ब्रह्म खण्ड · अध्याय 102
ऋषभ योगी द्वारा भद्रायु का पुनर्जीवन
श्लोक 1 (skanda.3.102.1)
॥ सूत उवाच ॥ विचित्रं शिवनिर्माणं विचित्र शिवचेष्टितम् ॥ विचित्रं शिवमाहात्म्यं विचित्रं शिवभाषितम्
sūta uvāca vicitraṁ śivanirmāṇaṁ vicitra śivaceṣṭitam vicitraṁ śivamāhātmyaṁ vicitraṁ śivabhāṣitam
सूत जी ने कहा — विचित्र है शिव की सृष्टि, विचित्र शिव की चेष्टा, विचित्र है शिव का माहात्म्य, विचित्र शिव के वचन।
श्लोक 2 (skanda.3.102.2)
विचित्रं शिवभक्तानां चरितं पापनाशनम् ॥ स्वर्गापवर्गयोः सत्यं साधनं तद्ब्रवीम्यहम्
vicitraṁ śivabhaktānāṁ caritaṁ pāpanāśanam svargāpavargayoḥ satyaṁ sādhanaṁ tadbravīmyaham
विचित्र है शिवभक्तों का पापनाशक चरित्र; मैं वही स्वर्ग और मोक्ष का सत्य साधन कहता हूँ।
श्लोक 3 (skanda.3.102.3)
अवंतीविषये कश्चिद्ब्राह्मणो मंदराह्वयः ॥ बभूव विषयारामः स्त्रीजितो धनसंग्रही
avaṁtīviṣaye kaścidbrāhmaṇo maṁdarāhvayaḥ babhūva viṣayārāmaḥ strījito dhanasaṁgrahī
अवन्ती देश में मन्दर नाम का एक ब्राह्मण था, विषयों में रत, स्त्री के वशीभूत, धन-संग्रही।
श्लोक 4 (skanda.3.102.4)
संध्यास्नापरित्यक्तो गंधमाल्यांबरप्रियः ॥ कुस्त्रीसक्तः कुमार्गस्थो यथा पूर्वमजामिलः
saṁdhyāsnāparityakto gaṁdhamālyāṁbarapriyaḥ kustrīsaktaḥ kumārgastho yathā pūrvamajāmilaḥ
संध्या-स्नान से रहित, गन्ध-माला-वस्त्र का प्रेमी, कुत्सित स्त्री में आसक्त, कुमार्गगामी, पूर्वकाल के अजामिल के समान।
श्लोक 5 (skanda.3.102.5)
स वेश्यां पिंगलां नाम रममाणो दिवानिशम् ॥ तस्या एव गृहे नित्यमासीदविजितेंद्रियः
sa veśyāṁ piṁgalāṁ nāma ramamāṇo divāniśam tasyā eva gṛhe nityamāsīdavijiteṁdriyaḥ
वह पिंगला नाम की एक वेश्या के साथ दिन-रात रमण करता हुआ, अजितेन्द्रिय होकर, नित्य उसी के घर में रहता था।
श्लोक 6 (skanda.3.102.6)
कदाचित्सदने तस्यास्तस्मिन्निवसति द्विजे ॥ ऋषभो नाम धर्मात्मा शिवयोगी समाययौ
kadācitsadane tasyāstasminnivasati dvije ṛṣabho nāma dharmātmā śivayogī samāyayau
एक बार, जब वह उस वेश्या के घर में रह रहा था, ऋषभ नाम के एक धर्मात्मा शिवयोगी वहाँ आए।
श्लोक 7 (skanda.3.102.7)
तमागतमभिप्रेक्ष्य मत्वा स्वं पुण्यमूर्जितम् ॥ सा वेश्या स च विप्रश्च पर्यपूजयतामुभौ
tamāgatamabhiprekṣya matvā svaṁ puṇyamūrjitam sā veśyā sa ca vipraśca paryapūjayatāmubhau
उन्हें आया देखकर, इसे अपना बड़ा पुण्य मानकर, वह वेश्या और वह ब्राह्मण दोनों ने उनकी पूजा की।
श्लोक 8 (skanda.3.102.8)
तमारोप्य महापीठे कंबलांबरसंभृते ॥ प्रक्षाल्य चरणौ भक्त्या तज्जलं दधतुः शिरः
tamāropya mahāpīṭhe kaṁbalāṁbarasaṁbhṛte prakṣālya caraṇau bhaktyā tajjalaṁ dadhatuḥ śiraḥ
उन्हें कम्बल और वस्त्र से सुसज्जित महापीठ पर बिठाकर, भक्तिपूर्वक उनके चरण धोकर, उन्होंने वह जल अपने सिर पर धारण किया।
श्लोक 9 (skanda.3.102.9)
स्वागतार्घ्यनमस्कारैर्गंधपुष्पाक्षतादिभिः ॥ उपचारैः समभ्यर्च्य भोजयामासतुर्मुदा
svāgatārghyanamaskārairgaṁdhapuṣpākṣatādibhiḥ upacāraiḥ samabhyarcya bhojayāmāsaturmudā
स्वागत, अर्घ्य, नमस्कार, गन्ध, पुष्प, अक्षत आदि उपचारों से उनकी पूजा करके, उन्होंने हर्षपूर्वक उन्हें भोजन कराया।
श्लोक 10 (skanda.3.102.10)
तं भुक्तवंतमाचांतं पर्यंके सुखसंस्तरे ॥ उपवेश्य मुदा युक्तौ तांबूलं प्रत्ययच्छताम्
taṁ bhuktavaṁtamācāṁtaṁ paryaṁke sukhasaṁstare upaveśya mudā yuktau tāṁbūlaṁ pratyayacchatām
भोजन करके आचमन किए हुए उन्हें, सुखद शय्यावाले पलंग पर बिठाकर, प्रसन्नतापूर्वक उन दोनों ने उन्हें ताम्बूल दिया।
श्लोक 11 (skanda.3.102.11)
पादसंवाहनं भक्त्या कुर्वंतौ दैवचो दितौ ॥ कल्पयित्वा तु शुश्रूषां प्रीणयामासतुश्चिरम्
pādasaṁvāhanaṁ bhaktyā kurvaṁtau daivaco ditau kalpayitvā tu śuśrūṣāṁ prīṇayāmāsatuściram
दैव से प्रेरित होकर भक्तिपूर्वक उनके पैर दबाते हुए, सेवा की व्यवस्था करके, उन्होंने उन्हें चिरकाल तक प्रसन्न किया।
