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ब्रह्म खण्ड · अध्याय 99

प्रदोष-पूजाविधि और धर्मगुप्त की कथा

अध्याय 98अध्याय-सूचीअध्याय 100

श्लोक 1 (skanda.3.99.1)

॥ सूत उवाच ॥ इत्युक्ता मुनिना साध्वी सा विप्रवनिता पुनः ॥ तं प्रणम्याथ पप्रच्छ शिवपूजाविधेः क्रमम्

sūta uvāca ityuktā muninā sādhvī sā vipravanitā punaḥ taṁ praṇamyātha papraccha śivapūjāvidheḥ kramam

सूत जी ने कहा — मुनि के इस प्रकार कहने पर उस साध्वी ब्राह्मणी ने पुनः उन्हें प्रणाम करके शिवपूजा की विधि का क्रम पूछा।

श्लोक 2 (skanda.3.99.2)

शांडिल्य उवाच ॥ पक्षद्वये त्रयोदश्यां निराहारो भवेद्यदा ॥ घटीत्रयादस्तमयात्पूर्वं स्नानं समाचरेत्

śāṁḍilya uvāca pakṣadvaye trayodaśyāṁ nirāhāro bhavedyadā ghaṭītrayādastamayātpūrvaṁ snānaṁ samācaret

शाण्डिल्य ने कहा — जब दोनों पक्षों की त्रयोदशी को निराहार रहना हो, तब सूर्यास्त से तीन घड़ी पहले स्नान करना चाहिए।

श्लोक 3 (skanda.3.99.3)

शुक्लांबरधरो धीरो वाग्यतो नियमान्वितः॥ कृतसंध्याजपविधिः शिवपूजां समारभेत्

śuklāṁbaradharo dhīro vāgyato niyamānvitaḥ kṛtasaṁdhyājapavidhiḥ śivapūjāṁ samārabhet

श्वेत वस्त्र धारण किए हुए, धीर, मौन और नियमपूर्वक, संध्या-जप की विधि पूरी करके शिवपूजा का आरम्भ करना चाहिए।

श्लोक 4 (skanda.3.99.4)

देवस्य पुरतः सम्यगुपलिप्य नवांभसा ॥ विधाय मंडलं रम्यं धौतवस्त्रादिभिर्बुधः

devasya purataḥ samyagupalipya navāṁbhasā vidhāya maṁḍalaṁ ramyaṁ dhautavastrādibhirbudhaḥ

देवता के सम्मुख नए जल से भलीभाँति लीपकर, धुले हुए वस्त्रों आदि से बुद्धिमान पुरुष एक सुन्दर मण्डल बनाए।

श्लोक 5 (skanda.3.99.5)

वितानाद्यैरलंकृत्य फलपुष्पनवांकुरैः ॥ विचित्रपद्ममुद्धृत्य वर्णपंचकसंयुतम्

vitānādyairalaṁkṛtya phalapuṣpanavāṁkuraiḥ vicitrapadmamuddhṛtya varṇapaṁcakasaṁyutam

वितान आदि से सजाकर, फल-फूल और नए अंकुरों से, पाँच रंगों से युक्त एक विचित्र कमल उभारकर,

श्लोक 6 (skanda.3.99.6)

तत्रोपविश्य सुशुभे भक्तियुक्तः स्थिरासने ॥ सम्यक्संपादिताशेष पूजोपकरणः शुचिः

tatropaviśya suśubhe bhaktiyuktaḥ sthirāsane samyaksaṁpāditāśeṣa pūjopakaraṇaḥ śuciḥ

वहाँ उस अत्यन्त शुभ, स्थिर आसन पर भक्तियुक्त होकर बैठे, समस्त पूजा-सामग्री भलीभाँति जुटाकर, पवित्र होकर,

श्लोक 7 (skanda.3.99.7)

आगमोक्तेन मंत्रेण पीठमामंत्रयेत्सुधीः ॥ ततः कृत्वात्मशुद्धिं च भूतशुद्ध्यादिकं क्रमात्

āgamoktena maṁtreṇa pīṭhamāmaṁtrayetsudhīḥ tataḥ kṛtvātmaśuddhiṁ ca bhūtaśuddhyādikaṁ kramāt

बुद्धिमान पुरुष आगमोक्त मन्त्र से पीठ का आवाहन करे; फिर क्रमशः आत्मशुद्धि और भूतशुद्धि आदि करे।

श्लोक 8 (skanda.3.99.8)

प्राणायामत्रयं कृत्वा बीजवर्णैः सबिंदुकैः ॥ मातृका न्यस्य विधिवद्ध्यात्वा तां देवतां पराम्

prāṇāyāmatrayaṁ kṛtvā bījavarṇaiḥ sabiṁdukaiḥ mātṛkā nyasya vidhivaddhyātvā tāṁ devatāṁ parām

बीजाक्षरों और बिन्दुओं सहित तीन प्राणायाम करके, विधिपूर्वक मातृका-न्यास करके, उस परम देवता का ध्यान करे।

श्लोक 9 (skanda.3.99.9)

समाप्य मातृका भूयो ध्यात्वा चैव परं शिवम् ॥ वामभागे गुरुं नत्वा दक्षिणे गणपं नमेत्

samāpya mātṛkā bhūyo dhyātvā caiva paraṁ śivam vāmabhāge guruṁ natvā dakṣiṇe gaṇapaṁ namet

मातृका-न्यास पूर्ण करके, पुनः परम शिव का ध्यान करके, बाईं ओर गुरु को नमन करके, दाईं ओर गणपति को प्रणाम करे।

श्लोक 10 (skanda.3.99.10)

अंसोरुयुग्मे धर्मादीन्न्यस्य नाभौ च पार्श्वयोः ॥ अधर्मादीननंतादीन्हृदि पीठे मनुं न्यसेत्

aṁsoruyugme dharmādīnnyasya nābhau ca pārśvayoḥ adharmādīnanaṁtādīnhṛdi pīṭhe manuṁ nyaset

दोनों कन्धों और जाँघों पर धर्म आदि को, नाभि और दोनों पार्श्वों में अधर्म आदि और अनन्त आदि को स्थापित करके, हृदय-पीठ में मन्त्र का न्यास करे।

श्लोक 11 (skanda.3.99.11)

आधारशक्तिमारभ्य ज्ञानात्मानमनुक्रमात् ॥ उक्तक्रमेण विन्यस्य हृत्पद्मे साधुभाविते

ādhāraśaktimārabhya jñānātmānamanukramāt uktakrameṇa vinyasya hṛtpadme sādhubhāvite

आधारशक्ति से लेकर ज्ञानात्मा तक क्रमशः, उक्त क्रम से हृदय-कमल में भलीभाँति स्थापित करके,

श्लोक 12 (skanda.3.99.12)

नवशक्तिमये रम्ये ध्यायेद्देवमुमापतिम्॥ चन्द्रकोटिप्रतीकाशं त्रिनेत्रं चन्द्रशेखरम्

navaśaktimaye ramye dhyāyeddevamumāpatim candrakoṭipratīkāśaṁ trinetraṁ candraśekharam

नौ शक्तियों से युक्त उस रमणीय हृदय-कमल में उमापति देव का ध्यान करे — करोड़ों चन्द्रमाओं के समान कान्तिवाले, त्रिनेत्र, चन्द्रशेखर,

श्लोक 13 (skanda.3.99.13)

आपिंगलजटाजूटं रत्नमौलिविराजितम् ॥ नीलग्रीवमुदारांगं नागहारोपशोभितम्

āpiṁgalajaṭājūṭaṁ ratnamaulivirājitam nīlagrīvamudārāṁgaṁ nāgahāropaśobhitam

पिंगल जटाजूट वाले, रत्नमुकुट से सुशोभित, नीलकण्ठ, उदार अंगोंवाले, नागहार से विभूषित,

श्लोक 14 (skanda.3.99.14)

वरदाभयहस्तं च धारिणं च परश्वधम् ॥ दधानं नागवलयकेयूरांगदमुद्रिकम्

varadābhayahastaṁ ca dhāriṇaṁ ca paraśvadham dadhānaṁ nāgavalayakeyūrāṁgadamudrikam

वरद और अभय मुद्रा में हाथ धारण किए हुए, परशु धारण किए हुए, नागों के कंकण, केयूर, बाजूबन्द और अंगूठियाँ धारण किए हुए,

श्लोक 15 (skanda.3.99.15)

व्याघ्रचर्मपरीधानं रत्नसिंहासने स्थितम् ॥ ध्यात्वा तद्वाम भागे च चिंतयेद्गिरिकन्यकाम्

vyāghracarmaparīdhānaṁ ratnasiṁhāsane sthitam dhyātvā tadvāma bhāge ca ciṁtayedgirikanyakām

व्याघ्रचर्म पहने, रत्नसिंहासन पर विराजमान — इस प्रकार ध्यान करके, उनके बाईं ओर गिरिपुत्री का चिन्तन करे —

श्लोक 16 (skanda.3.99.16)

भास्वज्जपाप्रसूनाभामुदयार्कसमप्रभाम् ॥ विद्युत्पुंजनिभां तन्वीं मनोनयननंदिनीम्

bhāsvajjapāprasūnābhāmudayārkasamaprabhām vidyutpuṁjanibhāṁ tanvīṁ manonayananaṁdinīm

जपापुष्प के समान कान्तिवाली, उदयाचल के सूर्य के समान प्रभावाली, विद्युत्पुंज के समान, कोमलांगी, मन और नेत्रों को आनन्द देनेवाली,

श्लोक 17 (skanda.3.99.17)

बालेंदु शेखरां स्निग्धां नीलकुंचितकुन्तलाम् ॥ भृंगसंघातरुचिरां नीलालकविराजिताम्

bāleṁdu śekharāṁ snigdhāṁ nīlakuṁcitakuntalām bhṛṁgasaṁghātarucirāṁ nīlālakavirājitām

बालचन्द्र से शोभित मस्तकवाली, स्निग्ध, नीले घुँघराले केशोंवाली, भ्रमरसमूह के समान सुन्दर, नीली अलकों से सुशोभित,

श्लोक 18 (skanda.3.99.18)

मणिकुंडलविद्योतन्मुखमंडलविभ्रमाम् ॥ नवकुम्कुमपंकांक कपोलदलदर्पणाम्

maṇikuṁḍalavidyotanmukhamaṁḍalavibhramām navakumkumapaṁkāṁka kapoladaladarpaṇām

मणिकुण्डलों से चमकते मुखमण्डलवाली, नए कुमकुम से लिप्त, दर्पण के समान कपोलोंवाली,

श्लोक 19 (skanda.3.99.19)

मधुरस्मितविभ्राजदरुणाधरपल्लवाम् ॥ कंबुकंठीं शिवामुद्यत्कुचपंकजकुड्मलाम्

madhurasmitavibhrājadaruṇādharapallavām kaṁbukaṁṭhīṁ śivāmudyatkucapaṁkajakuḍmalām

मधुर मुस्कान से चमकते हुए लाल अधरोंवाली, शंख के समान कण्ठवाली, मंगलमयी, उभरते कमलकलिका के समान स्तनोंवाली,

श्लोक 20 (skanda.3.99.20)

पाशांकुशाभयाभीष्टविल सत्सु चतुर्भुजाम् ॥ अनेकरत्नविलसत्कंकणांकितमुद्रिकाम्

pāśāṁkuśābhayābhīṣṭavila satsu caturbhujām anekaratnavilasatkaṁkaṇāṁkitamudrikām

पाश, अंकुश, अभय और वरद मुद्रा से सुशोभित चार भुजाओंवाली, अनेक रत्नों से चमकते कंकण और अंगूठियोंवाली,

