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ब्रह्म खण्ड · अध्याय 107

भस्म का माहात्म्य

अध्याय 106अध्याय-सूचीअध्याय 108

श्लोक 1 (skanda.3.107.1)

॥ सूत उवाच ॥ ऋषभस्यानुभावोयं वर्णितः शिवयोगिनः ॥ अथान्यस्यापि वक्ष्यामि प्रभावं शिवयोगिनः

sūta uvāca ṛṣabhasyānubhāvoyaṁ varṇitaḥ śivayoginaḥ athānyasyāpi vakṣyāmi prabhāvaṁ śivayoginaḥ

सूत जी ने कहा — यह ऋषभ शिवयोगी का प्रभाव वर्णित किया गया; अब मैं एक अन्य शिवयोगी का भी प्रभाव कहूँगा।

श्लोक 2 (skanda.3.107.2)

भस्मनश्चापि माहात्म्यं वर्णयामि समासतः ॥ कृतकृत्या भविष्यंति यच्छुत्वा पापिनो जनाः

bhasmanaścāpi māhātmyaṁ varṇayāmi samāsataḥ kṛtakṛtyā bhaviṣyaṁti yacchutvā pāpino janāḥ

और भस्म का माहात्म्य भी संक्षेप में वर्णन करूँगा, जिसे सुनकर पापी मनुष्य भी कृतकृत्य हो जाएँगे।

श्लोक 3 (skanda.3.107.3)

अस्त्येको वामदेवाख्यः शिवयोगी महा तपाः ॥ निर्द्वंद्वो निर्गुणः शांतो निःसंगः समदर्शनः

astyeko vāmadevākhyaḥ śivayogī mahā tapāḥ nirdvaṁdvo nirguṇaḥ śāṁto niḥsaṁgaḥ samadarśanaḥ

वामदेव नाम का एक महातपस्वी शिवयोगी है — निर्द्वंद्व, निर्गुण, शान्त, निःसंग, समदर्शी।

श्लोक 4 (skanda.3.107.4)

आत्मारामो जितक्रोधो गृहदारविवर्जितः ॥ अतर्कितगतिर्मौनी संतुष्टो निष्प रिग्रहः

ātmārāmo jitakrodho gṛhadāravivarjitaḥ atarkitagatirmaunī saṁtuṣṭo niṣpa rigrahaḥ

आत्माराम, क्रोध-विजयी, घर-पत्नी से रहित, अतर्कित गतिवाला, मौनी, संतुष्ट, निष्परिग्रह,

श्लोक 5 (skanda.3.107.5)

भस्मोद्धूलितसर्वांगो जटामंडलमंडितः ॥ वल्कलाजिनसंवीतो भिक्षामात्रपरिग्रहः

bhasmoddhūlitasarvāṁgo jaṭāmaṁḍalamaṁḍitaḥ valkalājinasaṁvīto bhikṣāmātraparigrahaḥ

सम्पूर्ण अंगों पर भस्म लगाए हुए, जटाओं के मण्डल से सुशोभित, वल्कल और मृगचर्म धारण किए हुए, केवल भिक्षा ग्रहण करनेवाला।

श्लोक 6 (skanda.3.107.6)

स एकदा चरंल्लोके सर्वानुग्रहतत्परः ॥ क्रौंचारण्यं महाघोरं प्रविवेश यदृच्छया

sa ekadā caraṁlloke sarvānugrahatatparaḥ krauṁcāraṇyaṁ mahāghoraṁ praviveśa yadṛcchayā

वह एक बार, समस्त प्राणियों पर अनुग्रह करने में तत्पर, संसार में विचरण करते हुए, अनायास ही महाभयंकर क्रौंच वन में प्रविष्ट हुआ।

श्लोक 7 (skanda.3.107.7)

तस्मिन्निर्मनुजेऽरण्ये तिष्ठत्येकोऽतिभीषणः ॥ क्षुत्तृषाकुलितो नित्यं यः कश्चिद्ब्रह्मराक्षसः

tasminnirmanuje'raṇye tiṣṭhatyeko'tibhīṣaṇaḥ kṣuttṛṣākulito nityaṁ yaḥ kaścidbrahmarākṣasaḥ

उस मनुष्यरहित वन में, अत्यन्त भयंकर, निरन्तर भूख-प्यास से व्याकुल, कोई एक ब्रह्मराक्षस अकेला रहता था।

श्लोक 8 (skanda.3.107.8)

तं प्रविष्टं शिवात्मानं स दृष्ट्वा ब्रह्मराक्षसः ॥ अभिदुद्राव वेगेन जग्धंु क्षुत्परिपीडितः

taṁ praviṣṭaṁ śivātmānaṁ sa dṛṣṭvā brahmarākṣasaḥ abhidudrāva vegena jagdhaṁu kṣutparipīḍitaḥ

उस साक्षात् शिवस्वरूप को प्रविष्ट हुआ देखकर, वह ब्रह्मराक्षस, भूख से पीड़ित, उसे खाने के लिए वेगपूर्वक दौड़ पड़ा।

श्लोक 9 (skanda.3.107.9)

व्यात्ताननं महाकायं भीमदंष्ट्रं भयानकम् ॥ तमायांतमभिप्रेक्ष्य योगीशो न चचाल सः

vyāttānanaṁ mahākāyaṁ bhīmadaṁṣṭraṁ bhayānakam tamāyāṁtamabhiprekṣya yogīśo na cacāla saḥ

