ब्रह्म खण्ड · अध्याय 96
चतुर्दशी माहात्म्य
श्लोक 1 (skanda.3.96.1)
॥ सूत उवाच ॥ भूयोपि शिवमाहात्म्यं वक्ष्यामि परमाद्भुतम् ॥ शृण्वतां सर्वपापघ्नं भवपाशविमोचनम्
sūta uvāca bhūyopi śivamāhātmyaṁ vakṣyāmi paramādbhutam śṛṇvatāṁ sarvapāpaghnaṁ bhavapāśavimocanam
सूत जी ने कहा — मैं पुनः शिव का परम अद्भुत माहात्म्य कहूँगा, जो सुनने वालों के समस्त पापों का नाश करने वाला और भव-पाश से मुक्त करने वाला है।
श्लोक 2 (skanda.3.96.2)
दुस्तरे दुरितांभोधौ मज्जतां विषयात्मनाम् ॥ शिवपूजां विना कश्चित्प्लवो नास्ति निरूपितः
dustare duritāṁbhodhau majjatāṁ viṣayātmanām śivapūjāṁ vinā kaścitplavo nāsti nirūpitaḥ
दुस्तर पाप-सागर में डूबते हुए विषयासक्त प्राणियों के लिए शिव-पूजा के बिना कोई अन्य नौका नहीं बताई गई है।
श्लोक 3 (skanda.3.96.3)
शिवपूजां सदा कुर्याद्बुद्धिमानिह मानवः ॥ अशक्तश्चेत्कृता पूजां पश्येद्भक्तिविनम्रधीः
śivapūjāṁ sadā kuryādbuddhimāniha mānavaḥ aśaktaścetkṛtā pūjāṁ paśyedbhaktivinamradhīḥ
बुद्धिमान मनुष्य को यहाँ सदा शिव-पूजा करनी चाहिए; यदि वह असमर्थ हो, तो कम-से-कम भक्ति से विनम्र होकर उसे होते हुए देखे।
श्लोक 4 (skanda.3.96.4)
अश्रद्धयापि यः कुर्याच्छिवपूजां विमुक्तिदाम् ॥ पश्येद्वा सोपि कालेन प्रयाति परमं पदम्
aśraddhayāpi yaḥ kuryācchivapūjāṁ vimuktidām paśyedvā sopi kālena prayāti paramaṁ padam
जो श्रद्धा-रहित होकर भी मुक्तिदायिनी शिव-पूजा करता है, या उसे देखता ही है, वह भी काल के साथ परम पद को प्राप्त होता है।
श्लोक 5 (skanda.3.96.5)
आसीत्किरातदेशेषु नाम्ना राजा विमर्दनः ॥ शूरः परमदुर्द्धर्षो जितशत्रुः प्रतापवान्
āsītkirātadeśeṣu nāmnā rājā vimardanaḥ śūraḥ paramadurddharṣo jitaśatruḥ pratāpavān
किरात देशों में विमर्दन नामक एक राजा था — शूरवीर, अत्यंत दुर्जेय, शत्रुओं को जीतने वाला, प्रतापी।
श्लोक 6 (skanda.3.96.6)
सर्वदा मृगयासक्तः कृपणो निर्घृणो बली ॥ सर्वमांसाशनः क्रूरः सर्ववर्णांगनावृतः
sarvadā mṛgayāsaktaḥ kṛpaṇo nirghṛṇo balī sarvamāṁsāśanaḥ krūraḥ sarvavarṇāṁganāvṛtaḥ
सदा मृगया में लीन, कृपण, निर्दयी, बलवान, समस्त प्रकार का मांस खाने वाला, क्रूर, समस्त वर्णों की स्त्रियों से घिरा हुआ —
