ब्रह्म खण्ड · अध्याय 108
त्रिपुण्ड्र का माहात्म्य
श्लोक 1 (skanda.3.108.1)
॥ सूत उवाच ॥ शृणुध्वं मुनयः श्रेष्ठा वामदेवस्य भाषितम्
sūta uvāca śṛṇudhvaṁ munayaḥ śreṣṭhā vāmadevasya bhāṣitam
सूत जी ने कहा — हे श्रेष्ठ मुनियो! वामदेव के वचन सुनो।
श्लोक 2 (skanda.3.108.2)
वामदेव उवाच ॥ पुरा मंदरशैलेंद्रे नानाधातुविचित्रिते ॥ नानासत्वसमाकीर्णे नानाद्रुमलताकुले
vāmadeva uvāca purā maṁdaraśaileṁdre nānādhātuvicitrite nānāsatvasamākīrṇe nānādrumalatākule
वामदेव ने कहा — पूर्वकाल में मन्दराचल पर्वत पर, जो विविध धातुओं से विचित्र, विविध प्राणियों से भरा, विविध वृक्ष-लताओं से युक्त था,
श्लोक 3 (skanda.3.108.3)
कालाग्निरुद्रो भगवान्कदाचिद्विश्ववंदितः ॥ समाससाद भूतेशः स्वेच्छया परमेश्वरः
kālāgnirudro bhagavānkadācidviśvavaṁditaḥ samāsasāda bhūteśaḥ svecchayā parameśvaraḥ
भगवान कालाग्निरुद्र, विश्व द्वारा वन्दित, भूतेश परमेश्वर, एक बार अपनी इच्छा से वहाँ पधारे।
श्लोक 4 (skanda.3.108.4)
समंतात्समुपातिष्ठन्रुद्राणां शतकोटयः ॥ तेषां मध्ये समासीनो देवदेवस्त्रिलोचनः
samaṁtātsamupātiṣṭhanrudrāṇāṁ śatakoṭayaḥ teṣāṁ madhye samāsīno devadevastrilocanaḥ
सैकड़ों करोड़ों रुद्रगण चारों ओर उपस्थित हुए; उनके मध्य त्रिलोचन देवदेव बैठे।
श्लोक 5 (skanda.3.108.5)
तत्रागच्छत्सुरश्रष्ठो देवैः सह पुरंदरः ॥ तथाग्निर्वरुणो वायुर्यमो वैवस्वतस्तथा
tatrāgacchatsuraśraṣṭho devaiḥ saha puraṁdaraḥ tathāgnirvaruṇo vāyuryamo vaivasvatastathā
वहाँ देवश्रेष्ठ पुरन्दर देवताओं सहित आए; तथा अग्नि, वरुण, वायु और वैवस्वत यम भी,
श्लोक 6 (skanda.3.108.6)
गंधर्वाश्चित्रसेनाद्याः खेचराः पन्नगादयः ॥ विद्याधराः किंपुरुषाः सिद्धाः साध्याश्च गुह्यकाः
gaṁdharvāścitrasenādyāḥ khecarāḥ pannagādayaḥ vidyādharāḥ kiṁpuruṣāḥ siddhāḥ sādhyāśca guhyakāḥ
चित्रसेन आदि गन्धर्व, आकाशचारी नाग आदि, विद्याधर, किम्पुरुष, सिद्ध, साध्य और गुह्यक,
श्लोक 7 (skanda.3.108.7)
ब्रह्मर्षयो वसिष्ठाद्या नारदाद्याः सुरर्षयः ॥ पितरश्च महात्मानो दक्षाद्याश्च प्रजेश्वराः
brahmarṣayo vasiṣṭhādyā nāradādyāḥ surarṣayaḥ pitaraśca mahātmāno dakṣādyāśca prajeśvarāḥ
वसिष्ठ आदि ब्रह्मर्षि, नारद आदि देवर्षि, महात्मा पितर, और दक्ष आदि प्रजापति,
श्लोक 8 (skanda.3.108.8)
उर्वश्याद्याश्चाप्सरसश्चंडिकाद्याश्च मातरः ॥ आदित्या वसवो दस्रौ विश्वेदेवा महौजसः
urvaśyādyāścāpsarasaścaṁḍikādyāśca mātaraḥ ādityā vasavo dasrau viśvedevā mahaujasaḥ
उर्वशी आदि अप्सराएँ, चण्डिका आदि मातृगण, आदित्य, वसु, दोनों अश्विनीकुमार, महातेजस्वी विश्वेदेव।
श्लोक 9 (skanda.3.108.9)
अथान्ये भूतपतयो लोकसंहरणे क्षमाः ॥ महाकालश्च नंदी च तथा वै शंखपालकौ
athānye bhūtapatayo lokasaṁharaṇe kṣamāḥ mahākālaśca naṁdī ca tathā vai śaṁkhapālakau
फिर लोकों का संहार करने में समर्थ अन्य भूतपति — महाकाल और नन्दी, तथा शंखपालक और उनके साथी,
श्लोक 10 (skanda.3.108.10)
वीरभद्रो महातेजाः शंकुकर्णो महाबलः ॥ घंटाकर्णश्च दुर्धर्षो मणिभद्रो वृकोदरः
vīrabhadro mahātejāḥ śaṁkukarṇo mahābalaḥ ghaṁṭākarṇaśca durdharṣo maṇibhadro vṛkodaraḥ
महातेजस्वी वीरभद्र, महाबली शंकुकर्ण, दुर्धर्ष घण्टाकर्ण, मणिभद्र, वृकोदर,
श्लोक 11 (skanda.3.108.11)
कुंडोदरश्च विकटास्तथा कुभोदरो बली ॥ मंदोदरः कर्णधारः केतुर्भृंगीरिटिस्तथा
kuṁḍodaraśca vikaṭāstathā kubhodaro balī maṁdodaraḥ karṇadhāraḥ keturbhṛṁgīriṭistathā
कुण्डोदर, विकराल गण, बलवान कुभोदर, मन्दोदर, कर्णधार, केतु, तथा भृंगीरिटि भी,
श्लोक 12 (skanda.3.108.12)
भूतनाथास्तथान्ये च महाकाया महौजसः ॥ कृष्णवर्णास्तथा श्वेताः केचिन्मंडूकसप्रभाः
bhūtanāthāstathānye ca mahākāyā mahaujasaḥ kṛṣṇavarṇāstathā śvetāḥ kecinmaṁḍūkasaprabhāḥ
