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ब्रह्म खण्ड · अध्याय 110

उमामहेश्वर व्रत: शारदा की कथा

अध्याय 109अध्याय-सूचीअध्याय 111

श्लोक 1 (skanda.3.110.1)

॥ सूत उवाच ॥ अथाहं संप्रवक्ष्यामि सर्वधर्मोत्तमोत्तमम् ॥ उमामहेश्वरं नाम व्रतं सर्वार्थसिद्धिदम्

sūta uvāca athāhaṁ saṁpravakṣyāmi sarvadharmottamottamam umāmaheśvaraṁ nāma vrataṁ sarvārthasiddhidam

सूत जी ने कहा — अब मैं समस्त धर्मों में सर्वोत्तम, समस्त कामनाओं की सिद्धि देनेवाला उमामहेश्वर नामक व्रत कहूँगा।

श्लोक 2 (skanda.3.110.2)

आनर्त्त संभवः कश्चिन्नाम्ना वेदरथो द्विजः ॥ कलत्रपुत्रसंपन्नो विद्वानुत्तमवंशजः

ānartta saṁbhavaḥ kaścinnāmnā vedaratho dvijaḥ kalatraputrasaṁpanno vidvānuttamavaṁśajaḥ

आनर्त देश में उत्पन्न वेदरथ नाम का एक ब्राह्मण था, विद्वान, उत्तम वंश में जन्मा, पत्नी-पुत्र से सम्पन्न।

श्लोक 3 (skanda.3.110.3)

तस्यैवं वर्तमानस्य ब्राह्मणस्य गृहाश्रमे ॥ बभूव शारदानाम कन्या कमललोचना

tasyaivaṁ vartamānasya brāhmaṇasya gṛhāśrame babhūva śāradānāma kanyā kamalalocanā

उस गृहस्थाश्रम में रहनेवाले ब्राह्मण के घर शारदा नाम की कमलनयनी कन्या उत्पन्न हुई।

श्लोक 4 (skanda.3.110.4)

तां रूपलक्षणोपेतां बालां द्वादशहायनाम् ॥ ययाचे पद्मनाभाख्यो मृतदारश्च स द्विजः

tāṁ rūpalakṣaṇopetāṁ bālāṁ dvādaśahāyanām yayāce padmanābhākhyo mṛtadāraśca sa dvijaḥ

रूप और शुभ लक्षणों से युक्त उस बारह वर्ष की बालिका को, पद्मनाभ नाम के, पत्नी मर चुकी थी, ब्राह्मण ने माँगा।

श्लोक 5 (skanda.3.110.5)

महाधनस्य शांतस्य सदा राजसखस्य च ॥ याञ्चाभंगभयात्तस्य तां कन्यां प्रददौ पिता

mahādhanasya śāṁtasya sadā rājasakhasya ca yāñcābhaṁgabhayāttasya tāṁ kanyāṁ pradadau pitā

उस महाधनी, शान्त, सदा राजा के मित्र की याचना के भंग होने के भय से, पिता ने वह कन्या उसे दे दी।

श्लोक 6 (skanda.3.110.6)

मध्यंदिने कृतोद्वाहः स विप्रः श्वशुरालये ॥ संध्यामुपासितुं सायं सरस्तटमुपाययौ

madhyaṁdine kṛtodvāhaḥ sa vipraḥ śvaśurālaye saṁdhyāmupāsituṁ sāyaṁ sarastaṭamupāyayau

मध्याह्न में विवाहित हुआ वह ब्राह्मण, अपने श्वसुर के घर में, सायंकाल संध्या करने के लिए सरोवर के तट पर गया।

श्लोक 7 (skanda.3.110.7)

उपास्य संध्यां विधिवत्प्रत्यागच्छत्तमोवृते ॥ मार्गे दष्टो भुजंगेन ममार निजकर्मणा

upāsya saṁdhyāṁ vidhivatpratyāgacchattamovṛte mārge daṣṭo bhujaṁgena mamāra nijakarmaṇā

विधिपूर्वक संध्या करके, अन्धकार में वापस आते हुए, मार्ग में सर्प द्वारा डँसा गया और अपने ही कर्म से मर गया।

श्लोक 8 (skanda.3.110.8)

तस्मिन्मृते कृतोद्वाहे सहसा तस्य बांधवाः ॥ चुक्रुशुः शोकसंतप्तौ श्वशुरावस्य कन्यका

tasminmṛte kṛtodvāhe sahasā tasya bāṁdhavāḥ cukruśuḥ śokasaṁtaptau śvaśurāvasya kanyakā

उस नवविवाहित के मरने पर, उसके बन्धुजन सहसा चिल्लाने लगे; उसके शोकसंतप्त श्वसुर-सास और उसकी वधू भी विलाप करने लगे।

श्लोक 9 (skanda.3.110.9)

निर्हृत्य तं बंधुजना जग्मुः स्वं स्वं निवेशनम् ॥ शारदा प्राप्तवैधव्या पितुरेवालये स्थिता

nirhṛtya taṁ baṁdhujanā jagmuḥ svaṁ svaṁ niveśanam śāradā prāptavaidhavyā piturevālaye sthitā

बन्धुजन उसे ले जाकर अपने-अपने घर चले गए; वैधव्य को प्राप्त शारदा अपने पिता के ही घर में रह गई।

श्लोक 10 (skanda.3.110.10)

भूताच्छादनभोज्येन भर्त्रा विरहिता सती॥ निनाय कतिचिन्मासान्सा बाला पितृमंदिरे

bhūtācchādanabhojyena bhartrā virahitā satī nināya katicinmāsānsā bālā pitṛmaṁdire

दूसरों द्वारा दिए गए वस्त्र-भोजन से जीवित रहती हुई, पति से वियुक्त वह सती बालिका, अपने पिता के घर में कुछ महीने बिता चुकी थी।

श्लोक 11 (skanda.3.110.11)

