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ब्रह्म खण्ड · अध्याय 105

मगध-युद्ध और भद्रायु का विवाह

अध्याय 104अध्याय-सूचीअध्याय 106

श्लोक 1 (skanda.3.105.1)

॥ सूत उवाच ॥ दशार्णाधिपतेस्तस्य वज्रबाहोर्महाभुजः ॥ बभूव शत्रुर्बलवान्राजा मगधराट् ततः

sūta uvāca daśārṇādhipatestasya vajrabāhormahābhujaḥ babhūva śatrurbalavānrājā magadharāṭ tataḥ

सूत जी ने कहा — उस महाबाहु वज्रबाहु, दशार्ण के अधिपति का, मगध का बलवान राजा शत्रु था।

श्लोक 2 (skanda.3.105.2)

स वै हेमरथो नाम बाहुशाली रणोत्कटः ॥ बलेन महतावृत्य दशार्णं न्यरुधद्बली

sa vai hemaratho nāma bāhuśālī raṇotkaṭaḥ balena mahatāvṛtya daśārṇaṁ nyarudhadbalī

वह हेमरथ नाम से प्रसिद्ध, बाहुबली, युद्ध में उत्कट, बलवान राजा विशाल सेना से घेरकर दशार्ण को रोक बैठा।

श्लोक 3 (skanda.3.105.3)

चमूपास्तस्य दुर्धर्षाः प्राप्य देशं दशार्णकम् ॥ व्यलुंपन्वसुरत्नानि गृहाणि ददहुः परे

camūpāstasya durdharṣāḥ prāpya deśaṁ daśārṇakam vyaluṁpanvasuratnāni gṛhāṇi dadahuḥ pare

उसकी दुर्धर्ष सेनाएँ दशार्ण देश में पहुँचकर धन-रत्नों को लूटने लगीं, घरों को जलाने लगीं, और अन्य कार्य करने लगीं।

श्लोक 4 (skanda.3.105.4)

केचिद्धनानि जगृहुः केचिद्बालान्स्त्रियोऽपरे ॥ गोधनान्यपरेऽगृह्णन्केचिद्धान्यपरिच्छदान् ॥ केचिदारामसस्यानि गृहोद्यानान्यनाशयत्

keciddhanāni jagṛhuḥ kecidbālānstriyo'pare godhanānyapare'gṛhṇankeciddhānyaparicchadān kecidārāmasasyāni gṛhodyānānyanāśayat

कुछ ने धन लूटा, कुछ ने बालक और स्त्रियों को, कुछ ने गोधन को, कुछ ने धान्य और सामग्री को; कुछ ने बगीचों, खेतों, घरों और उद्यानों को नष्ट कर दिया।

श्लोक 5 (skanda.3.105.5)

एवं विनाश्य तद्राज्यं स्त्रीगोधनजिघृक्षवः ॥ आवृत्य तस्य नगरीं वज्रबाहोस्तु मागधः

evaṁ vināśya tadrājyaṁ strīgodhanajighṛkṣavaḥ āvṛtya tasya nagarīṁ vajrabāhostu māgadhaḥ

इस प्रकार उस राज्य को नष्ट करके, स्त्री और गोधन को लूटने की इच्छा से, वह मगधराज वज्रबाहु की नगरी को घेर बैठा।

श्लोक 6 (skanda.3.105.6)

एवं पर्याकुलं वीक्ष्य राजा नगरमेव च ॥ युद्धाय निर्जगामाशु वज्रबाहुः ससै निकः

evaṁ paryākulaṁ vīkṣya rājā nagarameva ca yuddhāya nirjagāmāśu vajrabāhuḥ sasai nikaḥ

नगरी को इस प्रकार व्याकुल देखकर, राजा वज्रबाहु शीघ्र ही अपनी सेना सहित युद्ध के लिए निकल पड़ा।

श्लोक 7 (skanda.3.105.7)

वज्रबाहुश्च भूपालस्तथा मंत्रिपुरःसराः ॥ युयुधुर्मागधैः सार्धं निजघ्नुः शत्रुवाहिनीम्

vajrabāhuśca bhūpālastathā maṁtripuraḥsarāḥ yuyudhurmāgadhaiḥ sārdhaṁ nijaghnuḥ śatruvāhinīm

राजा वज्रबाहु और उसके मन्त्री आगे बढ़कर मगधों के साथ युद्ध करने लगे और शत्रु-सेना का नाश करने लगे।

श्लोक 8 (skanda.3.105.8)

वज्रबाहुर्महेष्वासो दंशितो रथमास्थितः॥ विकिरन्बाणवर्षाणि चकार कदनं महत्

vajrabāhurmaheṣvāso daṁśito rathamāsthitaḥ vikiranbāṇavarṣāṇi cakāra kadanaṁ mahat

महाधनुर्धर वज्रबाहु कवचधारी होकर रथ पर सवार होकर, बाणों की वर्षा करते हुए, महान संहार करने लगा।

श्लोक 9 (skanda.3.105.9)

दशार्णराजं युध्यंतं दृष्ट्वा युद्धे सुदुःसहम् ॥ तमेव तरसा वव्रुः सर्वे मागधसैनिकाः

daśārṇarājaṁ yudhyaṁtaṁ dṛṣṭvā yuddhe suduḥsaham tameva tarasā vavruḥ sarve māgadhasainikāḥ

दशार्ण के राजा को युद्ध में इस प्रकार दुःसह लड़ते देखकर, समस्त मगध सैनिकों ने तुरन्त उसे ही घेर लिया।

श्लोक 10 (skanda.3.105.10)

कृत्वा तु सुचिरं युद्धं मागधा दृढविक्रमाः ॥ तत्सैन्यं नाशयामासुर्लेभिरे च जयश्रियम्

kṛtvā tu suciraṁ yuddhaṁ māgadhā dṛḍhavikramāḥ tatsainyaṁ nāśayāmāsurlebhire ca jayaśriyam

दीर्घकाल तक युद्ध करके, दृढ़ पराक्रमी मगधों ने उसकी सेना का नाश किया और विजयश्री प्राप्त की।

श्लोक 11 (skanda.3.105.11)

केचित्तस्य रथं जघ्नुः केचित्तद्धनुराच्छिनम् ॥ सूतं तस्य जघानैकस्त्वपरः खड्गमाच्छिनत्

kecittasya rathaṁ jaghnuḥ kecittaddhanurācchinam sūtaṁ tasya jaghānaikastvaparaḥ khaḍgamācchinat

