ब्रह्म खण्ड · अध्याय 106
भद्रायु पर शिव का अनुग्रह
श्लोक 1 (skanda.3.106.1)
॥ सूत उवाच ॥ प्राप्तसिंहासनो वीरो भद्रायुः स महीपतिः ॥ प्रविवेश वनं रम्यं कदाचिद्भार्यया सह
sūta uvāca prāptasiṁhāsano vīro bhadrāyuḥ sa mahīpatiḥ praviveśa vanaṁ ramyaṁ kadācidbhāryayā saha
सूत जी ने कहा — सिंहासन प्राप्त वीर राजा भद्रायु एक बार अपनी पत्नी सहित एक रमणीय वन में प्रविष्ट हुआ।
श्लोक 2 (skanda.3.106.2)
तस्मिन्विकसिताशोकप्रसूननवपल्लवे॥ प्रोत्फुल्लमल्लिकाखंडकूजद्भ्रमरसंकुले
tasminvikasitāśokaprasūnanavapallave protphullamallikākhaṁḍakūjadbhramarasaṁkule
उस वन में, जहाँ खिले हुए अशोक के फूल और नए अंकुर थे, खिली हुई चमेली की झाड़ियों पर गुंजार करते भ्रमरों से भरे हुए,
श्लोक 3 (skanda.3.106.3)
नवकेसरसौरभ्यबद्धरागिजनोत्सवे॥ सद्यः कोरकिताशोकतमालगहनांतरे
navakesarasaurabhyabaddharāgijanotsave sadyaḥ korakitāśokatamālagahanāṁtare
नए पराग की सुगन्ध से जनों के मन को बाँधनेवाले उत्सव से युक्त, तत्काल कली आती अशोक और तमाल वृक्षों के घने भाग में,
श्लोक 4 (skanda.3.106.4)
प्रसूनप्रकरानम्र माधवीवनमंडपे॥ प्रवालकुसुमोद्द्योतचूतशाखिभिरञ्चिते
prasūnaprakarānamra mādhavīvanamaṁḍape pravālakusumoddyotacūtaśākhibhirañcite
फूलों के समूहों से झुके माधवी वन के मण्डपों में, नए पल्लव और फूलों से चमकते आम्रवृक्षों से सुशोभित,
श्लोक 5 (skanda.3.106.5)
पुन्नागवनविभ्रांतपुंस्कोकिलविराविणि॥ वसन्तसमये रम्ये विजहार स्त्रिया सह
punnāgavanavibhrāṁtapuṁskokilavirāviṇi vasantasamaye ramye vijahāra striyā saha
पुन्नाग वन में भटकते नर कोकिलों की पुकार से गूँजते हुए, उस रमणीय वसन्त ऋतु में, उसने अपनी पत्नी के साथ विहार किया।
श्लोक 6 (skanda.3.106.6)
अथाविदूरे क्रोशंतौ धावंतौ द्विजदंपती ॥ अन्वीयमानौ व्याघ्रेण ददर्श नृपसत्तमः
athāvidūre krośaṁtau dhāvaṁtau dvijadaṁpatī anvīyamānau vyāghreṇa dadarśa nṛpasattamaḥ
फिर, कुछ ही दूरी पर, उस श्रेष्ठ राजा ने एक व्याघ्र द्वारा पीछा किए जाते हुए, चिल्लाते और दौड़ते ब्राह्मण-दम्पति को देखा।
श्लोक 7 (skanda.3.106.7)
पाहि पाहि महाराज हा राजन्करुणानिधे ॥ एष धावति शार्दूलो जग्धुमावां महारयः
pāhi pāhi mahārāja hā rājankaruṇānidhe eṣa dhāvati śārdūlo jagdhumāvāṁ mahārayaḥ
"रक्षा करो, रक्षा करो, महाराज! हाय राजन्! करुणानिधे! यह व्याघ्र हम दोनों को खाने के लिए अत्यन्त वेग से दौड़ रहा है!
श्लोक 8 (skanda.3.106.8)
एष पर्वतसंकाशः सर्वप्राणिभयंकरः ॥ यावन्न खादति प्राप्य तावन्नौ रक्ष भूपते
eṣa parvatasaṁkāśaḥ sarvaprāṇibhayaṁkaraḥ yāvanna khādati prāpya tāvannau rakṣa bhūpate
"यह पर्वत के समान, समस्त प्राणियों को भयभीत करनेवाला — इससे पहले कि यह हमें पकड़कर खा जाए, हे भूपते! हमारी रक्षा करो!"
श्लोक 9 (skanda.3.106.9)
इत्थमाक्रंदितं श्रुत्वा स राजा धनुराददे ॥ तावदागत्य शार्दूलो मध्ये जग्राह तां वधूम्
itthamākraṁditaṁ śrutvā sa rājā dhanurādade tāvadāgatya śārdūlo madhye jagrāha tāṁ vadhūm
इस प्रकार पुकार सुनकर, वह राजा धनुष उठा लिया; इतने में ही व्याघ्र आकर बीच में ही उस वधू को पकड़ लिया।
श्लोक 10 (skanda.3.106.10)
हा नाथ नाथ हा कांत हा शंभो जगतः पते ॥ इति रोरूयमाणां तां यावज्जग्राह भीषणः
hā nātha nātha hā kāṁta hā śaṁbho jagataḥ pate iti rorūyamāṇāṁ tāṁ yāvajjagrāha bhīṣaṇaḥ
"हाय नाथ, नाथ! हाय प्रिय! हाय शम्भो, जगत के पति!" इस प्रकार चिल्लाती हुई उसे उस भयंकर जन्तु ने पकड़ लिया।
श्लोक 11 (skanda.3.106.11)
तावत्स राजा निशितैर्भल्लैर्व्याघ्रमताडयत् ॥ न च तैर्विव्यथे किंचिद्गिरींद्र इव वृष्टिभिः
tāvatsa rājā niśitairbhallairvyāghramatāḍayat na ca tairvivyathe kiṁcidgirīṁdra iva vṛṣṭibhiḥ
तभी उस राजा ने तीक्ष्ण बाणों से व्याघ्र को घायल किया, किन्तु वह उनसे तनिक भी विचलित नहीं हुआ, जैसे पर्वत वर्षा से।
श्लोक 12 (skanda.3.106.12)
स शार्दूलो महासत्त्वो राज्ञोस्त्रैरकृतव्यथः ॥ बलादाकृष्य तां नारीमपाक्रामत सत्वरः
sa śārdūlo mahāsattvo rājñostrairakṛtavyathaḥ balādākṛṣya tāṁ nārīmapākrāmata satvaraḥ
वह महाशक्तिशाली व्याघ्र, राजा के अस्त्रों से अविचलित, बलपूर्वक उस स्त्री को खींचकर तुरन्त चला गया।
श्लोक 13 (skanda.3.106.13)
व्याघ्रेणापहृतां पत्नीं वीक्ष्य विप्रोऽतिदुःखितः ॥ रुरोद हा प्रिये बाले हा कांते हा पतिव्रते
vyāghreṇāpahṛtāṁ patnīṁ vīkṣya vipro'tiduḥkhitaḥ ruroda hā priye bāle hā kāṁte hā pativrate
व्याघ्र द्वारा अपनी पत्नी को हर लिए जाते देखकर वह ब्राह्मण अत्यन्त दुःखी होकर विलाप करने लगा — "हाय प्रिये, बाले! हाय कान्ते! हाय पतिव्रते!