खुले मुखवाले, विशालकाय, भयंकर दाढ़ोंवाले, भयानक उस आते हुए को देखकर भी, वह योगीश्वर विचलित नहीं हुआ।

श्लोक 10 (skanda.3.107.10)

अथाभिद्रुत्य तरसा स घोरो वनगोचरः ॥ दोर्भ्यां निष्पीड्य जग्राह निष्कंपं शिवयोगिनम्

athābhidrutya tarasā sa ghoro vanagocaraḥ dorbhyāṁ niṣpīḍya jagrāha niṣkaṁpaṁ śivayoginam

फिर वह भयंकर वनचर वेगपूर्वक दौड़कर, अपनी दोनों भुजाओं से दबाकर, उस अविचल शिवयोगी को पकड़ लिया।

श्लोक 11 (skanda.3.107.11)

तदंगस्पर्शनादेव सद्यो विध्वस्तकिल्बिषः ॥ स ब्रह्मराक्षसो घोरो विषण्णः स्मृतिमाययौ

tadaṁgasparśanādeva sadyo vidhvastakilbiṣaḥ sa brahmarākṣaso ghoro viṣaṇṇaḥ smṛtimāyayau

उसके अंग के स्पर्शमात्र से ही, वह भयंकर ब्रह्मराक्षस तत्काल पाप से मुक्त होकर, विषण्ण होकर पूर्वस्मृति को प्राप्त हुआ।

श्लोक 12 (skanda.3.107.12)

यथा चिंतामणिं स्पृष्ट्वा लोहं कांचनतां व्रजेत् ॥ यथा जंबूनदीं प्राप्य मृत्तिका स्वर्णतां व्रजेत्

yathā ciṁtāmaṇiṁ spṛṣṭvā lohaṁ kāṁcanatāṁ vrajet yathā jaṁbūnadīṁ prāpya mṛttikā svarṇatāṁ vrajet

जैसे चिन्तामणि को छूकर लोहा स्वर्ण बन जाता है, जैसे जम्बूनदी को पाकर मिट्टी स्वर्ण बन जाती है,

श्लोक 13 (skanda.3.107.13)

यथा मानसमभ्येत्य वायसा यांति हंसताम् ॥ यथामृतं सकृत्पीत्वा नरो देवत्वमाप्नुयात्

yathā mānasamabhyetya vāyasā yāṁti haṁsatām yathāmṛtaṁ sakṛtpītvā naro devatvamāpnuyāt

जैसे मानसरोवर को पाकर कौवे हंस बन जाते हैं, जैसे एक बार अमृत पीकर मनुष्य देवत्व प्राप्त कर लेता है,

श्लोक 14 (skanda.3.107.14)

तथैव हि महात्मानो दर्शनस्पर्शनादिभिः ॥ सद्यः पुनंत्यघोपेतान्सत्संगो दुर्लभो ह्यतः

tathaiva hi mahātmāno darśanasparśanādibhiḥ sadyaḥ punaṁtyaghopetānsatsaṁgo durlabho hyataḥ

वैसे ही महात्मा लोग दर्शन-स्पर्श आदि से पापयुक्त लोगों को तत्काल पवित्र कर देते हैं; इसलिए सत्संग दुर्लभ ही है।

श्लोक 15 (skanda.3.107.15)

यः पूर्वं क्षुत्पिपासार्तो घोरात्मा विपिने चरः ॥ स सद्यस्तृप्तिमायातः पूर्णानंदो बभूव ह

yaḥ pūrvaṁ kṣutpipāsārto ghorātmā vipine caraḥ sa sadyastṛptimāyātaḥ pūrṇānaṁdo babhūva ha

जो पहले भूख-प्यास से पीड़ित, भयंकर स्वभाववाला, वन में विचरण करनेवाला था, वह तत्काल तृप्ति को प्राप्त होकर पूर्णानन्द हो गया।

श्लोक 16 (skanda.3.107.16)

तद्गात्रलग्नसितभस्मकणानुविद्धः सद्यो विधूतघनपापतमःस्वभावः ॥ संप्राप्तपूर्वभव संस्मृतिरुग्रकार्यस्तत्पादपद्मयुगले प्रणतो बभाषे

tadgātralagnasitabhasmakaṇānuviddhaḥ sadyo vidhūtaghanapāpatamaḥsvabhāvaḥ saṁprāptapūrvabhava saṁsmṛtirugrakāryastatpādapadmayugale praṇato babhāṣe

उसके अंगों में लगे सफेद भस्म-कणों से बिंधकर, तत्काल अपने घने पापमय अन्धकार-स्वभाव को दूर करके, पूर्वजन्म की स्मृति को प्राप्त वह उग्रकर्मी, उनके दोनों चरणकमलों में प्रणत होकर बोला —

श्लोक 17 (skanda.3.107.17)

राक्षस उवाच ॥ प्रसीद मे महायोगिन्प्रसीद करुणानिधे ॥ प्रसीद भवतप्तानामानंदामृवारिधे

rākṣasa uvāca prasīda me mahāyoginprasīda karuṇānidhe prasīda bhavataptānāmānaṁdāmṛvāridhe

राक्षस ने कहा — "मुझ पर प्रसन्न होइए, हे महायोगिन्! प्रसन्न होइए, हे करुणानिधे! प्रसन्न होइए, हे संसार से संतप्तों के लिए आनन्दामृत के सागर!

