ब्रह्म खण्ड · अध्याय 103
ऋषभ का भद्रायु को उपदेश
श्लोक 1 (skanda.3.103.1)
॥ सूत उवाच ॥ पिंगला नाम या वेश्या मया पूर्वमुदाहृता ॥ शिवभक्तार्चनात्पुण्यात्त्यक्त्वा पूर्वकलेवरम्
sūta uvāca piṁgalā nāma yā veśyā mayā pūrvamudāhṛtā śivabhaktārcanātpuṇyāttyaktvā pūrvakalevaram
सूत जी ने कहा — जिस पिंगला नाम की वेश्या का मैंने पहले वर्णन किया, उसने शिवभक्त की पूजा के पुण्य से अपना पूर्व शरीर त्यागकर,
श्लोक 2 (skanda.3.103.2)
चन्द्रांगदस्य सा भूयः सीमंतिन्यामजायत ॥ रूपौदार्यगुणोपेता नाम्ना वै कीर्तिमालिनी
candrāṁgadasya sā bhūyaḥ sīmaṁtinyāmajāyata rūpaudāryaguṇopetā nāmnā vai kīrtimālinī
फिर चन्द्रांगद और सीमन्तिनी की पुत्री के रूप में जन्म लिया, रूप, उदारता और गुणों से सम्पन्न, नाम से कीर्तिमालिनी।
श्लोक 3 (skanda.3.103.3)
भद्रायुरपि तत्रैव राजपुत्रो वणिक्पतेः ॥ ववृधे सदने भानुः शुचाविव महातपाः
bhadrāyurapi tatraiva rājaputro vaṇikpateḥ vavṛdhe sadane bhānuḥ śucāviva mahātapāḥ
भद्रायु भी वहीं, वणिक्पति के घर में राजपुत्र के रूप में, बादल में सूर्य के समान महातेजस्वी होकर बढ़ता गया।
श्लोक 4 (skanda.3.103.4)
तस्यापि वैश्यनाथस्य कुमारस्त्वेक उत्तमः ॥ स नाम्ना सुनयः प्रोक्तो राजसूनोः सखाऽभवत्
tasyāpi vaiśyanāthasya kumārastveka uttamaḥ sa nāmnā sunayaḥ prokto rājasūnoḥ sakhā'bhavat
उस वैश्यनाथ का भी एक उत्तम पुत्र था, जो सुनय नाम से प्रसिद्ध था, वह राजपुत्र का सखा हुआ।
श्लोक 5 (skanda.3.103.5)
तावुभौ परमस्निग्धौ राजवैश्यकुमारकौ॥ चित्रक्रीडावुदारांगौ रत्नाभरणमंडितौ
tāvubhau paramasnigdhau rājavaiśyakumārakau citrakrīḍāvudārāṁgau ratnābharaṇamaṁḍitau
वे दोनों राजपुत्र और वैश्यपुत्र परम स्नेही, विचित्र क्रीड़ाओं में रत, उदार अंगोंवाले, रत्नाभूषणों से सुसज्जित हुए।
श्लोक 6 (skanda.3.103.6)
तस्य राजकुमारस्य ब्राह्मणैः स वणिक्पतिः ॥ संस्कारान्कारयामास स्वपुत्रस्यापि विस्तरात्
tasya rājakumārasya brāhmaṇaiḥ sa vaṇikpatiḥ saṁskārānkārayāmāsa svaputrasyāpi vistarāt
उस वणिक्पति ने ब्राह्मणों द्वारा उस राजकुमार के, और अपने पुत्र के भी, संस्कार विस्तारपूर्वक करवाए।
श्लोक 7 (skanda.3.103.7)
काले कृतोपनयनौ गुरुशुश्रूषणे रतौ ॥ चक्रतुः सर्वविद्यानां संग्रहं विनयान्वितौ
kāle kṛtopanayanau guruśuśrūṣaṇe ratau cakratuḥ sarvavidyānāṁ saṁgrahaṁ vinayānvitau
समय आने पर उनका उपनयन संस्कार करके, गुरु की सेवा में रत, विनयवान वे दोनों समस्त विद्याओं का संग्रह करने लगे।
श्लोक 8 (skanda.3.103.8)
अथ राजकुमारस्य प्राप्ते षोडशहायने ॥ स एव ऋषभो योगी तस्य वेश्मन्युपाययौ
atha rājakumārasya prāpte ṣoḍaśahāyane sa eva ṛṣabho yogī tasya veśmanyupāyayau
फिर राजकुमार के सोलह वर्ष का होने पर, वही योगी ऋषभ उसके घर आ पहुँचे।
श्लोक 9 (skanda.3.103.9)
सा राज्ञी स कुमारश्च शिवयोगिनमागतम् ॥ मुहुर्मुहुः प्रणम्योभौ पूजयामासतुर्मुदा