श्लोक 12 (skanda.3.102.12)
एवं समर्चितस्ताभ्यां शिवयोगी महाद्युतिः ॥ अतिवाह्य निशामेकां ययौ प्रातस्तदादृतः
evaṁ samarcitastābhyāṁ śivayogī mahādyutiḥ ativāhya niśāmekāṁ yayau prātastadādṛtaḥ
इस प्रकार उन दोनों द्वारा पूजित वह महातेजस्वी शिवयोगी, एक रात्रि वहाँ बिताकर, आदरपूर्वक विदा होकर प्रातःकाल चले गए।
श्लोक 13 (skanda.3.102.13)
एवं काले गतप्राये स विप्रो निधनं गतः ॥ सा च वेश्या मृता काले ययौ कर्मार्जितां गतिम्
evaṁ kāle gataprāye sa vipro nidhanaṁ gataḥ sā ca veśyā mṛtā kāle yayau karmārjitāṁ gatim
इस प्रकार समय बीतने पर वह ब्राह्मण मृत्यु को प्राप्त हुआ; और वह वेश्या भी समय आने पर मरकर अपने कर्मों से अर्जित गति को प्राप्त हुई।
श्लोक 14 (skanda.3.102.14)
स विप्रः कर्मणा नीतो दशार्णधरणीपतेः ॥ वज्रबाहुकुटुंबिन्याः सुमत्या गर्भमास्थितः
sa vipraḥ karmaṇā nīto daśārṇadharaṇīpateḥ vajrabāhukuṭuṁbinyāḥ sumatyā garbhamāsthitaḥ
वह ब्राह्मण अपने कर्म से दशार्ण देश के राजा वज्रबाहु की पत्नी सुमति के गर्भ में स्थित हुआ।
श्लोक 15 (skanda.3.102.15)
तां ज्येष्ठपत्नीं नृपतेर्गर्भसंपदमाश्रिताम् ॥ अवेक्ष्य तस्यै गरलं सपत्न्यश्छद्मना ददुः
tāṁ jyeṣṭhapatnīṁ nṛpatergarbhasaṁpadamāśritām avekṣya tasyai garalaṁ sapatnyaśchadmanā daduḥ
उस राजा की ज्येष्ठ पत्नी को गर्भ की सम्पदा से युक्त देखकर, उसकी सौतों ने छलपूर्वक उसे विष दे दिया।
श्लोक 16 (skanda.3.102.16)
सा भुक्त्वा गरलं घोरं न मृता दैवयोगतः ॥ क्लेशमेव परं प्राप मरणादतिदुःसहम्
sā bhuktvā garalaṁ ghoraṁ na mṛtā daivayogataḥ kleśameva paraṁ prāpa maraṇādatiduḥsaham
वह भयंकर विष खाकर भी, दैवयोग से मरी नहीं, किन्तु मृत्यु से भी अधिक असह्य केवल परम क्लेश ही प्राप्त किया।
श्लोक 17 (skanda.3.102.17)
अथ काले समायाते पुत्रमे कमजीजनत् ॥ क्लेशेन महता साध्वी पीडिता वरवर्णिनी
atha kāle samāyāte putrame kamajījanat kleśena mahatā sādhvī pīḍitā varavarṇinī
फिर समय आने पर, उस सुन्दरी साध्वी ने अत्यन्त क्लेश से पीड़ित होकर एक पुत्र को जन्म दिया।
श्लोक 18 (skanda.3.102.18)
स निर्दशो राजपुत्रः स्पृष्टपूर्वो गरेण यत् ॥ तेनावाप महाक्लेशं क्रंदमानो दिवानिशम्
sa nirdaśo rājaputraḥ spṛṣṭapūrvo gareṇa yat tenāvāpa mahākleśaṁ kraṁdamāno divāniśam
वह दस दिन का भी न हुआ राजपुत्र, जो पहले ही विष से स्पर्शित था, इसी कारण महाक्लेश को प्राप्त हुआ, दिन-रात रोता रहा।
श्लोक 19 (skanda.3.102.19)
तस्य बालस्य माता च सर्वांगव्रणपीडिता ॥ बभूवतुरतिक्लिष्टौ गरयोगप्रभावतः
tasya bālasya mātā ca sarvāṁgavraṇapīḍitā babhūvaturatikliṣṭau garayogaprabhāvataḥ
उस बालक की माता, समस्त अंगों में व्रणों से पीड़ित, विष के प्रभाव से अत्यन्त क्लिष्ट हो गई।
श्लोक 20 (skanda.3.102.20)
तौ राज्ञा च समानीतौ वैद्यैश्च कृतभेषजौ ॥ न स्वास्थ्यमापतुर्यत्नैरनेकैर्योजितैरपि
tau rājñā ca samānītau vaidyaiśca kṛtabheṣajau na svāsthyamāpaturyatnairanekairyojitairapi
दोनों को राजा द्वारा वैद्यों के पास लाया गया और उपचार किया गया, किन्तु अनेक प्रयत्नों के बावजूद उन्हें स्वास्थ्य प्राप्त नहीं हुआ।
श्लोक 21 (skanda.3.102.21)
न रात्रौ लभते निद्रां सा राज्ञी विपुलव्यथा ॥ स्वपुत्रस्य च दुःखेन दुःखिता नितरां कृशा
na rātrau labhate nidrāṁ sā rājñī vipulavyathā svaputrasya ca duḥkhena duḥkhitā nitarāṁ kṛśā
वह विपुल वेदनावाली रानी रात में नींद नहीं पाती थी; अपने पुत्र के दुःख से दुःखी होकर अत्यन्त कृश हो गई।
श्लोक 22 (skanda.3.102.22)
नीत्वैवं कतिचिन्मासान्स राजा मातृपुत्रकौ ॥ जीवंतौ च मृतप्रायौ विलोक्यात्मन्यचिंतयत्
nītvaivaṁ katicinmāsānsa rājā mātṛputrakau jīvaṁtau ca mṛtaprāyau vilokyātmanyaciṁtayat
इस प्रकार कुछ महीने बिताकर, राजा ने माता-पुत्र दोनों को जीवित होते हुए भी मृतप्राय देखकर मन में सोचा —
श्लोक 23 (skanda.3.102.23)