श्लोक 18 (skanda.3.107.18)

क्वाहं पापमतिर्घोरः सर्वप्राणिभयंकरः ॥ क्व ते महानुभावस्य दर्शनं करुणात्मनः

kvāhaṁ pāpamatirghoraḥ sarvaprāṇibhayaṁkaraḥ kva te mahānubhāvasya darśanaṁ karuṇātmanaḥ

"कहाँ मैं, पापबुद्धि, भयंकर, समस्त प्राणियों को भयभीत करनेवाला — और कहाँ आप महानुभाव, करुणात्मा का दर्शन!

श्लोक 19 (skanda.3.107.19)

उद्धरोद्धर मां घोरे पतितं दुःखसागरे ॥ तव सन्निधिमात्रेण महानंदोऽभिवर्धते

uddharoddhara māṁ ghore patitaṁ duḥkhasāgare tava sannidhimātreṇa mahānaṁdo'bhivardhate

"मुझे उद्धार करो, उद्धार करो, इस भयंकर दुःख-सागर में गिरे हुए को; आपकी उपस्थिति मात्र से महान आनन्द बढ़ रहा है।"

श्लोक 20 (skanda.3.107.20)

वामदेव उवाच ॥ कस्त्वं वनेचरो घोरो राक्षसोऽत्र किमास्थितः ॥ कथमेतां महाघोरां कष्टां गतिमवाप्तवान्

vāmadeva uvāca kastvaṁ vanecaro ghoro rākṣaso'tra kimāsthitaḥ kathametāṁ mahāghorāṁ kaṣṭāṁ gatimavāptavān

वामदेव ने कहा — "तुम कौन हो, भयंकर वनचर राक्षस? यहाँ क्यों रहते हो? इस अत्यन्त भयंकर, कष्टकारी गति को तुमने कैसे प्राप्त किया?"

श्लोक 21 (skanda.3.107.21)

राक्षस उवाच ॥ राक्षसोऽहमितः पूर्वं पंचविंशतिमे भवे ॥ गोप्ता यवनराष्ट्रस्य दुर्जयो नाम वीर्यवान्

rākṣasa uvāca rākṣaso'hamitaḥ pūrvaṁ paṁcaviṁśatime bhave goptā yavanarāṣṭrasya durjayo nāma vīryavān

राक्षस ने कहा — "मैं पहले, इस पच्चीसवें जन्म में, यवन-राष्ट्र का रक्षक था, दुर्जय नाम का बलवान।

श्लोक 22 (skanda.3.107.22)

सोऽहं दुरात्मा पापीयान्स्वैरचारी मदोत्कटः ॥ दंडधारी दुराचारः प्रचंडो निर्घृणः खलः

so'haṁ durātmā pāpīyānsvairacārī madotkaṭaḥ daṁḍadhārī durācāraḥ pracaṁḍo nirghṛṇaḥ khalaḥ

"मैं वह दुरात्मा, पापी, स्वेच्छाचारी, मद से उन्मत्त, दण्डधारी, दुराचारी, प्रचण्ड, निर्दयी, दुष्ट,

श्लोक 23 (skanda.3.107.23)

युवा बहुकलत्रोऽपि कामासक्तोऽजितेंद्रियः ॥ इमां पापीयसीं चेष्टां पुनरेकां गतोऽस्म्यहम्

yuvā bahukalatro'pi kāmāsakto'jiteṁdriyaḥ imāṁ pāpīyasīṁ ceṣṭāṁ punarekāṁ gato'smyaham

"युवा, अनेक पत्नियोंवाला होते हुए भी, काम में आसक्त, अजितेन्द्रिय, इस पापमय आचरण में बार-बार लीन रहता था —

श्लोक 24 (skanda.3.107.24)

प्रत्यहं नूतनामन्या नारीं भोक्तुमनाः सदा ॥ आहृताः सर्वदेशेभ्यो नार्यो भृत्यैर्मदाज्ञया

pratyahaṁ nūtanāmanyā nārīṁ bhoktumanāḥ sadā āhṛtāḥ sarvadeśebhyo nāryo bhṛtyairmadājñayā

"प्रतिदिन नई-नई स्त्री का उपभोग करने की इच्छा से; मेरी आज्ञा से सेवकों द्वारा समस्त देशों से स्त्रियाँ लाई जाती थीं।

श्लोक 25 (skanda.3.107.25)

भुक्त्वाभुक्त्वा परित्यक्तामेकामेकां दिनेदिने ॥ अन्तर्गृहेषु संस्थाप्य पुनरन्याः स्त्रियो धृताः

bhuktvābhuktvā parityaktāmekāmekāṁ dinedine antargṛheṣu saṁsthāpya punaranyāḥ striyo dhṛtāḥ

"भोग-भोगकर, एक-एक को प्रतिदिन त्यागकर, अन्तःपुर में स्थापित करके, फिर अन्य स्त्रियों को ग्रहण किया जाता था।

श्लोक 26 (skanda.3.107.26)

एवं स्वराष्ट्रात्परराष्ट्रतश्च देशाकरग्रामपुरव्रजेभ्यः ॥ आहृत्य नार्यो रमिता दिनेदिने भुक्वा पुनः कापि न भुज्यते मया

evaṁ svarāṣṭrātpararāṣṭrataśca deśākaragrāmapuravrajebhyaḥ āhṛtya nāryo ramitā dinedine bhukvā punaḥ kāpi na bhujyate mayā

