ब्रह्म खण्ड · अध्याय 97
गोपकुमार चरित्र
श्लोक 1 (skanda.3.97.1)
॥ सूत उवाच ॥ शिवो गुरुः शिवो देवः शिवो बंधुः शरीरिणाम् ॥ शिव आत्मा शिवो जीवःशिवादन्यन्न किञ्चन
sūta uvāca śivo guruḥ śivo devaḥ śivo baṁdhuḥ śarīriṇām śiva ātmā śivo jīvaḥśivādanyanna kiñcana
सूत जी ने कहा — शिव ही गुरु हैं, शिव ही देव हैं, शिव ही प्राणियों के बंधु हैं। शिव ही आत्मा हैं, शिव ही जीव हैं; शिव के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है।
श्लोक 2 (skanda.3.97.2)
शिवमुद्दिश्य यत्किंचिद्दत्तं जप्तं हुतं कृतम् ॥ तदनंतफलं प्रोक्तं सर्वागमविनिश्चितम्
śivamuddiśya yatkiṁciddattaṁ japtaṁ hutaṁ kṛtam tadanaṁtaphalaṁ proktaṁ sarvāgamaviniścitam
शिव को उद्दिष्ट करके जो भी दिया जाए, जपा जाए, हवन किया जाए अथवा किया जाए, वह अनंत फल देने वाला कहा गया है — यह सभी शास्त्रों का निश्चित सिद्धांत है।
श्लोक 3 (skanda.3.97.3)
भक्त्या निवेदितं शंभोः पत्रं पुष्पं फलं जलम् ॥ अल्पादल्पतरं वापि तदानंत्याय कल्पते
bhaktyā niveditaṁ śaṁbhoḥ patraṁ puṣpaṁ phalaṁ jalam alpādalpataraṁ vāpi tadānaṁtyāya kalpate
भक्तिपूर्वक शंभु को अर्पित पत्र, पुष्प, फल, जल — चाहे कितना भी अल्प हो — वह अनंत फल के लिए समर्थ होता है।
श्लोक 4 (skanda.3.97.4)
विहाय सकलान्धर्मान्सकलागमनिश्चितान् ॥ शिवमेकं भजेद्यस्तु मुच्यते सर्वबन्धनात्
vihāya sakalāndharmānsakalāgamaniścitān śivamekaṁ bhajedyastu mucyate sarvabandhanāt
जो समस्त शास्त्र-निर्दिष्ट धर्मों को त्यागकर एक शिव की ही भक्ति करता है, वह समस्त बंधनों से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 5 (skanda.3.97.5)
या प्रीतिरात्मनः पुत्रे या कलत्रे धनेपि सा ॥ कृता चेच्छिवपूजायां त्रायतीति किमद्भुतम्
yā prītirātmanaḥ putre yā kalatre dhanepi sā kṛtā cecchivapūjāyāṁ trāyatīti kimadbhutam
अपने पुत्र, पत्नी अथवा धन में जो प्रीति होती है, वही यदि शिव-पूजा में की जाए, तो उसका त्राण करना कोई आश्चर्य नहीं है।
श्लोक 6 (skanda.3.97.6)
तस्मात्केचिन्महात्मानः सकलान्विषयासवान् ॥ त्यजंति शिवपूजार्थे स्वदेहमपि दुस्त्यजम्
tasmātkecinmahātmānaḥ sakalānviṣayāsavān tyajaṁti śivapūjārthe svadehamapi dustyajam
इसीलिए कुछ महात्मा समस्त विषय-भोगों को, और शिव-पूजा के लिए अपने दुस्त्याज्य शरीर को भी त्याग देते हैं।
श्लोक 7 (skanda.3.97.7)
सा जिह्वा या शिवं स्तौति तन्मनो ध्यायते शिवम् ॥ तौ कर्णौ तत्कथालोलौ तौ हस्तौ तस्य पूजकौ
sā jihvā yā śivaṁ stauti tanmano dhyāyate śivam tau karṇau tatkathālolau tau hastau tasya pūjakau
वही जिह्वा सार्थक है जो शिव की स्तुति करती है, वही मन जो शिव का ध्यान करता है; वे ही कान जो उनकी कथा में रत रहते हैं, वे ही हाथ जो उनके पूजक हैं;
श्लोक 8 (skanda.3.97.8)
ते नेत्रे पश्यतः पूजां तच्छिरः प्रणतं शिवे ॥ तौ पादौ यौ शिवक्षेत्रं भक्त्या पर्यटतः सदा
te netre paśyataḥ pūjāṁ tacchiraḥ praṇataṁ śive tau pādau yau śivakṣetraṁ bhaktyā paryaṭataḥ sadā
वे ही नेत्र जो उनकी पूजा को देखते हैं, वही सिर जो शिव के आगे झुकता है; वे ही चरण जो शिव-क्षेत्र में सदा भक्तिपूर्वक भ्रमण करते हैं।
श्लोक 9 (skanda.3.97.9)
यस्येन्द्रियाणि सर्वाणि वर्तंते शिवकर्मसु ॥ स निस्तरति संसारं भुक्तिं मुक्तिं च विंदति
yasyendriyāṇi sarvāṇi vartaṁte śivakarmasu sa nistarati saṁsāraṁ bhuktiṁ muktiṁ ca viṁdati
जिसकी समस्त इंद्रियाँ शिव के कार्यों में लगी रहती हैं, वह संसार को पार कर भोग और मोक्ष दोनों को प्राप्त करता है।
श्लोक 10 (skanda.3.97.10)
शिवभक्तियुतो मर्त्यश्चांडालः पुल्कसोपि च ॥ नारी नरो वा षंढो वा सद्यो मुच्येत संसृतेः
śivabhaktiyuto martyaścāṁḍālaḥ pulkasopi ca nārī naro vā ṣaṁḍho vā sadyo mucyeta saṁsṛteḥ
