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ब्रह्म खण्ड · अध्याय 111

शारदा के व्रत की पूर्णता

अध्याय 110अध्याय-सूचीअध्याय 112

श्लोक 1 (skanda.3.111.1)

॥ सूत उवाच ॥ एवं महाव्रतं तस्याश्चरंत्या गुरुसन्निधौ ॥ संवत्सरो व्यतीयाय नियमासक्तचेतसः

sūta uvāca evaṁ mahāvrataṁ tasyāścaraṁtyā gurusannidhau saṁvatsaro vyatīyāya niyamāsaktacetasaḥ

सूत जी ने कहा — इस प्रकार गुरु के समीप यह महाव्रत करते हुए, नियम में आसक्तचित्त उसका एक वर्ष बीत गया।

श्लोक 2 (skanda.3.111.2)

संवत्सरांते सा बाला तत्रैव पितृमंदिरे ॥ चकारोद्यापनं सम्यग्विप्रभोजनपूर्वकम्

saṁvatsarāṁte sā bālā tatraiva pitṛmaṁdire cakārodyāpanaṁ samyagviprabhojanapūrvakam

वर्ष के अन्त में, वह बालिका उसी पिता के घर में, ब्राह्मण-भोजन पूर्वक भलीभाँति उद्यापन किया।

श्लोक 3 (skanda.3.111.3)

दत्त्वा च दक्षिणां तेभ्यो ब्राह्मणेभ्यो यथार्हतः ॥ विसृज्य तान्नमस्कृत्य पितृभ्यामभिनंदिता

dattvā ca dakṣiṇāṁ tebhyo brāhmaṇebhyo yathārhataḥ visṛjya tānnamaskṛtya pitṛbhyāmabhinaṁditā

उन ब्राह्मणों को यथोचित दक्षिणा देकर, उन्हें विदा करके नमस्कार करके, अपने माता-पिता द्वारा अभिनन्दित हुई।

श्लोक 4 (skanda.3.111.4)

उपोषिता स्वयं तस्मिन्दिने नियममाश्रिता ॥ जजाप परमं मंत्रमुपदिष्टं महात्मना

upoṣitā svayaṁ tasmindine niyamamāśritā jajāpa paramaṁ maṁtramupadiṣṭaṁ mahātmanā

उस दिन स्वयं उपवास करके, नियम का आश्रय लेकर, उसने उस महात्मा द्वारा उपदिष्ट परम मन्त्र का जप किया।

श्लोक 5 (skanda.3.111.5)

अथ प्रदोषसमये प्राप्ते संपूज्य शंकरम् ॥ तस्मिन्गृहांतिकमठे गुरोस्तस्य च सन्निधौ

atha pradoṣasamaye prāpte saṁpūjya śaṁkaram tasmingṛhāṁtikamaṭhe gurostasya ca sannidhau

फिर प्रदोष का समय आने पर, शंकर की पूजा करके, उस घर के समीप के मठ में, उस गुरु के सान्निध्य में,

श्लोक 6 (skanda.3.111.6)

जपार्चनरता साध्वी ध्यायती परमेश्वरम् ॥ तस्मिञ्जागरणे रात्रावुपविष्टा शिवांतिके

japārcanaratā sādhvī dhyāyatī parameśvaram tasmiñjāgaraṇe rātrāvupaviṣṭā śivāṁtike

जप-अर्चना में रत वह साध्वी, परमेश्वर का ध्यान करती हुई, उस रात्रि जागरण में शिव के समीप बैठी रही।

श्लोक 7 (skanda.3.111.7)

युग्मम् ॥ तस्यां रात्रौ तया सार्धं स मुनिर्जगदंबिकाम् ॥ जपध्यान तपोभिश्च तोषयामास पार्वतीम्

yugmam tasyāṁ rātrau tayā sārdhaṁ sa munirjagadaṁbikām japadhyāna tapobhiśca toṣayāmāsa pārvatīm

उस रात्रि उसके साथ वह मुनि जगदम्बिका पार्वती को जप, ध्यान और तप से संतुष्ट करने लगा।

श्लोक 8 (skanda.3.111.8)

तस्याश्च भक्त्या व्रतभाविताया मुनेस्तपोयोगसमाधिना च ॥ तुष्टा भवानी जगदेकमाता प्रादुर्बभूवा कृतसांद्रमूर्तिः

tasyāśca bhaktyā vratabhāvitāyā munestapoyogasamādhinā ca tuṣṭā bhavānī jagadekamātā prādurbabhūvā kṛtasāṁdramūrtiḥ

और व्रत से भावित उसकी भक्ति से, और मुनि के तप-योग-समाधि से संतुष्ट होकर, जगत की एकमात्र माता भवानी सांद्र मूर्ति धारण करके प्रकट हुईं।

श्लोक 9 (skanda.3.111.9)

प्रादुर्भूता यदा गौरी तयोरग्रे जगन्मयी ॥ अन्धोऽपि तत्क्षणादेव मुनिः प्राप दृशोर्द्वयम्

prādurbhūtā yadā gaurī tayoragre jaganmayī andho'pi tatkṣaṇādeva muniḥ prāpa dṛśordvayam

जब गौरी, जगन्मयी, उन दोनों के सामने प्रकट हुईं, तब वह अन्धा मुनि भी उसी क्षण अपनी दोनों आँखें प्राप्त कर लिया।

श्लोक 10 (skanda.3.111.10)

तां वीक्ष्य जगतां धात्रीमाविर्भूतां पुरःस्थिताम् ॥ निपेततुस्तत्पदयोः स मुनिः सा च कन्यका

tāṁ vīkṣya jagatāṁ dhātrīmāvirbhūtāṁ puraḥsthitām nipetatustatpadayoḥ sa muniḥ sā ca kanyakā

जगत की उस धात्री को सामने प्रकट खड़ी देखकर, वह मुनि और वह कन्या दोनों उनके चरणों में गिर पड़े।

श्लोक 11 (skanda.3.111.11)

तौ भक्तिभावोच्छ्वसितामलाशयावानंदबाष्पोक्षित सर्वगात्रौ ॥ उत्थाप्य देवी कृपया परिप्लुता प्रेम्णा बभाषे मृदुवल्गुभाषिणी

tau bhaktibhāvocchvasitāmalāśayāvānaṁdabāṣpokṣita sarvagātrau utthāpya devī kṛpayā pariplutā premṇā babhāṣe mṛduvalgubhāṣiṇī

भक्तिभाव से उमड़े शुद्ध हृदयवाले, आनन्द के आँसुओं से भीगे सम्पूर्ण अंगोंवाले उन दोनों को उठाकर, करुणा से भरी देवी ने प्रेमपूर्वक कोमल मधुर वाणी में कहा —

श्लोक 12 (skanda.3.111.12)

देव्युवाच ॥ प्रीतास्मि ते मुनिश्रेष्ठ वत्से प्रीतास्मि तेऽनघे ॥ किं वा ददाम्यभिमतं देवानामपि दुर्लभम्

devyuvāca prītāsmi te muniśreṣṭha vatse prītāsmi te'naghe kiṁ vā dadāmyabhimataṁ devānāmapi durlabham

देवी ने कहा — "हे मुनिश्रेष्ठ! मैं तुमसे प्रसन्न हूँ; हे वत्से, निष्पाप! तुमसे भी प्रसन्न हूँ। देवताओं के लिए भी दुर्लभ, तुम्हारी क्या इच्छित वस्तु दूँ?"