और अन्य महाकाय, महातेजस्वी भूतनाथ — कुछ काले रंगवाले, कुछ श्वेत, कुछ मेंढक के समान वर्णवाले,
श्लोक 13 (skanda.3.108.13)
हरिता धूसरा धूम्राः कर्बुरा पीतलोहिताः॥ चित्रवर्णा विचित्रांगाश्चित्रलीला मदोत्कटाः
haritā dhūsarā dhūmrāḥ karburā pītalohitāḥ citravarṇā vicitrāṁgāścitralīlā madotkaṭāḥ
हरे, धूसर, धूम्रवर्ण, चितकबरे, पीत-लाल, विचित्र वर्णवाले, विचित्र अंगोंवाले, विचित्र लीलावाले, मद से उन्मत्त,
श्लोक 14 (skanda.3.108.14)
नानायुधोद्यतकरा नानावाहनभूषणाः ॥ केचिद्व्याघ्रमुखाः केचित्सूकरास्या मृगा ननाः
nānāyudhodyatakarā nānāvāhanabhūṣaṇāḥ kecidvyāghramukhāḥ kecitsūkarāsyā mṛgā nanāḥ
विविध आयुध उठाए हाथोंवाले, विविध वाहन और आभूषणोंवाले, कुछ व्याघ्रमुखी, कुछ शूकरमुखी, कुछ मृगमुखी,
श्लोक 15 (skanda.3.108.15)
केचिच्च नक्रवदनाः सारमेयमुखाः परे ॥ सृगालवदनाश्चान्य उष्ट्राभवदनाः परे
kecicca nakravadanāḥ sārameyamukhāḥ pare sṛgālavadanāścānya uṣṭrābhavadanāḥ pare
कुछ मगरमुखी, अन्य कुत्तों के मुखवाले, कुछ सियार-मुखी, अन्य ऊँट-मुखी,
श्लोक 16 (skanda.3.108.16)
केचिच्छरभभेरुंडसिंहाश्वोष्ट्रबकाननाः ॥ एकवक्त्रा द्विवक्त्राश्च त्रिमुखाश्चैव निर्मुखाः
keciccharabhabheruṁḍasiṁhāśvoṣṭrabakānanāḥ ekavaktrā dvivaktrāśca trimukhāścaiva nirmukhāḥ
कुछ शरभ, भेरुण्ड, सिंह, अश्व, ऊँट, बगुले के मुखवाले; एकमुखी, द्विमुखी, त्रिमुखी और मुखरहित भी,
श्लोक 17 (skanda.3.108.17)
एकहस्तास्त्रिहस्ताश्च पंचहस्तास्त्वहस्तकाः ॥ अपादा बहुपादाश्च बहुकर्णैककर्णकाः
ekahastāstrihastāśca paṁcahastāstvahastakāḥ apādā bahupādāśca bahukarṇaikakarṇakāḥ
एकहाथी, त्रिहाथी, पंचहाथी, और हाथरहित भी; पादरहित और बहुपाद, बहुकर्ण और एककर्ण,
श्लोक 18 (skanda.3.108.18)
एकनेत्राश्चतुर्नेत्रा दीर्घाः केचन वामनाः ॥ समंतात्परिवार्येशं भूतनाथमुपासते
ekanetrāścaturnetrā dīrghāḥ kecana vāmanāḥ samaṁtātparivāryeśaṁ bhūtanāthamupāsate
एकनेत्र और चतुर्नेत्र, कुछ लम्बे, कुछ नाटे — ये सब चारों ओर से भूतनाथ को घेरकर उनकी उपासना करते थे।
श्लोक 19 (skanda.3.108.19)
अथागच्छन्महातेजा मुनीनां प्रवरः सुधीः ॥ सनत्कुमारो धर्मात्मा तं द्रष्टुं जगदीश्वरम्
athāgacchanmahātejā munīnāṁ pravaraḥ sudhīḥ sanatkumāro dharmātmā taṁ draṣṭuṁ jagadīśvaram
फिर धर्मात्मा, महातेजस्वी, मुनियों में श्रेष्ठ बुद्धिमान सनत्कुमार उस जगदीश्वर के दर्शन के लिए आए।
श्लोक 20 (skanda.3.108.20)
तं देवदेवं विश्वेशं सूर्यकोटिसमप्रभम् ॥ महाप्रलयसंक्षुब्धसप्तार्णवघनस्वनम्
taṁ devadevaṁ viśveśaṁ sūryakoṭisamaprabham mahāpralayasaṁkṣubdhasaptārṇavaghanasvanam
उन देवदेव विश्वेश को, करोड़ों सूर्यों के समान प्रभावाले, महाप्रलय में क्षुब्ध सप्तसागरों के समान गम्भीर गर्जनावाले,
श्लोक 21 (skanda.3.108.21)
संवर्त्ताग्निसमाटोपं जटामंडलशोभितम् ॥ अक्षीणभालनयनं ज्वालाम्लानमुखत्विषम्
saṁvarttāgnisamāṭopaṁ jaṭāmaṁḍalaśobhitam akṣīṇabhālanayanaṁ jvālāmlānamukhatviṣam
संवर्तक अग्नि के समान प्रचण्ड, जटाओं के मण्डल से सुशोभित, अक्षीण भाल-नेत्रवाले, ज्वाला से अम्लान मुखवाले,
श्लोक 22 (skanda.3.108.22)
प्रदीप्तचूडामणिना शशिखंडेन शोभितम् ॥ तक्षकं वामकर्णेन दक्षिणेन च वासुकिम्
pradīptacūḍāmaṇinā śaśikhaṁḍena śobhitam takṣakaṁ vāmakarṇena dakṣiṇena ca vāsukim
प्रदीप्त चूड़ामणि और चन्द्रकला से सुशोभित, बाएँ कान में तक्षक और दाएँ कान में वासुकि को धारण किए हुए,
श्लोक 23 (skanda.3.108.23)
बिभ्राणं कुंडलयुगं नीलरत्नमहाहनुम् ॥ नीलग्रीवं महाबाहुं नागहारविराजितम्
bibhrāṇaṁ kuṁḍalayugaṁ nīlaratnamahāhanum nīlagrīvaṁ mahābāhuṁ nāgahāravirājitam
दोनों कुण्डल धारण किए हुए, नीलरत्न-जैसी महान हनुवाले, नीलकण्ठ, महाबाहु, नागहार से सुशोभित,