"इस प्रकार अपने राष्ट्र से और परराष्ट्र से, प्रदेशों, खानों, गाँवों, नगरों और गिरोहों से स्त्रियाँ लाकर प्रतिदिन भोगी गईं; एक बार भोगी गई किसी को भी मैंने पुनः नहीं भोगा।

श्लोक 27 (skanda.3.107.27)

अथान्यैश्च न भुज्यंते मया भुक्तास्तथा स्त्रियः ॥ अन्तर्गृहेषु निहिताः शोचंते च दिवानिशम्

athānyaiśca na bhujyaṁte mayā bhuktāstathā striyaḥ antargṛheṣu nihitāḥ śocaṁte ca divāniśam

"और मेरे द्वारा भोगी गई वे स्त्रियाँ अन्य किसी के द्वारा भी नहीं भोगी गईं; अन्तःपुर में रखी गई वे दिन-रात शोक करती रहती थीं।

श्लोक 28 (skanda.3.107.28)

ब्रह्मविट्क्षत्रशूद्राणां यदा नार्यो मया हृताः ॥ मम राज्ये स्थिता विप्राः सह दारैः प्रदुद्रुवुः

brahmaviṭkṣatraśūdrāṇāṁ yadā nāryo mayā hṛtāḥ mama rājye sthitā viprāḥ saha dāraiḥ pradudruvuḥ

"जब मैंने ब्राह्मण, वैश्य, क्षत्रिय और शूद्रों की स्त्रियों को हर लिया, तब मेरे राज्य में स्थित ब्राह्मण अपनी पत्नियों सहित भाग गए।

श्लोक 29 (skanda.3.107.29)

सभर्तृकाश्च कन्याश्च विधवाश्च रजस्वलाः ॥ आहृत्य नार्यो रमिता मया कामहतात्मना

sabhartṛkāśca kanyāśca vidhavāśca rajasvalāḥ āhṛtya nāryo ramitā mayā kāmahatātmanā

"पतिवाली स्त्रियों, कन्याओं, विधवाओं और रजस्वला स्त्रियों तक को — मैं, काम से नष्ट आत्मा, हरकर भोगता रहा।

श्लोक 30 (skanda.3.107.30)

त्रिशतं द्विजनारीणां राजस्त्रीणां चतुःशतम् ॥ षट्शतं वैश्यनारीणां सहस्रं शूद्रयोषिताम्

triśataṁ dvijanārīṇāṁ rājastrīṇāṁ catuḥśatam ṣaṭśataṁ vaiśyanārīṇāṁ sahasraṁ śūdrayoṣitām

"तीन सौ ब्राह्मण-स्त्रियाँ, चार सौ राज-स्त्रियाँ, छह सौ वैश्य-स्त्रियाँ, एक हजार शूद्र-स्त्रियाँ,

श्लोक 31 (skanda.3.107.31)

शतं चांडालनद्गीर्णा पुलिंदीनां सहस्रकम् ॥ शैलूषीणां पंचशतं रजकीनां चतुःशतम्

śataṁ cāṁḍālanadgīrṇā puliṁdīnāṁ sahasrakam śailūṣīṇāṁ paṁcaśataṁ rajakīnāṁ catuḥśatam

"सौ चाण्डाल-स्त्रियाँ निगल ली गईं, एक हजार पुलिन्द-स्त्रियाँ, पाँच सौ नर्तकियाँ, चार सौ धोबिनें,

श्लोक 32 (skanda.3.107.32)

असंख्या वारमुख्याश्च मया भुक्ता दुरात्मना॥ तथापि मयि कामस्य न तृप्तिः समजायत

asaṁkhyā vāramukhyāśca mayā bhuktā durātmanā tathāpi mayi kāmasya na tṛptiḥ samajāyata

"और असंख्य श्रेष्ठ वेश्याएँ मैंने, वह दुरात्मा, भोगीं; फिर भी मुझमें काम की तृप्ति नहीं हुई।

श्लोक 33 (skanda.3.107.33)

एवं दुर्विषयासक्तं मत्तं पानरतं सदा ॥ यौवनेपि महारोगा विविशुर्यक्ष्मकादयः

evaṁ durviṣayāsaktaṁ mattaṁ pānarataṁ sadā yauvanepi mahārogā viviśuryakṣmakādayaḥ

"इस प्रकार निकृष्ट विषयों में आसक्त, उन्मत्त, सदा मद्यपान में रत रहते हुए, यौवन में ही यक्ष्मा आदि महारोगों ने मुझ पर आक्रमण किया।

श्लोक 34 (skanda.3.107.34)

रोगार्दितोऽनपत्यश्च शत्रुभिश्चापि पीडितः ॥ त्यक्तोमात्यैश्च भृत्यैश्च मृतोऽहं स्वेन कर्मणा

rogārdito'napatyaśca śatrubhiścāpi pīḍitaḥ tyaktomātyaiśca bhṛtyaiśca mṛto'haṁ svena karmaṇā

"रोग से पीड़ित, सन्तानहीन, और शत्रुओं द्वारा भी पीड़ित, मन्त्रियों और सेवकों द्वारा त्यागा गया मैं अपने ही कर्म से मर गया।