श्लोक 21 (skanda.3.99.21)

वलित्रयेण विलसद्धेमकांचीगुणान्विताम् ॥ रक्तमाल्यांबरधरां दिव्यचंदनच र्चिताम्

valitrayeṇa vilasaddhemakāṁcīguṇānvitām raktamālyāṁbaradharāṁ divyacaṁdanaca rcitām

तीन रेखाओंवाली कमर में चमकते स्वर्ण-करधनी से युक्त, लाल माला और वस्त्र धारण किए हुए, दिव्य चन्दन से लिप्त,

श्लोक 22 (skanda.3.99.22)

दिक्पालवनितामौलिसन्नतांघ्रिसरोरुहाम् ॥ रत्नसिंहासनारूढां सर्पराजपरिच्छदाम्

dikpālavanitāmaulisannatāṁghrisaroruhām ratnasiṁhāsanārūḍhāṁ sarparājaparicchadām

दिक्पालों की पत्नियों के मुकुटों से नमस्कृत चरणकमलोंवाली, रत्नसिंहासन पर आरूढ़, नागराज को आसन बनाए हुए।

श्लोक 23 (skanda.3.99.23)

एवं ध्यात्वा महादेवं देवीं च गिरि कन्यकाम् ॥ न्यासक्रमेण संपूज्य देवं गंधादिभिः क्रमात्

evaṁ dhyātvā mahādevaṁ devīṁ ca giri kanyakām nyāsakrameṇa saṁpūjya devaṁ gaṁdhādibhiḥ kramāt

इस प्रकार महादेव और गिरिपुत्री देवी का ध्यान करके, न्यास-क्रम से गन्ध आदि द्वारा क्रमशः देव की पूजा करे।

श्लोक 24 (skanda.3.99.24)

पंचभिर्ब्रह्मभिः कुर्यात्प्रोक्तस्थानेषु वा हृदि ॥ पृथक्पुष्पांजलिं देहे मूलेन च हदि त्रिधा

paṁcabhirbrahmabhiḥ kuryātproktasthāneṣu vā hṛdi pṛthakpuṣpāṁjaliṁ dehe mūlena ca hadi tridhā

पंचब्रह्म-मन्त्रों से बताए गए स्थानों पर अथवा हृदय में, पृथक्-पृथक् पुष्पांजलि अर्पित करे, तथा मूल मन्त्र से शरीर और हृदय में तीन बार अर्पित करे।

श्लोक 25 (skanda.3.99.25)

पुनः स्वयं शिवो भूत्वा मूलमंत्रेण साधकः ॥ ततः संपूजयेद्देवं बाह्यपीठे पुनः क्रमात्

punaḥ svayaṁ śivo bhūtvā mūlamaṁtreṇa sādhakaḥ tataḥ saṁpūjayeddevaṁ bāhyapīṭhe punaḥ kramāt

फिर मूल मन्त्र से स्वयं शिवरूप होकर, साधक बाह्य पीठ पर पुनः क्रमशः देव की पूजा करे।

श्लोक 26 (skanda.3.99.26)

संकल्पं प्रवदेत्तत्र पूजारंभे समाहितः ॥ कृतांजलिपुटो भूत्वा चिंतयेद्धृदि शंकरम्

saṁkalpaṁ pravadettatra pūjāraṁbhe samāhitaḥ kṛtāṁjalipuṭo bhūtvā ciṁtayeddhṛdi śaṁkaram

वहाँ पूजा के आरम्भ में एकाग्रचित्त होकर संकल्प कहे; हाथ जोड़कर हृदय में शंकर का चिन्तन करे —

श्लोक 27 (skanda.3.99.27)

ऋणपातकदौर्भाग्यदारिद्र्यविनिवृत्तये ॥ अशेषाघविनाशाय प्रसीद मम शंकर

ṛṇapātakadaurbhāgyadāridryavinivṛttaye aśeṣāghavināśāya prasīda mama śaṁkara

"ऋण, पाप, दुर्भाग्य और दरिद्रता के निवारण के लिए, समस्त पापों के सम्पूर्ण नाश के लिए, हे शंकर! मुझ पर प्रसन्न होइए।

श्लोक 28 (skanda.3.99.28)

दुःखशोकाग्निसंतप्तं संसारभयपीडितम् ॥ बहुरोगाकुलं दीनं त्राहि मां वृषवाहन

duḥkhaśokāgnisaṁtaptaṁ saṁsārabhayapīḍitam bahurogākulaṁ dīnaṁ trāhi māṁ vṛṣavāhana

"दुःख और शोक की अग्नि से संतप्त, संसार के भय से पीड़ित, अनेक रोगों से व्याकुल, दीन मुझे बचाइए, हे वृषभवाहन!

श्लोक 29 (skanda.3.99.29)

आगच्छ देवदेवेश महादेवाभयंकर ॥ गृहाण सह पार्वत्या तव पूजां मया कृताम्

āgaccha devadeveśa mahādevābhayaṁkara gṛhāṇa saha pārvatyā tava pūjāṁ mayā kṛtām

"आइए, हे देवदेवेश! हे महादेव, अभयंकर! पार्वती सहित मेरी की हुई इस पूजा को स्वीकार कीजिए।"

श्लोक 30 (skanda.3.99.30)

इति संकल्प्य विधिवद्ब्राह्मपूजां समाचरेत् ॥ गुरुं गणपतिं चैव यजेत्सव्यापसव्ययोः

iti saṁkalpya vidhivadbrāhmapūjāṁ samācaret guruṁ gaṇapatiṁ caiva yajetsavyāpasavyayoḥ

इस प्रकार संकल्प करके विधिपूर्वक ब्राह्म पूजा करे; दाईं और बाईं ओर गुरु और गणपति का पूजन करे।

श्लोक 31 (skanda.3.99.31)

क्षेत्रेशमीशकोणे तु यजेद्वास्तोष्पतिं क्रमात् ॥ वाग्देवीं च यजेत्तत्र ततः कात्यायनीं यजेत्

kṣetreśamīśakoṇe tu yajedvāstoṣpatiṁ kramāt vāgdevīṁ ca yajettatra tataḥ kātyāyanīṁ yajet

ईशान कोण में क्षेत्रपाल का, फिर क्रमशः वास्तोष्पति का पूजन करे; वहाँ वाग्देवी का पूजन करे, फिर कात्यायनी का पूजन करे।

श्लोक 32 (skanda.3.99.32)

धर्मं ज्ञानं च वैराग्यमैश्वर्यं च नमोंऽतकैः ॥ स्वरैरीशादिकोणेषु पीठपादाननुक्रमात् ॥ आभ्यां बिंदुविसर्गाभ्यामधर्मादीन्प्रपूजयेत्

dharmaṁ jñānaṁ ca vairāgyamaiśvaryaṁ ca namoṁ'takaiḥ svarairīśādikoṇeṣu pīṭhapādānanukramāt ābhyāṁ biṁduvisargābhyāmadharmādīnprapūjayet

धर्म, ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्य का "नमः" के साथ, ईशान आदि कोणों में स्वरों सहित, पीठ के चरणों में क्रमशः, बिन्दु और विसर्ग सहित अधर्म आदि की पूजा करे।

श्लोक 33 (skanda.3.99.33)

सत्त्वरूपैश्चतुर्दिक्षु मध्येऽनंतं सतारकम् ॥ सत्त्वादींस्त्रिगुणांस्तं तु रूपान्पीठेषु विन्यसेत्

sattvarūpaiścaturdikṣu madhye'naṁtaṁ satārakam sattvādīṁstriguṇāṁstaṁ tu rūpānpīṭheṣu vinyaset

चारों दिशाओं में सत्त्व-रूपों से, मध्य में तारकों सहित अनन्त का, सत्त्व आदि तीनों गुणों के रूपों को पीठ पर स्थापित करे।

श्लोक 34 (skanda.3.99.34)

अत ऊर्ध्वच्छदे मायां सह लक्ष्म्या शिवेन च

ata ūrdhvacchade māyāṁ saha lakṣmyā śivena ca

इसके ऊपर आवरण पर लक्ष्मी और शिव सहित माया की पूजा करे।

श्लोक 35 (skanda.3.99.35)

तदंते चांबुजं भूयः सकलं मंडलत्रयम् ॥ पत्रकेसरकिंजल्कव्याप्तं ताराक्षरैः क्रमात्

tadaṁte cāṁbujaṁ bhūyaḥ sakalaṁ maṁḍalatrayam patrakesarakiṁjalkavyāptaṁ tārākṣaraiḥ kramāt

उसके अन्त में फिर से कमल, सम्पूर्ण त्रिमण्डल, पंखुड़ियों, केसर और किंजल्क से व्याप्त, क्रमशः तारा-अक्षरों से चिह्नित —

श्लोक 36 (skanda.3.99.36)

पद्मत्रयं तथाभ्यर्च्य मध्ये मंडलमादरात् ॥ वामां ज्येष्ठां च रौद्रीं च भागाद्यैर्दिक्षु पूजयेत्

padmatrayaṁ tathābhyarcya madhye maṁḍalamādarāt vāmāṁ jyeṣṭhāṁ ca raudrīṁ ca bhāgādyairdikṣu pūjayet

इस प्रकार तीनों कमलों का पूजन करके, आदरपूर्वक मध्य के मण्डल का पूजन करे; वामा, ज्येष्ठा और रौद्री को दिशाओं में उनके भागों सहित पूजे।

श्लोक 37 (skanda.3.99.37)

वामाद्या नव शक्तीश्च नवस्वरयुता यजेत् ॥ हृदि बीजत्रयाद्येन पीठमंत्रेण चार्चयेत्

vāmādyā nava śaktīśca navasvarayutā yajet hṛdi bījatrayādyena pīṭhamaṁtreṇa cārcayet

वामा आदि नौ शक्तियों को नौ स्वरों सहित पूजे; हृदय में तीन बीजाक्षरों सहित पीठ-मन्त्र से पूजन करे।

श्लोक 38 (skanda.3.99.38)

आवृत्तैः प्रथमांगैश्च पंचभिर्मूर्त्तिशक्तिभिः ॥ त्रिशक्तिमूर्त्तिभिश्चान्यैर्निधिद्वयसमन्वितैः

āvṛttaiḥ prathamāṁgaiśca paṁcabhirmūrttiśaktibhiḥ triśaktimūrttibhiścānyairnidhidvayasamanvitaiḥ

आवृत्त प्रथम अंगों से, पाँच मूर्तिशक्तियों से, अन्य तीन मूर्तिशक्तियों से, दोनों निधियों सहित,

श्लोक 39 (skanda.3.99.39)

अनंताद्यैः परीताश्च मातृभिश्च वृषादिभिः ॥ सिद्धिभिश्चाणिमाद्याभिरिंद्राद्यैश्च सहायुधैः

anaṁtādyaiḥ parītāśca mātṛbhiśca vṛṣādibhiḥ siddhibhiścāṇimādyābhiriṁdrādyaiśca sahāyudhaiḥ

अनन्त आदि से घिरी हुई, मातृकाओं से, वृष आदि से, अणिमा आदि सिद्धियों से, इन्द्र आदि से उनके आयुधों सहित —

श्लोक 40 (skanda.3.99.40)

वृषभक्षेत्रचंडेशदुर्गाश्च स्कंदनंदिनौ ॥ गणेशः सैन्यपश्चैव स्वस्वलक्षणलक्षिताः

vṛṣabhakṣetracaṁḍeśadurgāśca skaṁdanaṁdinau gaṇeśaḥ sainyapaścaiva svasvalakṣaṇalakṣitāḥ