श्लोक 13 (skanda.3.111.13)

मुनिरुवाच ॥ एषा तु शारदा नाम कन्या तु गतभतृका ॥ मया प्रतिश्रुतं चास्यै तुष्टेन गतचक्षुषा

muniruvāca eṣā tu śāradā nāma kanyā tu gatabhatṛkā mayā pratiśrutaṁ cāsyai tuṣṭena gatacakṣuṣā

मुनि ने कहा — "यह शारदा नाम की कन्या है, जिसका पति चल बसा; मैंने इसे प्रसन्न होकर, तब अन्धा होते हुए भी, वचन दिया था —

श्लोक 14 (skanda.3.111.14)

सह भर्त्रा चिरं कालं विहृत्य सुतमुत्तमम् ॥ लभस्वेति मया प्रोक्तं सत्यं कुरु नमोऽस्तु ते

saha bhartrā ciraṁ kālaṁ vihṛtya sutamuttamam labhasveti mayā proktaṁ satyaṁ kuru namo'stu te

"'पति के साथ दीर्घकाल तक विहार करके, उत्तम पुत्र पाकर, तुम प्राप्त करोगी' — यह मैंने कहा था; इसे सत्य कीजिए, आपको नमस्कार है।"

श्लोक 15 (skanda.3.111.15)

श्रीदेव्युवाच ॥ एषा पूर्वभवे बाला द्राविडस्य द्विजन्मनः ॥ आसीद्द्वितीया दयिता भामिनी नाम विश्रुता

śrīdevyuvāca eṣā pūrvabhave bālā drāviḍasya dvijanmanaḥ āsīddvitīyā dayitā bhāminī nāma viśrutā

श्रीदेवी ने कहा — "यह बालिका पूर्वजन्म में एक द्राविड़ ब्राह्मण की भामिनी नाम से विख्यात दूसरी प्रिय पत्नी थी।

श्लोक 16 (skanda.3.111.16)

सा भर्तृप्रेयसी नित्यं रूपमाधुर्यपेशला ॥ भर्तारं वशमानिन्ये रूपवश्यादिकैतवैः

sā bhartṛpreyasī nityaṁ rūpamādhuryapeśalā bhartāraṁ vaśamāninye rūpavaśyādikaitavaiḥ

"वह सदा पति की प्रिया, रूप-माधुर्य से युक्त, अपने रूप-वशीकरण आदि छलों से पति को अपने वश में कर लेती थी।

श्लोक 17 (skanda.3.111.17)

अस्यां चासक्तहृदयः स विप्रो मोहयंत्रितः ॥ कदाचिदपि नैवागाज्ज्येष्ठपत्नीं पतिव्रताम्

asyāṁ cāsaktahṛdayaḥ sa vipro mohayaṁtritaḥ kadācidapi naivāgājjyeṣṭhapatnīṁ pativratām

"उसमें आसक्तचित्त, मोह से बँधा वह ब्राह्मण कभी भी अपनी पतिव्रता ज्येष्ठ पत्नी के पास नहीं जाता था।

श्लोक 18 (skanda.3.111.18)

अनभ्यागमनाद्भर्तुः सा नारी पुत्रवर्जिता ॥ सदा शोकेन संतप्ता कालेन निधनं गता

anabhyāgamanādbhartuḥ sā nārī putravarjitā sadā śokena saṁtaptā kālena nidhanaṁ gatā

"पति के न आने से वह स्त्री, सन्तानहीन, सदा शोक से संतप्त, समय के साथ मृत्यु को प्राप्त हुई।

श्लोक 19 (skanda.3.111.19)

अस्या गृहसमीपस्थो यः कश्चिद्ब्राह्मणो युवा ॥ इमां वीक्ष्याथ चार्वंगीं कामार्तः करमग्रहीत्

asyā gṛhasamīpastho yaḥ kaścidbrāhmaṇo yuvā imāṁ vīkṣyātha cārvaṁgīṁ kāmārtaḥ karamagrahīt

"इसके घर के समीप रहनेवाला कोई युवा ब्राह्मण, इस सुन्दरी को देखकर, कामार्त होकर उसका हाथ पकड़ लिया।

श्लोक 20 (skanda.3.111.20)

अनया रोषताम्राक्ष्या स विप्रस्तु निवारितः ॥ इमां स्मरन्दिवानक्तं निधनं प्रत्यपद्यत

anayā roṣatāmrākṣyā sa viprastu nivāritaḥ imāṁ smarandivānaktaṁ nidhanaṁ pratyapadyata

"क्रोध से लाल नेत्रोंवाली इसके द्वारा वह ब्राह्मण रोका गया; इसका स्मरण करते हुए दिन-रात, वह मृत्यु को प्राप्त हुआ।

श्लोक 21 (skanda.3.111.21)

एषा संमोह्य भर्तारं ज्येष्ठपत्न्यां पराङ्मुखम् ॥ चकार तेन पापेन भवेस्मिन्विधवाऽभवत्

eṣā saṁmohya bhartāraṁ jyeṣṭhapatnyāṁ parāṅmukham cakāra tena pāpena bhavesminvidhavā'bhavat

"इस प्रकार पति को मोहित करके ज्येष्ठ पत्नी से विमुख करके, इसने वह पाप किया, जिससे यह इस जन्म में विधवा हुई।

श्लोक 22 (skanda.3.111.22)

याः कुर्वंति स्त्रियो लोके जायापत्योश्च विप्रियम् ॥ तासां कौमारवैधव्यमेकविंशतिजन्मसु

yāḥ kurvaṁti striyo loke jāyāpatyośca vipriyam tāsāṁ kaumāravaidhavyamekaviṁśatijanmasu

"जो स्त्रियाँ संसार में पति-पत्नी के बीच अप्रियता उत्पन्न करती हैं, उन्हें इक्कीस जन्मों तक बाल्यावस्था में ही वैधव्य प्राप्त होता है।

श्लोक 23 (skanda.3.111.23)

यदेतया पूर्वभवे मत्पूजा महती कृता ॥ तेन पुण्येन तत्पापं नष्टं सर्वं तदैव हि

yadetayā pūrvabhave matpūjā mahatī kṛtā tena puṇyena tatpāpaṁ naṣṭaṁ sarvaṁ tadaiva hi

"किन्तु इसने पूर्वजन्म में मेरी जो महती पूजा की थी, उस पुण्य से वह पाप उसी समय सर्वथा नष्ट हो गया।

श्लोक 24 (skanda.3.111.24)

यो विप्रो विरहार्तः सन्मृतः कामविमोहितः ॥ सोऽस्याः पाणिग्रहं कृत्वा भवेस्मिन्निधनं गतः

yo vipro virahārtaḥ sanmṛtaḥ kāmavimohitaḥ so'syāḥ pāṇigrahaṁ kṛtvā bhavesminnidhanaṁ gataḥ

"जो ब्राह्मण विरह से पीड़ित, काम से मोहित होकर मरा था, वह इसका पाणिग्रहण करके इस जन्म में मृत्यु को प्राप्त हुआ।

श्लोक 25 (skanda.3.111.25)