एकदा नैध्रुवो नाम कश्चिद्वृद्धतरो मुनिः॥ अन्धः शिष्यकरग्राही तन्मंदिरमुपाययौ

ekadā naidhruvo nāma kaścidvṛddhataro muniḥ andhaḥ śiṣyakaragrāhī tanmaṁdiramupāyayau

एक बार नैध्रुव नाम के किसी बहुत वृद्ध मुनि, अन्धे, शिष्य का हाथ पकड़े, उसके घर आए।

श्लोक 12 (skanda.3.110.12)

तस्मिन्वृद्धे गृहं प्राप्ते क्वापि यातेषु बंधुषु ॥ साक्षादिवात्मनो दैवं सा बाला समुपागमत्

tasminvṛddhe gṛhaṁ prāpte kvāpi yāteṣu baṁdhuṣu sākṣādivātmano daivaṁ sā bālā samupāgamat

उस वृद्ध के घर पहुँचने पर, बन्धुजन कहीं गए हुए होने के कारण, वह बालिका मानो साक्षात अपने ही भाग्य के समीप आ गई।

श्लोक 13 (skanda.3.110.13)

स्वागतं ते महाभाग पीठेस्मिन्नुपविश्यताम् ॥ नमस्ते मुनिनाथाय प्रियं ते करवाणि किम्

svāgataṁ te mahābhāga pīṭhesminnupaviśyatām namaste munināthāya priyaṁ te karavāṇi kim

"स्वागत है आपका, हे महाभाग! इस पीठ पर विराजें। मुनिनाथ को नमस्कार है; आपकी क्या प्रिय सेवा करूँ?"

श्लोक 14 (skanda.3.110.14)

इत्युक्त्वा भक्तिमास्थाय कृत्वा पादावनेजनम् ॥ वीजयित्वा परिश्रांतं तं मुनिं पर्यतोषयत्

ityuktvā bhaktimāsthāya kṛtvā pādāvanejanam vījayitvā pariśrāṁtaṁ taṁ muniṁ paryatoṣayat

यह कहकर, भक्तिपूर्वक उनके चरण धोकर, थके हुए उन्हें पंखा झलकर, उसने उस मुनि को प्रसन्न किया।

श्लोक 15 (skanda.3.110.15)

श्रांतं पीठे समावेश्य कृत्वाभ्यंगं स्वपाणिना ॥ कृतस्नानं च विधिवत्कृतदेवार्चनं मुनिम्

śrāṁtaṁ pīṭhe samāveśya kṛtvābhyaṁgaṁ svapāṇinā kṛtasnānaṁ ca vidhivatkṛtadevārcanaṁ munim

थके हुए को पीठ पर बिठाकर, अपने हाथों से मालिश करके, विधिपूर्वक स्नान कराकर, उस मुनि की देवपूजा करवाकर,

श्लोक 16 (skanda.3.110.16)

सुखासनोपविष्टं तं धूपमाल्यानुलेपनैः ॥ अर्चयित्वा वरान्नेन भोजयामास सादरम्

sukhāsanopaviṣṭaṁ taṁ dhūpamālyānulepanaiḥ arcayitvā varānnena bhojayāmāsa sādaram

सुखासन पर बैठे उन्हें धूप, माला और अनुलेपन से पूजकर, उत्तम अन्न से आदरपूर्वक भोजन कराया।

श्लोक 17 (skanda.3.110.17)

भुक्त्वा च सम्यक्छनकैस्तृप्तश्चानंदनिर्भरः ॥ चकारांधमुनिस्तस्यै सुप्रीतः परमाशिषम्

bhuktvā ca samyakchanakaistṛptaścānaṁdanirbharaḥ cakārāṁdhamunistasyai suprītaḥ paramāśiṣam

भलीभाँति और धीरे-धीरे भोजन करके, तृप्त और आनन्द से भरे उस अन्धे मुनि ने प्रसन्न होकर उसे परम आशीर्वाद दिया —

श्लोक 18 (skanda.3.110.18)

विहृत्य भर्त्रा सहसा च तेन लब्ध्वा सुतं सर्वगुणैर्वरिष्ठम् ॥ कीर्तिं च लोके महतीमवाप्य प्रसादयोग्या भव देवतानाम्

vihṛtya bhartrā sahasā ca tena labdhvā sutaṁ sarvaguṇairvariṣṭham kīrtiṁ ca loke mahatīmavāpya prasādayogyā bhava devatānām

"पति के साथ विहार करके, उसी से अचानक सर्वगुणश्रेष्ठ पुत्र पाकर, और संसार में महान कीर्ति प्राप्त करके, तुम देवताओं की कृपा के योग्य बनो।"

श्लोक 19 (skanda.3.110.19)

इत्यभिव्याहृतं तेन मुनिना गतचक्षुषा ॥ निशम्य विस्मिता बाला प्रत्युवाच कृतांजलिः

ityabhivyāhṛtaṁ tena muninā gatacakṣuṣā niśamya vismitā bālā pratyuvāca kṛtāṁjaliḥ

उस दृष्टिहीन मुनि द्वारा कहे गए इस आशीर्वाद को सुनकर, आश्चर्यचकित बालिका ने हाथ जोड़कर उत्तर दिया —

श्लोक 20 (skanda.3.110.20)

ब्रह्मंस्त्वद्वचनं सत्यं कदाचिन्न मृषा भवेत् ॥ तदेतन्मंदभाग्यायाः कथमेतत्फलिष्यति

brahmaṁstvadvacanaṁ satyaṁ kadācinna mṛṣā bhavet tadetanmaṁdabhāgyāyāḥ kathametatphaliṣyati

"हे ब्रह्मन्! आपका वचन सत्य है, कभी मिथ्या नहीं हो सकता; किन्तु यह मुझ मन्दभागिनी के लिए कैसे फलित होगा?

