ब्रह्म खण्ड · अध्याय 109
श्रद्धा और शबर की भक्ति
श्लोक 1 (skanda.3.109.1)
॥ ऋषय ऊचुः ॥ वेदवेदांगतत्त्वज्ञैर्गुरुभिर्ब्रह्मवादिभिः ॥ नृणां कृतोपदेशानां सद्यः सिद्धिर्हि जायते
ṛṣaya ūcuḥ vedavedāṁgatattvajñairgurubhirbrahmavādibhiḥ nṛṇāṁ kṛtopadeśānāṁ sadyaḥ siddhirhi jāyate
ऋषियों ने कहा — वेद-वेदांगों के तत्त्वज्ञ, ब्रह्मवादी गुरुओं द्वारा उपदिष्ट मनुष्यों की सिद्धि तो तत्काल होती ही है।
श्लोक 2 (skanda.3.109.2)
अथान्यजनसामान्यैर्गुरुभिर्नीतिकोविदैः॥ नृणां कृतोपदेशानां सिद्धिर्भवति कीदृशी
athānyajanasāmānyairgurubhirnītikovidaiḥ nṛṇāṁ kṛtopadeśānāṁ siddhirbhavati kīdṛśī
किन्तु सामान्य लोगों जैसे, केवल नीति में कुशल गुरुओं द्वारा उपदिष्ट मनुष्यों की सिद्धि कैसी होती है?
श्लोक 3 (skanda.3.109.3)
सूत उवाच ॥ श्रद्धैव सर्वधर्मस्य चातीव हितकारिणी ॥ श्रद्धयैव नृणां सिद्धिर्जायते लोकयोर्द्वयोः
sūta uvāca śraddhaiva sarvadharmasya cātīva hitakāriṇī śraddhayaiva nṛṇāṁ siddhirjāyate lokayordvayoḥ
सूत जी ने कहा — श्रद्धा ही समस्त धर्म के लिए अत्यन्त हितकारी है; श्रद्धा से ही मनुष्यों की दोनों लोकों में सिद्धि होती है।
श्लोक 4 (skanda.3.109.4)
श्रद्धया भजतः पुंसः शिलापि फलदायिनी ॥ मूर्खोऽपि पूजितो भक्त्या गुरुर्भवति सिद्धिदः
śraddhayā bhajataḥ puṁsaḥ śilāpi phaladāyinī mūrkho'pi pūjito bhaktyā gururbhavati siddhidaḥ
श्रद्धापूर्वक भजनेवाले पुरुष के लिए पत्थर भी फल देनेवाला बन जाता है; मूर्ख भी भक्तिपूर्वक गुरु के रूप में पूजित होकर सिद्धिदायक बन जाता है।
श्लोक 5 (skanda.3.109.5)
श्रद्धया पठितो मन्त्रस्त्वबद्धोपि फलप्रदः ॥ श्रद्धया पूजितो देवो नीचस्यापि फलप्रदः ॥ ६. ॥ अश्रद्धया कृता पूजा दानं यज्ञस्तपो व्रतम् ॥ सर्वं निष्फलतां याति पुष्पं वन्ध्यत रोरिव
śraddhayā paṭhito mantrastvabaddhopi phalapradaḥ śraddhayā pūjito devo nīcasyāpi phalapradaḥ 6. aśraddhayā kṛtā pūjā dānaṁ yajñastapo vratam sarvaṁ niṣphalatāṁ yāti puṣpaṁ vandhyata roriva
श्रद्धापूर्वक पढ़ा गया मन्त्र, त्रुटिपूर्ण होते हुए भी फलदायी होता है; श्रद्धापूर्वक पूजित देव, नीच व्यक्ति के लिए भी फलदायी होता है। श्रद्धारहित होकर की गई पूजा, दान, यज्ञ, तप और व्रत — सब निष्फल हो जाते हैं, जैसे बंजर वृक्ष पर फूल।
श्लोक 6 (skanda.3.109.6)
सर्वत्र संशयाविष्टः श्रद्धाहीनोऽतिचंचलः ॥ परमार्थात्परिभ्रष्टः संसृतेर्न हि मुच्यते
sarvatra saṁśayāviṣṭaḥ śraddhāhīno'ticaṁcalaḥ paramārthātparibhraṣṭaḥ saṁsṛterna hi mucyate
सर्वत्र संशयग्रस्त, श्रद्धाहीन, अत्यन्त चंचल, परमार्थ से भ्रष्ट व्यक्ति संसार से कभी मुक्त नहीं होता।
श्लोक 7 (skanda.3.109.7)
मन्त्रे तीर्थे द्विजे देवे दैवज्ञे भेषजे गुरौ ॥ यादृशी भावना यत्र सिद्धिर्भवति तादृशी
