ब्रह्म खण्ड · अध्याय 98
प्रदोष माहात्म्य का वर्णन
श्लोक 1 (skanda.3.98.1)
॥ ऋषय ऊचुः ॥ यदुक्तं भवता सूत महदाख्यानमद्भुतम् ॥ शम्भोर्माहात्म्यकथनमशेषाघहरं परम्
ṛṣaya ūcuḥ yaduktaṁ bhavatā sūta mahadākhyānamadbhutam śambhormāhātmyakathanamaśeṣāghaharaṁ param
ऋषियों ने कहा — हे सूत! आपने वह महान और अद्भुत आख्यान, शम्भु की समस्त पापनाशक परम माहात्म्य-कथा, हमें सुनाई।
श्लोक 2 (skanda.3.98.2)
भूयोपि श्रोतुमिच्छामस्तदेव सुसमाहिताः ॥ प्रदोषे भगवाञ्छंभुः पूजितस्तु महात्मभिः
bhūyopi śrotumicchāmastadeva susamāhitāḥ pradoṣe bhagavāñchaṁbhuḥ pūjitastu mahātmabhiḥ
हम पुनः, चित्त को एकाग्र करके, वही सुनना चाहते हैं — कि प्रदोष के समय महात्माओं द्वारा पूजित भगवान शम्भु,
श्लोक 3 (skanda.3.98.3)
संप्रयच्छति कां सिद्धिमेतन्नो ब्रूहि सुव्रत ॥ श्रुतमप्यसकृत्सूत भूयस्तृष्णा प्रवर्धते
saṁprayacchati kāṁ siddhimetanno brūhi suvrata śrutamapyasakṛtsūta bhūyastṛṣṇā pravardhate
...कौन-सी सिद्धि प्रदान करते हैं, हे सुव्रत! यह हमें बताइए। हे सूत! बार-बार सुनकर भी हमारी उत्कण्ठा और बढ़ती जाती है।
श्लोक 4 (skanda.3.98.4)
सूत उवाच ॥ साधु पृष्टं महाप्राज्ञा भवद्भिर्लोकविश्रुतैः ॥ अतोऽहं संप्रवक्ष्यामि शिवपूजाफलं महत्
sūta uvāca sādhu pṛṣṭaṁ mahāprājñā bhavadbhirlokaviśrutaiḥ ato'haṁ saṁpravakṣyāmi śivapūjāphalaṁ mahat
सूत जी ने कहा — हे महाप्राज्ञो, लोकविख्यात मुनियो! आपने भली भाँति प्रश्न किया है। अतः अब मैं शिवपूजा का महान फल कहूँगा।
श्लोक 5 (skanda.3.98.5)
त्रयोदश्यां तिथौ सायं प्रदोषः परिकीर्त्तितः ॥ तत्र पूज्यो महादेवो नान्यो देवः फलार्थिभिः
trayodaśyāṁ tithau sāyaṁ pradoṣaḥ parikīrttitaḥ tatra pūjyo mahādevo nānyo devaḥ phalārthibhiḥ
त्रयोदशी तिथि की सायंकाल प्रदोष कही गई है। उस समय फल चाहने वालों के लिए महादेव ही पूज्य हैं, अन्य कोई देवता नहीं।
श्लोक 6 (skanda.3.98.6)
प्रदोषपूजामाहात्म्यं को नु वर्णयितुं क्षमः ॥ यत्र सर्वेऽपि विबुधास्तिष्ठंति गिरिशांतिके
pradoṣapūjāmāhātmyaṁ ko nu varṇayituṁ kṣamaḥ yatra sarve'pi vibudhāstiṣṭhaṁti giriśāṁtike
प्रदोष-पूजा के माहात्म्य का वर्णन करने में भला कौन समर्थ है, जिस समय समस्त देवगण भी गिरीश (शिव) के समीप उपस्थित रहते हैं?
श्लोक 7 (skanda.3.98.7)
प्रदोषसमये देवः कैलासे रजतालये ॥ करोति नृत्यं विबुधैरभिष्टुतगुणोदयः
pradoṣasamaye devaḥ kailāse rajatālaye karoti nṛtyaṁ vibudhairabhiṣṭutaguṇodayaḥ
प्रदोष के समय भगवान शिव, जिनके गुणों का उदय देवताओं द्वारा स्तुत होता है, कैलास के रजतमय भवन में नृत्य करते हैं।
श्लोक 8 (skanda.3.98.8)
अतः पूजा जपो होमस्तत्कथास्तद्गुणस्तवः ॥ कर्त्तव्यो नियतं मर्त्यैश्चतुर्वर्गफला र्थिभिः
ataḥ pūjā japo homastatkathāstadguṇastavaḥ karttavyo niyataṁ martyaiścaturvargaphalā rthibhiḥ
अतः चारों पुरुषार्थों का फल चाहने वाले मनुष्यों को नियमपूर्वक पूजा, जप, होम, उनकी कथा और उनके गुणों की स्तुति करनी चाहिए।
श्लोक 9 (skanda.3.98.9)
दारिद्यतिमिरांधानां मर्त्यानां भवभीरुणाम् ॥ भवसागरमग्नानां प्लवोऽयं पारदर्शनः
dāridyatimirāṁdhānāṁ martyānāṁ bhavabhīruṇām bhavasāgaramagnānāṁ plavo'yaṁ pāradarśanaḥ
दरिद्रता के अंधकार से अंधे, संसार से भयभीत और भवसागर में डूबे हुए मनुष्यों के लिए यह प्रदोष-पूजा पार दिखाने वाली नौका है।
श्लोक 10 (skanda.3.98.10)
दुःखशोकभयार्त्तानां क्लेशनिर्वाणमिच्छताम् ॥ प्रदोषे पार्वतीशस्य पूजनं मंगलायनम्