श्लोक 35 (skanda.3.107.35)

आयुर्विनश्यत्ययशो विवर्धते भाग्यं क्षयं यात्यतिदुर्गतिं व्रजेत् ॥ स्वर्गाच्च्यवंते पितरः पुरातना धर्मव्यपेतस्य नरस्य निश्चितम्

āyurvinaśyatyayaśo vivardhate bhāgyaṁ kṣayaṁ yātyatidurgatiṁ vrajet svargāccyavaṁte pitaraḥ purātanā dharmavyapetasya narasya niścitam

"'आयु नष्ट होती है, अपयश बढ़ता है, भाग्य क्षीण होता है, अत्यन्त दुर्गति को प्राप्त होता है; पुरातन पितर स्वर्ग से च्युत हो जाते हैं — यह धर्मरहित मनुष्य के लिए निश्चित है।'

श्लोक 36 (skanda.3.107.36)

अथाहं किंकरैर्याम्यैर्नीतो वैवस्वतालयम् ॥ ततोऽहं नरके घोरे तत्कुण्डे विनिपातितः

athāhaṁ kiṁkarairyāmyairnīto vaivasvatālayam tato'haṁ narake ghore tatkuṇḍe vinipātitaḥ

"फिर मुझे यम के किंकरों द्वारा वैवस्वत के धाम ले जाया गया; वहाँ से मुझे उस भयंकर नरक के कुण्ड में गिरा दिया गया।

श्लोक 37 (skanda.3.107.37)

तत्राहं नरके घोरे वर्षाणामयुतत्रयम् ॥ रेतः पिबन्पीड्यमानो न्यवसं यमकिंकरैः

tatrāhaṁ narake ghore varṣāṇāmayutatrayam retaḥ pibanpīḍyamāno nyavasaṁ yamakiṁkaraiḥ

"वहाँ उस भयंकर नरक में तीस हजार वर्षों तक, वीर्य पीता हुआ, पीड़ित होता हुआ, मैं यमदूतों के पास रहा।

श्लोक 38 (skanda.3.107.38)

ततः पापावशेषेण पिशाचो निर्जने वने ॥ सहस्रशिश्नः संजातो नित्यं क्षुत्तृषयाकुलः

tataḥ pāpāvaśeṣeṇa piśāco nirjane vane sahasraśiśnaḥ saṁjāto nityaṁ kṣuttṛṣayākulaḥ

"फिर शेष पाप के कारण, निर्जन वन में सहस्र-लिंगधारी पिशाच बना, नित्य भूख-प्यास से व्याकुल।

श्लोक 39 (skanda.3.107.39)

पैशाचीं गतिमाश्रित्य नीतं दिव्यं शरच्छतम् ॥ द्वितीयेहं भवे जातो व्याघ्रः प्राणिभयंकरः

paiśācīṁ gatimāśritya nītaṁ divyaṁ śaracchatam dvitīyehaṁ bhave jāto vyāghraḥ prāṇibhayaṁkaraḥ

"पिशाच-गति में रहकर, दिव्य सौ शरद बीते; फिर दूसरे जन्म में मैं प्राणियों को भयभीत करनेवाला व्याघ्र बना।

श्लोक 40 (skanda.3.107.40)

तृतीयेऽजगरो घोरश्चतुर्थेऽहं भवे वृकः ॥ पंचमे विड्वराहश्च षष्ठेऽहं कृकलासकः

tṛtīye'jagaro ghoraścaturthe'haṁ bhave vṛkaḥ paṁcame viḍvarāhaśca ṣaṣṭhe'haṁ kṛkalāsakaḥ

"तीसरे में भयंकर अजगर, चौथे जन्म में मैं भेड़िया, पाँचवें में मल खानेवाला सूअर, छठे में मैं छिपकली बना।

श्लोक 41 (skanda.3.107.41)

सप्तमेऽहं सारमेयः सृगालश्चाष्टमे भवे ॥ नवमे गवयो भीमो मृगोऽहं दशमे भवे

saptame'haṁ sārameyaḥ sṛgālaścāṣṭame bhave navame gavayo bhīmo mṛgo'haṁ daśame bhave

"सातवें में मैं कुत्ता, आठवें जन्म में सियार; नौवें में भयंकर गवय, दसवें जन्म में मैं हिरण बना।

श्लोक 42 (skanda.3.107.42)

एकादशे मर्कटश्च गृध्रोऽहं द्वादशे भवे ॥ त्रयोदशेऽहं नकुलो वायसश्च चतु र्दशे

ekādaśe markaṭaśca gṛdhro'haṁ dvādaśe bhave trayodaśe'haṁ nakulo vāyasaśca catu rdaśe

"ग्यारहवें में बन्दर, बारहवें जन्म में गिद्ध; तेरहवें में नेवला, चौदहवें में कौआ।

श्लोक 43 (skanda.3.107.43)

अच्छभल्लः पंचदशे षोडशे वनकुक्कुटः॥ गर्दभोऽहं सप्तदशे मार्जारोष्टादशे भवे

acchabhallaḥ paṁcadaśe ṣoḍaśe vanakukkuṭaḥ gardabho'haṁ saptadaśe mārjāroṣṭādaśe bhave

"पन्द्रहवें में स्लॉथ-भालू, सोलहवें में जंगली मुर्गा; सत्रहवें में गधा, अठारहवें जन्म में बिल्ली।