श्लोक 14 (skanda.3.106.14)
एकं मामिह संत्यज्य कथं लोकांतरं गता ॥ प्राणेभ्योपि प्रियां त्यक्त्वा कथं जीवितुमुत्सहे
ekaṁ māmiha saṁtyajya kathaṁ lokāṁtaraṁ gatā prāṇebhyopi priyāṁ tyaktvā kathaṁ jīvitumutsahe
"मुझे अकेला यहाँ छोड़कर तुम कैसे परलोक चली गईं? प्राणों से भी प्रिय को त्यागकर, मैं जीवित रहने का साहस कैसे करूँ?
श्लोक 15 (skanda.3.106.15)
राजन्क्व ते महास्त्राणि क्व ते श्लाघ्यं महद्धनुः ॥ क्व ते द्वादशसाहस्रमहानागातिगं बलम्
rājankva te mahāstrāṇi kva te ślāghyaṁ mahaddhanuḥ kva te dvādaśasāhasramahānāgātigaṁ balam
"हे राजन्! तुम्हारे महान अस्त्र कहाँ हैं? तुम्हारा प्रशंसनीय महान धनुष कहाँ है? तुम्हारा बारह हजार महान गजों से भी अधिक बल कहाँ है?
श्लोक 16 (skanda.3.106.16)
किं ते शंखेन खङ्गेन किं ते मंत्रास्त्रविद्यया ॥ किं च तेन प्रयत्नेन किं प्रभावेण भूयसा
kiṁ te śaṁkhena khaṅgena kiṁ te maṁtrāstravidyayā kiṁ ca tena prayatnena kiṁ prabhāveṇa bhūyasā
"तुम्हारे शंख से क्या लाभ, खड्ग से क्या लाभ? तुम्हारी मन्त्र-अस्त्र-विद्या से क्या लाभ? उस प्रयत्न से क्या, उस प्रचुर प्रभाव से क्या लाभ?
श्लोक 17 (skanda.3.106.17)
तत्सर्वं विफलं जातं यच्चान्यत्त्वयि तिष्ठति ॥ यस्त्वं वनौकसं जंतुं निवारयितुमक्षमः
tatsarvaṁ viphalaṁ jātaṁ yaccānyattvayi tiṣṭhati yastvaṁ vanaukasaṁ jaṁtuṁ nivārayitumakṣamaḥ
"वह सब निष्फल हो गया, और जो कुछ भी और तुम में शेष है, क्योंकि तुम वन के इस जन्तु को रोकने में असमर्थ रहे।
श्लोक 18 (skanda.3.106.18)
क्षात्त्रस्यायं परो धर्मः क्षताद्यत्परिरक्षणम् ॥ तस्मात्कुलोचिते धर्मे नष्टे त्वज्जीवितेन किम्
kṣāttrasyāyaṁ paro dharmaḥ kṣatādyatparirakṣaṇam tasmātkulocite dharme naṣṭe tvajjīvitena kim
"यही क्षत्रिय का परम धर्म है — पीड़ितों की रक्षा करना। इसलिए, जब कुल के उचित धर्म का ही नाश हो गया, तो तुम्हारे जीवन से क्या लाभ?