प्राग्जन्मपतिरेतस्याः पांड्यराष्ट्रेषु सोऽधुना ॥ जातो विप्रवरः श्रीमान्सदारः सपरिच्छदः

prāgjanmapatiretasyāḥ pāṁḍyarāṣṭreṣu so'dhunā jāto vipravaraḥ śrīmānsadāraḥ saparicchadaḥ

"इसका पूर्वजन्म का पति अभी पाण्ड्य देशों में, श्रीमान, पत्नी और परिवार सहित, श्रेष्ठ ब्राह्मण के रूप में जन्मा है।

श्लोक 26 (skanda.3.111.26)

तेन भर्त्रा प्रतिनिशं सैषा प्रेम्णाभिसंगता ॥ स्वप्ने रतिसुखं यातु श्रेष्ठं जागरणादपि

tena bhartrā pratiniśaṁ saiṣā premṇābhisaṁgatā svapne ratisukhaṁ yātu śreṣṭhaṁ jāgaraṇādapi

"उस पति के साथ यह प्रतिरात्रि प्रेमपूर्वक मिलती है; स्वप्न में जागरण से भी श्रेष्ठ रतिसुख को प्राप्त करे।

श्लोक 27 (skanda.3.111.27)

षष्ट्युत्तरत्रिशतयोजनदूरसंस्थो देशादितो द्विजवरः स च कर्मगत्या ॥ एनां वधूं प्रतिनिशं मनसोभिरामां स्वप्नेषु पश्यति चिरं रतिमादधानः

ṣaṣṭyuttaratriśatayojanadūrasaṁstho deśādito dvijavaraḥ sa ca karmagatyā enāṁ vadhūṁ pratiniśaṁ manasobhirāmāṁ svapneṣu paśyati ciraṁ ratimādadhānaḥ

"यहाँ से तीन सौ साठ योजन दूर स्थित देश से वह श्रेष्ठ ब्राह्मण, कर्म की गति से,

श्लोक 28 (skanda.3.111.28)

सैषा वै स्वप्नसंगत्या पत्युः प्रतिनिशं सती ॥ कालेन लप्स्यते पुत्रं वेदवेदांगपारगम्

saiṣā vai svapnasaṁgatyā patyuḥ pratiniśaṁ satī kālena lapsyate putraṁ vedavedāṁgapāragam

"इस मनोहर वधू को प्रतिरात्रि स्वप्न में देखता है, चिरकाल तक रति का आनन्द लेते हुए।

श्लोक 29 (skanda.3.111.29)

एतस्यां तनयं जातमात्मनश्चिरसंगमात् ॥ सोऽपि विप्रोऽनिशं स्वप्ने द्रक्ष्यति प्रेमभावितम्

etasyāṁ tanayaṁ jātamātmanaścirasaṁgamāt so'pi vipro'niśaṁ svapne drakṣyati premabhāvitam

"यह सती स्वप्न-संगम से प्रतिरात्रि पति से मिलती हुई, समय के साथ वेद-वेदांगों में पारंगत पुत्र प्राप्त करेगी।

श्लोक 30 (skanda.3.111.30)

अनयाराधिता पूर्वे भवे साहं महामुने ॥ अस्यैव वरदानाय प्रादुर्भूतास्मि सांप्रतम्

anayārādhitā pūrve bhave sāhaṁ mahāmune asyaiva varadānāya prādurbhūtāsmi sāṁpratam

"इसमें अपने चिरकालीन संगम से उत्पन्न पुत्र को, वह ब्राह्मण भी निरन्तर स्वप्न में प्रेमपूर्वक देखेगा।

श्लोक 31 (skanda.3.111.31)

सूत उवाच ॥ अथोवाच महादेवी तां बालां प्रति सादरम् ॥ अयि वत्से महाभागे शृणु मे परमं वचः

sūta uvāca athovāca mahādevī tāṁ bālāṁ prati sādaram ayi vatse mahābhāge śṛṇu me paramaṁ vacaḥ

"पूर्वजन्म में इसके द्वारा आराधित मैं, हे महामुने! इसे यह वर देने के लिए ही अभी प्रकट हुई हूँ।"

श्लोक 32 (skanda.3.111.32)

यदा कदापि भर्त्तारं क्वापि देशे पुरातनम् ॥ द्रक्ष्यसि स्वप्नदृष्टं प्राक्ज्ञास्यसे त्वं विचक्षणा

yadā kadāpi bharttāraṁ kvāpi deśe purātanam drakṣyasi svapnadṛṣṭaṁ prākjñāsyase tvaṁ vicakṣaṇā

सूत जी ने कहा — फिर महादेवी ने उस बालिका से आदरपूर्वक कहा — "हे वत्से, महाभागे! मेरा परम वचन सुनो।

श्लोक 33 (skanda.3.111.33)

त्वां द्रक्ष्यति स विप्रोपि सुनयां स्वप्नलक्षणाम् ॥ तदा परस्परालापो युवयोः संभविष्यति

tvāṁ drakṣyati sa vipropi sunayāṁ svapnalakṣaṇām tadā parasparālāpo yuvayoḥ saṁbhaviṣyati

"जब कभी भी किसी देश में उस अपने पूर्वकालिक पति को, स्वप्न में देखे हुए के रूप में, तुम देखोगी, तो तुम, हे विचक्षणे! पहले से ही जान लोगी।

श्लोक 34 (skanda.3.111.34)

तदा स्वतनयं भद्रे तस्मै देहि बहुश्रुतम् ॥ फलमस्य व्रतस्याग्र्यं तस्य हस्ते समर्पय

tadā svatanayaṁ bhadre tasmai dehi bahuśrutam phalamasya vratasyāgryaṁ tasya haste samarpaya

"वह ब्राह्मण भी तुम्हें, स्वप्न-लक्षणवाली सुन्दरी के रूप में देखेगा; तब तुम दोनों के बीच परस्पर वार्तालाप होगा।

श्लोक 35 (skanda.3.111.35)

ततः प्रभृति तस्यैव वशे तिष्ठ सुमध्यमे ॥ युवयोदैहिकः संगो माभूत्स्वप्नरतादृते

tataḥ prabhṛti tasyaiva vaśe tiṣṭha sumadhyame yuvayodaihikaḥ saṁgo mābhūtsvapnaratādṛte

"तब, हे भद्रे! अपने बहुश्रुत पुत्र को उसे दे देना; इस व्रत का प्रधान फल उसके हाथ में सौंप देना।

श्लोक 36 (skanda.3.111.36)

कालात्पंचत्वमापन्ने तस्मिन्ब्राह्मणसत्तमे ॥ अग्निं प्रविश्य तेनैव सह यास्यसि मत्पदम्

kālātpaṁcatvamāpanne tasminbrāhmaṇasattame agniṁ praviśya tenaiva saha yāsyasi matpadam

"उसके बाद से केवल उसी के वश में रहना, हे सुमध्यमे! तुम दोनों के बीच स्वप्न-रति के अतिरिक्त कोई शारीरिक संगम न हो।

श्लोक 37 (skanda.3.111.37)

पुत्रस्ते भविता सुभ्रु सर्वलोकमनोरमः ॥ संपदश्च भविष्यंति प्राप्स्यते परमं पदम्

putraste bhavitā subhru sarvalokamanoramaḥ saṁpadaśca bhaviṣyaṁti prāpsyate paramaṁ padam