वृषभ, क्षेत्र, चण्डेश, दुर्गा, स्कन्द और नन्दी, गणेश, तथा सेनापति — अपने-अपने चिह्नों से युक्त इन सबकी पूजा करे।

श्लोक 41 (skanda.3.99.41)

अणिमा महिमा चैव गरिमा लघिमा तथा ॥ ईशित्वं च वशित्वं च प्राप्तिः प्राकाम्यमेव च

aṇimā mahimā caiva garimā laghimā tathā īśitvaṁ ca vaśitvaṁ ca prāptiḥ prākāmyameva ca

अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, ईशित्व, वशित्व, प्राप्ति और प्राकाम्य —

श्लोक 42 (skanda.3.99.42)

अष्टैश्वर्याणि चोक्तानि तेजोरूपाणि केवलम् ॥ पंचभिर्ब्रह्मभिः पूर्वं हृल्लेखाद्यादिभिः क्रमात

aṣṭaiśvaryāṇi coktāni tejorūpāṇi kevalam paṁcabhirbrahmabhiḥ pūrvaṁ hṛllekhādyādibhiḥ kramāta

ये आठ ऐश्वर्य केवल तेजोरूप कहे गए हैं; पहले पाँच ब्रह्ममन्त्रों से, हृल्लेखा आदि से क्रमशः,

श्लोक 43 (skanda.3.99.43)

अंगैरुमाद्यैरिंद्राद्यैः पूजोक्ता मुनिभिस्तु तैः ॥ उमाचंडेश्वरादींश्च पूजयेदुत्तरादितः

aṁgairumādyairiṁdrādyaiḥ pūjoktā munibhistu taiḥ umācaṁḍeśvarādīṁśca pūjayeduttarāditaḥ

उमा आदि और इन्द्र आदि अंगों से, मुनियों द्वारा पूजा कही गई है; उमा, चण्डेश्वर आदि की उत्तर दिशा से आरम्भ करके पूजा करे।

श्लोक 44 (skanda.3.99.44)

एवमावरणैर्युक्तं तेजोरूपं सदाशिवम् ॥ उमया सहितं देवमुपचारैः प्रपूजयेत्

evamāvaraṇairyuktaṁ tejorūpaṁ sadāśivam umayā sahitaṁ devamupacāraiḥ prapūjayet

इस प्रकार इन आवरणों से युक्त, तेजोरूप सदाशिव को, उमा सहित उपचारों से पूजित करे।

श्लोक 45 (skanda.3.99.45)

सुप्रतिष्ठितशंखस्य तीर्थैः पंचामृतैरपि ॥ अभिषिच्य महादेवं रुद्रसूक्तैः समाहितः

supratiṣṭhitaśaṁkhasya tīrthaiḥ paṁcāmṛtairapi abhiṣicya mahādevaṁ rudrasūktaiḥ samāhitaḥ

सुप्रतिष्ठित शिवलिंग को तीर्थ-जल और पंचामृत से, रुद्रसूक्तों के साथ एकाग्रचित्त होकर महादेव का अभिषेक करके,

श्लोक 46 (skanda.3.99.46)

कल्पयेद्विविधैर्मंत्रैरासनाद्युपचारकान्॥ आसनं कल्पयेद्धैमं दिव्यवस्त्रसमन्वितम्

kalpayedvividhairmaṁtrairāsanādyupacārakān āsanaṁ kalpayeddhaimaṁ divyavastrasamanvitam

विविध मन्त्रों से आसन आदि उपचार-सामग्री तैयार करे; दिव्य वस्त्र सहित स्वर्णिम आसन तैयार करे।

श्लोक 47 (skanda.3.99.47)

अर्घ्यमष्टगुणोपेतं पाद्यशुद्धोदकेन च ॥ तेनैवाचमनं दद्यान्मधुपर्कं मधूत्तरम्

arghyamaṣṭaguṇopetaṁ pādyaśuddhodakena ca tenaivācamanaṁ dadyānmadhuparkaṁ madhūttaram

आठ द्रव्यों से युक्त अर्घ्य, शुद्ध जल से पाद्य अर्पित करे; उसी से आचमन कराए, फिर मधु से युक्त मधुपर्क अर्पित करे।

श्लोक 48 (skanda.3.99.48)

पुनराचमनं दत्त्वा स्नानं मंत्रै प्रकल्पयेत् ॥ उपवीतं तथा वासो भूषणानि निवेदयेत् ॥ गंधमष्टांगसंयुक्तं सुपूतं विनिवेदयेत्

punarācamanaṁ dattvā snānaṁ maṁtrai prakalpayet upavītaṁ tathā vāso bhūṣaṇāni nivedayet gaṁdhamaṣṭāṁgasaṁyuktaṁ supūtaṁ vinivedayet

पुनः आचमन देकर, मन्त्रों से स्नान की व्यवस्था करे; यज्ञोपवीत, वस्त्र और आभूषण अर्पित करे; अष्टांग सुगन्ध, भलीभाँति पवित्र, अर्पित करे।

श्लोक 49 (skanda.3.99.49)

ततश्च बिल्वमंदारकह्लारसरसीरुहम् ॥ धत्तूरकं कर्णिकारं शणपुष्पं च मल्लिकाम्

tataśca bilvamaṁdārakahlārasarasīruham dhattūrakaṁ karṇikāraṁ śaṇapuṣpaṁ ca mallikām

फिर बिल्वपत्र, मन्दार, कुमुद, कमल, धतूरे के फूल, कर्णिकार, सन के फूल और चमेली,

श्लोक 50 (skanda.3.99.50)

कुशापामार्गतुलसीमाधवीचंपकादिकम् ॥ बृहतीकरवीराणि यथालब्धानि साधकः ॥ निवेदयेत्सुगंधीनि माल्यानि विविधानि च ॥ धूपं कालागरूत्पन्नं दीपं च विमलं शुभम्

kuśāpāmārgatulasīmādhavīcaṁpakādikam bṛhatīkaravīrāṇi yathālabdhāni sādhakaḥ nivedayetsugaṁdhīni mālyāni vividhāni ca dhūpaṁ kālāgarūtpannaṁ dīpaṁ ca vimalaṁ śubham

कुश, अपामार्ग, तुलसी, माधवी, चम्पक आदि, बृहती और कनेर — जो कुछ भी साधक को प्राप्त हो, वह सुगन्धित माला विविध प्रकार से अर्पित करे, काले अगर से बनी धूप और निर्मल शुभ दीप अर्पित करे।

श्लोक 51 (skanda.3.99.51)

विशेषकम् ॥ अथ पायसनैवेद्यं सघृतं सोपदंशकम् ॥ मोदकापूपसंयुक्तं शर्करागुडसंयुतम्

viśeṣakam atha pāyasanaivedyaṁ saghṛtaṁ sopadaṁśakam modakāpūpasaṁyuktaṁ śarkarāguḍasaṁyutam

विशेष रूप से फिर घी और उपदंश सहित खीर का नैवेद्य, लड्डू और पुए सहित, शक्कर और गुड़ से युक्त,

श्लोक 52 (skanda.3.99.52)

मधुनाक्तं दधियुतं जलपानसमन्वितम् ॥ तेनैव हविषा वह्नौ जुहुयान्मंत्रभाविते

madhunāktaṁ dadhiyutaṁ jalapānasamanvitam tenaiva haviṣā vahnau juhuyānmaṁtrabhāvite

मधु और दही से मिश्रित, जलपान सहित अर्पित करे; उसी हवि से मन्त्रभावित अग्नि में हवन करे,

श्लोक 53 (skanda.3.99.53)

आगमोक्तेन विधिना गुरुवाक्यनियंत्रितः ॥ नैवेद्यं शंभवे भूयो दत्त्वा तांबूलमुत्तमम्

āgamoktena vidhinā guruvākyaniyaṁtritaḥ naivedyaṁ śaṁbhave bhūyo dattvā tāṁbūlamuttamam

आगमोक्त विधि से, गुरु के वचन के अनुसार; शम्भु को पुनः नैवेद्य अर्पित करके, उत्तम ताम्बूल भी,

श्लोक 54 (skanda.3.99.54)

धूपं नीराजनं रम्यं छत्रं दर्पणमुत्तमम् ॥ समर्पयित्वा विधिवन्मंत्रैर्वेदिकतांत्रिकैः

dhūpaṁ nīrājanaṁ ramyaṁ chatraṁ darpaṇamuttamam samarpayitvā vidhivanmaṁtrairvedikatāṁtrikaiḥ

धूप, सुन्दर आरती, छत्र, उत्तम दर्पण — वैदिक और तान्त्रिक मन्त्रों से विधिपूर्वक अर्पित करके,

श्लोक 55 (skanda.3.99.55)

यद्यशक्तः स्वयं निःस्वो यथाविभवमर्चयेत् ॥ भक्त्त्या दत्तेन गौरीशः पुष्पमात्रेण तुष्यति

yadyaśaktaḥ svayaṁ niḥsvo yathāvibhavamarcayet bhakttyā dattena gaurīśaḥ puṣpamātreṇa tuṣyati

यदि साधक स्वयं असमर्थ और निर्धन हो, तो अपने सामर्थ्य के अनुसार पूजा करे; भक्तिपूर्वक अर्पित एक ही पुष्प से गौरीश प्रसन्न हो जाते हैं।

श्लोक 56 (skanda.3.99.56)

अथांगभूतान्सकलान्गणेशादीन्प्रपूजयेत् ॥ स्तवैर्नानाविधैः स्तुत्वा साष्टांगं प्रणमेद्बुधः

athāṁgabhūtānsakalāngaṇeśādīnprapūjayet stavairnānāvidhaiḥ stutvā sāṣṭāṁgaṁ praṇamedbudhaḥ

फिर गणेश आदि समस्त अंगभूत देवताओं का पूजन करे; विविध स्तोत्रों से स्तुति करके बुद्धिमान साष्टांग प्रणाम करे।

श्लोक 57 (skanda.3.99.57)

ततः प्रदक्षिणीकृत्य वृषचंडेश्वरादिकान् ॥ पूजां समर्प्य विधिवत्प्रार्थयेद्गिरिजापतिम्

tataḥ pradakṣiṇīkṛtya vṛṣacaṁḍeśvarādikān pūjāṁ samarpya vidhivatprārthayedgirijāpatim

फिर वृष, चण्डेश्वर आदि की प्रदक्षिणा करके, विधिपूर्वक पूजा अर्पित करके, गिरिजापति से प्रार्थना करे —

श्लोक 58 (skanda.3.99.58)

जय देव जगन्नाथ जय शंकर शाश्वत ॥ जय सर्व सुराध्यक्ष जय सर्वसुरार्चित

jaya deva jagannātha jaya śaṁkara śāśvata jaya sarva surādhyakṣa jaya sarvasurārcita

"जय हो, हे देव जगन्नाथ! जय हो, हे सनातन शंकर! जय हो, हे समस्त देवताओं के अध्यक्ष! जय हो, हे समस्त देवताओं द्वारा पूजित!

श्लोक 59 (skanda.3.99.59)

जय सर्वगुणातीत जय सर्ववरप्रद ॥ जय नित्य निराधार जय विश्वंभराव्यय

jaya sarvaguṇātīta jaya sarvavaraprada jaya nitya nirādhāra jaya viśvaṁbharāvyaya

"जय हो, हे समस्त गुणों से परे! जय हो, हे समस्त वरदाता! जय हो, हे नित्य निराधार! जय हो, हे अविनाशी विश्वंभर!