duḥkhaśokabhayārttānāṁ kleśanirvāṇamicchatām pradoṣe pārvatīśasya pūjanaṁ maṁgalāyanam
दुःख, शोक और भय से पीड़ित, क्लेश की निवृत्ति चाहने वालों के लिए प्रदोष में पार्वतीपति का पूजन मंगल का आश्रय है।
श्लोक 11 (skanda.3.98.11)
दुर्बुद्धिरपि नीचोपि मन्दभाग्यः शठोऽपि वा ॥ प्रदोषे पूज्य देवेशं विपद्भ्यः स प्रमुच्यते
durbuddhirapi nīcopi mandabhāgyaḥ śaṭho'pi vā pradoṣe pūjya deveśaṁ vipadbhyaḥ sa pramucyate
दुर्बुद्धि, नीच, मंदभाग्य अथवा दुष्ट भी यदि प्रदोष में देवेश की पूजा करे, तो वह सभी विपत्तियों से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 12 (skanda.3.98.12)
शत्रुभिर्हन्यमानोऽपि दश्यमानोपि पन्नगैः ॥ शैलैराक्रम्यमाणोऽपि पतितोऽपि महांबुधौ
śatrubhirhanyamāno'pi daśyamānopi pannagaiḥ śailairākramyamāṇo'pi patito'pi mahāṁbudhau
शत्रुओं द्वारा मारा जाता हुआ, सर्पों से डँसा जाता हुआ, पर्वतों से दबाया जाता हुआ, महासागर में गिरा हुआ भी —
श्लोक 13 (skanda.3.98.13)
आविद्धकालदण्डोऽपि नानारोगहतोऽपि वा ॥ न विनश्यति मर्त्योऽसौ प्रदोषे गिरिशार्चनात्
āviddhakāladaṇḍo'pi nānārogahato'pi vā na vinaśyati martyo'sau pradoṣe giriśārcanāt
काल के दण्ड से आहत अथवा नाना रोगों से पीड़ित मनुष्य भी, प्रदोष में गिरीश की अर्चना से नष्ट नहीं होता।
श्लोक 14 (skanda.3.98.14)
दारिद्र्यं मरणं दुःखमृणभारं नगोपमम् ॥ सद्यो विधूय संपद्भिः पूज्यते शिवपूजनात्
dāridryaṁ maraṇaṁ duḥkhamṛṇabhāraṁ nagopamam sadyo vidhūya saṁpadbhiḥ pūjyate śivapūjanāt
दरिद्रता, मृत्यु, दुःख और पर्वत के समान भारी ऋण — ये सब शिवपूजन से तत्काल दूर होकर मनुष्य सम्पत्तिशाली बन जाता है।
श्लोक 15 (skanda.3.98.15)
अत्र वक्ष्ये महापुण्यमितिहासं पुरातनम् ॥ यं श्रुत्वा मनुजाः सर्वे प्रयांति कृतकृत्यताम्
atra vakṣye mahāpuṇyamitihāsaṁ purātanam yaṁ śrutvā manujāḥ sarve prayāṁti kṛtakṛtyatām
यहाँ मैं एक अत्यन्त पुण्यमय पुरातन इतिहास कहूँगा, जिसे सुनकर सभी मनुष्य कृतकृत्य हो जाते हैं।
श्लोक 16 (skanda.3.98.16)
आसीद्विदर्भविषये नाम्ना सत्यरथो नृपः ॥ सर्वधर्मरतो धीरः सुशीलः सत्यसंगरः
āsīdvidarbhaviṣaye nāmnā satyaratho nṛpaḥ sarvadharmarato dhīraḥ suśīlaḥ satyasaṁgaraḥ
विदर्भ देश में सत्यरथ नामक राजा था — धीर, सभी धर्मों में अनुरक्त, सुशील और सत्यप्रतिज्ञ।
श्लोक 17 (skanda.3.98.17)
तस्य पालयतो भूमिं धर्मेण मुनिपुंगवाः ॥ व्यतीयाय महान्कालः सुखेनैव महामतेः
tasya pālayato bhūmiṁ dharmeṇa munipuṁgavāḥ vyatīyāya mahānkālaḥ sukhenaiva mahāmateḥ
हे मुनिश्रेष्ठ! उस महामति राजा के धर्मपूर्वक भूमि का पालन करते हुए सुखपूर्वक बहुत काल बीत गया।
श्लोक 18 (skanda.3.98.18)
अथ तस्य महीभर्तुर्बभूवुः शाल्वभूभुजः ॥ शत्रवश्चोद्धतबला दुर्मर्षणपुरोगमाः
atha tasya mahībharturbabhūvuḥ śālvabhūbhujaḥ śatravaścoddhatabalā durmarṣaṇapurogamāḥ
फिर उस राजा के शाल्व देश के राजा शत्रु बन गए, जो अत्यन्त बलशाली और दुर्दम्य नेतृत्व वाले थे।
श्लोक 19 (skanda.3.98.19)
कदाचिदथ ते शाल्वाः संनद्धबहुसैनिकाः ॥ विदर्भनगरीं प्राप्य रुरुधुर्विजिगीषवः
kadācidatha te śālvāḥ saṁnaddhabahusainikāḥ vidarbhanagarīṁ prāpya rurudhurvijigīṣavaḥ
एक बार वे शाल्व राजा बड़ी सेना सजाकर विजय की इच्छा से विदर्भ नगरी में आकर उसे घेर बैठे।
श्लोक 20 (skanda.3.98.20)
दृष्ट्वा निरुद्ध्यमानां तां विदर्भाधिपतिः पुरीम् ॥ योद्धुमभ्याययौ तूर्णं बलेन महता वृतः