कुछ ने उसका रथ तोड़ दिया, कुछ ने उसका धनुष तोड़ दिया; एक ने उसके सारथी को मार डाला, दूसरे ने उसका खड्ग तोड़ डाला।

श्लोक 12 (skanda.3.105.12)

संछिन्नखड्गधन्वानं विरथं हतसारथिम् ॥ बलाद्गृहीत्वा बलिनो बबंधुर्नृपतिं रुषा

saṁchinnakhaḍgadhanvānaṁ virathaṁ hatasārathim balādgṛhītvā balino babaṁdhurnṛpatiṁ ruṣā

इस प्रकार खड्ग-धनुष टूटे, रथहीन, सारथिहीन उस राजा को उन बलवानों ने बलपूर्वक पकड़कर क्रोधवश बाँध दिया।

श्लोक 13 (skanda.3.105.13)

तस्य मंत्रिगणं सर्वं तत्सैन्यं च विजित्य ते ॥ मागधास्तस्य नगरीं विविशुर्जयकाशिनः

tasya maṁtrigaṇaṁ sarvaṁ tatsainyaṁ ca vijitya te māgadhāstasya nagarīṁ viviśurjayakāśinaḥ

उसके समस्त मन्त्रिगण और सेना को जीतकर, वे विजयोल्लासी मगध उसकी नगरी में प्रविष्ट हुए।

श्लोक 14 (skanda.3.105.14)

अश्वान्नरान्गजानुष्ट्रान्पशूंश्चैव धनानि च ॥ जगृहुर्युवतीः सर्वाश्चार्वंगीश्चैव कन्यकाः

aśvānnarāngajānuṣṭrānpaśūṁścaiva dhanāni ca jagṛhuryuvatīḥ sarvāścārvaṁgīścaiva kanyakāḥ

उन्होंने घोड़े, मनुष्य, हाथी, ऊँट, पशु और धन लूट लिए; समस्त युवतियों और सुन्दरी कन्याओं को भी पकड़ लिया।

श्लोक 15 (skanda.3.105.15)

राज्ञो बबंधुर्महिषीर्दासीश्चैव सहस्रशः ॥ कोशं च रत्नसंपूर्णं जह्रुस्तेऽप्याततायिनः

rājño babaṁdhurmahiṣīrdāsīścaiva sahasraśaḥ kośaṁ ca ratnasaṁpūrṇaṁ jahruste'pyātatāyinaḥ

उन्होंने राजा की रानियों को और सहस्रों दासियों को बाँध लिया; उन आततायियों ने रत्नों से भरा कोष भी लूट लिया।

श्लोक 16 (skanda.3.105.16)

एवं विनाश्य नगरीं हृत्वा स्त्रीगोधनादिकम् ॥ वज्रबाहुं बलाद्बद्ध्वा रथे स्थाप्य विनिर्ययुः

evaṁ vināśya nagarīṁ hṛtvā strīgodhanādikam vajrabāhuṁ balādbaddhvā rathe sthāpya viniryayuḥ

इस प्रकार नगरी को नष्ट करके, स्त्री-गोधन आदि लूटकर, वज्रबाहु को बलपूर्वक बाँधकर रथ में बिठाकर वे निकल गए।

श्लोक 17 (skanda.3.105.17)

एवं कोलाहले जाते राष्ट्रनाशे च दारुणे ॥ राजपुत्रोऽथ भद्रायुस्तद्वार्तामशृणोद्बली

evaṁ kolāhale jāte rāṣṭranāśe ca dāruṇe rājaputro'tha bhadrāyustadvārtāmaśṛṇodbalī

इस प्रकार भीषण कोलाहल और राष्ट्र के दारुण विनाश के होने पर, बलवान राजपुत्र भद्रायु ने उसका समाचार सुना।

श्लोक 18 (skanda.3.105.18)

पितरं शत्रुनिर्बद्धं पितृपत्नीस्तथा हृताः ॥ नष्टं दशार्णराष्ट्रं च श्रुत्वा चुक्रोश सिंहवत्

pitaraṁ śatrunirbaddhaṁ pitṛpatnīstathā hṛtāḥ naṣṭaṁ daśārṇarāṣṭraṁ ca śrutvā cukrośa siṁhavat

अपने पिता को शत्रु द्वारा बाँधा गया, अपनी माताओं को हरा गया, और दशार्ण राष्ट्र को नष्ट हुआ सुनकर, वह सिंह के समान गरज उठा।

श्लोक 19 (skanda.3.105.19)

स खड्गशंखावादाय वैश्यपुत्रसहायवान् ॥ दंशितो हयमारुह्य कुमारो विजिगीषया

sa khaḍgaśaṁkhāvādāya vaiśyaputrasahāyavān daṁśito hayamāruhya kumāro vijigīṣayā

खड्ग और शंख लेकर, वैश्यपुत्र के सहायकसहित, कवचधारी होकर घोड़े पर चढ़कर, वह कुमार विजय की इच्छा से चल पड़ा।

श्लोक 20 (skanda.3.105.20)

जवेनागत्य तं देशं मागधैरभिपूरितम् ॥ दह्यमानं क्रंदमानं हृतस्त्रीसुतगोधनम्

javenāgatya taṁ deśaṁ māgadhairabhipūritam dahyamānaṁ kraṁdamānaṁ hṛtastrīsutagodhanam

वेगपूर्वक उस मगधों से भरे देश में पहुँचकर, जो जलता हुआ, चिल्लाता हुआ, स्त्री-पुत्र-गोधन से लूटा गया था,

श्लोक 21 (skanda.3.105.21)

दृष्ट्वा राजजनं सर्वं राज्यं शून्यं भयाकुलम् ॥ क्रोधाध्मातमनास्तूर्णं प्रविश्य रिपुवाहिनीम् ॥ आकर्णाकृष्टकोदंडो ववर्ष शरसंततीः

dṛṣṭvā rājajanaṁ sarvaṁ rājyaṁ śūnyaṁ bhayākulam krodhādhmātamanāstūrṇaṁ praviśya ripuvāhinīm ākarṇākṛṣṭakodaṁḍo vavarṣa śarasaṁtatīḥ

