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ब्रह्म खण्ड · अध्याय 101

शिवभक्तों का प्रभाव

अध्याय 100अध्याय-सूचीअध्याय 102

श्लोक 1 (skanda.3.101.1)

॥ ऋषय ऊचुः ॥ साधुसाधु महाभाग त्वया कथितमुत्तमम् ॥ आख्यानं पुनरन्यत्र विचित्रं वक्तुमर्हसि

ṛṣaya ūcuḥ sādhusādhu mahābhāga tvayā kathitamuttamam ākhyānaṁ punaranyatra vicitraṁ vaktumarhasi

ऋषियों ने कहा — साधु, साधु! हे महाभाग! आपने उत्तम आख्यान कहा है। अब कहीं अन्यत्र की एक विचित्र कथा और कहने योग्य हैं।

श्लोक 2 (skanda.3.101.2)

सूत उवाच ॥ विदर्भविषये पूर्वमासीदेको द्विजोत्तमः ॥ वेदमित्र इति ख्यातो वेद शास्त्रार्थवित्सुधीः

sūta uvāca vidarbhaviṣaye pūrvamāsīdeko dvijottamaḥ vedamitra iti khyāto veda śāstrārthavitsudhīḥ

सूत जी ने कहा — पूर्वकाल में विदर्भ देश में वेदमित्र नाम से विख्यात एक श्रेष्ठ ब्राह्मण था, वेद-शास्त्रों के अर्थ का ज्ञाता, बुद्धिमान।

श्लोक 3 (skanda.3.101.3)

तस्यासीदपरो विप्रः सखा सारस्वताह्वयः ॥ तावुभौ परमस्निग्धावेकदेशनिवासिनौ

tasyāsīdaparo vipraḥ sakhā sārasvatāhvayaḥ tāvubhau paramasnigdhāvekadeśanivāsinau

उसका सारस्वत नाम का एक अन्य ब्राह्मण मित्र था; दोनों परम स्नेही थे, एक ही स्थान में निवास करते थे।

श्लोक 4 (skanda.3.101.4)

वेदमित्रस्य पुत्रोऽभूत्सुमेधा नाम सुव्रतः ॥ सारस्वतस्य तनयः सोमवानिति विश्रुतः

vedamitrasya putro'bhūtsumedhā nāma suvrataḥ sārasvatasya tanayaḥ somavāniti viśrutaḥ

वेदमित्र का पुत्र सुमेधा नाम से सुव्रत हुआ; सारस्वत का पुत्र सोमवान नाम से विख्यात हुआ।

श्लोक 5 (skanda.3.101.5)

उभौ सवयसौ बालौ समवेषौ समस्थिती ॥ समं च कृतसंस्कारौ सम विद्यौ बभूवतुः

ubhau savayasau bālau samaveṣau samasthitī samaṁ ca kṛtasaṁskārau sama vidyau babhūvatuḥ

समान आयु, समान वेष, समान स्थितिवाले वे दोनों बालक, समान रूप से संस्कार किए गए, समान विद्यावाले हुए।

श्लोक 6 (skanda.3.101.6)

सांगानधीत्य तौ वेदांस्तर्कव्याकरणानि च ॥ इतिहासपुराणानि धर्मशास्त्राणि कृत्स्नशः

sāṁgānadhītya tau vedāṁstarkavyākaraṇāni ca itihāsapurāṇāni dharmaśāstrāṇi kṛtsnaśaḥ

अंगों सहित वेदों, तर्क, व्याकरण, इतिहास-पुराणों और धर्मशास्त्रों का पूर्ण रूप से अध्ययन करके,

श्लोक 7 (skanda.3.101.7)

सर्वविद्याकुशलिनौ बाल्य एव मनीषिणौ ॥ प्रहर्षमतुलं पित्रोर्ददतुः सकलैर्गुणैः

sarvavidyākuśalinau bālya eva manīṣiṇau praharṣamatulaṁ pitrordadatuḥ sakalairguṇaiḥ

समस्त विद्याओं में कुशल वे बुद्धिमान बालक, बाल्यावस्था में ही अपने सभी गुणों से माता-पिता को अतुल हर्ष देने लगे।

श्लोक 8 (skanda.3.101.8)

तावेकदा स्वतनयौ तावुभौ ब्राह्मणोत्तमौ ॥ आहूयावोचतां प्रीत्या षोड शाब्दौ शुभाकृती

tāvekadā svatanayau tāvubhau brāhmaṇottamau āhūyāvocatāṁ prītyā ṣoḍa śābdau śubhākṛtī

एक बार उन दोनों श्रेष्ठ ब्राह्मणों ने अपने-अपने सोलह वर्ष के शुभ रूपवाले पुत्रों को प्रेमपूर्वक बुलाकर कहा —

श्लोक 9 (skanda.3.101.9)

हे पुत्रकौ युवां बाल्ये कृतविद्यौ सुवर्चसौ ॥ वैवाहिकोयं समयो वर्तते युवयोः समम्

he putrakau yuvāṁ bālye kṛtavidyau suvarcasau vaivāhikoyaṁ samayo vartate yuvayoḥ samam

"हे पुत्रो! तुम दोनों बचपन में ही विद्या पूर्ण करके तेजस्वी हो गए हो; अब तुम दोनों के विवाह का समय आ गया है।

श्लोक 10 (skanda.3.101.10)

इमं प्रसाद्य राजानं विदर्भेशं स्वविद्यया ॥ ततः प्राप्य धनं भूरि कृतोद्वाहौ भविष्यथः

imaṁ prasādya rājānaṁ vidarbheśaṁ svavidyayā tataḥ prāpya dhanaṁ bhūri kṛtodvāhau bhaviṣyathaḥ

"इस विदर्भ के राजा को अपनी विद्या से प्रसन्न करके, फिर प्रचुर धन प्राप्त करके तुम विवाह करोगे।"

श्लोक 11 (skanda.3.101.11)

एवमुक्तौ सुतौ ताभ्यां तावुभौ द्विजनंदनौ ॥ विदर्भराजमासाद्य समतोषयतां गुणैः

evamuktau sutau tābhyāṁ tāvubhau dvijanaṁdanau vidarbharājamāsādya samatoṣayatāṁ guṇaiḥ

इस प्रकार पिताओं द्वारा कहे जाने पर, वे दोनों ब्राह्मणपुत्र विदर्भराज के पास जाकर अपने गुणों से उन्हें संतुष्ट करने लगे।

श्लोक 12 (skanda.3.101.12)

विद्यया परितुष्टाय तस्मै द्विजकुमारकौ ॥ विवाहार्थं कृतोद्योगौ धनहीनावशंसताम्

vidyayā parituṣṭāya tasmai dvijakumārakau vivāhārthaṁ kṛtodyogau dhanahīnāvaśaṁsatām

उनकी विद्या से संतुष्ट होकर राजा ने उनके विवाह की तैयारी की; किन्तु धनहीन उन दोनों ब्राह्मणकुमारों ने अपनी इच्छा व्यक्त की।