श्लोक 24 (skanda.3.108.24)
फणिराजपरिभ्राजत्कंक णांगदमुद्रिकम् ॥ अनंतगुणसाहस्रमणिरंजितमेखलम्
phaṇirājaparibhrājatkaṁka ṇāṁgadamudrikam anaṁtaguṇasāhasramaṇiraṁjitamekhalam
फणिराज से चमकते कंकण, अंगद और अंगूठियोंवाले, अनन्त गुणोंवाले सहस्र मणियों से रंजित करधनीवाले,
श्लोक 25 (skanda.3.108.25)
व्याघ्रचर्मपरीधानं घंटादर्पणभूषितम् ॥ कर्कोटकमहापद्मधृतराष्ट्रधनंजयैः
vyāghracarmaparīdhānaṁ ghaṁṭādarpaṇabhūṣitam karkoṭakamahāpadmadhṛtarāṣṭradhanaṁjayaiḥ
व्याघ्रचर्म धारण किए हुए, घण्टा और दर्पण से विभूषित, कर्कोटक, महापद्म, धृतराष्ट्र और धनंजय द्वारा सेवित,
श्लोक 26 (skanda.3.108.26)
कूजन्नूपुरसंघुष्टपादपद्मविराजितम् ॥ प्रासतोमरखट्वाङ्गशूलटंकधनुर्धरम्
kūjannūpurasaṁghuṣṭapādapadmavirājitam prāsatomarakhaṭvāṅgaśūlaṭaṁkadhanurdharam
कूजते नूपुरों से गूँजते चरणकमलोंवाले, प्रास, तोमर, खट्वांग, शूल, टंक और धनुष धारण किए हुए,
श्लोक 27 (skanda.3.108.27)
अप्रधृष्यमनिर्देश्यमचिंत्याकारमीश्वरम् ॥ रत्नसिंहासनारूढं प्रण नाम महामुनिः
apradhṛṣyamanirdeśyamaciṁtyākāramīśvaram ratnasiṁhāsanārūḍhaṁ praṇa nāma mahāmuniḥ
अप्रधृष्य, अनिर्देश्य, अचिन्त्य आकारवाले, रत्नसिंहासन पर आरूढ़ ईश्वर को, उस महामुनि ने प्रणाम किया।
श्लोक 28 (skanda.3.108.28)
तं भक्तिभारोच्छ्वसितांतरात्मा संस्तूय वाग्भिः श्रुतिसंमिताभिः ॥ कृतांजलिः प्रश्रयनम्रकंधरः पप्रच्छ धर्मानखिलाञ्छु भप्रदान्
taṁ bhaktibhārocchvasitāṁtarātmā saṁstūya vāgbhiḥ śrutisaṁmitābhiḥ kṛtāṁjaliḥ praśrayanamrakaṁdharaḥ papraccha dharmānakhilāñchu bhapradān
भक्ति के भार से उमड़े हुए अन्तरात्मावाला वह, श्रुतिसम्मत वाणी से उनकी स्तुति करके, हाथ जोड़े, विनयपूर्वक झुकी गर्दनवाला, उनसे समस्त शुभदायक धर्मों के बारे में पूछने लगा।
श्लोक 29 (skanda.3.108.29)
यान्यानपृच्छत मुनिस्तांस्तान्धर्मानशेषतः ॥ प्रोवाच भगवान्रुद्रो भूयो मुनिरपृच्छत
yānyānapṛcchata munistāṁstāndharmānaśeṣataḥ provāca bhagavānrudro bhūyo munirapṛcchata
मुनि ने जो-जो धर्मों के बारे में पूछा, भगवान रुद्र ने उन सबको पूरी तरह से बताया; मुनि ने फिर पूछा।
श्लोक 30 (skanda.3.108.30)
सनत्कुमार उवाच ॥ श्रुतास्ते भगवन्धर्मास्त्वन्मुखान्मुक्तिहेतवः ॥ यैर्मुक्तपापा मनुजास्तरिष्यंति भवार्णवम्
sanatkumāra uvāca śrutāste bhagavandharmāstvanmukhānmuktihetavaḥ yairmuktapāpā manujāstariṣyaṁti bhavārṇavam
सनत्कुमार ने कहा — "हे भगवन्! आपके मुख से ये मुक्तिदायक धर्म सुने गए, जिनसे पापमुक्त मनुष्य भवसागर को पार कर लेंगे।
श्लोक 31 (skanda.3.108.31)
अथापरं विभो धर्ममल्पायासं महाफलम् ॥ ब्रूहि कारुण्यतो मह्यं सद्यो मुक्तिप्रदं नृणाम्
athāparaṁ vibho dharmamalpāyāsaṁ mahāphalam brūhi kāruṇyato mahyaṁ sadyo muktipradaṁ nṛṇām
"अब हे विभो! एक और धर्म, जो अल्प प्रयास से महाफल देनेवाला हो, मुझे करुणापूर्वक बताइए, जो मनुष्यों को तत्काल मुक्ति देनेवाला हो।
श्लोक 32 (skanda.3.108.32)
अभ्यासबहुला धर्माः शास्त्रदृष्टाः सहस्रशः ॥ सम्यक्संसेविताः कालात्सिद्धिं यच्छंति वा न वा
abhyāsabahulā dharmāḥ śāstradṛṣṭāḥ sahasraśaḥ samyaksaṁsevitāḥ kālātsiddhiṁ yacchaṁti vā na vā
"शास्त्रों में देखे गए सहस्रों धर्म बहुत अभ्यास चाहनेवाले हैं; भलीभाँति सेवित होने पर भी वे काल से सिद्धि देते हैं या नहीं, यह अनिश्चित है।
श्लोक 33 (skanda.3.108.33)
अतो लोकहितं गुह्यं भुक्तिमुक्त्योश्च साधनम् ॥ धर्मं विज्ञातुमिच्छामि त्वत्प्रसादान्महेश्वर
ato lokahitaṁ guhyaṁ bhuktimuktyośca sādhanam dharmaṁ vijñātumicchāmi tvatprasādānmaheśvara
"इसलिए मैं लोकहितकारी, गुह्य, भुक्ति और मुक्ति दोनों का साधन धर्म जानना चाहता हूँ, आपकी कृपा से, हे महेश्वर!"
