ब्रह्म खण्ड · अध्याय 104
शिवकवच
श्लोक 1 (skanda.3.104.1)
॥ ऋषभ उवाच ॥ नमस्कृत्य महादेवं विश्वव्यापिनमीश्वरम् ॥ वक्ष्ये शिवमयं वर्म सर्वरक्षाकरं नृणाम्
ṛṣabha uvāca namaskṛtya mahādevaṁ viśvavyāpinamīśvaram vakṣye śivamayaṁ varma sarvarakṣākaraṁ nṛṇām
ऋषभ ने कहा — विश्वव्यापी ईश्वर महादेव को नमस्कार करके, मैं मनुष्यों की सर्वरक्षा करनेवाला शिवमय कवच कहूँगा।
श्लोक 2 (skanda.3.104.2)
शुचौ देशे समासीनो यथावत्कल्पितासनः ॥ जितेंद्रियो जितप्राणश्चिंतयेच्छिवमव्ययम्
śucau deśe samāsīno yathāvatkalpitāsanaḥ jiteṁdriyo jitaprāṇaściṁtayecchivamavyayam
पवित्र स्थान में बैठकर, विधिपूर्वक आसन लगाकर, इन्द्रियों और प्राणों को जीतकर, अव्यय शिव का ध्यान करना चाहिए।
श्लोक 3 (skanda.3.104.3)
हृत्पुंडरीकांतरसन्निविष्टं स्वतेजसा व्याप्तनभोवकाशम् ॥ अतींद्रियं सूक्ष्ममनंतमाद्यं ध्यायेत्परानंदमयं महेशम्
hṛtpuṁḍarīkāṁtarasanniviṣṭaṁ svatejasā vyāptanabhovakāśam atīṁdriyaṁ sūkṣmamanaṁtamādyaṁ dhyāyetparānaṁdamayaṁ maheśam
हृदयकमल के भीतर स्थित, अपने ही तेज से आकाश के समस्त विस्तार में व्याप्त, इन्द्रियों से परे, सूक्ष्म, अनन्त, आदि, परमानन्दमय महेश का ध्यान करना चाहिए।
श्लोक 4 (skanda.3.104.4)
ध्यानावधूताखिलकर्मबंधश्चिरं चिदानंदनिमग्नचेताः ॥ षडक्षरन्याससमाहितात्मा शैवेन कुर्या त्कवचेन रक्षाम्
dhyānāvadhūtākhilakarmabaṁdhaściraṁ cidānaṁdanimagnacetāḥ ṣaḍakṣaranyāsasamāhitātmā śaivena kuryā tkavacena rakṣām
ध्यान से समस्त कर्मबन्धन को दूर करके, चिरकाल तक चित्त को चिदानन्द में लीन रखते हुए, षडक्षर-न्यास से समाहित आत्मा होकर, शैव कवच से अपनी रक्षा करनी चाहिए।
श्लोक 5 (skanda.3.104.5)
मां पातु देवोऽखिलदेवतात्मा संसारकूपे पतितं गभीरे ॥ तन्नाम दिव्यं वरमंत्रमूलं धुनोतु मे सर्वमघं हृदिस्थम्
māṁ pātu devo'khiladevatātmā saṁsārakūpe patitaṁ gabhīre tannāma divyaṁ varamaṁtramūlaṁ dhunotu me sarvamaghaṁ hṛdistham
वे देव, जो समस्त देवताओं के आत्मा हैं, संसार के गहरे कुएँ में गिरे हुए मेरी रक्षा करें; उनका दिव्य नाम, श्रेष्ठ मन्त्र का मूल, मेरे हृदय में स्थित समस्त पाप को दूर करे।
श्लोक 6 (skanda.3.104.6)
सर्वत्र मां रक्षतु विश्वमूर्त्तिर्ज्योतिर्मयानंदघनश्चिदात्मा ॥ अणोरणीयानुरुशक्तिरेकः स ईश्वरः पातु भयादशेषात्
sarvatra māṁ rakṣatu viśvamūrttirjyotirmayānaṁdaghanaścidātmā aṇoraṇīyānuruśaktirekaḥ sa īśvaraḥ pātu bhayādaśeṣāt
विश्वमूर्ति, ज्योतिर्मय, आनन्दघन, चिदात्मा, अणु से भी अणु किन्तु महाशक्तिशाली वे एक ईश्वर, सर्वत्र मेरी रक्षा करें, समस्त भय से मुझे बचाएँ।
श्लोक 7 (skanda.3.104.7)
यो भूस्वरूपेण बिभर्ति विश्वं पायात्स भूमेर्गिरिशोऽष्टमूर्तिः ॥ योऽपां स्वरूपेण नृणां करोति संजीनं सोऽवतु मां जलेभ्यः
yo bhūsvarūpeṇa bibharti viśvaṁ pāyātsa bhūmergiriśo'ṣṭamūrtiḥ yo'pāṁ svarūpeṇa nṛṇāṁ karoti saṁjīnaṁ so'vatu māṁ jalebhyaḥ
जो भूमि-स्वरूप से विश्व को धारण करते हैं, वे अष्टमूर्ति गिरीश मुझे भूमि से रक्षा करें; जो जल-स्वरूप से मनुष्यों को जीवन देते हैं, वे मुझे जल से रक्षा करें।