श्लोक 13 (skanda.3.101.13)

तयोरपि मतं ज्ञात्वा स विदर्भमहीपतिः ॥ प्रहस्य किंचित्प्रोवाच लोकतत्त्वविवित्सया

tayorapi mataṁ jñātvā sa vidarbhamahīpatiḥ prahasya kiṁcitprovāca lokatattvavivitsayā

उनका भी विचार जानकर, लोकतत्त्व की परीक्षा लेने की इच्छा से, विदर्भाधिपति ने कुछ हँसते हुए कहा —

श्लोक 14 (skanda.3.101.14)

आस्ते निषधराजस्य राज्ञी सीमंतिनी सती ॥ सोमवारे महादेवं पूजयत्यंबिकायुतम्

āste niṣadharājasya rājñī sīmaṁtinī satī somavāre mahādevaṁ pūjayatyaṁbikāyutam

"निषध के राजा की सती रानी सीमन्तिनी, सोमवार को अम्बिका सहित महादेव की पूजा करती है।

श्लोक 15 (skanda.3.101.15)

तस्मिन्दिने सपत्नीकान्द्विजाग्र्यान्वेदवित्तमान्॥ संपूज्य परया भक्त्या धनं भूरि ददाति च

tasmindine sapatnīkāndvijāgryānvedavittamān saṁpūjya parayā bhaktyā dhanaṁ bhūri dadāti ca

"उस दिन वह वेदज्ञ श्रेष्ठ ब्राह्मणों को उनकी पत्नियों सहित परम भक्ति से पूजकर प्रचुर धन देती है।

श्लोक 16 (skanda.3.101.16)

अतोऽत्र युवयोरैको नारीविभ्रमवेषधृक्॥ एकस्तस्या पतिर्भूत्वा जायेतां विप्रदंपती

ato'tra yuvayoraiko nārīvibhramaveṣadhṛk ekastasyā patirbhūtvā jāyetāṁ vipradaṁpatī

"अतः तुम दोनों में से एक स्त्रीवेष धारण करके, दूसरा उसका पति बनकर, एक ब्राह्मण-दम्पति बन जाओ।

श्लोक 17 (skanda.3.101.17)

युवां वधूवरौ भूत्वा प्राप्य सीमंतिनीगृहम्॥ भुक्त्वा भूरि धनं लब्ध्वा पुनर्यातं ममांमतिकम्

yuvāṁ vadhūvarau bhūtvā prāpya sīmaṁtinīgṛham bhuktvā bhūri dhanaṁ labdhvā punaryātaṁ mamāṁmatikam

"वर-वधू बनकर तुम दोनों सीमन्तिनी के घर जाओ; वहाँ प्रचुर धन पाकर, आतिथ्य भोगकर, मेरे पास वापस लौट आओ।"

श्लोक 18 (skanda.3.101.18)

इति राज्ञा समादिष्टौ भीतौ द्विजकुमारकौ ॥ प्रत्यूचतुरिदं कर्म कर्तुं नौ जायते भयम्

iti rājñā samādiṣṭau bhītau dvijakumārakau pratyūcaturidaṁ karma kartuṁ nau jāyate bhayam

इस प्रकार राजा द्वारा आज्ञा दिए जाने पर, वे दोनों भयभीत ब्राह्मणकुमार बोले — "यह कार्य करने में हमें भय होता है।

श्लोक 19 (skanda.3.101.19)

देवतासु गुरौ पित्रोस्तथा राजकुलेषु च ॥ कौटिल्यमाचरन्मोहात्सद्यो नश्यति सान्वयः

devatāsu gurau pitrostathā rājakuleṣu ca kauṭilyamācaranmohātsadyo naśyati sānvayaḥ

"देवताओं, गुरु, माता-पिता तथा राजकुलों के प्रति मोहवश कुटिलता करनेवाला व्यक्ति तत्काल अपने वंश सहित नष्ट हो जाता है।

श्लोक 20 (skanda.3.101.20)

कथमंतर्गृहं राज्ञां छद्मना प्रविशेत्पुमान् ॥ गोप्यमानमपिच्छद्म कदाचित्ख्यातिमेष्यति

kathamaṁtargṛhaṁ rājñāṁ chadmanā praviśetpumān gopyamānamapicchadma kadācitkhyātimeṣyati

"कोई पुरुष राजाओं के अन्तःपुर में छल से कैसे प्रवेश कर सकता है? गुप्त रखा गया छल भी कभी न कभी प्रकट हो जाता है।

श्लोक 21 (skanda.3.101.21)

ये गुणाः साधिताः पूर्वं शीलाचारश्रुतादिभिः ॥ सद्यस्ते नाशमायांति कौटिल्य पथगामिनः

ye guṇāḥ sādhitāḥ pūrvaṁ śīlācāraśrutādibhiḥ sadyaste nāśamāyāṁti kauṭilya pathagāminaḥ

"शील, आचार और श्रुति आदि से पहले अर्जित किए गए गुण भी, कुटिलता के मार्ग पर चलनेवालों के लिए तत्काल नष्ट हो जाते हैं।

श्लोक 22 (skanda.3.101.22)

पापं निंदा भयं वैरं चत्वार्येतानि देहिनाम् ॥ छद्ममार्गप्रपन्नानां तिष्ठंत्येव हि सर्वदा

pāpaṁ niṁdā bhayaṁ vairaṁ catvāryetāni dehinām chadmamārgaprapannānāṁ tiṣṭhaṁtyeva hi sarvadā

"पाप, निन्दा, भय और वैर — ये चार वस्तुएँ छल के मार्ग पर चलनेवाले प्राणियों के साथ सदा बनी रहती हैं।

श्लोक 23 (skanda.3.101.23)

अत आवां शुभाचारौ जातौ च शुचिनां कुले ॥ वृत्तं धूर्तजनश्लाघ्यं नाश्रयावः कदाचन

ata āvāṁ śubhācārau jātau ca śucināṁ kule vṛttaṁ dhūrtajanaślāghyaṁ nāśrayāvaḥ kadācana

"इसलिए हम, जो शुद्ध कुल में उत्पन्न शुभाचारी हैं, धूर्तजनों द्वारा प्रशंसित इस आचरण का आश्रय कभी नहीं लेंगे।"

श्लोक 24 (skanda.3.101.24)

राजोवाच ॥ दैवतानां गुरूणां च पित्रोश्च पृथिवीपतेः ॥ शासनस्याप्यलंघ्यत्वात्प्रत्यादेशो न कर्हिचित्

rājovāca daivatānāṁ gurūṇāṁ ca pitrośca pṛthivīpateḥ śāsanasyāpyalaṁghyatvātpratyādeśo na karhicit

राजा ने कहा — "देवताओं, गुरुओं, माता-पिता और राजा की आज्ञा अलंघनीय होने के कारण, उसका प्रत्याख्यान कभी नहीं हो सकता।