श्लोक 60 (skanda.3.99.60)

जय विश्वैकवेद्येश जय नागेंद्रभूषण ॥ जय गौरीपते शंभो जय चंद्रार्धशेखर

jaya viśvaikavedyeśa jaya nāgeṁdrabhūṣaṇa jaya gaurīpate śaṁbho jaya caṁdrārdhaśekhara

"जय हो, हे विश्व के एकमात्र ज्ञेय ईश! जय हो, हे नागेन्द्र से विभूषित! जय हो, हे गौरीपति शम्भु! जय हो, हे अर्धचन्द्रशेखर!

श्लोक 61 (skanda.3.99.61)

जय कोट्यर्कसंकाश जयानंतगुणाश्रय

jaya koṭyarkasaṁkāśa jayānaṁtaguṇāśraya

"जय हो, हे करोड़ों सूर्यों के समान! जय हो, हे अनन्त गुणों के आश्रय!

श्लोक 62 (skanda.3.99.62)

जय रुद्र विरूपाक्ष जयाचिंत्य निरंजन ॥ जय नाथ कृपासिंधो जय भक्तार्तिभञ्जन ॥ जय दुस्तरसंसारसागरोत्तारण प्रभो

jaya rudra virūpākṣa jayāciṁtya niraṁjana jaya nātha kṛpāsiṁdho jaya bhaktārtibhañjana jaya dustarasaṁsārasāgarottāraṇa prabho

"जय हो, हे रुद्र विरूपाक्ष! जय हो, हे अचिन्त्य निरंजन! जय हो, हे कृपासिन्धु नाथ! जय हो, हे भक्तों की पीड़ा हरनेवाले! जय हो, हे दुस्तर संसार-सागर से पार लगानेवाले प्रभु!

श्लोक 63 (skanda.3.99.63)

प्रसीद मे महादेव संसारार्त्तस्य खिद्यतः ॥ सर्वपापभयं हृत्वा रक्ष मां परमेश्वर

prasīda me mahādeva saṁsārārttasya khidyataḥ sarvapāpabhayaṁ hṛtvā rakṣa māṁ parameśvara

"मुझ पर प्रसन्न होइए, हे महादेव! संसार से पीड़ित और खिन्न मुझ पर; समस्त पाप-भय हरकर मेरी रक्षा कीजिए, हे परमेश्वर।

श्लोक 64 (skanda.3.99.64)

महादारिद्र्यमग्नस्य महापापहतस्य च ॥ महाशोकविनष्टस्य महारोगातुरस्य च

mahādāridryamagnasya mahāpāpahatasya ca mahāśokavinaṣṭasya mahārogāturasya ca

"महादरिद्रता में डूबे, महापाप से आहत, महाशोक से नष्ट और महारोग से पीड़ित,

श्लोक 65 (skanda.3.99.65)

ऋणभारपरीतस्य दह्यमानस्य कर्मभिः ॥ ग्रहैः प्रपीड्यमानस्य प्रसीद मम शंकर

ṛṇabhāraparītasya dahyamānasya karmabhiḥ grahaiḥ prapīḍyamānasya prasīda mama śaṁkara

"ऋण के भार से घिरे, कर्मों से जलते हुए, ग्रहों से पीड़ित मुझ पर प्रसन्न होइए, हे शंकर।"

श्लोक 66 (skanda.3.99.66)

दरिद्रः प्रार्थयेदेवं पूजांते गिरिजापतिम् ॥ अर्थाढ्यो वापि राजा वा प्रार्थयेद्देवमीश्वरम्

daridraḥ prārthayedevaṁ pūjāṁte girijāpatim arthāḍhyo vāpi rājā vā prārthayeddevamīśvaram

इस प्रकार दरिद्र मनुष्य पूजा के अन्त में गिरिजापति से प्रार्थना करे; धनवान अथवा राजा भी ईश्वर देव से इस प्रकार प्रार्थना करे —

श्लोक 67 (skanda.3.99.67)

दीर्घमायुः सदारोग्यं कोशवृद्धिर्बलोन्नतिः ॥ ममास्तु नित्यमानन्दः प्रसादात्तव शंकर

dīrghamāyuḥ sadārogyaṁ kośavṛddhirbalonnatiḥ mamāstu nityamānandaḥ prasādāttava śaṁkara

"मुझे दीर्घायु, सदा आरोग्य, कोश की वृद्धि और बल की उन्नति मिले; आपकी कृपा से, हे शंकर! मुझे नित्य आनन्द प्राप्त हो।

श्लोक 68 (skanda.3.99.68)

शत्रवः संक्षयं यांतु प्रसीदन्तु मम ग्रहाः ॥ नश्यन्तु दस्यवो राष्ट्रे जनाः संतु निरापदः

śatravaḥ saṁkṣayaṁ yāṁtu prasīdantu mama grahāḥ naśyantu dasyavo rāṣṭre janāḥ saṁtu nirāpadaḥ

"मेरे शत्रुओं का नाश हो, मेरे ग्रह प्रसन्न हों; राष्ट्र में डाकू नष्ट हों, प्रजा विपत्तिरहित रहे।

श्लोक 69 (skanda.3.99.69)

दुर्भिक्षमारीसंतापाः शमं यांतु महीतले ॥ सर्वसस्यसमृद्धिश्च भूयात्सुखमया दिशः

durbhikṣamārīsaṁtāpāḥ śamaṁ yāṁtu mahītale sarvasasyasamṛddhiśca bhūyātsukhamayā diśaḥ

"पृथ्वी पर दुर्भिक्ष, महामारी और संताप शान्त हों; समस्त फसलों की समृद्धि हो, और दिशाएँ सुखमय हों।"

श्लोक 70 (skanda.3.99.70)

एवमाराधयेद्देवं प्रदोषे गिरिजापतिम् ॥ ब्राह्मणान्भोजयेत्पश्चाद्दक्षिणाभिश्च तोषयेत्

evamārādhayeddevaṁ pradoṣe girijāpatim brāhmaṇānbhojayetpaścāddakṣiṇābhiśca toṣayet

इस प्रकार प्रदोष में गिरिजापति की आराधना करे; तत्पश्चात ब्राह्मणों को भोजन कराए और दक्षिणा से संतुष्ट करे।

श्लोक 71 (skanda.3.99.71)

सर्वपापक्षयकरी सर्वदारिद्र्यनाशिनी ॥ शिवपूजा मया ख्याता सर्वाभीष्टवरप्रदा

sarvapāpakṣayakarī sarvadāridryanāśinī śivapūjā mayā khyātā sarvābhīṣṭavarapradā

यह शिवपूजा, जो मैंने बताई है, समस्त पापों का नाश करनेवाली, समस्त दरिद्रता का विनाश करनेवाली और समस्त अभीष्ट वर देनेवाली है।

श्लोक 72 (skanda.3.99.72)

महापातकसंघातमधिकं चोपपातकम् ॥ शिवद्रव्यापहरणादन्यत्सर्वं निवारयेत्

mahāpātakasaṁghātamadhikaṁ copapātakam śivadravyāpaharaṇādanyatsarvaṁ nivārayet

यह शिवद्रव्य के हरण को छोड़कर, समस्त महापातकों और उपपातकों के समूह का निवारण कर देती है।

श्लोक 73 (skanda.3.99.73)

ब्रह्महत्यादिपापानां पुराणेषु स्मृतिष्वपि ॥ प्रायश्चित्तानि दृष्टानि न शिवद्रव्यहारिणाम्

brahmahatyādipāpānāṁ purāṇeṣu smṛtiṣvapi prāyaścittāni dṛṣṭāni na śivadravyahāriṇām

ब्रह्महत्या आदि पापों के प्रायश्चित्त पुराणों और स्मृतियों में देखे गए हैं, किन्तु शिवद्रव्य के अपहरण करनेवालों के लिए कोई प्रायश्चित्त नहीं है।

श्लोक 74 (skanda.3.99.74)

बहुनात्र किमुक्तेन श्लोकार्धेन ब्रवीम्यहम् ॥ ब्रह्महत्याशतं वापि शिवपूजा विनाशयेत्

bahunātra kimuktena ślokārdhena bravīmyaham brahmahatyāśataṁ vāpi śivapūjā vināśayet

इस विषय में अधिक कहने से क्या लाभ? मैं आधे श्लोक में कहता हूँ — सौ ब्रह्महत्याओं को भी शिवपूजा नष्ट कर सकती है।

श्लोक 75 (skanda.3.99.75)

मया कथितमेतत्ते प्रदोषे शिवपूजनम् ॥ रहस्यं सर्वजंतूनामत्र नास्त्येव संशयः

mayā kathitametatte pradoṣe śivapūjanam rahasyaṁ sarvajaṁtūnāmatra nāstyeva saṁśayaḥ

मैंने तुम्हें यह प्रदोष की शिवपूजा बताई है — यह समस्त प्राणियों का रहस्य है, इसमें कोई संशय नहीं है।

श्लोक 76 (skanda.3.99.76)

एताभ्यामपि बालाभ्यामेवं पूजा विधीयताम् ॥ अतः संवत्सरादेव परां सिद्धिमवाप्स्यथ

etābhyāmapi bālābhyāmevaṁ pūjā vidhīyatām ataḥ saṁvatsarādeva parāṁ siddhimavāpsyatha

"इन दोनों बालकों से भी इसी प्रकार पूजा करवाई जाए; इससे केवल एक वर्ष में ही तुम परम सिद्धि प्राप्त करोगे।"

श्लोक 77 (skanda.3.99.77)

इति शांडिल्यवचनमाकर्ण्य द्विजभामिनी ॥ ताभ्यां तु सह बालाभ्यां प्रणनाम मुनेः पदम्

iti śāṁḍilyavacanamākarṇya dvijabhāminī tābhyāṁ tu saha bālābhyāṁ praṇanāma muneḥ padam

शाण्डिल्य के इन वचनों को सुनकर वह ब्राह्मणी उन दोनों बालकों सहित मुनि के चरणों में प्रणत हुई।

श्लोक 78 (skanda.3.99.78)

विप्रस्त्र्युवाच ॥ अहमद्य कृतार्थास्मि तव दर्शनमात्रतः ॥ एतौ कुमारौ भगवंस्त्वामेव शरणं गतौ

viprastryuvāca ahamadya kṛtārthāsmi tava darśanamātrataḥ etau kumārau bhagavaṁstvāmeva śaraṇaṁ gatau

ब्राह्मणी ने कहा — आज मैं आपके दर्शनमात्र से कृतार्थ हो गई हूँ। हे भगवन्! ये दोनों कुमार आपकी ही शरण में आए हैं।

श्लोक 79 (skanda.3.99.79)

एष मे तनयो ब्रह्मञ्छुचिव्रत इतीरितः ॥ एष राजसुतो नाम्ना धर्मगुप्तः कृतो मया

eṣa me tanayo brahmañchucivrata itīritaḥ eṣa rājasuto nāmnā dharmaguptaḥ kṛto mayā

"हे ब्रह्मन्! यह मेरा पुत्र है, इसे शुचिव्रत कहा गया है; यह राजपुत्र है, इसका नाम मैंने धर्मगुप्त रखा है।"

श्लोक 80 (skanda.3.99.80)

एतावहं च भगवन्भवच्चरणकिंकराः ॥ समुद्धरास्मिन्पतितान्घोरे दारिद्र्यसागरे

etāvahaṁ ca bhagavanbhavaccaraṇakiṁkarāḥ samuddharāsminpatitānghore dāridryasāgare

"हम दोनों, हे भगवन्! आपके चरणों के सेवक हैं; इस भयंकर दरिद्रता-सागर में डूबे हुए हमें उद्धार कीजिए।"

श्लोक 81 (skanda.3.99.81)