समस्त राजजनों को, राज्य को शून्य और भयाकुल देखकर, क्रोध से फूले हुए मन से, तुरन्त शत्रु-सेना में प्रविष्ट होकर, कान तक खींचे धनुष से, उसने बाणों की झड़ी लगा दी।

श्लोक 22 (skanda.3.105.22)

ते हन्यमाना रिपवो राजपुत्रेण सायकैः ॥ तमभिद्रुत्य वेगेन शरैर्विव्यधुरुल्बणैः

te hanyamānā ripavo rājaputreṇa sāyakaiḥ tamabhidrutya vegena śarairvivyadhurulbaṇaiḥ

राजपुत्र के बाणों से मारे जाते हुए वे शत्रु, वेगपूर्वक उस पर टूट पड़े और उग्र बाणों से उसे बींध डाला।

श्लोक 23 (skanda.3.105.23)

हन्यमानोऽस्त्रपूगेन रिपुभिर्युद्धदुर्मदैः ॥ न चचाल रणे धीरः शिववर्माभिरक्षितः

hanyamāno'strapūgena ripubhiryuddhadurmadaiḥ na cacāla raṇe dhīraḥ śivavarmābhirakṣitaḥ

युद्ध में उन्मत्त शत्रुओं के अस्त्र-समूहों से आहत होते हुए भी, वह धीर, शिवकवच से सुरक्षित, युद्ध में विचलित नहीं हुआ।

श्लोक 24 (skanda.3.105.24)

सोऽस्त्रकर्षं प्रसह्याशु प्रविश्य गजलीलया ॥ जघानाशु रथान्नागान्पदातीनपि भूरिशः

so'strakarṣaṁ prasahyāśu praviśya gajalīlayā jaghānāśu rathānnāgānpadātīnapi bhūriśaḥ

वह हाथी की लीला से उनके अस्त्र-आघात को बलपूर्वक सहते हुए प्रविष्ट हुआ, और शीघ्र ही रथियों, हाथियों और अनेक पैदल सैनिकों को मार डाला।

श्लोक 25 (skanda.3.105.25)

तत्रैकं रथिनं हत्वा ससूतं नृपनंदनः ॥ तमेव रथमास्थाय वैश्यनंदनसारथिः ॥ विचचार रणे धीरः सिंहो मृगकुलं यथा

tatraikaṁ rathinaṁ hatvā sasūtaṁ nṛpanaṁdanaḥ tameva rathamāsthāya vaiśyanaṁdanasārathiḥ vicacāra raṇe dhīraḥ siṁho mṛgakulaṁ yathā

वहाँ एक रथी को सारथी सहित मारकर, उस राजपुत्र ने उसी रथ पर चढ़कर, वैश्यपुत्र को सारथी बनाकर, धीरतापूर्वक युद्धभूमि में विचरण किया, जैसे सिंह मृगों के झुण्ड में।

श्लोक 26 (skanda.3.105.26)

अथ सर्वे सुसंरब्धाः शूराः प्रोद्यतकार्मुकाः ॥ अभिसस्रुस्तमेवैकं चमूपा बलशालिनः

atha sarve susaṁrabdhāḥ śūrāḥ prodyatakārmukāḥ abhisasrustamevaikaṁ camūpā balaśālinaḥ

फिर सभी क्रुद्ध, धनुष उठाए, बलशाली वीर सेनापति, उस अकेले पर ही टूट पड़े।

श्लोक 27 (skanda.3.105.27)

तेषामापततामग्रे खड्गमुद्यम्य दारुणम् ॥ अभ्युद्ययौ महावीरान्दर्शयन्निव पौरुषम्

teṣāmāpatatāmagre khaḍgamudyamya dāruṇam abhyudyayau mahāvīrāndarśayanniva pauruṣam

उनके सामने आते ही, भयंकर खड्ग उठाकर, वह महावीरों की ओर मानो पौरुष दिखाता हुआ आगे बढ़ा।

श्लोक 28 (skanda.3.105.28)

करालांतकजिह्वाभं तस्य खड्गं महोज्ज्वलम् ॥ दृष्ट्वैव सहसा मम्रुश्च मूपास्तत्प्रभावतः

karālāṁtakajihvābhaṁ tasya khaḍgaṁ mahojjvalam dṛṣṭvaiva sahasā mamruśca mūpāstatprabhāvataḥ

मृत्यु की भयंकर जिह्वा के समान उसके उस अत्यन्त उज्ज्वल खड्ग को देखते ही, उसके प्रभाव से सेनापति तत्काल मर गए।

श्लोक 29 (skanda.3.105.29)

येये पश्यंति तं खड्गं प्रस्फुरंतं रणांगणे ॥ ते सर्वे निधनं जग्मुर्वज्रं प्राप्येव कीटकः

yeye paśyaṁti taṁ khaḍgaṁ prasphuraṁtaṁ raṇāṁgaṇe te sarve nidhanaṁ jagmurvajraṁ prāpyeva kīṭakaḥ

जो-जो रणभूमि में चमकते उस खड्ग को देखते थे, वे सभी उसी प्रकार मृत्यु को प्राप्त हुए जैसे वज्र को पाकर कीट।

श्लोक 30 (skanda.3.105.30)

अथासौ सर्वसैन्यानां विनाशाय महाभुजः ॥ शंखं दध्मौ महारावं पूरयन्निव रोदसी

athāsau sarvasainyānāṁ vināśāya mahābhujaḥ śaṁkhaṁ dadhmau mahārāvaṁ pūrayanniva rodasī

फिर उस महाबाहु ने समस्त सेनाओं के विनाश के लिए, मानो आकाश और पृथ्वी को भरता हुआ, महाध्वनिवाला शंख बजाया।

श्लोक 31 (skanda.3.105.31)

तेन शंखनिनादेन विषाक्तेनैव भूयसा ॥ श्रुतमात्रेण रिपवो मूर्च्छिताः पतिता भुवि

tena śaṁkhaninādena viṣāktenaiva bhūyasā śrutamātreṇa ripavo mūrcchitāḥ patitā bhuvi

उस अत्यन्त विषैले शंखनाद को सुनते ही शत्रु मूर्च्छित होकर भूमि पर गिर पड़े।

श्लोक 32 (skanda.3.105.32)