श्लोक 21 (skanda.3.110.21)

शिलाग्र्यामिव सद्वृष्टिः शुनक्यामिव सत्क्रिया ॥ विफला मंदभाग्यायामाशीर्ब्रह्मविदामपि

śilāgryāmiva sadvṛṣṭiḥ śunakyāmiva satkriyā viphalā maṁdabhāgyāyāmāśīrbrahmavidāmapi

"जैसे शिलाखण्ड पर अच्छी वर्षा, जैसे कुतिया के लिए सत्कर्म — वैसे ही ब्रह्मवेत्ताओं का आशीर्वाद भी मन्दभागिनी के लिए निष्फल है।

श्लोक 22 (skanda.3.110.22)

सैषाहं विधवा ब्रह्मन्दुष्कर्मफलभागिनी ॥ त्वदाशीर्वचनस्यास्य कथं यास्यामि पात्रताम्

saiṣāhaṁ vidhavā brahmanduṣkarmaphalabhāginī tvadāśīrvacanasyāsya kathaṁ yāsyāmi pātratām

"मैं वही विधवा हूँ, हे ब्रह्मन्, दुष्कर्म के फल की भागिनी; आपके इस आशीर्वचन की पात्रता मुझे कैसे प्राप्त होगी?"

श्लोक 23 (skanda.3.110.23)

मुनिरुवाच ॥ त्वामनालक्ष्य यत्प्रोक्तमंधेनापि मयाऽधुना ॥ तदेतत्साधयिष्यामि कुरु मच्छासनं शुभे

muniruvāca tvāmanālakṣya yatproktamaṁdhenāpi mayā'dhunā tadetatsādhayiṣyāmi kuru macchāsanaṁ śubhe

मुनि ने कहा — "तुम्हें न देखकर, अन्धे होते हुए भी मैंने अभी जो कहा है, उसे ही मैं सिद्ध करूँगा; मेरी आज्ञा मानो, हे शुभे!

श्लोक 24 (skanda.3.110.24)

उमामहेश्वरं नाम व्रतं यदि चरिष्यसि ॥ तेन व्रतानुभावेन सद्यः श्रेयोऽनुभोक्ष्यसे

umāmaheśvaraṁ nāma vrataṁ yadi cariṣyasi tena vratānubhāvena sadyaḥ śreyo'nubhokṣyase

"यदि तुम उमामहेश्वर नामक व्रत करोगी, तो उस व्रत के प्रभाव से तुम तत्काल कल्याण का अनुभव करोगी।"

श्लोक 25 (skanda.3.110.25)

शारदोवाच ॥ त्वयोपदिष्टं यत्नेन चरिष्याम्यपि दुश्चरम् ॥ तद्व्रतं ब्रूहि मे ब्रह्मन्विधानं वद विस्तरात्

śāradovāca tvayopadiṣṭaṁ yatnena cariṣyāmyapi duścaram tadvrataṁ brūhi me brahmanvidhānaṁ vada vistarāt

शारदा ने कहा — "आपके द्वारा बताए गए, चाहे दुष्कर करने योग्य भी हो, उसे मैं प्रयत्नपूर्वक करूँगी; वह व्रत मुझे बताइए, हे ब्रह्मन्, उसकी विधि विस्तार से कहिए।"

श्लोक 26 (skanda.3.110.26)

मुनिरुवाच ॥ चैत्रे वा मार्गशीर्षे वा शुक्लपक्षे शुभे दिने ॥ व्रतारंभं प्रकुर्वीत यथावद्गुर्वनुज्ञया

muniruvāca caitre vā mārgaśīrṣe vā śuklapakṣe śubhe dine vratāraṁbhaṁ prakurvīta yathāvadgurvanujñayā

मुनि ने कहा — "चैत्र या मार्गशीर्ष में, शुक्ल पक्ष के शुभ दिन, गुरुजनों की अनुमति से यथाविधि व्रत का आरम्भ करना चाहिए।

श्लोक 27 (skanda.3.110.27)

अष्टम्यां च चतुर्दश्यामुभयोरपि पर्वणोः ॥ संकल्पं विधिवत्कृत्वा प्रातःस्नानं समाचरेत्

aṣṭamyāṁ ca caturdaśyāmubhayorapi parvaṇoḥ saṁkalpaṁ vidhivatkṛtvā prātaḥsnānaṁ samācaret

"अष्टमी और चतुर्दशी को, दोनों ही पर्वों में, विधिपूर्वक संकल्प करके प्रातःस्नान करना चाहिए।

श्लोक 28 (skanda.3.110.28)

सन्तर्प्य पितृदेवादीन्गत्वा स्वभवनं प्रति ॥ मंडपं रचयेद्दिव्यं वितानाद्यैरलंकृतम्

santarpya pitṛdevādīngatvā svabhavanaṁ prati maṁḍapaṁ racayeddivyaṁ vitānādyairalaṁkṛtam

"पितरों और देवताओं को तर्पण करके, अपने घर की ओर जाकर, वितान आदि से सुसज्जित एक दिव्य मण्डप बनाना चाहिए,

श्लोक 29 (skanda.3.110.29)

फलपल्लवपुष्पाद्यैस्तोरणैश्च समन्वितम् ॥ पंचवर्णैश्च तन्मध्ये रजोभिः पद्ममुद्धरेत्

phalapallavapuṣpādyaistoraṇaiśca samanvitam paṁcavarṇaiśca tanmadhye rajobhiḥ padmamuddharet

"फल, पल्लव, पुष्प आदि तोरणों से युक्त; उसके मध्य में पाँच रंगों के चूर्ण से एक कमल बनाना चाहिए।

श्लोक 30 (skanda.3.110.30)