शिव-भक्ति से युक्त मनुष्य — चाहे वह चांडाल हो, पुल्कस हो, स्त्री हो, पुरुष हो अथवा नपुंसक — तत्काल संसार-बंधन से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 11 (skanda.3.97.11)
किं कुलेन किमाचारैः किंशीलेन गुणेन वा ॥ भक्तिलेशयुतः शंभोः स वंद्यः सर्वदेहिनाम्
kiṁ kulena kimācāraiḥ kiṁśīlena guṇena vā bhaktileśayutaḥ śaṁbhoḥ sa vaṁdyaḥ sarvadehinām
कुल से क्या, आचार से क्या, शील अथवा गुण से क्या प्रयोजन? शंभु में लेशमात्र भक्ति रखने वाला भी समस्त प्राणियों के लिए वंदनीय है।
श्लोक 12 (skanda.3.97.12)
उज्जयिन्यामभूद्राजा चन्द्रसेनसमाह्वयः ॥ जातो मानवरूपेण द्वितीय इव वासवः
ujjayinyāmabhūdrājā candrasenasamāhvayaḥ jāto mānavarūpeṇa dvitīya iva vāsavaḥ
उज्जयिनी में चंद्रसेन नामक एक राजा था, जो मनुष्य-रूप में मानो दूसरे इंद्र के समान उत्पन्न हुआ था।
श्लोक 13 (skanda.3.97.13)
तस्मिन्पुरे महाकालं वसंतं परमेश्वरम् ॥ संपूजयत्यसौ भक्त्या चन्द्रसेनो नृपोत्तमः
tasminpure mahākālaṁ vasaṁtaṁ parameśvaram saṁpūjayatyasau bhaktyā candraseno nṛpottamaḥ
उस नगरी में स्थित परमेश्वर महाकाल की वह श्रेष्ठ राजा चंद्रसेन भक्तिपूर्वक पूजा करता था।
श्लोक 14 (skanda.3.97.14)
तस्याभवत्सखा राज्ञः शिवपारिषदाग्रणीः ॥ मणिभद्रो जिताभद्रः सर्वलोकनमस्कृतः
tasyābhavatsakhā rājñaḥ śivapāriṣadāgraṇīḥ maṇibhadro jitābhadraḥ sarvalokanamaskṛtaḥ
उस राजा का शिव के परिषदों में अग्रगण्य, समस्त लोक द्वारा नमस्कृत, अपशकुनों को जीत लेने वाला मणिभद्र नामक एक मित्र था।
श्लोक 15 (skanda.3.97.15)
तस्यै कदा महीभर्तुः प्रसन्नः शंकरानुगः ॥ चिन्तामणिं ददौ दिव्यं मणिभद्रो महामतिः
tasyai kadā mahībhartuḥ prasannaḥ śaṁkarānugaḥ cintāmaṇiṁ dadau divyaṁ maṇibhadro mahāmatiḥ
एक बार उस राजा से प्रसन्न होकर, शंकर के अनुयायी महाबुद्धिमान मणिभद्र ने उसे एक दिव्य चिंतामणि प्रदान की।
श्लोक 16 (skanda.3.97.16)
स मणिः कौस्तुभ इव द्योतमानोर्कसन्निभः ॥ दृष्टः श्रुतो वा ध्यातो वा नृणां यच्छति चिंतितम्
sa maṇiḥ kaustubha iva dyotamānorkasannibhaḥ dṛṣṭaḥ śruto vā dhyāto vā nṛṇāṁ yacchati ciṁtitam
वह मणि कौस्तुभ के समान द्योतमान, सूर्य के सदृश, देखे जाने, सुने जाने अथवा ध्यान किए जाने पर भी मनुष्यों का चिंतित (इच्छित) फल प्रदान करती थी।
श्लोक 17 (skanda.3.97.17)
तस्य कांतिलवस्पृष्टं कांस्यं ताम्रमयस्त्रपु ॥ पाषाणादिकमन्यद्वा सद्यो भवति कांचनम्
tasya kāṁtilavaspṛṣṭaṁ kāṁsyaṁ tāmramayastrapu pāṣāṇādikamanyadvā sadyo bhavati kāṁcanam
उसकी कांति का लेशमात्र स्पर्श पाकर कांसा, ताँबा, लोहा, राँगा, पत्थर आदि कोई भी वस्तु तत्काल सोना बन जाती थी।
श्लोक 18 (skanda.3.97.18)
स तं चिन्तामणिं कंठे बिभ्रद्राजासनं गतः ॥ रराज राजा देवानां मध्ये भानुरिव स्वयम्
sa taṁ cintāmaṇiṁ kaṁṭhe bibhradrājāsanaṁ gataḥ rarāja rājā devānāṁ madhye bhānuriva svayam
उस चिंतामणि को गले में धारण करके, राजासन पर बैठा हुआ वह राजा देवताओं के मध्य स्वयं सूर्य के समान शोभायमान होता था।
श्लोक 19 (skanda.3.97.19)
सदा चिन्तामणिग्रीवं तं श्रुत्वा राजसत्तमम् ॥ प्रवृद्धतर्षा राजानः सर्वे क्षुब्धहृदोऽभवन्
sadā cintāmaṇigrīvaṁ taṁ śrutvā rājasattamam pravṛddhatarṣā rājānaḥ sarve kṣubdhahṛdo'bhavan
सदा चिंतामणि धारण किए हुए उस श्रेष्ठ राजा के विषय में सुनकर, बढ़ी हुई लालसा वाले समस्त अन्य राजाओं का हृदय क्षुब्ध हो उठा।
श्लोक 20 (skanda.3.97.20)
स्नेहात्केचिदयाचंत धार्ष्ट्यात्केचन दुर्मदाः ॥ दैवलब्धमजानंतो मणिं मत्सरिणो नृपाः
snehātkecidayācaṁta dhārṣṭyātkecana durmadāḥ daivalabdhamajānaṁto maṇiṁ matsariṇo nṛpāḥ
कुछ ने स्नेहवश उससे याचना की, कुछ अहंकारी, धृष्ट राजाओं ने बलपूर्वक माँगा; यह न जानते हुए कि वह दैवयोग से प्राप्त हुई है, वे ईर्ष्यालु राजा (उसे पाने में असफल रहे)।
श्लोक 21 (skanda.3.97.21)
सर्वेषां भूभृतां याञ्चा यदा व्यर्थीकृतामुना॥ राजानः सर्वदेशानां संरंभं चक्रिरे तदा
