ब्रह्म खण्ड · अध्याय 100
सोमवार व्रत माहात्म्य: चन्द्रांगद और सीमन्तिनी
श्लोक 1 (skanda.3.100.1)
॥ सूत उवाच ॥ नित्यानंदमयं शांतं निर्विकल्पं निरामयम् ॥ शिवतत्त्वमनाद्यंतं ये विदुस्ते परं गताः
sūta uvāca nityānaṁdamayaṁ śāṁtaṁ nirvikalpaṁ nirāmayam śivatattvamanādyaṁtaṁ ye viduste paraṁ gatāḥ
सूत जी ने कहा — जो नित्य आनन्दमय, शान्त, निर्विकल्प, निरामय, आदि-अन्त रहित शिवतत्त्व को जानते हैं, वे परम गति को प्राप्त होते हैं।
श्लोक 2 (skanda.3.100.2)
विरक्ताः कामभोगेभ्यो ये प्रकुर्वंत्यहैतुकीम् ॥ भक्तिं परां शिवे धीरास्तेषां मुक्तिर्न संसृतिः
viraktāḥ kāmabhogebhyo ye prakurvaṁtyahaitukīm bhaktiṁ parāṁ śive dhīrāsteṣāṁ muktirna saṁsṛtiḥ
जो कामभोगों से विरक्त होकर शिव में निष्काम परम भक्ति करते हैं, उन धीर पुरुषों के लिए मुक्ति ही है, संसार नहीं।
श्लोक 3 (skanda.3.100.3)
विषयानभिसंधाय ये कुर्वंति शिवे रतिम् ॥ विषयैर्नाभिभूयंते भुंजानास्तत्फलान्यपि
viṣayānabhisaṁdhāya ye kurvaṁti śive ratim viṣayairnābhibhūyaṁte bhuṁjānāstatphalānyapi
जो विषयों की कामना किए बिना शिव में प्रेम करते हैं, वे विषयों के फल भोगते हुए भी उनसे पराभूत नहीं होते।
श्लोक 4 (skanda.3.100.4)
येन केनापि भावेन शिवभक्तियुतो नरः ॥ न विनश्यति कालेन स याति परमां गतिम्
yena kenāpi bhāvena śivabhaktiyuto naraḥ na vinaśyati kālena sa yāti paramāṁ gatim
जिस किसी भी भाव से शिवभक्ति से युक्त मनुष्य काल से नष्ट नहीं होता, वह परम गति को प्राप्त होता है।
श्लोक 5 (skanda.3.100.5)
आरुरुक्षुः परं स्थानं विषयासक्तमानसः ॥ पूजयेत्कर्मणा शंभुं भोगांते शिवमाप्नुयात्
ārurukṣuḥ paraṁ sthānaṁ viṣayāsaktamānasaḥ pūjayetkarmaṇā śaṁbhuṁ bhogāṁte śivamāpnuyāt
विषयों में आसक्त-मनवाला, किन्तु परम स्थान की इच्छा रखनेवाला पुरुष कर्म द्वारा शम्भु की पूजा करे; भोग के अन्त में शिव को प्राप्त करेगा।
श्लोक 6 (skanda.3.100.6)
अशक्तः कश्चिदुत्स्रष्टुं प्रायो विषयवासनाम् ॥ अतः कर्ममयी पूजा कामधेनुः शरीरिणाम्
aśaktaḥ kaścidutsraṣṭuṁ prāyo viṣayavāsanām ataḥ karmamayī pūjā kāmadhenuḥ śarīriṇām
जो विषय-वासना का त्याग करने में प्रायः असमर्थ है, उसके लिए कर्ममयी पूजा ही देहधारियों की कामधेनु है।
श्लोक 7 (skanda.3.100.7)
मायामयेपि संसारे ये विहृत्य चिरं सुखम् ॥ मुक्तिमिच्छन्ति देहांते तेषां धर्मोयमीरितः
māyāmayepi saṁsāre ye vihṛtya ciraṁ sukham muktimicchanti dehāṁte teṣāṁ dharmoyamīritaḥ
इस मायामय संसार में भी जो चिरकाल तक सुख भोगकर देहान्त में मुक्ति चाहते हैं, उनके लिए यही धर्म कहा गया है।
श्लोक 8 (skanda.3.100.8)
शिवपूजा सदा लोके हेतुः स्वर्गापवर्गयोः ॥ सोमवारे विशेषेण प्रदोषादिगुणान्विते
śivapūjā sadā loke hetuḥ svargāpavargayoḥ somavāre viśeṣeṇa pradoṣādiguṇānvite
शिवपूजा सदा संसार में स्वर्ग और मोक्ष दोनों का कारण है — विशेषकर प्रदोष आदि गुणों से युक्त सोमवार को।
श्लोक 9 (skanda.3.100.9)
केवलेनापि ये कुर्युः सोमवारे शिवार्चनम् ॥ न तेषां विद्यते किंचिदिहामुत्र च दुर्लभम्
kevalenāpi ye kuryuḥ somavāre śivārcanam na teṣāṁ vidyate kiṁcidihāmutra ca durlabham
जो केवल सोमवार को ही शिव की अर्चना करते हैं, उनके लिए इस लोक और परलोक में कुछ भी दुर्लभ नहीं है।
श्लोक 10 (skanda.3.100.10)
उपोषितः शुचिर्भूत्वा सोमवारे जितेंद्रियः ॥ वैदिकैर्लौकिकैर्वापि विधिवत्पूजयेच्छिवम्
upoṣitaḥ śucirbhūtvā somavāre jiteṁdriyaḥ vaidikairlaukikairvāpi vidhivatpūjayecchivam
उपवास करके, पवित्र होकर, जितेन्द्रिय होकर, सोमवार को वैदिक अथवा लौकिक विधि से विधिपूर्वक शिव की पूजा करे।
श्लोक 11 (skanda.3.100.11)
ब्रह्मचारी गृहस्थो वा कन्या वापि सभर्त्तृका॥ विभर्तृका वा संपूज्य लभते वरमीप्सितम्
brahmacārī gṛhastho vā kanyā vāpi sabharttṛkā vibhartṛkā vā saṁpūjya labhate varamīpsitam
ब्रह्मचारी, गृहस्थ, सपति कन्या अथवा विधवा — पूजा करके अभीष्ट वर प्राप्त करते हैं।
श्लोक 12 (skanda.3.100.12)
अत्राहं कथयिष्यामि कथां श्रोतृमनोहराम्॥ श्रुत्वा मुक्तिं प्रयांत्येव भर्तिर्भवति शांभवी
atrāhaṁ kathayiṣyāmi kathāṁ śrotṛmanoharām śrutvā muktiṁ prayāṁtyeva bhartirbhavati śāṁbhavī
यहाँ मैं श्रोताओं के मन को मोहित करने वाली एक कथा कहूँगा, जिसे सुनकर शाम्भवी भक्ति उत्पन्न होकर मुक्ति की ओर ले जाती है।
श्लोक 13 (skanda.3.100.13)
आर्यावर्ते नृपः कश्चिदासीद्धर्मभृतां वरः॥ चित्रवर्मेति विख्यातो धर्मराजो दुरात्मनाम्
āryāvarte nṛpaḥ kaścidāsīddharmabhṛtāṁ varaḥ citravarmeti vikhyāto dharmarājo durātmanām
आर्यावर्त में धर्मधारियों में श्रेष्ठ एक राजा था, चित्रवर्मा नाम से विख्यात, दुष्टों के लिए धर्मराज-सा।
श्लोक 14 (skanda.3.100.14)
स गोप्ता धर्मसेतूनां शास्ता दुष्पथगामिनाम् ॥ यष्टा समस्तयज्ञानां त्राता शरणमिच्छताम्
sa goptā dharmasetūnāṁ śāstā duṣpathagāminām yaṣṭā samastayajñānāṁ trātā śaraṇamicchatām
वह धर्म-सेतुओं का रक्षक, कुमार्गगामियों का शासक, समस्त यज्ञों का यजनकर्ता, शरणागतों का त्राता था।
श्लोक 15 (skanda.3.100.15)
कर्त्ता सकलपुण्यानां दाता सकलसंपदाम् ॥ जेता सपत्नवृंदानां भक्तः शिवमुकुन्दयोः
karttā sakalapuṇyānāṁ dātā sakalasaṁpadām jetā sapatnavṛṁdānāṁ bhaktaḥ śivamukundayoḥ
वह समस्त पुण्यों का कर्ता, समस्त सम्पदाओं का दाता, समस्त शत्रु-समूहों का विजेता, शिव और मुकुन्द का भक्त था।
श्लोक 16 (skanda.3.100.16)
सोनुकूलासु पत्नीषु लब्ध्वा पुत्रान्महौजसः ॥ चिरेण प्रार्थितां लेभे कन्यामेकां वराननाम्
sonukūlāsu patnīṣu labdhvā putrānmahaujasaḥ cireṇa prārthitāṁ lebhe kanyāmekāṁ varānanām
अनुकूल पत्नियों से महातेजस्वी पुत्र पाकर, उसने बहुत काल की प्रार्थना के बाद एक सुन्दर मुखवाली कन्या प्राप्त की।
श्लोक 17 (skanda.3.100.17)
स लब्ध्वा तनयां दिष्ट्या हिमवानिव पार्वतीम् ॥ आत्मानं देवसदृशं मेने पूर्णमनोरथम्
sa labdhvā tanayāṁ diṣṭyā himavāniva pārvatīm ātmānaṁ devasadṛśaṁ mene pūrṇamanoratham
उस कन्या को प्राप्त करके, मानो हिमवान ने पार्वती को पाया हो, वह अपने को देवतुल्य और मनोरथ पूर्ण मानने लगा।
श्लोक 18 (skanda.3.100.18)
स एकदा जातकलक्षणज्ञानाहूय साधून्द्विजमुख्यवृंदान् ॥ कुतूहलेनाभिनिविष्टचेताः पप्रच्छ कन्याजनने फलानि
sa ekadā jātakalakṣaṇajñānāhūya sādhūndvijamukhyavṛṁdān kutūhalenābhiniviṣṭacetāḥ papraccha kanyājanane phalāni
एक बार जन्मलक्षण जाननेवाले साधुओं और श्रेष्ठ ब्राह्मणों को बुलाकर, कौतूहलपूर्ण चित्त से उसने कन्या के जन्म के फल पूछे।
श्लोक 19 (skanda.3.100.19)
अथ तत्राब्रवीदेको बहुज्ञो द्विजसत्तमः ॥ एषा सीमंतिनी नाम्ना कन्या तव महीपते
atha tatrābravīdeko bahujño dvijasattamaḥ eṣā sīmaṁtinī nāmnā kanyā tava mahīpate
तब वहाँ एक बहुज्ञ श्रेष्ठ ब्राह्मण ने कहा — "हे राजन्! तुम्हारी यह कन्या सीमन्तिनी नाम से,
श्लोक 20 (skanda.3.100.20)
उमेव मांगल्यवती दमयंतीव रूपिणी ॥ भारतीव कलाभिज्ञा लक्ष्मीरिव महागुणा
umeva māṁgalyavatī damayaṁtīva rūpiṇī bhāratīva kalābhijñā lakṣmīriva mahāguṇā
"उमा के समान मंगलमयी, दमयन्ती के समान रूपवती, भारती के समान कलाओं में निपुण, लक्ष्मी के समान महागुणवती,
श्लोक 21 (skanda.3.100.21)
सुप्रजा देवमातेव जानकीव धृतव्रता ॥ रविप्रभेव सत्कांतिश्चंद्रिकेव मनोरमा
suprajā devamāteva jānakīva dhṛtavratā raviprabheva satkāṁtiścaṁdrikeva manoramā
"देवमाता के समान सुप्रजा, जानकी के समान व्रतधारी, सूर्य की प्रभा के समान सत्कान्ति, चन्द्रिका के समान मनोरम है —
श्लोक 22 (skanda.3.100.22)
दशवर्षसहस्राणि सह भर्त्रा प्रमोदते ॥ प्रसूय तनयानष्टौ परं सुखमवाप्स्यति
daśavarṣasahasrāṇi saha bhartrā pramodate prasūya tanayānaṣṭau paraṁ sukhamavāpsyati
"यह दस हजार वर्षों तक पति के साथ आनन्द भोगेगी; आठ पुत्रों को जन्म देकर परम सुख प्राप्त करेगी।"
श्लोक 23 (skanda.3.100.23)
इत्युक्तवंतं नृपतिर्धनैः संपूज्य तं द्विजम् ॥ अवाप परमां प्रीतिं तद्वागमृतसेवया
ityuktavaṁtaṁ nṛpatirdhanaiḥ saṁpūjya taṁ dvijam avāpa paramāṁ prītiṁ tadvāgamṛtasevayā
यह सुनकर राजा ने उस ब्राह्मण को धन से पूजित करके, उसके अमृत-तुल्य वचनों की सेवा से परम प्रीति प्राप्त की।
श्लोक 24 (skanda.3.100.24)
अथान्योऽपि द्विजः प्राह धैर्यवानमितद्युतिः ॥ एषा चतुर्दशे वर्षे वैधव्यं प्रतिपत्स्यति
athānyo'pi dvijaḥ prāha dhairyavānamitadyutiḥ eṣā caturdaśe varṣe vaidhavyaṁ pratipatsyati
फिर एक अन्य ब्राह्मण ने भी, धैर्यवान और अपरिमित तेजवाला, कहा — "यह चौदहवें वर्ष में वैधव्य को प्राप्त होगी।"
श्लोक 25 (skanda.3.100.25)
इत्याकर्ण्य वचस्तस्य वज्रनिर्घातनिष्ठुरम् ॥ मुहूर्तमभवद्राजा चिंताव्याकुलमानसः