श्लोक 8 (skanda.3.104.8)
कल्पावसाने भुवनानि दग्ध्वा सर्वाणि यो नृत्यति भूरिलीलः ॥ स कालरुद्रोऽवतु मां दवाग्नेर्वात्यादिभीतेरखिलाच्च तापात्
kalpāvasāne bhuvanāni dagdhvā sarvāṇi yo nṛtyati bhūrilīlaḥ sa kālarudro'vatu māṁ davāgnervātyādibhīterakhilācca tāpāt
कल्प के अन्त में समस्त लोकों को जलाकर जो विपुल लीला से नृत्य करते हैं, वे कालरुद्र मुझे दावाग्नि, आँधी आदि के भय और समस्त ताप से रक्षा करें।
श्लोक 9 (skanda.3.104.9)
प्रदीप्तविद्युत्कनकावभासो विद्यावराभीतिकुठारपाणिः॥ चतुर्मुखस्तत्पुरुषस्त्रिनेत्रः प्राच्यां स्थितं रक्षतु मामजस्रम्
pradīptavidyutkanakāvabhāso vidyāvarābhītikuṭhārapāṇiḥ caturmukhastatpuruṣastrinetraḥ prācyāṁ sthitaṁ rakṣatu māmajasram
दीप्त बिजली और स्वर्ण के समान कान्तिवाले, विद्या, वरद, अभय और परशु धारण किए हुए हाथोंवाले, चतुर्मुख, त्रिनेत्र तत्पुरुष पूर्व दिशा में स्थित मेरी सदा रक्षा करें।
श्लोक 10 (skanda.3.104.10)
कुठारवेदांकुशपाशशूलकपालढक्काक्षगुणान्दधानः ॥ चतुर्मुखो नीलरुचिस्त्रिनेत्रः पायादघोरो दिशि दक्षिणस्याम्
kuṭhāravedāṁkuśapāśaśūlakapālaḍhakkākṣaguṇāndadhānaḥ caturmukho nīlarucistrinetraḥ pāyādaghoro diśi dakṣiṇasyām
परशु, वेद, अंकुश, पाश, शूल, कपाल, डमरू और अक्षमाला धारण किए हुए, चतुर्मुख, नीलवर्ण, त्रिनेत्र अघोर दक्षिण दिशा में मेरी रक्षा करें।
श्लोक 11 (skanda.3.104.11)
कुंदेन्दुशंखस्फटिकावभासो वेदाक्षमालावरदाभयांकः ॥ त्र्यक्षश्चतुर्वक्त्र उरुप्रभावः सद्योधिजातोवतु मां प्रतीच्याम्
kuṁdenduśaṁkhasphaṭikāvabhāso vedākṣamālāvaradābhayāṁkaḥ tryakṣaścaturvaktra uruprabhāvaḥ sadyodhijātovatu māṁ pratīcyām
कुन्द, चन्द्र, शंख और स्फटिक के समान कान्तिवाले, वेद, अक्षमाला, वरद और अभय मुद्रा धारण किए हुए, त्र्यक्ष, चतुर्मुख, महाप्रभावशाली सद्योजात पश्चिम दिशा में मेरी रक्षा करें।
श्लोक 12 (skanda.3.104.12)
वराक्षमालाभयटंकहस्तः सरोजकिंजल्कसमानवर्णः ॥ त्रिलोचनश्चारुचतुर्मुखो मां पायादुदीच्यां दिशि वामदेवः
varākṣamālābhayaṭaṁkahastaḥ sarojakiṁjalkasamānavarṇaḥ trilocanaścārucaturmukho māṁ pāyādudīcyāṁ diśi vāmadevaḥ
श्रेष्ठ अक्षमाला, अभय और टंक धारण किए हुए हाथोंवाले, कमल के केसर के समान वर्णवाले, त्रिलोचन, सुन्दर चतुर्मुख वामदेव उत्तर दिशा में मेरी रक्षा करें।
श्लोक 13 (skanda.3.104.13)
वेदाभयेष्टांकुशटंकपाशकपालढक्काक्षकशूलपाणिः ॥ सितद्युतिः पंचमुखोऽवतान्मामीशान ऊर्द्ध्वं परमप्रकाशः
vedābhayeṣṭāṁkuśaṭaṁkapāśakapālaḍhakkākṣakaśūlapāṇiḥ sitadyutiḥ paṁcamukho'vatānmāmīśāna ūrddhvaṁ paramaprakāśaḥ
वेद, अभय, इष्ट, अंकुश, टंक, पाश, कपाल, डमरू, अक्षमाला और शूल धारण किए हुए हाथोंवाले, श्वेत कान्तिवाले, पंचमुख ईशान ऊपर से मेरी रक्षा करें, परम प्रकाशमय।
श्लोक 14 (skanda.3.104.14)
मूर्धानमव्यान्मम चंद्रमौ लिर्भालं ममाव्यादथ भालनेत्रः ॥ नेत्रे ममाव्याद्भगनेत्रहारी नासां सदा रक्षतु विश्वनाथः
mūrdhānamavyānmama caṁdramau lirbhālaṁ mamāvyādatha bhālanetraḥ netre mamāvyādbhaganetrahārī nāsāṁ sadā rakṣatu viśvanāthaḥ