sarveṣāṁ bhūbhṛtāṁ yāñcā yadā vyarthīkṛtāmunā rājānaḥ sarvadeśānāṁ saṁraṁbhaṁ cakrire tadā
जब उसके द्वारा समस्त राजाओं की याचना व्यर्थ कर दी गई, तब सभी देशों के राजा क्रोध से भर उठे।
श्लोक 22 (skanda.3.97.22)
सौराष्ट्राः कैकयाः शाल्वाः कलिंगशकमद्रकाः ॥ पांचालावंतिसौवीरा मागधा मत्स्यसृंजयाः
saurāṣṭrāḥ kaikayāḥ śālvāḥ kaliṁgaśakamadrakāḥ pāṁcālāvaṁtisauvīrā māgadhā matsyasṛṁjayāḥ
सौराष्ट्र, कैकय, शाल्व, कलिंग, शक, मद्रक, पांचाल, अवंति, सौवीर, मगध, मत्स्य, सृंजय के राजा —
श्लोक 23 (skanda.3.97.23)
एते चान्ये च राजानः सहाश्वरथकुमजराः ॥ चन्द्रसेनं मृधे जेतुमुद्यमं चक्रुरोजसा
ete cānye ca rājānaḥ sahāśvarathakumajarāḥ candrasenaṁ mṛdhe jetumudyamaṁ cakrurojasā
— ये और अन्य राजा, अश्व, रथ, हाथी और ऊँटों सहित, पूरे बल से चंद्रसेन को युद्ध में जीतने का प्रयत्न करने लगे।
श्लोक 24 (skanda.3.97.24)
ते तु सर्वे सुसंरब्धाः कंपयंतो वसुन्धराम् ॥ उज्जयिन्याश्चतुर्द्वारं रुरुधुर्बहुसैनिकाः
te tu sarve susaṁrabdhāḥ kaṁpayaṁto vasundharām ujjayinyāścaturdvāraṁ rurudhurbahusainikāḥ
वे सभी अत्यंत क्रुद्ध होकर, पृथ्वी को कंपाते हुए, अनेक सैनिकों के साथ उज्जयिनी के चारों द्वारों को घेर बैठे।
श्लोक 25 (skanda.3.97.25)
संरुध्यमानो स्वपुरीं दृष्ट्वा राजभिरुद्धतैः ॥ चंद्रसेनो महाकालं तमेव शरणं ययौ
saṁrudhyamāno svapurīṁ dṛṣṭvā rājabhiruddhataiḥ caṁdraseno mahākālaṁ tameva śaraṇaṁ yayau
अपनी नगरी को उन उद्दंड राजाओं द्वारा घिरा हुआ देखकर, चंद्रसेन ने साक्षात् महाकाल की ही शरण ली।
श्लोक 26 (skanda.3.97.26)
निर्विकल्पो निराहारः स राजा दृढनिश्चयः ॥ अर्चयामास गौरीशं दिवा नक्त मनन्यधीः
nirvikalpo nirāhāraḥ sa rājā dṛḍhaniścayaḥ arcayāmāsa gaurīśaṁ divā nakta mananyadhīḥ
निर्विकल्प, निराहार, दृढ़-निश्चयी वह राजा दिन-रात अनन्य चित्त से गौरीश की अर्चना करने लगा।
श्लोक 27 (skanda.3.97.27)
एतस्मिन्नंतरे गोपी काचित्तत्पुरवासिनी ॥ एकपुत्रा भर्तृहीना तत्रैवासीच्चिरंतना
etasminnaṁtare gopī kācittatpuravāsinī ekaputrā bhartṛhīnā tatraivāsīcciraṁtanā
इसी बीच उस नगरी में रहने वाली कोई गोपी, एक पुत्र वाली, पतिविहीन, वहीं दीर्घकाल से रह रही थी।
श्लोक 28 (skanda.3.97.28)
सा पंचहायनं बालं वहंती गत भर्तृका ॥ राज्ञा कृतां महापूजां ददर्श गिरिजापतेः
sā paṁcahāyanaṁ bālaṁ vahaṁtī gata bhartṛkā rājñā kṛtāṁ mahāpūjāṁ dadarśa girijāpateḥ
वह भर्तृहीना स्त्री, अपने पाँच वर्ष के बालक को लिए हुए, राजा द्वारा की जा रही गिरिजापति की उस महापूजा को देखने आई।
श्लोक 29 (skanda.3.97.29)
सा दृष्ट्वा सर्वमाश्चर्यं शिवपूजामहोदयम् ॥ प्रणिपत्य स्वशिबिरं पुनरेवाभ्यपद्यत
sā dṛṣṭvā sarvamāścaryaṁ śivapūjāmahodayam praṇipatya svaśibiraṁ punarevābhyapadyata
शिव-पूजा के उस महान वैभव के सम्पूर्ण आश्चर्य को देखकर, वह प्रणाम करके पुनः अपने शिविर की ओर लौट गई।
श्लोक 30 (skanda.3.97.30)
एतत्सर्वमशेषेण स दृष्ट्वा बल्लवीसुतः ॥ कुतूहलेन विदधे शिवपूजां विरक्तिदाम्
etatsarvamaśeṣeṇa sa dṛṣṭvā ballavīsutaḥ kutūhalena vidadhe śivapūjāṁ viraktidām
इस सबको सम्पूर्ण रूप से देखकर वह ग्वालिन का पुत्र भी कुतूहलवश वैराग्यदायिनी शिव-पूजा करने लगा।
श्लोक 31 (skanda.3.97.31)
आनीय हृद्यं पाषाणं शून्ये तु शिबिरोत्तमे ॥ नातिदूरे स्वशिबिराच्छिवलिंगमकल्पयत्
ānīya hṛdyaṁ pāṣāṇaṁ śūnye tu śibirottame nātidūre svaśibirācchivaliṁgamakalpayat
अपने उत्तम शिविर के भीतर, शून्य स्थान में, अपने ही शिविर से अधिक दूर न, एक मनोहर पाषाण लाकर उसने एक शिवलिंग बना लिया।
श्लोक 32 (skanda.3.97.32)
यानि कानि च पुष्पाणि हस्तलभ्यानि चात्मनः ॥ आनीय स्नाप्य तल्लिंगं पूजयामास भक्तितः
yāni kāni ca puṣpāṇi hastalabhyāni cātmanaḥ ānīya snāpya talliṁgaṁ pūjayāmāsa bhaktitaḥ