"जब समय आने पर वह उत्तम ब्राह्मण पंचत्व को प्राप्त होगा, तब अग्नि में प्रवेश करके उसी के साथ तुम मेरे पद को जाओगी।

श्लोक 38 (skanda.3.111.38)

सूत उवाच ॥ इत्युक्त्वा त्रिजगन्माता दत्त्वा तस्यै मनोरथम् ॥ तयोः संपश्यतोरेव क्षणेनादर्शनं गता

sūta uvāca ityuktvā trijaganmātā dattvā tasyai manoratham tayoḥ saṁpaśyatoreva kṣaṇenādarśanaṁ gatā

"तुम्हारा पुत्र, हे सुभ्रु! समस्त लोकों को मनोहर लगनेवाला होगा; सम्पदाएँ प्राप्त होंगी, वह परम पद को प्राप्त करेगा।"

श्लोक 39 (skanda.3.111.39)

सापि बाला वरं लब्ध्वा पार्वत्याः करुणानिधेः ॥ अवाप परमानंदं पूजयामास तं गुरुम्

sāpi bālā varaṁ labdhvā pārvatyāḥ karuṇānidheḥ avāpa paramānaṁdaṁ pūjayāmāsa taṁ gurum

सूत जी ने कहा — यह कहकर, त्रिजगन्माता ने उसे यह मनोरथ देकर, उन दोनों के देखते-देखते ही क्षणभर में अदृश्य हो गईं।

श्लोक 40 (skanda.3.111.40)

तस्यां रात्र्यां व्यतीतायां स मुनिर्लब्धलोचनः ॥ तस्याः पित्रोश्च तत्सर्वं रहस्याचष्ट धर्मवित्

tasyāṁ rātryāṁ vyatītāyāṁ sa munirlabdhalocanaḥ tasyāḥ pitrośca tatsarvaṁ rahasyācaṣṭa dharmavit

वह बालिका भी करुणानिधि पार्वती से वर पाकर परम आनन्द को प्राप्त हुई, और उस गुरु की पूजा करने लगी।

श्लोक 41 (skanda.3.111.41)

अथ सर्वानुपामंत्र्य शारदां च यशस्विनीम् ॥ विधायानुग्रहं तेषां ययौ स्वैरगतिर्मुनिः

atha sarvānupāmaṁtrya śāradāṁ ca yaśasvinīm vidhāyānugrahaṁ teṣāṁ yayau svairagatirmuniḥ

उस रात्रि के बीत जाने पर, दृष्टि प्राप्त वह मुनि, धर्मज्ञ, उसके माता-पिता को वह सब कुछ रहस्य बताया।

श्लोक 42 (skanda.3.111.42)

एवं दिनेषु गच्छत्सु सा बाला च प्रतिक्षणम् ॥ भर्तुः समागमं लेभे स्वप्ने सुख विवर्धनम्

evaṁ dineṣu gacchatsu sā bālā ca pratikṣaṇam bhartuḥ samāgamaṁ lebhe svapne sukha vivardhanam

फिर सभी को और यशस्विनी शारदा को विदा करके, उन्हें अनुग्रह देकर, वह मुनि यथेच्छ गति से चला गया।

श्लोक 43 (skanda.3.111.43)

गौर्या वरप्रदानेन शारदा विशदव्रता ॥ दधार गर्भं स्वप्नेपि भर्तुः संगानुभावतः

gauryā varapradānena śāradā viśadavratā dadhāra garbhaṁ svapnepi bhartuḥ saṁgānubhāvataḥ

इस प्रकार दिन बीतते हुए, वह बालिका प्रतिक्षण, सुख बढ़ानेवाला अपने पति का समागम स्वप्न में प्राप्त करने लगी।

श्लोक 44 (skanda.3.111.44)

तां श्रुत्वा भर्तृरहितां शारदां गर्भिणी सतीम्॥ सर्वे धिगिति प्रोचुस्तां जारिणीति जगुर्जनाः

tāṁ śrutvā bhartṛrahitāṁ śāradāṁ garbhiṇī satīm sarve dhigiti procustāṁ jāriṇīti jagurjanāḥ

गौरी के वरदान से, विशद व्रतवाली शारदा, स्वप्न में भी पति के संगम के प्रभाव से गर्भ धारण किया।

श्लोक 45 (skanda.3.111.45)

संपरेतस्य तद्भर्तुर्ये जातिकुलवबांधवाः ॥ तां वार्तां दुःसहां श्रुत्वा ययुस्तत्पितृमंदिरम्

saṁparetasya tadbharturye jātikulavabāṁdhavāḥ tāṁ vārtāṁ duḥsahāṁ śrutvā yayustatpitṛmaṁdiram

पति के बिना गर्भवती शारदा के बारे में सुनकर, सभी ने "धिक्कार है" कहा, और लोगों ने उसे व्यभिचारिणी कहा।

श्लोक 46 (skanda.3.111.46)

अथ सर्वे समायाता ग्रामवृद्धाश्च पंडिताः ॥ समाजं चक्रिरे तत्र कुलवृद्धैः समन्वितम्

atha sarve samāyātā grāmavṛddhāśca paṁḍitāḥ samājaṁ cakrire tatra kulavṛddhaiḥ samanvitam

उसके मृत पति के जाति-कुल के बन्धुजन, वह असह्य समाचार सुनकर उसके पिता के घर गए।

श्लोक 47 (skanda.3.111.47)

अन्तर्वत्नीं समाहूय शारदां विनताननाम् ॥ अतर्जयन्सुसंक्रुद्धाः केचिदासन्पराङ्मुखाः

antarvatnīṁ samāhūya śāradāṁ vinatānanām atarjayansusaṁkruddhāḥ kecidāsanparāṅmukhāḥ

फिर वहाँ सभी गाँव के वृद्ध और पण्डित आए, और कुल के वृद्धजनों सहित वहाँ एक सभा की।

श्लोक 48 (skanda.3.111.48)

अयि जारिणि दुर्बुद्धे किमेतत्ते विचेष्टितम् ॥ अस्मत्कुले सुदुष्कीर्त्तिं कृतवत्यसि बालिशे

ayi jāriṇi durbuddhe kimetatte viceṣṭitam asmatkule suduṣkīrttiṁ kṛtavatyasi bāliśe

गर्भवती, झुके मुखवाली शारदा को बुलाकर, कुछ अत्यन्त क्रुद्ध होकर उसे डाँटने लगे, कुछ मुँह फेर लिए।

श्लोक 49 (skanda.3.111.49)

इति संतर्जयंतस्ते ग्रामवृद्धा मनीषिणः ॥ सर्वे संमंत्रयामासुः किं कुर्म इति भाषिणः

iti saṁtarjayaṁtaste grāmavṛddhā manīṣiṇaḥ sarve saṁmaṁtrayāmāsuḥ kiṁ kurma iti bhāṣiṇaḥ

"हे दुर्बुद्धि व्यभिचारिणी! यह तूने क्या किया? हे मूर्ख! तूने हमारे कुल में यह भारी अपकीर्ति की है!"