चतुर्दशदलैर्बाह्ये द्वाविंशद्भिस्तदंतरे ॥ तदंतरं षोडशभिरष्टभिश्च तदंतरे ॥ एवं पद्मं समुद्धत्य पंचवर्णैर्मनोरमम् ॥ चतुरस्रं ततः कुर्यादंतर्वर्तुलमुत्तमम्

caturdaśadalairbāhye dvāviṁśadbhistadaṁtare tadaṁtaraṁ ṣoḍaśabhiraṣṭabhiśca tadaṁtare evaṁ padmaṁ samuddhatya paṁcavarṇairmanoramam caturasraṁ tataḥ kuryādaṁtarvartulamuttamam

"बाहर चौदह दलों से, उसके भीतर बाईस दलों से, उसके भीतर सोलह दलों से, और उसके भीतर आठ दलों से — इस प्रकार पाँच रंगों से मनोरम कमल बनाकर, फिर उसके भीतर एक उत्तम गोलाकार वर्गाकार बनाना चाहिए।

श्लोक 31 (skanda.3.110.31)

व्रीहितंडुलराशिं च तन्मध्ये च सकूर्चकम् ॥ कूर्चोपरि सुसंस्थाप्य कलशं वारिपूरितम्

vrīhitaṁḍularāśiṁ ca tanmadhye ca sakūrcakam kūrcopari susaṁsthāpya kalaśaṁ vāripūritam

"उसके मध्य में धान की राशि, उसके साथ कुशा का गुच्छा; उस गुच्छे के ऊपर भलीभाँति स्थापित करके, जल से भरा कलश,

श्लोक 32 (skanda.3.110.32)

कलशोपरि विन्यस्य वस्त्रं वर्णसमन्वितम् ॥ तस्योपरिष्टात्सौवर्ण्यौ प्रतिमे शिवयोः शुभे ॥ निधाय पूजयेद्भक्त्या यथाविभवविस्तरम्

kalaśopari vinyasya vastraṁ varṇasamanvitam tasyopariṣṭātsauvarṇyau pratime śivayoḥ śubhe nidhāya pūjayedbhaktyā yathāvibhavavistaram

"उस कलश के ऊपर विविध रंगों का वस्त्र रखकर, उसके ऊपर शिव-पार्वती की दो शुभ स्वर्ण-प्रतिमाएँ स्थापित करके, यथाशक्ति विस्तारपूर्वक भक्तिपूर्वक पूजा करनी चाहिए।

श्लोक 33 (skanda.3.110.33)

पंचामृतैस्तु संस्नाप्य तथा शुद्धोदकेन च ॥ रुद्रैकादशकं जप्त्वा पंचाक्षरशताष्टकम्

paṁcāmṛtaistu saṁsnāpya tathā śuddhodakena ca rudraikādaśakaṁ japtvā paṁcākṣaraśatāṣṭakam

"पंचामृत से और शुद्ध जल से स्नान कराकर, ग्यारह रुद्र-मन्त्रों और आठ सौ पंचाक्षर मन्त्रों का जप करके,

श्लोक 34 (skanda.3.110.34)

अभिमंत्र्य पुनः स्थाप्य पीठं मध्ये तथार्चयेत् ॥ स्वयं शुद्धासनासीनो धौतशुक्लांबरः सुधीः

abhimaṁtrya punaḥ sthāpya pīṭhaṁ madhye tathārcayet svayaṁ śuddhāsanāsīno dhautaśuklāṁbaraḥ sudhīḥ

"पुनः अभिमन्त्रित करके, मध्य में पीठ स्थापित करके वहाँ पूजा करनी चाहिए; स्वयं शुद्ध आसन पर बैठे, धुले श्वेत वस्त्र धारण किए बुद्धिमान,

श्लोक 35 (skanda.3.110.35)

पीठमामंत्र्य मंत्रेण प्राणायामान्समाचरेत् ॥ संकल्पं प्रवदेत्तत्र शिवाग्रे विहितांजलिः

pīṭhamāmaṁtrya maṁtreṇa prāṇāyāmānsamācaret saṁkalpaṁ pravadettatra śivāgre vihitāṁjaliḥ

"मन्त्र से पीठ का आवाहन करके प्राणायाम करें; वहाँ शिव के सम्मुख हाथ जोड़कर संकल्प कहें।

श्लोक 36 (skanda.3.110.36)

यानि पापानि घोराणि जन्मांतरशतेषु मे ॥ तेषां सर्वविनाशाय शिवपूजां समारभे

yāni pāpāni ghorāṇi janmāṁtaraśateṣu me teṣāṁ sarvavināśāya śivapūjāṁ samārabhe

"'जन्म-जन्मान्तर के सैकड़ों जन्मों में मेरे जो भी घोर पाप हैं, उन सबके सम्पूर्ण नाश के लिए मैं यह शिवपूजा आरम्भ करता हूँ।

श्लोक 37 (skanda.3.110.37)

सौभाग्यविजयारोग्यधर्मैश्वर्याभिवृद्धये ॥ स्वर्गापवर्गसिद्ध्यर्थं करिष्ये शिवपूजनम्

saubhāgyavijayārogyadharmaiśvaryābhivṛddhaye svargāpavargasiddhyarthaṁ kariṣye śivapūjanam

"'सौभाग्य, विजय, आरोग्य, धर्म और ऐश्वर्य की वृद्धि के लिए, तथा स्वर्ग और मोक्ष की सिद्धि के लिए मैं यह शिवपूजन करूँगा।'

श्लोक 38 (skanda.3.110.38)

इति संकल्पमुच्चार्य यथावत्सुसमाहितः ॥ अंगन्यासं ततः कृत्वा ध्यायेदीशं च पार्वतीम्

iti saṁkalpamuccārya yathāvatsusamāhitaḥ aṁganyāsaṁ tataḥ kṛtvā dhyāyedīśaṁ ca pārvatīm

"इस प्रकार संकल्प कहकर, यथाविधि एकाग्रचित्त होकर, फिर अंगन्यास करके, ईश और पार्वती का ध्यान करना चाहिए —

श्लोक 39 (skanda.3.110.39)