चन्द्रमौलि मेरे मस्तक की रक्षा करें, भालनेत्र मेरे भाल की; भगदेव के नेत्रों को हरनेवाले मेरे नेत्रों की; विश्वनाथ सदा मेरी नासिका की रक्षा करें।
श्लोक 15 (skanda.3.104.15)
पायाच्छ्रुती मे श्रुतिगीतकीर्तिः कपोलमव्या त्सततं कपाली ॥ वक्त्रं सदा रक्षतु पंचवक्त्रो जिह्वां सदा रक्षतु वेदजिह्वः
pāyācchrutī me śrutigītakīrtiḥ kapolamavyā tsatataṁ kapālī vaktraṁ sadā rakṣatu paṁcavaktro jihvāṁ sadā rakṣatu vedajihvaḥ
श्रुतिगीतकीर्तिवाले मेरे कानों की रक्षा करें; कपाली सदा मेरे कपोलों की; पंचवक्त्र सदा मेरे मुख की रक्षा करें; वेदजिह्व सदा मेरी जिह्वा की रक्षा करें।
श्लोक 16 (skanda.3.104.16)
कंठं गिरीशोऽवतु नीलकंठः पाणिद्वयं पातु पिनाकपाणिः ॥ दोर्मूलमव्यान्मम धर्मबाहुर्वक्षःस्थलं दक्षमखांतकोऽव्यात्
kaṁṭhaṁ girīśo'vatu nīlakaṁṭhaḥ pāṇidvayaṁ pātu pinākapāṇiḥ dormūlamavyānmama dharmabāhurvakṣaḥsthalaṁ dakṣamakhāṁtako'vyāt
नीलकण्ठ गिरीश मेरे कण्ठ की रक्षा करें; पिनाकपाणि मेरे दोनों हाथों की; धर्मबाहु मेरे कन्धों की; दक्षयज्ञ-विनाशक मेरी छाती की रक्षा करें।
श्लोक 17 (skanda.3.104.17)
ममोदरं पातु गिरींद्रधन्वा मध्यं ममाव्यान्मदनान्तकारी ॥ हेरंबतातो मम पातु नाभिं पायात्कटी धूर्जटिरीश्वरो मे
mamodaraṁ pātu girīṁdradhanvā madhyaṁ mamāvyānmadanāntakārī heraṁbatāto mama pātu nābhiṁ pāyātkaṭī dhūrjaṭirīśvaro me
गिरीन्द्रधन्वा मेरे उदर की रक्षा करें; मदनान्तकारी मेरी कमर की; हेरम्ब के पिता मेरी नाभि की रक्षा करें; धूर्जटि ईश्वर मेरी कटि की रक्षा करें।
श्लोक 18 (skanda.3.104.18)
ऊरुद्वयं पातु कुबेरमित्रो जानुद्वयं मे जगदीश्वरोऽव्यात् ॥ जंघायुगं पुंगवकेतुरव्यात्पादौ ममाव्या त्सुरवंद्यपादः
ūrudvayaṁ pātu kuberamitro jānudvayaṁ me jagadīśvaro'vyāt jaṁghāyugaṁ puṁgavaketuravyātpādau mamāvyā tsuravaṁdyapādaḥ
कुबेर के मित्र मेरी दोनों जाँघों की रक्षा करें; जगदीश्वर मेरे दोनों घुटनों की; पुंगवकेतु मेरी दोनों पिंडलियों की; देवों द्वारा वन्दित चरणोंवाले मेरे दोनों पैरों की रक्षा करें।
श्लोक 19 (skanda.3.104.19)
महेश्वरः पातु दिनादियामे मां मध्ययामेऽवतु वामदेवः ॥ त्रियंबकः पातु तृतीययामे वृषध्वजः पातु दिनांत्ययामे
maheśvaraḥ pātu dinādiyāme māṁ madhyayāme'vatu vāmadevaḥ triyaṁbakaḥ pātu tṛtīyayāme vṛṣadhvajaḥ pātu dināṁtyayāme
महेश्वर दिन के प्रथम प्रहर में मेरी रक्षा करें; वामदेव मध्य प्रहर में; त्र्यम्बक तीसरे प्रहर में; वृषध्वज दिन के अन्तिम प्रहर में मेरी रक्षा करें।
श्लोक 20 (skanda.3.104.20)
पायान्निशादौ शशिशेखरो मां गंगाधरो रक्षतु मां निशीथे ॥ गौरीपतिः पातु निशावसाने मृत्युंजयो रक्षतु सर्वकालम्
pāyānniśādau śaśiśekharo māṁ gaṁgādharo rakṣatu māṁ niśīthe gaurīpatiḥ pātu niśāvasāne mṛtyuṁjayo rakṣatu sarvakālam
शशिशेखर रात्रि के आरम्भ में मेरी रक्षा करें; गंगाधर मध्यरात्रि में मेरी रक्षा करें; गौरीपति रात्रि के अन्त में मेरी रक्षा करें; मृत्युंजय सर्वकाल में मेरी रक्षा करें।