श्लोक 50 (skanda.3.111.50)

तत्रोचुः के च वृद्धास्तां बालां प्रति विनिर्दयाः ॥ एषा पापमतिर्बाला कुलद्वयविनाशिनी

tatrocuḥ ke ca vṛddhāstāṁ bālāṁ prati vinirdayāḥ eṣā pāpamatirbālā kuladvayavināśinī

इस प्रकार डाँटते हुए वे बुद्धिमान गाँव के वृद्ध, सब मिलकर विचार करने लगे, "क्या करें" यह कहते हुए।

श्लोक 51 (skanda.3.111.51)

कृत्वास्याः केशवपनं छित्त्वा कर्णौ च नासिकाम् ॥ निर्वास्यतां बहिर्ग्रामात्परित्यज्य स्वगोत्रतः

kṛtvāsyāḥ keśavapanaṁ chittvā karṇau ca nāsikām nirvāsyatāṁ bahirgrāmātparityajya svagotrataḥ

वहाँ कुछ निर्दयी वृद्धों ने उस बालिका के विषय में कहा — "यह पापबुद्धि बालिका दोनों कुलों की विनाशक है।

श्लोक 52 (skanda.3.111.52)

इति सर्वे समालोच्य तां तथा कर्तुमुद्यताः ॥ अथांतरिक्षे संभूता शुश्रुवे वागगोचरा

iti sarve samālocya tāṁ tathā kartumudyatāḥ athāṁtarikṣe saṁbhūtā śuśruve vāgagocarā

"इसके केश मुँड़वाकर, कान और नाक काटकर, इसे गाँव से बाहर निकाल दिया जाए, अपने ही गोत्र से त्यागकर।"

श्लोक 53 (skanda.3.111.53)

अनया न कृतं पापं न चैव कुलदूषणम् ॥ व्रतभंगो न चैतस्यास्सुचरित्रेयमंगना

anayā na kṛtaṁ pāpaṁ na caiva kuladūṣaṇam vratabhaṁgo na caitasyāssucaritreyamaṁganā

इस प्रकार सभी ने विचार करके ऐसा करने को तैयार हुए; तभी आकाश में उत्पन्न, शरीररहित वाणी सुनाई पड़ी —

श्लोक 54 (skanda.3.111.54)

इतः परमियं नारी जारिणीति वदंति ये ॥ तेषां दोषविमूढानां सद्यो जिह्वा विदीर्यते

itaḥ paramiyaṁ nārī jāriṇīti vadaṁti ye teṣāṁ doṣavimūḍhānāṁ sadyo jihvā vidīryate

"इसके द्वारा कोई पाप नहीं किया गया, न ही कुल का दूषण; इसका व्रत भी भंग नहीं हुआ; यह स्त्री सच्चरित्र है।

श्लोक 55 (skanda.3.111.55)

इत्यंतरिक्षे जनितां वाणीं श्रुत्वाऽशरीरिणीम् ॥ सर्वे प्रजहृषुस्तस्या जननीजनकादयः

ityaṁtarikṣe janitāṁ vāṇīṁ śrutvā'śarīriṇīm sarve prajahṛṣustasyā jananījanakādayaḥ

"अब से जो कोई इस स्त्री को व्यभिचारिणी कहेंगे, उन दोषमूढ़ों की जिह्वा तत्काल फट जाएगी।"

श्लोक 56 (skanda.3.111.56)

ततः ससंभ्रमाः सर्वे ग्रामवृद्धाः सभाजनाः ॥ मुहूर्त्तं मौनमालंब्य भीतास्तस्थुरधोमुखाः

tataḥ sasaṁbhramāḥ sarve grāmavṛddhāḥ sabhājanāḥ muhūrttaṁ maunamālaṁbya bhītāstasthuradhomukhāḥ

इस प्रकार आकाश में उत्पन्न इस शरीररहित वाणी को सुनकर, उसके माता-पिता आदि सभी प्रसन्न हो गए।

श्लोक 57 (skanda.3.111.57)

तत्र केचिदविश्वस्ता मिथ्यावाणीत्यवादिषुः॥ तेषां जिह्वा द्विधा भिन्ना ववमुस्ते कृमीन्क्षणात्

tatra kecidaviśvastā mithyāvāṇītyavādiṣuḥ teṣāṁ jihvā dvidhā bhinnā vavamuste kṛmīnkṣaṇāt

फिर घबराए हुए सभी गाँव के वृद्ध और सभासद, क्षणभर मौन धारण करके, भयभीत होकर नीचे मुँह किए खड़े रहे।

श्लोक 58 (skanda.3.111.58)

ततः संपूजयामासुस्तां बालां ज्ञातिबांधवाः ॥ बांधवाश्च स्त्रियो वृद्धाः शशंसुः साधुसाध्विति

tataḥ saṁpūjayāmāsustāṁ bālāṁ jñātibāṁdhavāḥ bāṁdhavāśca striyo vṛddhāḥ śaśaṁsuḥ sādhusādhviti

वहाँ कुछ अविश्वस्त लोगों ने कहा — "यह मिथ्या वाणी है"; उनकी जिह्वा तत्काल दो भागों में फट गई, और वे कीड़े उगलने लगे।

श्लोक 59 (skanda.3.111.59)

मुमुचुः केचिदानंदबाष्पबिंदून्कुलोत्तमाः॥ कुलस्त्रियः प्रमुदितास्तामुद्दिश्य समाश्वसन्

mumucuḥ kecidānaṁdabāṣpabiṁdūnkulottamāḥ kulastriyaḥ pramuditāstāmuddiśya samāśvasan

फिर उसके ज्ञातिजन और बन्धुजन उस बालिका की पूजा करने लगे; बन्धुजन, स्त्रियाँ और वृद्धजन "साधु, साधु" कहने लगे।

श्लोक 60 (skanda.3.111.60)

अथ तत्रापरे प्रोचुर्देवो वदति नानृतम् ॥ कथमेषां दधौ गर्भं शीलान्न चलिता ध्रुवम्

atha tatrāpare procurdevo vadati nānṛtam kathameṣāṁ dadhau garbhaṁ śīlānna calitā dhruvam

कुल के कुछ श्रेष्ठजनों ने आनन्द के आँसू बहाए; कुल की स्त्रियाँ प्रसन्न होकर उसके प्रति सान्त्वना देने लगीं।

श्लोक 61 (skanda.3.111.61)

इति सर्वान्सभ्यजना न्संशयाविष्टचेतसः ॥ विलोक्य वृद्धस्तत्रैको सर्वज्ञो लोकतत्त्ववित्

iti sarvānsabhyajanā nsaṁśayāviṣṭacetasaḥ vilokya vṛddhastatraiko sarvajño lokatattvavit

फिर वहाँ कुछ अन्य लोगों ने कहा — "देवता झूठ नहीं बोलते; इसने गर्भ कैसे धारण किया, इसका शील निश्चय ही नहीं डगमगाया।"

श्लोक 62 (skanda.3.111.62)

मायामयमिदं विश्वं दृश्यते श्रूयते च यत् ॥ किं भाव्यं किमभाव्यं वा संसारेऽस्मिन्क्षणात्मके

māyāmayamidaṁ viśvaṁ dṛśyate śrūyate ca yat kiṁ bhāvyaṁ kimabhāvyaṁ vā saṁsāre'sminkṣaṇātmake

इस प्रकार सभी सभाजनों को संशयग्रस्त देखकर, वहाँ एक सर्वज्ञ वृद्ध, लोकतत्त्व का ज्ञाता,

श्लोक 63 (skanda.3.111.63)

अनिरूप्यमभूतार्थं मायया जायते स्फुटम् ॥ ईश्वरस्य वशे माया तस्य को वेद चेष्टितम्

anirūpyamabhūtārthaṁ māyayā jāyate sphuṭam īśvarasya vaśe māyā tasya ko veda ceṣṭitam

बोला — "यह विश्व, जो कुछ भी दिखाई-सुनाई देता है, मायामय है; इस क्षणभंगुर संसार में क्या सम्भव है, क्या असम्भव?