mantre tīrthe dvije deve daivajñe bheṣaje gurau yādṛśī bhāvanā yatra siddhirbhavati tādṛśī
मन्त्र में, तीर्थ में, ब्राह्मण में, देव में, ज्योतिषी में, वैद्य में, गुरु में — जहाँ जैसी भावना होती है, वहाँ वैसी ही सिद्धि होती है।
श्लोक 8 (skanda.3.109.8)
अतो भावमयं विश्वं पुण्यं पापं च भावतः ॥ ते उभे भावहीनस्य न भवेतां कदाचन
ato bhāvamayaṁ viśvaṁ puṇyaṁ pāpaṁ ca bhāvataḥ te ubhe bhāvahīnasya na bhavetāṁ kadācana
इसलिए यह विश्व भावनामय है, पुण्य और पाप भी भावना से ही होते हैं; भावनारहित के लिए ये दोनों कभी नहीं होते।
श्लोक 9 (skanda.3.109.9)
अत्रेदं परमाश्चर्यमाख्यानमनुवर्ण्यते ॥ अश्रद्धा सर्वमर्त्यानां येन सद्यो निवर्तते
atredaṁ paramāścaryamākhyānamanuvarṇyate aśraddhā sarvamartyānāṁ yena sadyo nivartate
यहाँ यह परम आश्चर्यजनक आख्यान वर्णित किया जाता है, जिससे समस्त मनुष्यों की अश्रद्धा तत्काल दूर हो जाती है।
श्लोक 10 (skanda.3.109.10)
आसीत्पांचालराजस्य सिंहकेतुरिति श्रुतः ॥ पुत्रः सर्वगुणोपेतः क्षात्रधर्मरतः सदा
āsītpāṁcālarājasya siṁhaketuriti śrutaḥ putraḥ sarvaguṇopetaḥ kṣātradharmarataḥ sadā
पांचाल के राजा का सिंहकेतु नाम से प्रसिद्ध एक पुत्र था, समस्त गुणों से युक्त, सदा क्षत्रिय-धर्म में रत।
श्लोक 11 (skanda.3.109.11)
स एकदा कतिपयैर्भृत्यैर्युक्तो महाबलः ॥ जगाम मृगयाहेतोर्बहु सत्त्वान्वितं वनम्
sa ekadā katipayairbhṛtyairyukto mahābalaḥ jagāma mṛgayāhetorbahu sattvānvitaṁ vanam
वह महाबली एक बार कुछ सेवकों सहित, अनेक प्राणियों से युक्त वन में मृगया के लिए गया।
श्लोक 12 (skanda.3.109.12)
तद्भृत्यः शबरः कश्चिद्विचरन्मृगयां वने ॥ ददर्श जीर्णं स्फुटितं पतितं देवतालयम्
tadbhṛtyaḥ śabaraḥ kaścidvicaranmṛgayāṁ vane dadarśa jīrṇaṁ sphuṭitaṁ patitaṁ devatālayam
उसका एक शबर सेवक, वन में मृगया के लिए विचरण करते हुए, एक जीर्ण, टूटा, गिरा हुआ देवमन्दिर देखा।
श्लोक 13 (skanda.3.109.13)
तत्रापश्यद्भिन्नपीठं पतितं स्थंडिलोपरि ॥ शिवलिंङ्गमृजुं सूक्ष्मं मूर्तं भाग्यमिवात्मनः
tatrāpaśyadbhinnapīṭhaṁ patitaṁ sthaṁḍilopari śivaliṁṅgamṛjuṁ sūkṣmaṁ mūrtaṁ bhāgyamivātmanaḥ
वहाँ उसने एक टूटी हुई पीठिका पर, नंगी भूमि पर गिरा हुआ, सीधा और सूक्ष्म शिवलिंग देखा, मानो अपने ही भाग्य की साक्षात मूर्ति।
श्लोक 14 (skanda.3.109.14)
स समादाय वेगेन पूर्वकर्मप्रचोदितः ॥ तस्मै संदर्शयामास राज पुत्राय धीमते
sa samādāya vegena pūrvakarmapracoditaḥ tasmai saṁdarśayāmāsa rāja putrāya dhīmate
अपने पूर्वकर्म से प्रेरित होकर, उसने वेगपूर्वक उसे उठाया और उस बुद्धिमान राजकुमार को दिखाया।
श्लोक 15 (skanda.3.109.15)
पश्येदं रुचिरं लिंगं मया दृष्टमिह प्रभो ॥ तदेतत्पूजयिष्यामि यथाविभवमादरात्
paśyedaṁ ruciraṁ liṁgaṁ mayā dṛṣṭamiha prabho tadetatpūjayiṣyāmi yathāvibhavamādarāt