ityākarṇya vacastasya vajranirghātaniṣṭhuram muhūrtamabhavadrājā ciṁtāvyākulamānasaḥ
वज्रपात के समान कठोर उसके इन वचनों को सुनकर राजा का मन क्षणभर के लिए चिन्ता से व्याकुल हो गया।
श्लोक 26 (skanda.3.100.26)
अथ सर्वान्समुत्सृज्य ब्राह्मणान्ब्रह्मवत्सलः ॥ सर्वं दैवकृतं मत्त्वा निश्चिंतः पार्थिवोऽभवत्
atha sarvānsamutsṛjya brāhmaṇānbrahmavatsalaḥ sarvaṁ daivakṛtaṁ mattvā niściṁtaḥ pārthivo'bhavat
फिर ब्रह्मवत्सल राजा ने सभी ब्राह्मणों को विदा करके, सब कुछ दैवकृत मानकर, स्वयं को निश्चिन्त कर लिया।
श्लोक 27 (skanda.3.100.27)
सापि सीमंतिनी बाला क्रमेण गतशैशवा ॥ वैधव्यमात्मनो भावि शुश्रावात्मसखीमुखात्
sāpi sīmaṁtinī bālā krameṇa gataśaiśavā vaidhavyamātmano bhāvi śuśrāvātmasakhīmukhāt
वह बालिका सीमन्तिनी भी क्रमशः शैशव बीत जाने पर, अपनी सखी के मुख से अपने भावी वैधव्य के बारे में सुनी।
श्लोक 28 (skanda.3.100.28)
परं निर्वेदमापन्ना चिंतयामास बालिका ॥ याज्ञवल्क्यमुनेः पत्नीं मैत्रेयीं पर्यपृच्छत
paraṁ nirvedamāpannā ciṁtayāmāsa bālikā yājñavalkyamuneḥ patnīṁ maitreyīṁ paryapṛcchata
अत्यन्त विषाद को प्राप्त होकर, वह बालिका चिन्तित हुई, और उसने याज्ञवल्क्य मुनि की पत्नी मैत्रेयी से पूछा —
श्लोक 29 (skanda.3.100.29)
मातस्त्वच्चरणांभोजं प्रपन्नास्मि भयाकुला॥ सौभाग्यवर्धनं कर्म मम शंसितुमर्हसि
mātastvaccaraṇāṁbhojaṁ prapannāsmi bhayākulā saubhāgyavardhanaṁ karma mama śaṁsitumarhasi
"हे माता! मैं भयाकुल होकर तुम्हारे चरणकमलों की शरण में आई हूँ; तुम मुझे सौभाग्य बढ़ानेवाला कर्म बताने योग्य हो।"
श्लोक 30 (skanda.3.100.30)
इति प्रपन्नां नृपतेः कन्यां प्राह मुनेः सती॥ शरणं व्रज तन्वंगि पार्वतीं शिवसंयुताम्
iti prapannāṁ nṛpateḥ kanyāṁ prāha muneḥ satī śaraṇaṁ vraja tanvaṁgi pārvatīṁ śivasaṁyutām
इस प्रकार शरण में आई राजकन्या से मुनि की उस सती ने कहा — "हे कोमलांगी! शिव सहित पार्वती की शरण में जाओ।
श्लोक 31 (skanda.3.100.31)
सोमवारे शिवं गौरीं पूजयस्व समाहिता॥ उपोषिता वा सुस्नाता विरजाम्बरधारिणी
somavāre śivaṁ gaurīṁ pūjayasva samāhitā upoṣitā vā susnātā virajāmbaradhāriṇī
"सोमवार को उपवास करके अथवा भलीभाँति स्नान करके, विरजा वस्त्र धारण करके, एकाग्रचित्त होकर शिव और गौरी की पूजा करो।
श्लोक 32 (skanda.3.100.32)
यतवाङ्निश्चलमनाः पूजां कृत्वा यथोचिताम् ॥ ब्राह्मणान्भोजयित्वाथ शिवं सम्यक्प्रसादयत्
yatavāṅniścalamanāḥ pūjāṁ kṛtvā yathocitām brāhmaṇānbhojayitvātha śivaṁ samyakprasādayat
"वाणी को संयमित रखकर, स्थिर मन से, यथोचित पूजा करके, ब्राह्मणों को भोजन कराकर, शिव को भलीभाँति प्रसन्न करो।
श्लोक 33 (skanda.3.100.33)
पापक्षयोऽभिषेकेण साम्राज्यं पीठपूजनात् ॥ सौभाग्यमखिलं सौख्यं गंधमाल्याक्षतार्पणात्
pāpakṣayo'bhiṣekeṇa sāmrājyaṁ pīṭhapūjanāt saubhāgyamakhilaṁ saukhyaṁ gaṁdhamālyākṣatārpaṇāt
"अभिषेक से पापक्षय होता है, पीठ-पूजन से साम्राज्य मिलता है, गन्ध-माल्य-अक्षत के अर्पण से समस्त सौभाग्य और सुख मिलता है।
श्लोक 34 (skanda.3.100.34)
धूपदानेन सौगंध्यं कांतिर्दीपप्रदानतः ॥ नैवेद्यैश्च महाभोगो लक्ष्मीस्तांबूलदानतः
dhūpadānena saugaṁdhyaṁ kāṁtirdīpapradānataḥ naivedyaiśca mahābhogo lakṣmīstāṁbūladānataḥ
"धूप देने से सुगन्ध, दीप देने से कान्ति, नैवेद्य से महाभोग, ताम्बूल देने से लक्ष्मी प्राप्त होती है।
श्लोक 35 (skanda.3.100.35)
धर्मार्थकाममोक्षाश्च नमस्कारप्रदानतः ॥ अष्टैश्वर्यादिसिद्धीनां जप एव हि कारणम्
dharmārthakāmamokṣāśca namaskārapradānataḥ aṣṭaiśvaryādisiddhīnāṁ japa eva hi kāraṇam
"नमस्कार करने से धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष प्राप्त होते हैं; जप ही अष्टैश्वर्य आदि सिद्धियों का कारण है।
श्लोक 36 (skanda.3.100.36)
होमेन सर्वकामानां समृद्धिरुपजायते ॥ सर्वेषामेव देवानां तुष्टिर्ब्राह्मणभोजनात्
homena sarvakāmānāṁ samṛddhirupajāyate sarveṣāmeva devānāṁ tuṣṭirbrāhmaṇabhojanāt
"होम से समस्त कामनाओं की समृद्धि उत्पन्न होती है; ब्राह्मण-भोजन से समस्त देवताओं की तुष्टि होती है।
श्लोक 37 (skanda.3.100.37)
इत्थमाराधय शिवं सोमवारे शिवामपि ॥ अत्यापदमपि प्राप्ता निस्तीर्णाभिभवा भवेः
itthamārādhaya śivaṁ somavāre śivāmapi atyāpadamapi prāptā nistīrṇābhibhavā bhaveḥ
"इस प्रकार सोमवार को शिव और शिवा की आराधना करो; अत्यन्त आपत्ति को प्राप्त होकर भी तुम भव के अपमान से पार हो जाओगी।
श्लोक 38 (skanda.3.100.38)
घोराद्घोरं प्रपन्नापि महाक्लेशं भयानकम् ॥ शिवपूजाप्रभावेण तरिष्यसि महद्भयम्
ghorādghoraṁ prapannāpi mahākleśaṁ bhayānakam śivapūjāprabhāveṇa tariṣyasi mahadbhayam
"घोर से घोरतर, भयानक महाक्लेश को प्राप्त होकर भी, शिवपूजा के प्रभाव से तुम उस महाभय से पार हो जाओगी।"
श्लोक 39 (skanda.3.100.39)
इत्थं सीमंतिनीं सम्यगनुशास्य पुनः सती ॥ ययौ सापि वरारोहा राजपुत्री तथाऽकरोत्
itthaṁ sīmaṁtinīṁ samyaganuśāsya punaḥ satī yayau sāpi varārohā rājaputrī tathā'karot
इस प्रकार सीमन्तिनी को भलीभाँति उपदेश देकर वह सती पुनः चली गई, और उस सुन्दरी राजकुमारी ने भी वैसा ही किया।
श्लोक 40 (skanda.3.100.40)
दमयंत्यां नलस्यासीदिंद्रसेनाभिधः सुतः ॥ तस्य चंद्रांगदो नाम पुत्रोभू च्चंद्रसन्निभः
damayaṁtyāṁ nalasyāsīdiṁdrasenābhidhaḥ sutaḥ tasya caṁdrāṁgado nāma putrobhū ccaṁdrasannibhaḥ
दमयन्ती से नल का पुत्र इन्द्रसेन नाम से हुआ; उसका पुत्र चन्द्रांगद नाम से चन्द्रमा के समान सुन्दर हुआ।
श्लोक 41 (skanda.3.100.41)
चित्रवर्मा नृपश्रेष्ठस्तमाहूय नृपात्मजम् ॥ कन्यां सीमंतिनीं तस्मै प्रायच्छद्गुर्वनुज्ञया
citravarmā nṛpaśreṣṭhastamāhūya nṛpātmajam kanyāṁ sīmaṁtinīṁ tasmai prāyacchadgurvanujñayā
राजश्रेष्ठ चित्रवर्मा ने उस राजपुत्र को बुलाकर, गुरुजनों की अनुमति से अपनी कन्या सीमन्तिनी उसे दे दी।
श्लोक 42 (skanda.3.100.42)
सोऽभून्महोत्सवस्तत्र तस्या उद्वाहकर्मणि ॥ यत्र सर्वमहीपानां समवायो महानभूत्
so'bhūnmahotsavastatra tasyā udvāhakarmaṇi yatra sarvamahīpānāṁ samavāyo mahānabhūt
उसके विवाह-कर्म में वहाँ एक महोत्सव हुआ, जहाँ समस्त राजाओं का महान समागम हुआ।
श्लोक 43 (skanda.3.100.43)
तस्याः पाणिग्रहं काले कृत्वा चंद्रांगदः कृती ॥ उवास कतिचिन्मासांस्तत्रैव श्वशुरालये
tasyāḥ pāṇigrahaṁ kāle kṛtvā caṁdrāṁgadaḥ kṛtī uvāsa katicinmāsāṁstatraiva śvaśurālaye
उसका पाणिग्रहण समय पर करके, गुणवान चन्द्रांगद कुछ महीनों तक वहीं ससुराल में रहा।
श्लोक 44 (skanda.3.100.44)
एकदा यमुनां तर्तुं स राजतनयो बली ॥ आरुरोह तरीं कैश्चिद्वयस्यैः सह लीलया
ekadā yamunāṁ tartuṁ sa rājatanayo balī āruroha tarīṁ kaiścidvayasyaiḥ saha līlayā
एक बार वह बलशाली राजपुत्र यमुना को पार करने के लिए कुछ मित्रों के साथ क्रीड़ापूर्वक नाव पर चढ़ा।
श्लोक 45 (skanda.3.100.45)
तस्मिंस्तरति कालिंदीं राजपुत्रे विधेर्वशात् ॥ ममज्ज सह कैवतैरावर्त्ताभिहता तरी
tasmiṁstarati kāliṁdīṁ rājaputre vidhervaśāt mamajja saha kaivatairāvarttābhihatā tarī
उस राजपुत्र के कालिन्दी पार करते समय, दैव के वशीभूत होकर, आवर्त से टकराई हुई नाव, नाविकों सहित डूब गई।
श्लोक 46 (skanda.3.100.46)
हा हेति शब्दः सुमहानासीत्तस्यास्तटद्वये ॥ पश्यतां सर्वसैन्यानां प्रलापो दिवम स्पृशत्
hā heti śabdaḥ sumahānāsīttasyāstaṭadvaye paśyatāṁ sarvasainyānāṁ pralāpo divama spṛśat
उसके दोनों तटों पर "हाय, हाय" का बड़ा भारी शब्द हुआ; देखते हुए सभी सेनाओं का विलाप आकाश को छू गया।
श्लोक 47 (skanda.3.100.47)
मज्जंतो मम्रिरे केचित्केचिद्ग्राहोदरं गताः ॥ राजपुत्रादयः केचिन्नादृश्यंत महाजले
majjaṁto mamrire kecitkecidgrāhodaraṁ gatāḥ rājaputrādayaḥ kecinnādṛśyaṁta mahājale
डूबते हुए कुछ लोग मर गए, कुछ मगरमच्छों के पेट में समा गए; राजपुत्र आदि कुछ लोग विशाल जल में दिखाई नहीं दिए।
श्लोक 48 (skanda.3.100.48)
तदुपश्रुत्य राजापि चित्रवर्मातिवि ह्वलः ॥ यमुनायास्तटं प्राप्य विचेष्टः समजायत
tadupaśrutya rājāpi citravarmātivi hvalaḥ yamunāyāstaṭaṁ prāpya viceṣṭaḥ samajāyata
यह सुनकर राजा चित्रवर्मा भी अत्यन्त विह्वल हो गया; यमुना के तट पर पहुँचकर वह व्याकुल हो गया।
श्लोक 49 (skanda.3.100.49)
श्रुत्वाथ राजपत्न्यश्च वभूबुर्गतचेतनाः ॥ सा च सीमंतिनी श्रुत्वा पपाप डूवि मूर्च्छिता
śrutvātha rājapatnyaśca vabhūburgatacetanāḥ sā ca sīmaṁtinī śrutvā papāpa ḍūvi mūrcchitā
यह सुनकर राजा की पत्नियाँ भी बेहोश हो गईं; वह सीमन्तिनी भी सुनकर मूर्च्छित होकर भूमि पर गिर पड़ी।
श्लोक 50 (skanda.3.100.50)