dṛṣṭvā niruddhyamānāṁ tāṁ vidarbhādhipatiḥ purīm yoddhumabhyāyayau tūrṇaṁ balena mahatā vṛtaḥ
अपनी नगरी को घिरा देखकर विदर्भाधिपति विशाल सेना के साथ युद्ध करने के लिए तुरन्त निकल पड़े।
श्लोक 21 (skanda.3.98.21)
तस्य तैरभवयुद्धं शाल्वैरपि बलोद्धतैः ॥ पाताले पन्नगेन्द्रस्य गन्धर्वैरिव दुर्मदैः
tasya tairabhavayuddhaṁ śālvairapi baloddhataiḥ pātāle pannagendrasya gandharvairiva durmadaiḥ
उन बलोद्धत शाल्वों के साथ उनका ऐसा युद्ध हुआ जैसे पाताल में नागराज का उन्मत्त गन्धर्वों से युद्ध हुआ हो।
श्लोक 22 (skanda.3.98.22)
विदर्भनृपतिः सोऽथ कृत्वा युद्धं सुदारुणम् ॥ प्रनष्टोरुबलैः शाल्वैर्निहतो रणमूर्धनि
vidarbhanṛpatiḥ so'tha kṛtvā yuddhaṁ sudāruṇam pranaṣṭorubalaiḥ śālvairnihato raṇamūrdhani
तब विदर्भ का राजा अत्यन्त भीषण युद्ध करके, शाल्वों की विशाल सेना का नाश करते हुए भी, रणभूमि में मारा गया।
श्लोक 23 (skanda.3.98.23)
तस्मिन्महारथे वीरे निहते मंत्रिभिः सह ॥ दुद्रुवुः समरे भग्ना हतशेषाश्च सैनिकाः
tasminmahārathe vīre nihate maṁtribhiḥ saha dudruvuḥ samare bhagnā hataśeṣāśca sainikāḥ
जब वह महारथी वीर अपने मन्त्रियों सहित मारा गया, तो युद्ध में टूटे हुए शेष सैनिक भाग खड़े हुए।
श्लोक 24 (skanda.3.98.24)
अथ युद्धेभिविरते नदत्सु रिपुमंत्रिषु ॥ नगर्यां युद्ध्यमानायां जाते कोलाहले रवे
atha yuddhebhivirate nadatsu ripumaṁtriṣu nagaryāṁ yuddhyamānāyāṁ jāte kolāhale rave
फिर जब युद्ध थमा और शत्रु के मन्त्री गरज रहे थे, नगरी पर आक्रमण होते हुए महान कोलाहल मच गया।
श्लोक 25 (skanda.3.98.25)
तस्य सत्यरथस्यैका विदर्भाधिपतेः सती ॥ भूरिशोकसमाविष्टा क्वचिद्यत्नाद्विनिर्ययौ
tasya satyarathasyaikā vidarbhādhipateḥ satī bhūriśokasamāviṣṭā kvacidyatnādviniryayau
उस विदर्भाधिपति सत्यरथ की एक पतिव्रता रानी, अत्यन्त शोकाकुल होकर, किसी प्रकार प्रयत्नपूर्वक वहाँ से निकल गई।
श्लोक 26 (skanda.3.98.26)
सा निशासमये यत्नादंतर्वत्नी नृपांगना ॥ निर्गता शोक संतप्ता प्रतीचीं प्रययौ दिशम्
sā niśāsamaye yatnādaṁtarvatnī nṛpāṁganā nirgatā śoka saṁtaptā pratīcīṁ prayayau diśam
वह गर्भवती रानी रात्रि के समय शोकसंतप्त होकर किसी तरह नगरी से निकलकर पश्चिम दिशा की ओर चल पड़ी।
श्लोक 27 (skanda.3.98.27)
अथ प्रभाते मार्गेण गच्छन्ती शनकैः सती ॥ अतीत्य दूरमध्वानं ददर्श विमलं सरः
atha prabhāte mārgeṇa gacchantī śanakaiḥ satī atītya dūramadhvānaṁ dadarśa vimalaṁ saraḥ
फिर प्रातःकाल वह पतिव्रता धीरे-धीरे मार्ग पर चलती हुई, बहुत दूरी तय करके, एक निर्मल सरोवर देख पाई।
श्लोक 28 (skanda.3.98.28)
तत्रागत्य वरारोहा तप्ता तापेन भूयसा ॥ विलसंतं सरस्तीरे छायावृक्षं समाश्रयत्
tatrāgatya varārohā taptā tāpena bhūyasā vilasaṁtaṁ sarastīre chāyāvṛkṣaṁ samāśrayat
वहाँ पहुँचकर वह सुन्दरी, अत्यन्त ताप से संतप्त, सरोवर के तट पर सुशोभित एक छायादार वृक्ष का आश्रय लिया।
श्लोक 29 (skanda.3.98.29)
तत्र दैववशाद्राज्ञी विजने तरुकुट्टिमे ॥ असूत तनयं साध्वी मूहूर्ते सद्गुणान्विते
tatra daivavaśādrājñī vijane tarukuṭṭime asūta tanayaṁ sādhvī mūhūrte sadguṇānvite
वहाँ दैव के वशीभूत होकर वह साध्वी रानी उस निर्जन वृक्ष-तल में शुभ मुहूर्त में एक पुत्र को जन्म दिया।
श्लोक 30 (skanda.3.98.30)
अथ सा राजमहिषी पिपासाभिहता भृशम् ॥ सरोऽवतीर्णा चार्वंगी ग्रस्ता ग्राहेण भूयसा
atha sā rājamahiṣī pipāsābhihatā bhṛśam saro'vatīrṇā cārvaṁgī grastā grāheṇa bhūyasā