श्लोक 21 (skanda.3.104.21)
अंतःस्थितं रक्षतु शंकरो मां स्थाणुः सदा पातु बहिःस्थितं माम् ॥ तदंतरे पातु पतिः पशूनां सदा शिवो रक्षतु मां समंतात्
aṁtaḥsthitaṁ rakṣatu śaṁkaro māṁ sthāṇuḥ sadā pātu bahiḥsthitaṁ mām tadaṁtare pātu patiḥ paśūnāṁ sadā śivo rakṣatu māṁ samaṁtāt
शंकर भीतर स्थित मेरी रक्षा करें; स्थाणु सदा बाहर स्थित मेरी रक्षा करें; पशुपति उन दोनों के बीच मेरी रक्षा करें; शिव सदा चारों ओर से मेरी रक्षा करें।
श्लोक 22 (skanda.3.104.22)
तिष्ठंतमव्या द्भुवनैकनाथः पायाद्व्रजंतं प्रमथाधिनाथः ॥ वेदांतवेद्योऽवतु मान्निषण्णं मामव्ययः पातु शिवः शयानम्
tiṣṭhaṁtamavyā dbhuvanaikanāthaḥ pāyādvrajaṁtaṁ pramathādhināthaḥ vedāṁtavedyo'vatu mānniṣaṇṇaṁ māmavyayaḥ pātu śivaḥ śayānam
एकमात्र लोकनाथ ठहरे हुए मेरी रक्षा करें; प्रमथाधिनाथ चलते हुए मेरी रक्षा करें; वेदान्तवेद्य बैठे हुए मेरी रक्षा करें; अव्यय शिव सोते हुए मेरी रक्षा करें।
श्लोक 23 (skanda.3.104.23)
मार्गेषु मां रक्षतु नीलकंठः शैलादिदुर्गेषु पुरत्रयारिः ॥ अरण्यवासादिमहाप्रवासे पायान्मृगव्याध उदारशक्तिः
mārgeṣu māṁ rakṣatu nīlakaṁṭhaḥ śailādidurgeṣu puratrayāriḥ araṇyavāsādimahāpravāse pāyānmṛgavyādha udāraśaktiḥ
नीलकण्ठ मार्गों में मेरी रक्षा करें; त्रिपुरारि पर्वत आदि दुर्गों में मेरी रक्षा करें; वन-निवास आदि महाप्रवास में उदारशक्ति मृगव्याध मेरी रक्षा करें।
श्लोक 24 (skanda.3.104.24)
कल्पांतकाटोपपटुप्रकोपः स्फुटाट्टहासोच्चलितांडकोशः ॥ घोरारिसेनार्णवदुर्निवारमहाभयाद्रक्षतु वीरभद्रः
kalpāṁtakāṭopapaṭuprakopaḥ sphuṭāṭṭahāsoccalitāṁḍakośaḥ ghorārisenārṇavadurnivāramahābhayādrakṣatu vīrabhadraḥ
कल्पान्त के समान प्रचण्ड क्रोधवाले, प्रकट अट्टहास से ब्रह्माण्ड को कम्पित करनेवाले वीरभद्र, शत्रु-सेना के भयंकर, दुर्निवार सागर से उत्पन्न महाभय से मेरी रक्षा करें।
श्लोक 25 (skanda.3.104.25)
पत्त्यश्वमातंगघटावरूथसहस्रलक्षायुतकोटिभीषणम् ॥ अक्षौहिणीनां शतमाततायिनां छिंद्या न्मूढो घोरकुठारधारया
pattyaśvamātaṁgaghaṭāvarūthasahasralakṣāyutakoṭibhīṣaṇam akṣauhiṇīnāṁ śatamātatāyināṁ chiṁdyā nmūḍho ghorakuṭhāradhārayā
पैदल सैनिक, अश्व, हाथी, रथ के समूहों से सहस्रों-लाखों-करोड़ों में भयंकर, आततायियों की सौ अक्षौहिणी सेना को, वह मूढ़ भयंकर परशु की धार से काट डाले।
श्लोक 26 (skanda.3.104.26)
निहंतु दस्यून्प्रलयानलार्चिर्ज्वलत्त्रिशूलं त्रिपुरांतकस्य ॥ शार्दूलसिंहर्क्षवृकादिहिंस्रान्संत्रासयत्वीशधनुःपिनाकम्
nihaṁtu dasyūnpralayānalārcirjvalattriśūlaṁ tripurāṁtakasya śārdūlasiṁharkṣavṛkādihiṁsrānsaṁtrāsayatvīśadhanuḥpinākam
त्रिपुरान्तक का प्रलयाग्नि की ज्वालाओं के समान जलता हुआ त्रिशूल दस्युओं का नाश करे; ईश्वर का पिनाक धनुष व्याघ्र, सिंह, भालू, भेड़िये आदि हिंसक जन्तुओं को भयभीत करे।
श्लोक 27 (skanda.3.104.27)
दुःस्वप्नदुःशकुनदुर्गतिदौर्मनस्यदुर्भिक्षदुर्व्यसनदुःसहदुर्यशांसि। उत्पाततापविषभीतिमसद्ग्रहार्तिव्याधींश्च नाशयतु मे जगतामधीशः