श्लोक 44 (skanda.3.107.44)

एकोनविंशे मण्डूकः कूर्मो विंशतिमे भवे ॥ एकविंशे भवे मत्स्यो द्वाविंशे मूषकोऽभवम्

ekonaviṁśe maṇḍūkaḥ kūrmo viṁśatime bhave ekaviṁśe bhave matsyo dvāviṁśe mūṣako'bhavam

"उन्नीसवें में मेंढक, बीसवें जन्म में कछुआ; इक्कीसवें जन्म में मछली, बाईसवें में मैं चूहा बना।

श्लोक 45 (skanda.3.107.45)

उलूकोहं त्रयोविंशे चतुर्विशे वनद्विपः ॥ पंचविंशे भवे चास्मिञ्जातोहं ब्रह्मराक्षसः

ulūkohaṁ trayoviṁśe caturviśe vanadvipaḥ paṁcaviṁśe bhave cāsmiñjātohaṁ brahmarākṣasaḥ

"तेईसवें में उल्लू, चौबीसवें में जंगली हाथी; और इस पच्चीसवें जन्म में मैं ब्रह्मराक्षस बना हूँ।

श्लोक 46 (skanda.3.107.46)

क्षुत्परीतो निराहारो वसाम्यत्र महावने ॥ इदानीमागतं दृष्ट्वा भवंतं जग्धुमुत्सुकः ॥ त्वद्देहस्पर्शमात्रेण जाता पूर्वभवस्मृतिः

kṣutparīto nirāhāro vasāmyatra mahāvane idānīmāgataṁ dṛṣṭvā bhavaṁtaṁ jagdhumutsukaḥ tvaddehasparśamātreṇa jātā pūrvabhavasmṛtiḥ

"भूख से व्याकुल, निराहार, मैं यहाँ इस महावन में रहता हूँ; अभी आपको आया देखकर आपको खाने के लिए उत्सुक हो गया था — किन्तु आपके शरीर के स्पर्शमात्र से ही मुझे पूर्वजन्म की स्मृति हो गई।

श्लोक 47 (skanda.3.107.47)

गतजन्म सहस्राणि स्मराम्यद्य त्वदंतिके ॥ निर्वेदश्च परो जातः प्रसन्नं हृदयं च मे

gatajanma sahasrāṇi smarāmyadya tvadaṁtike nirvedaśca paro jātaḥ prasannaṁ hṛdayaṁ ca me

"बीते हुए हजारों जन्मों को मैं आज आपके समीप स्मरण कर रहा हूँ; परम वैराग्य उत्पन्न हुआ है, और मेरा हृदय प्रसन्न हो गया है।

श्लोक 48 (skanda.3.107.48)

ईदृशोऽयं प्रभावस्ते कथं लब्धो महामते ॥ तपसा वापि तीव्रेण किमु तीर्थनिषेवणात्

īdṛśo'yaṁ prabhāvaste kathaṁ labdho mahāmate tapasā vāpi tīvreṇa kimu tīrthaniṣevaṇāt

"यह ऐसा आपका प्रभाव, हे महामते! कैसे प्राप्त हुआ — क्या तीव्र तप से, अथवा तीर्थ-सेवन से,

श्लोक 49 (skanda.3.107.49)

योगेन देवशक्त्या वा मंत्रैर्वानंतशक्तिभिः ॥ तत्त्वतो ब्रूहि भगवंस्त्वामहं शरणं गतः

yogena devaśaktyā vā maṁtrairvānaṁtaśaktibhiḥ tattvato brūhi bhagavaṁstvāmahaṁ śaraṇaṁ gataḥ

"योग से, दैवी शक्ति से, अथवा अनन्त शक्तिवाले मन्त्रों से? हे भगवन्! सच-सच बताइए, मैं आपकी शरण में आया हूँ।"

श्लोक 50 (skanda.3.107.50)

वामदेव उवाच ॥ एष मद्गात्रलग्नस्य प्रभावो भस्मनो महान् ॥ यत्संपर्कात्तमोवृत्तेस्तवेयं मतिरुत्तमा

vāmadeva uvāca eṣa madgātralagnasya prabhāvo bhasmano mahān yatsaṁparkāttamovṛttestaveyaṁ matiruttamā

वामदेव ने कहा — "यह मेरे अंगों में लगी भस्म का ही महान प्रभाव है, जिसके संसर्ग से तमोवृत्तिवाले तुम्हारी यह उत्तम बुद्धि उत्पन्न हुई।

श्लोक 51 (skanda.3.107.51)

को वेद भस्मसामर्थ्यं महादेवा दृते परः ॥ दुर्विभाव्यं यथा शंभोर्माहात्म्यं भस्मनस्तथा

ko veda bhasmasāmarthyaṁ mahādevā dṛte paraḥ durvibhāvyaṁ yathā śaṁbhormāhātmyaṁ bhasmanastathā

"महादेव को छोड़कर भस्म के सामर्थ्य को और कौन जानता है? जैसे शम्भु का माहात्म्य दुर्विभाव्य है, वैसे ही भस्म का भी।

श्लोक 52 (skanda.3.107.52)

पुरा भवादृशः कश्चिद्ब्राह्मणो धर्मवर्जितः ॥ द्राविडेषु स्थितो मूढः कर्मणा शूद्रतां गतः

purā bhavādṛśaḥ kaścidbrāhmaṇo dharmavarjitaḥ drāviḍeṣu sthito mūḍhaḥ karmaṇā śūdratāṁ gataḥ