श्लोक 7 (skanda.3.96.7)
तथापि कुरुते शंभोः पूजां नित्यमतंद्रितः ॥ चतुर्दश्यां विशेषेण पक्षयोः शुक्लकृष्णयोः
tathāpi kurute śaṁbhoḥ pūjāṁ nityamataṁdritaḥ caturdaśyāṁ viśeṣeṇa pakṣayoḥ śuklakṛṣṇayoḥ
— फिर भी वह प्रतिदिन अथक भाव से शंभु की पूजा करता था, और विशेष रूप से शुक्ल तथा कृष्ण दोनों पक्षों की चतुर्दशी को।
श्लोक 8 (skanda.3.96.8)
महाविभवसंपन्नां पूजां कृत्वा स मोदते ॥ हर्षेण महताविष्टो नृत्यति स्तौति गायति
mahāvibhavasaṁpannāṁ pūjāṁ kṛtvā sa modate harṣeṇa mahatāviṣṭo nṛtyati stauti gāyati
महाविभवसंपन्न पूजा करके वह प्रसन्न होता था; अत्यंत हर्ष से युक्त होकर वह नाचता, स्तुति करता, गाता था।
श्लोक 9 (skanda.3.96.9)
तस्यैवं वर्तमानस्य नृपतेः सर्वभक्षिणः ॥ दुराचारस्य महिषी चेष्टितेनान्वतप्यत
tasyaivaṁ vartamānasya nṛpateḥ sarvabhakṣiṇaḥ durācārasya mahiṣī ceṣṭitenānvatapyata
इस प्रकार व्यवहार करने वाले, सर्वभक्षी, दुराचारी उस राजा की महारानी उसके इस आचरण से चिंतित रहती थी।
श्लोक 10 (skanda.3.96.10)
सा वै कुमुद्वतीनाम राज्ञी शीलगुणान्विता ॥ एकदा पतिमासाद्य रहस्ये तदपृच्छत
sā vai kumudvatīnāma rājñī śīlaguṇānvitā ekadā patimāsādya rahasye tadapṛcchata
शीलवती वह रानी, जिसका नाम कुमुद्वती था, एक बार एकांत में पति के पास जाकर उससे यह पूछने लगी —
श्लोक 11 (skanda.3.96.11)
एतत्ते चरितं राजन्महदाश्चर्यकारणम् ॥ क्व ते महादुराचारः क्व भक्तिः परमेश्वरे
etatte caritaṁ rājanmahadāścaryakāraṇam kva te mahādurācāraḥ kva bhaktiḥ parameśvare
'हे राजन्! आपका यह चरित्र मेरे लिए महान आश्चर्य का कारण है। कहाँ आपका महादुराचार, और कहाँ परमेश्वर के प्रति आपकी भक्ति?'
श्लोक 12 (skanda.3.96.12)
सर्वदा सर्वभक्षस्त्वं सर्वस्त्रीजनलालसः ॥ सर्वहिंसापरः क्रूरः कथं भक्तिस्तवेश्वरे
sarvadā sarvabhakṣastvaṁ sarvastrījanalālasaḥ sarvahiṁsāparaḥ krūraḥ kathaṁ bhaktistaveśvare
'आप सदा सर्वभक्षी हैं, सभी प्रकार की स्त्रियों की कामना करने वाले हैं, सभी प्रकार की हिंसा में रत, क्रूर हैं — फिर आपमें ईश्वर की भक्ति कैसे है?'