श्लोक 25 (skanda.3.101.25)

एतैर्यद्यत्समादिष्टं शुभं वा यदि वाऽशुभम् ॥ कर्तव्यं नियतं भीतैरप्रमत्तैर्बुभूषुभिः

etairyadyatsamādiṣṭaṁ śubhaṁ vā yadi vā'śubham kartavyaṁ niyataṁ bhītairapramattairbubhūṣubhiḥ

"इनके द्वारा जो कुछ भी आज्ञा दी जाए, चाहे शुभ हो या अशुभ, भयभीत, सावधान और कल्याण चाहनेवालों द्वारा वह अवश्य करना चाहिए।

श्लोक 26 (skanda.3.101.26)

अहो वयं हि राजानः प्रजा यूयं हि संमताः ॥ राजाज्ञया प्रवृत्तानां श्रेयः स्यादन्यथा भयम्

aho vayaṁ hi rājānaḥ prajā yūyaṁ hi saṁmatāḥ rājājñayā pravṛttānāṁ śreyaḥ syādanyathā bhayam

"अहो! हम राजा हैं, और तुम हमारी प्रजा हो; राजाज्ञा से कार्य करनेवालों का कल्याण होता है, अन्यथा भय होता है।

श्लोक 27 (skanda.3.101.27)

अतो मच्छासनं कार्यं भव द्भ्यामविलंबितम् ॥ इत्युक्तौ नरदेवेन तौ तथेत्यूचतुर्भयात्

ato macchāsanaṁ kāryaṁ bhava dbhyāmavilaṁbitam ityuktau naradevena tau tathetyūcaturbhayāt

"इसलिए तुम दोनों को मेरी आज्ञा बिना विलम्ब के पूरी करनी चाहिए।" राजा द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर, वे दोनों भयवश "ऐसा ही हो" कहकर मान गए।

श्लोक 28 (skanda.3.101.28)

सारस्वतस्य तनयं सामवन्तं नराधिपः ॥ स्त्रीरूपधारिणं चक्रे वस्त्राकल्पां जनादिभिः

sārasvatasya tanayaṁ sāmavantaṁ narādhipaḥ strīrūpadhāriṇaṁ cakre vastrākalpāṁ janādibhiḥ

राजा ने सारस्वत के पुत्र सामवान को स्त्री का रूप धारण करवाया, दासियों आदि द्वारा वस्त्र-आभूषण पहनाकर।

श्लोक 29 (skanda.3.101.29)

स कृत्रिमोद्भूतकलत्रभावः प्रयुक्तकर्णाभरणांगरागः ॥ स्निग्धाञ्जनाक्षः स्पृहणीयरूपो बभूव सद्यः प्रमदोत्तमाभः

sa kṛtrimodbhūtakalatrabhāvaḥ prayuktakarṇābharaṇāṁgarāgaḥ snigdhāñjanākṣaḥ spṛhaṇīyarūpo babhūva sadyaḥ pramadottamābhaḥ

वह कृत्रिम स्त्रीभाव को प्राप्त, कर्णाभूषण और अंगराग से युक्त, स्निग्ध अंजनयुक्त नेत्रोंवाला, तत्काल एक उत्तम सुन्दरी के समान वांछनीय रूपवाला हो गया।

श्लोक 30 (skanda.3.101.30)

तावुभौ दंपती भूत्वा द्विजपुत्रौ नृपाज्ञया ॥ जग्मतुर्नैषधं देशं यद्वा तद्वा भवत्विति

tāvubhau daṁpatī bhūtvā dvijaputrau nṛpājñayā jagmaturnaiṣadhaṁ deśaṁ yadvā tadvā bhavatviti

वे दोनों ब्राह्मणपुत्र, दम्पति बनकर, राजाज्ञा से "जो होगा सो होगा" कहते हुए निषध देश की ओर चल पड़े।

श्लोक 31 (skanda.3.101.31)

उपेत्य राजसदनं सोमवारे द्विजोत्तमैः ॥ सपत्नीकैः कृतातिथ्यौ धौतपादौ बभूवतुः

upetya rājasadanaṁ somavāre dvijottamaiḥ sapatnīkaiḥ kṛtātithyau dhautapādau babhūvatuḥ

सोमवार को राजभवन पहुँचकर, अन्य श्रेष्ठ ब्राह्मणों सहित, अपनी पत्नियों सहित, उन्हें आतिथ्य मिला, उनके चरण धोए गए।

श्लोक 32 (skanda.3.101.32)

सा राज्ञी ब्राह्मणान्सर्वानुपविष्टान्वरासने ॥ प्रत्येकमर्चयांचक्रे सपत्नीकान्द्विजोत्तमान्

sā rājñī brāhmaṇānsarvānupaviṣṭānvarāsane pratyekamarcayāṁcakre sapatnīkāndvijottamān

उस रानी ने उत्तम आसन पर बैठे सभी ब्राह्मणों को, उनकी पत्नियों सहित, प्रत्येक को अलग-अलग पूजा।

श्लोक 33 (skanda.3.101.33)

तौ च विप्रसुतौ दृष्ट्वा प्राप्तौ कृतकदंपती ॥ ज्ञात्वा किंचिद्विहस्याथ मेने गौरीमहेश्वरौ

tau ca viprasutau dṛṣṭvā prāptau kṛtakadaṁpatī jñātvā kiṁcidvihasyātha mene gaurīmaheśvarau

उन दोनों ब्राह्मणपुत्रों को कृत्रिम दम्पति के रूप में आए देखकर, कुछ हँसते हुए सत्य जानकर भी, उसने उन्हें गौरी और महेश्वर मानकर पूजा।

श्लोक 34 (skanda.3.101.34)

आवाह्य द्विजमुख्येषु देवदेवं सदाशिवम् ॥ पत्नीष्वावाहयामास सा देवीं जगदंबिकाम्

āvāhya dvijamukhyeṣu devadevaṁ sadāśivam patnīṣvāvāhayāmāsa sā devīṁ jagadaṁbikām

श्रेष्ठ ब्राह्मणों में देवदेव सदाशिव का, और उनकी पत्नियों में जगदम्बिका देवी का आवाहन करके,

श्लोक 35 (skanda.3.101.35)

गन्धैर्माल्यैः सुरभिभिर्धूपैर्नीराजनैरपि ॥ अर्चयित्वा द्विजश्रेष्ठान्नमश्चक्रे समाहिता

gandhairmālyaiḥ surabhibhirdhūpairnīrājanairapi arcayitvā dvijaśreṣṭhānnamaścakre samāhitā

गन्ध, सुगन्धित माला, धूप और आरती से श्रेष्ठ ब्राह्मणों की पूजा करके, वह एकाग्रचित्त होकर उन्हें प्रणाम करने लगी।

श्लोक 36 (skanda.3.101.36)