श्लोक 34 (skanda.3.108.34)
श्रीरुद्र उवाच ॥ सर्वेषामपि धर्माणामुत्तमं श्रुतिचोदितम् ॥ रहस्यं सर्वजंतूनां यत्त्रिपुंड्रस्य धारणम्
śrīrudra uvāca sarveṣāmapi dharmāṇāmuttamaṁ śruticoditam rahasyaṁ sarvajaṁtūnāṁ yattripuṁḍrasya dhāraṇam
श्रीरुद्र ने कहा — "समस्त धर्मों में उत्तम, श्रुति द्वारा कहा गया, समस्त प्राणियों का रहस्य, त्रिपुण्ड्र धारण ही है।"
श्लोक 35 (skanda.3.108.35)
सनत्कुमार उवाच॥ त्रिपुंड्रस्य विधिं ब्रूहि भगवञ्जगतां पते ॥ तत्त्वतो ज्ञातुमिच्छामि त्वत्प्रसादान्महेश्वर
sanatkumāra uvāca tripuṁḍrasya vidhiṁ brūhi bhagavañjagatāṁ pate tattvato jñātumicchāmi tvatprasādānmaheśvara
सनत्कुमार ने कहा — "त्रिपुण्ड्र की विधि बताइए, हे भगवन्, जगत के स्वामी! मैं इसे सच-सच जानना चाहता हूँ, आपकी कृपा से, हे महेश्वर!
श्लोक 36 (skanda.3.108.36)
कति स्थानानि किं द्रव्यं का शक्तिः का च देवता ॥ किं प्रमाणं च कः कर्त्ता के मंत्रास्तस्य किं फलम्
kati sthānāni kiṁ dravyaṁ kā śaktiḥ kā ca devatā kiṁ pramāṇaṁ ca kaḥ karttā ke maṁtrāstasya kiṁ phalam
"कितने स्थान हैं? क्या द्रव्य है? क्या शक्ति है, और कौन-सी देवता है? क्या प्रमाण है, कौन कर्ता है, कौन-से मन्त्र हैं, और इसका क्या फल है?
श्लोक 37 (skanda.3.108.37)
एतत्सर्वमशेषेण त्रिपुंड्रस्य च लक्षणम् ॥ ब्रूहि मे जगतां नाथ लोकानुग्रहकाम्यया
etatsarvamaśeṣeṇa tripuṁḍrasya ca lakṣaṇam brūhi me jagatāṁ nātha lokānugrahakāmyayā
"यह सब कुछ, त्रिपुण्ड्र के सम्पूर्ण लक्षणों सहित, मुझे बताइए, हे जगत के नाथ! लोकों पर अनुग्रह करने की इच्छा से।"
श्लोक 38 (skanda.3.108.38)
श्रीरुद्र उवाच ॥ आग्नेयमुच्यते भस्म दग्धगोमयसंभवम् ॥ तदेव द्रव्यमित्युक्तं त्रिपुंड्रस्य महामुने
śrīrudra uvāca āgneyamucyate bhasma dagdhagomayasaṁbhavam tadeva dravyamityuktaṁ tripuṁḍrasya mahāmune
श्रीरुद्र ने कहा — "गोबर को जलाकर बनी भस्म को आग्नेय कहा जाता है; वही त्रिपुण्ड्र का द्रव्य कहा गया है, हे महामुने!