इति प्रपन्नां शरणं द्विजांगनामाश्वास्य वाक्यैरमृतोपमानैः ॥ उपादिदेशाथ तयोः कुमारयोर्मुनिः शिवाराधनमंत्र विद्याम्

iti prapannāṁ śaraṇaṁ dvijāṁganāmāśvāsya vākyairamṛtopamānaiḥ upādideśātha tayoḥ kumārayormuniḥ śivārādhanamaṁtra vidyām

इस प्रकार शरण में आई उस ब्राह्मणी को अमृत के समान वचनों से आश्वस्त करके, मुनि ने उन दोनों कुमारों को शिवाराधना की मन्त्रविद्या सिखाई।

श्लोक 82 (skanda.3.99.82)

अथोपदिष्टौ मुनिना कुमारौ ब्राह्मणी च सा ॥ तं प्रणम्य समामंत्र्य जग्मुस्ते शिवमंदिरात्

athopadiṣṭau muninā kumārau brāhmaṇī ca sā taṁ praṇamya samāmaṁtrya jagmuste śivamaṁdirāt

फिर मुनि द्वारा इस प्रकार उपदिष्ट होकर, वे दोनों कुमार और वह ब्राह्मणी, उन्हें प्रणाम करके और विदा लेकर शिवमन्दिर से चले गए।

श्लोक 83 (skanda.3.99.83)

ततः प्रभृति तौ बालौ मुनिवर्योपदेशतः ॥ प्रदोषे पार्वतीशस्य पूजां चक्रतुरंजसा

tataḥ prabhṛti tau bālau munivaryopadeśataḥ pradoṣe pārvatīśasya pūjāṁ cakraturaṁjasā

उसी समय से वे दोनों बालक, मुनिश्रेष्ठ के उपदेश के अनुसार, श्रद्धापूर्वक प्रदोष में पार्वतीपति की पूजा करने लगे।

श्लोक 84 (skanda.3.99.84)

एवं पूजयतोर्देवं द्विजराजकुमारयोः ॥ सुखेनैव व्यतीयाय तयोर्मासचतुष्टयम्

evaṁ pūjayatordevaṁ dvijarājakumārayoḥ sukhenaiva vyatīyāya tayormāsacatuṣṭayam

इस प्रकार उन दोनों ब्राह्मण और राजकुमारों द्वारा देव की पूजा करते हुए, उनके सुखपूर्वक चार महीने बीत गए।

श्लोक 85 (skanda.3.99.85)

कदाचिद्राजपुत्रेण विनासौ द्विजनंदनः ॥ स्नातुं गतो नदीतीरे चचार बहुलीलया

kadācidrājaputreṇa vināsau dvijanaṁdanaḥ snātuṁ gato nadītīre cacāra bahulīlayā

एक बार राजपुत्र के बिना वह ब्राह्मणकुमार स्नान के लिए नदी-तट पर गया और वहाँ बहुत क्रीड़ा करता रहा।

श्लोक 86 (skanda.3.99.86)

तत्र निर्झरनिर्घातनिर्भिन्ने वप्र कुट्टिमे ॥ निधानकलशं स्थूलं प्रस्फुरंतं ददर्श ह

tatra nirjharanirghātanirbhinne vapra kuṭṭime nidhānakalaśaṁ sthūlaṁ prasphuraṁtaṁ dadarśa ha

वहाँ झरने के वेग से टूटे हुए एक टीले में उसने एक विशाल निधि-कलश चमकता हुआ देखा।

श्लोक 87 (skanda.3.99.87)

तं दृष्ट्वा सहसागत्य हर्षकौतुकविह्वलः ॥ दैवोपपन्नं मन्वानो गृहीत्वा शिरसा ययौ

taṁ dṛṣṭvā sahasāgatya harṣakautukavihvalaḥ daivopapannaṁ manvāno gṛhītvā śirasā yayau

उसे देखकर, हर्ष और कौतूहल से विह्वल होकर, दैवयोग से प्राप्त हुआ मानकर, उसने उसे सिर पर उठा लिया और चल पड़ा।

श्लोक 88 (skanda.3.99.88)

ससंभ्रमं समानीय निधाय कलशं बलात् ॥ निधाय भवनस्यांते मातरं समभाषत

sasaṁbhramaṁ samānīya nidhāya kalaśaṁ balāt nidhāya bhavanasyāṁte mātaraṁ samabhāṣata

उतावली में उसे लाकर, बलपूर्वक कलश को रखकर, घर के पास रखकर उसने अपनी माता से कहा —

श्लोक 89 (skanda.3.99.89)

मातर्मातरिमं पश्य प्रसादं गिरिजापतेः ॥ निधानं कुम्भरूपेण दर्शितं करुणात्मना

mātarmātarimaṁ paśya prasādaṁ girijāpateḥ nidhānaṁ kumbharūpeṇa darśitaṁ karuṇātmanā

"माता, माता! देखो यह — गिरिजापति की कृपा! करुणामय देव ने कलश के रूप में यह निधि दिखाई है।"

श्लोक 90 (skanda.3.99.90)

अथ सा विस्मिता साध्वी समाहूय नृपात्मजम् ॥ स्वपुत्रं प्रतिनंद्याह मानयन्ती शिवार्चनम्

atha sā vismitā sādhvī samāhūya nṛpātmajam svaputraṁ pratinaṁdyāha mānayantī śivārcanam

फिर वह विस्मित साध्वी, राजपुत्र को बुलाकर, अपने पुत्र का अभिनन्दन करते हुए, शिवपूजा का सम्मान करते हुए बोली —

श्लोक 91 (skanda.3.99.91)

शृणुतां मे वचः पुत्रौ निधानकलशीमिमाम् ॥ समं विभज्य गृह्णीतं मम शासनगौरवात्

śṛṇutāṁ me vacaḥ putrau nidhānakalaśīmimām samaṁ vibhajya gṛhṇītaṁ mama śāsanagauravāt

"मेरे दोनों पुत्रो, मेरी बात सुनो — इस निधि-कलश को समान रूप से बाँटकर, मेरी आज्ञा के सम्मान में ग्रहण करो।"

श्लोक 92 (skanda.3.99.92)

इति मातुर्वचः श्रुत्वा तुतोष द्विज नंदनः ॥ प्रत्याह राजपुत्रस्तां विस्रब्धः शंकरार्चने

iti māturvacaḥ śrutvā tutoṣa dvija naṁdanaḥ pratyāha rājaputrastāṁ visrabdhaḥ śaṁkarārcane

माता के इन वचनों को सुनकर ब्राह्मणकुमार को संतोष हुआ; किन्तु राजपुत्र ने शंकर की आराधना में विश्वस्त होकर उससे कहा —

श्लोक 93 (skanda.3.99.93)

मातस्तव सुतस्यैव सुकृतेन समागतम् ॥ नाहं ग्रहीतुमिच्छामि विभक्तं धनसंच यम्

mātastava sutasyaiva sukṛtena samāgatam nāhaṁ grahītumicchāmi vibhaktaṁ dhanasaṁca yam

"माता, यह तुम्हारे ही पुत्र के सुकृत से प्राप्त हुआ है; मैं इस विभाजित धन-संचय को लेना नहीं चाहता।

श्लोक 94 (skanda.3.99.94)

आत्मनः सुकृताल्लब्धं स्वयमेव भुनक्त्वसौ ॥ स एव भगवानीशः करिष्यति कृपां मयि

ātmanaḥ sukṛtāllabdhaṁ svayameva bhunaktvasau sa eva bhagavānīśaḥ kariṣyati kṛpāṁ mayi

"अपने ही सुकृत से प्राप्त इसे यह स्वयं ही भोगे; वे ही भगवान ईश मुझ पर कृपा करेंगे।"

श्लोक 95 (skanda.3.99.95)

एवमर्चयतोः शंभुं भूयोपि परया मुदा ॥ संवत्सरो व्यतीयाय तस्मिन्नेव गृहे तयोः

evamarcayatoḥ śaṁbhuṁ bhūyopi parayā mudā saṁvatsaro vyatīyāya tasminneva gṛhe tayoḥ

इस प्रकार दोनों पुनः परम हर्ष से शम्भु की पूजा करते हुए, उसी घर में उनका एक वर्ष बीत गया।

श्लोक 96 (skanda.3.99.96)

अथैकदा राजसूनुः सह तेन द्विजन्मना ॥ वसंतसमये प्राप्ते विजहार वनां तरे

athaikadā rājasūnuḥ saha tena dvijanmanā vasaṁtasamaye prāpte vijahāra vanāṁ tare

फिर एक बार, वसन्त ऋतु आने पर, राजपुत्र उस ब्राह्मणकुमार के साथ वन के भीतर विहार करने गया।

श्लोक 97 (skanda.3.99.97)

अथ दूरं गतौ क्वापि वने द्विजनृपात्मजौ ॥ गन्धर्वकन्याः क्रीडंती शतशस्तावपश्यताम्

atha dūraṁ gatau kvāpi vane dvijanṛpātmajau gandharvakanyāḥ krīḍaṁtī śataśastāvapaśyatām

फिर वन में दूर तक जाने पर, उन दोनों ब्राह्मण और राजकुमारों ने सैकड़ों गन्धर्व-कन्याओं को क्रीड़ा करती देखा।

श्लोक 98 (skanda.3.99.98)

ताः सर्वाश्चारुसर्वांग्यो विहरंत्यो मनोहरम् ॥ दृष्ट्वा द्विजात्मजो दूरादुवाच नृपनंदनम्

tāḥ sarvāścārusarvāṁgyo viharaṁtyo manoharam dṛṣṭvā dvijātmajo dūrāduvāca nṛpanaṁdanam

उन सभी सर्वांग-सुन्दरी, मनोहर क्रीड़ा करती हुई कन्याओं को देखकर, ब्राह्मणकुमार ने दूर से ही राजपुत्र से कहा —

श्लोक 99 (skanda.3.99.99)

इतः पुरो न गंतव्यं विहरंत्यग्रतः स्त्रियः॥ स्त्रीसंन्निधानं विबुधास्त्यजंति विमलाशयाः

itaḥ puro na gaṁtavyaṁ viharaṁtyagrataḥ striyaḥ strīsaṁnnidhānaṁ vibudhāstyajaṁti vimalāśayāḥ

"इससे आगे नहीं जाना चाहिए; आगे स्त्रियाँ क्रीड़ा कर रही हैं। निर्मल हृदयवाले विद्वान स्त्रियों की समीपता का त्याग करते हैं।

श्लोक 100 (skanda.3.99.100)

एताः कैतवकारिण्यो धनयौवनदुर्मदाः । मोहयन्त्यो जनं दृष्ट्वा वाचानुनयकोविदाः

etāḥ kaitavakāriṇyo dhanayauvanadurmadāḥ mohayantyo janaṁ dṛṣṭvā vācānunayakovidāḥ

"ये कपटपूर्ण, धन और यौवन से उन्मत्त, वाणी से मोहित करने में कुशल — देखते ही मनुष्य को मोहित कर देती हैं।

श्लोक 101 (skanda.3.99.101)

अतः परित्यजेत्त्स्त्रीणां सन्निधिं सहभाषणम् । निज़धर्मरतो विद्वन्ब्रह्मचारी विशेषतः

ataḥ parityajettstrīṇāṁ sannidhiṁ sahabhāṣaṇam nija़dharmarato vidvanbrahmacārī viśeṣataḥ

"इसलिए स्त्रियों की समीपता और उनसे बातचीत का त्याग करना चाहिए — विशेषकर अपने धर्म में रत विद्वान ब्रह्मचारी को।"

श्लोक 102 (skanda.3.99.102)