अपने हाथों जो भी पुष्प उसे मिल सके, उन्हें लाकर उस लिंग को स्नान कराकर उसने भक्तिपूर्वक पूजा की।
श्लोक 33 (skanda.3.97.33)
गंधालंकारवासांसि धूपदीपाक्षतादिकम् ॥ विधाय कृत्रिमैर्दिव्यैर्नैवेद्यं चाप्यकल्पयत्
gaṁdhālaṁkāravāsāṁsi dhūpadīpākṣatādikam vidhāya kṛtrimairdivyairnaivedyaṁ cāpyakalpayat
गंध, अलंकार, वस्त्र, धूप-दीप, अक्षत आदि कृत्रिम, फिर भी मानो दिव्य सामग्री से सजाकर उसने नैवेद्य भी तैयार किया।
श्लोक 34 (skanda.3.97.34)
भूयोभूयः समभ्यर्च्य पत्रैः पुष्पैर्मनोरमैः ॥ नृत्यं च विविधं कृत्वा प्रणनाम पुनःपुनः
bhūyobhūyaḥ samabhyarcya patraiḥ puṣpairmanoramaiḥ nṛtyaṁ ca vividhaṁ kṛtvā praṇanāma punaḥpunaḥ
बार-बार उसे मनोहर पत्तों और पुष्पों से पूजकर, विविध प्रकार से नृत्य करके, उसने बार-बार प्रणाम किया।
श्लोक 35 (skanda.3.97.35)
एवं पूजां प्रकुर्वाणं शिवस्यानन्यमानसम् ॥ सा पुत्रं प्रणयाद्गोपी भोजनाय समा ह्वयत्
evaṁ pūjāṁ prakurvāṇaṁ śivasyānanyamānasam sā putraṁ praṇayādgopī bhojanāya samā hvayat
इस प्रकार शिव में अनन्य मन से पूजा करते हुए उसे, स्नेहवश उस गोपी माता ने भोजन के लिए बुलाया।
श्लोक 36 (skanda.3.97.36)
मात्राहूतोपि बहुशः स पूजासक्तमानसः ॥ बालोपि भोजनं नच्छत्तदा माता स्वयं ययौ
mātrāhūtopi bahuśaḥ sa pūjāsaktamānasaḥ bālopi bhojanaṁ nacchattadā mātā svayaṁ yayau
बार-बार माता द्वारा बुलाए जाने पर भी, पूजा में मग्न मन वाला वह बालक भोजन के लिए नहीं आया; तब माता स्वयं वहाँ गई।
श्लोक 37 (skanda.3.97.37)
तं विलोक्य शिवस्याग्रे निषण्णं मी लितेक्षणम्॥ चकर्ष पाणिं संगृह्य कोपेन समताडयत्
taṁ vilokya śivasyāgre niṣaṇṇaṁ mī litekṣaṇam cakarṣa pāṇiṁ saṁgṛhya kopena samatāḍayat
शिव के सम्मुख नेत्र मूँदकर बैठे हुए उसे देखकर, उसने उसका हाथ पकड़कर खींचा और क्रोधवश उसे मार दिया।
श्लोक 38 (skanda.3.97.38)
आकृष्टस्ताडितो वापि नागच्छत्स्वसुतो यदा ॥ तां पूजां नाशयामास क्षिप्त्वा लिंगं विदूरतः
ākṛṣṭastāḍito vāpi nāgacchatsvasuto yadā tāṁ pūjāṁ nāśayāmāsa kṣiptvā liṁgaṁ vidūrataḥ
जब खींचे जाने और मारे जाने पर भी उसका पुत्र नहीं आया, तो उसने लिंग को दूर फेंककर उस पूजा को नष्ट कर दिया।
श्लोक 39 (skanda.3.97.39)
हाहेति रुदमानं तं निर्भर्त्स्य स्वसुतं तदा ॥ पुनर्विवेश स्वगृहं गोपी रोषसमन्विता
hāheti rudamānaṁ taṁ nirbhartsya svasutaṁ tadā punarviveśa svagṛhaṁ gopī roṣasamanvitā
'हाय हाय!' कहकर रोते हुए अपने पुत्र को डाँटकर, वह गोपी क्रोध से भरी हुई पुनः अपने घर लौट गई।
श्लोक 40 (skanda.3.97.40)
मात्रा विनाशितां पूजां दृष्ट्वा देवस्य शूलिनः ॥ देवदेवेति चुक्रोश निपपात स बालकः
mātrā vināśitāṁ pūjāṁ dṛṣṭvā devasya śūlinaḥ devadeveti cukrośa nipapāta sa bālakaḥ
माता द्वारा त्रिशूलधारी देव की पूजा को नष्ट किया गया देखकर, वह बालक 'देवाधिदेव!' पुकारते हुए गिर पड़ा।
श्लोक 41 (skanda.3.97.41)
प्रनष्टसंज्ञः सहसा बाष्पपूरपरिप्लुतः ॥ लब्धसंज्ञो मुहूर्तेन चक्षुषी उदमीलयत्
pranaṣṭasaṁjñaḥ sahasā bāṣpapūrapariplutaḥ labdhasaṁjño muhūrtena cakṣuṣī udamīlayat
अचानक चेतना खोकर, अश्रुधारा से भीगा हुआ, वह क्षणभर में पुनः चेतना पाकर अपनी आँखें खोलने लगा।
श्लोक 42 (skanda.3.97.42)
ततो मणिस्तंभविराजमानं हिरण्मयद्वारकपाटतोरणम् ॥ महार्हनीलामलवज्रवेदिकं तदेव जातं शिबिरं शिवालयम्
tato maṇistaṁbhavirājamānaṁ hiraṇmayadvārakapāṭatoraṇam mahārhanīlāmalavajravedikaṁ tadeva jātaṁ śibiraṁ śivālayam
तब उसने देखा कि वही शिविर मणि-स्तंभों से सुशोभित, स्वर्णमय द्वार-कपाट और तोरण से युक्त, अमूल्य नीलम और निर्मल हीरों की वेदिका वाला शिवालय बन गया है।
श्लोक 43 (skanda.3.97.43)
संतप्तहेम कलशैर्बहुभिर्विचित्रैः प्रोद्भासितस्फटिकसौधतलाभिरामम् ॥ रम्यं च तच्छिवपुरं वरपीठमध्ये लिंगं च रत्नसहितं स ददर्श बालः