sā rājñī sa kumāraśca śivayoginamāgatam muhurmuhuḥ praṇamyobhau pūjayāmāsaturmudā
वह रानी और वह कुमार, आए हुए उस शिवयोगी को बार-बार प्रणाम करके हर्षपूर्वक उनकी पूजा करने लगे।
श्लोक 10 (skanda.3.103.10)
ताभ्यां च पूजितः सोऽथ योगीशो हृष्टमानसः ॥ तं राजपुत्रमुद्दिश्य बभाषे करुणार्द्रधीः
tābhyāṁ ca pūjitaḥ so'tha yogīśo hṛṣṭamānasaḥ taṁ rājaputramuddiśya babhāṣe karuṇārdradhīḥ
उन दोनों द्वारा पूजित वह योगीश्वर, प्रसन्नचित्त होकर, करुणा से आर्द्रबुद्धि होकर, उस राजपुत्र को लक्ष्य करके बोले —
श्लोक 11 (skanda.3.103.11)
शिवयोग्युवाच ॥ कच्चित्ते कुशलं तात त्वन्मातुश्चाप्यनामयम् ॥ कच्चित्त्वं सर्वविद्यानामकार्षीश्च प्रतिग्रहम्
śivayogyuvāca kaccitte kuśalaṁ tāta tvanmātuścāpyanāmayam kaccittvaṁ sarvavidyānāmakārṣīśca pratigraham
शिवयोगी ने कहा — "हे तात! क्या तुम्हारा कुशल है, और तुम्हारी माता निरोग है? क्या तुमने समस्त विद्याओं का अध्ययन पूर्ण किया?
श्लोक 12 (skanda.3.103.12)
कच्चिद्गुरूणां सततं शुश्रूषातत्परो भवान् ॥ कच्चित्स्मरसि मां तात तव प्राणप्रदं गुरुम्
kaccidgurūṇāṁ satataṁ śuśrūṣātatparo bhavān kaccitsmarasi māṁ tāta tava prāṇapradaṁ gurum
"क्या तुम सदा गुरुओं की सेवा में तत्पर हो? हे तात! क्या तुम मुझे, अपने प्राणदाता गुरु को, स्मरण करते हो?"
श्लोक 13 (skanda.3.103.13)
एवं वदति योगीशे राज्ञी सा विनयान्विता ॥ स्वपुत्रं पादयोस्तस्य निपात्यैनमभाषत
evaṁ vadati yogīśe rājñī sā vinayānvitā svaputraṁ pādayostasya nipātyainamabhāṣata
इस प्रकार योगीश्वर के कहने पर, विनयशील वह रानी अपने पुत्र को उनके चरणों में गिराकर बोली —
श्लोक 14 (skanda.3.103.14)
एष पुत्रस्तव गुरो त्वमस्य प्राणदः पिता ॥ एष शिष्यस्तु संग्राह्यो भवता करुणात्मना
eṣa putrastava guro tvamasya prāṇadaḥ pitā eṣa śiṣyastu saṁgrāhyo bhavatā karuṇātmanā
"हे गुरो! यह आपका ही पुत्र है, आप ही इसके प्राणदाता पिता हैं। इस शिष्य को करुणामय आपको स्वीकार करना चाहिए।
श्लोक 15 (skanda.3.103.15)
अतो बन्धुभिरुत्सृष्टमनाथं परिपालय ॥ अस्मै सम्यक्सतां मार्गमुपदेष्टुं त्वमर्हसि
ato bandhubhirutsṛṣṭamanāthaṁ paripālaya asmai samyaksatāṁ mārgamupadeṣṭuṁ tvamarhasi
"अतः बन्धुओं द्वारा त्यागे गए इस अनाथ का पालन कीजिए; आप ही इसे सज्जनों का सम्यक् मार्ग उपदेश देने योग्य हैं।"
श्लोक 16 (skanda.3.103.16)
इति प्रसादितो राज्ञ्या शिवयोगी महामतिः ॥ तस्मै राजकुमाराय सन्मार्गमुपदिष्टवान्
iti prasādito rājñyā śivayogī mahāmatiḥ tasmai rājakumārāya sanmārgamupadiṣṭavān
इस प्रकार रानी द्वारा प्रसन्न किए गए वे महामति शिवयोगी, उस राजकुमार को सन्मार्ग का उपदेश देने लगे।
श्लोक 17 (skanda.3.103.17)
ऋषभ उवाच ॥ श्रुतिस्मृतिपुराणेषु प्रोक्तो धर्मः सनातनः ॥ वर्णाश्रमानुरूपेण निषेव्यः सर्वदा जनैः
ṛṣabha uvāca śrutismṛtipurāṇeṣu prokto dharmaḥ sanātanaḥ varṇāśramānurūpeṇa niṣevyaḥ sarvadā janaiḥ