फिर वह राजरानी अत्यन्त प्यास से व्याकुल होकर सुन्दरांगी सरोवर में उतरी और वहीं एक विशाल मगर ने उसे पकड़ लिया।
श्लोक 31 (skanda.3.98.31)
जातमात्रः कुमारोऽपि विनष्टपितृमातृकः ॥ रुरोदोच्चैः सरस्तीरे क्षुत्पिपासार्दितोऽबलः
jātamātraḥ kumāro'pi vinaṣṭapitṛmātṛkaḥ rurodoccaiḥ sarastīre kṣutpipāsārdito'balaḥ
अभी-अभी जन्मा वह बालक, माता-पिता दोनों से रहित होकर, भूख-प्यास से पीड़ित, सरोवर के तट पर जोर-जोर से रोने लगा।
श्लोक 32 (skanda.3.98.32)
तस्मिन्नेवं क्रन्दमाने जातमात्रे कुमारके ॥ काचिदभ्याययौ शीघ्रं दिष्ट्या विप्रवरांगना
tasminnevaṁ krandamāne jātamātre kumārake kācidabhyāyayau śīghraṁ diṣṭyā vipravarāṁganā
उस नवजात बालक के इस प्रकार क्रन्दन करते समय, सौभाग्य से कोई ब्राह्मणी शीघ्र ही वहाँ आ पहुँची।
श्लोक 33 (skanda.3.98.33)
साप्येकहायनं बालमुद्वहन्ती निजात्मजम् ॥ अधना भर्तृरहिता याचमाना गृहेगृहे
sāpyekahāyanaṁ bālamudvahantī nijātmajam adhanā bhartṛrahitā yācamānā gṛhegṛhe
वह भी अपने एक वर्ष के पुत्र को गोद में लिए हुए थी, निर्धन थी, पति से रहित थी, और घर-घर भिक्षा माँगती फिरती थी।
श्लोक 34 (skanda.3.98.34)
एकात्मजा बंधुहीना याञ्चामार्गवशंगता॥ उमानाम द्विजसतीददर्श नृपनंदनम्
ekātmajā baṁdhuhīnā yāñcāmārgavaśaṁgatā umānāma dvijasatīdadarśa nṛpanaṁdanam
एकमात्र पुत्रवाली, बन्धुहीन, भिक्षा के मार्ग पर पड़ी उमा नामक उस ब्राह्मणी सती ने राजपुत्र को देखा।
श्लोक 35 (skanda.3.98.35)
सा दृष्ट्वा राजतनयं सूर्यबिंवमिव च्युतम्॥ अनाथमेनं क्रंदंतं चिंतयामास भूरिशः
sā dṛṣṭvā rājatanayaṁ sūryabiṁvamiva cyutam anāthamenaṁ kraṁdaṁtaṁ ciṁtayāmāsa bhūriśaḥ
सूर्य के गिरे हुए बिम्ब के समान उस राजकुमार को अनाथ और रोता हुआ देखकर वह बहुत देर तक सोचती रही।
श्लोक 36 (skanda.3.98.36)
अहो सुमहदाश्चर्यमिदं दृष्टं मयाधुना ॥ अच्छिन्ननाभिसूत्रोऽयं शिशुर्माता क्व वा गता
aho sumahadāścaryamidaṁ dṛṣṭaṁ mayādhunā acchinnanābhisūtro'yaṁ śiśurmātā kva vā gatā
"अहो, यह कितना बड़ा आश्चर्य मैंने अभी देखा है! इस शिशु की नाभि-नाल तक नहीं कटी है — इसकी माता कहाँ चली गई?"
श्लोक 37 (skanda.3.98.37)
पिता नास्ति न चान्योस्ति नास्ति बंधुजनोऽपि वा ॥ अनाथः कृपणो बालः शेते केवल भूतले
pitā nāsti na cānyosti nāsti baṁdhujano'pi vā anāthaḥ kṛpaṇo bālaḥ śete kevala bhūtale
"न पिता है, न कोई और, न कोई बन्धुजन ही — यह अनाथ, दीन बालक अकेला धरती पर पड़ा है।"
श्लोक 38 (skanda.3.98.38)
एष चांडालजो वापि शूद्रजो वैश्यजोपि वा ॥ विप्रात्मजो वा नृपजो ज्ञायते कथमर्भकः
eṣa cāṁḍālajo vāpi śūdrajo vaiśyajopi vā viprātmajo vā nṛpajo jñāyate kathamarbhakaḥ
"यह चाण्डाल का पुत्र है या शूद्र का, वैश्य का है या ब्राह्मण अथवा राजा का पुत्र है — यह कैसे जाना जाए?"
श्लोक 39 (skanda.3.98.39)
शिशुमेनं समुद्धृत्य पुष्णाम्यौरसवद्ध्रुवम् ॥ किं त्वविज्ञातकुलजं नोत्सहे स्प्रष्टुमुत्तमम्
śiśumenaṁ samuddhṛtya puṣṇāmyaurasavaddhruvam kiṁ tvavijñātakulajaṁ notsahe spraṣṭumuttamam
"इस शिशु को उठाकर मैं निश्चय ही अपने ही पुत्र के समान पाल सकती हूँ — किन्तु कुल अज्ञात होने से, मैं उत्तम होते हुए भी इसे छूने का साहस नहीं कर पा रही।"
श्लोक 40 (skanda.3.98.40)
इति मीमांसमानायां तस्यां विप्रवरस्त्रियाम्
iti mīmāṁsamānāyāṁ tasyāṁ vipravarastriyām
इस प्रकार वह श्रेष्ठ ब्राह्मणी मन में विचार कर ही रही थी...