श्लोक 64 (skanda.3.111.64)

यूपकेतोश्च राजर्षेः शुक्रं निपतितं जले ॥ सशुक्रं तज्जलं पीत्वा वेश्या गर्भं दधौ किल

yūpaketośca rājarṣeḥ śukraṁ nipatitaṁ jale saśukraṁ tajjalaṁ pītvā veśyā garbhaṁ dadhau kila

"अनिरूप्य, असत्य पदार्थ भी माया से स्पष्ट रूप से उत्पन्न हो जाता है; माया ईश्वर के वश में है, उसकी लीला को कौन जान सकता है?

श्लोक 65 (skanda.3.111.65)

मुनेर्विभांडकस्यापि शुक्रं पीत्वा सहांभसा ॥ हरिणी गर्भिणी भूत्वा ऋष्यशृंगमसूयत

munervibhāṁḍakasyāpi śukraṁ pītvā sahāṁbhasā hariṇī garbhiṇī bhūtvā ṛṣyaśṛṁgamasūyata

"राजर्षि यूपकेतु का वीर्य जल में गिरा; उस वीर्ययुक्त जल को पीकर एक वेश्या ने गर्भ धारण किया।

श्लोक 66 (skanda.3.111.66)

सुराष्ट्रस्य तथा राज्ञः करं स्पृष्ट्वा मृगांगना॥ तत्क्षणाद्गर्भिणी भूत्वा मुनिं प्रासूत तापसम्

surāṣṭrasya tathā rājñaḥ karaṁ spṛṣṭvā mṛgāṁganā tatkṣaṇādgarbhiṇī bhūtvā muniṁ prāsūta tāpasam

"मुनि विभाण्डक के वीर्य को जल सहित पीकर एक हिरणी गर्भवती हुई और ऋष्यशृंग को जन्म दिया।

श्लोक 67 (skanda.3.111.67)

तथा सत्यवती नारी शफरीगर्भसंभवा ॥ तथैव महिषीगर्भो जातश्च महिषासुरः

tathā satyavatī nārī śapharīgarbhasaṁbhavā tathaiva mahiṣīgarbho jātaśca mahiṣāsuraḥ

"इसी प्रकार, सुराष्ट्र के राजा का हाथ छूकर एक मृगांगना तत्काल गर्भवती होकर एक तापस मुनि को जन्म दिया।

श्लोक 68 (skanda.3.111.68)

तथा संति पुरा नार्यः कारुण्याद्गर्भसंभवाः॥ तथा हि वसुदेवेन रोहिण्या स्तनयोऽभवत्

tathā saṁti purā nāryaḥ kāruṇyādgarbhasaṁbhavāḥ tathā hi vasudevena rohiṇyā stanayo'bhavat

"इसी प्रकार सत्यवती नामक स्त्री मछली के गर्भ से उत्पन्न हुई; इसी प्रकार भैंस के गर्भ से महिषासुर उत्पन्न हुआ।

श्लोक 69 (skanda.3.111.69)

देवतानां महर्षीणां शापेन च वरेण च ॥ अयुक्तमपि यत्कर्म युज्यते नात्र संशयः

devatānāṁ maharṣīṇāṁ śāpena ca vareṇa ca ayuktamapi yatkarma yujyate nātra saṁśayaḥ

"इस प्रकार पूर्वकाल में करुणावश गर्भ धारण करनेवाली स्त्रियाँ रही हैं; इसी प्रकार वसुदेव से रोहिणी को पुत्र प्राप्त हुआ।

श्लोक 70 (skanda.3.111.70)

सांबस्य जठराज्जातं मुसलं मुनिशापतः ॥ युवनाश्वस्य गर्भोऽभून्मुनीनां मंत्रगौरवात्

sāṁbasya jaṭharājjātaṁ musalaṁ muniśāpataḥ yuvanāśvasya garbho'bhūnmunīnāṁ maṁtragauravāt

"देवताओं और महर्षियों के शाप और वरदान से, अयुक्त कर्म भी युक्त हो जाता है, इसमें कोई सन्देह नहीं है।

श्लोक 71 (skanda.3.111.71)

नूनमेषापि कल्याणी महर्षेः पादसेवनात् ॥ महाव्रतानुभावाच्च धत्ते गर्भमनिं दिता

nūnameṣāpi kalyāṇī maharṣeḥ pādasevanāt mahāvratānubhāvācca dhatte garbhamaniṁ ditā

"साम्ब के उदर से मुनि के शाप से मूसल उत्पन्न हुआ; युवनाश्व का गर्भ मुनियों के मन्त्र-प्रभाव से हुआ।

श्लोक 72 (skanda.3.111.72)

अस्मिन्नर्थे रहस्येनां सत्यं पृच्छंतु योषितः ॥ ततो निवृत्तसंदेहो भविष्यति महाजनः

asminnarthe rahasyenāṁ satyaṁ pṛcchaṁtu yoṣitaḥ tato nivṛttasaṁdeho bhaviṣyati mahājanaḥ

"निश्चय ही यह कल्याणी भी, महर्षि के चरणों की सेवा और महाव्रत के प्रभाव से, निर्दोष होते हुए भी गर्भ धारण करती है।

श्लोक 73 (skanda.3.111.73)

ततस्तद्वचनादेव तामपृच्छन्स्त्रियो मिथः ॥ ताभ्यः शशंस तत्सर्वं सा स्ववृत्तं महाद्भुतम्

tatastadvacanādeva tāmapṛcchanstriyo mithaḥ tābhyaḥ śaśaṁsa tatsarvaṁ sā svavṛttaṁ mahādbhutam

"इस विषय में, एकान्त में इससे स्त्रियाँ सत्य पूछें; तब यह सभा संशयरहित हो जाएगी।"

श्लोक 74 (skanda.3.111.74)

विजानंतस्ततः सर्वे मानयित्वा च तां सतीम् ॥ मोदमानाः प्रशंसंतः प्रययुः स्वं स्वमालयम्

vijānaṁtastataḥ sarve mānayitvā ca tāṁ satīm modamānāḥ praśaṁsaṁtaḥ prayayuḥ svaṁ svamālayam

फिर उसी के वचन से, स्त्रियों ने एकान्त में उससे पूछा; उसने उन्हें अपना वह सम्पूर्ण अद्भुत वृत्तान्त बताया।

श्लोक 75 (skanda.3.111.75)

अथ काले शुभे प्राप्ते शारदा विमलाशया ॥ असूत तनयं बाला बालार्कसमतेजसम्

atha kāle śubhe prāpte śāradā vimalāśayā asūta tanayaṁ bālā bālārkasamatejasam

समझ लेने पर, सभी ने उस सती का सम्मान करके, प्रसन्न होकर, उसकी प्रशंसा करते हुए, अपने-अपने घर चले गए।

श्लोक 76 (skanda.3.111.76)