श्लोक 39 (skanda.3.108.39)
सद्योजातादिभिर्ब्रह्ममयैर्मंत्रैश्च पंचभिः॥ परिगृह्याग्निरित्यादिमंत्रैर्भस्माभिमंत्रयेत्
sadyojātādibhirbrahmamayairmaṁtraiśca paṁcabhiḥ parigṛhyāgnirityādimaṁtrairbhasmābhimaṁtrayet
"सद्योजात आदि पाँच ब्रह्ममन्त्रों से उसे ग्रहण करके, 'अग्निरिति' आदि मन्त्रों से भस्म को अभिमन्त्रित करना चाहिए।
श्लोक 40 (skanda.3.108.40)
मानस्तोकेति संमृंज्य शिरो लिंपेच्च त्र्यंबकम् ॥ त्रियायुषादिभिर्मंत्रैर्ललाटे च भुजद्वये ॥ स्कंधे च लेपयेद्भस्म सजलं मंत्रभावितम्
mānastoketi saṁmṛṁjya śiro liṁpecca tryaṁbakam triyāyuṣādibhirmaṁtrairlalāṭe ca bhujadvaye skaṁdhe ca lepayedbhasma sajalaṁ maṁtrabhāvitam
"'मानस्तोके' मन्त्र से पोंछकर 'त्र्यम्बकम्' से सिर लीपना चाहिए; 'त्रियायुष' आदि मन्त्रों से ललाट, दोनों भुजाओं और कन्धे पर जल मिली, मन्त्रभावित भस्म लगानी चाहिए।
श्लोक 41 (skanda.3.108.41)
तिस्रो रेखा भवंत्येषु स्थानेषु मुनिपुंगव ॥ भ्रुवोर्मध्यं समारभ्य यावदंतो भ्रुवोर्भवेत्
tisro rekhā bhavaṁtyeṣu sthāneṣu munipuṁgava bhruvormadhyaṁ samārabhya yāvadaṁto bhruvorbhavet
"इन स्थानों पर तीन रेखाएँ होती हैं, हे मुनिश्रेष्ठ, भौंहों के मध्य से आरम्भ करके भौंहों के अन्त तक।
श्लोक 42 (skanda.3.108.42)
मध्यमानामिकांगुल्योर्मध्ये तु प्रतिलोमतः ॥ अंगुष्ठेन कृता रेखा त्रिपुंड्रस्याभिधीयते
madhyamānāmikāṁgulyormadhye tu pratilomataḥ aṁguṣṭhena kṛtā rekhā tripuṁḍrasyābhidhīyate
"मध्यमा और अनामिका अंगुलियों के मध्य में, उलटी दिशा से, अंगूठे द्वारा खींची गई रेखा त्रिपुण्ड्र कहलाती है।
श्लोक 43 (skanda.3.108.43)
तिसृणामपि रेखाणां प्रत्येकं नव देवताः ॥ अकारो गार्हपत्यश्च ऋग्भूर्लोको रजस्तथा
tisṛṇāmapi rekhāṇāṁ pratyekaṁ nava devatāḥ akāro gārhapatyaśca ṛgbhūrloko rajastathā
"तीनों रेखाओं में से प्रत्येक की नौ-नौ देवताएँ हैं — अकार, गार्हपत्य अग्नि, ऋग्वेद, भूर्लोक, रजोगुण,
श्लोक 44 (skanda.3.108.44)
आत्मा चैव क्रियाशक्तिः प्रातः सवनमेव च ॥ महादेवस्तु रेखायाः प्रथमायास्तु देवता
ātmā caiva kriyāśaktiḥ prātaḥ savanameva ca mahādevastu rekhāyāḥ prathamāyāstu devatā
"आत्मा, क्रियाशक्ति, और प्रातः सवन — महादेव पहली रेखा के देवता हैं।
श्लोक 45 (skanda.3.108.45)
उकारो दक्षिणाग्निश्च नभः सत्त्वं यजुस्तथा ॥ मध्यंदिनं च सवनमिच्छाशक्त्यंतरात्मकौ
ukāro dakṣiṇāgniśca nabhaḥ sattvaṁ yajustathā madhyaṁdinaṁ ca savanamicchāśaktyaṁtarātmakau
"उकार, दक्षिणाग्नि, अन्तरिक्ष, सत्त्वगुण, यजुर्वेद, मध्याह्न सवन, और इच्छाशक्ति-अन्तरात्मा —
श्लोक 46 (skanda.3.108.46)
महेश्वरश्च रेखाया द्वितीयायाश्च देवता ॥ मकाराहवनीयौ च परमात्मा तमो दिवः
maheśvaraśca rekhāyā dvitīyāyāśca devatā makārāhavanīyau ca paramātmā tamo divaḥ
"महेश्वर दूसरी रेखा के देवता हैं। मकार, दोनों आहवनीय अग्नि, परमात्मा, तमोगुण, स्वर्गलोक,
श्लोक 47 (skanda.3.108.47)
ज्ञानशक्तिः सामवेदस्तृतीयसवनं तथा ॥ शिवश्चेति तृतीयाया रेखायाश्चाधिदेवता
jñānaśaktiḥ sāmavedastṛtīyasavanaṁ tathā śivaśceti tṛtīyāyā rekhāyāścādhidevatā
"ज्ञानशक्ति, सामवेद, और तृतीय सवन — शिव तीसरी रेखा के अधिदेवता हैं।
श्लोक 48 (skanda.3.108.48)
एता नित्यं नमस्कृत्य त्रिपुंड्रं धारयेत्सुधीः ॥ महेश्वरव्रतमिदं सर्ववेदेषु कीर्तितम्
etā nityaṁ namaskṛtya tripuṁḍraṁ dhārayetsudhīḥ maheśvaravratamidaṁ sarvavedeṣu kīrtitam
"इन्हें नित्य नमस्कार करके बुद्धिमान को त्रिपुण्ड्र धारण करना चाहिए; यह महेश्वर-व्रत समस्त वेदों में कीर्तित है।
श्लोक 49 (skanda.3.108.49)
मुक्तिकामैर्नरैः सेव्यं पुनस्तेषां न संभवः ॥ त्रिपुंड्रं कुरुते यस्तु भस्मना विधिपूर्वकम्
muktikāmairnaraiḥ sevyaṁ punasteṣāṁ na saṁbhavaḥ tripuṁḍraṁ kurute yastu bhasmanā vidhipūrvakam