श्लोक 41 (skanda.3.98.41)
कश्चित्समाययौ भिक्षुः साक्षाद्देवः शिवः स्वयम् ॥ तामाह भिक्षुवर्योथ विप्रभामिनि मा खिदः
kaścitsamāyayau bhikṣuḥ sākṣāddevaḥ śivaḥ svayam tāmāha bhikṣuvaryotha viprabhāmini mā khidaḥ
...कि तभी एक भिक्षु वहाँ आ पहुँचा — जो साक्षात् स्वयं भगवान शिव ही थे। उस श्रेष्ठ भिक्षु ने उससे कहा — "हे ब्राह्मणी! खिन्न मत हो।"
श्लोक 42 (skanda.3.98.42)
रक्षैनं बालकं सुभ्रुर्विसृज्य हृदि संशयम्॥ अनेन परमं श्रेयः प्राप्स्यसे ह्यचिरादेिह
rakṣainaṁ bālakaṁ subhrurvisṛjya hṛdi saṁśayam anena paramaṁ śreyaḥ prāpsyase hyacirādeiha
"हे सुभ्रु! हृदय का संशय त्यागकर इस बालक की रक्षा करो। इसी के द्वारा तुम शीघ्र ही परम कल्याण प्राप्त करोगी।"
श्लोक 43 (skanda.3.98.43)
एतावदुक्त्वा त्वरितो भिक्षुः कारुणिको ययौ ॥ अथ तस्मिन्गते भिक्षौ विश्रब्धा विप्रभामिनी
etāvaduktvā tvarito bhikṣuḥ kāruṇiko yayau atha tasmingate bhikṣau viśrabdhā viprabhāminī
इतना कहकर वह करुणामय भिक्षु शीघ्र ही चला गया। फिर भिक्षु के जाने पर, वह ब्राह्मणी विश्वस्त होकर,
श्लोक 44 (skanda.3.98.44)
तमर्भकं समादाय निजमेव गृहं ययौ ॥ भिक्षुवाक्येन विश्रब्धा सा राज तनयं सती
tamarbhakaṁ samādāya nijameva gṛhaṁ yayau bhikṣuvākyena viśrabdhā sā rāja tanayaṁ satī
...उस शिशु को लेकर अपने घर चली गई। भिक्षु के वचन से आश्वस्त होकर उस सती ने उस राजपुत्र को साथ ले लिया।
श्लोक 45 (skanda.3.98.45)
आत्मपुत्रेण सदृशं कृपया पर्यपोषयत्॥ एकचक्राह्वये रम्ये ग्रामे कृतनिकेतना
ātmaputreṇa sadṛśaṁ kṛpayā paryapoṣayat ekacakrāhvaye ramye grāme kṛtaniketanā
उसने कृपापूर्वक उसे अपने ही पुत्र के समान पाला, तथा एकचक्रा नामक सुन्दर ग्राम में अपना निवास बना लिया।
श्लोक 46 (skanda.3.98.46)
स्वपुत्रं राजपुत्रं च भिक्षान्नेन व्यवर्धयत् ॥ ब्राह्मणीतनयश्चैव स राजतनयस्तथा
svaputraṁ rājaputraṁ ca bhikṣānnena vyavardhayat brāhmaṇītanayaścaiva sa rājatanayastathā
उसने अपने पुत्र और उस राजपुत्र दोनों को भिक्षा के अन्न से पाला-पोसा — ब्राह्मणी का पुत्र और वह राजपुत्र दोनों।
श्लोक 47 (skanda.3.98.47)
ब्राह्मणैः कृतसंस्कारौ ववृधाते सुपूजितौ॥ कृतोपनयनौ काले बालकौ नियमे स्थितौ
brāhmaṇaiḥ kṛtasaṁskārau vavṛdhāte supūjitau kṛtopanayanau kāle bālakau niyame sthitau
ब्राह्मणों द्वारा संस्कार किए जाने पर वे दोनों सम्मानपूर्वक बड़े हुए; समय आने पर उनका उपनयन संस्कार भी हुआ, और वे नियमपूर्वक रहने लगे।
श्लोक 48 (skanda.3.98.48)
भिक्षार्थं चेरतुस्तत्र मात्रा सह दिनेदिने ॥ ताभ्यां कदाचिद्बालाभ्यां सा विप्रवनिता सह
bhikṣārthaṁ ceratustatra mātrā saha dinedine tābhyāṁ kadācidbālābhyāṁ sā vipravanitā saha
वे दोनों बालक प्रतिदिन अपनी माता के साथ भिक्षा के लिए घूमते थे। एक बार उन दोनों बालकों सहित वह ब्राह्मणी,
श्लोक 49 (skanda.3.98.49)
भैक्ष्यं चरंती दैवेन प्रविष्टा देवतालयम्॥ तत्र वृद्धैः समाकीर्णे मुनिभिर्देवतालये
bhaikṣyaṁ caraṁtī daivena praviṣṭā devatālayam tatra vṛddhaiḥ samākīrṇe munibhirdevatālaye
...भिक्षा माँगती हुई दैवयोग से एक देवमन्दिर में प्रविष्ट हुई; वहाँ वृद्ध मुनियों से भरे उस मन्दिर में,
श्लोक 50 (skanda.3.98.50)
तौ दृष्ट्वा बालकौ धीमाञ्छांडिल्यो मुनिरब्रवीत् ॥ अहो दैवबलं चित्रमहो कर्म दुरत्ययम्
tau dṛṣṭvā bālakau dhīmāñchāṁḍilyo munirabravīt aho daivabalaṁ citramaho karma duratyayam
...उन दोनों बालकों को देखकर बुद्धिमान शाण्डिल्य मुनि बोले — "अहो, दैव का बल कैसा विचित्र है! अहो, कर्म कितना दुरतिक्रम्य है!"
श्लोक 51 (skanda.3.98.51)
एष बालोऽन्यजननीं श्रितो भैक्ष्येण जीवति ॥ इमामेव द्विजवधूं प्राप्य मातरमुत्तमाम्
eṣa bālo'nyajananīṁ śrito bhaikṣyeṇa jīvati imāmeva dvijavadhūṁ prāpya mātaramuttamām
"यह बालक दूसरी माता की शरण लेकर भिक्षा से जीवित है — इसी ब्राह्मण-पत्नी को उत्तम माता पाकर,"
श्लोक 52 (skanda.3.98.52)
सहैव द्विजपुत्रेण द्विजभावं समाश्रितः ॥ इति श्रुत्वा मुनेर्वाक्यं शांडिल्यस्य द्विजांगना
sahaiva dvijaputreṇa dvijabhāvaṁ samāśritaḥ iti śrutvā munervākyaṁ śāṁḍilyasya dvijāṁganā
"...ब्राह्मण-पुत्र के साथ ही यह ब्राह्मणत्व को प्राप्त हो गया है।" मुनि शाण्डिल्य के इन वचनों को सुनकर वह ब्राह्मणी,
श्लोक 53 (skanda.3.98.53)
सा प्रणम्य सभामध्ये पर्यपृच्छत्सविस्मया ॥ ब्रह्मन्नेषोर्भको नीतो मया भिक्षोर्गिरा गृहम्
sā praṇamya sabhāmadhye paryapṛcchatsavismayā brahmanneṣorbhako nīto mayā bhikṣorgirā gṛham
...सभा के मध्य प्रणाम करके आश्चर्यचकित होकर पूछने लगी — "हे ब्रह्मन्! इस शिशु को मैं एक भिक्षु के वचन से घर ले आई थी।"
श्लोक 54 (skanda.3.98.54)
अविज्ञातकुलोद्यापि सुतवत्परिपोष्यते ॥ कस्मिन्कुले प्रसूतोऽयं का माता जनकोस्य कः
avijñātakulodyāpi sutavatparipoṣyate kasminkule prasūto'yaṁ kā mātā janakosya kaḥ
"कुल अज्ञात होते हुए भी मैंने इसे पुत्र के समान पाला है। यह किस कुल में उत्पन्न हुआ है? इसकी माता कौन है, पिता कौन?"