"देखिए, प्रभु! यह सुन्दर लिंग मैंने यहाँ देखा है; इसकी मैं यथाशक्ति आदरपूर्वक पूजा करूँगा।
श्लोक 16 (skanda.3.109.16)
अस्य पूजाविधिं ब्रूहि यथा देवो महेश्वरः ॥ अमंत्रज्ञैश्च मन्त्रज्ञैः प्रीतो भवति पूजितः
asya pūjāvidhiṁ brūhi yathā devo maheśvaraḥ amaṁtrajñaiśca mantrajñaiḥ prīto bhavati pūjitaḥ
"इसकी पूजा-विधि बताइए, जिससे महेश्वर देव, मन्त्रज्ञों और अमन्त्रज्ञों दोनों द्वारा पूजित होकर प्रसन्न होते हैं।"
श्लोक 17 (skanda.3.109.17)
इति तेन निषादेन पृष्टः पार्थिवनंदनः ॥ प्रत्युवाच प्रहस्यैनं परिहास विचक्षणः
iti tena niṣādena pṛṣṭaḥ pārthivanaṁdanaḥ pratyuvāca prahasyainaṁ parihāsa vicakṣaṇaḥ
इस प्रकार उस निषाद द्वारा पूछे जाने पर, परिहास में निपुण उस राजकुमार ने हँसते हुए उसे उत्तर दिया।
श्लोक 18 (skanda.3.109.18)
संकल्पेन सदा कुर्यादभिषेकं नवांभसा ॥ उपवेश्यासने शुद्धे शुभैर्गंधाक्षतैर्नवैः ॥ वन्यैः पत्रैश्च कुसुमैर्धूपैर्दीपैश्च पूजयेत
saṁkalpena sadā kuryādabhiṣekaṁ navāṁbhasā upaveśyāsane śuddhe śubhairgaṁdhākṣatairnavaiḥ vanyaiḥ patraiśca kusumairdhūpairdīpaiśca pūjayeta
"संकल्पपूर्वक सदा नए जल से अभिषेक करना चाहिए; शुद्ध आसन पर बिठाकर, शुभ नए गन्ध-अक्षत से, वन के पत्तों और फूलों से, धूप-दीप से पूजा करनी चाहिए।
श्लोक 19 (skanda.3.109.19)
चिताभस्मोपहारं च प्रथमं परिकल्पयेत् ॥ आत्मोपभोग्येनान्नेन नैवद्यं कल्पयेद्बुधः
citābhasmopahāraṁ ca prathamaṁ parikalpayet ātmopabhogyenānnena naivadyaṁ kalpayedbudhaḥ
"सबसे पहले चिताभस्म का उपहार तैयार करना चाहिए; बुद्धिमान को अपने खाने योग्य अन्न से नैवेद्य तैयार करना चाहिए।
श्लोक 20 (skanda.3.109.20)
पुनश्च धूपदीपादीनुपचारान्प्रकल्पेत् ॥ नृत्यवादित्रगीतादीन्यथावत्परिकल्पयेत्
punaśca dhūpadīpādīnupacārānprakalpet nṛtyavāditragītādīnyathāvatparikalpayet
"फिर धूप-दीप आदि उपचार तैयार करने चाहिए; नृत्य, वाद्य, गीत आदि यथोचित रूप से व्यवस्थित करने चाहिए।
श्लोक 21 (skanda.3.109.21)
नमस्कृत्वा तु विधिवत्प्रसादं धारयेद्बुधः ॥ एष साधारणः प्रोक्तः शिवपूजाविधिस्तव
namaskṛtvā tu vidhivatprasādaṁ dhārayedbudhaḥ eṣa sādhāraṇaḥ proktaḥ śivapūjāvidhistava
"विधिपूर्वक नमस्कार करके, बुद्धिमान को प्रसाद ग्रहण करना चाहिए; यह तुम्हें बताई गई सामान्य शिवपूजा-विधि है।
श्लोक 22 (skanda.3.109.22)
चिताभस्मोपहारेण सद्यस्तुष्यति शंकरः
citābhasmopahāreṇa sadyastuṣyati śaṁkaraḥ
"चिताभस्म के उपहार से शंकर तत्काल संतुष्ट हो जाते हैं।"
श्लोक 23 (skanda.3.109.23)
सूत उवाच ॥ परिहासरसेनेत्थं शासितः स्वामिनाऽमुना ॥ स चंडकाख्यः शबरो मूर्ध्ना जग्राह तद्वचः
sūta uvāca parihāsarasenetthaṁ śāsitaḥ svāminā'munā sa caṁḍakākhyaḥ śabaro mūrdhnā jagrāha tadvacaḥ