हिरण्मयेषु पात्रेषु पायसं घृतसंयुतम् ॥ शर्करामधुसंयुक्तं शाकैर्जुष्टं मनोरमैः

hiraṇmayeṣu pātreṣu pāyasaṁ ghṛtasaṁyutam śarkarāmadhusaṁyuktaṁ śākairjuṣṭaṁ manoramaiḥ

स्वर्ण के पात्रों में घृतयुक्त, शक्कर-मधुयुक्त, मनोरम शाकों से युक्त खीर,

श्लोक 37 (skanda.3.101.37)

गंधशाल्योदनैर्हृद्यैर्मोदकापूपराशिभिः ॥ शष्क्रुलीभिश्च संयावैः कृसरैर्माषपक्वकैः

gaṁdhaśālyodanairhṛdyairmodakāpūparāśibhiḥ śaṣkrulībhiśca saṁyāvaiḥ kṛsarairmāṣapakvakaiḥ

सुगन्धित शालि-भात, लड्डू-पुओं की राशियाँ, शष्कुली और सम्यावादि व्यंजन, खिचड़ी और उड़द के पके व्यंजन,

श्लोक 38 (skanda.3.101.38)

तथान्यैरप्यसंख्यातैर्भक्ष्यैर्भोज्यैर्मनोरमैः ॥ सुगन्धैः स्वादुभिः सूपैः पानीयैरपि शीतलैः

tathānyairapyasaṁkhyātairbhakṣyairbhojyairmanoramaiḥ sugandhaiḥ svādubhiḥ sūpaiḥ pānīyairapi śītalaiḥ

तथा अन्य असंख्य मनोरम भक्ष्य-भोज्य पदार्थ, सुगन्धित स्वादिष्ट सूप और शीतल जल भी,

श्लोक 39 (skanda.3.101.39)

क्लृप्तमन्नं द्विजा -ग्र्येभ्यः सा भक्त्या पर्यवेषयत् ॥ दध्योदनं निरुपमं निवेद्य समतोषयत्

klṛptamannaṁ dvijā -gryebhyaḥ sā bhaktyā paryaveṣayat dadhyodanaṁ nirupamaṁ nivedya samatoṣayat

उसने भक्तिपूर्वक उन ब्राह्मणों को परोसा; अनुपम दधि-भात अर्पित करके उन्हें संतुष्ट किया।

श्लोक 40 (skanda.3.101.40)

भुक्तवत्सु द्विजाग्र्येषु स्वाचांतेषु नृपांगना ॥ प्रणम्य दत्त्वा तांबूलं दक्षिणां च यथार्हतः

bhuktavatsu dvijāgryeṣu svācāṁteṣu nṛpāṁganā praṇamya dattvā tāṁbūlaṁ dakṣiṇāṁ ca yathārhataḥ

जब वे श्रेष्ठ ब्राह्मण भोजन करके आचमन कर चुके, तब उस राजरानी ने प्रणाम करके यथोचित ताम्बूल और दक्षिणा दी।

श्लोक 41 (skanda.3.101.41)

धेनूर्हिरण्यवासांसि रत्नस्रग्भूषणानि च ॥ दत्त्वा भूयो नमस्कृत्य विससर्ज द्विजोत्तमान्

dhenūrhiraṇyavāsāṁsi ratnasragbhūṣaṇāni ca dattvā bhūyo namaskṛtya visasarja dvijottamān

गौएँ, स्वर्ण, वस्त्र, रत्नों की मालाएँ और आभूषण देकर, पुनः प्रणाम करके, उसने उन श्रेष्ठ ब्राह्मणों को विदा किया।

श्लोक 42 (skanda.3.101.42)

तयोर्द्वयोर्भूसुरवर्यपुत्रयोरेकस्त्तया हैमवतीधियार्चितः ॥ एको महादेवधियाभिपूजितः कृतप्रणामौ ययतुस्तदाज्ञया

tayordvayorbhūsuravaryaputrayorekasttayā haimavatīdhiyārcitaḥ eko mahādevadhiyābhipūjitaḥ kṛtapraṇāmau yayatustadājñayā

उन दोनों श्रेष्ठ ब्राह्मणपुत्रों में से एक की उसने हिमवत्पुत्री (पार्वती) के भाव से, दूसरे की महादेव के भाव से पूजा की; प्रणाम करके वे उसकी आज्ञा से वहाँ से चले गए।

श्लोक 43 (skanda.3.101.43)

सा तु विस्मृतपुंभावा तस्मिन्नेव द्विजोत्तमे ॥ जातस्पृहा मदोत्सिक्ता कन्दर्पविवशाब्रवीत्

sā tu vismṛtapuṁbhāvā tasminneva dvijottame jātaspṛhā madotsiktā kandarpavivaśābravīt

किन्तु वह (सामवती-रूपधारी), अपने पुरुषत्व को भूलकर, उसी श्रेष्ठ ब्राह्मण में अभिलाषा से युक्त होकर, मद से उन्मत्त और कामदेव के वशीभूत होकर बोली —

श्लोक 44 (skanda.3.101.44)

अंयि नाथ विशालाक्ष सर्वावयवसुन्दर ॥ तिष्ठतिष्ठ क्व वा यासि मां न पश्यसि ते प्रियाम्

aṁyi nātha viśālākṣa sarvāvayavasundara tiṣṭhatiṣṭha kva vā yāsi māṁ na paśyasi te priyām

"हे नाथ! विशाल नेत्रोंवाले, सर्वांग-सुन्दर! ठहरो, ठहरो, कहाँ जा रहे हो? क्या तुम अपनी प्रिया को नहीं देखते?

श्लोक 45 (skanda.3.101.45)

इदमग्रे वनं रम्यं सुपुष्पितमहाद्रुमम् ॥ अस्मिन्विहर्तुमिच्छामि त्वया सह यथासुखम्

idamagre vanaṁ ramyaṁ supuṣpitamahādrumam asminvihartumicchāmi tvayā saha yathāsukham

"यहाँ आगे एक रमणीय वन है, जो सुपुष्पित महावृक्षों से युक्त है; इसमें मैं तुम्हारे साथ सुखपूर्वक विहार करना चाहती हूँ।"

श्लोक 46 (skanda.3.101.46)

इत्थं तयोक्तमाकर्ण्य पुरोऽगच्छद्द्विजात्मजः ॥ विचिंत्य परिहासोक्तिं गच्छति स्म यथा पुरा

itthaṁ tayoktamākarṇya puro'gacchaddvijātmajaḥ viciṁtya parihāsoktiṁ gacchati sma yathā purā

इस प्रकार उसके कहे वचन सुनकर, ब्राह्मणपुत्र इसे केवल परिहास मानकर आगे बढ़ गया, पहले की भाँति चलता हुआ।

श्लोक 47 (skanda.3.101.47)

पुनरप्याह सा बाला तिष्ठतिष्ठ क्व यास्यसि॥ दुरुत्सहस्मरावेशां परिभोक्तुमुपेत्य माम्

punarapyāha sā bālā tiṣṭhatiṣṭha kva yāsyasi durutsahasmarāveśāṁ paribhoktumupetya mām