तथान्ये मंत्रिमुख्याश्च नायकाः सपुरोहिताः॥ विह्वलाः शोकसंतप्ता विलेपुर्मुक्तमूर्धजाः
tathānye maṁtrimukhyāśca nāyakāḥ sapurohitāḥ vihvalāḥ śokasaṁtaptā vilepurmuktamūrdhajāḥ
इसी प्रकार अन्य मुख्य मन्त्री और पुरोहितों सहित सेनापति भी शोक से संतप्त, विह्वल होकर, बाल बिखेरकर विलाप करने लगे।
श्लोक 51 (skanda.3.100.51)
इंद्रसेनोपि राजेद्रः पुत्रवार्त्तां सुदुःखितः॥ आकर्ण्य सह पत्नीभिर्नष्टसंज्ञः पपात ह
iṁdrasenopi rājedraḥ putravārttāṁ suduḥkhitaḥ ākarṇya saha patnībhirnaṣṭasaṁjñaḥ papāta ha
राजा इन्द्रसेन भी अपने पुत्र का समाचार सुनकर अत्यन्त दुःखी हुआ, पत्नियों सहित मूर्च्छित होकर गिर पड़ा।
श्लोक 52 (skanda.3.100.52)
तन्मंत्रिणश्च तत्पौरास्तथा तद्देशवासिनः ॥ आबालवृद्धवनिताश्चुक्रुशुः शोकविह्वलाः
tanmaṁtriṇaśca tatpaurāstathā taddeśavāsinaḥ ābālavṛddhavanitāścukruśuḥ śokavihvalāḥ
उसके मन्त्री, नगरवासी, तथा उस देश के निवासी — बालक से लेकर वृद्ध और स्त्रियाँ तक — शोक से विह्वल होकर चिल्लाने लगे।
श्लोक 53 (skanda.3.100.53)
शोकात्केचिदुरो जघ्नुः शिरो जघ्नुश्च केचन ॥ हा राजपुत्र हा तात क्वासि क्वासीति बभ्रमुः
śokātkeciduro jaghnuḥ śiro jaghnuśca kecana hā rājaputra hā tāta kvāsi kvāsīti babhramuḥ
शोक से कुछ लोग अपनी छाती पीटने लगे, कुछ अपना सिर पीटने लगे; "हाय राजपुत्र, हाय पुत्र! तुम कहाँ हो, कहाँ हो?" कहते हुए भटकने लगे।
श्लोक 54 (skanda.3.100.54)
एवं शोकाकुलं दीनमिंद्रसेनमहीपतेः ॥ नगरं सहसा क्षुब्धं चित्रवर्मपुरं तथा
evaṁ śokākulaṁ dīnamiṁdrasenamahīpateḥ nagaraṁ sahasā kṣubdhaṁ citravarmapuraṁ tathā
इस प्रकार राजा इन्द्रसेन का नगर और चित्रवर्मा का नगर, दोनों ही शोकाकुल, दीन और अचानक क्षुब्ध हो गए।
श्लोक 55 (skanda.3.100.55)
अथ वृद्धैः समाश्वस्तश्चित्रवर्मा महीपतिः ॥ शनैर्नगरमागत्य सान्त्वयामास चात्मजाम्
atha vṛddhaiḥ samāśvastaścitravarmā mahīpatiḥ śanairnagaramāgatya sāntvayāmāsa cātmajām
फिर वृद्धजनों द्वारा सांत्वना पाकर, राजा चित्रवर्मा धीरे-धीरे नगर में आकर अपनी पुत्री को सांत्वना देने लगा।
श्लोक 56 (skanda.3.100.56)
स राजांभसिमग्नस्य जामातुस्तस्य बांधवैः ॥ आगतैः कारयामास साकल्यादौर्ध्वदैहिकम्
sa rājāṁbhasimagnasya jāmātustasya bāṁdhavaiḥ āgataiḥ kārayāmāsa sākalyādaurdhvadaihikam
उस राजा ने जल में डूबे अपने जामाता का, आए हुए बन्धुजनों द्वारा, समस्त औध्वदैहिक अन्त्येष्टि कर्म पूरी तरह करवाया।
श्लोक 57 (skanda.3.100.57)
सा च सीमंतिनी साध्वी भर्तृलोकमतिः सती ॥ पित्रा निषिद्धा स्नेहेन वैधव्यं प्रत्यपद्यत
sā ca sīmaṁtinī sādhvī bhartṛlokamatiḥ satī pitrā niṣiddhā snehena vaidhavyaṁ pratyapadyata
वह साध्वी सीमन्तिनी, अपने पति के लोक में ही मन लगाए, पिता द्वारा स्नेहवश रोके जाने पर भी, वैधव्य को स्वीकार कर लिया।
श्लोक 58 (skanda.3.100.58)
मुनेः पत्न्योऽपदिष्टं यत्सोमवारव्रतं शुभम् ॥ न तत्याज शुभाचारा वैधव्यं प्राप्तवत्यपि
muneḥ patnyo'padiṣṭaṁ yatsomavāravrataṁ śubham na tatyāja śubhācārā vaidhavyaṁ prāptavatyapi
मुनि-पत्नी द्वारा उपदिष्ट उस शुभ सोमवार-व्रत को, वैधव्य को प्राप्त होने पर भी, उस शुभाचारिणी ने नहीं त्यागा।
श्लोक 59 (skanda.3.100.59)
एवं चतुर्दशे वर्षे दुःखं प्राप्य सुदारुणम् ॥ ध्यायन्ती शिवपादाब्जं वत्सरत्रयमत्यगात्
evaṁ caturdaśe varṣe duḥkhaṁ prāpya sudāruṇam dhyāyantī śivapādābjaṁ vatsaratrayamatyagāt
इस प्रकार चौदहवें वर्ष में अत्यन्त भीषण दुःख को प्राप्त करके, शिव के चरणकमलों का ध्यान करते हुए उसने तीन वर्ष बिता दिए।
श्लोक 60 (skanda.3.100.60)
पुत्रशोकादिवोन्मत्तमिंद्रसेनं महीपतिम् ॥ प्रसह्य तस्य दायादाः सप्तांगं जह्रुरोजसा
putraśokādivonmattamiṁdrasenaṁ mahīpatim prasahya tasya dāyādāḥ saptāṁgaṁ jahrurojasā
इसी बीच, पुत्र-शोक से मानो उन्मत्त हुए राजा इन्द्रसेन का सप्तांग राज्य उसके ही रिश्तेदारों ने बलपूर्वक हड़प लिया।
श्लोक 61 (skanda.3.100.61)
हृतसिंहासनः शूरैर्दायादैः सोऽप्रजो नृपः ॥ निगृह्य काराभवने सपत्नीको निवेशितः
hṛtasiṁhāsanaḥ śūrairdāyādaiḥ so'prajo nṛpaḥ nigṛhya kārābhavane sapatnīko niveśitaḥ
वीर रिश्तेदारों द्वारा सिंहासन से हटाया गया वह निष्संतान राजा पकड़ लिया गया और अपनी पत्नी सहित कारागार में डाल दिया गया।
श्लोक 62 (skanda.3.100.62)
चंद्रागदोऽपि तत्पुत्रो निमग्नो यमुनाजले ॥ अधोधोमज्जमानोऽसौ ददर्शोरगकामिनीः
caṁdrāgado'pi tatputro nimagno yamunājale adhodhomajjamāno'sau dadarśoragakāminīḥ
वह पुत्र चन्द्रांगद भी यमुना के जल में डूबता हुआ, नीचे-नीचे जाता हुआ, नागकन्याओं को देख पाया।
श्लोक 63 (skanda.3.100.63)
जलक्रीडासु सक्तास्ता दृष्ट्वा राजकुमार कम् ॥ विस्मितास्तमथो निन्युः पातालं पन्नगालयम्
jalakrīḍāsu saktāstā dṛṣṭvā rājakumāra kam vismitāstamatho ninyuḥ pātālaṁ pannagālayam
जलक्रीड़ा में लीन उन नागकन्याओं ने राजकुमार को देखकर आश्चर्यचकित होकर उसे पाताल, नागों के निवास, में ले गईं।
श्लोक 64 (skanda.3.100.64)
स नीयमानस्तरसा पन्नगीभिर्नृपात्मजः ॥ तक्षकस्य पुरं रम्यं विवेश परमाद्भुतम्
sa nīyamānastarasā pannagībhirnṛpātmajaḥ takṣakasya puraṁ ramyaṁ viveśa paramādbhutam
नागकन्याओं द्वारा तेजी से ले जाया जाता हुआ वह राजपुत्र तक्षक के सुन्दर, परम अद्भुत नगर में प्रविष्ट हुआ।
श्लोक 65 (skanda.3.100.65)
सोऽपश्यद्राजतनयो महेंद्रभवनोपमम् ॥ महारत्नपरिभ्राजन्मयूखपरिदीपितम्
so'paśyadrājatanayo maheṁdrabhavanopamam mahāratnaparibhrājanmayūkhaparidīpitam
उस राजपुत्र ने महेन्द्र के भवन के समान, महारत्नों की किरणों से प्रदीप्त वह स्थान देखा,
श्लोक 66 (skanda.3.100.66)
वज्रवैडूर्यपाचादिप्रासादशतसंकुलम् ॥ माणिक्य गोपुरद्वारं मुक्तादामभिरुज्ज्वलम्
vajravaiḍūryapācādiprāsādaśatasaṁkulam māṇikya gopuradvāraṁ muktādāmabhirujjvalam
वज्र, वैडूर्य आदि से बने सैकड़ों महलों से भरा हुआ, माणिक्य के गोपुरद्वारों वाला, मुक्ताहारों से उज्ज्वल,
श्लोक 67 (skanda.3.100.67)
चंद्रकांतस्थलं रम्यं हेमद्वारकपाटकम् ॥ अनेकशतसाहस्रमणिदीपविराजितम्
caṁdrakāṁtasthalaṁ ramyaṁ hemadvārakapāṭakam anekaśatasāhasramaṇidīpavirājitam
चन्द्रकान्तमणि के सुन्दर फर्शवाला, स्वर्णद्वार-किवाड़ोंवाला, सैकड़ों-हजारों मणिदीपों से सुशोभित।
श्लोक 68 (skanda.3.100.68)
तत्रापश्यत्सभा मध्ये निषण्णं रत्नविष्टरे ॥ तक्षकं पन्नगाधीशं फणानेकशतोज्ज्वलम्
tatrāpaśyatsabhā madhye niṣaṇṇaṁ ratnaviṣṭare takṣakaṁ pannagādhīśaṁ phaṇānekaśatojjvalam
वहाँ सभा के मध्य उसने रत्नसिंहासन पर विराजमान, सैकड़ों फणों से उज्ज्वल नागाधिपति तक्षक को देखा,
श्लोक 69 (skanda.3.100.69)
दिव्यांबरधरं दीप्तं रत्नकुण्डलराजितम् ॥ नानारत्नपरिक्षिप्तमुकुट द्युतिरंजितम्
divyāṁbaradharaṁ dīptaṁ ratnakuṇḍalarājitam nānāratnaparikṣiptamukuṭa dyutiraṁjitam
दिव्य वस्त्र धारण किए हुए, दीप्तिमान, रत्नकुण्डलों से सुशोभित, नाना रत्नों से जड़ित मुकुट की कान्ति से रंजित,
श्लोक 70 (skanda.3.100.70)
फणामणिमयूखाढ्यैरसंख्यैः पन्नगोत्तमैः ॥ उपासितं प्रांजलिभिश्चित्ररत्नविभूषितैः
phaṇāmaṇimayūkhāḍhyairasaṁkhyaiḥ pannagottamaiḥ upāsitaṁ prāṁjalibhiścitraratnavibhūṣitaiḥ
फणों के मणियों की किरणों से युक्त असंख्य श्रेष्ठ नागों द्वारा हाथ जोड़े हुए, विचित्र रत्नों से विभूषित, उपासित,
श्लोक 71 (skanda.3.100.71)
रूपयौवनमाधुर्यविलासगति शोभिना ॥ नागकन्यासहस्रेण समंतात्परिवारितम्
rūpayauvanamādhuryavilāsagati śobhinā nāgakanyāsahasreṇa samaṁtātparivāritam
रूप, यौवन, माधुर्य और विलासपूर्ण गति से सुशोभित हज़ारों नागकन्याओं से चारों ओर घिरा हुआ,
श्लोक 72 (skanda.3.100.72)
दिव्याभरणदीप्तांगं दिव्यचंदनचर्चितम् ॥ कालाग्निमिव दुर्धर्षं तेजसादित्यसन्निभम्
divyābharaṇadīptāṁgaṁ divyacaṁdanacarcitam kālāgnimiva durdharṣaṁ tejasādityasannibham
दिव्य आभूषणों से दीप्त अंगोंवाला, दिव्य चन्दन से लिप्त, कालाग्नि के समान दुर्धर्ष, तेज में सूर्य के समान।
श्लोक 73 (skanda.3.100.73)
दृष्ट्वा राजसुतो धीरः प्रणिपत्य सभास्थले ॥ उत्थितः प्रांजलिस्तस्य तेजसाक्षिप्तलोचनः
dṛṣṭvā rājasuto dhīraḥ praṇipatya sabhāsthale utthitaḥ prāṁjalistasya tejasākṣiptalocanaḥ
उसे देखकर धीर राजपुत्र सभा-स्थल में प्रणाम करके खड़ा हुआ, हाथ जोड़े हुए, उसके तेज से चौंधियाई आँखोंवाला।
श्लोक 74 (skanda.3.100.74)
नागराजोपि तं दृष्ट्वा राजपुत्रं मनोरमम् ॥ कोऽयं कस्मादिहायात इति पप्रच्छ पन्नगीः
nāgarājopi taṁ dṛṣṭvā rājaputraṁ manoramam ko'yaṁ kasmādihāyāta iti papraccha pannagīḥ
नागराज ने भी उस मनोहर राजपुत्र को देखकर नागकन्याओं से पूछा — "यह कौन है, कहाँ से यहाँ आया है?"