कुंदेंदुधवलाकारं नागाभरणभूषितम् ॥ वरदाभयहस्तं च बिभ्राणं परशुं मृगम्

kuṁdeṁdudhavalākāraṁ nāgābharaṇabhūṣitam varadābhayahastaṁ ca bibhrāṇaṁ paraśuṁ mṛgam

"कुन्द और चन्द्रमा के समान श्वेत रूपवाले, नाग-आभूषणों से भूषित, वरद और अभय मुद्रा में हाथ, परशु और मृग धारण किए हुए,

श्लोक 40 (skanda.3.110.40)

सूर्यकोटिप्रतीकाशं जगदानंदकारणम् ॥ जाह्नवीजलसंपर्काद्दीर्घपिंगजटाधरम्

sūryakoṭipratīkāśaṁ jagadānaṁdakāraṇam jāhnavījalasaṁparkāddīrghapiṁgajaṭādharam

"करोड़ों सूर्यों के समान प्रभावाले, जगत को आनन्द देनेवाले, गंगाजल के स्पर्श से लम्बी पिंगल जटाओंवाले,

श्लोक 41 (skanda.3.110.41)

उरगेंद्रफणोद्भूतमहामुकुटमंडितम् ॥ शीतांशुखंडविलसत्कोटीरांगदभूषणम्

urageṁdraphaṇodbhūtamahāmukuṭamaṁḍitam śītāṁśukhaṁḍavilasatkoṭīrāṁgadabhūṣaṇam

"नागराज के फणों से बने महान मुकुट से सुशोभित, शीतल चन्द्रकला से चमकते मुकुट और अंगदों से विभूषित,

श्लोक 42 (skanda.3.110.42)

उन्मीलद्भालनयनं तथा सूर्येंदुलोचनम् ॥ नीलकंठं चतुर्बाहुं गजेंद्राजिनवाससम्

unmīladbhālanayanaṁ tathā sūryeṁdulocanam nīlakaṁṭhaṁ caturbāhuṁ gajeṁdrājinavāsasam

"खुलते भाल-नेत्रवाले, सूर्य-चन्द्र समान नेत्रोंवाले, नीलकण्ठ, चतुर्भुज, गजेन्द्र के चर्म का वस्त्र धारण किए हुए,

श्लोक 43 (skanda.3.110.43)

रत्नसिंहासनारूढं नागाभरणभूषितम् ॥ देवीं च दिव्यवसनां बालसूर्यायुतद्युतिम्

ratnasiṁhāsanārūḍhaṁ nāgābharaṇabhūṣitam devīṁ ca divyavasanāṁ bālasūryāyutadyutim

"रत्नसिंहासन पर आरूढ़, नाग-आभूषणों से भूषित; और देवी को, दिव्य वस्त्रोंवाली, दस हजार उदित सूर्यों के समान प्रभावाली,

श्लोक 44 (skanda.3.110.44)

बालवेषां च तन्वंगीं बालशीतांशुशेखराम् ॥ पाशांकुशवराभीतिं बिभ्रतीं च चतुर्भुजाम्

bālaveṣāṁ ca tanvaṁgīṁ bālaśītāṁśuśekharām pāśāṁkuśavarābhītiṁ bibhratīṁ ca caturbhujām

"बालवेशवाली, कोमलांगी, बालचन्द्र से सुशोभित मस्तकवाली, पाश, अंकुश, वरद और अभय मुद्रा धारण किए चतुर्भुजा,

श्लोक 45 (skanda.3.110.45)

प्रसादसुमुखीमंबां लीलारसविहारिणीम् ॥ लसत्कुरबकाशोकपुन्नागनवचंपकैः

prasādasumukhīmaṁbāṁ līlārasavihāriṇīm lasatkurabakāśokapunnāganavacaṁpakaiḥ

"प्रसन्न मुखवाली अम्बा, लीला-रस में विहार करनेवाली, कुरबक, अशोक, पुन्नाग और नए चम्पक फूलों से सजी,

श्लोक 46 (skanda.3.110.46)

कृतावतंसामुत्फुल्लमल्लिकोत्कलितालकाम् ॥ कांचीकलापपर्यस्तजघनाभोगशालिनीम्

kṛtāvataṁsāmutphullamallikotkalitālakām kāṁcīkalāpaparyastajaghanābhogaśālinīm

"खिली चमेली से सुशोभित अलकोंवाली, करधनी की लड़ी से घिरे विशाल नितम्बोंवाली,

श्लोक 47 (skanda.3.110.47)

उदारकिंकिणीश्रेणीनूपुराढ्यपदद्वयाम् ॥ गंडमंडलसंसक्तरत्नकुंडलशोभिताम्

udārakiṁkiṇīśreṇīnūpurāḍhyapadadvayām gaṁḍamaṁḍalasaṁsaktaratnakuṁḍalaśobhitām

"उदार किंकिणी-श्रेणी और नूपुरों से समृद्ध दोनों पैरोंवाली, गण्डमण्डल से सटे रत्नकुण्डलों से सुशोभित,

श्लोक 48 (skanda.3.110.48)

बिंबाधरानुरक्तांशुलसद्दशन कुड्मलाम् ॥ महार्हरत्नग्रेवेयतारहारविराजिताम्

biṁbādharānuraktāṁśulasaddaśana kuḍmalām mahārharatnagreveyatārahāravirājitām

"बिम्बाधर की लालिमा से रंजित चमकते दाँतों की कलियोंवाली, बहुमूल्य रत्नों के ग्रैवेय हार से सुशोभित,

श्लोक 49 (skanda.3.110.49)

नवमाणिक्यरुचिरकंकणांगदमुद्रिकाम् ॥ रक्तांशुकपरीधानां रत्नमाल्यानुलेपनाम्

navamāṇikyarucirakaṁkaṇāṁgadamudrikām raktāṁśukaparīdhānāṁ ratnamālyānulepanām

"नए माणिक्यों से सुन्दर कंकण, अंगद और अंगूठियोंवाली, लाल वस्त्र धारण किए हुए, रत्नमाला और अनुलेपन से युक्त,