श्लोक 19 (skanda.3.106.19)
आर्तानां शरणार्तानां त्राणं कुर्वंति पार्थिवाः ॥ प्राणैरर्थैश्च धर्मज्ञास्तद्विहीना मृतोपमाः
ārtānāṁ śaraṇārtānāṁ trāṇaṁ kurvaṁti pārthivāḥ prāṇairarthaiśca dharmajñāstadvihīnā mṛtopamāḥ
"धर्मज्ञ राजा पीड़ितों और शरणागतों की रक्षा प्राणों और धन से करते हैं; जो ऐसा नहीं करते, वे मृततुल्य हैं।
श्लोक 20 (skanda.3.106.20)
धनिनां दानहीनानां गार्हस्थ्याद्भिक्षुता वरा ॥ आर्तत्राणविहीनानां जीवितान्मरणं वरम्
dhanināṁ dānahīnānāṁ gārhasthyādbhikṣutā varā ārtatrāṇavihīnānāṁ jīvitānmaraṇaṁ varam
"दानरहित धनवानों के लिए, गृहस्थी से भिक्षुता श्रेष्ठ है; पीड़ितों की रक्षा से रहित लोगों के लिए, जीवन से मृत्यु श्रेष्ठ है।
श्लोक 21 (skanda.3.106.21)
वरं विषादनं राज्ञो वरमग्नौ प्रवेशनम् ॥ अनाथानां प्रपन्नानां कृपणानामरक्षणात्
varaṁ viṣādanaṁ rājño varamagnau praveśanam anāthānāṁ prapannānāṁ kṛpaṇānāmarakṣaṇāt
"अनाथों, शरणागतों और दीनों की रक्षा न करने से तो राजा का विषाद खाना श्रेष्ठ है, अग्नि में प्रवेश करना श्रेष्ठ है।"
श्लोक 22 (skanda.3.106.22)
इत्थं विलपितं तस्य स्ववीर्यस्य च गर्हणम् ॥ निशम्य नृपतिः शोकादात्मन्येवमचिंतयत्
itthaṁ vilapitaṁ tasya svavīryasya ca garhaṇam niśamya nṛpatiḥ śokādātmanyevamaciṁtayat
इस प्रकार उसके विलाप और अपने ही पराक्रम की निन्दा को सुनकर, राजा शोक से स्वयं मन में इस प्रकार सोचने लगा —
श्लोक 23 (skanda.3.106.23)
अहो मे पौरुषं नष्टमद्य दैवविपर्ययात् ॥ अद्य कीर्तिश्च मे नष्टा पातकं प्राप्तमुत्क टम्
aho me pauruṣaṁ naṣṭamadya daivaviparyayāt adya kīrtiśca me naṣṭā pātakaṁ prāptamutka ṭam
"अहो, आज दैव की विपरीतता से मेरा पौरुष नष्ट हो गया! आज मेरी कीर्ति भी नष्ट हो गई, मुझे भयंकर पाप प्राप्त हुआ है।
श्लोक 24 (skanda.3.106.24)
धर्मः कालोचितो नष्टो मन्दभाग्यस्य दुर्मतेः ॥ नूनं मे संपदो राज्यमायुष्यं क्षयमेष्यति
dharmaḥ kālocito naṣṭo mandabhāgyasya durmateḥ nūnaṁ me saṁpado rājyamāyuṣyaṁ kṣayameṣyati
"मुझ मन्दभाग्य दुर्बुद्धि का समयोचित धर्म नष्ट हो गया; निश्चय ही मेरी सम्पदा, राज्य और आयु क्षय को प्राप्त होंगे।
श्लोक 25 (skanda.3.106.25)
अपुंसां संपदो भोगाः पुत्रदारधनानि च ॥ दैवेन क्षणमुद्यंति क्षणादस्तं व्रजंति च
apuṁsāṁ saṁpado bhogāḥ putradāradhanāni ca daivena kṣaṇamudyaṁti kṣaṇādastaṁ vrajaṁti ca
"पुरुषत्वहीनों की सम्पदाएँ, भोग, पुत्र, पत्नी और धन दैवयोग से क्षणभर में उदित होते हैं और क्षणभर में ही अस्त हो जाते हैं।
श्लोक 26 (skanda.3.106.26)
अत एनं द्विजन्मानं हतदारं शुचार्दितम् ॥ गतशोकं करिष्यामि दत्त्वा प्राणानपि प्रियान्
ata enaṁ dvijanmānaṁ hatadāraṁ śucārditam gataśokaṁ kariṣyāmi dattvā prāṇānapi priyān
"इसलिए मैं इस ब्राह्मण को, जो पत्नी-वियोग से शोकाकुल है, अपने प्रिय प्राण देकर भी शोकरहित करूँगा।"
श्लोक 27 (skanda.3.106.27)
इति निश्चित्य मनसा भद्रायुर्नृपसत्तमः ॥ पतित्वा पादयोस्त्वस्य बभाषे परिसांत्वयन्
iti niścitya manasā bhadrāyurnṛpasattamaḥ patitvā pādayostvasya babhāṣe parisāṁtvayan
इस प्रकार मन में निश्चय करके, श्रेष्ठ राजा भद्रायु उसके चरणों में गिरकर सान्त्वना देते हुए बोला —
श्लोक 28 (skanda.3.106.28)
कृपां कुरु मयि ब्रह्मन्क्षत्रबंधौ हतौजसि ॥ शोकं त्यज महाबुद्धे दास्याम्यर्थं तवेप्सितम्
kṛpāṁ kuru mayi brahmankṣatrabaṁdhau hataujasi śokaṁ tyaja mahābuddhe dāsyāmyarthaṁ tavepsitam
"हे ब्रह्मन्! तेजहीन इस क्षत्रिय पर कृपा करो; हे महाबुद्धे! शोक त्यागो, मैं तुम्हें तुम्हारी इच्छित वस्तु दूँगा।
श्लोक 29 (skanda.3.106.29)
इदं राज्यमियं राज्ञी ममेदं च कलेवरम् ॥ त्वधीनमिदं सर्वं किं तेऽभिलषितं वद
idaṁ rājyamiyaṁ rājñī mamedaṁ ca kalevaram tvadhīnamidaṁ sarvaṁ kiṁ te'bhilaṣitaṁ vada
"यह राज्य, यह रानी, यह मेरा शरीर — यह सब तुम्हारे अधीन है; कहो, तुम्हें क्या अभीष्ट है?"
श्लोक 30 (skanda.3.106.30)
ब्राह्मण उवाच ॥ किमादर्शेन चांधस्य किं गृहैर्भैक्ष्यजीविनः ॥ किं पुस्तकेन मूर्खस्य ह्यस्त्रीकस्य धनेन किम्
brāhmaṇa uvāca kimādarśena cāṁdhasya kiṁ gṛhairbhaikṣyajīvinaḥ kiṁ pustakena mūrkhasya hyastrīkasya dhanena kim
ब्राह्मण ने कहा — "अन्धे के लिए दर्पण से क्या लाभ? भिक्षा से जीवन बितानेवाले के लिए घर से क्या लाभ? मूर्ख के लिए पुस्तक से क्या, पत्नीहीन के लिए धन से क्या?