ऋषभ ने कहा — "श्रुति, स्मृति और पुराणों में जो सनातन धर्म कहा गया है, वह सदा वर्णाश्रम के अनुरूप मनुष्यों द्वारा सेवन करने योग्य है।
श्लोक 18 (skanda.3.103.18)
भज वत्स सतां मार्गं सदेव चरितं चर ॥ न देवाज्ञां विलंघेथा मा कार्षीर्देवहेलनम्
bhaja vatsa satāṁ mārgaṁ sadeva caritaṁ cara na devājñāṁ vilaṁghethā mā kārṣīrdevahelanam
"हे वत्स! सज्जनों के मार्ग का आश्रय लो, सज्जनों जैसा आचरण करो। देवाज्ञा का उल्लंघन मत करो, देवताओं का अनादर मत करो।
श्लोक 19 (skanda.3.103.19)
गोदेवगुरुविप्रेषु भक्तिमान्भव सर्वदा ॥ चांडालमपि संप्राप्तं सदा संभावयातिथिम्
godevaguruvipreṣu bhaktimānbhava sarvadā cāṁḍālamapi saṁprāptaṁ sadā saṁbhāvayātithim
"गौ, देव, गुरु और ब्राह्मणों में सदा भक्तिमान रहो; चाण्डाल भी यदि अतिथि रूप में आ जाए, तो सदा उसका सम्मान करो।
श्लोक 20 (skanda.3.103.20)
सत्यं न त्यज सर्वत्र प्राप्तेऽपि प्राणसंकटे ॥ गोब्राह्मणानां रक्षार्थमसत्यं त्वं वद क्वचित्
satyaṁ na tyaja sarvatra prāpte'pi prāṇasaṁkaṭe gobrāhmaṇānāṁ rakṣārthamasatyaṁ tvaṁ vada kvacit
"प्राणसंकट आने पर भी कहीं भी सत्य का त्याग मत करो; किन्तु गौ और ब्राह्मणों की रक्षा के लिए कभी असत्य भी बोल सकते हो।
श्लोक 21 (skanda.3.103.21)
परस्वेषु परस्त्रीषु देवब्राह्मण वस्तुषु ॥ तृष्णां त्यज महाबाहो दुर्लभेष्वपि वस्तुषु
parasveṣu parastrīṣu devabrāhmaṇa vastuṣu tṛṣṇāṁ tyaja mahābāho durlabheṣvapi vastuṣu
"दूसरे के धन, दूसरे की स्त्री, और देव-ब्राह्मणों की वस्तुओं में, हे महाबाहो! तृष्णा त्यागो, चाहे वे दुर्लभ वस्तुएँ ही क्यों न हों।
श्लोक 22 (skanda.3.103.22)
सत्कथायां सदाचारे सद्व्रते च सदागमे ॥ धर्मादिसंग्रहे नित्यं तृष्णां कुरु महामते
satkathāyāṁ sadācāre sadvrate ca sadāgame dharmādisaṁgrahe nityaṁ tṛṣṇāṁ kuru mahāmate
"सत्कथा में, सदाचार में, सद्व्रत में, सत्शास्त्र में, और धर्म आदि के संग्रह में, हे महामते! सदा तृष्णा रखो।
श्लोक 23 (skanda.3.103.23)
स्नाने जपे च होमे च स्वाध्याये पितृतर्पणे ॥ गोदेवातिथिपूजासु निरालस्यो भवानघ
snāne jape ca home ca svādhyāye pitṛtarpaṇe godevātithipūjāsu nirālasyo bhavānagha
"स्नान, जप, होम, स्वाध्याय, पितृतर्पण, तथा गौ-देव-अतिथि की पूजा में, हे निष्पाप! सदा आलस्यरहित रहो।
श्लोक 24 (skanda.3.103.24)
क्रोधं द्वेषं भयं शाठ्यं पैशुन्य मसदाग्रहम् ॥ कौटिल्यं दंभमुद्वेगं यत्नेन परिवर्जय
krodhaṁ dveṣaṁ bhayaṁ śāṭhyaṁ paiśunya masadāgraham kauṭilyaṁ daṁbhamudvegaṁ yatnena parivarjaya
"क्रोध, द्वेष, भय, धूर्तता, चुगली, अनुचित हठ, कुटिलता, दम्भ और उद्वेग — इन सबका प्रयत्नपूर्वक त्याग करो।
श्लोक 25 (skanda.3.103.25)
क्षात्रधर्मरतोऽपि त्वं वृथा हिंसां परित्यज ॥ शुष्कवैरं वृथालापं परनिदां च वर्जय
kṣātradharmarato'pi tvaṁ vṛthā hiṁsāṁ parityaja śuṣkavairaṁ vṛthālāpaṁ paranidāṁ ca varjaya
