयं शैवं लिंगं मत्प्राणसंनिभम् ॥ रक्षणीयं त्वया कांते तस्य हानिर्मृतिर्मम

idaṁ ratnamayaṁ śaivaṁ liṁgaṁ matprāṇasaṁnibham rakṣaṇīyaṁ tvayā kāṁte tasya hānirmṛtirmama

"'यह रत्नमय शैव लिंग मेरे प्राणों के समान है; इसकी रक्षा तुम्हें करनी होगी, हे कान्ते! इसकी हानि मेरी मृत्यु होगी।'

श्लोक 55 (skanda.3.112.55)

एवमस्त्विति सा कांता लिंगमादाय रत्नजम् ॥ नाट्यमण्डपिकास्तंभे निधाय प्राविशद्गृहम्

evamastviti sā kāṁtā liṁgamādāya ratnajam nāṭyamaṇḍapikāstaṁbhe nidhāya prāviśadgṛham

"'ऐसा ही हो' कहकर, वह प्रिया उस रत्नमय लिंग को लेकर, नाट्यमण्डप के खम्भे पर रखकर घर में प्रविष्ट हुई।

श्लोक 56 (skanda.3.112.56)

सा तेन संगता रात्रौ वैश्येन विटधर्मिणा ॥ सुखं सुष्वाप पर्यंके मृदुतल्पोपशोभिते

sā tena saṁgatā rātrau vaiśyena viṭadharmiṇā sukhaṁ suṣvāpa paryaṁke mṛdutalpopaśobhite

"उस विटधर्मी वैश्य के साथ रात्रि में मिलकर, वह कोमल शय्या से सुशोभित पलंग पर सुखपूर्वक सो गई।

श्लोक 57 (skanda.3.112.57)

ततो निशीथसमये नाट्यमण्डपिकांतरे ॥ अकस्मादुत्थितो वह्निस्तमेव सहसावृणोत्

tato niśīthasamaye nāṭyamaṇḍapikāṁtare akasmādutthito vahnistameva sahasāvṛṇot

"फिर मध्यरात्रि के समय, नाट्यमण्डप के भीतर अचानक अग्नि उठी और उसी को तुरन्त घेर लिया।

श्लोक 58 (skanda.3.112.58)

मण्डपे दह्यमाने तु सहसोत्थाय संभ्रमात् ॥ सा वेश्या मर्कटं तत्र मोचयामास बंधनात्

maṇḍape dahyamāne tu sahasotthāya saṁbhramāt sā veśyā markaṭaṁ tatra mocayāmāsa baṁdhanāt

"मण्डप जलते हुए, तुरन्त घबराकर उठकर, वह वेश्या वहाँ बन्दर को बन्धन से मुक्त कर दिया।

श्लोक 59 (skanda.3.112.59)

स मर्कटो मुक्तबंधः कुक्कुटेन सहामुना ॥ भीतो दूरं प्रदुद्राव विधूयाग्निकणान्बहून्

sa markaṭo muktabaṁdhaḥ kukkuṭena sahāmunā bhīto dūraṁ pradudrāva vidhūyāgnikaṇānbahūn

"वह बन्दर, बन्धन-मुक्त होकर, उस मुर्गे के साथ, भयभीत होकर दूर तक भाग गया, अनेक अग्नि-कणों को झाड़ते हुए।

श्लोक 60 (skanda.3.112.60)

स्तंभेन सह निर्दग्धं तल्लिंगं शकलीकृतम् ॥ दृष्ट्वा वेश्या च वैश्यश्च दुरंतं दुःखमापतुः

staṁbhena saha nirdagdhaṁ talliṁgaṁ śakalīkṛtam dṛṣṭvā veśyā ca vaiśyaśca duraṁtaṁ duḥkhamāpatuḥ

"खम्भे सहित पूरी तरह जले हुए, टुकड़े-टुकड़े हुए उस लिंग को देखकर, वेश्या और वैश्य दोनों असीम दुःख को प्राप्त हुए।

श्लोक 61 (skanda.3.112.61)

दृष्ट्वा प्राणसमं लिंगं दग्धं वैश्यपतिस्तथा ॥ स्वयमप्याप्तनिर्वेदो मरणाय मतिं दधौ

dṛṣṭvā prāṇasamaṁ liṁgaṁ dagdhaṁ vaiśyapatistathā svayamapyāptanirvedo maraṇāya matiṁ dadhau

"प्राणों के समान प्रिय उस लिंग को जला हुआ देखकर, वह वैश्यपति स्वयं भी वैराग्य को प्राप्त होकर, मृत्यु का विचार करने लगा।