श्लोक 31 (skanda.3.106.31)
अतोऽहं गतपत्नीको भुक्तभोगो न कर्हिचित् ॥ इमां तवाग्रमहिषीं कामार्थं दीयतां मम
ato'haṁ gatapatnīko bhuktabhogo na karhicit imāṁ tavāgramahiṣīṁ kāmārthaṁ dīyatāṁ mama
"अतः मैं पत्नी-रहित, कभी भोग न भोगा हुआ — तुम्हारी यह अग्रमहिषी काम-पूर्ति के लिए मुझे दे दो।"
श्लोक 32 (skanda.3.106.32)
राजोवाच ॥ ब्रह्मन्किमेष धर्मस्ते किमेतद्गुरुशासनम् ॥ अस्वर्ग्यमयशस्यं च परदाराभिमर्शनम्
rājovāca brahmankimeṣa dharmaste kimetadguruśāsanam asvargyamayaśasyaṁ ca paradārābhimarśanam
राजा ने कहा — "हे ब्रह्मन्! क्या यह तुम्हारा धर्म है, क्या यह गुरु का उपदेश है — परस्त्री का स्पर्श, जो न स्वर्ग देनेवाला है, न यश देनेवाला?
श्लोक 33 (skanda.3.106.33)
दातारः संति वित्तस्य राज्यस्य गजवाजिनाम् ॥ आत्मदेहस्य वा क्वापि न कलत्रस्य कर्हिचित्
dātāraḥ saṁti vittasya rājyasya gajavājinām ātmadehasya vā kvāpi na kalatrasya karhicit
"धन, राज्य, हाथी-घोड़े देनेवाले होते हैं, कहीं अपने शरीर के भी दाता होते हैं, किन्तु पत्नी के दाता कभी नहीं होते।
श्लोक 34 (skanda.3.106.34)
परदारोपभोगेन यत्पापं समुपार्जितम् ॥ न तत्क्षालयितुं शक्यं प्रायश्चित्तशतैरपि
paradāropabhogena yatpāpaṁ samupārjitam na tatkṣālayituṁ śakyaṁ prāyaścittaśatairapi
"परस्त्री के उपभोग से अर्जित पाप सौ प्रायश्चित्तों से भी धोया नहीं जा सकता।"
श्लोक 35 (skanda.3.106.35)
ब्राह्मण उवाच ॥ अपि ब्रह्मवधं घोरमपि मद्यनिषेवणम् ॥ तपसा नाशयिष्यामि कि पुनः पारदारिकम् ॥ तस्मात्प्रयच्छ मे भार्यामिमां त्वं ध्रुवमन्यथा
brāhmaṇa uvāca api brahmavadhaṁ ghoramapi madyaniṣevaṇam tapasā nāśayiṣyāmi ki punaḥ pāradārikam tasmātprayaccha me bhāryāmimāṁ tvaṁ dhruvamanyathā
ब्राह्मण ने कहा — "मैं तप से घोर ब्रह्महत्या और मद्यपान के पाप को भी नष्ट कर दूँगा, फिर परस्त्रीगमन की तो बात ही क्या? इसलिए मुझे यह अपनी पत्नी दो, अन्यथा निश्चय ही
श्लोक 36 (skanda.3.106.36)
अरक्षणाद्भयार्तानां गंतासि निरयं ध्रुवम् ॥ इति विप्रगिरा भीतश्चिंतयामास पार्थिवः ॥ अरक्षणान्महत्पापं पत्नीदानं ततो वरम्
arakṣaṇādbhayārtānāṁ gaṁtāsi nirayaṁ dhruvam iti vipragirā bhītaściṁtayāmāsa pārthivaḥ arakṣaṇānmahatpāpaṁ patnīdānaṁ tato varam
"भयार्तों की रक्षा न करने से तुम निश्चय ही नरक जाओगे।" इस प्रकार ब्राह्मण के वचनों से भयभीत होकर, राजा ने सोचा — "रक्षा न करने से महापाप होता है, अतः पत्नी-दान ही श्रेष्ठ है।
श्लोक 37 (skanda.3.106.37)
अतः पत्नीं द्विजाग्र्याय दत्त्वा निर्मुक्तकिल्विषः ॥ सद्यो वह्निं प्रवेक्ष्यामि कीर्तिश्च निहिता भवेत्
ataḥ patnīṁ dvijāgryāya dattvā nirmuktakilviṣaḥ sadyo vahniṁ pravekṣyāmi kīrtiśca nihitā bhavet
"इसलिए इस श्रेष्ठ ब्राह्मण को पत्नी देकर, पाप से मुक्त होकर, मैं तत्काल अग्नि में प्रवेश करूँगा, जिससे मेरी कीर्ति भी सुरक्षित रहे।"
श्लोक 38 (skanda.3.106.38)
इति निश्चित्य मनसा समुज्ज्वाल्य हुताशनम् ॥ तं ब्राह्मणं समाहूय ददौ पत्नीं सहोदकाम्
iti niścitya manasā samujjvālya hutāśanam taṁ brāhmaṇaṁ samāhūya dadau patnīṁ sahodakām
इस प्रकार मन में निश्चय करके, अग्नि को प्रज्वलित करके, उस ब्राह्मण को बुलाकर, उसने जल सहित अपनी पत्नी दे दी।
श्लोक 39 (skanda.3.106.39)
स्वयं स्नातः शुचिर्भूत्वा प्रणम्य विबुधेश्वरान् ॥ तमग्निं द्विः परिक्रम्य शिवं दध्यौ समाहितः
svayaṁ snātaḥ śucirbhūtvā praṇamya vibudheśvarān tamagniṁ dviḥ parikramya śivaṁ dadhyau samāhitaḥ
स्वयं स्नान करके पवित्र होकर, देवताओं को प्रणाम करके, उस अग्नि की दो बार परिक्रमा करके, वह एकाग्रचित्त होकर शिव का ध्यान करने लगा।
श्लोक 40 (skanda.3.106.40)