श्लोक 55 (skanda.3.98.55)
सर्वं विज्ञातुमिच्छामि भवतो ज्ञानचक्षुषः ॥.५५ ॥ इति पृष्टो मुनिः सोथ ज्ञानदृष्टिर्द्विजस्त्रियां ॥ आचख्यौ तस्य बालस्य जन्म कर्म च पौर्विकम्
sarvaṁ vijñātumicchāmi bhavato jñānacakṣuṣaḥ .55 iti pṛṣṭo muniḥ sotha jñānadṛṣṭirdvijastriyāṁ ācakhyau tasya bālasya janma karma ca paurvikam
"आपके ज्ञानचक्षु से मैं सब कुछ जानना चाहती हूँ।" इस प्रकार पूछे जाने पर, ज्ञानदृष्टि वाले उस मुनि ने उस ब्राह्मणी को उस बालक का जन्म और पूर्वजन्म का समस्त वृत्तान्त कह सुनाया।
श्लोक 56 (skanda.3.98.56)
विदर्भराजपुत्रस्तु तत्पितुः समरे मृतिम्॥ तन्मातुर्नक्रहरणं साकल्येन न्यवेदयत्
vidarbharājaputrastu tatpituḥ samare mṛtim tanmāturnakraharaṇaṁ sākalyena nyavedayat
उन्होंने यह बताया कि यह विदर्भ के राजा का पुत्र है, इसके पिता की युद्ध में मृत्यु हुई, और इसकी माता को मगर ने पकड़ लिया — यह सब विस्तार से कहा।
श्लोक 57 (skanda.3.98.57)
अथ सा विस्मिता नारी पुनः प्रपच्छ तं मुनिम् ॥ स राजा सकलान्भोगान्हित्वा युद्धे कथं मृतः
atha sā vismitā nārī punaḥ prapaccha taṁ munim sa rājā sakalānbhogānhitvā yuddhe kathaṁ mṛtaḥ
फिर वह विस्मित स्त्री पुनः उस मुनि से पूछने लगी — "वह राजा समस्त भोगों को छोड़कर युद्ध में कैसे मारा गया?"
श्लोक 58 (skanda.3.98.58)
दारिद्र्यमस्य बालस्य कथं प्राप्तं महामुने ॥ दारिद्र्यं पुनरुद्धूय कथं राज्यमवाप्स्यति
dāridryamasya bālasya kathaṁ prāptaṁ mahāmune dāridryaṁ punaruddhūya kathaṁ rājyamavāpsyati
"हे महामुने! इस बालक को दरिद्रता कैसे प्राप्त हुई? और दरिद्रता को दूर करके यह अपना राज्य पुनः कैसे प्राप्त करेगा?"
श्लोक 59 (skanda.3.98.59)
अस्यापि मम पुत्रस्य भिक्षान्नेनैव जीवतः । दारिद्र्यशमनोपायमुपदेष्टुं त्वमर्हसि
asyāpi mama putrasya bhikṣānnenaiva jīvataḥ dāridryaśamanopāyamupadeṣṭuṁ tvamarhasi
"मेरे इस पुत्र को भी, जो भिक्षा के अन्न से ही जीवित है, दरिद्रता की शान्ति का उपाय बताने के आप योग्य हैं।"
श्लोक 60 (skanda.3.98.60)
शांडिल्य उवाच ॥ अमुष्य बालस्य पिता स विदर्भमहीपतिः ॥ पूर्वजन्मनि पांड्येशो बभूव नृपसत्तमः
śāṁḍilya uvāca amuṣya bālasya pitā sa vidarbhamahīpatiḥ pūrvajanmani pāṁḍyeśo babhūva nṛpasattamaḥ
शाण्डिल्य ने कहा — इस बालक के पिता, विदर्भ के उस राजा ने पूर्वजन्म में पाण्ड्य देश के श्रेष्ठ राजा के रूप में जन्म लिया था।
श्लोक 61 (skanda.3.98.61)
स राजा सर्वधर्मज्ञः पालयन्सकलां महीम् ॥ प्रदोषसमये शंभुं कदा चित्प्रत्यपूजयत्
sa rājā sarvadharmajñaḥ pālayansakalāṁ mahīm pradoṣasamaye śaṁbhuṁ kadā citpratyapūjayat
वह सर्वधर्मज्ञ राजा समस्त पृथ्वी का पालन करते हुए एक बार प्रदोष के समय शम्भु की पूजा कर रहा था।
श्लोक 62 (skanda.3.98.62)
तस्य पूजयतो भक्त्या देवं त्रिभुवनेश्वरम् ॥ आसीत्कलकलारावः सर्वत्र नगरे महान्
tasya pūjayato bhaktyā devaṁ tribhuvaneśvaram āsītkalakalārāvaḥ sarvatra nagare mahān
उस त्रिभुवनेश्वर देव की भक्तिपूर्वक पूजा करते समय, नगर में सर्वत्र अचानक बड़ा कोलाहल मच गया।
श्लोक 63 (skanda.3.98.63)
श्रुत्वा तमुत्कटं शब्दं राजा त्यक्तशिवार्चनः ॥ निर्ययौ राजभवनान्नगरक्षोभशंकया
śrutvā tamutkaṭaṁ śabdaṁ rājā tyaktaśivārcanaḥ niryayau rājabhavanānnagarakṣobhaśaṁkayā
उस भीषण शब्द को सुनकर राजा शिवपूजन को छोड़कर नगर में उपद्रव की आशंका से राजभवन से बाहर निकल आया।
श्लोक 64 (skanda.3.98.64)
एतस्मिन्नेव समये तस्यामात्यो महाबलः ॥ शत्रुं गृहीत्वा सामंतं राजांतिकमुपागमत्
etasminneva samaye tasyāmātyo mahābalaḥ śatruṁ gṛhītvā sāmaṁtaṁ rājāṁtikamupāgamat