saṁtaptahema kalaśairbahubhirvicitraiḥ prodbhāsitasphaṭikasaudhatalābhirāmam ramyaṁ ca tacchivapuraṁ varapīṭhamadhye liṁgaṁ ca ratnasahitaṁ sa dadarśa bālaḥ
संतप्त स्वर्ण-कलशों से, विचित्र और चमकते हुए स्फटिक के प्रासाद-तलों से सुशोभित उस मनोहर शिवपुरी को, और उत्तम पीठ के मध्य रत्नों सहित उस लिंग को उस बालक ने देखा।
श्लोक 44 (skanda.3.97.44)
स दृष्ट्वा सहसोत्थाय भीतविस्मितमानसः ॥ निमग्न इव संतोषात्परमानंदसागरे
sa dṛṣṭvā sahasotthāya bhītavismitamānasaḥ nimagna iva saṁtoṣātparamānaṁdasāgare
यह देखकर वह अचानक उठ खड़ा हुआ, भय और विस्मय से भरे मन वाला, मानो परम आनंद के सागर में संतोष से डूब गया हो।
श्लोक 45 (skanda.3.97.45)
विज्ञाय शिवपूजाया माहात्म्यं तत्प्रभावतः ॥ ननाम दंडवद्भूमौ स्वमातुरघशांतये
vijñāya śivapūjāyā māhātmyaṁ tatprabhāvataḥ nanāma daṁḍavadbhūmau svamāturaghaśāṁtaye
शिव-पूजा के इस माहात्म्य को उसके प्रभाव से जानकर, उसने अपनी माता के पाप की शांति के लिए भूमि पर दंडवत प्रणाम किया।
श्लोक 46 (skanda.3.97.46)
देव क्षमस्व दुरितं मम मातुरुमापते ॥ मूढायास्त्वामजानंत्याः प्रसन्नो भव शंकर
deva kṣamasva duritaṁ mama māturumāpate mūḍhāyāstvāmajānaṁtyāḥ prasanno bhava śaṁkara
'हे देव! मेरी माता के पाप को क्षमा कीजिए, हे उमापति! उस मूढ़ स्त्री पर, जो आपको नहीं जानती थी, प्रसन्न होइए, हे शंकर!'
श्लोक 47 (skanda.3.97.47)
यद्यस्ति मयि यत्किंचित्पुण्यं त्वद्भक्तिसंभवम् ॥ तेनापि शिव मे माता तव कारुण्यमाप्नुयात्
yadyasti mayi yatkiṁcitpuṇyaṁ tvadbhaktisaṁbhavam tenāpi śiva me mātā tava kāruṇyamāpnuyāt
'यदि मुझमें आपकी भक्ति से उत्पन्न कोई भी पुण्य हो, तो उससे भी, हे शिव! मेरी माता आपकी करुणा प्राप्त करे।'
श्लोक 48 (skanda.3.97.48)
इति प्रसाद्य गिरिशं भूयोभूयः प्रणम्य च ॥ सूर्ये चास्तं गते बालो निर्जगाम शिवालयात्
iti prasādya giriśaṁ bhūyobhūyaḥ praṇamya ca sūrye cāstaṁ gate bālo nirjagāma śivālayāt
इस प्रकार गिरीश को प्रसन्न करके और बार-बार प्रणाम करके, सूर्यास्त होने पर वह बालक शिवालय से बाहर निकला।
श्लोक 49 (skanda.3.97.49)
अथापश्यत्स्वशिबिरं पुरंदरपुरोपमम् ॥ सद्यो हिरण्मयीभूतं विचित्रविभवोज्ज्वलम्
athāpaśyatsvaśibiraṁ puraṁdarapuropamam sadyo hiraṇmayībhūtaṁ vicitravibhavojjvalam
तब उसने अपने शिविर को देखा, जो इंद्रपुरी के समान, तत्काल स्वर्णमय बना हुआ, विचित्र वैभव से देदीप्यमान था।
श्लोक 50 (skanda.3.97.50)
सोंतः प्रविश्य भवनं मोदमानो निशामुखे ॥ महामणिगणाकीर्णं हेमराशिसमुज्ज्वलम्
soṁtaḥ praviśya bhavanaṁ modamāno niśāmukhe mahāmaṇigaṇākīrṇaṁ hemarāśisamujjvalam
रात्रि के प्रारंभ में प्रसन्नतापूर्वक उस भवन में प्रवेश करके, जो महामणि-समूहों से भरा हुआ, स्वर्ण-राशियों से देदीप्यमान था,
श्लोक 51 (skanda.3.97.51)
तत्रापश्यत्स्वजननीं स्मरंतीमकुतोभयाम् ॥ महार्हरत्न पर्यंके सितशय्यामधिश्रिताम्
tatrāpaśyatsvajananīṁ smaraṁtīmakutobhayām mahārharatna paryaṁke sitaśayyāmadhiśritām
उसने वहाँ अपनी जननी को, अकुतोभय होकर उसका ही स्मरण करती हुई, अमूल्य रत्नों की शय्या पर श्वेत बिछावन पर विराजमान देखा।
श्लोक 52 (skanda.3.97.52)
रत्नालंकारदीप्तांगीं दिव्यांबरविराजिनीम् ॥ दिव्यलक्षणसंपन्नां साक्षात्सुरवधूमिव
ratnālaṁkāradīptāṁgīṁ divyāṁbaravirājinīm divyalakṣaṇasaṁpannāṁ sākṣātsuravadhūmiva
रत्नाभूषणों से देदीप्यमान अंगों वाली, दिव्य वस्त्रों से सुशोभित, दिव्य लक्षणों से सम्पन्न, वह साक्षात् देवांगना के समान प्रतीत होती थी।
श्लोक 53 (skanda.3.97.53)
जवेनोत्थापयामास संभ्रमोत्फुल्ललोचनः ॥ अंब जागृहि भद्रं ते पश्येदं महदद्भुतम्
javenotthāpayāmāsa saṁbhramotphullalocanaḥ aṁba jāgṛhi bhadraṁ te paśyedaṁ mahadadbhutam
संभ्रम से प्रफुल्लित नेत्रों वाला वह शीघ्रता से उसे जगाने लगा — 'माँ, जागो! तुम्हारा कल्याण हो — यह महान आश्चर्य देखो!'