"क्षत्रिय-धर्म में रत होते हुए भी, व्यर्थ हिंसा का त्याग करो; निरर्थक वैर, व्यर्थ बकवास और दूसरों की निन्दा से बचो।
श्लोक 26 (skanda.3.103.26)
मृगया द्यूतपानेषु स्त्रीषु स्त्रीविजितेषु च ॥ अत्याहारमतिक्रोधमतिनिद्रामतिश्रमम्
mṛgayā dyūtapāneṣu strīṣu strīvijiteṣu ca atyāhāramatikrodhamatinidrāmatiśramam
"मृगया, द्यूत, मद्यपान, स्त्रियों और स्त्रियों से पराजित होने में, अत्यधिक भोजन, अत्यधिक क्रोध, अत्यधिक निद्रा, अत्यधिक श्रम,
श्लोक 27 (skanda.3.103.27)
अत्यालापमतिक्रीडां सर्वदा परिवर्जय
atyālāpamatikrīḍāṁ sarvadā parivarjaya
"अत्यधिक बातूनीपन और अत्यधिक क्रीड़ा — इन सबका सदा त्याग करो।
श्लोक 28 (skanda.3.103.28)
अतिविद्यामतिश्रद्धामतिपुण्यमतिस्मृतिम् ॥ अत्युत्साहमतिख्यातिमतिधैर्यं च साधय
atividyāmatiśraddhāmatipuṇyamatismṛtim atyutsāhamatikhyātimatidhairyaṁ ca sādhaya
"अतिविद्या, अतिश्रद्धा, अतिपुण्य, उत्तम स्मृति, अतिउत्साह, उत्तम कीर्ति और उत्तम धैर्य — इनका अर्जन करो।
श्लोक 29 (skanda.3.103.29)
सकामो निजदारेषु सक्रोधो निज शत्रुषु ॥ सलोभः पुण्यनिचये साभ्यसूयो ह्यधर्मिषु
sakāmo nijadāreṣu sakrodho nija śatruṣu salobhaḥ puṇyanicaye sābhyasūyo hyadharmiṣu
"अपनी पत्नी के प्रति सकाम, अपने शत्रुओं के प्रति क्रोधित, पुण्य-संचय में लोभी, तथा अधर्मियों के प्रति ईर्ष्यालु बनो।
श्लोक 30 (skanda.3.103.30)
सद्वेषो भव पाखण्डे सरागः सज्जनेषु च ॥ दुर्बोधो भव दुर्मंत्रे बधिरः पिशुनोक्तिषु
sadveṣo bhava pākhaṇḍe sarāgaḥ sajjaneṣu ca durbodho bhava durmaṁtre badhiraḥ piśunoktiṣu
"पाखण्ड के प्रति द्वेष रखो, सज्जनों के प्रति अनुराग; दुष्ट मन्त्रणा को समझने में मन्द बनो, चुगली की बातों में बहरे बनो।
श्लोक 31 (skanda.3.103.31)
धूर्त्तं चंडं शठं क्रूरं कितवं चपलं खलम् ॥ पतितं नास्तिकं जिह्मं दूरतः परिवर्जय
dhūrttaṁ caṁḍaṁ śaṭhaṁ krūraṁ kitavaṁ capalaṁ khalam patitaṁ nāstikaṁ jihmaṁ dūrataḥ parivarjaya
"धूर्त, क्रोधी, दुष्ट, क्रूर, जुआरी, चंचल, दुर्जन, पतित, नास्तिक और कुटिल पुरुष का दूर से ही त्याग करो।
श्लोक 32 (skanda.3.103.32)
आत्मप्रशंसा मा कार्षीः परिज्ञातेंगितो भव ॥ धने सर्वकुटुंबे च नात्यासक्तः सदा भव
ātmapraśaṁsā mā kārṣīḥ parijñāteṁgito bhava dhane sarvakuṭuṁbe ca nātyāsaktaḥ sadā bhava
"अपनी प्रशंसा मत करो, दूसरों के मनोभावों को समझो; धन में और सम्पूर्ण कुटुम्ब में सदा अत्यधिक आसक्त मत बनो।
श्लोक 33 (skanda.3.103.33)
पत्न्याः पतिव्रतायाश्च जनन्याः श्वशुरस्य च ॥ सतां गुरोश्च वचने विश्वासं कुरु सर्वदा
patnyāḥ pativratāyāśca jananyāḥ śvaśurasya ca satāṁ gurośca vacane viśvāsaṁ kuru sarvadā
"पतिव्रता पत्नी के, माता के, श्वसुर के, सज्जनों के और गुरु के वचन में सदा विश्वास रखो।
श्लोक 34 (skanda.3.103.34)
आत्मरक्षापरो नित्यमप्रमत्तो दृढव्रतः ॥ विश्वासं नैव कुर्वीथाः स्वभृत्येष्वपि कुत्र चित्
ātmarakṣāparo nityamapramatto dṛḍhavrataḥ viśvāsaṁ naiva kurvīthāḥ svabhṛtyeṣvapi kutra cit