उसी समय उसका महाबली मन्त्री एक शत्रु सामन्त को बन्दी बनाकर राजा के समीप ले आया।
श्लोक 65 (skanda.3.98.65)
अमात्येन समानीतं शत्रुं सामंतमुद्धतम् ॥ दृष्ट्वा क्रोधेन नृपतिः शिरच्छेदमकारयत्
amātyena samānītaṁ śatruṁ sāmaṁtamuddhatam dṛṣṭvā krodhena nṛpatiḥ śiracchedamakārayat
मन्त्री द्वारा लाए गए उस उद्दण्ड शत्रु सामन्त को देखकर राजा ने क्रोधवश उसका सिर कटवा दिया।
श्लोक 66 (skanda.3.98.66)
स तथैव महीपालो विसृज्य शिवपूजनम् ॥ असमाप्तात्मनियमश्चकार निशि भोजनम्
sa tathaiva mahīpālo visṛjya śivapūjanam asamāptātmaniyamaścakāra niśi bhojanam
इस प्रकार उस राजा ने शिवपूजन का त्याग करके, अपना नियम अधूरा छोड़कर, रात्रि में भोजन कर लिया।
श्लोक 67 (skanda.3.98.67)
तत्पुत्रोपि तथा चक्रे प्रदोषसमये शिवम् ॥ अनर्चयित्वा मूढात्मा भुक्त्वा सुष्वाप दुर्मदः
tatputropi tathā cakre pradoṣasamaye śivam anarcayitvā mūḍhātmā bhuktvā suṣvāpa durmadaḥ
उसके पुत्र ने भी वैसा ही किया — प्रदोष के समय शिव की अर्चना न करके, मूढ़बुद्धि होकर भोजन करके मद में सो गया।
श्लोक 68 (skanda.3.98.68)
जन्मांतरे स नृपतिर्विदर्भक्षितिपोऽभवत् ॥ शिवार्चनांतरायेण परैर्भोगांतरे हतः
janmāṁtare sa nṛpatirvidarbhakṣitipo'bhavat śivārcanāṁtarāyeṇa parairbhogāṁtare hataḥ
दूसरे जन्म में वही राजा विदर्भ का अधिपति हुआ; शिवार्चना में हुए उस विघ्न के कारण वह शत्रुओं द्वारा भोगों के बीच ही मार डाला गया।
श्लोक 69 (skanda.3.98.69)
तत्पुत्रो यः पूर्वभवे सोस्मिञ्जन्मनि तत्सुतः ॥ भूत्वा दारिद्र्यमापन्नः शिवपूजाव्यतिक्रमात्
tatputro yaḥ pūrvabhave sosmiñjanmani tatsutaḥ bhūtvā dāridryamāpannaḥ śivapūjāvyatikramāt
पूर्वजन्म में जो उसका पुत्र था, वही इस जन्म में उसका पुत्र हुआ है — और शिवपूजा के उल्लंघन के कारण ही यह दरिद्रता को प्राप्त हुआ है।
श्लोक 70 (skanda.3.98.70)
अस्य माता पूर्वभवे सपत्नीं छद्मनाहनत् ॥ तेन पापेन महता ग्राहेणास्मिन्भवे हता
asya mātā pūrvabhave sapatnīṁ chadmanāhanat tena pāpena mahatā grāheṇāsminbhave hatā
इस बालक की माता ने पूर्वजन्म में छल से अपनी सौत की हत्या की थी; उसी महापाप के कारण इस जन्म में इसे मगर ने मार डाला।
श्लोक 71 (skanda.3.98.71)
एषा प्रवृत्तिरेतेषां भवत्यै समुदाहृता ॥ अनर्चितशिवा मर्त्याः प्राप्नुवंति दरिद्रताम्
eṣā pravṛttireteṣāṁ bhavatyai samudāhṛtā anarcitaśivā martyāḥ prāpnuvaṁti daridratām
हे देवी! इनके विषय में यह सारा वृत्तान्त तुम्हें कह सुनाया गया — जो मनुष्य शिव की पूजा नहीं करते, वे दरिद्रता को प्राप्त होते हैं।
श्लोक 72 (skanda.3.98.72)
सत्यं ब्रवीमि परलोकहितं ब्रवीमि सारं ब्रवीम्युपनिषद्धृदयं ब्रवीमि ॥ संसारमुल्बणमसारमवाप्य जंतोः सारो यमीश्वरपदांबुरुहस्य सेवा
satyaṁ bravīmi paralokahitaṁ bravīmi sāraṁ bravīmyupaniṣaddhṛdayaṁ bravīmi saṁsāramulbaṇamasāramavāpya jaṁtoḥ sāro yamīśvarapadāṁburuhasya sevā
मैं सत्य कहता हूँ, परलोक का हित कहता हूँ, सार कहता हूँ, उपनिषदों का हृदय कहता हूँ — इस भयंकर और असार संसार को पाकर प्राणी के लिए सार केवल ईश्वर के चरणकमलों की सेवा ही है।
श्लोक 73 (skanda.3.98.73)
ये नार्चयंति गिरिशं समये प्रदोषे ये नार्चितं शिवमपि प्रणमंति चान्ये ॥ एतत्कथां श्रुतिपुटैर्न पिबंति मूढास्ते जन्मजन्मसु भवंति नरा दरिद्राः
ye nārcayaṁti giriśaṁ samaye pradoṣe ye nārcitaṁ śivamapi praṇamaṁti cānye etatkathāṁ śrutipuṭairna pibaṁti mūḍhāste janmajanmasu bhavaṁti narā daridrāḥ
जो प्रदोष के समय गिरीश की अर्चना नहीं करते, और जो पूजित शिव को भी प्रणाम नहीं करते, तथा जो मूढ़ इस कथा को अपने कानों से नहीं सुनते — वे मनुष्य जन्म-जन्मान्तर तक दरिद्र ही बने रहते हैं।