वह बालिका फिर से बोली — "ठहरो, ठहरो, कहाँ जा रहे हो? कामदेव के दुःसह आवेश से व्याकुल होकर, मेरे पास आकर मुझे भोगो।

श्लोक 48 (skanda.3.101.48)

परिष्वजस्व मां कांतां पाययस्व तवाधरम् ॥ नाहं गंतुं समर्थास्मि स्मरबाणप्रपीडिता

pariṣvajasva māṁ kāṁtāṁ pāyayasva tavādharam nāhaṁ gaṁtuṁ samarthāsmi smarabāṇaprapīḍitā

"मुझ प्रिया का आलिंगन करो, अपना अधर पिलाओ; कामबाणों से पीड़ित मैं आगे जाने में असमर्थ हूँ।"

श्लोक 49 (skanda.3.101.49)

इत्थमश्रुतपूर्वां तां निशम्य परिशंकितः ॥ आयांतीं पृष्ठतो वीक्ष्य सहसा विस्मयं गतः

itthamaśrutapūrvāṁ tāṁ niśamya pariśaṁkitaḥ āyāṁtīṁ pṛṣṭhato vīkṣya sahasā vismayaṁ gataḥ

इस प्रकार अनसुनी बात सुनकर, आशंकित होकर, पीछे मुड़कर आती हुई उसे देखकर, वह सहसा आश्चर्यचकित हो गया।

श्लोक 50 (skanda.3.101.50)

कैषा पद्मपलाशाक्षी पीनोन्नतपयोधरा ॥ कृशोदरी बृहच्छ्रोणी नवपल्लवकोमला

kaiṣā padmapalāśākṣī pīnonnatapayodharā kṛśodarī bṛhacchroṇī navapallavakomalā

"यह कमलपत्र-नयना, उन्नत पीन स्तनोंवाली, कृशोदरी, बृहत्-नितम्बोंवाली, नए पल्लव के समान कोमल कौन है?

श्लोक 51 (skanda.3.101.51)

स एव मे सखा किन्नु जात एव वरांगना ॥ पृच्छाम्येनमतः सर्वमिति संचिन्त्य सोऽब्रवीत्

sa eva me sakhā kinnu jāta eva varāṁganā pṛcchāmyenamataḥ sarvamiti saṁcintya so'bravīt

"क्या यह मेरा वही मित्र है, जो अब सुन्दरी बन गया है? मुझे इससे सब कुछ पूछना चाहिए।" ऐसा सोचकर वह बोला —

श्लोक 52 (skanda.3.101.52)

किमपूर्व इवाभाषि सखे रूपगुणादिभिः ॥ अपूर्वं भाषसे वाक्यं कामिनीव समाकुला

kimapūrva ivābhāṣi sakhe rūpaguṇādibhiḥ apūrvaṁ bhāṣase vākyaṁ kāminīva samākulā

"क्यों तुम इतनी अपूर्व बातें कर रहे हो, हे मित्र, अपने रूप-गुणों के साथ? तुम कामिनी की भाँति व्याकुल होकर अपूर्व वचन बोल रहे हो।

श्लोक 53 (skanda.3.101.53)

यस्त्वं वेदपुराणज्ञो ब्रह्मचारी जितेंद्रियः ॥ सारस्वतात्मजः शांतः कथमेवं प्रभाषसे

yastvaṁ vedapurāṇajño brahmacārī jiteṁdriyaḥ sārasvatātmajaḥ śāṁtaḥ kathamevaṁ prabhāṣase

"तुम जो वेद-पुराणों के ज्ञाता, ब्रह्मचारी, जितेन्द्रिय, सारस्वत के शान्त पुत्र हो, ऐसा कैसे बोल रहे हो?"

श्लोक 54 (skanda.3.101.54)

इत्युक्ता सा पुनः प्राह नाहमस्मि पुमान्प्रभो ॥ नाम्ना सामवती बाला तवास्मि रतिदायिनी

ityuktā sā punaḥ prāha nāhamasmi pumānprabho nāmnā sāmavatī bālā tavāsmi ratidāyinī

इस प्रकार पूछे जाने पर वह फिर बोली — "मैं पुरुष नहीं हूँ, हे प्रभु! मैं सामवती नाम की बालिका हूँ, तुम्हें आनन्द देनेवाली।

श्लोक 55 (skanda.3.101.55)

यदि ते संशयः कांत ममांगानि विलोकय ॥ इत्युक्तः सहसा मार्गे रहस्येनां व्यलोकयत्

yadi te saṁśayaḥ kāṁta mamāṁgāni vilokaya ityuktaḥ sahasā mārge rahasyenāṁ vyalokayat

"यदि तुम्हें संशय है, हे प्रिय, तो मेरे अंगों को देख लो।" इस प्रकार कहे जाने पर, उसने अचानक मार्ग में ही, एकान्त में, उसे देखा।

श्लोक 56 (skanda.3.101.56)

तामकृत्रिमधम्मिल्लां जवनस्तनशोभिनीम् ॥ सुरूपां वीक्ष्य कामेन किंचिद्व्याकुलतामगात्

tāmakṛtrimadhammillāṁ javanastanaśobhinīm surūpāṁ vīkṣya kāmena kiṁcidvyākulatāmagāt

उसके स्वाभाविक केश, दृढ़ और सुन्दर स्तनों, सुन्दर रूप को देखकर, वह काम से कुछ व्याकुल हो गया।

श्लोक 57 (skanda.3.101.57)

पुनः संस्तभ्य यत्नेन चेतसो विकृतिं बुधः ॥ मुहूर्तं विस्मयाविष्टो न किंचित्प्रत्यभाषत

punaḥ saṁstabhya yatnena cetaso vikṛtiṁ budhaḥ muhūrtaṁ vismayāviṣṭo na kiṁcitpratyabhāṣata

फिर प्रयत्नपूर्वक अपने चित्त की विकृति को रोककर, वह बुद्धिमान क्षणभर आश्चर्य से भरकर कुछ न बोला।

श्लोक 58 (skanda.3.101.58)

सामवत्युवाच ॥ गतस्ते संशयः कश्चित्तर्ह्यागच्छ भजस्व माम् ॥ पश्येदं विपिनं कांत परस्त्रीसुरतोचितम्

sāmavatyuvāca gataste saṁśayaḥ kaścittarhyāgaccha bhajasva mām paśyedaṁ vipinaṁ kāṁta parastrīsuratocitam

सामवती ने कहा — "तुम्हारा संशय अब दूर हो गया; अब आओ, मुझे भजो। देखो यह वन, हे प्रिय, परस्त्री-सुरत के लिए उपयुक्त है।"

श्लोक 59 (skanda.3.101.59)

सुमेधा उवाच ॥ मैवं कथय मर्यादां मा हिंसीर्मदमत्तवत् ॥ आवां विज्ञातशास्त्रार्थौ त्वमेवं भाषसे कथम्

sumedhā uvāca maivaṁ kathaya maryādāṁ mā hiṁsīrmadamattavat āvāṁ vijñātaśāstrārthau tvamevaṁ bhāṣase katham

सुमेधा ने कहा — "ऐसा मत कहो, मर्यादा का उल्लंघन मत करो, मत्त की भाँति व्यवहार मत करो; हम दोनों शास्त्रार्थ जाननेवाले हैं, तुम ऐसा कैसे कह सकती हो?