सूत जी ने कहा — इस प्रकार अपने स्वामी द्वारा परिहासरस में इस प्रकार कहे जाने पर, चण्डक नाम के उस शबर ने उस वचन को शिरोधार्य कर लिया।
श्लोक 24 (skanda.3.109.24)
ततः स्वभवनं प्राप्य लिंगमूर्ति महेश्वरम् ॥ प्रत्यहं पूजयामास चिताभस्मोपहारकृत्
tataḥ svabhavanaṁ prāpya liṁgamūrti maheśvaram pratyahaṁ pūjayāmāsa citābhasmopahārakṛt
फिर अपने घर पहुँचकर, वह लिंगमूर्ति महेश्वर की, चिताभस्म का उपहार अर्पित करते हुए, प्रतिदिन पूजा करने लगा।
श्लोक 25 (skanda.3.109.25)
यच्चात्मनः प्रियं वस्तु गन्धपुष्पाक्षतादिकम् ॥ निवेद्य शंभवे नित्यमुपायुंक्त ततः स्वयम्
yaccātmanaḥ priyaṁ vastu gandhapuṣpākṣatādikam nivedya śaṁbhave nityamupāyuṁkta tataḥ svayam
और जो कुछ भी उसे स्वयं प्रिय वस्तु होती — गन्ध, पुष्प, अक्षत आदि — उसे नित्य शम्भु को अर्पित करके, फिर स्वयं उसका उपभोग करता था।
श्लोक 26 (skanda.3.109.26)
एवं महेश्वरं भक्त्या सह पत्न्याभ्यपूजयत् ॥ शबरः सुखमासाद्य निनाय कतिचित्समाः
evaṁ maheśvaraṁ bhaktyā saha patnyābhyapūjayat śabaraḥ sukhamāsādya nināya katicitsamāḥ
इस प्रकार भक्तिपूर्वक अपनी पत्नी सहित महेश्वर की पूजा करते हुए, वह शबर सुख प्राप्त करके कुछ वर्ष बिता चुका था।
श्लोक 27 (skanda.3.109.27)
एकदा शिवपूजायै प्रवृत्तः शबरोत्तमः ॥ न ददर्श चिताभस्म पात्रे पूरितमण्वपि
ekadā śivapūjāyai pravṛttaḥ śabarottamaḥ na dadarśa citābhasma pātre pūritamaṇvapi
एक बार शिवपूजा के लिए प्रवृत्त हुए उस श्रेष्ठ शबर ने पात्र में चिताभस्म का एक कण भी भरा हुआ नहीं देखा।
श्लोक 28 (skanda.3.109.28)
अथासौ त्वरितो दूरमन्विष्यन्परितो भ्रमन् ॥ न लब्धवांश्चिताभस्म श्रांतो गृहमगात्पुनः
athāsau tvarito dūramanviṣyanparito bhraman na labdhavāṁścitābhasma śrāṁto gṛhamagātpunaḥ
फिर वह तुरन्त दूर तक खोजते हुए, चारों ओर घूमते हुए, चिताभस्म नहीं पा सका, और थककर पुनः घर लौट आया।
श्लोक 29 (skanda.3.109.29)
तत आहूय पत्नीं स्वां शबरो वाक्यमब्रवीत् ॥ न लब्धं मे चिताभस्म किं करोमि वद प्रिये
tata āhūya patnīṁ svāṁ śabaro vākyamabravīt na labdhaṁ me citābhasma kiṁ karomi vada priye
फिर अपनी पत्नी को बुलाकर, शबर ने यह वचन कहा — "मुझे चिताभस्म नहीं मिली; मैं क्या करूँ, बताओ प्रिये।
श्लोक 30 (skanda.3.109.30)
शिवपूजांतरायो मे जातोद्य बत पाप्मनः ॥ पूजां विना क्षणमपि नाहं जीवितुमुत्सहे
śivapūjāṁtarāyo me jātodya bata pāpmanaḥ pūjāṁ vinā kṣaṇamapi nāhaṁ jīvitumutsahe
"आज मुझ पापी को शिवपूजा में विघ्न उत्पन्न हो गया; पूजा के बिना, क्षणभर भी मैं जीने का साहस नहीं करता।
श्लोक 31 (skanda.3.109.31)
उपायं नात्र पश्यामि पूजोपकरणे हते ॥ न गुरोश्च विहन्येत शासनं सकलार्थदम्
upāyaṁ nātra paśyāmi pūjopakaraṇe hate na gurośca vihanyeta śāsanaṁ sakalārthadam