तमथाग्नौ पतिष्यंतं स्वपदासक्तचेतसम् ॥ प्रत्यदृश्यत विश्वेशः प्रादुर्भूतो जगत्पतिः
tamathāgnau patiṣyaṁtaṁ svapadāsaktacetasam pratyadṛśyata viśveśaḥ prādurbhūto jagatpatiḥ
फिर जब वह अग्नि में गिरने ही वाला था, शिवपद में लीन चित्तवाला, तभी विश्वेश, जगत्पति, प्रकट होकर उसके सम्मुख दिखाई दिए।
श्लोक 41 (skanda.3.106.41)
तमीश्वरं पंचवक्त्रं त्रिनेत्रं पिनाकिनं चन्द्रकलावतंसम् ॥ आलंबितापिंगजटाकलापं मध्यंगतं भास्करकोटितेजसम्
tamīśvaraṁ paṁcavaktraṁ trinetraṁ pinākinaṁ candrakalāvataṁsam ālaṁbitāpiṁgajaṭākalāpaṁ madhyaṁgataṁ bhāskarakoṭitejasam
उस राजा ने उन ईश्वर को देखा, पंचमुख, त्रिनेत्र, पिनाकधारी, चन्द्रकला से सुशोभित, लटकती पिंगल जटाओं से युक्त, मध्य में स्थित, करोड़ों सूर्यों के तेजवाले,
श्लोक 42 (skanda.3.106.42)
मृणालगौरं गजचर्मवाससं गंगातरंगो क्षितमौलिदेशम् ॥ नागेंद्रहारावलिकंकणोर्मिकाकिरीटकोट्यंगदकुंडलोज्ज्वलम्
mṛṇālagauraṁ gajacarmavāsasaṁ gaṁgātaraṁgo kṣitamaulideśam nāgeṁdrahārāvalikaṁkaṇormikākirīṭakoṭyaṁgadakuṁḍalojjvalam
कमलनाल के समान गौरवर्ण, गजचर्म धारण किए हुए, गंगा की तरंगों से भीगे मुकुट-प्रदेशवाले, नागेन्द्र के हार, कंकण, मुकुट, करोड़ों अंगद और कुण्डलों से उज्ज्वल,
श्लोक 43 (skanda.3.106.43)
त्रिशूलखट्वांगकुठारचर्ममृगाभयेष्टार्थपिनाकहस्तम् ॥ वृषोपरिस्थं शितिकंठमीशं प्रोद्भूतमग्रे नृपतिर्ददर्श
triśūlakhaṭvāṁgakuṭhāracarmamṛgābhayeṣṭārthapinākahastam vṛṣoparisthaṁ śitikaṁṭhamīśaṁ prodbhūtamagre nṛpatirdadarśa
त्रिशूल, खट्वांग, परशु, ढाल, मृग, अभय और वरद मुद्रा तथा पिनाक धनुष हाथों में धारण किए हुए, वृषभ पर स्थित, नीलकण्ठ ईश को उस राजा ने अपने सामने प्रकट देखा।
श्लोक 44 (skanda.3.106.44)
अथांबराद्द्रुतं पेतुर्दिव्याः कुसुमवृष्टयः ॥ प्रणेदुर्देवतूर्याणि देवाश्च ननृतुर्जगुः
athāṁbarāddrutaṁ peturdivyāḥ kusumavṛṣṭayaḥ praṇedurdevatūryāṇi devāśca nanṛturjaguḥ
फिर आकाश से तुरन्त दिव्य पुष्पों की वर्षा हुई; देवताओं के वाद्य बजने लगे और देवता नाचने-गाने लगे।
श्लोक 45 (skanda.3.106.45)
तत्राजग्मुर्नारदाद्याः सनकाद्या सुरर्षयः ॥ इन्द्रादयश्च लोकेशास्तथाब्रह्मर्षयोऽमलाः
tatrājagmurnāradādyāḥ sanakādyā surarṣayaḥ indrādayaśca lokeśāstathābrahmarṣayo'malāḥ
वहाँ नारद आदि, सनक आदि देवर्षि, इन्द्र आदि लोकपाल, तथा निर्मल ब्रह्मर्षि भी आए।
श्लोक 46 (skanda.3.106.46)
तेषां मध्ये समासीनो महादेवः सहोमया ॥ ववर्ष करुणासारं भक्तिनम्रे महीपतौ
teṣāṁ madhye samāsīno mahādevaḥ sahomayā vavarṣa karuṇāsāraṁ bhaktinamre mahīpatau
उनके बीच बैठे महादेव, उमा सहित, भक्तिपूर्वक झुके उस राजा पर करुणा की वर्षा करने लगे।
श्लोक 47 (skanda.3.106.47)
तद्दर्शनानंदविजृंभिताशयः प्रवृद्धबाष्पांबुपरिप्लुतांगः ॥ प्रहृष्टरोमा गलगद्गदाक्षरं तुष्टाव गीर्भिर्मुकुलीकृतांजलिः
taddarśanānaṁdavijṛṁbhitāśayaḥ pravṛddhabāṣpāṁbupariplutāṁgaḥ prahṛṣṭaromā galagadgadākṣaraṁ tuṣṭāva gīrbhirmukulīkṛtāṁjaliḥ
उनके दर्शन के आनन्द से हृदय विस्तृत होकर, बहते हुए आँसुओं से भीगे अंगोंवाला, रोमांचित, गद्गद कण्ठवाला वह राजा हाथ जोड़े स्तुति करने लगा।
श्लोक 48 (skanda.3.106.48)
राजोवाच ॥ नतोस्म्यहं देवमनाथमव्ययं प्रधानमव्यक्तगुणं महांतम् ॥ अकारणं कारणकारणं परं शिवं चिदानंदमयं प्रशांतम्
rājovāca natosmyahaṁ devamanāthamavyayaṁ pradhānamavyaktaguṇaṁ mahāṁtam akāraṇaṁ kāraṇakāraṇaṁ paraṁ śivaṁ cidānaṁdamayaṁ praśāṁtam
राजा ने कहा — "मैं उस देव को नमस्कार करता हूँ, जो अनाथ, अव्यय, प्रधान, अव्यक्त गुणोंवाले, महान, अकारण, कारणों के भी कारण, परम, चिदानन्दमय, परम शान्त शिव हैं।
श्लोक 49 (skanda.3.106.49)