श्लोक 60 (skanda.3.101.60)

अधीतस्य च शास्त्रस्य विवेकस्य कुलस्य च ॥ किमेष सदृशो धर्मो जारधर्मनिषेवणम्

adhītasya ca śāstrasya vivekasya kulasya ca kimeṣa sadṛśo dharmo jāradharmaniṣevaṇam

"अध्ययन किए हुए शास्त्र, विवेक और कुल के अनुरूप — क्या यह जारधर्म का सेवन उचित है?

श्लोक 61 (skanda.3.101.61)

न त्वं स्त्री पुरुषो विद्वाञ्जानीह्यात्मानमात्मना ॥ अयं स्वयंकृतोऽनर्थ आवाभ्यां यद्विचेष्टितम्

na tvaṁ strī puruṣo vidvāñjānīhyātmānamātmanā ayaṁ svayaṁkṛto'nartha āvābhyāṁ yadviceṣṭitam

"तुम स्त्री नहीं, विद्वान पुरुष हो; अपने आप को अपने आप से पहचानो। यह जो हम दोनों ने किया है, यह स्वयं-कृत अनर्थ है।

श्लोक 62 (skanda.3.101.62)

वंचयित्वात्मपितरौ धूर्त्तराजानुशासनात् ॥ कृत्वा चानुचितं कर्म तस्यैतद्भुज्यते फलम्

vaṁcayitvātmapitarau dhūrttarājānuśāsanāt kṛtvā cānucitaṁ karma tasyaitadbhujyate phalam

"अपने माता-पिता को धोखा देकर, धूर्त राजा की आज्ञा से अनुचित कर्म करके, उसी का यह फल भोगा जा रहा है।

श्लोक 63 (skanda.3.101.63)

सर्वं त्वनुचितं कर्म नृणां श्रेयोविनाशनम् ॥ यस्त्वं विप्रात्मजो विद्वान्गतः स्त्रीत्वं विगर्हितम्

sarvaṁ tvanucitaṁ karma nṛṇāṁ śreyovināśanam yastvaṁ viprātmajo vidvāngataḥ strītvaṁ vigarhitam

"समस्त अनुचित कर्म मनुष्यों के कल्याण का विनाश करनेवाला है; तुम, जो विद्वान ब्राह्मणपुत्र हो, इस निंदित स्त्रीत्व को प्राप्त हो गए हो।

श्लोक 64 (skanda.3.101.64)

मार्गं त्यक्त्वा गतोऽरण्यं नरो विध्येत कण्टकैः ॥ बलार्द्धिस्येत वा हिंस्रैर्यदा त्यक्तसमा गमः

mārgaṁ tyaktvā gato'raṇyaṁ naro vidhyeta kaṇṭakaiḥ balārddhisyeta vā hiṁsrairyadā tyaktasamā gamaḥ

"मार्ग छोड़कर वन में गया हुआ मनुष्य काँटों से बिंधता है, अथवा हिंसक जन्तुओं द्वारा सताया जाता है, जब वह अपने समान लोगों का साथ छोड़ देता है।

श्लोक 65 (skanda.3.101.65)

एवं विवेकमाश्रित्य तूष्णीमेहि स्वयं गृहम् ॥ देवद्विजप्रसादेन स्त्रीत्वं तव विलीयते

evaṁ vivekamāśritya tūṣṇīmehi svayaṁ gṛham devadvijaprasādena strītvaṁ tava vilīyate

"इस प्रकार विवेक का आश्रय लेकर, चुपचाप स्वयं घर चलो; देवताओं और ब्राह्मणों की कृपा से तुम्हारा स्त्रीत्व मिट जाएगा।

श्लोक 66 (skanda.3.101.66)

अथवा दैवयोगेन स्त्रीत्वमेव भवेत्तव ॥ पित्रा दत्ता मया साकं रंस्यसे वरवर्णिनि

athavā daivayogena strītvameva bhavettava pitrā dattā mayā sākaṁ raṁsyase varavarṇini

"अथवा यदि दैवयोग से तुम्हें स्त्रीत्व ही प्राप्त रहे, तो पिता द्वारा दी गई तुम मुझ ही से, हे सुन्दरी, रमण करोगी।"

श्लोक 67 (skanda.3.101.67)

अहो चित्रमहो दुःखमहो पापबलं महत् ॥ अहो राज्ञः प्रभावोयं शिवाराधनसंभृतः

aho citramaho duḥkhamaho pāpabalaṁ mahat aho rājñaḥ prabhāvoyaṁ śivārādhanasaṁbhṛtaḥ

"अहो, कैसा विचित्र, अहो कैसा दुःख, अहो पाप का कितना बड़ा बल! अहो, यह राजा का प्रभाव है, जो शिवाराधना से उत्पन्न हुआ है!"

श्लोक 68 (skanda.3.101.68)

इत्युक्ताप्यसकृत्तेन सा वधूरतिविह्वला ॥ बलेन तं समालिंग्य चुचुंबाधरपल्लवम्

ityuktāpyasakṛttena sā vadhūrativihvalā balena taṁ samāliṁgya cucuṁbādharapallavam

इस प्रकार बार-बार कहे जाने पर भी, वह अत्यन्त विह्वल वधू बलपूर्वक उसे आलिंगन करके उसका अधर चूम बैठी।

श्लोक 69 (skanda.3.101.69)

धर्षितोपि तया धीरः सुमेधा नूतनस्त्रियम् ॥ यत्नादानीय सदनं कृत्स्नं तत्र न्यवेदयत्

dharṣitopi tayā dhīraḥ sumedhā nūtanastriyam yatnādānīya sadanaṁ kṛtsnaṁ tatra nyavedayat

उससे इस प्रकार सताए जाने पर भी, धीर सुमेधा उस नई स्त्री को प्रयत्नपूर्वक घर लाकर, वहाँ सारा वृत्तान्त बता दिया।

श्लोक 70 (skanda.3.101.70)

तदाकर्ण्याथ तौ विप्रौ कुपितौ शोकविह्वलौ ॥ ताभ्यां सह कुमाराभ्यां वैदर्भांतिकमीयतुः

tadākarṇyātha tau viprau kupitau śokavihvalau tābhyāṁ saha kumārābhyāṁ vaidarbhāṁtikamīyatuḥ

यह सुनकर वे दोनों ब्राह्मण क्रोधित और शोक से विह्वल होकर, उन दोनों कुमारों सहित विदर्भराज के समीप गए।