श्लोक 50 (skanda.3.110.50)

उद्यत्पीनकुचद्वंद्वनिंदितांभोजकुड्मलाम् ॥ लीलालोलासितापांगीं भक्तानुग्रहदायिनीम्

udyatpīnakucadvaṁdvaniṁditāṁbhojakuḍmalām līlālolāsitāpāṁgīṁ bhaktānugrahadāyinīm

"उभरते पीन स्तन-युगल से कमलकलिका को भी निन्दित करनेवाली, लीलापूर्वक चंचल श्याम कटाक्षवाली, भक्तों पर अनुग्रह करनेवाली।

श्लोक 51 (skanda.3.110.51)

एवं ध्यात्वा तु हृत्पद्मे जगतः पितरौ शिवौ ॥ जप्त्वा तदात्मकं मंत्रं तदंते बहिरर्चयेत्

evaṁ dhyātvā tu hṛtpadme jagataḥ pitarau śivau japtvā tadātmakaṁ maṁtraṁ tadaṁte bahirarcayet

"इस प्रकार हृदयकमल में जगत के माता-पिता शिव-पार्वती का ध्यान करके, उनके आत्मक मन्त्र का जप करके, उसके अन्त में बाहर पूजा करनी चाहिए।

श्लोक 52 (skanda.3.110.52)

आवाह्य प्रतिमायुग्मे कल्पयेदासनादिकम् ॥ अर्घ्यं च दद्याच्छिवयोर्मंत्रेणानेन मंत्रवित्

āvāhya pratimāyugme kalpayedāsanādikam arghyaṁ ca dadyācchivayormaṁtreṇānena maṁtravit

"दोनों प्रतिमाओं में आवाहन करके, आसन आदि की व्यवस्था करके, मन्त्रज्ञ को इस मन्त्र से शिव-पार्वती को अर्घ्य देना चाहिए —

श्लोक 53 (skanda.3.110.53)

नमस्ते पार्वतीनाथ त्रैलोक्यवरदर्षभ ॥ त्र्यंबकेश महादेव गृहाणार्घ्यं नमोऽस्तु ते

namaste pārvatīnātha trailokyavaradarṣabha tryaṁbakeśa mahādeva gṛhāṇārghyaṁ namo'stu te

"'हे पार्वतीनाथ! त्रिलोक के वरदाताओं में श्रेष्ठ! हे त्र्यम्बकेश महादेव! अर्घ्य ग्रहण कीजिए, आपको नमस्कार है।

श्लोक 54 (skanda.3.110.54)

नमस्ते देवदेवेशि प्रपन्नभयहारिणि ॥ अंबिके वरदे देवि गृहाणार्घ्यं शिवप्रिये

namaste devadeveśi prapannabhayahāriṇi aṁbike varade devi gṛhāṇārghyaṁ śivapriye

"'हे देवदेवेशी! शरणागतों का भय हरनेवाली! हे अम्बिके, वरदे देवी, शिवप्रिये! अर्घ्य ग्रहण कीजिए।'

श्लोक 55 (skanda.3.110.55)

इति त्रिवारमुच्चार्य दद्यादर्घ्यं समाहितः ॥ गन्धपुष्पाक्षतान्सम्यग्धूपदीपान्प्रकल्पयेत्

iti trivāramuccārya dadyādarghyaṁ samāhitaḥ gandhapuṣpākṣatānsamyagdhūpadīpānprakalpayet

"इस प्रकार तीन बार कहकर, एकाग्रचित्त होकर अर्घ्य देना चाहिए; गन्ध, पुष्प, अक्षत, धूप-दीप भलीभाँति व्यवस्थित करने चाहिए।

श्लोक 56 (skanda.3.110.56)

नैवेद्यं पायसान्नेन घृताक्तं परिकल्पयेत् ॥ जुहुयान्मूलमंत्रेण हविरष्टोत्तरं शतम्

naivedyaṁ pāyasānnena ghṛtāktaṁ parikalpayet juhuyānmūlamaṁtreṇa haviraṣṭottaraṁ śatam

"घी से युक्त खीर का नैवेद्य तैयार करना चाहिए; मूल मन्त्र से एक सौ आठ हवि की आहुतियाँ देनी चाहिए।

श्लोक 57 (skanda.3.110.57)

तत उद्वास्य नैवेद्यं धूपनीराजनादिकम् ॥ कृत्वा निवेद्य तांबूलं नमस्कुर्यात्समाहितः

tata udvāsya naivedyaṁ dhūpanīrājanādikam kṛtvā nivedya tāṁbūlaṁ namaskuryātsamāhitaḥ

"फिर नैवेद्य हटाकर, धूप-आरती आदि करके, ताम्बूल अर्पित करके, एकाग्रचित्त होकर नमस्कार करना चाहिए।

श्लोक 58 (skanda.3.110.58)

अथाभ्यर्च्योपचारेण भोजयेद्विप्रदंपती

athābhyarcyopacāreṇa bhojayedvipradaṁpatī

"फिर इस प्रकार उपचारपूर्वक पूजा करके, एक ब्राह्मण-दम्पति को भोजन कराना चाहिए।

श्लोक 59 (skanda.3.110.59)

एवं सायंतनीं पूजां कृत्वा विप्रानुमोदितः ॥ भुंजीत वाग्यतो रात्रौ हविष्यं क्षीरभावितम्

evaṁ sāyaṁtanīṁ pūjāṁ kṛtvā viprānumoditaḥ bhuṁjīta vāgyato rātrau haviṣyaṁ kṣīrabhāvitam

"इस प्रकार सायंकालीन पूजा करके, ब्राह्मणों की अनुमति से, रात्रि में वाणी संयत रखते हुए दूध से बना हविष्यान्न खाना चाहिए।

श्लोक 60 (skanda.3.110.60)