"पूर्वकाल में तुम्हारे ही समान कोई एक धर्मरहित ब्राह्मण, द्राविड़ देश में रहता हुआ, मूढ़, अपने कर्मों से शूद्रत्व को प्राप्त हुआ।

श्लोक 53 (skanda.3.107.53)

चौर्यवृत्तिर्नैष्कृतिको वृषलीरतिलालसः॥ कदाचिज्जारतां प्राप्तः शूद्रेण निहतो निशि

cauryavṛttirnaiṣkṛtiko vṛṣalīratilālasaḥ kadācijjāratāṁ prāptaḥ śūdreṇa nihato niśi

"चोरी में लगा हुआ, पतित, नीच स्त्रियों में अत्यन्त आसक्त, एक बार व्यभिचार में लिप्त होकर, रात्रि में किसी शूद्र द्वारा मार डाला गया।

श्लोक 54 (skanda.3.107.54)

तच्छवस्य बहिर्ग्रामा त्क्षिप्तस्य प्रेतकर्मणः ॥ चचार सारमेयोंऽगे भस्मपादो यदृच्छया

tacchavasya bahirgrāmā tkṣiptasya pretakarmaṇaḥ cacāra sārameyoṁ'ge bhasmapādo yadṛcchayā

"उसके शव को गाँव के बाहर, प्रेतकर्म के लिए फेंके जाने पर, भस्म-लिप्त पैरवाला एक कुत्ता अनायास ही उसके शरीर पर से गुजरा।

श्लोक 55 (skanda.3.107.55)

अथ तं नरके घोरे पतितं शिवकिंकराः॥ निन्युर्विमानमारोप्य प्रसह्य यमकिंकरान्

atha taṁ narake ghore patitaṁ śivakiṁkarāḥ ninyurvimānamāropya prasahya yamakiṁkarān

"फिर उस भयंकर नरक में गिरे हुए उसे, शिव के दूत विमान पर चढ़ाकर, यमदूतों को बलपूर्वक रोककर ले गए।

श्लोक 56 (skanda.3.107.56)

शिवदूतान्समभ्येत्य यमोपि परिपृष्टवान् ॥ महापातककर्त्तारं कथमेनं निनीषथ

śivadūtānsamabhyetya yamopi paripṛṣṭavān mahāpātakakarttāraṁ kathamenaṁ ninīṣatha

"शिवदूतों के पास आकर यम ने भी पूछा — 'इस महापातकी को तुम क्यों ले जा रहे हो?'

श्लोक 57 (skanda.3.107.57)

अथोचुः शिवदूतास्ते पश्यास्य शवविग्रहम् ॥ वक्षोललाटदोर्मूलान्यंकितानि सुभस्मना

athocuḥ śivadūtāste paśyāsya śavavigraham vakṣolalāṭadormūlānyaṁkitāni subhasmanā

"तब उन शिवदूतों ने कहा — 'इसके शव की देह देखो — इसकी छाती, ललाट और कन्धे पवित्र भस्म से चिह्नित हैं।

श्लोक 58 (skanda.3.107.58)

अत एनं समानेतुमागताः शिवशासनात् ॥ नास्मान्निषेद्धुं शक्तोसि मास्त्वत्र तव संशयः

ata enaṁ samānetumāgatāḥ śivaśāsanāt nāsmānniṣeddhuṁ śaktosi māstvatra tava saṁśayaḥ

"'इसीलिए हम इसे शिव की आज्ञा से लेने आए हैं; तुम हमें रोकने में समर्थ नहीं हो, इसमें कोई सन्देह मत करो।'

श्लोक 59 (skanda.3.107.59)

इत्याभाष्य यमं शंभोर्दूतास्तं ब्राह्मणं ततः ॥ पश्यतां सर्वलोकानां निन्युर्लोकमनामयम्

ityābhāṣya yamaṁ śaṁbhordūtāstaṁ brāhmaṇaṁ tataḥ paśyatāṁ sarvalokānāṁ ninyurlokamanāmayam

"इस प्रकार यम से कहकर, शम्भु के दूत उस ब्राह्मण को, समस्त लोकों के देखते हुए, निरामय लोक में ले गए।

श्लोक 60 (skanda.3.107.60)

तस्मादशेषपापानां सद्यः संशोधनं परम् ॥ शंभोर्विभूषणं भस्म सततं ध्रियते मया

tasmādaśeṣapāpānāṁ sadyaḥ saṁśodhanaṁ param śaṁbhorvibhūṣaṇaṁ bhasma satataṁ dhriyate mayā

"इसीलिए समस्त पापों का तत्काल परम शोधन करनेवाली, शम्भु की विभूषण भस्म को मैं सतत धारण करता हूँ।"

श्लोक 61 (skanda.3.107.61)

इत्थं निशम्य माहात्म्यं भस्मनो ब्रह्मराक्षसः ॥ विस्तरेण पुनः श्रोतु मौत्कंठ्यादित्यभाषत

itthaṁ niśamya māhātmyaṁ bhasmano brahmarākṣasaḥ vistareṇa punaḥ śrotu mautkaṁṭhyādityabhāṣata

इस प्रकार भस्म का माहात्म्य सुनकर, वह ब्रह्मराक्षस, उत्कण्ठावश उसे विस्तार से पुनः सुनने के लिए बोला —

श्लोक 62 (skanda.3.107.62)

साधुसाधु महायोगिन्धन्योस्मि तव दर्शनात् ॥ मां विमोचय धर्मात्मन्घोरादस्मात्कुजन्मनः

sādhusādhu mahāyogindhanyosmi tava darśanāt māṁ vimocaya dharmātmanghorādasmātkujanmanaḥ

"साधु, साधु, हे महायोगिन्! आपके दर्शन से मैं धन्य हुआ; मुझे इस भयंकर नीच जन्म से मुक्त कीजिए, हे धर्मात्मन्!