श्लोक 62 (skanda.3.112.62)

निर्वेददान्नितरां खेदाद्वैश्यस्तामाह दुःखिताम् ॥ शिवलिंगे तु निर्भिन्ने नाहं जीवितुमुत्सहे

nirvedadānnitarāṁ khedādvaiśyastāmāha duḥkhitām śivaliṁge tu nirbhinne nāhaṁ jīvitumutsahe

"अत्यन्त वैराग्य और खेद से वह वैश्य, दुःखी उस स्त्री से बोला — 'शिवलिंग के नष्ट हो जाने पर, मैं जीने का साहस नहीं करता।

श्लोक 63 (skanda.3.112.63)

चितां कारय मे भद्रे तव भृत्यैर्बलाधिकैः ॥ शिवे मनः समावेश्य प्रविशामि हुताशनम्

citāṁ kāraya me bhadre tava bhṛtyairbalādhikaiḥ śive manaḥ samāveśya praviśāmi hutāśanam

"'मेरे लिए चिता तैयार करवाओ, हे भद्रे! अपने बलशाली सेवकों से; शिव में मन लगाकर मैं अग्नि में प्रवेश करता हूँ।

श्लोक 64 (skanda.3.112.64)

यदि ब्रह्मेंद्रविष्ण्वाद्या वारयेयुः समेत्य माम् ॥ तथाप्यस्मिन्क्षणे धीरः प्रविश्याग्निं त्यजाम्यसून्

yadi brahmeṁdraviṣṇvādyā vārayeyuḥ sametya mām tathāpyasminkṣaṇe dhīraḥ praviśyāgniṁ tyajāmyasūn

"'यदि ब्रह्मा, इन्द्र, विष्णु आदि भी आकर मुझे रोकें, फिर भी इसी क्षण, धीर होकर, अग्नि में प्रवेश करके मैं प्राण त्याग दूँगा।'

श्लोक 65 (skanda.3.112.65)

तमेवं दृढबंधं सा विज्ञाय बहुदुःखिता ॥ स्वभृत्यैः कारयामास चितां स्वनगराद्बहिः

tamevaṁ dṛḍhabaṁdhaṁ sā vijñāya bahuduḥkhitā svabhṛtyaiḥ kārayāmāsa citāṁ svanagarādbahiḥ

"उसके इस दृढ़ संकल्प को जानकर, वह अत्यन्त दुःखी होकर, अपने सेवकों से नगर के बाहर उसके लिए चिता तैयार करवाई।

श्लोक 66 (skanda.3.112.66)

ततः स वैश्यः शिवभक्तिपूतः प्रदक्षिणीकृत्य समिद्धमग्निम् ॥ विवेश पश्यत्सु जनेषु धीरः सा चानुतापं युवती प्रपेदे

tataḥ sa vaiśyaḥ śivabhaktipūtaḥ pradakṣiṇīkṛtya samiddhamagnim viveśa paśyatsu janeṣu dhīraḥ sā cānutāpaṁ yuvatī prapede

"फिर वह वैश्य, शिवभक्ति से पवित्र होकर, प्रज्वलित अग्नि की प्रदक्षिणा करके, लोगों के देखते हुए धीरतापूर्वक उसमें प्रविष्ट हुआ; और वह युवती अनुताप को प्राप्त हुई।

श्लोक 67 (skanda.3.112.67)

अथ सा दुःखिता नारी स्मृत्वा धर्मं सुनिर्मलम् ॥ सर्वान्बन्धून्समीक्ष्यैव बभाषे करुणं वचः

atha sā duḥkhitā nārī smṛtvā dharmaṁ sunirmalam sarvānbandhūnsamīkṣyaiva babhāṣe karuṇaṁ vacaḥ

"फिर वह दुःखी स्त्री, अत्यन्त निर्मल धर्म का स्मरण करके, अपने सभी बन्धुओं की ओर देखकर, करुण वचन बोली —

श्लोक 68 (skanda.3.112.68)

रत्नकंकणमादाय मया सत्यमुदाहृतम् ॥ दिनत्रयमहं पत्नी वैश्यस्यामुष्य संमता

ratnakaṁkaṇamādāya mayā satyamudāhṛtam dinatrayamahaṁ patnī vaiśyasyāmuṣya saṁmatā

"'रत्नकंकण ग्रहण करके मैंने सत्य कहा था — तीन दिन के लिए मैं इस वैश्य की पत्नी मानी गई।

श्लोक 69 (skanda.3.112.69)