एवं संवत्सरं कुर्याद्व्रतं पक्षद्वये बुधः ॥ ततः संवत्सरे पूर्णे व्रतोद्यापनमाचरेत्

evaṁ saṁvatsaraṁ kuryādvrataṁ pakṣadvaye budhaḥ tataḥ saṁvatsare pūrṇe vratodyāpanamācaret

"इस प्रकार बुद्धिमान को एक वर्ष तक दोनों पक्षों में व्रत करना चाहिए; फिर वर्ष पूर्ण होने पर व्रत का उद्यापन करना चाहिए।

श्लोक 61 (skanda.3.110.61)

शतरुद्राभिजप्तेन स्नापयेत्प्रतिमे जलैः ॥ आगमोक्तेन मन्त्रेण संपूज्य गिरिजाशिवौ

śatarudrābhijaptena snāpayetpratime jalaiḥ āgamoktena mantreṇa saṁpūjya girijāśivau

"शतरुद्रीय से अभिमन्त्रित जल से प्रतिमाओं को स्नान कराकर, आगमोक्त मन्त्र से गिरिजा-शिव की पूजा करके,

श्लोक 62 (skanda.3.110.62)

सवस्त्रं ससुवर्ण च कलशं प्रति मान्वितम्॥ दत्त्वाचार्याय महते सदाचाररताय च ॥ ब्राह्मणान्भोजयेद्भक्त्या यथाशक्त्याभिपूज्य च

savastraṁ sasuvarṇa ca kalaśaṁ prati mānvitam dattvācāryāya mahate sadācāraratāya ca brāhmaṇānbhojayedbhaktyā yathāśaktyābhipūjya ca

"वस्त्र और स्वर्ण सहित एक उचित माप का कलश महान, सदाचारी आचार्य को देकर, भक्तिपूर्वक यथाशक्ति सम्मान करके ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए।

श्लोक 63 (skanda.3.110.63)

दद्याच्च दक्षिणां तेभ्यो गोहिरण्यांबरादिकम् ॥ भुंजीत तदनुज्ञातः सहेष्टजनबंधुभिः

dadyācca dakṣiṇāṁ tebhyo gohiraṇyāṁbarādikam bhuṁjīta tadanujñātaḥ saheṣṭajanabaṁdhubhiḥ

"और उन्हें गौ, स्वर्ण, वस्त्र आदि दक्षिणा देनी चाहिए; उनकी अनुमति से अपने प्रियजनों और बन्धुओं सहित भोजन करना चाहिए।

श्लोक 64 (skanda.3.110.64)

एवं यः कुरुते भक्त्या व्रतं त्रैलोक्यविश्रुतम् ॥ त्रिःसप्तकुलमुद्धृत्य भुक्त्वा भोगान्यथेप्सि तान्

evaṁ yaḥ kurute bhaktyā vrataṁ trailokyaviśrutam triḥsaptakulamuddhṛtya bhuktvā bhogānyathepsi tān

"जो कोई भक्तिपूर्वक इस त्रिलोक-विख्यात व्रत को करता है, वह इक्कीस पीढ़ियों का उद्धार करके, यथेच्छ भोगों को भोगकर,

श्लोक 65 (skanda.3.110.65)

इन्द्रादिलोकपालानां स्थानेषु रमते धुवम् ॥ ब्रह्मलोके च रमते विष्णुलोके च शाश्वते

indrādilokapālānāṁ sthāneṣu ramate dhuvam brahmaloke ca ramate viṣṇuloke ca śāśvate

"इन्द्र आदि लोकपालों के स्थानों में निश्चय ही रमण करता है; ब्रह्मलोक में और शाश्वत विष्णुलोक में भी रमण करता है।

श्लोक 66 (skanda.3.110.66)

शिवलोकमथ प्राप्य तत्र कल्पशतं पुनः ॥ भुक्त्वा भोगान्सुविपुलाञ्छिवमेव प्रपद्यते

śivalokamatha prāpya tatra kalpaśataṁ punaḥ bhuktvā bhogānsuvipulāñchivameva prapadyate

"फिर शिवलोक को प्राप्त करके, वहाँ सौ कल्पों तक अत्यन्त विपुल भोगों को भोगकर, वह शिव को ही प्राप्त होता है।

श्लोक 67 (skanda.3.110.67)

महाव्रतमिदं प्रोक्तं त्वमपि श्रद्धया चर ॥ अत्यंतदुर्लभं वापि लप्स्यसे च मनोरथम्

mahāvratamidaṁ proktaṁ tvamapi śraddhayā cara atyaṁtadurlabhaṁ vāpi lapsyase ca manoratham

"यह महाव्रत कहा गया है; तुम भी श्रद्धापूर्वक इसे करो; अत्यन्त दुर्लभ होते हुए भी अपना मनोरथ प्राप्त करोगी।"

श्लोक 68 (skanda.3.110.68)

इत्यादिष्टा मुनींद्रेण सा बाला मुदिता भृशम् ॥ प्रत्यग्रहीत्सुविश्रब्धा तद्वाक्यं सुमनोहरम्

ityādiṣṭā munīṁdreṇa sā bālā muditā bhṛśam pratyagrahītsuviśrabdhā tadvākyaṁ sumanoharam

इस प्रकार मुनीन्द्र द्वारा उपदिष्ट होकर, वह बालिका अत्यन्त प्रसन्न होकर, पूर्ण विश्वास से उसके अत्यन्त मनोहर वचन को स्वीकार किया।

श्लोक 69 (skanda.3.110.69)

अथ तस्याः समायाताः पितृमातृ सहोदराः ॥ तं मुनिं सुखमासीनं ददृशुः कृतभोजनम्

atha tasyāḥ samāyātāḥ pitṛmātṛ sahodarāḥ taṁ muniṁ sukhamāsīnaṁ dadṛśuḥ kṛtabhojanam

फिर उसके माता-पिता और भाई-बहन आ पहुँचे और उस मुनि को सुखपूर्वक बैठे, भोजन किए हुए देखा।