"पूजा-सामग्री समाप्त होने पर मुझे यहाँ कोई उपाय नहीं दिखता; गुरु की सर्वार्थदायक आज्ञा भी भंग नहीं होनी चाहिए।"
श्लोक 32 (skanda.3.109.32)
इति व्याकुलितं दृष्ट्वा भर्त्तारं शबरांगना ॥ प्रत्यभाषत मा भैस्त्वमुपायं प्रवदामि ते
iti vyākulitaṁ dṛṣṭvā bharttāraṁ śabarāṁganā pratyabhāṣata mā bhaistvamupāyaṁ pravadāmi te
इस प्रकार अपने पति को व्याकुल देखकर, शबर की पत्नी ने कहा — "डरो मत, मैं तुम्हें उपाय बताती हूँ।
श्लोक 33 (skanda.3.109.33)
इदमेव गृहं दग्ध्वा बहुकालोपबृंहितम् ॥ अहमग्निं प्रवेक्ष्यामि चिताभस्म भवेत्ततः
idameva gṛhaṁ dagdhvā bahukālopabṛṁhitam ahamagniṁ pravekṣyāmi citābhasma bhavettataḥ
"इसी घर को, जो बहुत काल से बना हुआ है, जलाकर, मैं अग्नि में प्रवेश करूँगी; उससे चिताभस्म प्राप्त होगी।"
श्लोक 34 (skanda.3.109.34)
शबर उवाच ॥ धर्मार्थकाममोक्षाणां देहः परमसाधनम् ॥ कथं त्यजसि तं देहं सुखार्थं नवयौवनम्
śabara uvāca dharmārthakāmamokṣāṇāṁ dehaḥ paramasādhanam kathaṁ tyajasi taṁ dehaṁ sukhārthaṁ navayauvanam
शबर ने कहा — "धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का यह देह ही परम साधन है; सुख के लिए इस नवयौवन देह को तुम कैसे त्याग सकती हो?
श्लोक 35 (skanda.3.109.35)
अधुना त्वनपत्या त्वमभुक्तविषयासवा ॥ भोगयोग्यमिमं देहं कथं दग्धुमिहेच्छसि
adhunā tvanapatyā tvamabhuktaviṣayāsavā bhogayogyamimaṁ dehaṁ kathaṁ dagdhumihecchasi
"अभी तुम सन्तानहीन हो, विषयों का रस भोगा नहीं है; भोग के योग्य इस देह को यहाँ जलाने की इच्छा तुम कैसे करती हो?"
श्लोक 36 (skanda.3.109.36)
शबर्युवाच ॥ एतावदेव साफल्यं जीवितस्य च जन्मनः ॥ परार्थे यस्त्यजेत्प्राणाञ्छिवार्थे किमुत स्वयम्
śabaryuvāca etāvadeva sāphalyaṁ jīvitasya ca janmanaḥ parārthe yastyajetprāṇāñchivārthe kimuta svayam
शबर की पत्नी ने कहा — "जीवन और जन्म की सफलता यही है — जो दूसरे के लिए प्राण त्याग दे, तो शिव के लिए स्वयं तो क्या ही बात है!
श्लोक 37 (skanda.3.109.37)
किं नु तप्तं तपो घोरं किं वा दत्तं मया पुरा ॥ किं वार्चनं कृतं शंभोः पूर्वजन्मशतांतरे
kiṁ nu taptaṁ tapo ghoraṁ kiṁ vā dattaṁ mayā purā kiṁ vārcanaṁ kṛtaṁ śaṁbhoḥ pūrvajanmaśatāṁtare
"मैंने पूर्वकाल में कौन-सा घोर तप तपा, अथवा क्या दान दिया? सैकड़ों पूर्वजन्मों में मैंने शम्भु की कैसी अर्चना की?
श्लोक 38 (skanda.3.109.38)
किं वा पुण्यं मम पितुः का वा मातुः कृतार्थता ॥ यच्छिवार्थे समिद्धेऽग्नौ त्यजाम्येतत्कलेवरम्
kiṁ vā puṇyaṁ mama pituḥ kā vā mātuḥ kṛtārthatā yacchivārthe samiddhe'gnau tyajāmyetatkalevaram
"अथवा मेरे पिता का कौन-सा पुण्य, मेरी माता की कौन-सी कृतार्थता, कि आज मैं शिव के लिए, प्रज्वलित अग्नि में यह शरीर त्याग रही हूँ?"