"मुक्ति चाहनेवाले मनुष्यों को इसका सेवन करना चाहिए; उनका पुनर्जन्म नहीं होता। जो कोई विधिपूर्वक भस्म से त्रिपुण्ड्र करता है,
श्लोक 50 (skanda.3.108.50)
ब्रह्मचारी गृहस्थो वा वनस्थो यतिरेव वा॥ महापातकसंघातैर्मुच्यते चोपपातकैः
brahmacārī gṛhastho vā vanastho yatireva vā mahāpātakasaṁghātairmucyate copapātakaiḥ
"चाहे ब्रह्मचारी हो, गृहस्थ हो, वानप्रस्थ हो, या संन्यासी ही हो, वह महापातकों के समूह और उपपातकों से मुक्त हो जाता है,
श्लोक 51 (skanda.3.108.51)
तथान्यैः क्षत्रविट्शूद्रस्त्रीगोहत्या दिपातकैः॥ वीरहत्याश्वहत्याभ्यां मुच्यते नात्र संशयः
tathānyaiḥ kṣatraviṭśūdrastrīgohatyā dipātakaiḥ vīrahatyāśvahatyābhyāṁ mucyate nātra saṁśayaḥ
"तथा क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, स्त्री और गोहत्या आदि अन्य पातकों से भी; वीरहत्या और अश्वहत्या से भी वह मुक्त हो जाता है, इसमें कोई सन्देह नहीं है।
श्लोक 52 (skanda.3.108.52)
अमंत्रेणापि यः कुर्यादज्ञात्वा महिमोन्नतिम्॥ त्रिपुंड्रं भालपटले मुच्यते सर्वपातकैः
amaṁtreṇāpi yaḥ kuryādajñātvā mahimonnatim tripuṁḍraṁ bhālapaṭale mucyate sarvapātakaiḥ
"जो बिना मन्त्र के भी, इसकी महिमा की उन्नति को न जानते हुए भी, ललाट पर त्रिपुण्ड्र करता है, वह समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 53 (skanda.3.108.53)
परद्रव्यापहरणं परदाराभिमर्शनम्॥ परनिंदा परक्षेत्रहरणं परपीडनम्
paradravyāpaharaṇaṁ paradārābhimarśanam paraniṁdā parakṣetraharaṇaṁ parapīḍanam
"दूसरे के धन का अपहरण, दूसरे की स्त्री का स्पर्श, दूसरे की निन्दा, दूसरे के खेत का हरण, दूसरे को पीड़ा देना,
श्लोक 54 (skanda.3.108.54)
सस्यारामादिहरणं गृहदाहादिकर्म च ॥ असत्यवादं पैशुन्यं पारुष्यं वेदविक्र यः॥ कूटसाक्ष्यं व्रतत्यागः कैतवं नीचसेवनम्
sasyārāmādiharaṇaṁ gṛhadāhādikarma ca asatyavādaṁ paiśunyaṁ pāruṣyaṁ vedavikra yaḥ kūṭasākṣyaṁ vratatyāgaḥ kaitavaṁ nīcasevanam
"फसल-बगीचे आदि का हरण, घर जलाना आदि कर्म, असत्य भाषण, चुगली, कठोर वचन, वेद बेचना,
श्लोक 55 (skanda.3.108.55)
गोभूहिरण्यमहिषी तिलकंबलवाससाम्॥ अन्नधान्यजलादीनां नीचेभ्यश्च परिग्रहः
gobhūhiraṇyamahiṣī tilakaṁbalavāsasām annadhānyajalādīnāṁ nīcebhyaśca parigrahaḥ
"झूठी साक्षी, व्रत का त्याग, धोखा, नीचों की सेवा, नीचों से गौ, भूमि, स्वर्ण, महिषी, तिल, कम्बल, वस्त्र,
श्लोक 56 (skanda.3.108.56)
दासी वेश्याभुजंगेषु वृषलीषु नटीषु च ॥ रजस्वलासु कन्यासु विधवासु च संगमः
dāsī veśyābhujaṁgeṣu vṛṣalīṣu naṭīṣu ca rajasvalāsu kanyāsu vidhavāsu ca saṁgamaḥ
"अन्न, धान्य, जल आदि लेना, दासी, वेश्या, नागिन, वृषली, नर्तकी में,
श्लोक 57 (skanda.3.108.57)
मांसचर्मरसादीनां लवणस्य च विक्रयः ॥ एवमादीन्य संख्यानि पापानि विविधानि च
māṁsacarmarasādīnāṁ lavaṇasya ca vikrayaḥ evamādīnya saṁkhyāni pāpāni vividhāni ca
"रजस्वला, कन्या और विधवा में संगम, मांस-चर्म-रस आदि का विक्रय, और नमक का विक्रय —
श्लोक 58 (skanda.3.108.58)
सद्य एव विनश्यंति त्रिपुंड्रस्य च धारणात् ॥ शिवद्रव्यापहरणं शिवनिंदा च कुत्रचित्
sadya eva vinaśyaṁti tripuṁḍrasya ca dhāraṇāt śivadravyāpaharaṇaṁ śivaniṁdā ca kutracit
"इस प्रकार असंख्य और विविध पाप, त्रिपुण्ड्र धारण से तत्काल ही नष्ट हो जाते हैं — शिवद्रव्य के अपहरण और कहीं भी शिव की निन्दा को छोड़कर,
श्लोक 59 (skanda.3.108.59)
निंदा च शिवभक्तानां प्रायश्चितैर्न शुद्ध्यति ॥ रुद्राक्षा यस्य गात्रेषु ललाटे च त्रिपुंड्रकम्
niṁdā ca śivabhaktānāṁ prāyaścitairna śuddhyati rudrākṣā yasya gātreṣu lalāṭe ca tripuṁḍrakam
"तथा शिवभक्तों की निन्दा को छोड़कर, जो प्रायश्चित्तों से भी शुद्ध नहीं होती। जिसके अंगों पर रुद्राक्ष हों और ललाट पर त्रिपुण्ड्र,
श्लोक 60 (skanda.3.108.60)