श्लोक 71 (skanda.3.101.71)

ततः सारस्वतः प्राह राजानं धूर्तचेष्टितम् ॥ राजन्ममात्मजं पश्य तव शासनयंत्रितम्

tataḥ sārasvataḥ prāha rājānaṁ dhūrtaceṣṭitam rājanmamātmajaṁ paśya tava śāsanayaṁtritam

तब सारस्वत ने राजा से उसके धूर्त आचरण के विषय में कहा — "हे राजन्! देखिए, आपकी आज्ञा से बँधा हुआ मेरा पुत्र।

श्लोक 72 (skanda.3.101.72)

एतौ तवाज्ञावशगौ चक्रतुः कर्म गर्हितम् ॥ मत्पुत्रस्तत्फलं भुंक्ते स्त्रीत्वं प्राप्य जुगुप्सितम्

etau tavājñāvaśagau cakratuḥ karma garhitam matputrastatphalaṁ bhuṁkte strītvaṁ prāpya jugupsitam

"आपकी आज्ञा के अधीन इन दोनों ने यह निंदनीय कार्य किया; मेरा पुत्र उसी का फल भोग रहा है, इस घृणित स्त्रीत्व को प्राप्त करके।

श्लोक 73 (skanda.3.101.73)

अद्य मे संततिर्नष्टा निराशाः पितरो मम ॥ नापुत्रस्य हि लोकोस्ति लुप्तपिंडादिसंस्कृतेः

adya me saṁtatirnaṣṭā nirāśāḥ pitaro mama nāputrasya hi lokosti luptapiṁḍādisaṁskṛteḥ

"आज मेरी संतान नष्ट हो गई, मेरे पितर निराश हो गए; क्योंकि जिसका पिण्डदान आदि संस्कार लुप्त हो गया हो, उस अपुत्रक के लिए कोई लोक नहीं है।

श्लोक 74 (skanda.3.101.74)

शिखोपवीतमजिनं मौजीं दंडं कमंडलुम् ॥ ब्रह्मचर्योचितं चिह्नं विहायेमां दशां गतः

śikhopavītamajinaṁ maujīṁ daṁḍaṁ kamaṁḍalum brahmacaryocitaṁ cihnaṁ vihāyemāṁ daśāṁ gataḥ

"शिखा, यज्ञोपवीत, मृगचर्म, मौंजी, दण्ड और कमण्डलु — ब्रह्मचर्य के उचित चिह्नों को त्यागकर वह इस दशा को प्राप्त हुआ है।

श्लोक 75 (skanda.3.101.75)

ब्रह्मसूत्रं च सावित्रीं स्नानं संध्यां जपार्चनम् ॥ विसृज्य स्त्रीत्वमाप्तोस्य का गतिर्वद पार्थिव

brahmasūtraṁ ca sāvitrīṁ snānaṁ saṁdhyāṁ japārcanam visṛjya strītvamāptosya kā gatirvada pārthiva

"ब्रह्मसूत्र, सावित्री, स्नान, संध्या और जपार्चन त्यागकर, स्त्रीत्व को प्राप्त इसकी क्या गति होगी, बताइए, हे राजन्!

श्लोक 76 (skanda.3.101.76)

त्वया मे संततिर्नष्टा नष्टो वेदपथश्च मे ॥ एकात्मजस्य मे राजन्का गतिर्वद शाश्वती

tvayā me saṁtatirnaṣṭā naṣṭo vedapathaśca me ekātmajasya me rājankā gatirvada śāśvatī

"आपके कारण मेरी संतान नष्ट हो गई, मेरा वेदमार्ग भी नष्ट हो गया; मेरे इस एकमात्र पुत्र की, हे राजन्, शाश्वत गति क्या होगी, बताइए।"

श्लोक 77 (skanda.3.101.77)

इति सारस्वतेनोक्तं वाक्यमाकर्ण्य भूपतिः ॥ सीमंतिन्याः प्रभावेण विस्मयं परमं गतः

iti sārasvatenoktaṁ vākyamākarṇya bhūpatiḥ sīmaṁtinyāḥ prabhāveṇa vismayaṁ paramaṁ gataḥ

सारस्वत के इस प्रकार कहे गए वचन को सुनकर, राजा सीमन्तिनी के प्रभाव से परम आश्चर्य को प्राप्त हुआ।

श्लोक 78 (skanda.3.101.78)

अथ सर्वान्समाहूय महर्षीनमितद्युतीन्॥ प्रसाद्य प्रार्थयामास तस्य पुंस्त्वं महीपतिः

atha sarvānsamāhūya maharṣīnamitadyutīn prasādya prārthayāmāsa tasya puṁstvaṁ mahīpatiḥ

फिर अपरिमित तेजस्वी सभी महर्षियों को बुलाकर, उन्हें प्रसन्न करके, राजा ने उस बालक का पुरुषत्व वापस पाने की प्रार्थना की।

श्लोक 79 (skanda.3.101.79)

तेऽबुवन्नथ पार्वत्याः शिवस्य च समीहितम् ॥ तद्भक्तानां च माहात्म्यं कोन्यथा कर्तुमीश्वरः

te'buvannatha pārvatyāḥ śivasya ca samīhitam tadbhaktānāṁ ca māhātmyaṁ konyathā kartumīśvaraḥ

उन्होंने कहा — "यह पार्वती और शिव की इच्छा है; उनके भक्तों के माहात्म्य को उनके अतिरिक्त और कौन कर सकता है?"

श्लोक 80 (skanda.3.101.80)

अथ राजा भरद्वाजमादाय मुनिपुंगवम् ॥ ताभ्यां सह द्विजाग्र्याभ्यां तत्सुताभ्यां समन्वितः

atha rājā bharadvājamādāya munipuṁgavam tābhyāṁ saha dvijāgryābhyāṁ tatsutābhyāṁ samanvitaḥ

फिर राजा भरद्वाज मुनिश्रेष्ठ को साथ लेकर, उन दोनों श्रेष्ठ ब्राह्मणों और उनके पुत्रों के साथ,

श्लोक 81 (skanda.3.101.81)

अंबिकाभवनं प्राप्य भरद्वाजोपदेशतः ॥ तां देवीं नियमैस्तीव्रैरुपास्ते स्म महानिशि

aṁbikābhavanaṁ prāpya bharadvājopadeśataḥ tāṁ devīṁ niyamaistīvrairupāste sma mahāniśi

अम्बिका के मन्दिर पहुँचकर, भरद्वाज के उपदेश से, उस देवी की महारात्रि में कठोर नियमों से उपासना करने लगा।

श्लोक 82 (skanda.3.101.82)