येऽश्वपृष्ठे रथे ये च ये च दंतिषु संस्थिताः॥ ते विसंज्ञाः क्षणात्पेतुः शंखनादहतौजसः

ye'śvapṛṣṭhe rathe ye ca ye ca daṁtiṣu saṁsthitāḥ te visaṁjñāḥ kṣaṇātpetuḥ śaṁkhanādahataujasaḥ

जो अश्वपृष्ठ पर, जो रथ में, और जो हाथियों पर स्थित थे, वे सभी शंखनाद से तेज हरे जाकर क्षणभर में चेतनाहीन होकर गिर पड़े।

श्लोक 33 (skanda.3.105.33)

तान्भूमौ पतितान्सर्वान्नष्टसंज्ञा न्निरायुधान्॥ विगणय्य शवप्रायाननावधीद्धर्मशास्त्रवित्

tānbhūmau patitānsarvānnaṣṭasaṁjñā nnirāyudhān vigaṇayya śavaprāyānanāvadhīddharmaśāstravit

भूमि पर गिरे हुए, चेतनाहीन, निरायुध, शवप्राय उन सभी को गिनकर, धर्मशास्त्र के ज्ञाता उस राजपुत्र ने उन्हें नहीं मारा।

श्लोक 34 (skanda.3.105.34)

आत्मनः पितरं बद्धं मोचयित्वा रणाजिरे॥ तत्पत्नीः शत्रुवशगाः सर्वाः सद्यो व्यमोचयत्

ātmanaḥ pitaraṁ baddhaṁ mocayitvā raṇājire tatpatnīḥ śatruvaśagāḥ sarvāḥ sadyo vyamocayat

रणभूमि में अपने बँधे हुए पिता को मुक्त कराकर, उसने शत्रुओं के वश में पड़ी उसकी सभी पत्नियों को तत्काल मुक्त कराया।

श्लोक 35 (skanda.3.105.35)

पत्नीश्च मंत्रिमुख्यानां तथान्येषां पुरौकसाम् ॥ स्त्रियो बालांश्च कन्याश्च गोधनादीन्यनेकशः

patnīśca maṁtrimukhyānāṁ tathānyeṣāṁ puraukasām striyo bālāṁśca kanyāśca godhanādīnyanekaśaḥ

मुख्य मन्त्रियों और अन्य नगरवासियों की पत्नियों, स्त्रियों, बालकों, कन्याओं और अनेक गोधन को,

श्लोक 36 (skanda.3.105.36)

मोचयित्वा रिपुभयात्तमाश्वासयदाकुलः ॥ अथारिसैन्येषु चरंस्तेषां जग्राह योषितः

mocayitvā ripubhayāttamāśvāsayadākulaḥ athārisainyeṣu caraṁsteṣāṁ jagrāha yoṣitaḥ

शत्रु के भय से मुक्त कराकर, व्याकुल होते हुए उन्हें आश्वस्त किया; फिर शत्रु-सेना में विचरण करते हुए, उसने उनकी स्त्रियों को भी पकड़ लिया,

श्लोक 37 (skanda.3.105.37)

मरुन्मनोजवानश्वान्मातंगान्गिरिसन्निभान् ॥ स्यंदनानि च रौक्माणि दासीश्च रुचिराननाः

marunmanojavānaśvānmātaṁgāngirisannibhān syaṁdanāni ca raukmāṇi dāsīśca rucirānanāḥ

मन के समान वेगवाले घोड़ों को, पर्वत के समान हाथियों को, स्वर्णमय रथों को और सुन्दर मुखवाली दासियों को —

श्लोक 38 (skanda.3.105.38)

युग्मम् ॥ सर्वमाहृत्य वेगेन गृहीत्वा तद्धनं बहु ॥ मागधेशं हेमरथं निर्बबंध पराजितम्

yugmam sarvamāhṛtya vegena gṛhītvā taddhanaṁ bahu māgadheśaṁ hemarathaṁ nirbabaṁdha parājitam

यह सब वेगपूर्वक लाकर, उनका बहुत सा धन ग्रहण करके, उसने पराजित मगधेश हेमरथ को बाँध लिया।

श्लोक 39 (skanda.3.105.39)

तन्मंत्रिणश्च भूपांश्च तत्र मुख्यांश्च नायकान्॥ गृहीत्वा तरसा बद्ध्वा पुरीं प्रावेशयद्द्रुतम्

tanmaṁtriṇaśca bhūpāṁśca tatra mukhyāṁśca nāyakān gṛhītvā tarasā baddhvā purīṁ prāveśayaddrutam

उसके मन्त्रियों, राजाओं और वहाँ के प्रमुख सेनापतियों को शीघ्र पकड़कर बाँधकर, वह तुरन्त नगरी में प्रविष्ट हुआ।

श्लोक 40 (skanda.3.105.40)

पूर्वं ये समरे भग्ना विवृत्ताः सर्वतोदिशम् ॥ ते मंत्रिमुख्या विश्वस्ता नायकाश्च समाययुः

pūrvaṁ ye samare bhagnā vivṛttāḥ sarvatodiśam te maṁtrimukhyā viśvastā nāyakāśca samāyayuḥ

पहले युद्ध में टूटकर, सब दिशाओं में भाग गए वे मुख्य मन्त्री और सेनापति, आश्वस्त होकर वापस आए।

श्लोक 41 (skanda.3.105.41)

कुमारविक्रमं दृष्ट्वा सर्वे विस्मितमानसाः ॥ तं मेनिरे सुरश्रेष्ठं कारणादागतं भुवम्

kumāravikramaṁ dṛṣṭvā sarve vismitamānasāḥ taṁ menire suraśreṣṭhaṁ kāraṇādāgataṁ bhuvam

कुमार के इस पराक्रम को देखकर, सभी विस्मित मन से, उसे भूमि पर किसी कारणवश आए हुए देवश्रेष्ठ मानने लगे।

श्लोक 42 (skanda.3.105.42)

अहो नः सुमहाभाग्यमहो नस्तपसः फलम् ॥ केनाप्यनेन वीरेण मृताः संजीविताः खलु

aho naḥ sumahābhāgyamaho nastapasaḥ phalam kenāpyanena vīreṇa mṛtāḥ saṁjīvitāḥ khalu

"अहो, यह हमारा कितना बड़ा सौभाग्य है! अहो, यह हमारे तप का फल है! इस वीर के द्वारा मृत लोग भी निश्चय ही पुनर्जीवित हो गए हैं!