स चांडालोऽपि संपूज्यः सर्ववर्णोत्तमो भवेत् ॥ यानि तीर्थानि लोकेऽस्मिन्गंगायाः सरितश्च याः
sa cāṁḍālo'pi saṁpūjyaḥ sarvavarṇottamo bhavet yāni tīrthāni loke'smingaṁgāyāḥ saritaśca yāḥ
"वह चाण्डाल भी पूजनीय है, सभी वर्णों में श्रेष्ठ बन जाता है। इस लोक में जो भी तीर्थ हैं, गंगा की जो भी सरिताएँ हैं,
श्लोक 61 (skanda.3.108.61)
स्नातो भवति सर्वत्र ललाटे यस्त्रिपुंड्रधृक् ॥ सप्तकोटिमहामंत्राः पंचाक्षरपुरःसराः
snāto bhavati sarvatra lalāṭe yastripuṁḍradhṛk saptakoṭimahāmaṁtrāḥ paṁcākṣarapuraḥsarāḥ
"उन सभी में स्नान किया हुआ हो जाता है वह, जो ललाट पर त्रिपुण्ड्र धारण करता है। सात करोड़ महामन्त्र, पंचाक्षर के अग्रणी,
श्लोक 62 (skanda.3.108.62)
तथान्ये कोटिशो मंत्राः शैवाः कैवल्यहेतवः ॥ ते सर्वे येन जप्ताः स्युर्यो बिभर्ति त्रिपुंड्रकम्
tathānye koṭiśo maṁtrāḥ śaivāḥ kaivalyahetavaḥ te sarve yena japtāḥ syuryo bibharti tripuṁḍrakam
"तथा अन्य करोड़ों शैव मन्त्र, कैवल्य के कारण — वे सब उसी के द्वारा जपे हुए मानो जाते हैं, जो त्रिपुण्ड्र धारण करता है।
श्लोक 63 (skanda.3.108.63)
सहस्रं पूर्वजातानां सहस्रं च जनिष्यताम् ॥ स्ववंशजानां मर्त्यानामुद्धरेद्यस्त्रिपुंड्रधृक्
sahasraṁ pūrvajātānāṁ sahasraṁ ca janiṣyatām svavaṁśajānāṁ martyānāmuddharedyastripuṁḍradhṛk
"त्रिपुण्ड्रधारी अपने वंश के पहले उत्पन्न हुए सहस्र पूर्वजों का, और आगे उत्पन्न होनेवाले सहस्र मनुष्यों का उद्धार करता है।
श्लोक 64 (skanda.3.108.64)
इह भुक्त्वाखिलान्भोगान्दीर्घायुर्व्याधिवर्जितः ॥ जीवितांते च मरणं सुखनैवं प्रपद्यते
iha bhuktvākhilānbhogāndīrghāyurvyādhivarjitaḥ jīvitāṁte ca maraṇaṁ sukhanaivaṁ prapadyate
"यहाँ समस्त भोगों को भोगकर, दीर्घायु, व्याधिरहित होकर, जीवन के अन्त में सुखमय मृत्यु को ही प्राप्त होता है।
श्लोक 65 (skanda.3.108.65)
अष्टैश्वर्यगुणोपेतं प्राप्य दिव्यं वपुः शुभम् ॥ दिव्यं विमानमारुह्य दिव्यस्त्रीशतसेवितः
aṣṭaiśvaryaguṇopetaṁ prāpya divyaṁ vapuḥ śubham divyaṁ vimānamāruhya divyastrīśatasevitaḥ
"अष्टैश्वर्य गुणों से युक्त, दिव्य और शुभ शरीर प्राप्त करके, दिव्य विमान पर चढ़कर, सैकड़ों दिव्य स्त्रियों द्वारा सेवित होकर,
श्लोक 66 (skanda.3.108.66)
विद्याधराणां सिद्धानां गंधर्वाणां महौजसाम् ॥ इंद्रादिलोकपालानां लोकेषु च यथाक्रमम्
vidyādharāṇāṁ siddhānāṁ gaṁdharvāṇāṁ mahaujasām iṁdrādilokapālānāṁ lokeṣu ca yathākramam
"विद्याधरों, सिद्धों, महातेजस्वी गन्धर्वों, इन्द्र आदि लोकपालों के लोकों में क्रमशः,
श्लोक 67 (skanda.3.108.67)
भुक्त्वा भोगान्सुविपुलान्प्रजेशानां पुरेषु च ॥ ब्रह्मणः पदमासाद्य तत्र कल्पशतं रमेत्
bhuktvā bhogānsuvipulānprajeśānāṁ pureṣu ca brahmaṇaḥ padamāsādya tatra kalpaśataṁ ramet
"प्रजापतियों की नगरियों में अत्यन्त विपुल भोगों को भोगकर, ब्रह्मा के पद को प्राप्त करके, वहाँ सौ कल्पों तक रमण करता है।
श्लोक 68 (skanda.3.108.68)
विष्णोर्लोके च रमते यावद्ब्रह्मशतत्रयम्
viṣṇorloke ca ramate yāvadbrahmaśatatrayam
"विष्णु के लोक में तीन सौ ब्रह्म-कल्पों तक रमण करता है।
श्लोक 69 (skanda.3.108.69)
शिवलोकं ततः प्राप्य रमते कालमक्षयम् ॥ शिवसायुज्यमाप्नोति न स भूयोऽभिजायते
śivalokaṁ tataḥ prāpya ramate kālamakṣayam śivasāyujyamāpnoti na sa bhūyo'bhijāyate
"फिर शिवलोक को प्राप्त करके अक्षय काल तक रमण करता है; शिव-सायुज्य को प्राप्त करता है, वह फिर जन्म नहीं लेता।
श्लोक 70 (skanda.3.108.70)
सर्वोपनिषदां सारं समालोच्य मुहुर्मुहुः ॥ इदमेव हि निर्णीतं परं श्रेयस्त्रिपुंड्रकम्
sarvopaniṣadāṁ sāraṁ samālocya muhurmuhuḥ idameva hi nirṇītaṁ paraṁ śreyastripuṁḍrakam
"समस्त उपनिषदों के सार को बार-बार विचार करके यही निर्णीत किया गया है कि त्रिपुण्ड्र ही परम श्रेय है।
श्लोक 71 (skanda.3.108.71)