श्लोक 54 (skanda.3.97.54)
इति प्रबोधिता गोपी स्वपुत्रेण महात्मना ॥ ततोऽपश्यत्स्वजननी स्मयन्ती मुकुटोज्ज्वला
iti prabodhitā gopī svaputreṇa mahātmanā tato'paśyatsvajananī smayantī mukuṭojjvalā
इस प्रकार अपने महात्मा पुत्र द्वारा जगाई गई वह गोपी, मुस्कराती हुई, मुकुट से देदीप्यमान होकर तब —
श्लोक 55 (skanda.3.97.55)
ससंभ्रमं समुत्थाय तत्सर्वं प्रत्यवेक्षत ॥ अपूर्वमिव चात्मानमपूर्वमिव बालकम्
sasaṁbhramaṁ samutthāya tatsarvaṁ pratyavekṣata apūrvamiva cātmānamapūrvamiva bālakam
— संभ्रमपूर्वक उठकर उस सब को देखने लगी — अपने आपको भी मानो अपूर्व और अपने बालक को भी मानो अपूर्व।
श्लोक 56 (skanda.3.97.56)
अपूर्वं च स्वसदनं दृष्ट्वा सीत्सुखविह्वला ॥ श्रुत्वा पुत्रमुखात्सर्वं प्रसादं गिरिजापतेः
apūrvaṁ ca svasadanaṁ dṛṣṭvā sītsukhavihvalā śrutvā putramukhātsarvaṁ prasādaṁ girijāpateḥ
अपने घर को भी अपूर्व देखकर वह सुख से विह्वल हो गई; पुत्र के मुख से गिरिजापति की सारी कृपा-कथा सुनकर,
श्लोक 57 (skanda.3.97.57)
राज्ञे विज्ञापयामास यो भजत्यनिशं शिवम् ॥ स राजा सहसागत्य समाप्त नियमो निशि
rājñe vijñāpayāmāsa yo bhajatyaniśaṁ śivam sa rājā sahasāgatya samāpta niyamo niśi
उसने राजा को — जो सतत शिव की भक्ति करता है — यह सूचना भिजवाई। वह राजा, रात्रि का अपना नियम पूरा करके, तुरंत वहाँ आया,
श्लोक 58 (skanda.3.97.58)
ददर्श गोपिकासूनोः प्रभावं शिवतोषजम् ॥ हिरण्मयं शिवस्थानं लिंगं मणिमयं तथा
dadarśa gopikāsūnoḥ prabhāvaṁ śivatoṣajam hiraṇmayaṁ śivasthānaṁ liṁgaṁ maṇimayaṁ tathā
और उसने गोपी-पुत्र के शिव-प्रसन्नता से उत्पन्न प्रभाव को देखा — स्वर्णमय शिव-स्थान को, मणिमय लिंग को,
श्लोक 59 (skanda.3.97.59)
गोपवध्वाश्च सदनं माणि क्यवरकोज्ज्वलम्॥ दृष्ट्वा महीपतिः सर्वं सामात्यः सपुरोहितः
gopavadhvāśca sadanaṁ māṇi kyavarakojjvalam dṛṣṭvā mahīpatiḥ sarvaṁ sāmātyaḥ sapurohitaḥ
और उत्तम माणिक्यों से देदीप्यमान गोपी के घर को भी। यह सब देखकर वह राजा, अपने मंत्री और पुरोहित सहित —
श्लोक 60 (skanda.3.97.60)
मुहूर्तं विस्मितधृतिः परमानंदनिर्भरः ॥ प्रेम्णा वाष्पजलं मुंचन्परिरेभे तम र्भकम्
muhūrtaṁ vismitadhṛtiḥ paramānaṁdanirbharaḥ premṇā vāṣpajalaṁ muṁcanparirebhe tama rbhakam
— क्षणभर विस्मित होकर, परमानंद से पूर्ण होकर, प्रेम से अश्रु बहाते हुए, उस बालक का आलिंगन करने लगा।
श्लोक 61 (skanda.3.97.61)
एवमत्यद्भुताकाराच्छिवमाहात्म्यकीर्त्तनात् ॥ पौराणां संभ्रमाच्चैव सा रात्रिः क्षणतामगात्
evamatyadbhutākārācchivamāhātmyakīrttanāt paurāṇāṁ saṁbhramāccaiva sā rātriḥ kṣaṇatāmagāt
इस प्रकार इस अत्यंत आश्चर्यजनक स्वरूप से, शिव-माहात्म्य के कीर्तन से, तथा नगरवासियों के उत्साह से, वह रात्रि क्षणमात्र में बीत गई।
श्लोक 62 (skanda.3.97.62)
अथ प्रभाते युद्धाय पुरं संरुध्य संस्थिताः ॥ राजानश्चारवक्त्रेभ्यः शुश्रुवुः परमाद्भुतम्
atha prabhāte yuddhāya puraṁ saṁrudhya saṁsthitāḥ rājānaścāravaktrebhyaḥ śuśruvuḥ paramādbhutam
तब प्रातःकाल, युद्ध के लिए नगर को घेरकर बैठे हुए राजाओं ने अपने गुप्तचरों के मुख से यह परम अद्भुत घटना सुनी।
श्लोक 63 (skanda.3.97.63)
ते त्यक्तवैराः सहसा राजानश्चकिता भृशम् ॥ न्यस्तशस्त्रा निविविशुश्चंद्रसेनानुमोदिताः
te tyaktavairāḥ sahasā rājānaścakitā bhṛśam nyastaśastrā niviviśuścaṁdrasenānumoditāḥ
वे राजा अत्यंत विस्मित होकर, तुरंत वैर त्यागकर, शस्त्र रखकर, चंद्रसेन की अनुमति से नगर में प्रविष्ट हुए।