श्लोक 43 (skanda.3.105.43)

एष किं योगसिद्धो वा तपःसिद्धो ऽथवाऽमरः ॥ अमानुषमिद कर्म यदनेन कृतं महत्

eṣa kiṁ yogasiddho vā tapaḥsiddho 'thavā'maraḥ amānuṣamida karma yadanena kṛtaṁ mahat

"क्या यह योगसिद्ध है, या तपःसिद्ध है, अथवा अमर देव है? यह जो महान कार्य उसने किया है, वह अमानुष है।

श्लोक 44 (skanda.3.105.44)

नूनमस्य भवेन्माता सा गौरीति शिवः पिता ॥ अक्षौहिणीनां नवकं जिगायानंतशक्तिधृक्

nūnamasya bhavenmātā sā gaurīti śivaḥ pitā akṣauhiṇīnāṁ navakaṁ jigāyānaṁtaśaktidhṛk

"निश्चय ही इसकी माता गौरी और पिता शिव होंगे; अनन्त शक्तिधारी इसने नौ अक्षौहिणी सेना को जीत लिया।"

श्लोक 45 (skanda.3.105.45)

इत्याश्चर्ययुतैर्हृष्टैः प्रशंसद्भिः परस्परम् ॥ पृष्टोऽमात्यजनेनासावात्मानं प्राह तत्त्वतः

ityāścaryayutairhṛṣṭaiḥ praśaṁsadbhiḥ parasparam pṛṣṭo'mātyajanenāsāvātmānaṁ prāha tattvataḥ

इस प्रकार आश्चर्य से भरे, प्रसन्न, परस्पर प्रशंसा करते हुए उन लोगों द्वारा, मन्त्रियों से पूछे जाने पर, उसने सच-सच अपना परिचय दिया।

श्लोक 46 (skanda.3.105.46)

समागतं स्वपितरं विस्मयाह्लादविप्लुतम् ॥ मुंचंतमानंदजलं ववंदे प्रेमविह्वलः

samāgataṁ svapitaraṁ vismayāhlādaviplutam muṁcaṁtamānaṁdajalaṁ vavaṁde premavihvalaḥ

आश्चर्य और आनन्द से अभिभूत, आनन्द के आँसू बहाते अपने आए हुए पिता को, प्रेम से विह्वल होकर उसने प्रणाम किया।

श्लोक 47 (skanda.3.105.47)

स राजा निजपुत्रेण प्रणयादभिवंदितः ॥ आश्लिष्य गाढं तरसा बभाषे प्रेमकातरः

sa rājā nijaputreṇa praṇayādabhivaṁditaḥ āśliṣya gāḍhaṁ tarasā babhāṣe premakātaraḥ

वह राजा अपने पुत्र द्वारा प्रेमपूर्वक अभिवादित होकर, उसे दृढ़ता से गले लगाकर, प्रेम से व्याकुल होकर बोला —

श्लोक 48 (skanda.3.105.48)

कस्त्वं देवो मनुष्यो वा गन्धर्वो वा महामते ॥ का माता जनकः को वा को देशस्तव नाम किम्

kastvaṁ devo manuṣyo vā gandharvo vā mahāmate kā mātā janakaḥ ko vā ko deśastava nāma kim

"तुम कौन हो — देव, मनुष्य या गन्धर्व, हे महामते? कौन तुम्हारी माता है, कौन पिता, कौन-सा तुम्हारा देश है, तुम्हारा नाम क्या है?

श्लोक 49 (skanda.3.105.49)

कस्मान्न शत्रुभिर्बद्धान्मृतानिव हतौजसः ॥ कारुण्यादिह संप्राप्य सपत्नीकान्मुमोच यः

kasmānna śatrubhirbaddhānmṛtāniva hataujasaḥ kāruṇyādiha saṁprāpya sapatnīkānmumoca yaḥ

"किस कारण से, यहाँ शत्रुओं द्वारा बँधे, मृततुल्य, तेजहीन हम सबको, अपनी पत्नियों सहित, करुणावश तुमने मुक्त किया?

श्लोक 50 (skanda.3.105.50)

कुतो लब्धमिदं शौर्यं धैर्यं तेजो बलोन्नतिः ॥ जिगीषसीव लोकांस्त्रीन्सदेवासुरमानुषान्

kuto labdhamidaṁ śauryaṁ dhairyaṁ tejo balonnatiḥ jigīṣasīva lokāṁstrīnsadevāsuramānuṣān

"यह शौर्य, यह धैर्य, यह तेज, यह बल की उन्नति तुमने कहाँ से प्राप्त की? तुम मानो देवों, असुरों और मनुष्यों सहित तीनों लोकों को जीतने की इच्छा रखते हो।

श्लोक 51 (skanda.3.105.51)

अपि जन्मसहस्रेण तवानृण्यं महौजसः ॥ कर्तुं नाहं समर्थोस्मि सहैभिर्दारबांधवैः

api janmasahasreṇa tavānṛṇyaṁ mahaujasaḥ kartuṁ nāhaṁ samarthosmi sahaibhirdārabāṁdhavaiḥ

"हजार जन्मों में भी मैं तुम्हारे इस महातेजस्वी उपकार का ऋण, इन अपनी पत्नियों और बन्धुओं सहित, चुकाने में समर्थ नहीं हूँ।

श्लोक 52 (skanda.3.105.52)

इमान्पुत्रानिमाः पत्नीरिदं राज्यमिदं पुरम् ॥ सर्वं विहाय मच्चित्तं त्वय्येव प्रेमबंधनम्

imānputrānimāḥ patnīridaṁ rājyamidaṁ puram sarvaṁ vihāya maccittaṁ tvayyeva premabaṁdhanam

"इन पुत्रों, इन पत्नियों, इस राज्य, इस नगर को — इन सबको छोड़कर, मेरा चित्त तुम्हारे ही प्रति प्रेम-बन्धन में बँध गया है।

श्लोक 53 (skanda.3.105.53)

सर्वं कथय मे तात मत्प्राणपरिरक्षक ॥ एतासां मम पत्नीनां त्वदधीनं हि जीवितम्

sarvaṁ kathaya me tāta matprāṇaparirakṣaka etāsāṁ mama patnīnāṁ tvadadhīnaṁ hi jīvitam

"हे तात! मेरे प्राणरक्षक! मुझे सब कुछ बताओ; इन मेरी पत्नियों का जीवन तुम्हारे ही अधीन है।"