स कुमारो महोदारलक्षणः कमलेक्षणः ॥ अवाप्य महतीं विद्यां बाल्य एव महामतिः

sa kumāro mahodāralakṣaṇaḥ kamalekṣaṇaḥ avāpya mahatīṁ vidyāṁ bālya eva mahāmatiḥ

फिर शुभ समय आने पर, निर्मलहृदया शारदा ने बालसूर्य के समान तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया।

श्लोक 77 (skanda.3.111.77)

अथोपनीतो गुरुणा काले लोकमनोरमः ॥ स शारदेय एवेति लोके ख्याति मवाप ह

athopanīto guruṇā kāle lokamanoramaḥ sa śāradeya eveti loke khyāti mavāpa ha

वह कुमार अत्यन्त उदार लक्षणोंवाला, कमलनयन, बाल्यावस्था में ही महती विद्या प्राप्त कर, महाबुद्धिमान हुआ।

श्लोक 78 (skanda.3.111.78)

ऋग्वेदमष्टमे वर्षे नवमे यजुषां गणम् । दशमे सामवेदं च लीलयाध्यगमत्सुधीः

ṛgvedamaṣṭame varṣe navame yajuṣāṁ gaṇam daśame sāmavedaṁ ca līlayādhyagamatsudhīḥ

फिर समय आने पर गुरु द्वारा उपनीत होकर, लोकमनोहर वह "शारदेय" नाम से ही संसार में प्रसिद्धि पाया।

श्लोक 79 (skanda.3.111.79)

अथ त्रिलोकमहिते संप्राप्ते शिवपर्वणि ॥ गोकर्णं प्रययुः सर्वे जनाः सर्वनिवासिनः

atha trilokamahite saṁprāpte śivaparvaṇi gokarṇaṁ prayayuḥ sarve janāḥ sarvanivāsinaḥ

आठवें वर्ष में ऋग्वेद, नौवें में यजुर्वेद-समूह, दसवें में सामवेद — वह बुद्धिमान लीलापूर्वक ही अध्ययन कर लिया।

श्लोक 80 (skanda.3.111.80)

शारदापि स्वपुत्रेण गोकर्णं प्रययौ सती

śāradāpi svaputreṇa gokarṇaṁ prayayau satī

फिर त्रिलोक-पूजित शिवपर्व आने पर, सर्वत्र के निवासी सभी लोग गोकर्ण गए।

श्लोक 81 (skanda.3.111.81)

तत्रापश्यत्समायातं सदा स्वप्नेषु लक्षितम् ॥ पूर्वजन्मनि भर्त्तारं द्विजबंधुजनावृतम्

tatrāpaśyatsamāyātaṁ sadā svapneṣu lakṣitam pūrvajanmani bharttāraṁ dvijabaṁdhujanāvṛtam

शारदा भी अपने पुत्र सहित, वह सती, गोकर्ण गई।

श्लोक 82 (skanda.3.111.82)

तं दृष्ट्वा प्रेमनिर्विण्णा पुलकांकितविग्रहा ॥ निरुद्धबाष्पप्रसरा तस्थौ तन्न्यस्तलोचना

taṁ dṛṣṭvā premanirviṇṇā pulakāṁkitavigrahā niruddhabāṣpaprasarā tasthau tannyastalocanā

वहाँ उसने, सदा स्वप्नों में देखे हुए पूर्वजन्म के अपने पति को, ब्राह्मण-बन्धुजनों से घिरे आते हुए देखा।

श्लोक 83 (skanda.3.111.83)

स च विप्रोऽपि तां दृष्ट्वा रूपलक्षणलक्षिताम्॥ स्वप्ने सदा भुज्यमानामात्मनो रतिदायिनीम्

sa ca vipro'pi tāṁ dṛṣṭvā rūpalakṣaṇalakṣitām svapne sadā bhujyamānāmātmano ratidāyinīm

उसे देखकर, प्रेम से विह्वल, रोमांचित शरीरवाली, रोके हुए आँसुओं की धारावाली, वह उसी पर दृष्टि गड़ाए खड़ी रही।

श्लोक 84 (skanda.3.111.84)

तं कुमारमपि स्वप्ने दृष्ट्वा चात्म शरीरजम् ॥ विलोक्य विस्मयाविष्टस्तदंतिकमुपाययौ

taṁ kumāramapi svapne dṛṣṭvā cātma śarīrajam vilokya vismayāviṣṭastadaṁtikamupāyayau

और वह ब्राह्मण भी, रूप-लक्षणों से युक्त, स्वप्न में सदा भोगी जाती हुई, अपनी रतिदायिनी उसे देखकर,

श्लोक 85 (skanda.3.111.85)

भद्रे त्वां प्रष्टुमिच्छामि यत्किंचिन्मनसि स्थितम् ॥ इति प्रथममाभाष्य रहः स्थानं निनाय ताम्

bhadre tvāṁ praṣṭumicchāmi yatkiṁcinmanasi sthitam iti prathamamābhāṣya rahaḥ sthānaṁ nināya tām

और उस कुमार को भी, अपने ही शरीर से उत्पन्न, स्वप्न में देखा हुआ, देखकर, आश्चर्यचकित होकर उसके समीप आया।

श्लोक 86 (skanda.3.111.86)

का त्वं कथय वामोरु कस्य भार्यासि सुव्रते ॥ को देशः कस्य वा पुत्री किन्नामेत्यब्रवीच्च ताम्

kā tvaṁ kathaya vāmoru kasya bhāryāsi suvrate ko deśaḥ kasya vā putrī kinnāmetyabravīcca tām

"हे भद्रे! मैं तुमसे कुछ पूछना चाहता हूँ, जो मेरे मन में है" — यह पहले कहकर, उसे एकान्त स्थान पर ले गया।

श्लोक 87 (skanda.3.111.87)

इति तेन समापृष्टा सा नारी बाष्पलोचना ॥ व्याजहारात्मनोवृत्तं बाल्ये वैधव्यकारणम्

iti tena samāpṛṣṭā sā nārī bāṣpalocanā vyājahārātmanovṛttaṁ bālye vaidhavyakāraṇam

"तुम कौन हो, बताओ, हे सुन्दर जाँघोंवाली सुव्रते! तुम किसकी पत्नी हो? कौन-सा देश है, किसकी पुत्री हो, क्या नाम है?" यह उसने उससे कहा।

श्लोक 88 (skanda.3.111.88)

पुनः पप्रच्छ तां बालां पुत्रः कस्यायमुत्तमः ॥ कथं धृतो वा जठरे बालोऽयं चंद्रसन्निभः

punaḥ papraccha tāṁ bālāṁ putraḥ kasyāyamuttamaḥ kathaṁ dhṛto vā jaṭhare bālo'yaṁ caṁdrasannibhaḥ

इस प्रकार उसके द्वारा पूछे जाने पर, आँसू भरे नेत्रोंवाली वह स्त्री, अपना वृत्तान्त — बाल्यावस्था में वैधव्य का कारण — कह सुनाया।

श्लोक 89 (skanda.3.111.89)

शारदोवाच ॥ एष मे तनयः स्वामिन्सर्वविद्याविशारदः॥ शारदेय इति प्रोक्तो मम नाम्नैव कल्पितः

śāradovāca eṣa me tanayaḥ svāminsarvavidyāviśāradaḥ śāradeya iti prokto mama nāmnaiva kalpitaḥ

उसने फिर उस बालिका से पूछा — "यह उत्तम पुत्र किसका है? यह चन्द्रमा के समान बालक गर्भ में कैसे धारण किया गया?"