श्लोक 63 (skanda.3.107.63)

किंचिदस्तीह मे भाति मया पुण्यं पुराकृतम् ॥ अतोहं त्वत्प्रसादेन मुक्तोस्म्यद्य द्विजोत्तम

kiṁcidastīha me bhāti mayā puṇyaṁ purākṛtam atohaṁ tvatprasādena muktosmyadya dvijottama

"मुझ में कुछ पूर्वकाल में किया हुआ पुण्य शेष है, ऐसा मुझे प्रतीत होता है; इसीलिए, हे द्विजोत्तम! मैं आज आपकी कृपा से मुक्त हुआ हूँ।

श्लोक 64 (skanda.3.107.64)

एकस्मै शिवभक्ताय तस्मिन्पार्थिवजन्मनि ॥ भूमिर्वृत्तिकरी दत्ता सस्यारामान्विता मया

ekasmai śivabhaktāya tasminpārthivajanmani bhūmirvṛttikarī dattā sasyārāmānvitā mayā

"उस राजपद के जन्म में, मैंने एक शिवभक्त को खेती और बगीचों से युक्त, आजीविका देनेवाली भूमि दान की थी।

श्लोक 65 (skanda.3.107.65)

यमेनापि तदैवोक्तं पंचविंशतिमे भवे ॥ कस्यचिद्योगिनः संगान्मोक्ष्यसे संसृतेरिति

yamenāpi tadaivoktaṁ paṁcaviṁśatime bhave kasyacidyoginaḥ saṁgānmokṣyase saṁsṛteriti

"यम ने भी तभी कहा था — 'पच्चीसवें जन्म में, किसी योगी के संग से तुम संसार से मुक्त हो जाओगे।'

श्लोक 66 (skanda.3.107.66)

तदद्य फलितं पुण्यं यत्किंचित्प्राग्भवार्जितम् ॥ अतो निर्मनुजारण्ये संप्राप्तस्तव संगमः

tadadya phalitaṁ puṇyaṁ yatkiṁcitprāgbhavārjitam ato nirmanujāraṇye saṁprāptastava saṁgamaḥ

"आज वही पूर्वजन्म में अर्जित थोड़ा-सा पुण्य फलित हुआ है; इसीलिए इस मनुष्यरहित वन में आपसे यह समागम प्राप्त हुआ।

श्लोक 67 (skanda.3.107.67)

अतो मां घोरपाप्मानं संसरंतं कुजन्मनि ॥ समुद्धर कृपासिन्धो दत्त्वा भस्म समंत्रकम्

ato māṁ ghorapāpmānaṁ saṁsaraṁtaṁ kujanmani samuddhara kṛpāsindho dattvā bhasma samaṁtrakam

"इसलिए मुझ भयंकर पापी, नीच जन्म में भटकते हुए को, हे कृपासिन्धो! मन्त्रयुक्त भस्म देकर उद्धार कीजिए।

श्लोक 68 (skanda.3.107.68)

कथं धार्यमिदं भस्म को मंत्रः को विधिः शुभः ॥ कः कालः कश्च वा देशः सर्वं कथय मे गुरो

kathaṁ dhāryamidaṁ bhasma ko maṁtraḥ ko vidhiḥ śubhaḥ kaḥ kālaḥ kaśca vā deśaḥ sarvaṁ kathaya me guro

"यह भस्म कैसे धारण करना चाहिए? क्या मन्त्र है? क्या शुभ विधि है? क्या समय है, और कौन-सा स्थान? हे गुरो! सब कुछ मुझे बताइए।

श्लोक 69 (skanda.3.107.69)

भवादृशा महात्मानः सदा लोकहिते रताः ॥ नात्मनो हितमिच्छंति कल्पवृक्षसधर्मिणः

bhavādṛśā mahātmānaḥ sadā lokahite ratāḥ nātmano hitamicchaṁti kalpavṛkṣasadharmiṇaḥ

"आप जैसे महात्मा सदा लोक-हित में रत रहते हैं; कल्पवृक्ष के समान स्वभाववाले वे अपना हित नहीं चाहते।"

श्लोक 70 (skanda.3.107.70)

सूत उवाच ॥ इत्युक्तस्तेन योगीशो घोरेण वनचारिणा ॥ भूयोपि भस्ममाहात्म्यं वर्णयामास तत्त्ववित्

sūta uvāca ityuktastena yogīśo ghoreṇa vanacāriṇā bhūyopi bhasmamāhātmyaṁ varṇayāmāsa tattvavit

सूत जी ने कहा — उस भयंकर वनचर द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर, तत्त्वज्ञ योगीश्वर ने पुनः भस्म का माहात्म्य वर्णन करना आरम्भ किया।

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