श्लोक 39 (skanda.3.109.39)
इत्थं स्थिरां मतिं दृष्ट्वा तस्या भक्तिं च शंकरे ॥ तथेति दृढसंकल्पः शबरः प्रत्यपूजयत्
itthaṁ sthirāṁ matiṁ dṛṣṭvā tasyā bhaktiṁ ca śaṁkare tatheti dṛḍhasaṁkalpaḥ śabaraḥ pratyapūjayat
इस प्रकार उसकी स्थिर बुद्धि और शंकर में भक्ति को देखकर, शबर ने दृढ़ संकल्प करके "ऐसा ही हो" कहकर उसकी पूजा में सम्मति दी।
श्लोक 40 (skanda.3.109.40)
सा भर्त्तारमनुप्राप्य स्नात्वा शुचिरलंकृता ॥ गृहमादीप्य तं वह्निं भक्त्या चक्रे प्रदक्षिणम्
sā bharttāramanuprāpya snātvā śuciralaṁkṛtā gṛhamādīpya taṁ vahniṁ bhaktyā cakre pradakṣiṇam
उसने अपने पति की सम्मति पाकर, स्नान करके पवित्र और अलंकृत होकर, घर में आग लगाकर, भक्तिपूर्वक उस अग्नि की प्रदक्षिणा की।
श्लोक 41 (skanda.3.109.41)
नमस्कृत्वात्मगुरवे ध्यात्वा हृदि सदाशिवम् ॥ अग्निप्रवेशाभिमुखी कृतांजलिरिदं जगौ
namaskṛtvātmagurave dhyātvā hṛdi sadāśivam agnipraveśābhimukhī kṛtāṁjaliridaṁ jagau
अपने गुरु को नमस्कार करके, हृदय में सदाशिव का ध्यान करके, अग्नि-प्रवेश के सम्मुख हाथ जोड़े हुए, उसने यह गाया —
श्लोक 42 (skanda.3.109.42)
शबर्युवाच ॥ पुष्पाणि संतु तव देव ममेंद्रियाणि धूपोऽगुरुर्वपुरिदं हृदयं प्रदीपः ॥ प्राणा हवींषि करणानि तवाक्षताश्च पूजाफलं व्रजतु सांप्रतमेष जीवः
śabaryuvāca puṣpāṇi saṁtu tava deva mameṁdriyāṇi dhūpo'gururvapuridaṁ hṛdayaṁ pradīpaḥ prāṇā havīṁṣi karaṇāni tavākṣatāśca pūjāphalaṁ vrajatu sāṁpratameṣa jīvaḥ
शबर की पत्नी ने कहा — "हे देव! मेरी इन्द्रियाँ तुम्हारे लिए पुष्प हों, यह देह अगुरु धूप हो, यह हृदय दीप हो। मेरे प्राण हवि हों, मेरी इन्द्रियाँ अक्षत हों; यह पूजा का फल, यह जीव, अभी तुम्हारी ओर जाए।
श्लोक 43 (skanda.3.109.43)
वांछामि नाहमपि सर्वधनाधिपत्यं न स्वर्गभूमिमचलां न पदं विधातुः ॥ भूयो भवामि यदि जन्मनिजन्मनि स्यां त्वत्पादपंकजलसन्मकरंदभृंगी
vāṁchāmi nāhamapi sarvadhanādhipatyaṁ na svargabhūmimacalāṁ na padaṁ vidhātuḥ bhūyo bhavāmi yadi janmanijanmani syāṁ tvatpādapaṁkajalasanmakaraṁdabhṛṁgī
"मैं समस्त धन का आधिपत्य भी नहीं चाहती, न अचल स्वर्गभूमि, न विधाता का पद; यदि मुझे पुनः-पुनः जन्म लेना ही पड़े, तो जन्म-जन्म में तुम्हारे चरणकमल के बहते मकरन्द की भ्रमरी बनूँ।
श्लोक 44 (skanda.3.109.44)
जन्मानि संतु मम देव शताधिकानि माया न मे वि शतु चित्तमबोधहेतुः ॥ किंचित्क्षणार्धमपि ते चरणारविन्दान्नापैतु मे हृदयमीश नमोनमस्ते
janmāni saṁtu mama deva śatādhikāni māyā na me vi śatu cittamabodhahetuḥ kiṁcitkṣaṇārdhamapi te caraṇāravindānnāpaitu me hṛdayamīśa namonamaste
"हे देव! मुझे सौ से अधिक जन्म प्राप्त हों, किन्तु अज्ञान का कारण माया मेरे चित्त में कभी प्रवेश न करे; मेरा हृदय क्षणार्ध भी तुम्हारे चरणारविन्द से न हटे, हे ईश! तुम्हें नमस्कार है, नमस्कार है।"