श्लोक 75 (skanda.3.100.75)
ता ऊचुर्यमुनातोये दृष्टोऽस्माभिर्यदृच्छया ॥ अज्ञातकुलनामायमानीतस्तव सन्निधिम्
tā ūcuryamunātoye dṛṣṭo'smābhiryadṛcchayā ajñātakulanāmāyamānītastava sannidhim
वे बोलीं — "हमने इसे यमुना के जल में अनायास देखा; अज्ञातकुल-नामवाले इसे हम आपके समीप ले आई हैं।"
श्लोक 76 (skanda.3.100.76)
अथ पृष्टो राजपुत्रस्तक्षकेण महात्मना ॥ कस्यासि तनयः कस्त्वं को देशः कथमागतः
atha pṛṣṭo rājaputrastakṣakeṇa mahātmanā kasyāsi tanayaḥ kastvaṁ ko deśaḥ kathamāgataḥ
फिर उस महात्मा तक्षक ने राजपुत्र से पूछा — "तुम किसके पुत्र हो, कौन हो, कौन-सा देश है, कैसे आए हो?"
श्लोक 77 (skanda.3.100.77)
राजपुत्रो वचः श्रुत्वा तक्षकं वाक्यमब्रवीत्
rājaputro vacaḥ śrutvā takṣakaṁ vākyamabravīt
तक्षक के इस वचन को सुनकर राजपुत्र ने उससे यह कहा —
श्लोक 78 (skanda.3.100.78)
राजपुत्र उवाच ॥ अस्ति भूमंडले कश्चिद्देशो निषधसंज्ञकः ॥ तस्याधिपोऽभवद्राजा नलो नाम महा यशाः ॥ स पुण्यकीर्तिः क्षितिपो दमयन्तीपतिः शुभः
rājaputra uvāca asti bhūmaṁḍale kaściddeśo niṣadhasaṁjñakaḥ tasyādhipo'bhavadrājā nalo nāma mahā yaśāḥ sa puṇyakīrtiḥ kṣitipo damayantīpatiḥ śubhaḥ
राजपुत्र ने कहा — "पृथ्वीमण्डल में निषध नामक एक देश है; उसका स्वामी नल नामक महायशस्वी राजा हुआ, वह पुण्यकीर्ति, शुभ, दमयन्ती का पति राजा था।
श्लोक 79 (skanda.3.100.79)
तस्मादपींद्रसेनाख्यस्तस्य पुत्रो महाबलः ॥ चंद्रांगदोस्मि नाम्नाहं नवोढः श्वशुरालये ॥ विहरन्यमुनातोये निमग्नो देवचोदितः
tasmādapīṁdrasenākhyastasya putro mahābalaḥ caṁdrāṁgadosmi nāmnāhaṁ navoḍhaḥ śvaśurālaye viharanyamunātoye nimagno devacoditaḥ
"उससे इन्द्रसेन नामक महाबली पुत्र हुआ; मैं उसी का पुत्र हूँ, नाम से चन्द्रांगद, ससुराल में नवविवाहित। यमुना के जल में विहार करते हुए, देवयोग से मैं डूब गया।
श्लोक 80 (skanda.3.100.80)
एताभिः पन्नगस्त्रीभिरानीतोस्मि तवांतिकम् ॥ दृष्ट्वाहं तव पादाब्जं पुण्यैर्जन्मांतरार्जितैः
etābhiḥ pannagastrībhirānītosmi tavāṁtikam dṛṣṭvāhaṁ tava pādābjaṁ puṇyairjanmāṁtarārjitaiḥ
"इन नागकन्याओं द्वारा मैं आपके समीप लाया गया हूँ; पूर्वजन्मों में अर्जित पुण्यों से आपके चरणकमल देखकर,
श्लोक 81 (skanda.3.100.81)
अद्य धन्योऽस्मि धन्योऽस्मि कृतार्थो पितरौ मम ॥ यत्प्रेक्षितोऽहं कारुण्यात्त्वया संभाषितोपि च
adya dhanyo'smi dhanyo'smi kṛtārtho pitarau mama yatprekṣito'haṁ kāruṇyāttvayā saṁbhāṣitopi ca
"आज मैं धन्य हूँ, धन्य हूँ, मेरे माता-पिता कृतार्थ हैं — क्योंकि आपने करुणापूर्वक मुझे देखा और मुझसे बातचीत भी की।"
श्लोक 82 (skanda.3.100.82)
सूत उवाच ॥ इत्युदारमसंभ्रांतं वचः श्रुत्वातिपेशलम् ॥ तक्षकः पुनरौत्सुक्याद्बभाषे राजनंदनम्
sūta uvāca ityudāramasaṁbhrāṁtaṁ vacaḥ śrutvātipeśalam takṣakaḥ punarautsukyādbabhāṣe rājanaṁdanam
सूत जी ने कहा — इस प्रकार उदार, अविचलित और अत्यन्त मधुर वचन सुनकर, तक्षक ने पुनः उत्सुकतापूर्वक राजपुत्र से कहा।
श्लोक 83 (skanda.3.100.83)
तक्षक उवाच ॥ भोभो नरेंद्रदायाद मा भैषीर्धीरतां व्रज ॥ सर्वदेवेषु को देवो युष्माभिः पूज्यते सदा
takṣaka uvāca bhobho nareṁdradāyāda mā bhaiṣīrdhīratāṁ vraja sarvadeveṣu ko devo yuṣmābhiḥ pūjyate sadā
तक्षक ने कहा — "अरे राजवंशज! डरो मत, धैर्य धारण करो। सभी देवताओं में तुम लोग सदा किस देव की पूजा करते हो?"
श्लोक 84 (skanda.3.100.84)
राजपुत्र उवाच ॥ यो देवः सर्वेदेवेषु महादेवं इति स्मृतः ॥ पूज्यते स हि विश्वात्मा शिवोऽस्माभिरुमापतिः
rājaputra uvāca yo devaḥ sarvedeveṣu mahādevaṁ iti smṛtaḥ pūjyate sa hi viśvātmā śivo'smābhirumāpatiḥ
राजपुत्र ने कहा — "जो देव सभी देवताओं में महादेव कहलाते हैं, वे ही विश्वात्मा उमापति शिव हमारे द्वारा पूजित हैं।
श्लोक 85 (skanda.3.100.85)
यस्य तेजोंशलेशेन रजसा च प्रजापतिः ॥ कृतरूपोऽसृजद्विश्वं स नः पूज्यो महेश्वरः
yasya tejoṁśaleśena rajasā ca prajāpatiḥ kṛtarūpo'sṛjadviśvaṁ sa naḥ pūjyo maheśvaraḥ
"जिनके तेज के अंशमात्र और रज से प्रजापति ने रूप धारण करके विश्व की सृष्टि की, वे ही हमारे पूज्य महेश्वर हैं।
श्लोक 86 (skanda.3.100.86)
यस्यांशात्सात्त्विकं दिव्यं बिभ्रद्विष्णुः सनातनः ॥ विश्वं बिभर्त्ति भूतात्मा शिवोऽस्माभिः स पूज्यते
yasyāṁśātsāttvikaṁ divyaṁ bibhradviṣṇuḥ sanātanaḥ viśvaṁ bibhartti bhūtātmā śivo'smābhiḥ sa pūjyate
"जिनके अंश से सात्त्विक दिव्य विष्णु सनातन रूप धारण करके भूतात्मा होकर विश्व को धारण करते हैं, वे ही शिव हमारे द्वारा पूजित हैं।
श्लोक 87 (skanda.3.100.87)
यस्यांशात्तामसाज्जातो रुद्रः कालाग्निसन्निभः ॥ विश्वमेतद्धरत्यंते स पूज्योऽस्माभिरीश्वरः
yasyāṁśāttāmasājjāto rudraḥ kālāgnisannibhaḥ viśvametaddharatyaṁte sa pūjyo'smābhirīśvaraḥ
"जिनके तामस अंश से कालाग्नि के समान रुद्र उत्पन्न हुए, जो अन्त में इस समस्त विश्व का संहार करते हैं, वे ही ईश्वर हमारे द्वारा पूजित हैं।
श्लोक 88 (skanda.3.100.88)
यो विधाता विधातुश्च कारणस्यापि कारणम् ॥ तेजसां परमं तेजः स शिवो नः परा गतिः
yo vidhātā vidhātuśca kāraṇasyāpi kāraṇam tejasāṁ paramaṁ tejaḥ sa śivo naḥ parā gatiḥ
"जो विधाता के भी विधाता हैं, कारण के भी कारण हैं, सभी तेजों के परम तेज हैं, वही शिव हमारी परम गति हैं।
श्लोक 89 (skanda.3.100.89)
योंतिकस्थोऽपि दूरस्थः पापोपहृतचेतसाम् ॥ अपरिच्छेद्य धामासौ शिवो नः परमा गतिः
yoṁtikastho'pi dūrasthaḥ pāpopahṛtacetasām aparicchedya dhāmāsau śivo naḥ paramā gatiḥ
"जो समीप होते हुए भी पापयुक्त चित्तवालों के लिए दूर प्रतीत होते हैं, जिनका धाम अपरिमेय है, वही शिव हमारी परम गति हैं।
श्लोक 90 (skanda.3.100.90)
योऽग्नौ तिष्ठति यो भूमौ यो वायौ सलिले च यः ॥ य आकाशे च विश्वात्मा स पूज्यो नः सदाशिवः
yo'gnau tiṣṭhati yo bhūmau yo vāyau salile ca yaḥ ya ākāśe ca viśvātmā sa pūjyo naḥ sadāśivaḥ
"जो अग्नि में स्थित हैं, जो पृथ्वी में, जो वायु में, जल में और जो आकाश में स्थित विश्वात्मा हैं, वही सदाशिव हमारे द्वारा पूजित हैं।
श्लोक 91 (skanda.3.100.91)
यः साक्षी सर्वभूतानां य आत्मस्थो निरंजनः ॥ यस्येच्छावशगो लोकः सोऽस्माभिः पूज्यते शिवः
yaḥ sākṣī sarvabhūtānāṁ ya ātmastho niraṁjanaḥ yasyecchāvaśago lokaḥ so'smābhiḥ pūjyate śivaḥ
"जो समस्त प्राणियों के साक्षी हैं, जो आत्मस्थ और निरंजन हैं, जिनकी इच्छा के अधीन यह संसार है, वही शिव हमारे द्वारा पूजित हैं।
श्लोक 92 (skanda.3.100.92)
यमेकमाद्यं पुरुषं पुराणं वदंति भिन्नं गुणवैकृतेन ॥ क्षेत्रज्ञमेकेथ तुरीयमन्ये कूटस्थमन्ये स शिवो गतिर्नः
yamekamādyaṁ puruṣaṁ purāṇaṁ vadaṁti bhinnaṁ guṇavaikṛtena kṣetrajñameketha turīyamanye kūṭasthamanye sa śivo gatirnaḥ
"जिन्हें कुछ लोग एकमात्र आदि पुरुष, पुरातन, गुणों के विकार से भिन्न कहते हैं; कुछ क्षेत्रज्ञ, कुछ तुरीय, कुछ कूटस्थ कहते हैं — वही शिव हमारी गति हैं।
श्लोक 93 (skanda.3.100.93)
यं नास्पृशंश्चैत्यमचिंत्यतत्त्वं दुरंतधामानमतत्स्वरूपम् ॥ मनोवचोवृत्तय आत्मभाजां स एष पूज्यः परमः शिवो नः