duḥsvapnaduḥśakunadurgatidaurmanasyadurbhikṣadurvyasanaduḥsahaduryaśāṁsi utpātatāpaviṣabhītimasadgrahārtivyādhīṁśca nāśayatu me jagatāmadhīśaḥ
जगदीश्वर मेरे दुःस्वप्न, अपशकुन, दुर्गति, दुर्मनस्य, दुर्भिक्ष, कुव्यसन, असह्य अपयश, उत्पात, ताप, विष का भय, अशुभ ग्रह-पीड़ा और व्याधियों का नाश करें।
श्लोक 28 (skanda.3.104.28)
ओंनमो भगवते सदाशिवाय सकलतत्त्वात्मकाय सकलतत्त्वविहाराय सकललोकैककर्त्रे सकललौकैकभर्त्रे सकललोकैकहर्त्रे सकललोकैकगुरवे सकललोकैकसाक्षिणे सकलनिगमगुह्याय सकलवरप्रदाय सकलदुरितार्तिभंजनाय सकलजगदभयंकराय सकललोकैकशंकराय शशांकशेखराय शाश्व तनिजाभासाय निर्गुणाय निरुपमाय नीरूपाय निराभासाय निरामयाय निष्प्रपंचाय निष्कलंकाय निर्द्वंद्वाय निःसंगाय निर्मलाय निर्गमाय नित्यरूपविभवाय निरुपमविभवाय निराधाराय नित्यशुद्धबुद्धपरिपूर्णसच्चिदानंदाद्वयाय परमशांतप्रकाशतेजोरूपाय जयजय महारुद्र महारौद्र भद्रावतार दुःखदावदारण महाभैरव कालभैरव कल्पान्तभैरव कपालमालाधर खट्वांगखड्गचर्मपाशांकुशडमरुशूलचापबाणगदाशक्तिभिं डिपालतोमरमुसलमुद्गरपट्टिशपरशुपरिघभुशुंडीशतघ्नीचक्राद्यायुधभीषणकरसहस्र मुखदंष्ट्राकराल विकटाट्टहासविस्फारितब्रह्मामण्डल नागेंद्र कुण्डल नागेंद्रहार नागेंद्रवलय नागेंद्रचर्मधर मृत्युंजय त्र्यंबक त्रिपुरांतक विरूपाक्ष विश्वेश्वर विश्वरूप वृषभवाहन विषभूषण विश्वतोमुख सर्वतो रक्षरक्ष मां ज्वलज्वल महामृत्युभयमपमृत्युभयं नाशयनाशय रोगभयमुत्सादयोत्सादय विषसर्पभयं शमयशमय चोरभयं मारयमारय मम शत्रूनुच्चा टयोच्चाटय शूलेन विदारयविदारय कुठारेण भिंधिभिंधि खड्गेन छिंधिछिंधि खट्वांगेन विपोथयविपोथय मुसलेन निष्पेषयनिष्पेषय बाणैः संताडय संताडय रक्षांसि भीषयभीषय भूतानि विद्रावयविद्रावय कूष्मांडवेतालमारीगणब्रह्मराक्षसान्संत्रासयसंत्रासय ममाभयं कुरुकुरु वित्रस्तं मामाश्वास याश्वासय नरकभयान्मामुद्धारयोद्धारय संजीवयसंजीवय क्षुत्तृड्भ्यां मामाप्याययाप्यायय दुःखातुरं मामानन्दयानंदय शिवकवचेन मामाच्छादया च्छादय त्र्यंबक सदाशिव नमस्तेनमस्तेनमस्ते ॥ ऋषभ उवाच ॥ इत्येतत्कवचं शैवं वरदं व्याहृतं मया ॥ सर्वबाधाप्रशमनं रहस्यं सर्व देहिनाम्
oṁnamo bhagavate sadāśivāya sakalatattvātmakāya sakalatattvavihārāya sakalalokaikakartre sakalalaukaikabhartre sakalalokaikahartre sakalalokaikagurave sakalalokaikasākṣiṇe sakalanigamaguhyāya sakalavarapradāya sakaladuritārtibhaṁjanāya sakalajagadabhayaṁkarāya sakalalokaikaśaṁkarāya śaśāṁkaśekharāya śāśva tanijābhāsāya nirguṇāya nirupamāya nīrūpāya nirābhāsāya nirāmayāya niṣprapaṁcāya niṣkalaṁkāya nirdvaṁdvāya niḥsaṁgāya nirmalāya nirgamāya nityarūpavibhavāya nirupamavibhavāya nirādhārāya nityaśuddhabuddhaparipūrṇasaccidānaṁdādvayāya paramaśāṁtaprakāśatejorūpāya jayajaya mahārudra mahāraudra bhadrāvatāra duḥkhadāvadāraṇa mahābhairava kālabhairava kalpāntabhairava kapālamālādhara khaṭvāṁgakhaḍgacarmapāśāṁkuśaḍamaruśūlacāpabāṇagadāśaktibhiṁ ḍipālatomaramusalamudgarapaṭṭiśaparaśuparighabhuśuṁḍīśataghnīcakrādyāyudhabhīṣaṇakarasahasra mukhadaṁṣṭrākarāla