श्लोक 13 (skanda.3.96.13)
इति पृष्टः स भूपालो विमृश्य सुचिरं ततः ॥ त्रिकालज्ञः प्रहस्यैनां प्रोवाच सुकुतूहलः
iti pṛṣṭaḥ sa bhūpālo vimṛśya suciraṁ tataḥ trikālajñaḥ prahasyaināṁ provāca sukutūhalaḥ
इस प्रकार पूछे जाने पर, त्रिकालज्ञ वह राजा बहुत देर तक विचार करके, फिर मुस्कराते हुए, स्वयं भी कुतूहलपूर्ण होकर उससे बोला —
श्लोक 14 (skanda.3.96.14)
राजोवाच ॥ अहं पूर्वभवे कश्चित्सारमेयो वरानने ॥ पंपानगरमाश्रित्य पर्यटामि समंततः
rājovāca ahaṁ pūrvabhave kaścitsārameyo varānane paṁpānagaramāśritya paryaṭāmi samaṁtataḥ
राजा ने कहा — हे वरानने! मैं पूर्वजन्म में कोई कुत्ता था; पंपा नगरी के निकट रहते हुए मैं सर्वत्र भ्रमण करता था।
श्लोक 15 (skanda.3.96.15)
एवं कालेषु गच्छत्सु तत्रैव नगरोत्तमे ॥ कदाचिदागतः सोहं मनोज्ञं शिवमंदिरम्
evaṁ kāleṣu gacchatsu tatraiva nagarottame kadācidāgataḥ sohaṁ manojñaṁ śivamaṁdiram
इस प्रकार समय बीतते हुए, उसी उत्तम नगरी में एक बार मैं एक मनोहर शिव-मंदिर के पास पहुँचा।
श्लोक 16 (skanda.3.96.16)
पूजायां वर्तमानायां चतुर्दश्यां महातिथौ ॥ अपश्यमुत्सवं दूराद्बहिर्द्वारं समाश्रितः
pūjāyāṁ vartamānāyāṁ caturdaśyāṁ mahātithau apaśyamutsavaṁ dūrādbahirdvāraṁ samāśritaḥ
वहाँ पूजा हो रही थी, चतुर्दशी की महातिथि पर; मैं बाहरी द्वार के निकट रहकर दूर से ही उस उत्सव को देखता रहा।
श्लोक 17 (skanda.3.96.17)
अथाहं परमक्रुद्धैर्दंडहस्तैः प्रधावितः ॥ तस्माद्देशादपक्रांतः प्राणरक्षापरायणः
athāhaṁ paramakruddhairdaṁḍahastaiḥ pradhāvitaḥ tasmāddeśādapakrāṁtaḥ prāṇarakṣāparāyaṇaḥ
तब अत्यंत क्रुद्ध, हाथों में दंड लिए लोगों ने मुझे भगा दिया, और मैं प्राण-रक्षा में तत्पर होकर उस स्थान से भाग गया।
श्लोक 18 (skanda.3.96.18)
ततः प्रदक्षिणीकृत्य मनोज्ञं शिवमंदिरम् ॥ द्वारदेशं पुनः प्राप्य पुनश्चैव निवारितः
tataḥ pradakṣiṇīkṛtya manojñaṁ śivamaṁdiram dvāradeśaṁ punaḥ prāpya punaścaiva nivāritaḥ
तब मैंने उस मनोहर शिव-मंदिर की प्रदक्षिणा करके पुनः द्वार-प्रदेश में जाकर पुनः भगाया गया।
श्लोक 19 (skanda.3.96.19)
पुनः प्रदक्षिणीकृत्य तदेव शिवमन्दिरम् ॥ बलिपिंडादिलोभेन पुनर्द्वारमुपागतः
punaḥ pradakṣiṇīkṛtya tadeva śivamandiram balipiṁḍādilobhena punardvāramupāgataḥ
उसी शिव-मंदिर की पुनः प्रदक्षिणा करके, बलि-पिंड आदि की लालसा से मैं फिर द्वार पर आ पहुँचा।
श्लोक 20 (skanda.3.96.20)
एवं पुनःपुनस्तत्र कृत्वा कृत्वा प्रदक्षिणाम् ॥ द्वारदेशे समासीनं निजघ्नुर्निशितैः शरैः