yaṁ nāspṛśaṁścaityamaciṁtyatattvaṁ duraṁtadhāmānamatatsvarūpam manovacovṛttaya ātmabhājāṁ sa eṣa pūjyaḥ paramaḥ śivo naḥ
"जिन्हें अचिन्त्यतत्त्व, दुरन्तधाम, अरूपस्वरूप को आत्मावाले प्राणियों के मन-वचन की वृत्तियाँ भी नहीं छू सकतीं, वही परम शिव हमारे द्वारा पूजित हैं।
श्लोक 94 (skanda.3.100.94)
यस्य प्रसादं प्रतिलभ्य संतो वांछंति नैंद्रं पदमुज्ज्वलं वा ॥ निस्तीर्णकर्मार्गलकालचक्राश्चरंत्यभीताः स शिवो गतिर्नः
yasya prasādaṁ pratilabhya saṁto vāṁchaṁti naiṁdraṁ padamujjvalaṁ vā nistīrṇakarmārgalakālacakrāścaraṁtyabhītāḥ sa śivo gatirnaḥ
"जिनकी कृपा प्राप्त करके सन्त इन्द्र के उज्ज्वल पद की भी इच्छा नहीं करते, जो कर्म की सांकल और कालचक्र को पार करके निर्भय विचरते हैं, वही शिव हमारी गति हैं।
श्लोक 95 (skanda.3.100.95)
यस्य स्मृतिः सकलपापरुजां विघातं सद्यः करोत्यपि चु पुल्कसजन्मभाजाम् ॥ यस्य स्वरूपमखिलं श्रुतिभिर्विमृग्यं तस्मै शिवाय सततं करवाम पूजाम्
yasya smṛtiḥ sakalapāparujāṁ vighātaṁ sadyaḥ karotyapi cu pulkasajanmabhājām yasya svarūpamakhilaṁ śrutibhirvimṛgyaṁ tasmai śivāya satataṁ karavāma pūjām
"जिनका स्मरण मात्र सम्पूर्ण पाप-रोगों का, यहाँ तक कि पुल्कस-जन्मवालों के भी, तत्काल नाश कर देता है, जिनका सम्पूर्ण स्वरूप श्रुतियों द्वारा खोजा जाता है, उन्हीं शिव की हम सदा पूजा करते हैं।
श्लोक 96 (skanda.3.100.96)
यन्मूर्ध्नि लब्धनिलया सुरलोकसिंधुर्यस्यांगगाँ भगवती जगदंबिका च ॥ यत्कुंडले त्वहह तक्षकवासुकी द्वौ सोऽस्माकमेव गतिरर्धशशांकमौलिः
yanmūrdhni labdhanilayā suralokasiṁdhuryasyāṁgagām̐ bhagavatī jagadaṁbikā ca yatkuṁḍale tvahaha takṣakavāsukī dvau so'smākameva gatirardhaśaśāṁkamauliḥ
"जिनके मस्तक पर देवलोक की गंगा निवास करती हैं, जिनके अंग पर भगवती जगदम्बा विराजमान हैं, जिनके दोनों कुण्डल तक्षक और वासुकि हैं, वही अर्धचन्द्रशेखर हमारी एकमात्र गति हैं।
श्लोक 97 (skanda.3.100.97)
जयति निगमचूडाग्रेषु यस्यांघ्रिपद्मं जयति च हृदि नित्यं योगिनां यस्य मूर्तिः ॥ जयति सकलतत्त्वोद्भासनं यस्य मूर्तिः स विजितगुणसर्गः पूज्यतेऽस्माभिरीशः
jayati nigamacūḍāgreṣu yasyāṁghripadmaṁ jayati ca hṛdi nityaṁ yogināṁ yasya mūrtiḥ jayati sakalatattvodbhāsanaṁ yasya mūrtiḥ sa vijitaguṇasargaḥ pūjyate'smābhirīśaḥ
"जिनका चरणकमल वेदों के शिखर पर विजयी है, जिनकी मूर्ति सदा योगियों के हृदय में विजयी है, जिनकी मूर्ति समस्त तत्त्वों को प्रकाशित करती हुई विजयी है, वही गुणसृष्टि पर विजयी ईश हमारे द्वारा पूजित हैं।"
श्लोक 98 (skanda.3.100.98)
सूत उवाच ॥ इत्याकर्ण्य वचस्तस्य तक्षकः प्रीतमानसः ॥ जातभक्तिर्महादेवे राजपुत्रमभाषत
sūta uvāca ityākarṇya vacastasya takṣakaḥ prītamānasaḥ jātabhaktirmahādeve rājaputramabhāṣata
सूत जी ने कहा — इस प्रकार उसके वचन सुनकर, तक्षक का मन प्रसन्न हुआ, महादेव में भक्ति उत्पन्न होकर उसने राजपुत्र से कहा।
श्लोक 99 (skanda.3.100.99)
तक्षक उवाच ॥ परितुष्टोऽस्मि भद्रं स्तात्तव राजेद्रनंदन ॥ बालोपि यत्परं तत्त्वं वेत्सि शैवं परात्परम्
takṣaka uvāca parituṣṭo'smi bhadraṁ stāttava rājedranaṁdana bālopi yatparaṁ tattvaṁ vetsi śaivaṁ parātparam
तक्षक ने कहा — "मैं अत्यन्त संतुष्ट हूँ, तुम्हारा कल्याण हो, हे राजपुत्र! बालक होते हुए भी तुम शैव परात्पर तत्त्व को जानते हो।
श्लोक 100 (skanda.3.100.100)
एष रत्नमयो लोक एताश्चारुदृशोऽबलाः ॥ एते कल्पद्रुमाः सर्वे वाप्योमृतरसांभसः
eṣa ratnamayo loka etāścārudṛśo'balāḥ ete kalpadrumāḥ sarve vāpyomṛtarasāṁbhasaḥ
"यह रत्नमय लोक है, ये सुन्दर नेत्रोंवाली स्त्रियाँ हैं; ये सभी कल्पवृक्ष हैं, इन बावड़ियों में अमृत-रस के समान जल है।
श्लोक 101 (skanda.3.100.101)
नात्र मृत्युभयं घोरं न जरारोगपीडनम् ॥ यथेष्टं विहरात्रैव भुंक्ष्व भोगान्यथोचितान्
nātra mṛtyubhayaṁ ghoraṁ na jarārogapīḍanam yatheṣṭaṁ viharātraiva bhuṁkṣva bhogānyathocitān
"यहाँ न मृत्यु का भीषण भय है, न बुढ़ापे-रोग की पीड़ा; यहीं इच्छानुसार विहार करो, यथोचित भोगों का आनन्द लो।"
श्लोक 102 (skanda.3.100.102)
इत्युक्तो नागराजेन स राजेंद्रकुमारकः ॥ प्रत्युवाच परं प्रीत्या कृतांजलिरुदारधीः
ityukto nāgarājena sa rājeṁdrakumārakaḥ pratyuvāca paraṁ prītyā kṛtāṁjalirudāradhīḥ
नागराज द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर, वह उदारबुद्धि राजकुमार हाथ जोड़कर अत्यन्त प्रेमपूर्वक बोला —
श्लोक 103 (skanda.3.100.103)
कृतदारोऽस्म्यहं काले सुव्रता गृहिणी मम ॥ शिव पूजापरा नित्यं पितरावेकपुत्रकौ
kṛtadāro'smyahaṁ kāle suvratā gṛhiṇī mama śiva pūjāparā nityaṁ pitarāvekaputrakau
"मैं समय पर विवाहित हूँ, मेरी गृहिणी सुव्रता है, नित्य शिवपूजा में रत है; मेरे माता-पिता के मैं ही एकमात्र पुत्र हूँ।
श्लोक 104 (skanda.3.100.104)
ते त्वद्य मां मृतं मत्त्वा शोकेन महतावृताः ॥ प्रायः प्राणैर्वियुज्यंते दैवात्प्राणान्वहंति वा
te tvadya māṁ mṛtaṁ mattvā śokena mahatāvṛtāḥ prāyaḥ prāṇairviyujyaṁte daivātprāṇānvahaṁti vā
"वे आज मुझे मृत मानकर, महान शोक से आवृत होकर, प्रायः प्राण त्याग देंगे, अथवा दैवयोग से जीवित रह जाएँगे।
श्लोक 105 (skanda.3.100.105)
अतो मया बहुतिथं नात्र स्थेयं कथंचन ॥ तमेव लोकं कृपया मां प्रापयितुमर्हसि
ato mayā bahutithaṁ nātra stheyaṁ kathaṁcana tameva lokaṁ kṛpayā māṁ prāpayitumarhasi
"इसलिए मुझे यहाँ अधिक समय तक किसी भी प्रकार नहीं रहना चाहिए; कृपया मुझे उसी लोक में पहुँचाने योग्य हो।"
श्लोक 106 (skanda.3.100.106)
इत्युक्तवंतं नरदेवपुत्रं दिव्यैर्वरान्नैः सुरपादपोत्थैः ॥ आप्याययित्वा वरगंधवासः स्रग्रत्नदिव्याभरणैर्विचित्रैः
ityuktavaṁtaṁ naradevaputraṁ divyairvarānnaiḥ surapādapotthaiḥ āpyāyayitvā varagaṁdhavāsaḥ sragratnadivyābharaṇairvicitraiḥ
इस प्रकार कहनेवाले उस राजपुत्र को, देवताओं के वृक्षों से उत्पन्न दिव्य उत्तम अन्नों से तृप्त करके, उत्तम गन्ध-वस्त्र, माला, रत्न और विचित्र दिव्य आभूषणों से,
श्लोक 107 (skanda.3.100.107)
संतोषयित्वा विविधैश्च भोगैः पुनर्बभाषे भुजगाधिराजः ॥ यदायदा त्वं स्मरसि त्वदग्रे तदा तदाविष्क्रियते मयेति
saṁtoṣayitvā vividhaiśca bhogaiḥ punarbabhāṣe bhujagādhirājaḥ yadāyadā tvaṁ smarasi tvadagre tadā tadāviṣkriyate mayeti
विविध भोगों से संतुष्ट करके, नागराज ने पुनः कहा — "जब-जब तुम मुझे स्मरण करोगे, तब-तब मैं तुम्हारे सामने प्रकट हो जाऊँगा।"
श्लोक 108 (skanda.3.100.108)
पुनश्च राजपुत्राय तक्षकोश्वं च कामगम् ॥ नानाद्वीपसमुद्रेषु लोकेषु च निरर्गलम्
punaśca rājaputrāya takṣakośvaṁ ca kāmagam nānādvīpasamudreṣu lokeṣu ca nirargalam
फिर तक्षक ने राजपुत्र को इच्छानुसार गति करनेवाला घोड़ा दिया, जो अनेक द्वीपों, समुद्रों और लोकों में निर्बाध विचरण कर सके।
श्लोक 109 (skanda.3.100.109)
दत्तवान्रत्नाभरण दिव्याभरणवाससाम् ॥ वाहनाय ददावेकं राक्षसं पन्नगेश्वरः
dattavānratnābharaṇa divyābharaṇavāsasām vāhanāya dadāvekaṁ rākṣasaṁ pannageśvaraḥ