श्लोक 70 (skanda.3.110.70)

सहसागत्य ते सर्वे नमश्चक्रुर्महात्मने ॥ प्रसीद नः प्रसीदेति गृणतः पर्यपूज यन्

sahasāgatya te sarve namaścakrurmahātmane prasīda naḥ prasīdeti gṛṇataḥ paryapūja yan

सहसा आकर वे सभी उस महात्मा को नमस्कार करने लगे, "हम पर प्रसन्न हों, प्रसन्न हों" कहते हुए उनकी पूजा करने लगे।

श्लोक 71 (skanda.3.110.71)

श्रुत्वा च ते तया साध्व्या पूजितं परमं मुनिम् ॥ अनुग्रहवतं तस्यै श्रुत्वा हर्षं परं ययुः

śrutvā ca te tayā sādhvyā pūjitaṁ paramaṁ munim anugrahavataṁ tasyai śrutvā harṣaṁ paraṁ yayuḥ

उस साध्वी द्वारा परम मुनि की पूजा किए जाने और उनकी उस पर कृपा होने का समाचार सुनकर, वे परम हर्ष को प्राप्त हुए।

श्लोक 72 (skanda.3.110.72)

ते कृतांजलयः सर्वे तमूचुर्मुनि पुंगवम्

te kṛtāṁjalayaḥ sarve tamūcurmuni puṁgavam

वे सभी हाथ जोड़कर उस मुनिश्रेष्ठ से बोले —

श्लोक 73 (skanda.3.110.73)

अद्य धन्या वयं सर्वे तवागमनमात्रतः ॥ पावितं नः कुलं सर्वं गृहं च सफलीकृतम्

adya dhanyā vayaṁ sarve tavāgamanamātrataḥ pāvitaṁ naḥ kulaṁ sarvaṁ gṛhaṁ ca saphalīkṛtam

"आज हम सभी आपके आगमन मात्र से धन्य हो गए; हमारा सम्पूर्ण कुल पवित्र हो गया, और हमारा घर सफल हो गया।

श्लोक 74 (skanda.3.110.74)

इयं च शारदा नाम कन्या वैधव्यमागता ॥ केनापि कर्मयोगेन दुर्विलंघ्येन भूयसा

iyaṁ ca śāradā nāma kanyā vaidhavyamāgatā kenāpi karmayogena durvilaṁghyena bhūyasā

"यह शारदा नाम की कन्या, किसी अत्यन्त दुर्लंघ्य कर्मयोग से वैधव्य को प्राप्त हुई है।

श्लोक 75 (skanda.3.110.75)

सैषाद्य तव पादाब्जं प्रपन्ना शरणं सती ॥ इमां समुद्धरासह्यात्सुघोराद्दुःख सागरात्

saiṣādya tava pādābjaṁ prapannā śaraṇaṁ satī imāṁ samuddharāsahyātsughorādduḥkha sāgarāt

"यह सती आज आपके चरणकमल की शरण में आई है; इसे इस असह्य, अत्यन्त घोर दुःख-सागर से उद्धार कीजिए।

श्लोक 76 (skanda.3.110.76)

त्वयापि तावदत्रैव स्थातव्यं नो गृहांतिके ॥ अस्मद्गृहमठेऽप्यस्मिन्स्नानपूजाजपोचिते

tvayāpi tāvadatraiva sthātavyaṁ no gṛhāṁtike asmadgṛhamaṭhe'pyasminsnānapūjājapocite

"आपको भी अभी यहीं, हमारे घर के समीप, हमारे इस स्नान-पूजा-जप के योग्य मठ में ही रहना चाहिए।

श्लोक 77 (skanda.3.110.77)

एषा बालापि भगवन्कुर्वंती त्वत्पदार्चनम् ॥ व्रतं त्वत्सन्निधावेव चरिष्यति महामुने

eṣā bālāpi bhagavankurvaṁtī tvatpadārcanam vrataṁ tvatsannidhāveva cariṣyati mahāmune

"यह बालिका भी, हे भगवन्! आपके चरणों की पूजा करते हुए, आपके सान्निध्य में ही यह व्रत करेगी, हे महामुने!

श्लोक 78 (skanda.3.110.78)

यावत्समाप्तिमायाति व्रतमस्यास्त्वदंतिके ॥ उषित्वा तावदत्रैव कृतार्थान्कुरु नो गुरो

yāvatsamāptimāyāti vratamasyāstvadaṁtike uṣitvā tāvadatraiva kṛtārthānkuru no guro

"जब तक इसका यह व्रत आपके समीप पूर्णता को न प्राप्त हो, तब तक यहीं रहकर हमें कृतार्थ कीजिए, हे गुरो!"

श्लोक 79 (skanda.3.110.79)

एवमभ्यर्थितः सर्वैस्तस्या भ्रातृजनादिभिः ॥ तथेति स मुनिश्रेष्ठस्तत्रोवास मठे शुभे

evamabhyarthitaḥ sarvaistasyā bhrātṛjanādibhiḥ tatheti sa muniśreṣṭhastatrovāsa maṭhe śubhe

इस प्रकार उसके भाइयों आदि सभी द्वारा प्रार्थना किए जाने पर, वह मुनिश्रेष्ठ "ऐसा ही हो" कहकर वहाँ उस शुभ मठ में रहने लगे।

श्लोक 80 (skanda.3.110.80)

सापि तेनोपदिष्टेन मार्गेण गिरिजाशिवौ ॥ अर्चयंती व्रतं सम्यक्चचार विमला सती

sāpi tenopadiṣṭena mārgeṇa girijāśivau arcayaṁtī vrataṁ samyakcacāra vimalā satī

वह भी उनके द्वारा उपदिष्ट मार्ग से गिरिजा-शिव की पूजा करते हुए, भलीभाँति व्रत का पालन करने लगी, वह निर्मल सती।

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