श्लोक 54 (skanda.3.105.54)

सूत उवाच ॥ इति पृष्टः स भद्रायुः स्वपित्रा तमभाषत ॥ एष वैश्यसुतो राजन्सुनयो नाम मत्सखा

sūta uvāca iti pṛṣṭaḥ sa bhadrāyuḥ svapitrā tamabhāṣata eṣa vaiśyasuto rājansunayo nāma matsakhā

सूत जी ने कहा — इस प्रकार अपने पिता द्वारा पूछे जाने पर, भद्रायु ने उससे कहा — "हे राजन्! यह वैश्यपुत्र सुनय नाम का मेरा सखा है।

श्लोक 55 (skanda.3.105.55)

अहमस्य गृहे रम्ये वसामि सहमातृकः ॥ भद्रायुर्नाम मद्वृत्तं पश्चाद्विज्ञापयामि ते

ahamasya gṛhe ramye vasāmi sahamātṛkaḥ bhadrāyurnāma madvṛttaṁ paścādvijñāpayāmi te

"मैं इसके सुन्दर घर में अपनी माता सहित रहता हूँ; भद्रायु नामक अपना वृत्तान्त मैं आपको बाद में बताऊँगा।

श्लोक 56 (skanda.3.105.56)

पुरं प्रविश्य भद्रं ते सदारः ससुहृज्जनः ॥ त्यक्त्वा भयमरातिभ्यो विहरस्व यथासुखम्

puraṁ praviśya bhadraṁ te sadāraḥ sasuhṛjjanaḥ tyaktvā bhayamarātibhyo viharasva yathāsukham

"नगर में प्रवेश करके, आपका कल्याण हो, पत्नी और मित्रों सहित शत्रुओं से भय त्यागकर सुखपूर्वक विहार करें।

श्लोक 57 (skanda.3.105.57)

नैतान्मुंच रिपूंस्तावद्यावदागमनं मम ॥ अहमद्य गमिष्यामि शीघ्रमात्मनिवेशनम्

naitānmuṁca ripūṁstāvadyāvadāgamanaṁ mama ahamadya gamiṣyāmi śīghramātmaniveśanam

"इन शत्रुओं को तब तक मत छोड़ें, जब तक मैं वापस न आऊँ; मैं आज शीघ्र अपने निवास स्थान को जाऊँगा।"

श्लोक 58 (skanda.3.105.58)

इत्युक्त्वा नृपमामंत्र्य भद्रायुर्नृपनंदनः ॥ आजगाम स्वभवनं मात्रे सर्वं न्यवेदयत्

ityuktvā nṛpamāmaṁtrya bhadrāyurnṛpanaṁdanaḥ ājagāma svabhavanaṁ mātre sarvaṁ nyavedayat

यह कहकर राजा से विदा लेकर, राजकुमार भद्रायु अपने घर आया और अपनी माता को सब कुछ बता दिया।

श्लोक 59 (skanda.3.105.59)

सापि हृष्टा स्वतनयं परिरेभेऽश्रुलोचना ॥ स च वैश्यपतिः प्रेम्णा परिष्वज्याभ्यपूजयत्

sāpi hṛṣṭā svatanayaṁ parirebhe'śrulocanā sa ca vaiśyapatiḥ premṇā pariṣvajyābhyapūjayat

वह भी प्रसन्न होकर अपने पुत्र को आँसू भरे नेत्रों से गले लगा लिया; और वह वैश्यपति भी प्रेमपूर्वक गले लगाकर उसका सम्मान किया।

श्लोक 60 (skanda.3.105.60)

वज्रबाहुश्च राजेंद्रः प्रविष्टो निजमंदिरम् ॥ स्त्रीपुत्रामात्य सहितः प्रहर्षमतुलं ययौ

vajrabāhuśca rājeṁdraḥ praviṣṭo nijamaṁdiram strīputrāmātya sahitaḥ praharṣamatulaṁ yayau

और राजा वज्रबाहु अपने भवन में प्रविष्ट होकर, पत्नियों, पुत्रों और मन्त्रियों सहित अतुल हर्ष को प्राप्त हुआ।

श्लोक 61 (skanda.3.105.61)

तस्यां निशायां व्युष्टायामृषभो योगिनां वरः ॥ चंद्रांगदं समागत्य सीमंतिन्याः पतिं नृपम्

tasyāṁ niśāyāṁ vyuṣṭāyāmṛṣabho yogināṁ varaḥ caṁdrāṁgadaṁ samāgatya sīmaṁtinyāḥ patiṁ nṛpam

उस रात्रि के बीतने पर, योगियों में श्रेष्ठ ऋषभ, सीमन्तिनी के पति राजा चन्द्रांगद के पास आकर,

श्लोक 62 (skanda.3.105.62)

भद्रायुषः समुत्पत्तिं तस्य कर्माप्यमानुषम् ॥ आवेद्य रहसि प्रेम्णा त्वत्सुतां कीर्तिमालिनीम्

bhadrāyuṣaḥ samutpattiṁ tasya karmāpyamānuṣam āvedya rahasi premṇā tvatsutāṁ kīrtimālinīm

भद्रायु की उत्पत्ति और उसके अमानुष कर्म को एकान्त में प्रेमपूर्वक बताकर, "अपनी पुत्री कीर्तिमालिनी

श्लोक 63 (skanda.3.105.63)

भद्रायुषे प्रयच्छेति बोधयित्वा च नैषधम् ॥ ऋषभो निर्जगामाथ देशकालार्थतत्त्ववित्

bhadrāyuṣe prayaccheti bodhayitvā ca naiṣadham ṛṣabho nirjagāmātha deśakālārthatattvavit

भद्रायु को दे दो" — यह कहकर निषधराज को उपदेश देकर, देश-काल-अर्थ-तत्त्व के ज्ञाता ऋषभ वहाँ से चले गए।

श्लोक 64 (skanda.3.105.64)

विशेषकम् ॥ अथ चंद्रांगदो राजा मुहूर्त्ते मंगलोचिते ॥ भद्रायुषं समाहूय प्रायच्छत्कीर्त्तिमालिनीम्

viśeṣakam atha caṁdrāṁgado rājā muhūrtte maṁgalocite bhadrāyuṣaṁ samāhūya prāyacchatkīrttimālinīm