श्लोक 74 (skanda.3.98.74)
ये वै प्रदोषसमये परमेश्वरस्य कुर्वंत्यनन्यमनसोंऽघ्रिसरोजपूजाम् ॥ नित्यं प्रवृद्धधन धान्यकलत्रपुत्रसौभाग्यसंपदधिकास्त इहैव लोके
ye vai pradoṣasamaye parameśvarasya kurvaṁtyananyamanasoṁ'ghrisarojapūjām nityaṁ pravṛddhadhana dhānyakalatraputrasaubhāgyasaṁpadadhikāsta ihaiva loke
किन्तु जो प्रदोष के समय अनन्यचित्त होकर परमेश्वर के चरणकमलों की पूजा करते हैं, वे इसी लोक में सदा बढ़ते हुए धन, धान्य, पत्नी, पुत्र, सौभाग्य और सम्पत्ति से युक्त हो जाते हैं।
श्लोक 75 (skanda.3.98.75)
कैलासशैलभवने त्रिजगजनित्रीं गौरीं निवेश्य कनकांचितरत्नपीठे ॥ नृत्यं विधातु मभिवाञ्छति शूलपाणौ देवाः प्रदोषसमयेऽनुभजंति सर्वे
kailāsaśailabhavane trijagajanitrīṁ gaurīṁ niveśya kanakāṁcitaratnapīṭhe nṛtyaṁ vidhātu mabhivāñchati śūlapāṇau devāḥ pradoṣasamaye'nubhajaṁti sarve
कैलास पर्वत के भवन में त्रिलोकजननी गौरी को स्वर्णजड़ित रत्नपीठ पर बिठाकर, जब शूलपाणि नृत्य करने की इच्छा करते हैं, तब प्रदोष के समय सभी देवता उनका अनुसरण करते हैं।
श्लोक 76 (skanda.3.98.76)
वाग्देवी धृतवल्लकी शतमखो वेणुं दधत्पद्मजस्तालोन्निद्रकरो रमा भगवती गेयप्रयोगान्विता ॥ विष्णुः सांद्रमृदंगवादनपटुर्देवाः समंतात्स्थिताः सेवंते तमनु प्रदोषसमये देवं मृडानीपतिम्
vāgdevī dhṛtavallakī śatamakho veṇuṁ dadhatpadmajastālonnidrakaro ramā bhagavatī geyaprayogānvitā viṣṇuḥ sāṁdramṛdaṁgavādanapaṭurdevāḥ samaṁtātsthitāḥ sevaṁte tamanu pradoṣasamaye devaṁ mṛḍānīpatim
वाग्देवी वीणा बजाती हैं, शतमख (इन्द्र) वंशी बजाते हैं, कमलजन्मा (ब्रह्मा) ताल देते हैं, भगवती रमा गीत गाती हैं, और विष्णु मृदंग बजाने में कुशल हैं — देवगण चारों ओर खड़े होकर प्रदोष के समय उन मृडानीपति (शिव) की इस प्रकार सेवा करते हैं।
श्लोक 77 (skanda.3.98.77)
गंधर्वयक्षपतगोरगसिद्ध साध्या विद्याधरामरवराप्सरसां गणाश्च ॥ येऽन्ये त्रिलोकनिलयाः सह भूतवर्गाः प्राप्ते प्रदोषसमये हरपार्थसंस्थाः
gaṁdharvayakṣapatagoragasiddha sādhyā vidyādharāmaravarāpsarasāṁ gaṇāśca ye'nye trilokanilayāḥ saha bhūtavargāḥ prāpte pradoṣasamaye harapārthasaṁsthāḥ
गन्धर्व, यक्ष, पक्षी, नाग, सिद्ध, साध्य, विद्याधर, श्रेष्ठ देवगण और अप्सराओं के समूह, तथा त्रिलोक में निवास करने वाले अन्य समस्त भूतगण भी प्रदोष के समय हर के समीप उपस्थित होते हैं।
श्लोक 78 (skanda.3.98.78)
अतः प्रदोषे शिव एक एव पूज्योऽथ नान्ये हरिपद्मजाद्याः ॥ तस्मिन्महेशे विधिनेज्यमाने सर्वे प्रसीदंति सुराधिनाथाः
ataḥ pradoṣe śiva eka eva pūjyo'tha nānye haripadmajādyāḥ tasminmaheśe vidhinejyamāne sarve prasīdaṁti surādhināthāḥ
इसलिए प्रदोष में एकमात्र शिव ही पूज्य हैं, हरि, ब्रह्मा आदि अन्य कोई नहीं; जब उन महेश्वर की विधिपूर्वक पूजा होती है, तो देवताओं के सभी अधिनाथ स्वयं ही प्रसन्न हो जाते हैं।
श्लोक 79 (skanda.3.98.79)
एष ते तनयः पूर्वजन्मनि ब्राह्मणोत्तमः ॥ प्रतिग्रहैर्वयो निन्ये न यज्ञाद्यैः सुकर्मभिः
eṣa te tanayaḥ pūrvajanmani brāhmaṇottamaḥ pratigrahairvayo ninye na yajñādyaiḥ sukarmabhiḥ
यह तुम्हारा पुत्र पूर्वजन्म में एक श्रेष्ठ ब्राह्मण था, जिसने प्रतिग्रह (दान लेकर) से अपना जीवन बिताया, न कि यज्ञ आदि सत्कर्मों से।
श्लोक 80 (skanda.3.98.80)
अतो दारिद्र्यमापन्नः पुत्रस्ते द्विजभामिनि॥ तद्दोष परिहारार्थं शरणं यातु शंकरम्
ato dāridryamāpannaḥ putraste dvijabhāmini taddoṣa parihārārthaṁ śaraṇaṁ yātu śaṁkaram
इसीलिए, हे द्विजभामिनि! तुम्हारा यह पुत्र दरिद्रता को प्राप्त हुआ है; इस दोष के निवारण हेतु इसे शंकर की शरण में जाना चाहिए।