एतत्त्रिपुंड्रमाहात्म्यं समासात्कथितं मया ॥ रहस्यं सर्वभूतानां गोपनीयमिदं त्वया
etattripuṁḍramāhātmyaṁ samāsātkathitaṁ mayā rahasyaṁ sarvabhūtānāṁ gopanīyamidaṁ tvayā
"यह त्रिपुण्ड्र का माहात्म्य मैंने संक्षेप में कहा है; यह समस्त प्राणियों का रहस्य है, इसे तुम्हें गोपनीय रखना चाहिए।"
श्लोक 72 (skanda.3.108.72)
इत्युक्त्वा भगवान्रुद्रस्तत्रैवांतरधीयत ॥ सनत्कुमारोऽपि मुनिर्जगाम ब्रह्मणः पदम्
ityuktvā bhagavānrudrastatraivāṁtaradhīyata sanatkumāro'pi munirjagāma brahmaṇaḥ padam
यह कहकर भगवान रुद्र वहीं अन्तर्धान हो गए; मुनि सनत्कुमार भी ब्रह्मा के पद को चले गए।
श्लोक 73 (skanda.3.108.73)
तवापि भस्मसंपर्कात्संजाता विमला मतिः ॥ त्वमपि श्रद्धया पुण्यं धारयस्व त्रिपुंड्रकम्
tavāpi bhasmasaṁparkātsaṁjātā vimalā matiḥ tvamapi śraddhayā puṇyaṁ dhārayasva tripuṁḍrakam
भस्म के संसर्ग से तुम्हारी भी निर्मल बुद्धि उत्पन्न हुई है; तुम भी श्रद्धापूर्वक इस पवित्र त्रिपुण्ड्र को धारण करो।"
श्लोक 74 (skanda.3.108.74)
सूत उवाच ॥ इत्युक्त्वा वामदेवस्तु शिवयोगी महातपाः ॥ अभिमंत्र्य ददौ भस्म घोराय ब्रह्मरक्षसे
sūta uvāca ityuktvā vāmadevastu śivayogī mahātapāḥ abhimaṁtrya dadau bhasma ghorāya brahmarakṣase
सूत जी ने कहा — यह कहकर महातपस्वी शिवयोगी वामदेव ने भस्म को अभिमन्त्रित करके उस भयंकर ब्रह्मराक्षस को दे दिया।
श्लोक 75 (skanda.3.108.75)
तेनासौ भालपटले चक्रे तिर्य क्त्रिपुंड्रकम् ॥ ब्रह्मराक्षसतां सद्यो जहौ तस्यानुभावतः
tenāsau bhālapaṭale cakre tirya ktripuṁḍrakam brahmarākṣasatāṁ sadyo jahau tasyānubhāvataḥ
उससे उसने अपने ललाट-प्रदेश पर आड़ा त्रिपुण्ड्र बनाया; तत्काल ही उसके प्रभाव से उसने ब्रह्मराक्षसत्व को त्याग दिया।
श्लोक 76 (skanda.3.108.76)
स बभौ सूर्यसंकाशस्तेजोमण्डलमंडितः ॥ दिव्यावयरूपैश्च दिव्यमाल्यांबरो ज्ज्वलः
sa babhau sūryasaṁkāśastejomaṇḍalamaṁḍitaḥ divyāvayarūpaiśca divyamālyāṁbaro jjvalaḥ
वह सूर्य के समान चमक उठा, तेजोमण्डल से सुशोभित, दिव्य अंगों और रूपवाला, दिव्य माला-वस्त्रों से उज्ज्वल।
श्लोक 77 (skanda.3.108.77)
भक्त्या प्रदक्षिणीकृत्य तं गुरुं शिवयोगिनम् ॥ दिव्यं विमानमारुह्य पुण्यलोकाञ्जगाम सः
bhaktyā pradakṣiṇīkṛtya taṁ guruṁ śivayoginam divyaṁ vimānamāruhya puṇyalokāñjagāma saḥ
भक्तिपूर्वक उस गुरु शिवयोगी की प्रदक्षिणा करके, दिव्य विमान पर चढ़कर, वह पुण्यलोकों को चला गया।
श्लोक 78 (skanda.3.108.78)
वामदेवो महायोगी दत्त्वा तस्मै परां गतिम् ॥ चचार लोके मूढात्मा साक्षादिव शिवः स्वयम्
vāmadevo mahāyogī dattvā tasmai parāṁ gatim cacāra loke mūḍhātmā sākṣādiva śivaḥ svayam
महायोगी वामदेव, उसे परम गति देकर, वह मूढ़ात्मा साक्षात् शिव के समान ही संसार में विचरण करने लगा।
श्लोक 79 (skanda.3.108.79)
य एतद्भस्ममाहात्म्यं त्रिपुंड्रं शृणुयान्नरः ॥ श्रावयेद्वा पठेद्वापि स हि याति परां गतिम्
ya etadbhasmamāhātmyaṁ tripuṁḍraṁ śṛṇuyānnaraḥ śrāvayedvā paṭhedvāpi sa hi yāti parāṁ gatim
जो मनुष्य इस भस्म-माहात्म्य और त्रिपुण्ड्र को सुनता है, अथवा सुनाता है, अथवा स्वयं पढ़ता है, वह निश्चय ही परम गति को प्राप्त होता है।
श्लोक 80 (skanda.3.108.80)
कथयति शिवकीर्तिं संसृतेर्मुक्तिहेतुं प्रणमति शिवयोगिध्येयमीशांघ्रिपद्मम् ॥ रचयति शिवभक्तोद्भासि भाले त्रिपुंड्रं न पुनरिह जनन्या गर्भवासं भजेत्सः
kathayati śivakīrtiṁ saṁsṛtermuktihetuṁ praṇamati śivayogidhyeyamīśāṁghripadmam racayati śivabhaktodbhāsi bhāle tripuṁḍraṁ na punariha jananyā garbhavāsaṁ bhajetsaḥ
जो शिव की कीर्ति कहता है, जो संसार से मुक्ति का कारण है, जो शिवयोगियों द्वारा ध्यान किए जानेवाले ईश के चरणकमलों को प्रणाम करता है, जो अपने ललाट पर शिवभक्ति से चमकता त्रिपुण्ड्र बनाता है — वह इस संसार में पुनः माता के गर्भवास को कभी प्राप्त नहीं होता।