एतौ मे गृहिणीपुत्रौ निरयादागताविह ॥ अश्रांतरोगौ क्रंदंतौ निद्राभंगविधायिनौ
etau me gṛhiṇīputrau nirayādāgatāviha aśrāṁtarogau kraṁdaṁtau nidrābhaṁgavidhāyinau
"ये मेरी पत्नी और पुत्र मानो नरक से यहाँ आए हैं, निरन्तर रोगग्रस्त, रोते हुए, मेरी नींद भंग करनेवाले।
श्लोक 24 (skanda.3.102.24)
अत्रोपायं करिष्यामि पापयोर्ध्रुवमेतयोः ॥ मर्तुं वा जीवितुं वापि न क्षमौ पापभोगिनौ
atropāyaṁ kariṣyāmi pāpayordhruvametayoḥ martuṁ vā jīvituṁ vāpi na kṣamau pāpabhoginau
"इन पापी दोनों का मैं कोई उपाय करूँगा; ये न मरने योग्य हैं, न जीने योग्य, अपने पाप का भोग भोगते हुए।"
श्लोक 25 (skanda.3.102.25)
इत्थं विनिश्चित्य च भूमिपालः सक्तः सपत्नीषु तदात्मजेषु ॥ आहूय सूतं निजदारपुत्रौ निर्वापयामास रथेन दूरम्
itthaṁ viniścitya ca bhūmipālaḥ saktaḥ sapatnīṣu tadātmajeṣu āhūya sūtaṁ nijadāraputrau nirvāpayāmāsa rathena dūram
इस प्रकार निश्चय करके, अपनी अन्य पत्नियों और उनके पुत्रों में आसक्त उस राजा ने सारथी को बुलाकर अपनी पत्नी और पुत्र को रथ द्वारा दूर छुड़वा दिया।
श्लोक 26 (skanda.3.102.26)
तौ सूतेन परित्यक्तौ कुत्रचिद्विजने वने ॥ अवापतुः परां पीडां क्षुत्तृड्भ्यां भृशविह्वलौ
tau sūtena parityaktau kutracidvijane vane avāpatuḥ parāṁ pīḍāṁ kṣuttṛḍbhyāṁ bhṛśavihvalau
सारथी द्वारा किसी निर्जन वन में त्याग दिए गए वे दोनों, भूख-प्यास से अत्यन्त विह्वल होकर, परम पीड़ा को प्राप्त हुए।
श्लोक 27 (skanda.3.102.27)
सोद्वहंती निजं बालं निपतंती पदे पदे ॥ निःश्वसंती निजं कर्म निंदंती चकिता भृशम्
sodvahaṁtī nijaṁ bālaṁ nipataṁtī pade pade niḥśvasaṁtī nijaṁ karma niṁdaṁtī cakitā bhṛśam
अपने बालक को उठाए हुए, पग-पग पर गिरती हुई, अपने ही कर्म पर आह भरती हुई, स्वयं को कोसती हुई, अत्यन्त भयभीत,
श्लोक 28 (skanda.3.102.28)
क्वचित्कंटकभिन्नांगी मुक्तकेशी भयातुरा ॥ क्वचिद्व्याघ्रस्वनैर्भीता क्वचिद्व्यालैरनुद्रुता
kvacitkaṁṭakabhinnāṁgī muktakeśī bhayāturā kvacidvyāghrasvanairbhītā kvacidvyālairanudrutā
कहीं काँटों से बिंधे अंगोंवाली, बिखरे केशोंवाली, भयातुर, कहीं व्याघ्रों की गर्जना से डरी हुई, कहीं सर्पों द्वारा पीछा की जाती हुई,
श्लोक 29 (skanda.3.102.29)
भर्त्स्यमाना पिशाचैश्च वेतालैर्ब्रह्मराक्षसैः ॥ महागुल्मेषु धावंती भिन्नपादा क्षुराश्मभिः
bhartsyamānā piśācaiśca vetālairbrahmarākṣasaiḥ mahāgulmeṣu dhāvaṁtī bhinnapādā kṣurāśmabhiḥ
पिशाचों, वेतालों और ब्रह्मराक्षसों द्वारा डराई जाती हुई, बड़ी झाड़ियों में दौड़ती हुई, तीखे पत्थरों से पैर कटे हुए,
श्लोक 30 (skanda.3.102.30)
सैवं घोरे महारण्ये भ्रमंती नृपगे हिनी ॥ दैवात्प्राप्ता वणिङ्मार्गं गोवाजिनरसेवितम्
saivaṁ ghore mahāraṇye bhramaṁtī nṛpage hinī daivātprāptā vaṇiṅmārgaṁ govājinarasevitam
इस प्रकार उस राजरानी ने घोर महावन में भटकते हुए, दैवयोग से गौ, अश्व और मनुष्यों से सेवित वणिकों के मार्ग को पा लिया।
श्लोक 31 (skanda.3.102.31)
गच्छंती तेन मार्गेण सुदूरमतियत्नतः ॥ ददर्श वैश्यनगरं वहुस्त्रीनरसेवितम्
gacchaṁtī tena mārgeṇa sudūramatiyatnataḥ dadarśa vaiśyanagaraṁ vahustrīnarasevitam
उस मार्ग पर अत्यन्त प्रयत्न से बहुत दूर तक चलते हुए, उसने अनेक स्त्री-पुरुषों से भरा एक वैश्य-नगर देखा।
श्लोक 32 (skanda.3.102.32)
तस्य गोप्ता महावैश्यो नगरस्य महाजनः ॥ अस्ति पद्माकरो नाम राजराज इवापरः
tasya goptā mahāvaiśyo nagarasya mahājanaḥ asti padmākaro nāma rājarāja ivāparaḥ
उस नगर का रक्षक एक महान वैश्य था, नगर का प्रमुख, जिसका नाम पद्माकर था, मानो एक दूसरा राजाधिराज।
श्लोक 33 (skanda.3.102.33)
तस्य वैश्यपतेः काचिद्गृहदासी नृपांगनाम् ॥ आयांती दूरतो दृष्ट्वा तदंतिकमुपाययौ
tasya vaiśyapateḥ kācidgṛhadāsī nṛpāṁganām āyāṁtī dūrato dṛṣṭvā tadaṁtikamupāyayau
उस वैश्यपति की एक गृहदासी ने दूर से आती हुई उस राजरानी को देखकर उसके समीप गई।