कर्मणा मत्कृतेनायं मृतो वैश्यः शिवव्रती। तस्मादहं प्रवेक्ष्यामि सहानेन हुताशनम् ॥ सधर्मचारिणीत्युक्तं सत्यमेतद्धि पश्यथ

karmaṇā matkṛtenāyaṁ mṛto vaiśyaḥ śivavratī tasmādahaṁ pravekṣyāmi sahānena hutāśanam sadharmacāriṇītyuktaṁ satyametaddhi paśyatha

"'मेरे ही किए कर्म से यह शिवव्रती वैश्य मरा; इसलिए मैं इसी के साथ अग्नि में प्रवेश करूँगी; "मैं सहधर्मचारिणी बनूँगी" यह कहा गया था — देखो, यह सत्य है।

श्लोक 70 (skanda.3.112.70)

सत्येन प्रीतिमायांति देवास्त्रिभुवनेश्वराः ॥ सत्यासक्तिः परो धर्मः सत्ये सर्वं प्रतिष्ठितम्

satyena prītimāyāṁti devāstribhuvaneśvarāḥ satyāsaktiḥ paro dharmaḥ satye sarvaṁ pratiṣṭhitam

"'सत्य से त्रिभुवनेश्वर देवता प्रसन्न होते हैं; सत्य के प्रति आसक्ति ही परम धर्म है; सत्य में ही सब कुछ प्रतिष्ठित है।

श्लोक 71 (skanda.3.112.71)

सत्येन स्वर्गमोक्षौ च नासत्येन परा गतिः ॥ तस्मासत्यं समाश्रित्य प्रवेक्ष्यामि हुताशनम्

satyena svargamokṣau ca nāsatyena parā gatiḥ tasmāsatyaṁ samāśritya pravekṣyāmi hutāśanam

"'सत्य से ही स्वर्ग और मोक्ष प्राप्त होते हैं; असत्य से परम गति नहीं होती; इसलिए सत्य का आश्रय लेकर मैं अग्नि में प्रवेश करूँगी।'

श्लोक 72 (skanda.3.112.72)

इति सा दृढनिर्बंधा वार्यमाणापि बंधुभिः ॥ सत्यलोपभयान्नारी प्राणांस्त्यक्तुं मनो दधे

iti sā dṛḍhanirbaṁdhā vāryamāṇāpi baṁdhubhiḥ satyalopabhayānnārī prāṇāṁstyaktuṁ mano dadhe

"इस प्रकार वह दृढ़संकल्प स्त्री, बन्धुओं द्वारा रोके जाने पर भी, सत्य के लोप के भय से प्राण त्यागने का मन बना लिया।

श्लोक 73 (skanda.3.112.73)

सर्वस्वं शिवभक्तेभ्यो दत्त्वा ध्यात्वा सदाशिवम् ॥ तमग्निं त्रिः परिक्रम्य प्रदेशाभिमुखी स्थिता

sarvasvaṁ śivabhaktebhyo dattvā dhyātvā sadāśivam tamagniṁ triḥ parikramya pradeśābhimukhī sthitā

"अपना सर्वस्व शिवभक्तों को देकर, सदाशिव का ध्यान करके, उस अग्नि की तीन बार परिक्रमा करके, वह उसके सम्मुख खड़ी हुई।

श्लोक 74 (skanda.3.112.74)

तां पतंतीं समिद्धेऽग्नौ स्वपदार्पितमानसाम् ॥ वारयामास विश्वात्मा प्रादुर्भूतः शिवः स्वयम्

tāṁ pataṁtīṁ samiddhe'gnau svapadārpitamānasām vārayāmāsa viśvātmā prādurbhūtaḥ śivaḥ svayam

"प्रज्वलित अग्नि में गिरती हुई, अपने चरणों में मन अर्पित किए उस स्त्री को, साक्षात् प्रकट हुए विश्वात्मा शिव ने स्वयं रोक लिया।

श्लोक 75 (skanda.3.112.75)

सा तं विलोक्याखिलदेव देवं त्रिलोचनं चन्द्रकलावतंसम् ॥ शशांकसूर्यानलकोटिभासं स्तब्धेव भीतेव तथैव तस्थौ

sā taṁ vilokyākhiladeva devaṁ trilocanaṁ candrakalāvataṁsam śaśāṁkasūryānalakoṭibhāsaṁ stabdheva bhīteva tathaiva tasthau

"उसे देखकर — समस्त देवताओं के देव, त्रिलोचन, चन्द्रकला-भूषित, चन्द्र-सूर्य-अग्नि करोड़ों के समान प्रभावाले — वह मानो स्तब्ध, मानो भयभीत, वैसे ही खड़ी रह गई।

श्लोक 76 (skanda.3.112.76)