फिर राजा चन्द्रांगद ने शुभ मुहूर्त में भद्रायु को बुलाकर कीर्तिमालिनी को उसे दे दिया।

श्लोक 65 (skanda.3.105.65)

कृतोद्वाहः स राजेंद्रतनयः सह भार्यया ॥ हेमासनस्थः शुशुभे रोहिण्येव निशाकरः

kṛtodvāhaḥ sa rājeṁdratanayaḥ saha bhāryayā hemāsanasthaḥ śuśubhe rohiṇyeva niśākaraḥ

वह विवाहित राजकुमार अपनी पत्नी सहित स्वर्णासन पर बैठा, रोहिणी के साथ चन्द्रमा के समान सुशोभित हुआ।

श्लोक 66 (skanda.3.105.66)

वज्रबाहुं तत्पितरं समाहूय स नैषधः ॥ पुरं प्रवेश्य सामात्यः प्रत्युद्गम्याभ्यपूजयत्

vajrabāhuṁ tatpitaraṁ samāhūya sa naiṣadhaḥ puraṁ praveśya sāmātyaḥ pratyudgamyābhyapūjayat

उस निषधराज ने वज्रबाहु, उसके पिता को बुलाकर, मन्त्रियों सहित नगर में प्रवेश कराकर, आगे बढ़कर उसका सम्मान किया।

श्लोक 67 (skanda.3.105.67)

तत्रापश्यत्कृतोद्वाहं भद्रायुषमरिंदमम् ॥ पादयोः पतितं प्रेम्णा हर्षात्तं परिषस्वजे

tatrāpaśyatkṛtodvāhaṁ bhadrāyuṣamariṁdamam pādayoḥ patitaṁ premṇā harṣāttaṁ pariṣasvaje

वहाँ उसने विवाहित शत्रुदमन भद्रायु को देखा; प्रेमपूर्वक उसके चरणों में गिरे उसे हर्षपूर्वक गले लगाया।

श्लोक 68 (skanda.3.105.68)

एष मे प्राणदो वीर एष शत्रुनिषूदनः ॥ अथाप्यज्ञातवंशोऽयं मयानंतपराक्रमः

eṣa me prāṇado vīra eṣa śatruniṣūdanaḥ athāpyajñātavaṁśo'yaṁ mayānaṁtaparākramaḥ

"यह मेरा प्राणदाता वीर है, यह शत्रुनाशक है; फिर भी इसका वंश मुझे अज्ञात है, यह अनन्त पराक्रमी।

श्लोक 69 (skanda.3.105.69)

एष ते नृप जामाता चंद्रांगद महाबलः ॥ अस्य वंशमथोत्पत्तिं श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः

eṣa te nṛpa jāmātā caṁdrāṁgada mahābalaḥ asya vaṁśamathotpattiṁ śrotumicchāmi tattvataḥ

"हे राजन्! यह महाबली चन्द्रांगद तुम्हारा जामाता है; मैं इसका वंश और उत्पत्ति सच-सच सुनना चाहता हूँ।"

श्लोक 70 (skanda.3.105.70)

इत्थं दशार्णराजेन प्रार्थितो निषधाधिपः ॥ विविक्त उपसंगम्य प्रहसन्निदमब्रवीत्

itthaṁ daśārṇarājena prārthito niṣadhādhipaḥ vivikta upasaṁgamya prahasannidamabravīt

इस प्रकार दशार्णराज द्वारा प्रार्थना किए जाने पर, निषधाधिपति एकान्त में जाकर मुस्कुराते हुए यह बोले —

श्लोक 71 (skanda.3.105.71)

एष ते तनयो राजञ्छैशवे रोगपीडितः ॥ त्वया वने परित्यक्तः सह मात्रा रुजार्तया

eṣa te tanayo rājañchaiśave rogapīḍitaḥ tvayā vane parityaktaḥ saha mātrā rujārtayā

"हे राजन्! यह तुम्हारा ही पुत्र है, जो बचपन में रोग से पीड़ित होने पर, तुमने वन में अपनी रोगग्रस्त माता सहित त्याग दिया था।

श्लोक 72 (skanda.3.105.72)

परिभ्रमंती विपिने सा नारी शिशुनामुना ॥ दैवाद्वैश्यगृहं प्राप्ता तेन वैश्येन रक्षिता

paribhramaṁtī vipine sā nārī śiśunāmunā daivādvaiśyagṛhaṁ prāptā tena vaiśyena rakṣitā

"वन में भटकती हुई वह स्त्री, इस शिशु सहित, दैवयोग से वैश्य के घर पहुँची, और उस वैश्य द्वारा सुरक्षित हुई।

श्लोक 73 (skanda.3.105.73)

अथासौ बहुरोगार्तो मृतस्तव कुमारकः ॥ केनापि योगिराजेन मृतः संजीवितः पुनः

athāsau bahurogārto mṛtastava kumārakaḥ kenāpi yogirājena mṛtaḥ saṁjīvitaḥ punaḥ

"फिर अनेक रोगों से पीड़ित यह तुम्हारा कुमार मर गया; किसी योगिराज द्वारा वह मृत पुनः जीवित कर दिया गया।

श्लोक 74 (skanda.3.105.74)

ऋषभाख्यस्य तस्यैव प्रभावाच्छिवयोगिनः ॥ रूपं च देवसदृशं प्राप्तौ मातृकुमारकौ

ṛṣabhākhyasya tasyaiva prabhāvācchivayoginaḥ rūpaṁ ca devasadṛśaṁ prāptau mātṛkumārakau

"उसी ऋषभ नामक शिवयोगी के प्रभाव से, माता और पुत्र दोनों ने देवतुल्य रूप प्राप्त किया।

श्लोक 75 (skanda.3.105.75)

तेन दत्तेन खड्गेन शंखेन रिपुघातिना ॥ जिगाय समरे शत्रूञ्छिववर्माभिरक्षितः

tena dattena khaḍgena śaṁkhena ripughātinā jigāya samare śatrūñchivavarmābhirakṣitaḥ

"उसके द्वारा दिए गए शत्रुनाशक खड्ग और शंख से, शिवकवच से सुरक्षित होकर, उसने युद्ध में शत्रुओं को जीत लिया।

श्लोक 76 (skanda.3.105.76)