अतोहं नोत्सहे गन्तुं क्रीडास्थानं मृगीदृशाम् ॥ इत्युक्त्वा द्विजपुत्रस्तु निवृत्तो दूरतः स्थितः

atohaṁ notsahe gantuṁ krīḍāsthānaṁ mṛgīdṛśām ityuktvā dvijaputrastu nivṛtto dūrataḥ sthitaḥ

"इसलिए मैं इन मृगनयनी कन्याओं के क्रीड़ास्थल में जाने का साहस नहीं करता।" यह कहकर ब्राह्मणकुमार लौट गया और दूर खड़ा रहा।

श्लोक 103 (skanda.3.99.103)

अथासौ राजपुत्रस्तु कौतुकाविष्टमानसः ॥ तासां विहारपदवीमेक एवाभयो ययौ

athāsau rājaputrastu kautukāviṣṭamānasaḥ tāsāṁ vihārapadavīmeka evābhayo yayau

किन्तु राजपुत्र, कौतूहल से भरे मन से, अकेला ही निर्भय होकर उनकी क्रीड़ा-भूमि की ओर चला गया।

श्लोक 104 (skanda.3.99.104)

तत्र गंधर्वकन्यानां मध्ये त्वेका वरानना ॥ दृष्ट्वाऽऽयांतं राजपुत्रं चिंतयामास चेतसा

tatra gaṁdharvakanyānāṁ madhye tvekā varānanā dṛṣṭvā''yāṁtaṁ rājaputraṁ ciṁtayāmāsa cetasā

वहाँ गन्धर्व-कन्याओं में से एक सुन्दर मुखवाली कन्या ने आते हुए राजपुत्र को देखकर मन में विचार किया —

श्लोक 105 (skanda.3.99.105)

अहो कोयमुदारांगो युवा सर्वांगसुन्दरः ॥ मत्तमातंग गमनो लावण्यामृतवारिधिः

aho koyamudārāṁgo yuvā sarvāṁgasundaraḥ mattamātaṁga gamano lāvaṇyāmṛtavāridhiḥ

"अहो, यह उदार अंगोंवाला, सर्वांग-सुन्दर यह युवक कौन है? मत्त हाथी की चाल चलनेवाला, सौन्दर्य का अमृत-सागर,

श्लोक 106 (skanda.3.99.106)

लीलालोलविशालाक्षी मधुरस्मितपेशलः ॥ मदनोपमरूपश्रीः सुकुमारांगलक्षणः

līlālolaviśālākṣī madhurasmitapeśalaḥ madanopamarūpaśrīḥ sukumārāṁgalakṣaṇaḥ

"क्रीड़ा से चंचल विशाल नेत्रोंवाला, मधुर मुस्कान से कोमल, कामदेव के समान रूप-शोभावाला, कोमल अंगों के शुभ लक्षणोंवाला।"

श्लोक 107 (skanda.3.99.107)

इत्याश्चर्ययुता बाला दूराद्दृष्ट्वा नृपात्मजम् ॥ सर्वाः सखीः समालोक्य वचनं चेदमब्रवीत्

ityāścaryayutā bālā dūrāddṛṣṭvā nṛpātmajam sarvāḥ sakhīḥ samālokya vacanaṁ cedamabravīt

इस प्रकार आश्चर्य से भरी वह कन्या दूर से राजपुत्र को देखकर, अपनी सभी सखियों की ओर देखकर यह वचन बोली —

श्लोक 108 (skanda.3.99.108)

इतो विदूरे हे सख्यो वनमस्त्येकमुत्तमम् ॥ विचित्रचंपकाशोकपुन्नागबकुलैर्युतम्

ito vidūre he sakhyo vanamastyekamuttamam vicitracaṁpakāśokapunnāgabakulairyutam

"हे सखियो! यहाँ से थोड़ी दूर पर एक उत्तम वन है, जो विचित्र चम्पक, अशोक, पुन्नाग और बकुल वृक्षों से युक्त है।

श्लोक 109 (skanda.3.99.109)

तत्र गत्वा वनं सर्वाः संचीय कुसुमोत्करम् ॥ भवत्यः पुनरायांतु तावत्तिष्ठाम्यहं त्विह

tatra gatvā vanaṁ sarvāḥ saṁcīya kusumotkaram bhavatyaḥ punarāyāṁtu tāvattiṣṭhāmyahaṁ tviha

"वहाँ जाकर तुम सब उस वन में फूलों का संग्रह करो; फिर वापस आ जाना — तब तक मैं यहीं रहूँगी।"

श्लोक 110 (skanda.3.99.110)

इत्यादिष्टः सखीवर्गो जगाम विपिनांतरम् ॥ सापि गंधर्वजा तस्थौ न्यस्तदृष्टिर्नृपात्मजे

ityādiṣṭaḥ sakhīvargo jagāma vipināṁtaram sāpi gaṁdharvajā tasthau nyastadṛṣṭirnṛpātmaje

इस प्रकार आदेश पाकर सखियों का समूह वन के भीतर चला गया; परन्तु वह गन्धर्वकन्या राजपुत्र पर दृष्टि टिकाए वहीं ठहरी रही।

श्लोक 111 (skanda.3.99.111)

तां समालोक्य तन्वंगीं नवयौवनशालिनीम् ॥ बालां स्वरूपसंपत्त्या परैिभूततिलोत्तमाम्

tāṁ samālokya tanvaṁgīṁ navayauvanaśālinīm bālāṁ svarūpasaṁpattyā paraiibhūtatilottamām

नवयौवन से सुशोभित, तिलोत्तमा को भी मात करनेवाली उस कोमलांगी कन्या को देखकर,

श्लोक 112 (skanda.3.99.112)

राजपुत्रः समागम्य कौतुकोत्फुल्ललोचनः ॥ अवाप दैवयोगेन मदनस्य शरव्यथाम्

rājaputraḥ samāgamya kautukotphullalocanaḥ avāpa daivayogena madanasya śaravyathām

कौतूहल से खिले नेत्रोंवाला राजपुत्र निकट आया, और दैवयोग से कामदेव के बाण की पीड़ा को प्राप्त हुआ।

श्लोक 113 (skanda.3.99.113)

गन्धर्वतनया सापि प्राप्ताय नृपसूनवे ॥ उत्थाय तरसा तस्मै प्रददौ पल्लवासनम्

gandharvatanayā sāpi prāptāya nṛpasūnave utthāya tarasā tasmai pradadau pallavāsanam

वह गन्धर्वकन्या भी, राजपुत्र के निकट आने पर, शीघ्र उठकर उसके लिए पत्तों का आसन ले आई।

श्लोक 114 (skanda.3.99.114)

कृतोपचारमासीनं तमासाद्य सुमध्यमा ॥ पप्रच्छ तद्रूपगुणैर्ध्वस्तधैर्याकुलेंद्रिया

kṛtopacāramāsīnaṁ tamāsādya sumadhyamā papraccha tadrūpaguṇairdhvastadhairyākuleṁdriyā

उसके सत्कारपूर्वक बैठ जाने पर, उस सुमध्यमा कन्या ने, उसके रूप और गुणों से धैर्य खोकर, व्याकुल इन्द्रियों से पूछा —

श्लोक 115 (skanda.3.99.115)

कस्त्वं कमलपत्राक्ष कस्माद्देशादिहागतः ॥ कस्य पुत्र इति प्रेम्णा पृष्टः सर्वं न्यवेदयत्

kastvaṁ kamalapatrākṣa kasmāddeśādihāgataḥ kasya putra iti premṇā pṛṣṭaḥ sarvaṁ nyavedayat

"हे कमलनेत्र! तुम कौन हो? किस देश से यहाँ आए हो? किसके पुत्र हो?" इस प्रकार प्रेमपूर्वक पूछे जाने पर उसने सब कुछ बता दिया —

श्लोक 116 (skanda.3.99.116)

विदर्भ राजतनयं विध्वस्तपितृमातृकम् ॥ शत्रुभिश्च हृतस्थानमात्मानं परराष्ट्रगम्

vidarbha rājatanayaṁ vidhvastapitṛmātṛkam śatrubhiśca hṛtasthānamātmānaṁ pararāṣṭragam

कि वह विदर्भ के राजा का पुत्र है, माता-पिता दोनों से रहित, शत्रुओं द्वारा अपने स्थान से निकाला गया, दूसरे राज्य में विचरण करता हुआ।

श्लोक 117 (skanda.3.99.117)

सर्वमावेद्य भूयस्तां पप्रच्छ नृपनंदनः ॥ का त्वं वामोरु किं चात्र कार्यं ते कस्य चात्मजा

sarvamāvedya bhūyastāṁ papraccha nṛpanaṁdanaḥ kā tvaṁ vāmoru kiṁ cātra kāryaṁ te kasya cātmajā

सब कुछ बताकर राजपुत्र ने पुनः उससे पूछा — "हे सुन्दर जाँघोंवाली! तुम कौन हो? यहाँ तुम्हारा क्या प्रयोजन है, और तुम किसकी पुत्री हो?

श्लोक 118 (skanda.3.99.118)

किमवध्यायसि हृदा किं वा वक्तुमिहेच्छसि ॥ इत्युक्ता सा पुनः प्राह शृणु राजेंद्रसत्तम

kimavadhyāyasi hṛdā kiṁ vā vaktumihecchasi ityuktā sā punaḥ prāha śṛṇu rājeṁdrasattama

"तुम हृदय में क्या सोच रही हो? यहाँ क्या कहना चाहती हो?" इस प्रकार पूछे जाने पर वह फिर बोली — "सुनिए, हे राजेन्द्रश्रेष्ठ!

श्लोक 119 (skanda.3.99.119)

अस्त्येको द्रविकोनाम गंधर्वाणां कुलाग्रणीः ॥ तस्याहमस्मि तनया नाम्ना चांशुमती स्मृता

astyeko dravikonāma gaṁdharvāṇāṁ kulāgraṇīḥ tasyāhamasmi tanayā nāmnā cāṁśumatī smṛtā

"गन्धर्वों के कुल में अग्रणी द्रविक नाम का एक गन्धर्व है; मैं उसकी पुत्री हूँ, मेरा नाम अंशुमती है।

श्लोक 120 (skanda.3.99.120)

त्वामायांतं विलोक्याहं त्वत्संभाषण लालसा ॥ त्यक्त्वा सखीजनं सर्वमेकैवास्मि महामते

tvāmāyāṁtaṁ vilokyāhaṁ tvatsaṁbhāṣaṇa lālasā tyaktvā sakhījanaṁ sarvamekaivāsmi mahāmate

"आपको आते देखकर मैं आपसे बातचीत के लिए लालायित हो गई; अपनी सभी सखियों को छोड़कर, हे महामते! मैं अकेली यहाँ रह गई।

श्लोक 121 (skanda.3.99.121)

सर्वसंगीतविद्यासु न मत्तोऽन्यास्ति काचन ॥ मम योगेन तुष्यंति सर्वा अपि सुरस्त्रियः

sarvasaṁgītavidyāsu na matto'nyāsti kācana mama yogena tuṣyaṁti sarvā api surastriyaḥ

"संगीत की समस्त विद्याओं में मेरे समान कोई नहीं है; मेरे संगीत से सभी देवांगनाएँ भी प्रसन्न हो जाती हैं।

श्लोक 122 (skanda.3.99.122)

साहं सर्वकलाभिज्ञा ज्ञातसर्वजनेंगिता ॥ तवाहमीप्सितं वेद्मि मयि ते संगतं मनः

sāhaṁ sarvakalābhijñā jñātasarvajaneṁgitā tavāhamīpsitaṁ vedmi mayi te saṁgataṁ manaḥ