तां विह्वलां परित्रस्तां वेपमानां जडी कृताम् ॥ समाश्वास्य गलद्बाष्पां करे गृह्याब्रवीद्वचः

tāṁ vihvalāṁ paritrastāṁ vepamānāṁ jaḍī kṛtām samāśvāsya galadbāṣpāṁ kare gṛhyābravīdvacaḥ

"उस विह्वल, भयभीत, काँपती, जड़ हो गई, आँसू बहाती स्त्री को सान्त्वना देकर, उसका हाथ पकड़कर उन्होंने यह वचन कहा —

श्लोक 77 (skanda.3.112.77)

शिव उवाच ॥ सत्यं धर्मं च ते धैर्यं भक्तिं च मयि निश्चलाम् ॥ निरीक्षितुं त्वत्सकाशं वैश्यो भूत्वाहमागतः

śiva uvāca satyaṁ dharmaṁ ca te dhairyaṁ bhaktiṁ ca mayi niścalām nirīkṣituṁ tvatsakāśaṁ vaiśyo bhūtvāhamāgataḥ

"शिव ने कहा — 'तुम्हारे सत्य, धर्म, धैर्य और मुझमें अचल भक्ति को देखने के लिए, मैं वैश्य बनकर तुम्हारे पास आया था।

श्लोक 78 (skanda.3.112.78)

माययाग्निं समुत्थाप्य दग्धवान्नाट्यमंडपम् ॥ दग्धं कृत्वा रत्नलिंगं प्रवृष्टोस्मि हुताशनम्

māyayāgniṁ samutthāpya dagdhavānnāṭyamaṁḍapam dagdhaṁ kṛtvā ratnaliṁgaṁ pravṛṣṭosmi hutāśanam

"'माया से अग्नि उत्पन्न करके मैंने नाट्यमण्डप जलाया; रत्नलिंग को जलाकर मैं अग्नि में प्रविष्ट हुआ।

श्लोक 79 (skanda.3.112.79)

वेश्याः कैतवकारिण्यः स्वैरिण्यो जनवंचकाः ॥ सा त्वं सत्यमनुस्मृत्य प्रविष्टाग्निं मया सह

veśyāḥ kaitavakāriṇyaḥ svairiṇyo janavaṁcakāḥ sā tvaṁ satyamanusmṛtya praviṣṭāgniṁ mayā saha

"'वेश्याएँ कपटपूर्ण, स्वेच्छाचारिणी, लोगों को धोखा देनेवाली होती हैं; किन्तु तुम, सत्य का स्मरण करके, मेरे साथ अग्नि में प्रविष्ट हुई।

श्लोक 80 (skanda.3.112.80)

अतस्ते संप्रदास्यामि भोगांस्त्रिदशदुर्लभान् ॥ आयुश्च परमं दीर्घमारोग्यं च प्रजोन्नतिम् ॥ यद्यदिच्छसि सुश्रोणि तत्तदेव ददामि ते

ataste saṁpradāsyāmi bhogāṁstridaśadurlabhān āyuśca paramaṁ dīrghamārogyaṁ ca prajonnatim yadyadicchasi suśroṇi tattadeva dadāmi te

"'इसलिए मैं तुम्हें देवताओं के लिए भी दुर्लभ भोग दूँगा; परम दीर्घ आयु, आरोग्य और सन्तान की उन्नति; जो-जो चाहो, हे सुश्रोणि! वही-वही मैं तुम्हें दूँगा।'"

श्लोक 81 (skanda.3.112.81)

सूत उवाच ॥ इति ब्रुवति गौरीशे सा वेश्या प्रत्यभाषत

sūta uvāca iti bruvati gaurīśe sā veśyā pratyabhāṣata

सूत जी ने कहा — इस प्रकार गौरीश के कहने पर, वह वेश्या उत्तर देने लगी।

श्लोक 82 (skanda.3.112.82)

वेश्योवाच ॥ न मे वांछास्ति भोगेषु भूमौ स्वर्गे रसातले ॥ तव पादांबुजस्पर्शादन्यत्किंचिन्न वै वृणे

veśyovāca na me vāṁchāsti bhogeṣu bhūmau svarge rasātale tava pādāṁbujasparśādanyatkiṁcinna vai vṛṇe

वेश्या ने कहा — "मुझे पृथ्वी, स्वर्ग या रसातल के भोगों की कोई इच्छा नहीं है; आपके चरणकमल के स्पर्श के अतिरिक्त मैं और कुछ नहीं माँगती।

श्लोक 83 (skanda.3.112.83)