श्लोक 34 (skanda.3.102.34)
सा दासी नृपतेः कांतां सपुत्रां भृशपीडिताम् ॥ स्वयं विदितवृत्तांता स्वामिने प्रत्यदर्शयत्
sā dāsī nṛpateḥ kāṁtāṁ saputrāṁ bhṛśapīḍitām svayaṁ viditavṛttāṁtā svāmine pratyadarśayat
उस दासी ने स्वयं सारा वृत्तान्त जानकर, अत्यन्त पीड़ित उस पुत्रसहित राजरानी को अपने स्वामी को दिखाया।
श्लोक 35 (skanda.3.102.35)
स तां दृष्ट्वा विशां नाथो रुजार्त्तां क्लिष्टपुत्रकाम् ॥ नीत्वा रहसि सुव्यक्तं तद्वृत्तांतमपृच्छत
sa tāṁ dṛṣṭvā viśāṁ nātho rujārttāṁ kliṣṭaputrakām nītvā rahasi suvyaktaṁ tadvṛttāṁtamapṛcchata
उस वैश्यनाथ ने उसे रोग से पीड़ित, क्लिष्ट पुत्रवाली देखकर, एकान्त में ले जाकर स्पष्ट रूप से उसका वृत्तान्त पूछा।
श्लोक 36 (skanda.3.102.36)
तया निवेदिताशेषवृत्तांतः स वणिक्पतिः ॥ अहोकष्टमिति ज्ञात्वा निशश्वास मुहुर्मुहुः
tayā niveditāśeṣavṛttāṁtaḥ sa vaṇikpatiḥ ahokaṣṭamiti jñātvā niśaśvāsa muhurmuhuḥ
उसके द्वारा बताए गए सम्पूर्ण वृत्तान्त को सुनकर, वह वणिकपति "अहो, कैसा कष्ट है!" यह जानकर बार-बार लम्बी साँसें लेने लगा।
श्लोक 37 (skanda.3.102.37)
तामंतिके स्वगेहस्य संनिवेश्य रहोगृहे ॥ वासोन्नपानशयनैर्मातृसाम्यमपूजयत्
tāmaṁtike svagehasya saṁniveśya rahogṛhe vāsonnapānaśayanairmātṛsāmyamapūjayat
अपने घर के समीप, एक एकान्त कक्ष में उसे बसाकर, वस्त्र, अन्न-पान और शय्या से उसने उसे माता के समान सम्मानित किया।
श्लोक 38 (skanda.3.102.38)
तस्मिन्गृहे नृपवधूर्निवसंती सुरक्षिता ॥ व्रणयक्ष्मादिरोगाणां न शांतिं प्रत्यपद्यत
tasmingṛhe nṛpavadhūrnivasaṁtī surakṣitā vraṇayakṣmādirogāṇāṁ na śāṁtiṁ pratyapadyata
उस घर में सुरक्षित रहती हुई भी राजरानी को व्रण, यक्ष्मा आदि रोगों से शान्ति नहीं मिली।
श्लोक 39 (skanda.3.102.39)
ततो दिनैः कतिपयैः स बालो व्रणपीडितः ॥ विलंघितभिषक्सत्त्वो ममार च विधेर्वशात्
tato dinaiḥ katipayaiḥ sa bālo vraṇapīḍitaḥ vilaṁghitabhiṣaksattvo mamāra ca vidhervaśāt
फिर कुछ दिनों में वह व्रणपीड़ित बालक, वैद्यों की शक्ति को लाँघकर, भाग्य के वशीभूत होकर मर गया।
श्लोक 40 (skanda.3.102.40)
मृते स्वतनये राज्ञी शोकेन महतावृता ॥ मूर्च्छिता चापतद्भूमौ गजभग्नेव वल्लरी
mṛte svatanaye rājñī śokena mahatāvṛtā mūrcchitā cāpatadbhūmau gajabhagneva vallarī
अपने पुत्र के मरने पर, वह रानी महाशोक से आवृत होकर, मूर्च्छित होकर हाथी द्वारा तोड़ी गई लता के समान भूमि पर गिर पड़ी।
श्लोक 41 (skanda.3.102.41)
दैवात्संज्ञामवाप्याथ वाष्पक्लिन्नपयोधरा ॥ सांत्विताऽपि वणिक्स्त्रीभिर्विललाप सुदुःखिता
daivātsaṁjñāmavāpyātha vāṣpaklinnapayodharā sāṁtvitā'pi vaṇikstrībhirvilalāpa suduḥkhitā
दैवयोग से सचेत होकर, आँसुओं से भीगे वक्षस्थलवाली, वणिक-स्त्रियों द्वारा सान्त्वना दी जाने पर भी, वह अत्यन्त दुःखी होकर विलाप करने लगी —
श्लोक 42 (skanda.3.102.42)
हा ताततात हा पुत्र हा मम प्राणरक्षक ॥ हा राजकुलपूर्णेन्दो हा ममानंदवर्धन
hā tātatāta hā putra hā mama prāṇarakṣaka hā rājakulapūrṇendo hā mamānaṁdavardhana
"हाय पिता, पिता! हाय पुत्र! हाय मेरे प्राणरक्षक! हाय राजकुल के पूर्णचन्द्र! हाय मेरे आनन्द को बढ़ानेवाले!
श्लोक 43 (skanda.3.102.43)
इमामनाथां कृपणां त्वत्प्राणां त्यक्तवबांधवाम् ॥ मातरं ते परित्यज्य क्व यातोऽसि नृपात्मज
imāmanāthāṁ kṛpaṇāṁ tvatprāṇāṁ tyaktavabāṁdhavām mātaraṁ te parityajya kva yāto'si nṛpātmaja
"इस अनाथ, दीन, तुम्हारे ही प्राणों पर जीनेवाली, बन्धुहीन माता को त्यागकर, तुम कहाँ चले गए, हे राजपुत्र?"
श्लोक 44 (skanda.3.102.44)
इत्येभिरुदितैर्वाक्यैः शोकचिंताविवर्धकैः ॥ विलपंतीं मृतापत्यां को नु सांत्वयितुं क्षमः
ityebhiruditairvākyaiḥ śokaciṁtāvivardhakaiḥ vilapaṁtīṁ mṛtāpatyāṁ ko nu sāṁtvayituṁ kṣamaḥ
इन शोक और चिन्ता बढ़ानेवाले वचनों से, मृत सन्तान के लिए विलाप करती हुई उसे भला कौन सान्त्वना देने में समर्थ था?