उसने रत्नाभूषण, दिव्य आभूषण और वस्त्र दिए; वाहन के लिए एक राक्षस भी दिया, वह नागेश्वर।
श्लोक 110 (skanda.3.100.110)
तत्सहायार्थमेकं च पन्नगेंद्रकुमारकम् ॥ नियुज्य तक्षकः प्रीत्या गच्छेति विससर्ज तम्
tatsahāyārthamekaṁ ca pannageṁdrakumārakam niyujya takṣakaḥ prītyā gaccheti visasarja tam
उसकी सहायता के लिए एक नागराजकुमार को भी नियुक्त करके, तक्षक ने प्रेमपूर्वक "जाओ" कहकर उसे विदा किया।
श्लोक 111 (skanda.3.100.111)
इति चंद्रांगदः सोऽथ संगृह्य विविधं धनम् ॥ अश्वं कामगमारुह्य ताभ्यां सह विनिर्ययौ
iti caṁdrāṁgadaḥ so'tha saṁgṛhya vividhaṁ dhanam aśvaṁ kāmagamāruhya tābhyāṁ saha viniryayau
इस प्रकार चन्द्रांगद, विविध धन एकत्रित करके, इच्छानुसार चलनेवाले घोड़े पर चढ़कर उन दोनों के साथ निकल पड़ा।
श्लोक 112 (skanda.3.100.112)
स मूहूर्तादिवोन्मज्ज्य तस्मा देव सरिज्जलात् ॥ विजहार तटे रम्ये दिव्यमारुह्य वाजिनम्
sa mūhūrtādivonmajjya tasmā deva sarijjalāt vijahāra taṭe ramye divyamāruhya vājinam
वह एक ही मुहूर्त में उस दिव्य नदी के जल से ऊपर उठकर, दिव्य घोड़े पर चढ़कर सुन्दर तट पर विहार करने लगा।
श्लोक 113 (skanda.3.100.113)
अथास्मिन्समये तन्वी सा च सीमंतिनी सती ॥ स्नातुं समाययौ तत्र सखी भिः परिवारिता
athāsminsamaye tanvī sā ca sīmaṁtinī satī snātuṁ samāyayau tatra sakhī bhiḥ parivāritā
उसी समय वह कोमलांगी सती सीमन्तिनी भी सखियों से घिरी हुई वहाँ स्नान के लिए आई।
श्लोक 114 (skanda.3.100.114)
सा ददर्श नदीतीरे विहरंतं नृपात्मजम् ॥ रक्षसा नररूपेण नागपुत्रेण चान्वितम्
sā dadarśa nadītīre viharaṁtaṁ nṛpātmajam rakṣasā nararūpeṇa nāgaputreṇa cānvitam
उसने नदी-तट पर उस राजपुत्र को विहार करते देखा, मनुष्यरूपी राक्षस और नागपुत्र से युक्त,
श्लोक 115 (skanda.3.100.115)
दिव्यरत्नसमाकीर्णं दिव्य माल्यावतंसकम् ॥ देहेन दिव्यगंधेन व्याक्षिप्तदशयोजनम्
divyaratnasamākīrṇaṁ divya mālyāvataṁsakam dehena divyagaṁdhena vyākṣiptadaśayojanam
दिव्य रत्नों से युक्त, दिव्य मालाओं से सुशोभित, जिसके शरीर की दिव्य सुगन्ध दस योजन तक फैली हुई थी।
श्लोक 116 (skanda.3.100.116)
तमपूर्वाकृतिं वीक्ष्य दिव्याश्वमधिसंस्थितम् ॥ जडोन्मत्तेव भीतेव तस्थौ तन्न्यस्तलोचना
tamapūrvākṛtiṁ vīkṣya divyāśvamadhisaṁsthitam jaḍonmatteva bhīteva tasthau tannyastalocanā
उस अपूर्व आकृतिवाले, दिव्य घोड़े पर सवार उसे देखकर, वह जैसे जड़ हो गई, उन्मत्त-सी, भयभीत-सी, उस पर दृष्टि गड़ाए खड़ी रही।
श्लोक 117 (skanda.3.100.117)
तां च राजेंद्रपुत्रोऽसौ दृष्टपूर्वामिति स्मरन् ॥ निर्मुक्तकंठाभरणां कंठसूत्रविवर्जिताम्
tāṁ ca rājeṁdraputro'sau dṛṣṭapūrvāmiti smaran nirmuktakaṁṭhābharaṇāṁ kaṁṭhasūtravivarjitām
और वह राजपुत्र भी, उसे पहले देखी हुई मानकर स्मरण करते हुए, उसके गले के आभूषण उतरे हुए, कण्ठसूत्र से रहित,
श्लोक 118 (skanda.3.100.118)
असंयोजितधम्मिल्लामंगरागविवर्जिताम् ॥ त्यक्तनीलांजनापांगीं कृशांगीं शोकदूषिताम्
asaṁyojitadhammillāmaṁgarāgavivarjitām tyaktanīlāṁjanāpāṁgīṁ kṛśāṁgīṁ śokadūṣitām
बिखरे हुए केशोंवाली, अंगराग से रहित, नीले अंजन से रहित आँखोंवाली, कृशांगी और शोकपीड़ित देखकर,
श्लोक 119 (skanda.3.100.119)
दृष्ट्वाऽवतीर्य तुरगादुपविष्टः सरित्तटे ॥ तामाहूय वरारोहामुपवेश्येदम ब्रवीत्
dṛṣṭvā'vatīrya turagādupaviṣṭaḥ sarittaṭe tāmāhūya varārohāmupaveśyedama bravīt
घोड़े से उतरकर नदी-तट पर बैठ गया; उस सुन्दरी को बुलाकर, बिठाकर यह बोला —
श्लोक 120 (skanda.3.100.120)
का त्वं कस्य कलत्रं वा कस्यासि तनया सती ॥ किमिदं तेंगने बाल्ये दुःसहं शोकलक्षणम्
kā tvaṁ kasya kalatraṁ vā kasyāsi tanayā satī kimidaṁ teṁgane bālye duḥsahaṁ śokalakṣaṇam
"तुम कौन हो? किसकी पत्नी हो, अथवा किसकी सती पुत्री हो? बचपन में ही तुम्हें यह दुःसह शोक-चिह्न क्यों है?"
श्लोक 121 (skanda.3.100.121)
इति स्नेहेन संपृष्टा सा वधूरश्रुलोचना ॥ लज्जिता स्वयमाख्यातुं तत्सखी सर्वमब्रवीत्
iti snehena saṁpṛṣṭā sā vadhūraśrulocanā lajjitā svayamākhyātuṁ tatsakhī sarvamabravīt
इस प्रकार स्नेहपूर्वक पूछे जाने पर, वह वधू आँसुओं से भरे नेत्रोंवाली, स्वयं बताने में लज्जित हुई; उसकी सखी ने सब कुछ बताया —
श्लोक 122 (skanda.3.100.122)
इयं सीमंतिनी नाम्ना स्नुषा निषधभूपतेः ॥ चंद्रांगदस्य महिषी तनया चित्रवर्मणः
iyaṁ sīmaṁtinī nāmnā snuṣā niṣadhabhūpateḥ caṁdrāṁgadasya mahiṣī tanayā citravarmaṇaḥ
"यह सीमन्तिनी नाम से निषध के राजा की पुत्रवधू है, चन्द्रांगद की रानी, चित्रवर्मा की पुत्री है।
श्लोक 123 (skanda.3.100.123)
अस्याः पतिर्दैवयोगान्निमग्नोऽस्मिन्महाजले ॥ तेनेयं प्राप्तवैधव्या बाला दुःखेन शोषिता
asyāḥ patirdaivayogānnimagno'sminmahājale teneyaṁ prāptavaidhavyā bālā duḥkhena śoṣitā
"इसका पति दैवयोग से इसी विशाल जल में डूब गया; उससे यह बालिका वैधव्य को प्राप्त हुई, दुःख से क्षीण हो गई।
श्लोक 124 (skanda.3.100.124)
एवं वर्षत्रयं नीतं शोकेनातिबलीयसा ॥ अद्येंदुवारे संप्राप्ते स्नातुमत्र समागता
evaṁ varṣatrayaṁ nītaṁ śokenātibalīyasā adyeṁduvāre saṁprāpte snātumatra samāgatā
"इस प्रकार अत्यन्त बलशाली शोक में तीन वर्ष बीत गए; आज सोमवार आने पर यह यहाँ स्नान करने आई है।
श्लोक 125 (skanda.3.100.125)
श्वशुरोऽस्याश्च राजेंद्रो हृतराज्यश्च शत्रु भिः ॥ बलाद्गृहीतो बद्धश्च सभार्यस्तद्वशे स्थितः
śvaśuro'syāśca rājeṁdro hṛtarājyaśca śatru bhiḥ balādgṛhīto baddhaśca sabhāryastadvaśe sthitaḥ
"इसके श्वसुर, महाराज, शत्रुओं द्वारा राज्यभ्रष्ट किए गए और बलपूर्वक पकड़कर बाँध दिए गए; पत्नी सहित वे उनके वश में हैं।
श्लोक 126 (skanda.3.100.126)
तथाप्येषा शुभाचारा सोमवारे महेश्वरम् ॥ सांबिकं परया भक्त्या पूजयत्यमलाशया
tathāpyeṣā śubhācārā somavāre maheśvaram sāṁbikaṁ parayā bhaktyā pūjayatyamalāśayā
"फिर भी यह शुभाचारिणी सोमवार को अम्बिका सहित महेश्वर की परम भक्ति से, निर्मल भाव से पूजा करती है।"
श्लोक 127 (skanda.3.100.127)
सूत उवाच ॥ इत्थं सखीमुखेनैव सर्वमावेद्य सुव्रता ॥ ततः सीमंतिनी प्राह स्वयमेव नृपात्मजम्
sūta uvāca itthaṁ sakhīmukhenaiva sarvamāvedya suvratā tataḥ sīmaṁtinī prāha svayameva nṛpātmajam
सूत जी ने कहा — इस प्रकार सखी के मुख से ही सब कुछ बताए जाने पर, वह सुव्रता सीमन्तिनी फिर स्वयं ही राजपुत्र से बोली —
श्लोक 128 (skanda.3.100.128)
कस्त्वं कंदर्पसंकाशः काविमौ तव पार्श्वगौ ॥ देवो नरेंद्रः सिद्धो वा गंधर्वो वाथ किन्नरः
kastvaṁ kaṁdarpasaṁkāśaḥ kāvimau tava pārśvagau devo nareṁdraḥ siddho vā gaṁdharvo vātha kinnaraḥ
"कामदेव के समान तुम कौन हो? तुम्हारे पास ये दोनों कौन हैं — देव, राजा, सिद्ध, गन्धर्व अथवा किन्नर?
श्लोक 129 (skanda.3.100.129)
किमर्थं मम वृत्तांतं स्नेहवानिव पृच्छसि ॥ किं मां वेत्सि महाबाहो दृष्टवान्किमु कुत्रचित्
kimarthaṁ mama vṛttāṁtaṁ snehavāniva pṛcchasi kiṁ māṁ vetsi mahābāho dṛṣṭavānkimu kutracit
"तुम मानो स्नेहपूर्वक मेरा वृत्तान्त क्यों पूछते हो? हे महाबाहो! क्या तुम मुझे जानते हो? क्या तुमने मुझे कहीं देखा है?