"सदा आत्मरक्षा में तत्पर, सावधान, दृढ़व्रत रहो; अपने ही सेवकों में भी कहीं भी पूर्ण विश्वास मत करो।
श्लोक 35 (skanda.3.103.35)
विश्वस्तं मा वधीः कंचिदपि चोरं महामते ॥ अपापेषु न शंकेथाः सत्यान्न चलितो भव
viśvastaṁ mā vadhīḥ kaṁcidapi coraṁ mahāmate apāpeṣu na śaṁkethāḥ satyānna calito bhava
"विश्वस्त व्यक्ति को, चाहे वह चोर ही क्यों न हो, कभी मत मारो, हे महामते! निर्दोषों पर सन्देह मत करो, और सत्य से कभी विचलित मत होओ।
श्लोक 36 (skanda.3.103.36)
अनाथं कृपणं वृद्धं स्त्रियं बालं निरागसम् ॥ परिरक्ष धनैः प्राणैर्बुद्ध्या शक्त्या बलेन च
anāthaṁ kṛpaṇaṁ vṛddhaṁ striyaṁ bālaṁ nirāgasam parirakṣa dhanaiḥ prāṇairbuddhyā śaktyā balena ca
"अनाथ, दीन, वृद्ध, स्त्री, बालक और निर्दोष की, धन से, प्राणों से, बुद्धि से, शक्ति से और बल से रक्षा करो।
श्लोक 37 (skanda.3.103.37)
अपि शत्रुं वधस्यार्हं मा वधीः शरणागतम् ॥ अप्यपात्रं सुपात्रं वा नीचो वापि महत्तमः
api śatruṁ vadhasyārhaṁ mā vadhīḥ śaraṇāgatam apyapātraṁ supātraṁ vā nīco vāpi mahattamaḥ
"वध के योग्य शत्रु को भी, यदि वह शरणागत हो जाए, तो मत मारो; चाहे वह कुपात्र हो या सुपात्र, नीच हो या महान,
श्लोक 38 (skanda.3.103.38)
यो वा को वापि याचेत तस्मै देहि शिरोपि च ॥ अपि यत्नेन महता कीर्तिमेव सदार्जय
yo vā ko vāpi yāceta tasmai dehi śiropi ca api yatnena mahatā kīrtimeva sadārjaya
"जो कोई भी माँगे, उसे अपना सिर भी दे दो; बड़े प्रयत्न से सदा केवल कीर्ति का ही अर्जन करो।
श्लोक 39 (skanda.3.103.39)
राज्ञां च विदुषां चैव कीर्तिरेव हि भूषणम् ॥ सत्कीर्तिप्रभवा लक्ष्मीः पुण्यं सत्कीर्तिसंभवम्
rājñāṁ ca viduṣāṁ caiva kīrtireva hi bhūṣaṇam satkīrtiprabhavā lakṣmīḥ puṇyaṁ satkīrtisaṁbhavam
"राजाओं और विद्वानों का कीर्ति ही सच्चा आभूषण है; सत्कीर्ति से लक्ष्मी उत्पन्न होती है, सत्कीर्ति से ही पुण्य उत्पन्न होता है।
श्लोक 40 (skanda.3.103.40)
सत्कीर्त्या राजते लोकश्चंद्रश्चंद्रिकया न्यथा ॥ गजाश्वहेमनिचयं रत्नराशिं नगोपमम्
satkīrtyā rājate lokaścaṁdraścaṁdrikayā nyathā gajāśvahemanicayaṁ ratnarāśiṁ nagopamam
"जैसे चन्द्रमा चन्द्रिका से सुशोभित होता है, वैसे ही संसार सत्कीर्ति से सुशोभित होता है, अन्यथा नहीं; हाथी, घोड़े, स्वर्ण के ढेर और पर्वत के समान रत्नराशि —
श्लोक 41 (skanda.3.103.41)
अकीर्त्योपहतं सर्वं तृणवन्मुंच सत्वरम् ॥ मातुः कोपं पितुः कोपं गुरोः कोपं धनव्य यम्
akīrtyopahataṁ sarvaṁ tṛṇavanmuṁca satvaram mātuḥ kopaṁ pituḥ kopaṁ guroḥ kopaṁ dhanavya yam
"अपकीर्ति से आहत यह सब तिनके के समान शीघ्र त्याग दो। माता का क्रोध, पिता का क्रोध, गुरु का क्रोध, धन की हानि,
श्लोक 42 (skanda.3.103.42)
पुत्राणामपराधं च ब्राह्मणानां क्षमस्व भोः ॥ यथा द्विजप्रसादः स्यात्तथा तेषां हितं चर
putrāṇāmaparādhaṁ ca brāhmaṇānāṁ kṣamasva bhoḥ yathā dvijaprasādaḥ syāttathā teṣāṁ hitaṁ cara