श्लोक 45 (skanda.3.109.45)
इति प्रसाद्य देवेशं शबरी दृढनिश्चया ॥ विवेश ज्वलितं वह्निं भस्मसादभवत्क्षणात्
iti prasādya deveśaṁ śabarī dṛḍhaniścayā viveśa jvalitaṁ vahniṁ bhasmasādabhavatkṣaṇāt
इस प्रकार देवेश को प्रसन्न करके, दृढ़निश्चयी वह शबरी प्रज्वलित अग्नि में प्रविष्ट हुई, और क्षणभर में भस्म हो गई।
श्लोक 46 (skanda.3.109.46)
शबरोपि च तद्भस्म यत्नेन परिगृह्य सः ॥ चक्रे दग्धगृहोपान्ते शिवपूजां समाहितः
śabaropi ca tadbhasma yatnena parigṛhya saḥ cakre dagdhagṛhopānte śivapūjāṁ samāhitaḥ
शबर ने भी उस भस्म को यत्नपूर्वक ग्रहण करके, जले हुए घर के समीप एकाग्रचित्त होकर शिवपूजा की।
श्लोक 47 (skanda.3.109.47)
अथ सस्मार पूजांते प्रसादग्रहणोचिताम् ॥ दयितां नित्यमायांतीं प्रांजलिं विनयान्विताम्
atha sasmāra pūjāṁte prasādagrahaṇocitām dayitāṁ nityamāyāṁtīṁ prāṁjaliṁ vinayānvitām
फिर पूजा के अन्त में, वह प्रसाद ग्रहण के योग्य, नित्य आनेवाली, हाथ जोड़े, विनयशील अपनी प्रिया का स्मरण करने लगा।
श्लोक 48 (skanda.3.109.48)
स्मृतमात्रां तदापश्यदागतां पृष्ठतः स्थिताम् ॥ पूर्वेणावयवेनैव भक्तिनम्रां शुचिस्मिताम्
smṛtamātrāṁ tadāpaśyadāgatāṁ pṛṣṭhataḥ sthitām pūrveṇāvayavenaiva bhaktinamrāṁ śucismitām
स्मरण करते ही उसने उसे पीछे खड़ी, पूर्ववत् अंगोंवाली, भक्ति से नम्र, शुद्ध मुस्कानवाली, वहाँ आई हुई देखा।
श्लोक 49 (skanda.3.109.49)
तां वीक्ष्य शबरः पत्नीं पूर्ववत्प्रांजलिं स्थिताम् ॥ भस्मावशेषितगृहं यथापूर्वमवस्थितम्
tāṁ vīkṣya śabaraḥ patnīṁ pūrvavatprāṁjaliṁ sthitām bhasmāvaśeṣitagṛhaṁ yathāpūrvamavasthitam
अपनी पत्नी को पूर्ववत् हाथ जोड़े खड़ी देखकर, और भस्मावशिष्ट घर को भी पहले जैसा स्थित देखकर,
श्लोक 50 (skanda.3.109.50)
अग्निर्दहति तेजोभिः सूर्यो दहति रश्मिभिः ॥ राजा दहति दंडेन ब्राह्मणो मनसा दहेत्
agnirdahati tejobhiḥ sūryo dahati raśmibhiḥ rājā dahati daṁḍena brāhmaṇo manasā dahet
"अग्नि तेज से जलाती है, सूर्य किरणों से जलाता है, राजा दण्ड से जलाता है, ब्राह्मण मन से जला देता है —
श्लोक 51 (skanda.3.109.51)
किमयं स्वप्न आहोस्वित्किं वा माया भ्रमात्मिका ॥ इति विस्मयसंभ्रातस्तां भूयः पर्यपृच्छत
kimayaṁ svapna āhosvitkiṁ vā māyā bhramātmikā iti vismayasaṁbhrātastāṁ bhūyaḥ paryapṛcchata
"क्या यह स्वप्न है, अथवा क्या यह भ्रमपूर्ण माया है?" इस प्रकार आश्चर्यचकित होकर उसने उससे पुनः पूछा —
श्लोक 52 (skanda.3.109.52)
अपि त्वं च कथं प्राप्ता भस्मभूतासि पावके ॥ दग्धं च भवनं भूयः कथं पूर्व वदास्थितम्
api tvaṁ ca kathaṁ prāptā bhasmabhūtāsi pāvake dagdhaṁ ca bhavanaṁ bhūyaḥ kathaṁ pūrva vadāsthitam
"तुम अग्नि में भस्म होकर भी यहाँ कैसे आ गईं? और यह जला हुआ घर भी पहले जैसा फिर से कैसे खड़ा है?"