श्लोक 64 (skanda.3.97.64)
तां प्रविश्य पुरीं रम्यां महाकालं प्रणम्य च ॥ तद्गोपवनितागेहमाजग्मुः सर्वभूभृतः
tāṁ praviśya purīṁ ramyāṁ mahākālaṁ praṇamya ca tadgopavanitāgehamājagmuḥ sarvabhūbhṛtaḥ
उस रमणीय नगरी में प्रवेश करके और महाकाल को प्रणाम करके, समस्त राजा उस गोपिका के घर पहुँचे।
श्लोक 65 (skanda.3.97.65)
ते तत्र चंद्रसेनेन प्रत्युद्गम्याभि पूजिताः ॥ महार्हविष्टरगताः प्रीत्यानंदन्सुविस्मिताः
te tatra caṁdrasenena pratyudgamyābhi pūjitāḥ mahārhaviṣṭaragatāḥ prītyānaṁdansuvismitāḥ
वहाँ चंद्रसेन द्वारा आगे बढ़कर सम्मानित होकर, अमूल्य आसनों पर बैठकर वे अत्यंत विस्मित होकर प्रेमपूर्वक आनंदित हुए।
श्लोक 66 (skanda.3.97.66)
गोपसूनोः प्रसादाय प्रादुर्भूतं शिवालयम् ॥ लिंगं च वीक्ष्य सुमहच्छिवे चक्रुः परां मतिम्
gopasūnoḥ prasādāya prādurbhūtaṁ śivālayam liṁgaṁ ca vīkṣya sumahacchive cakruḥ parāṁ matim
गोपी-पुत्र पर कृपा से प्रकट हुए उस महान शिवालय और लिंग को देखकर उन्होंने शिव के प्रति परम श्रद्धा उत्पन्न की।
श्लोक 67 (skanda.3.97.67)
तस्मै गोपकुमाराय प्रीतास्ते सर्वभूभुजः ॥ वासोहिरण्यरत्नानि गोमहिष्यादिकं धनम्
tasmai gopakumārāya prītāste sarvabhūbhujaḥ vāsohiraṇyaratnāni gomahiṣyādikaṁ dhanam
प्रसन्न होकर उन समस्त राजाओं ने उस गोप-कुमार को वस्त्र, स्वर्ण, रत्न, गौ-भैंस आदि धन,
श्लोक 68 (skanda.3.97.68)
गजानश्वान्रथान्रौक्माञ्छत्र यानपरिच्छदान् ॥ दासान्दासीरनेकाश्च ददुः शिवकृपार्थिनः
gajānaśvānrathānraukmāñchatra yānaparicchadān dāsāndāsīranekāśca daduḥ śivakṛpārthinaḥ
हाथी, घोड़े, रथ, स्वर्णाभूषण, छत्र, वाहन-सामग्री, तथा अनेक दास-दासियाँ शिव की कृपा की कामना करते हुए प्रदान किए।
श्लोक 69 (skanda.3.97.69)
येये सर्वेषु देशेषु गोपास्तिष्ठंति भूरिशः ॥ तेषां तमेव राजानं चक्रिरे सर्व पार्थिवाः
yeye sarveṣu deśeṣu gopāstiṣṭhaṁti bhūriśaḥ teṣāṁ tameva rājānaṁ cakrire sarva pārthivāḥ
और समस्त देशों में जितने भी गोप थे, उन सबका राजा उन्होंने उसी को बना दिया।
श्लोक 70 (skanda.3.97.70)
अथास्मिन्नंतरे सर्वैस्त्रिदशैरभिपूजितः ॥ प्रादुर्बभूव तेजस्वी हनूमान्वानरेश्वरः
athāsminnaṁtare sarvaistridaśairabhipūjitaḥ prādurbabhūva tejasvī hanūmānvānareśvaraḥ
तभी इसी बीच, समस्त देवताओं द्वारा पूजित, तेजस्वी वानरेश्वर हनुमान वहाँ प्रकट हुए।
श्लोक 71 (skanda.3.97.71)
तस्याभिगमनादेव राजानो जातसंभ्रमाः ॥ प्रत्युत्थाय नमश्चक्रुर्भक्तिनम्रात्ममूर्त्तयः
tasyābhigamanādeva rājāno jātasaṁbhramāḥ pratyutthāya namaścakrurbhaktinamrātmamūrttayaḥ
उनके आगमन मात्र से ही, राजा उत्साहित होकर उठ खड़े हुए और भक्तिपूर्वक झुककर उन्हें नमस्कार करने लगे।
श्लोक 72 (skanda.3.97.72)
तेषां मध्ये समासीनः पूजितः प्लवगेश्वरः ॥ गोपात्मजं समाश्लिष्य राज्ञो वीक्ष्येदमववीत्
teṣāṁ madhye samāsīnaḥ pūjitaḥ plavageśvaraḥ gopātmajaṁ samāśliṣya rājño vīkṣyedamavavīt
उनके मध्य विराजमान, पूजित वह वानरेश्वर, गोप-पुत्र का आलिंगन करके और राजाओं की ओर देखकर यह बोले —
श्लोक 73 (skanda.3.97.73)
सर्वे शृणुत भद्रं वो राजानो ये च देहिनः ॥ शिवपूजामृते नान्या गतिरस्ति शरीरिणाम
sarve śṛṇuta bhadraṁ vo rājāno ye ca dehinaḥ śivapūjāmṛte nānyā gatirasti śarīriṇāma
'सुनो सब लोगो, तुम्हारा कल्याण हो — जो भी राजा और प्राणी हैं — शिव-पूजा के अतिरिक्त प्राणियों की और कोई गति नहीं है।'