"पुत्रों के अपराध और ब्राह्मणों के अपराध को, हे भो! क्षमा करो; जैसे ब्राह्मणों की प्रसन्नता हो, वैसे ही उनका हित करो।
श्लोक 43 (skanda.3.103.43)
राजानं संकटे मग्नमुद्धरेयुर्द्विजोत्तमा ॥ आयुर्यशो बलं सौख्यं धनं पुण्यं प्रजोन्नतिः
rājānaṁ saṁkaṭe magnamuddhareyurdvijottamā āyuryaśo balaṁ saukhyaṁ dhanaṁ puṇyaṁ prajonnatiḥ
"संकट में डूबे राजा को श्रेष्ठ ब्राह्मण ही उबार सकते हैं; आयु, यश, बल, सुख, धन, पुण्य और प्रजा की उन्नति —
श्लोक 44 (skanda.3.103.44)
कर्मणा येन जायेत तत्सेव्यं भवता सदा ॥ देशं कालं च शक्तिं च कार्यं चा कार्यमेव च
karmaṇā yena jāyeta tatsevyaṁ bhavatā sadā deśaṁ kālaṁ ca śaktiṁ ca kāryaṁ cā kāryameva ca
"जिस कर्म से जो प्राप्त हो, उसे सदा तुम्हें सेवन करना चाहिए; देश, काल, शक्ति, और क्या करने योग्य है, क्या नहीं —
श्लोक 45 (skanda.3.103.45)
सम्यग्विचार्य यत्नेन कुरु कार्यं च सर्वदा ॥ न कुर्याः कस्यचिद्बाधां परबाधां निवारय
samyagvicārya yatnena kuru kāryaṁ ca sarvadā na kuryāḥ kasyacidbādhāṁ parabādhāṁ nivāraya
"इनका भलीभाँति प्रयत्नपूर्वक विचार करके सदा अपना कार्य करो; किसी को बाधा मत पहुँचाओ, दूसरों की बाधा को दूर करो।
श्लोक 46 (skanda.3.103.46)
चोरान्दुष्टांश्च बाधेथाः सुनीत्या शक्तिमत्तया ॥ स्नाने जपे च होमे च दैवे पित्र्ये च कर्मणि
corānduṣṭāṁśca bādhethāḥ sunītyā śaktimattayā snāne jape ca home ca daive pitrye ca karmaṇi
"चोरों और दुष्टों को उचित नीति और शक्ति से रोको; स्नान, जप, होम में, तथा दैव और पैतृक कर्मों में,
श्लोक 47 (skanda.3.103.47)
अत्वरो भव निद्रायां भोजने भव सत्वरः ॥ दाक्षिण्ययुक्तमशठं सत्यं जनमनोहरम्
atvaro bhava nidrāyāṁ bhojane bhava satvaraḥ dākṣiṇyayuktamaśaṭhaṁ satyaṁ janamanoharam
"जल्दबाजी मत करो; किन्तु नींद में और भोजन में शीघ्रता करो। दाक्षिण्ययुक्त, निष्कपट, सत्य, लोगों के मन को मोहित करनेवाली,
श्लोक 48 (skanda.3.103.48)
अल्पाक्षरमनंतार्थं वाक्यं ब्रूहि महामते॥ अभीतो भव सर्वत्र विपक्षेषु विपत्सु च
alpākṣaramanaṁtārthaṁ vākyaṁ brūhi mahāmate abhīto bhava sarvatra vipakṣeṣu vipatsu ca
"अल्प अक्षरोंवाली किन्तु अनन्त अर्थवाली वाणी बोलो, हे महामते! सर्वत्र, विपक्षियों और विपत्तियों में भी निर्भय रहो।
श्लोक 49 (skanda.3.103.49)
भीतो भव ब्रह्मकुले न पापे गुरुशासने ॥ ज्ञातिबंधुषु विप्रेषु भार्यासु तनयेषु च
bhīto bhava brahmakule na pāpe guruśāsane jñātibaṁdhuṣu vipreṣu bhāryāsu tanayeṣu ca
"ब्रह्मकुल के प्रति, पाप के प्रति और गुरु की आज्ञा के प्रति भयभीत रहो; ज्ञातिजनों, बन्धुओं, ब्राह्मणों, पत्नियों और पुत्रों के प्रति,
श्लोक 50 (skanda.3.103.50)
समभावेन वर्तेथास्तथा भोजनपंक्तिषु ॥ सतां हितोपदेशेषु तथा पुण्य कथासु च
samabhāvena vartethāstathā bhojanapaṁktiṣu satāṁ hitopadeśeṣu tathā puṇya kathāsu ca