श्लोक 45 (skanda.3.102.45)
एतस्मिन्समये तस्या दुःखशोकचिकित्सकः॥ ऋषभः पूर्वमाख्यातः शिवयोगी समाययौ
etasminsamaye tasyā duḥkhaśokacikitsakaḥ ṛṣabhaḥ pūrvamākhyātaḥ śivayogī samāyayau
इसी समय, उसके दुःख-शोक के चिकित्सक, पूर्वोक्त ऋषभ नाम के शिवयोगी वहाँ आ पहुँचे।
श्लोक 46 (skanda.3.102.46)
स योगी वैश्यनाथेन सार्घहस्तेन पूजितः॥ तस्याः सकाशमगमच्छोचन्त्या इदमब्रवीत्
sa yogī vaiśyanāthena sārghahastena pūjitaḥ tasyāḥ sakāśamagamacchocantyā idamabravīt
वैश्यनाथ द्वारा अर्घ्य सहित पूजित उस योगी ने, शोक करती उस रानी के समीप जाकर यह कहा।
श्लोक 47 (skanda.3.102.47)
ऋषभ उवाच ॥ अकस्मात्किमहो वत्से रोरवीषि विमूढधीः ॥ को जातः कतमो लोके को मृतो वद सांप्रतम्
ṛṣabha uvāca akasmātkimaho vatse roravīṣi vimūḍhadhīḥ ko jātaḥ katamo loke ko mṛto vada sāṁpratam
ऋषभ ने कहा — "क्यों, हे वत्से, अचानक भ्रमित बुद्धि से इस प्रकार क्रन्दन कर रही हो? किसका जन्म हुआ, किस लोक में, और किसकी मृत्यु हुई है, अभी बताओ।
श्लोक 48 (skanda.3.102.48)
अमी देहादयो भावास्तोयफेनसधर्मकाः ॥ क्वचिद्भ्रांतिः क्वचिच्छांतिः स्थितिर्भवति वा पुनः
amī dehādayo bhāvāstoyaphenasadharmakāḥ kvacidbhrāṁtiḥ kvacicchāṁtiḥ sthitirbhavati vā punaḥ
"ये देह आदि भाव जल के फेन के समान हैं; कहीं भ्रान्ति है, कहीं शान्ति है, अथवा पुनः स्थिति भी हो जाती है।
श्लोक 49 (skanda.3.102.49)
अतोऽस्मिन्फेनसदृशे देहे पञ्चत्वमागते ॥ शोकस्यानवकाशत्वान्न शोचंति विपश्चितः
ato'sminphenasadṛśe dehe pañcatvamāgate śokasyānavakāśatvānna śocaṁti vipaścitaḥ
"अतः इस फेन के समान देह के पंचत्व को प्राप्त होने पर, शोक के लिए कोई अवकाश न होने के कारण, बुद्धिमान लोग शोक नहीं करते।
श्लोक 50 (skanda.3.102.50)
गुणैर्भूतानि सृज्यंते भ्राम्यंते निजकर्मभिः ॥ कालेनाथ विकृष्यंते वासनायां च शेरते
guṇairbhūtāni sṛjyaṁte bhrāmyaṁte nijakarmabhiḥ kālenātha vikṛṣyaṁte vāsanāyāṁ ca śerate
"प्राणी गुणों से उत्पन्न होते हैं, अपने कर्मों से भटकते हैं, फिर काल द्वारा खींचे जाते हैं, और वासना में लीन रहते हैं।
श्लोक 51 (skanda.3.102.51)
माययोत्पत्तिमायांति गुणाः सत्त्वादयस्त्रयः ॥ तैरेव देहा जायंते जातास्तल्लक्षणाश्रयाः
māyayotpattimāyāṁti guṇāḥ sattvādayastrayaḥ taireva dehā jāyaṁte jātāstallakṣaṇāśrayāḥ
"माया से सत्त्व आदि तीनों गुण उत्पन्न होते हैं; उन्हीं से देह जन्म लेते हैं, जन्म लेकर उन्हीं के लक्षणों के आश्रित होते हैं।
श्लोक 52 (skanda.3.102.52)
देवत्वं यानि सत्त्वेन रजसा च मनुष्यताम् ॥ तिर्यक्त्वं तमसा जंतुर्वासनानुगतोवशः
devatvaṁ yāni sattvena rajasā ca manuṣyatām tiryaktvaṁ tamasā jaṁturvāsanānugatovaśaḥ
"सत्त्व से देवत्व, रजस से मनुष्यत्व, तमस से तिर्यक्त्व प्राप्त होता है; प्राणी अपनी वासना के अनुगत, उसी के वश में रहता है।
श्लोक 53 (skanda.3.102.53)
संसारे वर्तमानेस्मिञ्जंतुः कर्मानुबन्धनात् ॥ दुर्विभाव्यां गतिं याति सुखदुःखमयीं मुहुः
saṁsāre vartamānesmiñjaṁtuḥ karmānubandhanāt durvibhāvyāṁ gatiṁ yāti sukhaduḥkhamayīṁ muhuḥ
"इस संसार में विद्यमान प्राणी, अपने कर्मों के बन्धन से, सुख-दुःखमयी दुर्विभाव्य गति को बार-बार प्राप्त होता है।
श्लोक 54 (skanda.3.102.54)
अपि कल्पायुषां तेषां देवानां तु विपर्ययः ॥ अनेकामयबद्धानां का कथा नरदेहिनाम्
api kalpāyuṣāṁ teṣāṁ devānāṁ tu viparyayaḥ anekāmayabaddhānāṁ kā kathā naradehinām
"जिन देवताओं की आयु एक कल्प है, उनका भी विपर्यय होता है, तो अनेक रोगों से बद्ध मनुष्य-शरीरधारियों की क्या कथा?
श्लोक 55 (skanda.3.102.55)
केचिद्वदंति देहस्य कालमेव हि कारणम् ॥ कर्म केचिद्गुणान्केचिद्देहः साधारणो ह्ययम्
kecidvadaṁti dehasya kālameva hi kāraṇam karma kecidguṇānkeciddehaḥ sādhāraṇo hyayam
"कुछ लोग कहते हैं कि देह का कारण केवल काल है, कुछ कहते हैं कर्म, कुछ गुण — यह देह इन सभी का साधारण परिणाम है।
श्लोक 56 (skanda.3.102.56)
कालकर्मगुणाधानं पञ्चात्मकमिदं वपुः ॥ जातं दृष्ट्वा न हृष्यंति न शोचंति मृतं बुधाः
kālakarmaguṇādhānaṁ pañcātmakamidaṁ vapuḥ jātaṁ dṛṣṭvā na hṛṣyaṁti na śocaṁti mṛtaṁ budhāḥ
"काल, कर्म और गुणों से निर्मित यह पंचतत्त्वमय शरीर — इसके जन्म को देखकर बुद्धिमान हर्षित नहीं होते, न मृत्यु को देखकर शोक करते हैं।
श्लोक 57 (skanda.3.102.57)
अव्यक्ते जायते जंतुरव्यक्ते च प्रलीयते ॥ मध्ये व्यक्तवदाभाति जलबुद्बुदसन्निभः
avyakte jāyate jaṁturavyakte ca pralīyate madhye vyaktavadābhāti jalabudbudasannibhaḥ
"प्राणी अव्यक्त में जन्म लेता है और अव्यक्त में ही विलीन हो जाता है; बीच में जल के बुलबुले के समान व्यक्त-सा प्रतीत होता है।
श्लोक 58 (skanda.3.102.58)
यदा गर्भगतो देही विनाशः कल्पितस्तदा ॥ दैवाज्जीवति वा जातो म्रियते सहसैव वा
yadā garbhagato dehī vināśaḥ kalpitastadā daivājjīvati vā jāto mriyate sahasaiva vā
"जब प्राणी गर्भ में होता है, तभी उसका विनाश निश्चित हो जाता है; दैवयोग से जन्मा हुआ जीता है, या तत्काल ही मर जाता है।