द्विषट्सहस्रनागानां बलमेको बिभर्त्यसौ ॥ सर्वविद्यासु निष्णातो मम जामातृतां गतः

dviṣaṭsahasranāgānāṁ balameko bibhartyasau sarvavidyāsu niṣṇāto mama jāmātṛtāṁ gataḥ

"यह अकेला बारह हजार हाथियों का बल धारण करता है; समस्त विद्याओं में निष्णात यह मेरा जामाता बना है।

श्लोक 77 (skanda.3.105.77)

अत एनं समादाय मातरं चास्य सुव्रताम्॥ गच्छस्व नगरीं राजन्प्राप्स्यसि श्रेय उत्तमम्

ata enaṁ samādāya mātaraṁ cāsya suvratām gacchasva nagarīṁ rājanprāpsyasi śreya uttamam

"अतः इसे और इसकी सुव्रता माता को लेकर, हे राजन्! अपनी नगरी को जाओ, तुम्हें परम कल्याण प्राप्त होगा।"

श्लोक 78 (skanda.3.105.78)

इति चंद्रांगदः सर्वमाख्यायांतर्गृहे स्थिताम् ॥ तस्याग्र पत्नीमाहूय दर्शयामास भूषिताम्

iti caṁdrāṁgadaḥ sarvamākhyāyāṁtargṛhe sthitām tasyāgra patnīmāhūya darśayāmāsa bhūṣitām

इस प्रकार चन्द्रांगद ने सब कुछ बताकर, अन्तःपुर में स्थित अपनी उस ज्येष्ठ पत्नी को बुलाकर, आभूषित करके उसे दिखाया।

श्लोक 79 (skanda.3.105.79)

इत्यादि सर्वमाकर्ण्य दृष्ट्वा च स महीपतिः ॥ व्रीडितो नितरां मौढ्यात्स्वकृतं कर्म गर्हयन्

ityādi sarvamākarṇya dṛṣṭvā ca sa mahīpatiḥ vrīḍito nitarāṁ mauḍhyātsvakṛtaṁ karma garhayan

यह सब सुनकर और देखकर वह राजा अपनी मूढ़ता से किए गए कर्म को कोसते हुए अत्यन्त लज्जित हुआ,

श्लोक 80 (skanda.3.105.80)

प्राप्तश्च परमानन्दं तयोर्दर्शनकौतुकात् ॥ पुलकांकितसर्वांगस्तावुभौ परिषस्वजे

prāptaśca paramānandaṁ tayordarśanakautukāt pulakāṁkitasarvāṁgastāvubhau pariṣasvaje

और उन दोनों के दर्शन के कौतुक से परम आनन्द को प्राप्त हुआ; रोमांचित सर्वांगवाला होकर उसने दोनों को गले लगाया।

श्लोक 81 (skanda.3.105.81)

युग्मम् ॥ एवं निषधराजेन पूजितश्चाभिनन्दितः ॥ स भोजयित्वा तं सम्यक्स्वयं च सह मंत्रिभिः

yugmam evaṁ niṣadharājena pūjitaścābhinanditaḥ sa bhojayitvā taṁ samyaksvayaṁ ca saha maṁtribhiḥ

इस प्रकार निषधराज द्वारा पूजित और अभिनन्दित होकर, उनके द्वारा और मन्त्रियों सहित स्वयं भी भलीभाँति भोजन कराए जाकर,

श्लोक 82 (skanda.3.105.82)

तामात्मनोग्रमहिषीं पुत्रं तमपि तां स्नुषाम् ॥ आदाय सपरीवारो वज्रबाहुः पुरीं ययौ

tāmātmanogramahiṣīṁ putraṁ tamapi tāṁ snuṣām ādāya saparīvāro vajrabāhuḥ purīṁ yayau

अपनी उस श्रेष्ठ पत्नी, उस पुत्र और उस पुत्रवधू को लेकर, परिवार सहित वज्रबाहु अपनी नगरी को गया।

श्लोक 83 (skanda.3.105.83)

स संभ्रमेण महता भद्रायुः पितृमंदिरम्॥ संप्राप्य परमानंदं चक्रे सर्वपुरौकसाम्

sa saṁbhrameṇa mahatā bhadrāyuḥ pitṛmaṁdiram saṁprāpya paramānaṁdaṁ cakre sarvapuraukasām

भद्रायु ने भी बड़े उत्साह से पिता के भवन पहुँचकर, समस्त नगरवासियों को परम आनन्द दिया।

श्लोक 84 (skanda.3.105.84)

कालेन दिवमारूढे पितरि प्राप्तयौवनः॥ भद्रायुः पृथिवीं सर्वां शशासाद्भुतविक्रमः

kālena divamārūḍhe pitari prāptayauvanaḥ bhadrāyuḥ pṛthivīṁ sarvāṁ śaśāsādbhutavikramaḥ

समय बीतने पर, पिता के स्वर्गारोहण करने पर, युवावस्था को प्राप्त भद्रायु ने अद्भुत पराक्रम से समस्त पृथ्वी का शासन किया।

श्लोक 85 (skanda.3.105.85)

मागधेशं हेमरथं मोचयामास बंधनात् ॥ संधाय मैत्रीं परमां ब्रह्मर्षीणां च सन्निधौ

māgadheśaṁ hemarathaṁ mocayāmāsa baṁdhanāt saṁdhāya maitrīṁ paramāṁ brahmarṣīṇāṁ ca sannidhau

उसने मगधेश हेमरथ को बन्धन से मुक्त कर दिया, ब्रह्मर्षियों की उपस्थिति में उसके साथ परम मित्रता स्थापित करके।

श्लोक 86 (skanda.3.105.86)

इत्थं त्रिलोकमहितां शिवयोगिपूजां कृत्वा पुरातनभवेऽपि स राजसूनुः ॥ निस्तीर्य दुःसहविपद्गणमाप्तराज्यश्चंद्रांगदस्य सुतया सह साधु रेमे

itthaṁ trilokamahitāṁ śivayogipūjāṁ kṛtvā purātanabhave'pi sa rājasūnuḥ nistīrya duḥsahavipadgaṇamāptarājyaścaṁdrāṁgadasya sutayā saha sādhu reme

इस प्रकार पूर्वजन्म में भी त्रिलोक-पूजित शिवयोगी की पूजा करके, उस राजपुत्र ने असह्य विपत्तियों के समूह को पार करके, राज्य प्राप्त करके, चन्द्रांगद की पुत्री के साथ सुखपूर्वक रमण किया।

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