श्लोक 130 (skanda.3.100.130)
दृष्टपूर्व इवाभासि मया च स्वजनो यथा ॥ सर्वं कथय तत्त्वेन सत्यसारा हि साधवः
dṛṣṭapūrva ivābhāsi mayā ca svajano yathā sarvaṁ kathaya tattvena satyasārā hi sādhavaḥ
"तुम मुझे मानो पहले देखे हुए जैसे लगते हो, अपने ही स्वजन के समान; सत्यसार साधुजनों की भाँति सब कुछ सच-सच बताओ।"
श्लोक 131 (skanda.3.100.131)
सूत उवाच ॥ एतावदुक्त्वा नरदेवपुत्री सबाष्पकंठं सुचिरं रुरोद ॥ मुमोह भूमौ पतिता सखीभिर्वृता न किंचित्कथितुं शशाक
sūta uvāca etāvaduktvā naradevaputrī sabāṣpakaṁṭhaṁ suciraṁ ruroda mumoha bhūmau patitā sakhībhirvṛtā na kiṁcitkathituṁ śaśāka
सूत जी ने कहा — इतना कहकर वह राजकुमारी गला भर्रा गई और बहुत देर तक रोती रही; सखियों से घिरी वह भूमि पर गिरकर मूर्च्छित हो गई और कुछ भी कहने में असमर्थ हो गई।
श्लोक 132 (skanda.3.100.132)
श्रुत्वा चंद्रांगदः सर्वं प्रियायाः शोककारणम् ॥ मुहूर्त्तमभवतूष्णीं स्वयं शोकसमाकुलः
śrutvā caṁdrāṁgadaḥ sarvaṁ priyāyāḥ śokakāraṇam muhūrttamabhavatūṣṇīṁ svayaṁ śokasamākulaḥ
अपनी प्रिया के शोक का सारा कारण सुनकर, चन्द्रांगद स्वयं भी शोकाकुल होकर क्षणभर के लिए मौन हो गया।
श्लोक 133 (skanda.3.100.133)
अथाश्वास्य प्रियां तन्वीं विविधैर्वाक्यनैपुणैः ॥ सिद्धा नाम वयं देवाः कामगा इति सोऽब्रवीत्
athāśvāsya priyāṁ tanvīṁ vividhairvākyanaipuṇaiḥ siddhā nāma vayaṁ devāḥ kāmagā iti so'bravīt
फिर विविध कुशल वचनों से अपनी कोमलांगी प्रिया को सांत्वना देकर, उसने कहा — "हम सिद्ध नामक देवता हैं, इच्छानुसार गमन करनेवाले।"
श्लोक 134 (skanda.3.100.134)
ततो बलादिवाकृष्य पाणिग्रहणशंकिताम् ॥ पुलकांचितसर्वांगीं तां कर्णे त्विदमब्रवीत्
tato balādivākṛṣya pāṇigrahaṇaśaṁkitām pulakāṁcitasarvāṁgīṁ tāṁ karṇe tvidamabravīt
फिर, मानो बलपूर्वक खींचकर, पाणिग्रहण की आशंका से रोमांचित सर्वांगवाली उससे उसने कान में यह कहा —
श्लोक 135 (skanda.3.100.135)
क्वापि लोके मया दृष्टस्तव भर्त्ता वरानने ॥ त्वद्व्रताचरणात्प्रीतः सद्य एवागमिष्यति
kvāpi loke mayā dṛṣṭastava bharttā varānane tvadvratācaraṇātprītaḥ sadya evāgamiṣyati
"हे सुन्दरी! मैंने संसार में कहीं तुम्हारे पति को देखा है; तुम्हारे व्रत-आचरण से प्रसन्न होकर वह शीघ्र ही यहाँ आएगा।
श्लोक 136 (skanda.3.100.136)
अपनेष्यति ते शोकं द्वित्रैरेव दिनैर्ध्रुवम् ॥ एतच्छंसितुमायातस्तव भर्त्तुः सखाऽस्म्यहम्
apaneṣyati te śokaṁ dvitraireva dinairdhruvam etacchaṁsitumāyātastava bharttuḥ sakhā'smyaham
"वह दो-तीन दिनों में ही निश्चय ही तुम्हारा शोक दूर करेगा; यही बताने मैं आया हूँ, मैं तुम्हारे पति का मित्र हूँ।
श्लोक 137 (skanda.3.100.137)
अत्र कार्यो न संदेहः शपामि शिवपादयोः ॥ तावत्त्वद्धृदये स्थेयं न प्रकाश्यं च कुत्रचित्
atra kāryo na saṁdehaḥ śapāmi śivapādayoḥ tāvattvaddhṛdaye stheyaṁ na prakāśyaṁ ca kutracit
"इसमें कोई सन्देह नहीं करना चाहिए, मैं शिव के चरणों की शपथ लेता हूँ; तब तक यह तुम्हारे हृदय में ही रहे, कहीं भी प्रकट न किया जाए।"
श्लोक 138 (skanda.3.100.138)
सा तु तद्वचनं श्रुत्वा सुधाधाराशताधिकम् ॥ संभ्रमोद्भ्रांतनयना तमेव मुहुरैक्षत
sā tu tadvacanaṁ śrutvā sudhādhārāśatādhikam saṁbhramodbhrāṁtanayanā tameva muhuraikṣata
सैकड़ों अमृतधाराओं से भी अधिक मीठे उसके इस वचन को सुनकर, वह घबराई हुई नेत्रोंवाली उसे बार-बार निहारने लगी।
श्लोक 139 (skanda.3.100.139)
प्रेमबंधानुगुणितं वाक्यं चाह रसायनम् ॥ विभ्रमोदारसहितं मधुरापांगवीक्षणम्
premabaṁdhānuguṇitaṁ vākyaṁ cāha rasāyanam vibhramodārasahitaṁ madhurāpāṁgavīkṣaṇam
उसने प्रेम-बन्धन से युक्त अमृततुल्य वचन कहा, विभ्रमपूर्ण मधुर तिरछी दृष्टि से युक्त,
श्लोक 140 (skanda.3.100.140)
स्वपाणिस्पर्शनोद्भिन्नपुलकांचितविग्रहम्॥ पूर्व दृष्टानि चांगेषु लक्षणानि स्वरादिषु ॥ वयःप्रमाणं वर्णं च परीक्ष्यैनमतर्कयत्
svapāṇisparśanodbhinnapulakāṁcitavigraham pūrva dṛṣṭāni cāṁgeṣu lakṣaṇāni svarādiṣu vayaḥpramāṇaṁ varṇaṁ ca parīkṣyainamatarkayat
अपने ही हाथ के स्पर्श से रोमांचित समस्त शरीरवाली होकर, उसके अंगों, स्वर आदि में पहले देखे हुए लक्षणों, आयु और वर्ण को परखकर उसने विचार किया —
श्लोक 141 (skanda.3.100.141)
एष एव पतिर्मे स्याद्ध्रुवं नान्यो भविष्यति ॥ अस्मिन्नेव प्रसक्तं मे हृदयं प्रेमकातरम्
eṣa eva patirme syāddhruvaṁ nānyo bhaviṣyati asminneva prasaktaṁ me hṛdayaṁ premakātaram
"यही निश्चय ही मेरा पति होगा, कोई और नहीं होगा; प्रेम से व्याकुल मेरा हृदय इसी में लग गया है।
श्लोक 142 (skanda.3.100.142)
परलोकादिहायातः कथमेवं स्वरूपधृक् ॥ दुर्भाग्यायाः कथं मे स्याद्भर्तुर्नष्टस्य दर्शनम्
paralokādihāyātaḥ kathamevaṁ svarūpadhṛk durbhāgyāyāḥ kathaṁ me syādbharturnaṣṭasya darśanam
"परलोक से यहाँ आकर, यह इसी रूप को कैसे धारण किए है? दुर्भाग्या मुझे अपने खोए हुए पति का दर्शन कैसे प्राप्त हुआ?
श्लोक 143 (skanda.3.100.143)
स्वप्नोयं किमु न स्वप्नो भ्रमोऽयं किं तु न भ्रमः ॥ एष धूर्तोऽथवा कश्चिद्यक्षो गंधर्व एव वा
svapnoyaṁ kimu na svapno bhramo'yaṁ kiṁ tu na bhramaḥ eṣa dhūrto'thavā kaścidyakṣo gaṁdharva eva vā
"यह स्वप्न है या स्वप्न नहीं है? यह भ्रम है या भ्रम नहीं है? यह कोई धूर्त है, अथवा यक्ष है, या फिर गन्धर्व ही है?
श्लोक 144 (skanda.3.100.144)
मुनिपल्या यदुक्तं मे परमापद्गतापि च ॥ व्रतमेतत्कुरुष्वेति तस्य वा फलमेव वा
munipalyā yaduktaṁ me paramāpadgatāpi ca vratametatkuruṣveti tasya vā phalameva vā
"मुनि-पत्नी ने जो मुझे परम आपत्ति में कहा था — 'यह व्रत करो' — क्या यह उसी का फल है?
श्लोक 145 (skanda.3.100.145)
यो वर्षायुत सौभाग्यं ममेत्याह द्विजोत्तमः॥ नूनं तस्य वचः सत्यं को विद्यादीश्वरं विना
yo varṣāyuta saubhāgyaṁ mametyāha dvijottamaḥ nūnaṁ tasya vacaḥ satyaṁ ko vidyādīśvaraṁ vinā
"जिस श्रेष्ठ ब्राह्मण ने मुझे दस हजार वर्षों के सौभाग्य की बात कही थी, निश्चय ही उसके वचन सत्य हैं; ईश्वर के अतिरिक्त कौन जान सकता है?
श्लोक 146 (skanda.3.100.146)
निमित्तानि च दृश्यंते मंगलानि दिनेदिने॥ प्रसन्ने पार्वतीनाथे किमसाध्यं शरीरिणाम्
nimittāni ca dṛśyaṁte maṁgalāni dinedine prasanne pārvatīnāthe kimasādhyaṁ śarīriṇām
"प्रतिदिन मंगल-संकेत दिखाई दे रहे हैं; पार्वतीनाथ प्रसन्न हों तो देहधारियों के लिए क्या असाध्य है?"
श्लोक 147 (skanda.3.100.147)
इत्थं विमृश्य बहुधा तां पुनर्मुक्तसंशयाम्॥ लज्जानम्रमुखीं कर्णे शशंसात्मप्रयोजनम्
itthaṁ vimṛśya bahudhā tāṁ punarmuktasaṁśayām lajjānamramukhīṁ karṇe śaśaṁsātmaprayojanam
इस प्रकार अनेक प्रकार से विचार करके, संशयरहित हुई उस लज्जा से झुके मुखवाली को उसने कान में अपना प्रयोजन बताया —
श्लोक 148 (skanda.3.100.148)
इमं वृत्तांतमाख्यातुं तत्पित्रोः शोकतप्तयोः ॥ गच्छामः स्वस्ति ते भद्रे सद्यः पतिमवाप्स्यसि
imaṁ vṛttāṁtamākhyātuṁ tatpitroḥ śokataptayoḥ gacchāmaḥ svasti te bhadre sadyaḥ patimavāpsyasi
"यह वृत्तान्त शोकसंतप्त तुम्हारे माता-पिता को बताने हम जाते हैं; तुम्हारा कल्याण हो, हे भद्रे! तुम शीघ्र ही अपने पति को प्राप्त करोगी।"
श्लोक 149 (skanda.3.100.149)
इत्युक्त्वाश्वं समारुह्य जगाम नृपनंदनः ॥ ताभ्यां सह निजं राष्ट्रं प्रत्यपद्यत तत्क्षणात्
ityuktvāśvaṁ samāruhya jagāma nṛpanaṁdanaḥ tābhyāṁ saha nijaṁ rāṣṭraṁ pratyapadyata tatkṣaṇāt
यह कहकर राजपुत्र घोड़े पर चढ़कर चल पड़ा; उन दोनों के साथ वह उसी क्षण अपने राज्य पहुँच गया।
श्लोक 150 (skanda.3.100.150)
स पुरोपवनाभ्याशे स्थित्वा तं फणि पुत्रकम् ॥ विससर्जात्मदायादान्नृपासनगतान्प्रति
sa puropavanābhyāśe sthitvā taṁ phaṇi putrakam visasarjātmadāyādānnṛpāsanagatānprati
नगर के बाहरी उद्यान के समीप ठहरकर, उसने उस नागपुत्र को अपने राज्यहड़पने वाले रिश्तेदारों के पास भेजा।
श्लोक 151 (skanda.3.100.151)
स गत्वोवाच ताञ्छीघ्रमिंद्रसेनो विमुच्यताम् ॥ चंद्रांगदस्तस्य सुतः प्राप्तोऽयं पन्नगाल यात्
sa gatvovāca tāñchīghramiṁdraseno vimucyatām caṁdrāṁgadastasya sutaḥ prāpto'yaṁ pannagāla yāt
उसने जाकर उनसे तुरन्त कहा — "इन्द्रसेन को शीघ्र मुक्त करो! यह उसका पुत्र चन्द्रांगद नागलोक से यहाँ आ पहुँचा है।
श्लोक 152 (skanda.3.100.152)
नृपासनं विमुंचंतु भवंतो न विचार्यताम् ॥ नो चेच्चंद्रागदस्याशु बाणाः प्राणान्हरंति वः
nṛpāsanaṁ vimuṁcaṁtu bhavaṁto na vicāryatām no ceccaṁdrāgadasyāśu bāṇāḥ prāṇānharaṁti vaḥ
"राजसिंहासन छोड़ दो, विचार करने की आवश्यकता नहीं है; अन्यथा चन्द्रांगद के बाण शीघ्र ही तुम्हारे प्राण हर लेंगे।"
श्लोक 153 (skanda.3.100.153)
स मग्नो यमुनातोये गत्वा तक्षकमंदिरम् ॥ लब्ध्वा च तस्य साहाय्यं पुनर्लोकादिहागतः
sa magno yamunātoye gatvā takṣakamaṁdiram labdhvā ca tasya sāhāyyaṁ punarlokādihāgataḥ
"वह यमुना के जल में डूबकर तक्षक के भवन गया, और उसकी सहायता पाकर पुनः उस लोक से यहाँ आया है।"
श्लोक 154 (skanda.3.100.154)