श्लोक 59 (skanda.3.102.59)
गर्भस्था एव नश्यंति जातमात्रास्तथा परे ॥ क्वचिद्युवानो नश्यंति म्रियंते केपि वार्धके
garbhasthā eva naśyaṁti jātamātrāstathā pare kvacidyuvāno naśyaṁti mriyaṁte kepi vārdhake
"कुछ गर्भ में ही नष्ट हो जाते हैं, अन्य जन्म लेते ही; कुछ युवावस्था में नष्ट होते हैं, कुछ वृद्धावस्था में मरते हैं।
श्लोक 60 (skanda.3.102.60)
यादृशं प्राक्तनं कर्म तादृशं विंदते वपुः ॥ भुंक्ते तदनुरूपाणि सुखदुःखानि वै ह्यसौ
yādṛśaṁ prāktanaṁ karma tādṛśaṁ viṁdate vapuḥ bhuṁkte tadanurūpāṇi sukhaduḥkhāni vai hyasau
"जैसा पूर्वजन्म का कर्म होता है, वैसा ही शरीर प्राप्त होता है; वह उसी के अनुरूप सुख-दुःख भोगता है।
श्लोक 61 (skanda.3.102.61)
मायानुभावेरितयोः पित्रोः सुरतसंभ्रमात् ॥ देह उत्पद्यते कोपि पुंयोषित्क्लीबलक्षणः
māyānubhāveritayoḥ pitroḥ suratasaṁbhramāt deha utpadyate kopi puṁyoṣitklībalakṣaṇaḥ
"माया के प्रभाव से प्रेरित माता-पिता के सुरत-संभ्रम से, कोई भी शरीर पुरुष, स्त्री अथवा नपुंसक लक्षणवाला उत्पन्न होता है।
श्लोक 62 (skanda.3.102.62)
आयुः सुखं च दुःख च पुण्यं पापं श्रुतं धनम् ॥ ललाटे लिखितं धात्रा वहञ्जंतुः प्रजायते
āyuḥ sukhaṁ ca duḥkha ca puṇyaṁ pāpaṁ śrutaṁ dhanam lalāṭe likhitaṁ dhātrā vahañjaṁtuḥ prajāyate
"आयु, सुख, दुःख, पुण्य, पाप, विद्या और धन — विधाता द्वारा ललाट पर लिखे इन्हें धारण करके ही प्राणी जन्म लेता है।
श्लोक 63 (skanda.3.102.63)
कर्मणामविलंघ्यत्वात्कालस्याप्यनतिक्रमात् ॥ अनित्यत्वाच्च भावानां न शोकं कर्तुमर्हसि
karmaṇāmavilaṁghyatvātkālasyāpyanatikramāt anityatvācca bhāvānāṁ na śokaṁ kartumarhasi
"कर्मों के अलंघनीय होने से, काल के भी अतिक्रमण न होने से, और भावों के अनित्य होने से, तुम्हें शोक नहीं करना चाहिए।
श्लोक 64 (skanda.3.102.64)
क्व स्वप्ने नियतं स्थैर्यमिंद्रजाले क्व सत्यता ॥ क्व नित्यता शरन्मेघे क्व शश्वत्त्वं कलेवरे
kva svapne niyataṁ sthairyamiṁdrajāle kva satyatā kva nityatā śaranmeghe kva śaśvattvaṁ kalevare
"स्वप्न में स्थिरता कहाँ निश्चित है? इन्द्रजाल में सत्यता कहाँ है? शरद के मेघ में नित्यता कहाँ है? शरीर में शाश्वतता कहाँ है?
श्लोक 65 (skanda.3.102.65)
तव जन्मान्यतीतानि शतकोट्ययुतानि च ॥ अजानंत्याः परं तत्त्वं संप्राप्तोऽयं महाश्रमः
tava janmānyatītāni śatakoṭyayutāni ca ajānaṁtyāḥ paraṁ tattvaṁ saṁprāpto'yaṁ mahāśramaḥ
"तुम्हारे सैकड़ों-करोड़ों जन्म बीत चुके हैं; परम तत्त्व को न जानते हुए, तुमने यह महान श्रम प्राप्त किया है।
श्लोक 66 (skanda.3.102.66)
कस्यकस्यासि तनया जननी कस्यकस्य वा ॥ कस्यकस्यासि गृहिणी भवकोटिषु वर्त्तिनी
kasyakasyāsi tanayā jananī kasyakasya vā kasyakasyāsi gṛhiṇī bhavakoṭiṣu varttinī
"करोड़ों जन्मों में विचरण करती हुई तुम किस-किसकी पुत्री रही हो, किस-किसकी जननी, किस-किसकी गृहिणी रही हो?
श्लोक 67 (skanda.3.102.67)
पञ्चभूतात्मको देहस्त्वगसृङ्मांसबन्धनः ॥ मेदोमज्जास्थिनिचितो विण्मूत्रश्लेष्मभाजनम्
pañcabhūtātmako dehastvagasṛṅmāṁsabandhanaḥ medomajjāsthinicito viṇmūtraśleṣmabhājanam
"पंचभूतों से बना यह शरीर, त्वचा-रक्त-मांस से बँधा हुआ, मेद-मज्जा-अस्थि से भरा, मल-मूत्र-कफ का पात्र है।
श्लोक 68 (skanda.3.102.68)
शरीरांतरमप्येतन्निजदेहोद्भवं मलम् ॥ मत्त्वा स्वतनयं मूढे मा शोकं कर्तुमर्हसि
śarīrāṁtaramapyetannijadehodbhavaṁ malam mattvā svatanayaṁ mūḍhe mā śokaṁ kartumarhasi
"यह दूसरा शरीर भी तुम्हारे ही शरीर से उत्पन्न मल ही है; इसे अपना पुत्र मानकर, हे मूढ़े! तुम्हें शोक नहीं करना चाहिए।
श्लोक 69 (skanda.3.102.69)
यदि नाम जनः कश्चिन्मृत्युं तरति यत्नतः ॥ कथं तर्हि विपद्येरन्सर्वे पूर्वे विपश्चितः
yadi nāma janaḥ kaścinmṛtyuṁ tarati yatnataḥ kathaṁ tarhi vipadyeransarve pūrve vipaścitaḥ
"यदि कोई मनुष्य प्रयत्न से मृत्यु को टाल सकता, तो पूर्वकाल के सभी बुद्धिमान लोग कैसे मृत्यु को प्राप्त होते?
श्लोक 70 (skanda.3.102.70)
तपसा विद्यया बुद्ध्या मन्त्रौषधिरसायनैः ॥ अतियाति परं मृत्युं न कश्चिदपि पंडितः
tapasā vidyayā buddhyā mantrauṣadhirasāyanaiḥ atiyāti paraṁ mṛtyuṁ na kaścidapi paṁḍitaḥ
"तप से, विद्या से, बुद्धि से, मन्त्र-औषधि-रसायनों से, कोई भी पण्डित मृत्यु को लाँघकर नहीं जा सकता।
श्लोक 71 (skanda.3.102.71)
एकस्याद्य मृतिर्जंतोः श्वश्चान्यस्य वरानने ॥ तस्मादनित्यावयवे न त्वं शोचितुमर्हसि
ekasyādya mṛtirjaṁtoḥ śvaścānyasya varānane tasmādanityāvayave na tvaṁ śocitumarhasi
"आज किसी एक प्राणी की मृत्यु है, कल किसी और की, हे सुन्दरी! इसलिए इस अनित्य देह के लिए तुम्हें शोक नहीं करना चाहिए।
श्लोक 72 (skanda.3.102.72)
नित्यं सन्निहितो मृत्युः किं सुखं वद देहिनाम् ॥ व्याघ्रे पुरः स्थिते ग्रासः पशूनां किं नु रोचते
nityaṁ sannihito mṛtyuḥ kiṁ sukhaṁ vada dehinām vyāghre puraḥ sthite grāsaḥ paśūnāṁ kiṁ nu rocate
"मृत्यु सदा समीप है; प्राणियों को क्या सुख है, बताओ? सामने बाघ खड़ा हो तो पशुओं को भोजन में क्या रुचि होती है?