vikaṭāṭṭahāsavisphāritabrahmāmaṇḍala nāgeṁdra kuṇḍala nāgeṁdrahāra nāgeṁdravalaya nāgeṁdracarmadhara mṛtyuṁjaya tryaṁbaka tripurāṁtaka virūpākṣa viśveśvara viśvarūpa vṛṣabhavāhana viṣabhūṣaṇa viśvatomukha sarvato rakṣarakṣa māṁ jvalajvala mahāmṛtyubhayamapamṛtyubhayaṁ nāśayanāśaya rogabhayamutsādayotsādaya viṣasarpabhayaṁ śamayaśamaya corabhayaṁ mārayamāraya mama śatrūnuccā ṭayoccāṭaya śūlena vidārayavidāraya kuṭhāreṇa bhiṁdhibhiṁdhi khaḍgena chiṁdhichiṁdhi khaṭvāṁgena vipothayavipothaya musalena niṣpeṣayaniṣpeṣaya bāṇaiḥ saṁtāḍaya saṁtāḍaya rakṣāṁsi bhīṣayabhīṣaya bhūtāni vidrāvayavidrāvaya kūṣmāṁḍavetālamārīgaṇabrahmarākṣasānsaṁtrāsayasaṁtrāsaya mamābhayaṁ kurukuru vitrastaṁ māmāśvāsa yāśvāsaya narakabhayānmāmuddhārayoddhāraya saṁjīvayasaṁjīvaya kṣuttṛḍbhyāṁ māmāpyāyayāpyāyaya duḥkhāturaṁ māmānandayānaṁdaya śivakavacena māmācchādayā cchādaya tryaṁbaka sadāśiva namastenamastenamaste ṛṣabha uvāca ityetatkavacaṁ śaivaṁ varadaṁ vyāhṛtaṁ mayā sarvabādhāpraśamanaṁ rahasyaṁ sarva dehinām
"ॐ नमो भगवते सदाशिवाय, सकल तत्त्वों के आत्मा को, सकल तत्त्वों में विहार करनेवाले को, सकल लोकों के एकमात्र कर्ता को, सकल लोकों के एकमात्र भर्ता को, सकल लोकों के एकमात्र संहारक को, सकल लोकों के एकमात्र गुरु को, सकल लोकों के एकमात्र साक्षी को, समस्त वेदों के रहस्यरूप को, समस्त वर देनेवाले को, समस्त दुरितों की पीड़ा हरनेवाले को, समस्त जगत को अभय देनेवाले को, समस्त लोकों के एकमात्र कल्याणकारी को, चन्द्रशेखर को, शाश्वत स्वप्रकाश को, निर्गुण को, निरुपम को, निराकार को, निराभास को, निरामय को, निष्प्रपंच को, निष्कलंक को, निर्द्वंद्व को, निःसंग को, निर्मल को, निर्गम को, नित्यरूप-वैभवशाली को, अनुपम वैभवशाली को, निराधार को, नित्य शुद्ध-बुद्ध-परिपूर्ण सच्चिदानन्द अद्वैत को, परम शान्त प्रकाशमय तेजोरूप को — जय हो, जय हो! हे महारुद्र, महारौद्र, भद्रावतार, दुःखवन को विदीर्ण करनेवाले, महाभैरव, कालभैरव, कल्पान्तभैरव, कपालमाला धारण करनेवाले, खट्वांग, खड्ग, ढाल, पाश, अंकुश, डमरू, शूल, धनुष, बाण, गदा, शक्ति, भिण्डिपाल, तोमर, मूसल, मुद्गर, पट्टिश, परशु, परिघ, भुशुण्डी, शतघ्नी, चक्र आदि भयंकर आयुधों को सहस्र हाथों में धारण करनेवाले, दाढ़ों से भयंकर मुखवाले, विकट अट्टहास से ब्रह्माण्ड को कम्पित करनेवाले, नागेन्द्र के कुण्डल, नागेन्द्र की माला, नागेन्द्र के कंकण, नागेन्द्र की चर्म धारण करनेवाले, मृत्युंजय, त्र्यम्बक, त्रिपुरान्तक, विरूपाक्ष, विश्वेश्वर, विश्वरूप, वृषभवाहन, विषभूषण, विश्वतोमुख — मेरी सब ओर से रक्षा करो, रक्षा करो! ज्वलित हो जाओ, ज्वलित हो जाओ! महामृत्यु के भय और अपमृत्यु के भय को नष्ट करो, नष्ट करो! रोग-भय को उखाड़ फेंको, उखाड़ फेंको! विष-सर्प के भय को शान्त करो, शान्त करो! चोर-भय को मार डालो, मार डालो! मेरे शत्रुओं को भगा दो, भगा दो! शूल से विदीर्ण करो, विदीर्ण करो! परशु से चीर डालो, चीर डालो! खड्ग से काट डालो, काट डालो! खट्वांग से कूट डालो, कूट