श्लोक 74 (skanda.3.97.74)
एष गोपसुतो दिष्ट्या प्रदोषे मंदवा सरे ॥ अमंत्रेणापि संपूज्य शिवं शिवमवाप्तवान्
eṣa gopasuto diṣṭyā pradoṣe maṁdavā sare amaṁtreṇāpi saṁpūjya śivaṁ śivamavāptavān
'यह गोप-पुत्र सौभाग्य से शनिवार की प्रदोष-बेला में, मंत्र के बिना ही शिव की पूजा करके, शिव को ही प्राप्त कर गया है।'
श्लोक 75 (skanda.3.97.75)
मंदवारे प्रदोषोऽयं दुर्लभः सर्वदेहिनाम् ॥ तत्रापि दुर्लभतरः कृष्णपक्षे समागते
maṁdavāre pradoṣo'yaṁ durlabhaḥ sarvadehinām tatrāpi durlabhataraḥ kṛṣṇapakṣe samāgate
'शनिवार की यह प्रदोष सभी प्राणियों के लिए दुर्लभ है; और उससे भी दुर्लभतर तब है जब यह कृष्णपक्ष में आ जाए।'
श्लोक 76 (skanda.3.97.76)
एष पुण्यतमो लोके गोपानां कीर्तिवर्धनः ॥ अस्य वंशेऽष्टमो भावी नंदोनाम महायशाः ॥ प्राप्स्यते तस्य पुत्रत्वं कृष्णो नारा यणः स्वयम्
eṣa puṇyatamo loke gopānāṁ kīrtivardhanaḥ asya vaṁśe'ṣṭamo bhāvī naṁdonāma mahāyaśāḥ prāpsyate tasya putratvaṁ kṛṣṇo nārā yaṇaḥ svayam
'यह लोक में अत्यंत पुण्यशाली, गोपों की कीर्ति बढ़ाने वाला है। इसके वंश में आठवीं पीढ़ी में नंद नामक महायशस्वी होगा; साक्षात् नारायण कृष्ण उसके पुत्र-रूप में जन्म लेंगे।'
श्लोक 77 (skanda.3.97.77)
अद्यप्रभृति लोकेस्मिन्नेष गोपालनंदनः ॥ नाम्ना श्रीकर इत्युच्चैर्लोके ख्यातिं गमिष्यति
adyaprabhṛti lokesminneṣa gopālanaṁdanaḥ nāmnā śrīkara ityuccairloke khyātiṁ gamiṣyati
'आज से इस लोक में यह गोपाल-पुत्र श्रीकर नाम से लोक में उच्च ख्याति को प्राप्त करेगा।'
श्लोक 78 (skanda.3.97.78)
सूत उवाच ॥ एवमुक्त्वांजनीसूनुस्तस्मै गोपकसूनवे ॥ उपदिश्य शिवाचारं तत्रैवांतरधीयत
sūta uvāca evamuktvāṁjanīsūnustasmai gopakasūnave upadiśya śivācāraṁ tatraivāṁtaradhīyata
सूत जी ने कहा — इस प्रकार कहकर अंजनी-पुत्र हनुमान ने उस गोपक-पुत्र को शिवाचार का उपदेश देकर वहीं अंतर्धान हो गए।
श्लोक 79 (skanda.3.97.79)
ते च सर्वे महीपालाः संहृष्टाः प्रतिपूजिताः ॥ चन्द्रसेनं समामंत्र्य प्रतिजग्मुर्यथागतम्
te ca sarve mahīpālāḥ saṁhṛṣṭāḥ pratipūjitāḥ candrasenaṁ samāmaṁtrya pratijagmuryathāgatam
और वे समस्त राजा प्रसन्न, सम्मानित होकर चंद्रसेन से विदा लेकर जैसे आए थे वैसे ही लौट गए।
श्लोक 80 (skanda.3.97.80)
श्रीकरोऽपि महातेजा उपदिष्टो हनूमता ॥ ब्राह्मणैः सह धर्मज्ञैश्चक्रे शम्भोः समर्हणम्
śrīkaro'pi mahātejā upadiṣṭo hanūmatā brāhmaṇaiḥ saha dharmajñaiścakre śambhoḥ samarhaṇam
महातेजस्वी श्रीकर भी, हनुमान द्वारा उपदिष्ट होकर, धर्मज्ञ ब्राह्मणों के साथ शंभु की पूजा करने लगा।
श्लोक 81 (skanda.3.97.81)
कालेन श्रीकरः सोऽपि चंद्रसेनश्च भूपतिः ॥ समाराध्य शिवं भक्त्या प्रापतुः परमं पदम्
kālena śrīkaraḥ so'pi caṁdrasenaśca bhūpatiḥ samārādhya śivaṁ bhaktyā prāpatuḥ paramaṁ padam
समय बीतने पर श्रीकर और राजा चंद्रसेन दोनों ने ही भक्तिपूर्वक शिव की आराधना करके परम पद को प्राप्त किया।
श्लोक 82 (skanda.3.97.82)
इदं रहस्यं परमं पवित्रं यशस्करं पुण्यमहर्द्धिवर्धनम् ॥ आख्यानमाख्यातमघौघनाशनं गौरीशपादांबुजभक्तिवर्धनम्
idaṁ rahasyaṁ paramaṁ pavitraṁ yaśaskaraṁ puṇyamaharddhivardhanam ākhyānamākhyātamaghaughanāśanaṁ gaurīśapādāṁbujabhaktivardhanam
यह परम पवित्र, यशस्कर, पुण्यवर्धक, समृद्धि बढ़ाने वाला रहस्य-आख्यान कहा गया, जो पाप-समूहों का नाशक और गौरीश के चरणकमलों की भक्ति को बढ़ाने वाला है।