श्लोक 73 (skanda.3.102.73)
अतो जन्मजरां जेतुं यदीच्छसि वरानने ॥ शरणं व्रज सर्वेशं मृत्युंजयमुमापतिम्
ato janmajarāṁ jetuṁ yadīcchasi varānane śaraṇaṁ vraja sarveśaṁ mṛtyuṁjayamumāpatim
"इसलिए, हे सुन्दरी! यदि तुम जन्म-जरा को जीतना चाहती हो, तो समस्त के स्वामी, मृत्युंजय, उमापति की शरण में जाओ।
श्लोक 74 (skanda.3.102.74)
तावन्मृत्युभयं घोरं तावज्जन्मजराभयम् ॥ यावन्नो याति शरणं देही शिवपदांबुजम्
tāvanmṛtyubhayaṁ ghoraṁ tāvajjanmajarābhayam yāvanno yāti śaraṇaṁ dehī śivapadāṁbujam
"जब तक प्राणी शिव के चरणकमलों की शरण में नहीं जाता, तब तक ही मृत्यु का घोर भय है, और जन्म-जरा का भय है।
श्लोक 75 (skanda.3.102.75)
अनुभूयेह दुःखानि संसारे भृशदारुणे ॥ मनो यदा वियुज्येत तदा ध्येयो महेश्वरः
anubhūyeha duḥkhāni saṁsāre bhṛśadāruṇe mano yadā viyujyeta tadā dhyeyo maheśvaraḥ
"इस अत्यन्त भयंकर संसार में दुःखों का अनुभव करके, जब मन विरक्त हो जाए, तब महेश्वर का ध्यान करना चाहिए।
श्लोक 76 (skanda.3.102.76)
मनसा पिबतः पुंसः शिवध्यानरसामृतम् ॥ भूयस्तृष्णा न जायेत संसारविषयासवे
manasā pibataḥ puṁsaḥ śivadhyānarasāmṛtam bhūyastṛṣṇā na jāyeta saṁsāraviṣayāsave
"मन से शिवध्यान के अमृत-रस को पीनेवाले पुरुष को संसार के विषयों की मदिरा के लिए फिर से तृष्णा नहीं होती।
श्लोक 77 (skanda.3.102.77)
विमुक्तं सर्वसंगैश्च मनो वैराग्ययंत्रितम् ॥ यदा शिवपदे मग्नं तदा नास्ति पुनर्भवः
vimuktaṁ sarvasaṁgaiśca mano vairāgyayaṁtritam yadā śivapade magnaṁ tadā nāsti punarbhavaḥ
"समस्त आसक्तियों से मुक्त, वैराग्य से नियंत्रित मन जब शिवपद में लीन हो जाता है, तब पुनर्जन्म नहीं होता।
श्लोक 78 (skanda.3.102.78)
तस्मादिदं मनो भद्रे शिवध्यानैकसाधनम् ॥ शोकमोहसमाविष्टं मा कुरुष्व शिवं भज
tasmādidaṁ mano bhadre śivadhyānaikasādhanam śokamohasamāviṣṭaṁ mā kuruṣva śivaṁ bhaja
"इसलिए, हे भद्रे! शिवध्यान के एकमात्र साधन इस मन को शोक-मोह से युक्त मत करो, शिव को भजो।"
श्लोक 79 (skanda.3.102.79)
सूत उवाच ॥ इत्थं सानुनयं राज्ञी बोधिता शिवयोगिना ॥ प्रत्याचष्ट गुरोस्तस्य प्रणम्य चरणां बुजम्
sūta uvāca itthaṁ sānunayaṁ rājñī bodhitā śivayoginā pratyācaṣṭa gurostasya praṇamya caraṇāṁ bujam
सूत जी ने कहा — इस प्रकार शिवयोगी द्वारा प्रेमपूर्वक समझाई गई वह रानी, उस गुरु के चरणकमलों में प्रणाम करके उत्तर देने लगी।
श्लोक 80 (skanda.3.102.80)
राज्ञ्युवाच ॥ भगवन्मृतपुत्रायास्त्यक्तायाः प्रियबन्धुभिः ॥ महारोगातुराया मे का गतिर्मरणं विना
rājñyuvāca bhagavanmṛtaputrāyāstyaktāyāḥ priyabandhubhiḥ mahārogāturāyā me kā gatirmaraṇaṁ vinā
रानी ने कहा — "हे भगवन्! पुत्र के मृत, प्रियजनों द्वारा त्यागी गई, महारोग से पीड़ित मुझ जैसी की, मृत्यु के अतिरिक्त क्या गति है?