त्वं विश्वसाक्षी जगतोऽस्यकर्त्ता विरूढधामा हृदि सन्निविष्टः ॥ अतो विचिन्वंति विधौ विपश्चितो योगैरनेकैः कृतचित्तरोधैः
tvaṁ viśvasākṣī jagato'syakarttā virūḍhadhāmā hṛdi sanniviṣṭaḥ ato vicinvaṁti vidhau vipaścito yogairanekaiḥ kṛtacittarodhaiḥ
"आप विश्व के साक्षी, इस जगत के कर्ता, प्रबल तेजवाले, हृदय में स्थित हैं; इसलिए बुद्धिमान लोग अनेक साधनों से, चित्त को रोककर, विधिपूर्वक आपको खोजते हैं।
श्लोक 50 (skanda.3.106.50)
एकात्मतां भावयतां त्वमेको नानाधियां यस्त्वमनेकरूपः ॥ अतींद्रियं साक्ष्युदयास्तविभ्रमं मनःपथात्संह्रियते पदं ते
ekātmatāṁ bhāvayatāṁ tvameko nānādhiyāṁ yastvamanekarūpaḥ atīṁdriyaṁ sākṣyudayāstavibhramaṁ manaḥpathātsaṁhriyate padaṁ te
"जो एकात्मता का भाव करते हैं, उनके लिए आप एक हैं; जो अनेक बुद्धिवाले हैं, उनके लिए आप अनेक रूपवाले हैं; इन्द्रियों से परे, उदय-अस्त के भ्रम के साक्षी, आपका पद मन के मार्ग से परे है।
श्लोक 51 (skanda.3.106.51)
तं त्वां दुरापं वचसो धियाश्च व्यपेतमोहं परमात्मरूपम् ॥ गुणैकनिष्ठाः प्रकृतौ विलीनाः कथं वपुः स्तोतुमलंगिरो मे
taṁ tvāṁ durāpaṁ vacaso dhiyāśca vyapetamohaṁ paramātmarūpam guṇaikaniṣṭhāḥ prakṛtau vilīnāḥ kathaṁ vapuḥ stotumalaṁgiro me
"वाणी और बुद्धि से दुष्प्राप्य, मोहरहित, परमात्मस्वरूप आपकी, गुणों में ही स्थित, प्रकृति में लीन, मेरी वाणी कैसे स्तुति करने में समर्थ हो सकती है?
श्लोक 52 (skanda.3.106.52)
तथापि भक्त्याश्रयतामुपेयुस्तवांघ्रिपद्मं प्रणतार्तिभंजनम् ॥ सुघोरसंसारदवाग्निपीडितो भजामि नित्यं भवभीतिशांतये
tathāpi bhaktyāśrayatāmupeyustavāṁghripadmaṁ praṇatārtibhaṁjanam sughorasaṁsāradavāgnipīḍito bhajāmi nityaṁ bhavabhītiśāṁtaye
"फिर भी, भक्ति से आश्रय पानेवाले प्रणतजनों की पीड़ा हरनेवाले आपके चरणकमलों की, संसार की भीषण दावाग्नि से पीड़ित मैं, भवभय की शान्ति के लिए, नित्य आराधना करता हूँ।
श्लोक 53 (skanda.3.106.53)
नमस्ते देव देवाय महादेवाय शंभवे ॥ नमस्त्रिमूर्तिरूपाय सर्गस्थित्यंतकारिणे
namaste deva devāya mahādevāya śaṁbhave namastrimūrtirūpāya sargasthityaṁtakāriṇe
"हे देवदेव! हे महादेव! हे शम्भो! तुम्हें नमस्कार है; सृष्टि, स्थिति और संहार करनेवाले त्रिमूर्तिरूप को नमस्कार है।
श्लोक 54 (skanda.3.106.54)
नमो विश्वादिरूपाय विश्वप्रथमसाक्षिणे ॥ नमः सन्मात्रतत्त्वाय बोधानंदघनाय च
namo viśvādirūpāya viśvaprathamasākṣiṇe namaḥ sanmātratattvāya bodhānaṁdaghanāya ca
"विश्व के आदिरूप, विश्व के प्रथम साक्षी को नमस्कार; सन्मात्र तत्त्व, बोध-आनन्दघन को नमस्कार है।
श्लोक 55 (skanda.3.106.55)
सर्वक्षेत्रनिवासाय क्षेत्रभिन्नात्मशक्तये ॥ अशक्ताय नमस्तुभ्यं शक्ताभासाय भूयसे
sarvakṣetranivāsāya kṣetrabhinnātmaśaktaye aśaktāya namastubhyaṁ śaktābhāsāya bhūyase
"समस्त क्षेत्रों में निवास करनेवाले, क्षेत्र से भिन्न आत्मशक्तिवाले को; अशक्त होते हुए भी शक्ति के आभासवाले, अत्यन्त महान आपको नमस्कार है।
श्लोक 56 (skanda.3.106.56)
निराभासाय नित्याय सत्यज्ञानांतरात्मने ॥ विशुद्धाय विदूराय विमुक्ताशेषकर्मणे
nirābhāsāya nityāya satyajñānāṁtarātmane viśuddhāya vidūrāya vimuktāśeṣakarmaṇe
"निराभास, नित्य, सत्यज्ञान के अन्तरात्मा को; विशुद्ध, विदूर, समस्त कर्मों से मुक्त आपको नमस्कार है।
श्लोक 57 (skanda.3.106.57)
नमो वेदांतवेद्याय वेदमूलनिवासिने ॥ नमो विविक्तचेष्टाय निवृत्तगुण वृत्तये
namo vedāṁtavedyāya vedamūlanivāsine namo viviktaceṣṭāya nivṛttaguṇa vṛttaye
"वेदान्त से जाननेयोग्य, वेद के मूल में निवास करनेवाले को नमस्कार; विविक्त चेष्टावाले, गुणवृत्ति से निवृत्त आपको नमस्कार है।
श्लोक 58 (skanda.3.106.58)
नमः कल्याणवीर्याय कल्याणफलदायिने ॥ नमोऽनंताय महते शांताय शिवरूपिणे