डालो! मूसल से पीस डालो, पीस डालो! बाणों से आहत करो, आहत करो! राक्षसों को भयभीत करो, भयभीत करो! भूतों को भगा दो, भगा दो! कूष्माण्ड, वेताल, महामारी के गण और ब्रह्मराक्षसों को त्रस्त करो, त्रस्त करो! मुझे अभय दो, अभय दो! भयभीत मुझे सान्त्वना दो, सान्त्वना दो! नरक के भय से मेरा उद्धार करो, उद्धार करो! मुझे संजीवित करो, संजीवित करो! भूख-प्यास से पीड़ित मुझे तृप्त करो, तृप्त करो! दुःख से आतुर मुझे आनन्दित करो, आनन्दित करो! शिवकवच से मुझे ढक दो, ढक दो! हे त्र्यम्बक, हे सदाशिव, तुम्हें नमस्कार है, नमस्कार है, नमस्कार है।" ऋषभ ने कहा — इस प्रकार यह वरदायक शैव कवच मेरे द्वारा कहा गया, जो समस्त बाधाओं को शान्त करनेवाला और समस्त प्राणियों का रहस्य है।
श्लोक 29 (skanda.3.104.29)
यः सदा धारयेन्मर्त्यः शैवं कवचमुत्तमम् ॥ न तस्य जायते क्वापि भयं शम्भोरनुग्रहात्
yaḥ sadā dhārayenmartyaḥ śaivaṁ kavacamuttamam na tasya jāyate kvāpi bhayaṁ śambhoranugrahāt
जो मनुष्य सदा इस उत्तम शैव कवच को धारण करता है, उसे शम्भु की कृपा से कहीं भी कभी भय उत्पन्न नहीं होता।
श्लोक 30 (skanda.3.104.30)
क्षीणायुर्मृत्युमापन्नो महारोगहतोऽपि वा ॥ सद्यः सुखमवाप्नोति दीर्घमायुश्च विंदति
kṣīṇāyurmṛtyumāpanno mahārogahato'pi vā sadyaḥ sukhamavāpnoti dīrghamāyuśca viṁdati
क्षीणायु, मृत्यु को प्राप्त होनेवाला, अथवा महारोग से आहत भी, तत्काल सुख प्राप्त कर लेता है और दीर्घायु पाता है।
श्लोक 31 (skanda.3.104.31)
सर्वदारिद्र्यशमनं सौमंगल्यविवर्धनम् ॥ यो धत्ते कवचं शैवं स देवैरपि पूज्यते
sarvadāridryaśamanaṁ saumaṁgalyavivardhanam yo dhatte kavacaṁ śaivaṁ sa devairapi pūjyate
यह समस्त दरिद्रता को शान्त करनेवाला और सौभाग्य बढ़ानेवाला है; जो शैव कवच धारण करता है, वह देवताओं द्वारा भी पूजित होता है।
श्लोक 32 (skanda.3.104.32)
महापातकसंघातैर्मुच्यते चोपपातकैः ॥ देहांते शिवमाप्नोति शिववर्मानुभावतः
mahāpātakasaṁghātairmucyate copapātakaiḥ dehāṁte śivamāpnoti śivavarmānubhāvataḥ
वह महापातकों के समूह और उपपातकों से भी मुक्त हो जाता है; देहान्त में शिवकवच के प्रभाव से शिव को प्राप्त होता है।
श्लोक 33 (skanda.3.104.33)
त्वमपि श्रद्धया वत्स शैवं कवच मुत्तमम्॥ धारयस्व मया दत्तं सद्यः श्रेयो ह्यवाप्स्यसि
tvamapi śraddhayā vatsa śaivaṁ kavaca muttamam dhārayasva mayā dattaṁ sadyaḥ śreyo hyavāpsyasi
हे वत्स! तुम भी श्रद्धापूर्वक मेरे द्वारा दिए गए इस उत्तम शैव कवच को धारण करो; तुम तत्काल कल्याण प्राप्त करोगे।
श्लोक 34 (skanda.3.104.34)
सूत उवाच ॥ इत्युक्त्वा ऋषभो योगी तस्मै पार्थिवसूनवे ॥ ददौ शंखं महारावं खड्गं चारिनिषूदनम्
sūta uvāca ityuktvā ṛṣabho yogī tasmai pārthivasūnave dadau śaṁkhaṁ mahārāvaṁ khaḍgaṁ cāriniṣūdanam
सूत जी ने कहा — इस प्रकार कहकर, योगी ऋषभ ने उस राजपुत्र को महाध्वनिवाला शंख और शत्रुनाशक खड्ग दिया।
श्लोक 35 (skanda.3.104.35)
पुनश्च भस्म संमंत्र्य तदंगं सर्वतोऽस्पृशत् ॥ गजानां षट्सहस्रस्य द्विगुणं च बलं ददौ