एते भृत्याश्च दास्यश्च ये चान्ये मम बांधवाः ॥ सर्वे त्वदर्चनपरास्त्वयि संन्यस्तवृत्तयः

ete bhṛtyāśca dāsyaśca ye cānye mama bāṁdhavāḥ sarve tvadarcanaparāstvayi saṁnyastavṛttayaḥ

"ये सेवक-दासियाँ, और मेरे जो अन्य बन्धुजन हैं, वे सभी आपकी अर्चना में रत हैं, आपमें ही अपनी वृत्ति समर्पित किए हुए।

श्लोक 84 (skanda.3.112.84)

सर्वानेतान्मया सार्धं नीत्वा तव परं पदम् ॥ पुनर्जन्मभयं घोरं विमोचय नमोस्तु ते

sarvānetānmayā sārdhaṁ nītvā tava paraṁ padam punarjanmabhayaṁ ghoraṁ vimocaya namostu te

"इन सभी को मेरे साथ लेकर, अपने परम पद को ले जाइए; पुनर्जन्म के घोर भय से मुझे मुक्त कीजिए; आपको नमस्कार है।"

श्लोक 85 (skanda.3.112.85)

तथेति तस्या वचनं प्रतिनंद्य महेश्वरः ॥ तान्सर्वांश्च तया सार्धं निनाय परमं पदम्

tatheti tasyā vacanaṁ pratinaṁdya maheśvaraḥ tānsarvāṁśca tayā sārdhaṁ nināya paramaṁ padam

महेश्वर ने उसके इस वचन को स्वीकार करके "ऐसा ही हो" कहकर, उन सभी को उसके साथ अपने परम पद को ले गए।

श्लोक 86 (skanda.3.112.86)

पराशर उवाच ॥ नाट्यमंडपिकादाहे यौ दूरं विद्रुतौ पुरा ॥ तत्रावशिष्टौ तावेव कुक्कुटो मर्कटस्तथा

parāśara uvāca nāṭyamaṁḍapikādāhe yau dūraṁ vidrutau purā tatrāvaśiṣṭau tāveva kukkuṭo markaṭastathā

पराशर ने कहा — "नाट्यमण्डप के जलने पर जो दोनों दूर भाग गए थे, वहाँ अवशिष्ट रह गए थे वे ही मुर्गा और बन्दर।

श्लोक 87 (skanda.3.112.87)

कालेन निधनं यातो यस्तस्या नाट्यमर्कटः ॥ सोभूत्तव कुमारोऽसौ कुवकुटो मंत्रिणः सुतः

kālena nidhanaṁ yāto yastasyā nāṭyamarkaṭaḥ sobhūttava kumāro'sau kuvakuṭo maṁtriṇaḥ sutaḥ

"समय के साथ, उसके नाट्य-बन्दर की जो मृत्यु हुई, वही तुम्हारा यह पुत्र बना; और मुर्गा मन्त्री का पुत्र बना।

श्लोक 88 (skanda.3.112.88)

रुद्राक्षधारणोद्भूतात्पुण्यात्पूर्वभवार्जितात् ॥ कुले महति संजातौ वर्तेते बालकाविमौ

rudrākṣadhāraṇodbhūtātpuṇyātpūrvabhavārjitāt kule mahati saṁjātau vartete bālakāvimau

"पूर्वजन्म में अर्जित रुद्राक्ष-धारण के पुण्य से, ये दोनों बालक महान कुल में उत्पन्न हुए हैं।

श्लोक 89 (skanda.3.112.89)

पूर्वाभ्यासेन रुद्राक्षान्दधाते शुद्धमानसौ ॥ अस्मिञ्जन्मनि तं लोकं शिवं संपूज्य यास्य तः

pūrvābhyāsena rudrākṣāndadhāte śuddhamānasau asmiñjanmani taṁ lokaṁ śivaṁ saṁpūjya yāsya taḥ

"पूर्वाभ्यास से शुद्ध मनवाले वे दोनों रुद्राक्ष धारण करते हैं; इस जन्म में शिव की भलीभाँति पूजा करके वे उसी लोक को जाएँगे।

श्लोक 90 (skanda.3.112.90)

एषा प्रवृत्तिस्त्वनयोर्बालयोः समुदाहृता ॥ कथा च शिवभक्ताया किमन्यत्प्रष्टुमिच्छसि

eṣā pravṛttistvanayorbālayoḥ samudāhṛtā kathā ca śivabhaktāyā kimanyatpraṣṭumicchasi

"यह इन दोनों बालकों का वृत्तान्त और शिवभक्ता की कथा कही गई; अन्य क्या पूछना चाहते हो?"

अध्याय 111अध्याय-सूचीअध्याय 113