namaḥ kalyāṇavīryāya kalyāṇaphaladāyine namo'naṁtāya mahate śāṁtāya śivarūpiṇe
"कल्याणकारी वीर्यवाले, कल्याणकारी फल देनेवाले को नमस्कार; अनन्त, महान, शान्त, शिवरूप आपको नमस्कार है।
श्लोक 59 (skanda.3.106.59)
अघोराय सुघोराय घोराघौघ विदारिणे ॥ भर्गाय भवबीजानां भंजनाय गरीयसे ॥ नमो विध्वस्तमोहाय विशदात्मगुणाय च
aghorāya sughorāya ghorāghaugha vidāriṇe bhargāya bhavabījānāṁ bhaṁjanāya garīyase namo vidhvastamohāya viśadātmaguṇāya ca
"अघोर, सुघोर, घोर पापसमूह को विदीर्ण करनेवाले, भर्ग, संसार के बीजों के भी विनाशक, अत्यन्त महान आपको; मोह को नष्ट करनेवाले, विशद आत्मगुणवाले आपको नमस्कार है।
श्लोक 60 (skanda.3.106.60)
पाहि मां जगतां नाथ पाहि शंकर शाश्वत ॥ पाहि रुद्र विरूपाक्ष पाहि मृत्युंजयाव्यय
pāhi māṁ jagatāṁ nātha pāhi śaṁkara śāśvata pāhi rudra virūpākṣa pāhi mṛtyuṁjayāvyaya
"हे जगत्पति! मेरी रक्षा करो; हे शाश्वत शंकर! रक्षा करो; हे रुद्र विरूपाक्ष! रक्षा करो; हे अव्यय मृत्युंजय! रक्षा करो।
श्लोक 61 (skanda.3.106.61)
शम्भो शशांककृतशेखर शांतमूर्ते गौरीश गोपतिनिशापहुताशनेत्र ॥ गंगाधरांधकविदारण पुण्यकीर्ते भूतेश भूधरनिवास सदा नमस्ते
śambho śaśāṁkakṛtaśekhara śāṁtamūrte gaurīśa gopatiniśāpahutāśanetra gaṁgādharāṁdhakavidāraṇa puṇyakīrte bhūteśa bhūdharanivāsa sadā namaste
"हे शम्भो! चन्द्रशेखर, शान्तमूर्ति, गौरीश, गोपति, रात्रि को भस्म करनेवाले नेत्रवाले, गंगाधर, अन्धकासुर के विदारक, पुण्यकीर्ति, भूतेश, पर्वतनिवासी — तुम्हें सदा नमस्कार है।"
श्लोक 62 (skanda.3.106.62)
सूत उवाच ॥ एवं स्तुतः स भगवान्राज्ञा देवो महेश्वरः ॥ प्रसन्नः सह पार्वत्या प्रत्युवाच दयानिधिः
sūta uvāca evaṁ stutaḥ sa bhagavānrājñā devo maheśvaraḥ prasannaḥ saha pārvatyā pratyuvāca dayānidhiḥ
सूत जी ने कहा — इस प्रकार राजा द्वारा स्तुत होकर, वे भगवान महेश्वर देव, पार्वती सहित प्रसन्न होकर, वे दयानिधि उत्तर देने लगे।
श्लोक 63 (skanda.3.106.63)
ईश्वर उवाच ॥ राजंस्ते परितुष्टोऽस्मि भक्त्या पुण्यस्तवेन च ॥ अनन्यचेता यो नित्यं सदा मां पर्यपूजयः
īśvara uvāca rājaṁste parituṣṭo'smi bhaktyā puṇyastavena ca ananyacetā yo nityaṁ sadā māṁ paryapūjayaḥ
ईश्वर ने कहा — "हे राजन्! मैं तुम्हारी भक्ति और इस पुण्य स्तवन से अत्यन्त संतुष्ट हूँ, क्योंकि तुमने अनन्यचित्त होकर सदा मेरी पूजा की है।
श्लोक 64 (skanda.3.106.64)
तव भावपरीक्षार्थं द्विजो भूत्वाहमागतः ॥ व्याघ्रेण या परिग्रस्ता सैषा दैवी गिरींद्रजा
tava bhāvaparīkṣārthaṁ dvijo bhūtvāhamāgataḥ vyāghreṇa yā parigrastā saiṣā daivī girīṁdrajā
"तुम्हारे भाव की परीक्षा के लिए, मैं ब्राह्मण बनकर आया था; व्याघ्र द्वारा जो पकड़ी गई थी, वह साक्षात् दैवी गिरिपुत्री ही थीं।
श्लोक 65 (skanda.3.106.65)
व्याघ्रो मायामयो यस्ते शरैरक्षतविग्रहः ॥ धीरतां द्रष्टुकामस्ते पत्नीं याचितवानहम्
vyāghro māyāmayo yaste śarairakṣatavigrahaḥ dhīratāṁ draṣṭukāmaste patnīṁ yācitavānaham
"व्याघ्र भी तुम्हारे लिए मायामय था; तुम्हारे बाणों से उसका शरीर अक्षत रहा; तुम्हारी धीरता देखने की इच्छा से मैंने तुम्हारी पत्नी माँगी थी।
श्लोक 66 (skanda.3.106.66)
अस्याश्च कीर्तिमालिन्यास्तव भक्त्या च मानद ॥ तुष्टोऽहं संप्रयच्छामि वरं वरय दुर्लभम्
asyāśca kīrtimālinyāstava bhaktyā ca mānada tuṣṭo'haṁ saṁprayacchāmi varaṁ varaya durlabham
"इस कीर्तिमालिनी के प्रति और तुम्हारी मेरे प्रति भक्ति से, हे मानद! मैं संतुष्ट हूँ; एक दुर्लभ वर माँगो, मैं दूँगा।"
श्लोक 67 (skanda.3.106.67)
राजोवाच ॥ एष एव वरो देव यद्भवान्परमेश्वरः ॥ भवतापपरीतस्य मम प्रत्यक्षतां गतः
rājovāca eṣa eva varo deva yadbhavānparameśvaraḥ bhavatāpaparītasya mama pratyakṣatāṁ gataḥ