श्लोक 53 (skanda.3.109.53)
शबर्युवाच ॥ यदा गृहं समुद्दीप्य प्रविष्टाहं हुताशने ॥ तदात्मानं न जानामि न पश्यामि हुताशनम्
śabaryuvāca yadā gṛhaṁ samuddīpya praviṣṭāhaṁ hutāśane tadātmānaṁ na jānāmi na paśyāmi hutāśanam
शबर की पत्नी ने कहा — "जब मैं घर को जलाकर अग्नि में प्रविष्ट हुई, तब न मैं स्वयं को जानती थी, न अग्नि को देखती थी।
श्लोक 54 (skanda.3.109.54)
न तापलेशोप्यासीन्मे प्रविष्टाया इवोदकम् ॥ सुषुप्तेव क्षणार्धेन प्रबुद्धास्मि पुनः क्षणात्
na tāpaleśopyāsīnme praviṣṭāyā ivodakam suṣupteva kṣaṇārdhena prabuddhāsmi punaḥ kṣaṇāt
"मुझे तनिक भी ताप का अनुभव नहीं हुआ, मानो जल में प्रविष्ट हुई हूँ; मानो आधे क्षण के लिए सोई हुई, फिर तुरन्त जाग गई।
श्लोक 55 (skanda.3.109.55)
तावद्भवनमद्राक्षमदग्धमिव सुस्थितम् ॥ अधुना देवपूजांते प्रसादं लब्धुमागता
tāvadbhavanamadrākṣamadagdhamiva susthitam adhunā devapūjāṁte prasādaṁ labdhumāgatā
"तब मैंने घर को बिना जले हुए के समान सुस्थित देखा; अब देवपूजा के अन्त में प्रसाद पाने आई हूँ।"
श्लोक 56 (skanda.3.109.56)
एवं परस्परं प्रेम्णा दंपत्योर्भाषमाणयोः ॥ प्रादुरासीत्तयोरग्रे विमानं दिव्यमद्भुतम्
evaṁ parasparaṁ premṇā daṁpatyorbhāṣamāṇayoḥ prādurāsīttayoragre vimānaṁ divyamadbhutam
इस प्रकार परस्पर प्रेमपूर्वक बातचीत करते हुए उन दम्पति के सामने एक दिव्य, अद्भुत विमान प्रकट हुआ।
श्लोक 57 (skanda.3.109.57)
तस्मिन्विमाने शतचन्द्रभास्वरे चत्वार ईशानुचराः पुरःसराः ॥ हस्ते गृहीत्वाथ निषाददंपती आरोपयामासुरमुक्तविग्रहौ
tasminvimāne śatacandrabhāsvare catvāra īśānucarāḥ puraḥsarāḥ haste gṛhītvātha niṣādadaṁpatī āropayāmāsuramuktavigrahau
सौ चन्द्रमाओं के समान प्रकाशमान उस विमान में, ईश के चार अनुचर आगे बढ़कर, उस निषाद-दम्पति को हाथ से पकड़कर, अक्षत शरीरवाले उन्हें उस पर बिठा दिया।
श्लोक 58 (skanda.3.109.58)
तयोर्निषाददंपत्योस्तत्क्षणादेव तद्वपुः ॥ शिवदूतकरस्पर्शात्तत्सारूप्यमवाप ह
tayorniṣādadaṁpatyostatkṣaṇādeva tadvapuḥ śivadūtakarasparśāttatsārūpyamavāpa ha
उस निषाद-दम्पति के शरीर उसी क्षण, शिवदूतों के हाथ के स्पर्श से, उनके ही सारूप्य को प्राप्त हो गए।
श्लोक 59 (skanda.3.109.59)
तस्माच्छ्रद्धैव सर्वेषु विधेया पुण्यकर्मसु ॥ नीचोपि शबरः प्राप श्रद्धया योगिनां गतिम्
tasmācchraddhaiva sarveṣu vidheyā puṇyakarmasu nīcopi śabaraḥ prāpa śraddhayā yogināṁ gatim
इसलिए समस्त पुण्यकर्मों में श्रद्धा ही रखनी चाहिए; नीच शबर भी श्रद्धा से योगियों की गति को प्राप्त हुआ।
श्लोक 60 (skanda.3.109.60)
किं जन्मना सकलवर्णजनोत्तमेन किं विद्यया सकलशास्त्रविचारवत्या ॥ यस्यास्ति चेतसि सदा परमेशभक्तिः कोऽन्यस्ततस्त्रिभुवने पुरुषोस्ति धन्यः
kiṁ janmanā sakalavarṇajanottamena kiṁ vidyayā sakalaśāstravicāravatyā yasyāsti cetasi sadā parameśabhaktiḥ ko'nyastatastribhuvane puruṣosti dhanyaḥ
समस्त वर्णों में श्रेष्ठ जन्म से क्या लाभ? समस्त शास्त्रों का विचार करनेवाली विद्या से क्या लाभ? जिसके चित्त में सदा परमेश की भक्ति है, उससे बढ़कर त्रिभुवन में और कौन धन्य पुरुष है?