इत्याख्यातमशेषेण तद्वृत्तांतं निशम्य ते ॥ साधुसाध्विति संभ्रांताः शशंसुः परिपंथिनः
ityākhyātamaśeṣeṇa tadvṛttāṁtaṁ niśamya te sādhusādhviti saṁbhrāṁtāḥ śaśaṁsuḥ paripaṁthinaḥ
इस प्रकार पूरा वृत्तान्त सुनकर, वे शत्रुगण आश्चर्यचकित होकर "साधु, साधु!" कहकर प्रशंसा करने लगे।
श्लोक 155 (skanda.3.100.155)
अथेंद्रसेनाय निवेद्य सत्वरं नष्टस्य पुत्रस्य पुनः समागमम् ॥ प्रसाद्य तं प्राप्तनरेश्वरासनं दायादमुख्यास्तु भयं प्रपेदिरे
atheṁdrasenāya nivedya satvaraṁ naṣṭasya putrasya punaḥ samāgamam prasādya taṁ prāptanareśvarāsanaṁ dāyādamukhyāstu bhayaṁ prapedire
फिर इन्द्रसेन को शीघ्र अपने खोए पुत्र के पुनः लौट आने की सूचना देकर, राजसिंहासन प्राप्त उसे प्रसन्न करके, वे प्रमुख रिश्तेदार भय से ग्रस्त हो गए।
श्लोक 156 (skanda.3.100.156)
अथ पौरजनाः सर्वे पुरोद्याने नृपात्मजम् ॥ दृष्ट्वा राज्ञे द्रुतं प्रोचुर्लेभिरे च महाधनम्
atha paurajanāḥ sarve purodyāne nṛpātmajam dṛṣṭvā rājñe drutaṁ procurlebhire ca mahādhanam
फिर सभी नगरवासियों ने नगर के उद्यान में राजपुत्र को देखकर तुरन्त राजा को बताया और भारी धन प्राप्त किया।
श्लोक 157 (skanda.3.100.157)
आकर्ण्य पुत्रमायांतं राजानंदजलाप्लुतः ॥ न व्यजानादिमं लोकं राज्ञी च परया मुदा
ākarṇya putramāyāṁtaṁ rājānaṁdajalāplutaḥ na vyajānādimaṁ lokaṁ rājñī ca parayā mudā
पुत्र के आने का समाचार सुनकर, राजा आनन्द के आँसुओं में भीगकर इस लोक को पहचान न सका, और रानी भी परम हर्ष से भर गई।
श्लोक 158 (skanda.3.100.158)
अथ नागरिकाः सर्वे मंत्रिवृद्धाः पुरोधसः ॥ प्रत्युद्गम्य परिष्वज्य तमानिन्युर्नृपांति कम्
atha nāgarikāḥ sarve maṁtrivṛddhāḥ purodhasaḥ pratyudgamya pariṣvajya tamāninyurnṛpāṁti kam
फिर सभी नगरवासी, वृद्ध मन्त्रीगण और पुरोहित, आगे बढ़कर, आलिंगन करके उसे राजा के समीप ले आए।
श्लोक 159 (skanda.3.100.159)
अथोत्सवेन महता प्रविश्य निजमंदिरम् ॥ राजपुत्रः स्वपितरौ ववंदे बाष्पमुत्सृजन्
athotsavena mahatā praviśya nijamaṁdiram rājaputraḥ svapitarau vavaṁde bāṣpamutsṛjan
फिर महान उत्सव के साथ अपने भवन में प्रवेश करके, राजपुत्र ने आँसू बहाते हुए अपने माता-पिता को प्रणाम किया।
श्लोक 160 (skanda.3.100.160)
तं पादमूले पतितं स्वपुत्रं विवेद नासौ पृथिवीपतिः क्षणम् ॥ प्रबोधितोऽमात्यजनैः कथंचिदुत्थाय क्लिन्नेन हृदालिलिंग
taṁ pādamūle patitaṁ svaputraṁ viveda nāsau pṛthivīpatiḥ kṣaṇam prabodhito'mātyajanaiḥ kathaṁcidutthāya klinnena hṛdāliliṁga
उस पृथ्वीपति ने चरणों में गिरे उस अपने पुत्र को क्षणभर तक नहीं पहचाना; मन्त्रियों द्वारा जगाए जाने पर किसी तरह उठकर, आर्द्र हृदय से उसे आलिंगन किया।
श्लोक 161 (skanda.3.100.161)
क्रमेण मातॄरभिवंद्य ताभिः प्रवर्धिताशीः प्रणयाकु लाभिः ॥ आलिंगितः पौरजनानशेषान्संभावयामास स राजसूनुः
krameṇa mātṝrabhivaṁdya tābhiḥ pravardhitāśīḥ praṇayāku lābhiḥ āliṁgitaḥ paurajanānaśeṣānsaṁbhāvayāmāsa sa rājasūnuḥ
क्रमशः माताओं को प्रणाम करके, स्नेहपूर्ण आशीर्वादों से आशीर्वादित होकर, आलिंगित हुए उस राजपुत्र ने समस्त नगरवासियों का सम्मान किया।
श्लोक 162 (skanda.3.100.162)
तेषां मध्ये समासीनः स्ववृत्तांतमशेषतः ॥ पित्रे निवेदयामास तक्षकस्य च मित्रताम्
teṣāṁ madhye samāsīnaḥ svavṛttāṁtamaśeṣataḥ pitre nivedayāmāsa takṣakasya ca mitratām
उनके बीच बैठकर उसने अपने पिता को अपना सम्पूर्ण वृत्तान्त और तक्षक से हुई मित्रता के बारे में बताया।
श्लोक 163 (skanda.3.100.163)
दत्तं भुजंगराजेन रत्नादिधनसंचयम् ॥ दिव्यं तद्राक्षसानीतं पित्रे सर्वं न्यवेदयत्
dattaṁ bhujaṁgarājena ratnādidhanasaṁcayam divyaṁ tadrākṣasānītaṁ pitre sarvaṁ nyavedayat
नागराज द्वारा दिए गए रत्न आदि धन-संग्रह, और राक्षस द्वारा लाए गए दिव्य पदार्थों के बारे में उसने अपने पिता को सब कुछ बताया।
श्लोक 164 (skanda.3.100.164)
राजपुत्रस्य चरितं दृष्ट्वा श्रुत्वा च विह्वलः ॥ मेने स्नुषायाः सौभाग्यं महेशाराधनार्जितम्
rājaputrasya caritaṁ dṛṣṭvā śrutvā ca vihvalaḥ mene snuṣāyāḥ saubhāgyaṁ maheśārādhanārjitam
राजपुत्र का चरित्र देखकर और सुनकर विह्वल होकर, उसने अपनी पुत्रवधू के सौभाग्य को महेश की आराधना से प्राप्त हुआ माना।
श्लोक 165 (skanda.3.100.165)
सौमांगल्यमयीं वार्तामिमां निषधभूपतिः॥ चारैर्निवेदयामास चित्रवर्ममहीपतेः
saumāṁgalyamayīṁ vārtāmimāṁ niṣadhabhūpatiḥ cārairnivedayāmāsa citravarmamahīpateḥ
निषध के राजा ने यह मंगलमयी समाचार दूतों द्वारा राजा चित्रवर्मा को भेजा।
श्लोक 166 (skanda.3.100.166)
श्रुत्वाऽमृतमयीं वार्त्तां स समुत्थाय संभ्रमात् ॥ तेभ्यो दत्त्वा धनं भूरि ननर्तानंदविह्वलः
śrutvā'mṛtamayīṁ vārttāṁ sa samutthāya saṁbhramāt tebhyo dattvā dhanaṁ bhūri nanartānaṁdavihvalaḥ
यह अमृततुल्य समाचार सुनकर, वह उतावली से उठकर, दूतों को प्रचुर धन देकर, आनन्द से विह्वल होकर नाचने लगा।
श्लोक 167 (skanda.3.100.167)
अथाहूय स्वतनयां परिष्वज्याश्रुलोचनः ॥ भूषणैर्भूषयामास त्यक्तवैधव्यलक्षणाम्
athāhūya svatanayāṁ pariṣvajyāśrulocanaḥ bhūṣaṇairbhūṣayāmāsa tyaktavaidhavyalakṣaṇām
फिर अपनी पुत्री को बुलाकर, आँसू भरे नेत्रों से आलिंगन करके, वैधव्य के चिह्न त्याग चुकी उसे आभूषणों से सुसज्जित किया।
श्लोक 168 (skanda.3.100.168)
अथोत्सवो महानासीद्राष्ट्रग्रामपुरादिषु ॥ सीमंतिन्याः शुभाचारं शशंसुः सर्वतो जनाः
athotsavo mahānāsīdrāṣṭragrāmapurādiṣu sīmaṁtinyāḥ śubhācāraṁ śaśaṁsuḥ sarvato janāḥ
फिर राज्य, ग्राम और नगर आदि में महान उत्सव हुआ; सर्वत्र लोगों ने सीमन्तिनी के शुभ आचरण की प्रशंसा की।
श्लोक 169 (skanda.3.100.169)
चित्रवर्माथ नृपतिः समाहूयेंद्रसेनजम् ॥ पुनर्विवाहविधिना सुतां तस्मै न्यवेदयत्
citravarmātha nṛpatiḥ samāhūyeṁdrasenajam punarvivāhavidhinā sutāṁ tasmai nyavedayat
फिर राजा चित्रवर्मा ने इन्द्रसेन-पुत्र को बुलाकर, पुनर्विवाह की विधि से अपनी पुत्री उसे सौंप दी।
श्लोक 170 (skanda.3.100.170)
चन्द्रांगदोऽपि रत्नाद्यैरानीतैस्तक्षकालयात् ॥ स्वां पत्नीं भूषयां चक्रे मर्त्यानामतिदुर्लभैः
candrāṁgado'pi ratnādyairānītaistakṣakālayāt svāṁ patnīṁ bhūṣayāṁ cakre martyānāmatidurlabhaiḥ
चन्द्रांगद ने भी तक्षक के भवन से लाए गए रत्नों आदि से, मनुष्यों के लिए अत्यन्त दुर्लभ वस्तुओं से अपनी पत्नी को सुसज्जित किया।
श्लोक 171 (skanda.3.100.171)
अंगरागेण दिव्येन तप्तकांचनशोभिना ॥ शुशुभे सा सुगंधेन दशयोजनगामिना
aṁgarāgeṇa divyena taptakāṁcanaśobhinā śuśubhe sā sugaṁdhena daśayojanagāminā
तपाए हुए स्वर्ण के समान शोभा देनेवाले दिव्य अंगराग से, दस योजन तक फैलनेवाली सुगन्ध से वह सुशोभित हुई।
श्लोक 172 (skanda.3.100.172)
अम्लानमालया शश्वत्पद्मकिंजल्कवर्णया ॥ कल्पद्रुमोत्थया बाला भूषिता शुशुभे सती
amlānamālayā śaśvatpadmakiṁjalkavarṇayā kalpadrumotthayā bālā bhūṣitā śuśubhe satī
सदा कमल-केसर के रंग की, कभी न मुरझानेवाली, कल्पवृक्ष से उत्पन्न माला से सुसज्जित होकर वह सती सुशोभित हुई।
श्लोक 173 (skanda.3.100.173)
एवं चंद्रांगदः पत्नीमवाप्य समये शुभे ॥ ययौ स्वनगरीं भूयः श्वशुरेणानुमोदितः
evaṁ caṁdrāṁgadaḥ patnīmavāpya samaye śubhe yayau svanagarīṁ bhūyaḥ śvaśureṇānumoditaḥ
इस प्रकार चन्द्रांगद शुभ समय पर अपनी पत्नी को पाकर, अपने ससुर की अनुमति से पुनः अपने नगर को चला गया।
श्लोक 174 (skanda.3.100.174)
इन्द्रसेनोऽपि राजेंद्रो राज्ये स्थाप्य निजात्मजम् ॥ तपसा शिवमाराध्य लेभे संयमिनां गतिम्
indraseno'pi rājeṁdro rājye sthāpya nijātmajam tapasā śivamārādhya lebhe saṁyamināṁ gatim
राजा इन्द्रसेन ने भी अपने पुत्र को राज्य में स्थापित करके, तपस्या से शिव की आराधना करके, संयमियों की गति प्राप्त की।
श्लोक 175 (skanda.3.100.175)
दशवर्ष सहस्राणि सीमंतिन्या स्वभार्यया ॥ सार्धं चन्द्रांगदो राजा बुभुजे विषयान्बहून्
daśavarṣa sahasrāṇi sīmaṁtinyā svabhāryayā sārdhaṁ candrāṁgado rājā bubhuje viṣayānbahūn
दस हजार वर्षों तक राजा चन्द्रांगद अपनी पत्नी सीमन्तिनी के साथ अनेक भोगों का उपभोग करता रहा।
श्लोक 176 (skanda.3.100.176)
प्रासूत तनयानष्टौ कन्यामेकां वराननाम् ॥ रेमे सीमंतिनी भर्त्रा पूजयती महेश्वरम् ॥ दिनेदिने च सौभाग्यं प्राप्तं चैवेन्दुवासरात्
prāsūta tanayānaṣṭau kanyāmekāṁ varānanām reme sīmaṁtinī bhartrā pūjayatī maheśvaram dinedine ca saubhāgyaṁ prāptaṁ caivenduvāsarāt
उसने आठ पुत्रों और एक सुन्दर मुखवाली कन्या को जन्म दिया; सीमन्तिनी पति के साथ रमण करती हुई महेश्वर की पूजा करती रही, और उसी सोमवार से प्रतिदिन उसका सौभाग्य बढ़ता गया।
श्लोक 177 (skanda.3.100.177)
सूत उवाच ॥ विचित्रमिदमाख्यानं मया समनुवर्णितम् ॥ भूयोऽपि वक्ष्ये माहात्म्यं सोमवारव्रतोदितम्
sūta uvāca vicitramidamākhyānaṁ mayā samanuvarṇitam bhūyo'pi vakṣye māhātmyaṁ somavāravratoditam
सूत जी ने कहा — यह विचित्र आख्यान मैंने पूर्ण रूप से वर्णित किया; अब मैं फिर से सोमवार-व्रत का कहा गया माहात्म्य कहूँगा।