"समभाव से व्यवहार करो, वैसे ही भोजन-पंक्तियों में भी; सज्जनों के हितोपदेशों में और पुण्यकथाओं में,
श्लोक 51 (skanda.3.103.51)
विद्यागोष्ठीषु धर्म्यासु क्वचिन्मा भूः पराङ्मुखः ॥ शुचौ पुण्यजलस्यांते प्रख्याते ब्रह्मसंकुले
vidyāgoṣṭhīṣu dharmyāsu kvacinmā bhūḥ parāṅmukhaḥ śucau puṇyajalasyāṁte prakhyāte brahmasaṁkule
"और धार्मिक विद्या-गोष्ठियों में कभी विमुख मत बनो। पवित्र, पुण्य-जल के तट पर, प्रसिद्ध ब्रह्मसमूह से युक्त,
श्लोक 52 (skanda.3.103.52)
महादेशे शिवमये वस्तव्यं भवता सदा ॥ कुलटा गणिका यत्र यत्र तिष्ठति कामुकः
mahādeśe śivamaye vastavyaṁ bhavatā sadā kulaṭā gaṇikā yatra yatra tiṣṭhati kāmukaḥ
"महान शिवमय देश में सदा निवास करो; जहाँ-जहाँ कुलटा, गणिका या कामुक व्यक्ति रहता हो,
श्लोक 53 (skanda.3.103.53)
दुर्देशे नीचसंबाधे कदाचिदपि मा वस ॥ एकमेवाश्रितोपि त्वं शिवं त्रिभुवनेश्वरम्
durdeśe nīcasaṁbādhe kadācidapi mā vasa ekamevāśritopi tvaṁ śivaṁ tribhuvaneśvaram
"ऐसे दुष्ट, नीचों से भरे देश में कभी मत रहो। यद्यपि तुम एकमात्र त्रिभुवनेश्वर शिव की ही शरण में हो,
श्लोक 54 (skanda.3.103.54)
सर्वान्देवानुपासीथास्तद्दिनानि च मानयन् ॥ सदा शुचिः सदा दक्षः सदा शांतः सदा स्थिरः
sarvāndevānupāsīthāstaddināni ca mānayan sadā śuciḥ sadā dakṣaḥ sadā śāṁtaḥ sadā sthiraḥ
"फिर भी समस्त देवताओं की उपासना करो, उनके-उनके दिनों का सम्मान करते हुए; सदा पवित्र, सदा दक्ष, सदा शान्त, सदा स्थिर रहो।
श्लोक 55 (skanda.3.103.55)
सदा विजित षड्वर्गः सदैकांतो भवानघ ॥ विप्रान्वेदविदः शांतान्यतींश्च नियतोज्वलान्
sadā vijita ṣaḍvargaḥ sadaikāṁto bhavānagha viprānvedavidaḥ śāṁtānyatīṁśca niyatojvalān
"सदा षड्वर्ग पर विजयी, सदा एकनिष्ठ रहो, हे निष्पाप! वेदज्ञ, शान्त ब्राह्मणों को, और नियमित, तेजस्वी संन्यासियों को,
श्लोक 56 (skanda.3.103.56)
युग्मम् ॥ पुण्यवृक्षान्पुण्यनदीः पुण्यतीर्थं महत्सरः ॥ धेनुं च वृषभं रत्नं युवतीं च पतिव्रताम्
yugmam puṇyavṛkṣānpuṇyanadīḥ puṇyatīrthaṁ mahatsaraḥ dhenuṁ ca vṛṣabhaṁ ratnaṁ yuvatīṁ ca pativratām
"पुण्यवृक्षों को, पुण्यनदियों को, पुण्यतीर्थ और महासरोवर को, गौ और वृषभ को, रत्न को, और पतिव्रता युवती को,
श्लोक 57 (skanda.3.103.57)
आत्मनो गृहदेवांश्च सहसैव नमस्कुरु ॥ उत्थाय समये ब्राह्मे स्वाचम्य विमलाशयः
ātmano gṛhadevāṁśca sahasaiva namaskuru utthāya samaye brāhme svācamya vimalāśayaḥ
"तथा अपने कुलदेवताओं को, तुरन्त ही नमस्कार करो। ब्राह्ममुहूर्त में उठकर, आचमन करके, निर्मल हृदय से,
श्लोक 58 (skanda.3.103.58)
नमस्कृत्यात्मगुरुवे ध्यात्वा देवमुमापतिम्॥ नारायणं च लक्ष्मीशं ब्रह्माणं च विनायकम्
namaskṛtyātmaguruve dhyātvā devamumāpatim nārāyaṇaṁ ca lakṣmīśaṁ brahmāṇaṁ ca vināyakam
"अपने गुरु को नमस्कार करके, उमापति देव का ध्यान करके, नारायण, लक्ष्मीपति, ब्रह्मा और विनायक का,
श्लोक 59 (skanda.3.103.59)