राजा ने कहा — "हे देव! यही मेरे लिए वर है, कि आप, परमेश्वर, मेरे संताप से पीड़ित मुझे प्रत्यक्ष दिखाई दिए।
श्लोक 68 (skanda.3.106.68)
नान्यं वरं वृणे देव भवतो वरदर्षभात् ॥ अहं च सेयं सा राज्ञी मम माता च मत्पिता
nānyaṁ varaṁ vṛṇe deva bhavato varadarṣabhāt ahaṁ ca seyaṁ sā rājñī mama mātā ca matpitā
"हे देव! वरदाताओं में श्रेष्ठ! मैं आपसे और कोई वर नहीं माँगता — केवल यह कि मैं और यह रानी, मेरी माता और मेरे पिता,
श्लोक 69 (skanda.3.106.69)
वैश्यः पद्माकरो नाम तत्पुत्रः सुनयाभिधः ॥ सर्वानेतान्महादेव सदा त्वत्पार्श्वगान्कुरु
vaiśyaḥ padmākaro nāma tatputraḥ sunayābhidhaḥ sarvānetānmahādeva sadā tvatpārśvagānkuru
"पद्माकर नाम का वैश्य, और उसका पुत्र सुनय नाम का — हे महादेव! इन सबको सदा अपने समीप रखिए।"
श्लोक 70 (skanda.3.106.70)
सूत उवाच ॥ अथ राज्ञी महाभागा प्रणता कीर्तिमालिनी ॥ भक्त्या प्रसाद्य गिरिशं ययाचे वरमुत्तमम्
sūta uvāca atha rājñī mahābhāgā praṇatā kīrtimālinī bhaktyā prasādya giriśaṁ yayāce varamuttamam
सूत जी ने कहा — फिर वह महाभागा रानी कीर्तिमालिनी, प्रणाम करके, भक्तिपूर्वक गिरीश को प्रसन्न करके, एक उत्तम वर माँगने लगी।
श्लोक 71 (skanda.3.106.71)
राज्ञ्युवाच ॥ चंद्रांगदो मम पिता माता सीमंतिनी च मे ॥ तयोर्याचे महादेव त्वत्पार्श्वे सन्निधिं सदा
rājñyuvāca caṁdrāṁgado mama pitā mātā sīmaṁtinī ca me tayoryāce mahādeva tvatpārśve sannidhiṁ sadā
रानी ने कहा — "चन्द्रांगद मेरे पिता हैं, और सीमन्तिनी मेरी माता हैं; हे महादेव! मैं माँगती हूँ कि वे भी सदा आपके समीप रहें।"
श्लोक 72 (skanda.3.106.72)
एवमस्त्विति गौरीशः प्रसन्नो भक्तवत्सलः ॥ तयोः कामवरं दत्त्वा क्षणादंतर्हितोऽभवत्
evamastviti gaurīśaḥ prasanno bhaktavatsalaḥ tayoḥ kāmavaraṁ dattvā kṣaṇādaṁtarhito'bhavat
"ऐसा ही हो" — यह कहकर भक्तवत्सल गौरीश प्रसन्न होकर, उन्हें उनकी अभीष्ट वर देकर, क्षणभर में अन्तर्धान हो गए।
श्लोक 73 (skanda.3.106.73)
सोपि राजा सुरैः सार्धं प्रसादं प्राप्य शूलिनः ॥ सहितः कीर्तिमालिन्या बुभुजे विषयान्प्रियान्
sopi rājā suraiḥ sārdhaṁ prasādaṁ prāpya śūlinaḥ sahitaḥ kīrtimālinyā bubhuje viṣayānpriyān
वह राजा भी, त्रिशूलधारी की कृपा प्राप्त करके, देवताओं सहित, कीर्तिमालिनी के साथ प्रिय विषयों का उपभोग करने लगा।
श्लोक 74 (skanda.3.106.74)
कृत्वा वर्षायुतं राज्यमव्याहतबलोन्नतिः ॥ राज्यं पुत्रेषु विन्यस्य भेजे शंभोः परं पदम्
kṛtvā varṣāyutaṁ rājyamavyāhatabalonnatiḥ rājyaṁ putreṣu vinyasya bheje śaṁbhoḥ paraṁ padam
दस हजार वर्षों तक अखण्डित बल और उन्नति से राज्य करके, अपने पुत्रों को राज्य सौंपकर, उसने शम्भु के परम पद को प्राप्त किया।
श्लोक 75 (skanda.3.106.75)
चंद्रांगदोपि राजेंद्रो राज्ञी सीमंतिनी च सा ॥ भक्त्या संपूज्य गिरिशं जग्मतुः शांभवं पदम्
caṁdrāṁgadopi rājeṁdro rājñī sīmaṁtinī ca sā bhaktyā saṁpūjya giriśaṁ jagmatuḥ śāṁbhavaṁ padam
चन्द्रांगद भी, वह राजराज, और वह रानी सीमन्तिनी, भक्तिपूर्वक गिरीश की पूजा करके शाम्भव पद को प्राप्त हुए।
श्लोक 76 (skanda.3.106.76)
एतत्पवित्रमघनाशकरं विचित्रं शम्भोर्गुणानुकथनं परमं रहस्यम् ॥ यः श्रावयेद्बुधजनान्प्रयतः पठेद्वा संप्राप्य भोगविभवं शिव मेति सोंते
etatpavitramaghanāśakaraṁ vicitraṁ śambhorguṇānukathanaṁ paramaṁ rahasyam yaḥ śrāvayedbudhajanānprayataḥ paṭhedvā saṁprāpya bhogavibhavaṁ śiva meti soṁte
यह शम्भु के गुणों का पवित्र, पापनाशक, विचित्र, परम रहस्यमय वर्णन — जो कोई संयमी होकर विद्वानों को सुनाता है, अथवा स्वयं पढ़ता है, वह भोग और वैभव प्राप्त करके अन्त में शिव को प्राप्त होता है।