एवं त्रिरात्रं सुविसृष्टभोजनः स पार्वतीध्यान रतो महीपतिः ॥ सम्यक्प्रणामैर्विविधैश्च संस्तवैर्गौरीं प्रपन्नार्तिहरामतोषयत्

evaṁ trirātraṁ suvisṛṣṭabhojanaḥ sa pārvatīdhyāna rato mahīpatiḥ samyakpraṇāmairvividhaiśca saṁstavairgaurīṁ prapannārtiharāmatoṣayat

इस प्रकार तीन रात्रियों तक भोजन का त्याग करके, पार्वती के ध्यान में लीन वह राजा, विविध भलीभाँति प्रणामों और स्तुतियों से शरणागतों का दुःख हरनेवाली गौरी को प्रसन्न कर लिया।

श्लोक 83 (skanda.3.101.83)

ततः प्रसन्ना सा देवी भक्तस्य पृथिवीपतेः ॥ स्वरूपं दर्शयामास चंद्रकोटिसमप्रभम्

tataḥ prasannā sā devī bhaktasya pṛthivīpateḥ svarūpaṁ darśayāmāsa caṁdrakoṭisamaprabham

तब उस भक्त राजा से प्रसन्न होकर, उस देवी ने करोड़ों चन्द्रमाओं के समान प्रभावाला अपना स्वरूप दिखाया।

श्लोक 84 (skanda.3.101.84)

अथाह गौरी राजानं किं ते ब्रूहि समीहितम् ॥ सोऽप्याह पुंस्त्वमेतस्य कृपया दीयतामिति

athāha gaurī rājānaṁ kiṁ te brūhi samīhitam so'pyāha puṁstvametasya kṛpayā dīyatāmiti

फिर गौरी ने राजा से कहा — "बताओ, तुम्हारी क्या इच्छा है?" उसने भी कहा — "कृपया इसका पुरुषत्व लौटा दीजिए।"

श्लोक 85 (skanda.3.101.85)

भूयोप्याह महादेवी मद्भक्तैः कर्म यत्कृतम् ॥ शक्यते नान्यथा कर्तुं वर्षायुतशतैरपि

bhūyopyāha mahādevī madbhaktaiḥ karma yatkṛtam śakyate nānyathā kartuṁ varṣāyutaśatairapi

महादेवी ने फिर कहा — "मेरे भक्तों द्वारा किया गया कर्म, सौ हजार वर्षों में भी अन्यथा नहीं किया जा सकता।"

श्लोक 86 (skanda.3.101.86)

राजोवाच ॥ एकात्मजो हि विप्रोयं कर्मणा नष्टसंततिः ॥ कथं सुखं प्रपद्येत विना पुत्रेण तादृशः

rājovāca ekātmajo hi viproyaṁ karmaṇā naṣṭasaṁtatiḥ kathaṁ sukhaṁ prapadyeta vinā putreṇa tādṛśaḥ

राजा ने कहा — "यह ब्राह्मण एकमात्र पुत्रवाला है, जिसकी संतान इस कर्म से नष्ट हो गई है; बिना पुत्र के ऐसा व्यक्ति सुख कैसे प्राप्त करेगा?"

श्लोक 87 (skanda.3.101.87)

देव्युवाच ॥ तस्यान्यो मत्प्रसादेन भविष्यति सुतोत्तमः ॥ विद्या विनयसंपन्नो दीर्घायुरमलाशयः

devyuvāca tasyānyo matprasādena bhaviṣyati sutottamaḥ vidyā vinayasaṁpanno dīrghāyuramalāśayaḥ

देवी ने कहा — "मेरी कृपा से इसे एक और उत्तम पुत्र प्राप्त होगा — विद्या और विनय से सम्पन्न, दीर्घायु, निर्मल हृदयवाला।

श्लोक 88 (skanda.3.101.88)

एषा सामवती नाम सुता तस्य द्विजन्मनः ॥ भूत्वा सुमेधसः पत्नी कामभोगेन युज्यताम्

eṣā sāmavatī nāma sutā tasya dvijanmanaḥ bhūtvā sumedhasaḥ patnī kāmabhogena yujyatām

"यह सामवती नाम की उस ब्राह्मण की पुत्री, सुमेधा की पत्नी बनकर, कामभोग से युक्त हो।"

श्लोक 89 (skanda.3.101.89)

इत्युक्त्वांतर्हिता देवी ते च राजपुरोगमाः ॥ गताः स्वंस्वं गृहं सर्वे चक्रुस्तच्छासने स्थितिम्

ityuktvāṁtarhitā devī te ca rājapurogamāḥ gatāḥ svaṁsvaṁ gṛhaṁ sarve cakrustacchāsane sthitim

यह कहकर देवी अन्तर्धान हो गई; और वे सभी, राजा सहित, अपने-अपने घर जाकर उसकी आज्ञा का पालन करने लगे।

श्लोक 90 (skanda.3.101.90)

सोपि सारस्वतो विप्रः पुत्रं पूर्वसुतो त्तमम् ॥ लेभे देव्याः प्रसादेन ह्यचिरादेव कालतः

sopi sārasvato vipraḥ putraṁ pūrvasuto ttamam lebhe devyāḥ prasādena hyacirādeva kālataḥ

वह सारस्वत ब्राह्मण भी, देवी की कृपा से, शीघ्र ही अपने पहले पुत्र से भी उत्तम पुत्र प्राप्त कर लिया।

श्लोक 91 (skanda.3.101.91)

तां च सामवतीं कन्यां ददौ तस्मै सुमेधसे ॥ तौ दंपती चिरं कालं बुभुजाते परं सुखम्

tāṁ ca sāmavatīṁ kanyāṁ dadau tasmai sumedhase tau daṁpatī ciraṁ kālaṁ bubhujāte paraṁ sukham

और उसने वह सामवती नाम की कन्या सुमेधा को दे दी; वे दोनों दम्पति चिरकाल तक परम सुख भोगते रहे।

श्लोक 92 (skanda.3.101.92)

सूत उवाच ॥ इत्येष शिवभक्तायाः सीमंतिन्या नृपस्त्रियाः ॥ प्रभावः कथितः शंभोर्माहात्म्यमपि वर्णितम्

sūta uvāca ityeṣa śivabhaktāyāḥ sīmaṁtinyā nṛpastriyāḥ prabhāvaḥ kathitaḥ śaṁbhormāhātmyamapi varṇitam

सूत जी ने कहा — इस प्रकार शिवभक्त राजरानी सीमन्तिनी का यह प्रभाव कहा गया, और शम्भु का माहात्म्य भी वर्णित हुआ।

श्लोक 93 (skanda.3.101.93)

भूयोपि शिवभक्तानां प्रभावं विस्मयावहम् ॥ समासाद्वर्णयिष्यामि श्रोतॄणां मंगलायनम्

bhūyopi śivabhaktānāṁ prabhāvaṁ vismayāvaham samāsādvarṇayiṣyāmi śrotṝṇāṁ maṁgalāyanam

अब मैं फिर से शिवभक्तों के आश्चर्यजनक प्रभाव को, श्रोताओं के मंगल के लिए, संक्षेप में वर्णन करूँगा।

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