स्कन्दं कात्यायनीं देवीं महालक्ष्मीं सरस्वतीम् ॥ इन्द्रादीनथ लोकेशान्पुण्यश्लोकानृषीनपि
skandaṁ kātyāyanīṁ devīṁ mahālakṣmīṁ sarasvatīm indrādīnatha lokeśānpuṇyaślokānṛṣīnapi
"स्कन्द, कात्यायनी देवी, महालक्ष्मी, सरस्वती का, तथा इन्द्र आदि लोकपालों और पुण्यश्लोक ऋषियों का,
श्लोक 60 (skanda.3.103.60)
चिंतयित्वाथ मार्त्तंडमुद्यंतं प्रणमेत्सदा ॥ गंधं पुष्पं च तांबूलं शाकं पक्वफलादिकम्
ciṁtayitvātha mārttaṁḍamudyaṁtaṁ praṇametsadā gaṁdhaṁ puṣpaṁ ca tāṁbūlaṁ śākaṁ pakvaphalādikam
"स्मरण करके, फिर उदय होते सूर्य को सदा प्रणाम करो। गन्ध, पुष्प, ताम्बूल, शाक, पके फल आदि,
श्लोक 61 (skanda.3.103.61)
शिवाय दत्त्वोपभुंक्ष्व भक्ष्यं भोज्यं प्रियं नवम् ॥ यद्दत्तं यत्कृतं जप्तं यत्स्नातं यद्धुतं स्मृतम्
śivāya dattvopabhuṁkṣva bhakṣyaṁ bhojyaṁ priyaṁ navam yaddattaṁ yatkṛtaṁ japtaṁ yatsnātaṁ yaddhutaṁ smṛtam
"शिव को अर्पित करके ही स्वयं भक्ष्य-भोज्य नए और प्रिय पदार्थ ग्रहण करो। जो कुछ दिया, जो किया, जो जपा, जो स्नान किया, जो हवन किया, जो स्मरण किया,
श्लोक 62 (skanda.3.103.62)
यच्च तप्तं तपः सर्वं तच्छिवाय निवेदय॥ भुंजानश्च पठन्वापि शयानो विहरन्नपि ॥ पश्यञ्छृण्न्ववदन्गृह्णञ्छिवमेवानुचिंतय
yacca taptaṁ tapaḥ sarvaṁ tacchivāya nivedaya bhuṁjānaśca paṭhanvāpi śayāno viharannapi paśyañchṛṇnvavadangṛhṇañchivamevānuciṁtaya
"और जो तप तपा, वह सब शिव को अर्पित करो। भोजन करते हुए, पढ़ते हुए, सोते हुए, विहार करते हुए भी, देखते, सुनते, बोलते, ग्रहण करते हुए भी, सदा शिव का ही चिन्तन करो।
श्लोक 63 (skanda.3.103.63)
रुद्राक्षकंकणलसत्करदंडयुग्मो मालांतरालधृतभस्म सितत्रिपुंडूः ॥ पंचाक्षरं परिपठन्परमंत्रराजं ध्यायन्सदा पशुपतेश्चरणं रमेथाः
rudrākṣakaṁkaṇalasatkaradaṁḍayugmo mālāṁtarāladhṛtabhasma sitatripuṁḍūḥ paṁcākṣaraṁ paripaṭhanparamaṁtrarājaṁ dhyāyansadā paśupateścaraṇaṁ ramethāḥ
"रुद्राक्ष के कंकणों से चमकते दोनों हाथों-भुजाओंवाले, माला के बीच भस्म और सफेद त्रिपुण्ड्र धारण किए हुए, पंचाक्षर परम मन्त्रराज का सदा पाठ और ध्यान करते हुए, पशुपति के चरणों में रमण करो।
श्लोक 64 (skanda.3.103.64)
इति संक्षेपतो वत्स कथितो धर्मसंग्रहः ॥ अन्येषु च पुराणेषु विस्तरेण प्रकीर्तितः
iti saṁkṣepato vatsa kathito dharmasaṁgrahaḥ anyeṣu ca purāṇeṣu vistareṇa prakīrtitaḥ
"इस प्रकार, हे वत्स! संक्षेप में धर्म-संग्रह कहा गया; अन्य पुराणों में इसे विस्तार से वर्णित किया गया है।
श्लोक 65 (skanda.3.103.65)
अथापरं सर्वपुराणगुह्यं निःशेषपापौघहरं पवित्रम्॥ जयप्रदं सर्वविपद्विमोचनं वक्ष्यामि शैवं कवचं हिताय ते
athāparaṁ sarvapurāṇaguhyaṁ niḥśeṣapāpaughaharaṁ pavitram jayapradaṁ sarvavipadvimocanaṁ vakṣyāmi śaivaṁ kavacaṁ hitāya te
"अब मैं तुम्हारे हित के लिए, समस्त पुराणों के गुह्य, पवित्र, समस्त पापसमूह का नाशक, विजय देनेवाला, और समस्त विपत्तियों से मुक्त करनेवाला शैव कवच कहूँगा।"