punaśca bhasma saṁmaṁtrya tadaṁgaṁ sarvato'spṛśat gajānāṁ ṣaṭsahasrasya dviguṇaṁ ca balaṁ dadau
फिर उन्होंने भस्म को अभिमन्त्रित करके उसके सम्पूर्ण शरीर का स्पर्श किया, और छह हजार हाथियों से दुगुना बल प्रदान किया।
श्लोक 36 (skanda.3.104.36)
भस्मप्रभावात्संप्राप्य बलैश्वर्यधृतिस्मृतीः ॥ स राजपुत्रः शुशुभे शरदर्क इव श्रिया
bhasmaprabhāvātsaṁprāpya balaiśvaryadhṛtismṛtīḥ sa rājaputraḥ śuśubhe śaradarka iva śriyā
भस्म के प्रभाव से बल, ऐश्वर्य, धृति और स्मृति प्राप्त करके, वह राजपुत्र शरद के सूर्य के समान श्री से सुशोभित हुआ।
श्लोक 37 (skanda.3.104.37)
तमाह प्रांजलिं भूयः स योगी राजनंदनम् ॥ एष खड्गो मया दत्तस्तपोमंत्रानुभावतः
tamāha prāṁjaliṁ bhūyaḥ sa yogī rājanaṁdanam eṣa khaḍgo mayā dattastapomaṁtrānubhāvataḥ
फिर उस योगी ने हाथ जोड़े उस राजपुत्र से पुनः कहा — "यह खड्ग मैंने तुम्हें तप और मन्त्र के प्रभाव से दिया है।
श्लोक 38 (skanda.3.104.38)
शितधारमिमं खड्गं यस्मै दर्शयसि स्फुटम् ॥ स सद्यो म्रियते शत्रुः साक्षान्मृत्युरपि स्वयम्
śitadhāramimaṁ khaḍgaṁ yasmai darśayasi sphuṭam sa sadyo mriyate śatruḥ sākṣānmṛtyurapi svayam
"इस तीक्ष्ण धारवाले खड्ग को जिसे भी तुम स्पष्ट रूप से दिखाओगे, वह शत्रु तत्काल मर जाएगा, भले ही वह साक्षात् मृत्यु ही क्यों न हो।
श्लोक 39 (skanda.3.104.39)
अस्य शंखस्य निह्रादं ये शृण्वंति तवाहिताः.॥ ते मूर्च्छिताः पतिष्यंति न्यस्तशस्त्रा विचेतना
asya śaṁkhasya nihrādaṁ ye śṛṇvaṁti tavāhitāḥ. te mūrcchitāḥ patiṣyaṁti nyastaśastrā vicetanā
"इस शंख की ध्वनि जो तुम्हारे शत्रु सुनेंगे, वे मूर्च्छित होकर, शस्त्र त्यागकर, चेतनाहीन होकर गिर पड़ेंगे।
श्लोक 40 (skanda.3.104.40)
खड्गशंखाविमौ दिव्यौ परसैन्यविनाशिनौ ॥ आत्मसैन्यस्वपक्षाणां शौर्यतेजोविवर्धनौ
khaḍgaśaṁkhāvimau divyau parasainyavināśinau ātmasainyasvapakṣāṇāṁ śauryatejovivardhanau
"ये दोनों दिव्य खड्ग और शंख शत्रु-सेना का विनाश करनेवाले हैं, और अपनी सेना तथा मित्रों के शौर्य और तेज को बढ़ानेवाले हैं।
श्लोक 41 (skanda.3.104.41)
एतयोश्च प्रभावेन शैवेन कवचेन च ॥ द्विषट्सहस्रनागानां बलेन महतापि च
etayośca prabhāvena śaivena kavacena ca dviṣaṭsahasranāgānāṁ balena mahatāpi ca
"इन दोनों के प्रभाव से, शैव कवच से, और बारह हजार हाथियों के बल से भी,
श्लोक 42 (skanda.3.104.42)
भस्मधारणसामर्थ्याच्छत्रुसैन्यं विजेष्यसि ॥ प्राप्य सिंहासनं पैत्र्यं गोप्तासि पृथिवीमिमाम्
bhasmadhāraṇasāmarthyācchatrusainyaṁ vijeṣyasi prāpya siṁhāsanaṁ paitryaṁ goptāsi pṛthivīmimām
"तथा भस्म धारण करने के सामर्थ्य से, तुम शत्रु-सेना को जीत लोगे; अपने पैतृक सिंहासन को प्राप्त करके इस पृथ्वी की रक्षा करोगे।"
श्लोक 43 (skanda.3.104.43)
इति भद्रायुषं सम्यगनुशास्य समातृकम्॥ ताभ्यां संपूजितः सोऽथ योगी स्वैरगतिर्ययौ
iti bhadrāyuṣaṁ samyaganuśāsya samātṛkam tābhyāṁ saṁpūjitaḥ so'tha yogī svairagatiryayau
इस प्रकार भद्रायु को उसकी माता सहित भलीभाँति उपदेश देकर, उन दोनों द्वारा पूजित होकर, वह योगी यथेच्छ गति से चला गया।