"मैं समस्त कलाओं में निपुण हूँ, प्रत्येक व्यक्ति के मनोभावों को जानती हूँ; मैं तुम्हारी इच्छा जानती हूँ — मेरा मन तुम में लग गया है।

श्लोक 123 (skanda.3.99.123)

तथा ममापि चौत्सुक्यं दैवेन प्रतिपादितम्॥ आवयोः स्नेहभेदोऽत्र नाभिभूयादितः परम्

tathā mamāpi cautsukyaṁ daivena pratipāditam āvayoḥ snehabhedo'tra nābhibhūyāditaḥ param

"और वैसे ही मेरी उत्सुकता भी दैव द्वारा ही उत्पन्न हुई है; आज से आगे हमारे बीच स्नेह का यह बन्धन कभी न टूटे।"

श्लोक 124 (skanda.3.99.124)

इति संभाष्य तेनाशु प्रेम्णा गन्धर्वनंदिनी ॥ मुक्ताहारं ददौ तस्मै स्वकुचांतरभूषणम्

iti saṁbhāṣya tenāśu premṇā gandharvanaṁdinī muktāhāraṁ dadau tasmai svakucāṁtarabhūṣaṇam

इस प्रकार उससे बातचीत करके गन्धर्वकन्या ने शीघ्र ही प्रेमपूर्वक उसे अपने वक्षस्थल का मुक्ताहार भेंट किया।

श्लोक 125 (skanda.3.99.125)

तमादायाद्भुतं हारं स तस्याः प्रणयाकुलः ॥ गाढहर्षभरोत्सिक्तामिदमाह नृपात्मजः

tamādāyādbhutaṁ hāraṁ sa tasyāḥ praṇayākulaḥ gāḍhaharṣabharotsiktāmidamāha nṛpātmajaḥ

उस अद्भुत हार को लेकर, उसके प्रति प्रेम से व्याकुल और गहरे हर्ष से भरा हुआ राजपुत्र यह बोला —

श्लोक 126 (skanda.3.99.126)

सत्यमुक्तं त्वया भीरु तथाप्येकं वदाम्यहम् ॥ त्यक्तराज्यस्य निःस्वस्य कथं मे भवसि प्रिया

satyamuktaṁ tvayā bhīru tathāpyekaṁ vadāmyaham tyaktarājyasya niḥsvasya kathaṁ me bhavasi priyā

"हे भीरु! तुमने सत्य कहा है, फिर भी मैं एक बात कहता हूँ — राज्यहीन और निर्धन मेरी तुम कैसे प्रिया बन सकोगी?

श्लोक 127 (skanda.3.99.127)

सा त्वं पितृमती बाला विलंघ्य पितृशासनम् ॥ स्वच्छंदा चरणं कर्तुं मूढेव कथमर्हसि

sā tvaṁ pitṛmatī bālā vilaṁghya pitṛśāsanam svacchaṁdā caraṇaṁ kartuṁ mūḍheva kathamarhasi

"तुम, पिता वाली कन्या होकर, पिता की आज्ञा का उल्लंघन करके, स्वच्छन्द आचरण करना — मूढ़ों जैसा यह तुम्हें कैसे शोभा देगा?"

श्लोक 128 (skanda.3.99.128)

इति तस्य वचः श्रुत्वा तं प्रत्याह शुचिस्मिता ॥ अस्तु नाम तथैवाहं करिष्ये पश्य कौतुकम्

iti tasya vacaḥ śrutvā taṁ pratyāha śucismitā astu nāma tathaivāhaṁ kariṣye paśya kautukam

उसके ये वचन सुनकर, वह पवित्र मुस्कानवाली कन्या उससे बोली — "ऐसा ही हो, जैसा तुम कहते हो; परन्तु देखो मैं क्या कौतुक करती हूँ।

श्लोक 129 (skanda.3.99.129)

गच्छ स्वभवनं कांत परश्वः प्रातरेव तु ॥ आगच्छ पुनरत्रैव कार्यमस्ति च नो मृषा

gaccha svabhavanaṁ kāṁta paraśvaḥ prātareva tu āgaccha punaratraiva kāryamasti ca no mṛṣā

"हे प्रिय! अपने घर जाओ; परसों प्रातःकाल ही यहाँ पुनः आ जाना — यह कार्य असत्य नहीं होगा।"

श्लोक 130 (skanda.3.99.130)

इत्युक्त्वा तं नृपसुतं सा संगतसखीजना ॥ अपाक्रामत चार्वंगी स चापि नृपनन्दनः

ityuktvā taṁ nṛpasutaṁ sā saṁgatasakhījanā apākrāmata cārvaṁgī sa cāpi nṛpanandanaḥ

यह कहकर, अपनी सखियों के साथ मिलकर, वह सुन्दरी वहाँ से चली गई, और राजपुत्र भी वहाँ से चला गया।

श्लोक 131 (skanda.3.99.131)

स समभ्येत्य हर्षेण द्विजपुत्रस्य सन्निधिम् ॥ सर्वमाख्याय तेनैव सार्धं स्वभवनं ययौ

sa samabhyetya harṣeṇa dvijaputrasya sannidhim sarvamākhyāya tenaiva sārdhaṁ svabhavanaṁ yayau

वह हर्षपूर्वक ब्राह्मणकुमार के पास आया और उसे सब कुछ बताकर, उसी के साथ अपने घर गया।

श्लोक 132 (skanda.3.99.132)

तां च विप्रसतीं भूयो हर्षयित्वा नृपात्मजः ॥ परश्वो द्विजपुत्रेण सार्धं तेन वनं ययौ

tāṁ ca viprasatīṁ bhūyo harṣayitvā nṛpātmajaḥ paraśvo dvijaputreṇa sārdhaṁ tena vanaṁ yayau

उस ब्राह्मणी को पुनः प्रसन्न करके, राजपुत्र परसों ब्राह्मणकुमार के साथ उस वन में गया।

श्लोक 133 (skanda.3.99.133)

स तया पूर्वनिर्दिष्टं स्थानं प्राप्य नृपात्मजः ॥ गन्धर्वराजमद्राक्षीत्स्वदुहित्रा समन्वितम्

sa tayā pūrvanirdiṣṭaṁ sthānaṁ prāpya nṛpātmajaḥ gandharvarājamadrākṣītsvaduhitrā samanvitam

राजपुत्र, उसके द्वारा पहले बताए गए स्थान पर पहुँचकर, अपनी पुत्री सहित गन्धर्वराज को देख पाया।

श्लोक 134 (skanda.3.99.134)

स गंधर्वपतिः प्राप्तावभिनंद्य कुमारकौ ॥ उपवेश्यासने रम्ये राजपुत्रमभाषत

sa gaṁdharvapatiḥ prāptāvabhinaṁdya kumārakau upaveśyāsane ramye rājaputramabhāṣata

उस गन्धर्वपति ने आए हुए दोनों कुमारों का अभिनन्दन करके, उन्हें सुन्दर आसन पर बिठाकर, राजपुत्र से बात की।

श्लोक 135 (skanda.3.99.135)

गंधर्व उवाच ॥ राजेंद्रपुत्र पूर्वेद्युः कैलासं गतवानहम् ॥ तत्रापश्यं महादेवं पार्वत्या सहितं प्रभुम्

gaṁdharva uvāca rājeṁdraputra pūrvedyuḥ kailāsaṁ gatavānaham tatrāpaśyaṁ mahādevaṁ pārvatyā sahitaṁ prabhum

गन्धर्व ने कहा — हे राजेन्द्रपुत्र! कल मैं कैलास गया था; वहाँ मैंने पार्वती सहित प्रभु महादेव को देखा।

श्लोक 136 (skanda.3.99.136)

आहूय मां स देवेशः सर्वेषां त्रिदिवौकसाम् ॥ सन्निधावाह भगवान्करुणामृतवारिधिः

āhūya māṁ sa deveśaḥ sarveṣāṁ tridivaukasām sannidhāvāha bhagavānkaruṇāmṛtavāridhiḥ

उन देवेश, समस्त देवताओं में भी करुणा-अमृत के सागर भगवान ने मुझे बुलाकर सबके समक्ष कहा —

श्लोक 137 (skanda.3.99.137)

धर्मगुप्ताह्वयः कश्चिद्राजपुत्रोऽस्ति भूतले ॥ अकिञ्चनो भ्रष्टराज्यो हृतदेशश्च शत्रुभिः

dharmaguptāhvayaḥ kaścidrājaputro'sti bhūtale akiñcano bhraṣṭarājyo hṛtadeśaśca śatrubhiḥ

"पृथ्वी पर धर्मगुप्त नामक एक राजपुत्र है, निर्धन, राज्यभ्रष्ट, शत्रुओं द्वारा अपने देश से निकाला हुआ।

श्लोक 138 (skanda.3.99.138)

स बालो गुरुवाक्येन मदर्च्चायां रतः सदा ॥ अद्य तत्पितरः सर्वे मां प्राप्तास्तत्प्रभावतः

sa bālo guruvākyena madarccāyāṁ rataḥ sadā adya tatpitaraḥ sarve māṁ prāptāstatprabhāvataḥ

"वह बालक गुरु के वचन से सदा मेरी अर्चना में रत है; आज उसके प्रभाव से उसके समस्त पितर मुझे प्राप्त हुए हैं।

श्लोक 139 (skanda.3.99.139)

तस्य त्वमपि साहाय्यं कुरु गन्धर्वसत्तम ॥ अथासौ निजराज्यस्थो हतशत्रुर्भविष्यति

tasya tvamapi sāhāyyaṁ kuru gandharvasattama athāsau nijarājyastho hataśatrurbhaviṣyati

"उसकी तुम भी सहायता करो, हे गन्धर्वश्रेष्ठ! तब वह अपने ही राज्य में स्थित होकर शत्रुओं का नाश करेगा।"

श्लोक 140 (skanda.3.99.140)

इत्याज्ञप्तो महेशेन संप्राप्तो निजमदिरम् ॥ अनया मद्दुहित्रा च बहुशोऽभ्यर्थितस्तथा

ityājñapto maheśena saṁprāpto nijamadiram anayā madduhitrā ca bahuśo'bhyarthitastathā

इस प्रकार महेश की आज्ञा पाकर मैं अपने घर आया; और इस मेरी पुत्री ने भी मुझसे बार-बार यही प्रार्थना की।

श्लोक 141 (skanda.3.99.141)

ज्ञात्वेमं सकलं शंभोर्नियोगं करुणात्मनः ॥ आदायेमां दुहितरं प्राप्तोऽस्मीदं वनांतरम्

jñātvemaṁ sakalaṁ śaṁbhorniyogaṁ karuṇātmanaḥ ādāyemāṁ duhitaraṁ prāpto'smīdaṁ vanāṁtaram

करुणामय शम्भु की इस सम्पूर्ण आज्ञा को जानकर, इस अपनी पुत्री को लेकर मैं इस वन में आया हूँ।

श्लोक 142 (skanda.3.99.142)

अत एनां प्रयच्छामि कन्यामंशुमतीं तव ॥ हत्वा शत्रून्स्वराष्टे त्वां स्थापयामि शिवाज्ञया

ata enāṁ prayacchāmi kanyāmaṁśumatīṁ tava hatvā śatrūnsvarāṣṭe tvāṁ sthāpayāmi śivājñayā

इसलिए मैं यह अपनी कन्या अंशुमती तुम्हें देता हूँ; शत्रुओं का वध करके, शिव की आज्ञा से तुम्हें तुम्हारे राज्य में स्थापित करूँगा।

श्लोक 143 (skanda.3.99.143)