श्लोक 90 (skanda.3.111.90)

इति तस्या वचः श्रुत्वा विहस्य ब्राह्मणोत्तमः ॥ प्रोवाच कष्टात्कष्टं हि चरितं तव भामिनि

iti tasyā vacaḥ śrutvā vihasya brāhmaṇottamaḥ provāca kaṣṭātkaṣṭaṁ hi caritaṁ tava bhāmini

शारदा ने कहा — "यह मेरा पुत्र है, हे स्वामिन्! समस्त विद्याओं में निपुण; इसे शारदेय कहा गया है, मेरे ही नाम से रखा गया।"

श्लोक 91 (skanda.3.111.91)

पाणिग्रहणमात्रं ते कृत्वा भर्त्ता मृतः किल ॥ कथं चायं सुतो जातस्तस्य कारणमुच्यताम्

pāṇigrahaṇamātraṁ te kṛtvā bharttā mṛtaḥ kila kathaṁ cāyaṁ suto jātastasya kāraṇamucyatām

उसके इन वचनों को सुनकर, हँसते हुए उस श्रेष्ठ ब्राह्मण ने कहा — "हे भामिनि! तुम्हारा जीवन-वृत्तान्त तो अत्यन्त कष्टमय रहा है।

श्लोक 92 (skanda.3.111.92)

इति तेनोदितां वाणीमाकर्ण्यातीव लज्जिता ॥ क्षणं चाश्रुमुखी भूत्वा धैर्यादित्थमभाषत

iti tenoditāṁ vāṇīmākarṇyātīva lajjitā kṣaṇaṁ cāśrumukhī bhūtvā dhairyāditthamabhāṣata

"केवल पाणिग्रहण करके ही तुम्हारा पति मर गया था; फिर यह पुत्र कैसे जन्मा? इसका कारण बताओ।"

श्लोक 93 (skanda.3.111.93)

शारदोवाच ॥ तदलं परिहासोक्त्या त्वं मां वेत्सि महामते ॥ त्वामहं वेद्मि चार्थेऽस्मिन्प्रमाणं मन आवयोः

śāradovāca tadalaṁ parihāsoktyā tvaṁ māṁ vetsi mahāmate tvāmahaṁ vedmi cārthe'sminpramāṇaṁ mana āvayoḥ

उसके द्वारा कहे गए इन वचनों को सुनकर, अत्यन्त लज्जित होकर, क्षणभर आँसू भरे मुखवाली होकर, धैर्यपूर्वक वह इस प्रकार बोली —

श्लोक 94 (skanda.3.111.94)

इत्युक्त्वा सर्वमावेद्य देव्या दत्तं वरादिकम् ॥ व्रतस्यार्धं कुमारं तं ददौ तस्मै धृतव्रतम्

ityuktvā sarvamāvedya devyā dattaṁ varādikam vratasyārdhaṁ kumāraṁ taṁ dadau tasmai dhṛtavratam

शारदा ने कहा — "बस, यह परिहासपूर्ण वचन छोड़ो; तुम मुझे जानते हो, हे महामते! और मैं तुम्हें जानती हूँ; इस विषय में हम दोनों का मन ही प्रमाण है।"

श्लोक 95 (skanda.3.111.95)

सोऽपि प्रमुदितो विप्रः कुमारं प्रतिगृह्य तम्॥ पित्रोरनुमतेनैव तां निनाय निजालयम्

so'pi pramudito vipraḥ kumāraṁ pratigṛhya tam pitroranumatenaiva tāṁ nināya nijālayam

यह कहकर, देवी द्वारा दिए गए वर आदि सब कुछ बताकर, उसने व्रत का आधा फल — वह कुमार — उस दृढ़व्रती को दे दिया।

श्लोक 96 (skanda.3.111.96)

सापि स्थित्वा बहून्मासांस्तस्य विप्रस्य मंदिरे ॥ तस्मिन्कालवशं प्राप्ते प्रविश्याग्निं तमन्वगात्

sāpi sthitvā bahūnmāsāṁstasya viprasya maṁdire tasminkālavaśaṁ prāpte praviśyāgniṁ tamanvagāt

वह ब्राह्मण भी प्रसन्न होकर, उस कुमार को स्वीकार करके, उसके माता-पिता की अनुमति से ही उसे अपने घर ले गया।

श्लोक 97 (skanda.3.111.97)

ततस्तौ दंपती भूत्वा विमानं दिव्यमास्थितौ ॥ दिव्यभोगसमायुक्तौ जग्मतुः शिवमंदिरम्

tatastau daṁpatī bhūtvā vimānaṁ divyamāsthitau divyabhogasamāyuktau jagmatuḥ śivamaṁdiram

वह भी उस ब्राह्मण के घर में कई महीने रहकर, उसके काल के वश होने पर, अग्नि में प्रवेश करके उसका अनुसरण किया।

श्लोक 98 (skanda.3.111.98)

इत्येततत्पुण्यमाख्यानं मया समनुवर्णितम् ॥ पठतां शृण्वतां सम्यग्भुक्तिमुक्तिफलप्रदम्

ityetatatpuṇyamākhyānaṁ mayā samanuvarṇitam paṭhatāṁ śṛṇvatāṁ samyagbhuktimuktiphalapradam

फिर वे दोनों दम्पति होकर, दिव्य विमान पर आरूढ़ होकर, दिव्य भोगों से युक्त होकर शिव के मन्दिर को गए।

श्लोक 99 (skanda.3.111.99)

आयुरारोग्यसंपत्तिधनधत्यविवर्द्धनम् ॥ स्त्रीणां मंगलसौभाग्यसंतानसुखसाधनम्

āyurārogyasaṁpattidhanadhatyavivarddhanam strīṇāṁ maṁgalasaubhāgyasaṁtānasukhasādhanam

इस प्रकार यह पवित्र आख्यान मैंने पूर्ण रूप से वर्णित किया, जो पढ़नेवालों और सुननेवालों को भलीभाँति भुक्ति और मुक्ति का फल देनेवाला है।

श्लोक 100 (skanda.3.111.100)

एतन्महाख्यानमघौघनाशनं गौरीमहेशव्रतपुण्यकीर्तनम् ॥ भक्त्या सकृद्यः शृणुयाच्च कीर्त्तयेद्भुक्त्वा स भोगान्पदमेति शाश्वतम्

etanmahākhyānamaghaughanāśanaṁ gaurīmaheśavratapuṇyakīrtanam bhaktyā sakṛdyaḥ śṛṇuyācca kīrttayedbhuktvā sa bhogānpadameti śāśvatam

यह आयु, आरोग्य, सम्पत्ति, धन-धान्य को बढ़ानेवाला है; स्त्रियों के लिए मंगल, सौभाग्य, सन्तान और सुख का साधन है। यह महान आख्यान, पापसमूह का नाशक, गौरी-महेश के व्रत के पुण्य का कीर्तन — जो कोई भक्तिपूर्वक एक बार भी सुनता या कहता है, वह भोगों को भोगकर शाश्वत पद को प्राप्त होता है।

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