श्लोक 81 (skanda.3.102.81)
अतोऽहं मर्तुमिच्छामि सहैव शिशुनाऽमुना ॥ कृतार्थाहं यदद्य त्वामपश्यं मरणोन्मुखी
ato'haṁ martumicchāmi sahaiva śiśunā'munā kṛtārthāhaṁ yadadya tvāmapaśyaṁ maraṇonmukhī
"इसलिए मैं इसी शिशु के साथ मरना चाहती हूँ; मैं आज कृतार्थ हुई, कि मृत्यु के सम्मुख होकर भी मैंने आपके दर्शन पाए।"
श्लोक 82 (skanda.3.102.82)
सूत उवाच ॥ इति तस्या वचः श्रुत्वा शिवयोगी दयानिधिः ॥ पूर्वोपकारं संस्मृत्य मृतस्यांतिकमाययौ
sūta uvāca iti tasyā vacaḥ śrutvā śivayogī dayānidhiḥ pūrvopakāraṁ saṁsmṛtya mṛtasyāṁtikamāyayau
सूत जी ने कहा — उसके इन वचनों को सुनकर, दयानिधि उस शिवयोगी ने अपने पूर्व-उपकार का स्मरण करके, उस मृत बालक के समीप जाकर,
श्लोक 83 (skanda.3.102.83)
स तदा भस्म संगृह्य शिवमन्त्राभिमंत्रितम् ॥ विदीर्णे तन्मुखे क्षिप्त्वा मृतं प्राणैरयोजयत्
sa tadā bhasma saṁgṛhya śivamantrābhimaṁtritam vidīrṇe tanmukhe kṣiptvā mṛtaṁ prāṇairayojayat
उन्होंने तब शिवमन्त्र से अभिमन्त्रित भस्म लेकर, उसके फटे हुए मुख में डालकर, उस मृत को प्राणों से युक्त कर दिया।
श्लोक 84 (skanda.3.102.84)
स बालः संगतः प्राणैः शनैरुन्मील्य लोचने ॥ प्राप्तपूर्वेन्द्रियबलो रुरोद स्तन्यकांक्षया
sa bālaḥ saṁgataḥ prāṇaiḥ śanairunmīlya locane prāptapūrvendriyabalo ruroda stanyakāṁkṣayā
वह बालक प्राणों से युक्त होकर, धीरे-धीरे नेत्र खोलकर, पूर्व की इन्द्रिय-शक्ति प्राप्त करके, स्तनपान की इच्छा से रोने लगा।
श्लोक 85 (skanda.3.102.85)
मृतस्य पुनरुत्थानं वीक्ष्य बालस्य विस्मिताः ॥ जना मुमुदिरे सर्वे नगरेषु पुरोगमाः
mṛtasya punarutthānaṁ vīkṣya bālasya vismitāḥ janā mumudire sarve nagareṣu purogamāḥ
मृत बालक के पुनर्जीवित होने को देखकर, नगर के अग्रणी सभी लोग आश्चर्यचकित होकर आनन्दित हुए।
श्लोक 86 (skanda.3.102.86)
अथानंदभरा राज्ञी विह्वलोन्मत्तलोचना ॥ जग्राह तनयं शीघ्रं बाष्पव्याकुललोचना
athānaṁdabharā rājñī vihvalonmattalocanā jagrāha tanayaṁ śīghraṁ bāṣpavyākulalocanā
फिर आनन्द से भरी वह रानी, विह्वल और उन्मत्त नेत्रोंवाली, आँसुओं से व्याकुल नेत्रोंवाली, शीघ्र ही अपने पुत्र को गोद में ले ली।
श्लोक 87 (skanda.3.102.87)
उपगुह्य तदा तन्वी परमानंदनिर्वृता ॥ न वेदात्मानमन्यं वा सुषुप्तेव परिश्रमात्
upaguhya tadā tanvī paramānaṁdanirvṛtā na vedātmānamanyaṁ vā suṣupteva pariśramāt
उसे गले लगाकर, परम आनन्द से तृप्त वह कोमलांगी, थकान से मानो सोई हुई-सी, न अपने को जानती थी, न किसी और को।
श्लोक 88 (skanda.3.102.88)
पुनश्च ऋषभो योगी तयोर्मातृकुमारयोः ॥ विषव्रणयुतं देहं भस्मनैव परामृशत्
punaśca ṛṣabho yogī tayormātṛkumārayoḥ viṣavraṇayutaṁ dehaṁ bhasmanaiva parāmṛśat
फिर योगी ऋषभ ने उस माता और पुत्र दोनों के, विष-व्रणयुक्त शरीर को उसी भस्म से स्पर्श किया।
श्लोक 89 (skanda.3.102.89)
तौ च तद्भस्मना स्पृष्टौ प्राप्तदिव्यकलेवरौ ॥ देवानां सदृशं रूपं दधतुः कांतिभूषितम्
tau ca tadbhasmanā spṛṣṭau prāptadivyakalevarau devānāṁ sadṛśaṁ rūpaṁ dadhatuḥ kāṁtibhūṣitam
उस भस्म से स्पर्शित होकर वे दोनों दिव्य देह को प्राप्त हुए, देवताओं के समान कान्तिमय रूप धारण किया।
श्लोक 90 (skanda.3.102.90)
संप्राप्ते त्रिदिवैश्वर्ये यत्सुखं पुण्यकर्मणाम् ॥ तस्माच्छतगुणं प्राप सा राज्ञी सुखमुत्तमम्
saṁprāpte tridivaiśvarye yatsukhaṁ puṇyakarmaṇām tasmācchataguṇaṁ prāpa sā rājñī sukhamuttamam
स्वर्ग के ऐश्वर्य को प्राप्त पुण्यकर्मियों को जो सुख मिलता है, उससे भी सौ गुना उत्तम सुख उस रानी ने प्राप्त किया।
श्लोक 91 (skanda.3.102.91)
तां पादयोर्निपतितामृषभः प्रेमविह्वलः ॥ उत्थाप्याश्वासयामास दुःखैर्मुक्तामुवाच ह
tāṁ pādayornipatitāmṛṣabhaḥ premavihvalaḥ utthāpyāśvāsayāmāsa duḥkhairmuktāmuvāca ha
उसके चरणों में गिरी हुई उस रानी को, प्रेम से विह्वल ऋषभ ने उठाकर सान्त्वना दी, और दुःखों से मुक्त हुई उससे यह कहा —
श्लोक 92 (skanda.3.102.92)
अयि वत्से महाराज्ञि जीवत्वं शाश्वतीः समाः ॥ यावज्जीवसि लोकेस्मिन्न तावत्प्राप्स्यसे जराम्
ayi vatse mahārājñi jīvatvaṁ śāśvatīḥ samāḥ yāvajjīvasi lokesminna tāvatprāpsyase jarām
"हे वत्से! हे महारानी! शाश्वत वर्षों तक जीवित रहो; जब तक तुम इस लोक में जीवित रहोगी, तब तक तुम्हें बुढ़ापा प्राप्त नहीं होगा।
श्लोक 93 (skanda.3.102.93)
एष ते तनयः साध्वि भद्रायुरिति नामतः ॥ ख्यातिं यास्यति लोकेषु निजं राज्यमवाप्स्यति
eṣa te tanayaḥ sādhvi bhadrāyuriti nāmataḥ khyātiṁ yāsyati lokeṣu nijaṁ rājyamavāpsyati
"यह तुम्हारा पुत्र, हे साध्वी! भद्रायु नाम से लोकों में प्रसिद्धि पाएगा, और अपना राज्य प्राप्त करेगा।
श्लोक 94 (skanda.3.102.94)
अस्य वैश्यस्य सदने तावत्तिष्ठ शुचिस्मिते ॥ यावदेष कुमारस्ते प्राप्तविद्यो भविष्यति
asya vaiśyasya sadane tāvattiṣṭha śucismite yāvadeṣa kumāraste prāptavidyo bhaviṣyati
"तब तक, हे शुचिस्मिते! इसी वैश्य के घर में रहो, जब तक तुम्हारा यह कुमार विद्या प्राप्त न कर ले।"
श्लोक 95 (skanda.3.102.95)
सूत उवाच॥ इति तामृषभो योगी तं च राजकुमारकम् ॥ संजीव्य भस्मवीर्येण ययौ देशान्यथेप्सितान्
sūta uvāca iti tāmṛṣabho yogī taṁ ca rājakumārakam saṁjīvya bhasmavīryeṇa yayau deśānyathepsitān
सूत जी ने कहा — इस प्रकार वह योगी ऋषभ, उस रानी और उस राजकुमार को अपनी भस्म की शक्ति से जीवित करके, यथेच्छ देशों की ओर चला गया।