तस्मिन्पुरे त्वमनया भुक्त्वा भोगान्यथेप्सितान्॥ दशवर्षसहस्रान्ते गन्तासि गिरिशालयम् ॥ तत्रापि मम कन्येयं त्वामेव प्रतिपत्स्यते ॥ अनेनैव स्वदेहेन दिव्येन शिवसन्निधौ

tasminpure tvamanayā bhuktvā bhogānyathepsitān daśavarṣasahasrānte gantāsi giriśālayam tatrāpi mama kanyeyaṁ tvāmeva pratipatsyate anenaiva svadehena divyena śivasannidhau

उस नगर में तुम इसके साथ इच्छानुसार भोग भोगकर, दस हजार वर्षों के अन्त में गिरीश के धाम को जाओगे; वहाँ भी यह मेरी पुत्री इसी दिव्य देह से शिव के समीप तुम्हें ही प्राप्त होगी।

श्लोक 144 (skanda.3.99.144)

इति गन्धर्वराजस्तमाभाष्य नृपनन्दनम् ॥ तस्मिन्वने स्वदुहितुः पाणिग्रहमकारयत्

iti gandharvarājastamābhāṣya nṛpanandanam tasminvane svaduhituḥ pāṇigrahamakārayat

इस प्रकार गन्धर्वराज ने उस राजपुत्र से बातचीत करके, उसी वन में अपनी पुत्री का पाणिग्रहण करवाया।

श्लोक 145 (skanda.3.99.145)

पारिबर्हमदात्तस्मै रत्नभारान्महोज्ज्वलान् ॥ चूडामणिं चन्द्रनिभं मुक्ताहारांश्च भासुरान्

pāribarhamadāttasmai ratnabhārānmahojjvalān cūḍāmaṇiṁ candranibhaṁ muktāhārāṁśca bhāsurān

उसे विवाह-उपहार में महातेजस्वी रत्नों के ढेर, चन्द्रमा के समान चूड़ामणि और चमकते मुक्ताहार दिए,

श्लोक 146 (skanda.3.99.146)

दिव्यालंकारवासांसि कार्त्तस्वरपरिच्छदान् ॥ गजानामयुतं भूयो नियुतं नीलवाजिनाम्

divyālaṁkāravāsāṁsi kārttasvaraparicchadān gajānāmayutaṁ bhūyo niyutaṁ nīlavājinām

दिव्य आभूषण और वस्त्र, स्वर्ण के बर्तन, दस हजार हाथी, एक लाख नीले घोड़े,

श्लोक 147 (skanda.3.99.147)

स्यन्दनानां सहस्राणि सौवर्णानि महांति च ॥ पुनरेकं रथं दिव्यं धनुश्चेन्द्रायुधोपमम्

syandanānāṁ sahasrāṇi sauvarṇāni mahāṁti ca punarekaṁ rathaṁ divyaṁ dhanuścendrāyudhopamam

हजारों बड़े सुवर्णमय रथ, और फिर एक दिव्य रथ, इन्द्र के धनुष के समान एक धनुष,

श्लोक 148 (skanda.3.99.148)

अस्त्राणां च सहस्राणि तूणी चाक्षय्यसायकौ ॥ अभेद्यं वर्म सौवर्णं शक्तिं च रिपुमर्दिनीम्

astrāṇāṁ ca sahasrāṇi tūṇī cākṣayyasāyakau abhedyaṁ varma sauvarṇaṁ śaktiṁ ca ripumardinīm

हजारों अस्त्र, दो अक्षय तूणीर, अभेद्य सुवर्ण कवच, तथा शत्रुनाशक शक्ति भी दी।

श्लोक 149 (skanda.3.99.149)

दुहितुः परिचर्यार्थं दासीपञ्चसहस्रकम् ॥ ददौ प्रीतमनास्तस्मै धनानि विविधानि च

duhituḥ paricaryārthaṁ dāsīpañcasahasrakam dadau prītamanāstasmai dhanāni vividhāni ca

पुत्री की सेवा के लिए पाँच हजार दासियाँ दीं, और प्रसन्नचित्त होकर उसे विविध प्रकार के धन भी दिए।

श्लोक 150 (skanda.3.99.150)

गंधर्वसैन्यमत्युग्रं चतुरंगसममन्वितम् ॥ पुनश्च तत्सहायार्थे गन्धर्वाधिपतिर्ददौ

gaṁdharvasainyamatyugraṁ caturaṁgasamamanvitam punaśca tatsahāyārthe gandharvādhipatirdadau

गन्धर्वराज ने पुनः उसकी सहायता के लिए चतुरंगिणी अत्यन्त उग्र गन्धर्व-सेना भी दी।

श्लोक 151 (skanda.3.99.151)

इत्थं राजेन्द्रतनयः संप्राप्तः श्रियमुत्तमाम् ॥ अभीष्टजायासहितो मुमुदे निजसंपदा

itthaṁ rājendratanayaḥ saṁprāptaḥ śriyamuttamām abhīṣṭajāyāsahito mumude nijasaṁpadā

इस प्रकार वह राजपुत्र परम श्री को प्राप्त हुआ; अभीष्ट पत्नी सहित अपनी सम्पदा से आनन्दित हुआ।

श्लोक 152 (skanda.3.99.152)

कारयित्वा स्वदुहितुर्विवाहं समयोचितम् ॥ ययौ विमानमारुह्य गंधर्वाधिपतिर्दिवम्

kārayitvā svaduhiturvivāhaṁ samayocitam yayau vimānamāruhya gaṁdharvādhipatirdivam

अपनी पुत्री का विवाह विधिपूर्वक सम्पन्न कराकर, गन्धर्वराज विमान पर चढ़कर स्वर्ग को चला गया।

श्लोक 153 (skanda.3.99.153)

धर्मगुप्तः कृतोद्वाहः सह गंधर्वसेनया ॥ पुनः स्वनगरं प्राप्य जघान रिपुवाहिनीम्

dharmaguptaḥ kṛtodvāhaḥ saha gaṁdharvasenayā punaḥ svanagaraṁ prāpya jaghāna ripuvāhinīm

विवाहित हुआ धर्मगुप्त, गन्धर्व-सेना सहित पुनः अपने नगर पहुँचकर शत्रु-सेना का नाश कर दिया।

श्लोक 154 (skanda.3.99.154)

दुर्धर्षणं रणे हत्वा शक्त्या गंधर्वसेनया ॥ निः शेषितारातिबलः प्रविवेश निजं पुरम्

durdharṣaṇaṁ raṇe hatvā śaktyā gaṁdharvasenayā niḥ śeṣitārātibalaḥ praviveśa nijaṁ puram

गन्धर्व-सेना की शक्ति से दुर्धर्ष शत्रु को युद्ध में मारकर, शत्रुओं की समस्त शक्ति समाप्त करके उसने अपने नगर में प्रवेश किया।

श्लोक 155 (skanda.3.99.155)

ततोभिषिक्तः सचिवैर्ब्राह्मणैश्च महोत्तमैः ॥ रत्नसिंहासनारूढश्चक्रे राज्यमकण्टकम्

tatobhiṣiktaḥ sacivairbrāhmaṇaiśca mahottamaiḥ ratnasiṁhāsanārūḍhaścakre rājyamakaṇṭakam

फिर मन्त्रियों और श्रेष्ठ ब्राह्मणों द्वारा अभिषिक्त होकर, रत्नसिंहासन पर आरूढ़ होकर, उसने निष्कण्टक राज्य किया।

श्लोक 156 (skanda.3.99.156)

या विप्रवनिता पूर्वं तमपुष्णात्स्वपुत्रवत् ॥ सैव माताभवत्तस्य स भ्राता द्विजनन्दनः

yā vipravanitā pūrvaṁ tamapuṣṇātsvaputravat saiva mātābhavattasya sa bhrātā dvijanandanaḥ

जो ब्राह्मणी पहले उसे अपने पुत्र के समान पालती थी, वही उसकी माता बनी, और उसका ब्राह्मणकुमार पुत्र उसका भाई बना।

श्लोक 157 (skanda.3.99.157)

गंधर्वतनया जाया विदर्भनगरेश्वरः ॥ आराध्य देवं गिरिशं धर्मगुप्तो नृपोऽभवत्

gaṁdharvatanayā jāyā vidarbhanagareśvaraḥ ārādhya devaṁ giriśaṁ dharmagupto nṛpo'bhavat

गन्धर्वकन्या को पत्नी बनाकर, गिरीश देव की आराधना करके, धर्मगुप्त विदर्भ नगर का स्वामी राजा बना।

श्लोक 158 (skanda.3.99.158)

एवमन्ये समाराध्य प्रदोषे गिरिजापतिम् ॥ लभंतेभीप्सितान्कामान्देहांते तु परां गतिम्

evamanye samārādhya pradoṣe girijāpatim labhaṁtebhīpsitānkāmāndehāṁte tu parāṁ gatim

इस प्रकार अन्य लोग भी प्रदोष में गिरिजापति की आराधना करके अभीष्ट कामनाओं को प्राप्त करते हैं, और देहान्त में परम गति को प्राप्त होते हैं।

श्लोक 159 (skanda.3.99.159)

सूत उवाच ॥ एतन्महाव्रतं पुण्यं प्रदोषे शंकरार्चनम् ॥ धर्मार्थकाममोक्षाणां यदेतत्साधनं परम्

sūta uvāca etanmahāvrataṁ puṇyaṁ pradoṣe śaṁkarārcanam dharmārthakāmamokṣāṇāṁ yadetatsādhanaṁ param

सूत जी ने कहा — यह प्रदोष में शंकर की अर्चना नामक पवित्र महाव्रत, धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का यह परम साधन है।

श्लोक 160 (skanda.3.99.160)

य एतच्छृणुयात्पुण्यं माहात्म्यं परमाद्भुतम् ॥ प्रदोषे शिवपूजांते कथयेद्वा समाहितः

ya etacchṛṇuyātpuṇyaṁ māhātmyaṁ paramādbhutam pradoṣe śivapūjāṁte kathayedvā samāhitaḥ

जो इस पवित्र और परम अद्भुत माहात्म्य को सुनता है, अथवा प्रदोष में शिवपूजा के अन्त में एकाग्रचित्त होकर इसे कहता है,

श्लोक 161 (skanda.3.99.161)

भवेन्न तस्य दारिद्र्यं जन्मान्तरशतेष्वपि ॥ ज्ञानैश्वर्यसमायुक्तः सोन्ते शिवपुरं व्रजेत्

bhavenna tasya dāridryaṁ janmāntaraśateṣvapi jñānaiśvaryasamāyuktaḥ sonte śivapuraṁ vrajet

उसे सैकड़ों जन्मों में भी दरिद्रता नहीं होती; ज्ञान और ऐश्वर्य से युक्त होकर वह अन्त में शिवपुर को जाता है।

श्लोक 162 (skanda.3.99.162)

ये प्राप्य दुर्लभतरं मनुजाः शरीरं कुर्वंति हंत परमेश्वरपादपूजाम् ॥ धन्यास्त एव निजपुण्यजितत्रिलोकास्तेषां पदांबुजरजो भुवनं पुनाति

ye prāpya durlabhataraṁ manujāḥ śarīraṁ kurvaṁti haṁta parameśvarapādapūjām dhanyāsta eva nijapuṇyajitatrilokāsteṣāṁ padāṁbujarajo bhuvanaṁ punāti

जो मनुष्य इस अत्यन्त दुर्लभ शरीर को पाकर परमेश्वर के चरणों की पूजा करते हैं — धन्य हैं वे ही, जिन्होंने अपने पुण्य से तीनों लोकों को जीत लिया है; उनके चरणकमलों की धूल संसार को पवित्र करती है।

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