evaṁ punaḥpunastatra kṛtvā kṛtvā pradakṣiṇām dvāradeśe samāsīnaṁ nijaghnurniśitaiḥ śaraiḥ
इस प्रकार बार-बार वहाँ प्रदक्षिणा करते हुए, जब मैं द्वार-प्रदेश में बैठा, तब उन्होंने तीक्ष्ण बाणों से मुझे मार डाला।
श्लोक 21 (skanda.3.96.21)
स विद्धगात्रः सहसा शिवद्वारि गतासुकः ॥ जातोऽस्म्यहं कुले राज्ञां प्रभावाच्छिवसन्निधेः
sa viddhagātraḥ sahasā śivadvāri gatāsukaḥ jāto'smyahaṁ kule rājñāṁ prabhāvācchivasannidheḥ
शरीर में बाण लगने से अचानक मेरे प्राण शिव के द्वार पर ही निकल गए; उस शिव-सान्निध्य के प्रभाव से मैं राजवंश में जन्मा।
श्लोक 22 (skanda.3.96.22)
दृष्ट्वा चतुर्दशीपूजां दीपमाला विलोकिताः ॥ तेन पुण्येन महता त्रिकालज्ञोऽस्मि भामिनि
dṛṣṭvā caturdaśīpūjāṁ dīpamālā vilokitāḥ tena puṇyena mahatā trikālajño'smi bhāmini
चतुर्दशी की पूजा देखने और दीपमाला के दर्शन करने के उसी महान पुण्य से, हे भामिनि! मैं त्रिकालज्ञ हूँ।
श्लोक 23 (skanda.3.96.23)
प्राग्जन्मवासनाभिश्च सर्वभक्षोऽस्मि निर्घृणः ॥ विदुषामपि दुर्लंघ्या प्रकृतिर्वासनामयी
prāgjanmavāsanābhiśca sarvabhakṣo'smi nirghṛṇaḥ viduṣāmapi durlaṁghyā prakṛtirvāsanāmayī
किंतु पूर्वजन्म की वासनाओं के कारण मैं निर्दयी, सर्वभक्षी हूँ; क्योंकि विद्वानों के लिए भी वासनामयी प्रकृति को लाँघना कठिन है।
श्लोक 24 (skanda.3.96.24)
अतोऽहमर्चयामीशं चतुर्दश्यां जगद्गुरुम् ॥ त्वमपि श्रद्धया भद्रे भज देवं पिनाकिनम्
ato'hamarcayāmīśaṁ caturdaśyāṁ jagadgurum tvamapi śraddhayā bhadre bhaja devaṁ pinākinam
अतः मैं चतुर्दशी को जगद्गुरु ईश्वर की अर्चना करता हूँ; तुम भी, हे भद्रे! श्रद्धापूर्वक पिनाकधारी देव की भक्ति करो।
श्लोक 25 (skanda.3.96.25)
राज्ञ्युवाच ॥ त्रिकालज्ञोऽसि राजेन्द्र प्रसादाद्गिरिजापतेः ॥ मत्पूर्वजन्मचरितं वक्तुमर्हसि तत्त्वतः
rājñyuvāca trikālajño'si rājendra prasādādgirijāpateḥ matpūrvajanmacaritaṁ vaktumarhasi tattvataḥ
रानी ने कहा — हे राजेन्द्र! गिरिजापति की कृपा से आप त्रिकालज्ञ हैं; मेरे पूर्वजन्म का चरित्र भी मुझे यथार्थ रूप से बताइए।
श्लोक 26 (skanda.3.96.26)
राजोवाच ॥ त्वं तु पूर्वभवे काचित्कपोती व्योमचारिणी ॥ क्वापि लब्धवती किंचिन्मां सपिंडं यदृच्छया
rājovāca tvaṁ tu pūrvabhave kācitkapotī vyomacāriṇī kvāpi labdhavatī kiṁcinmāṁ sapiṁḍaṁ yadṛcchayā
राजा ने कहा — तुम तो पूर्वजन्म में आकाश में विचरण करने वाली कोई कबूतरी थीं, जिसे कहीं संयोगवश थोड़ा-सा मांस-पिंड प्राप्त हुआ था, जिसका मैं एक अंश था।
श्लोक 27 (skanda.3.96.27)
त्वद्गृहीतमथालोक्य गृध्रः कोप्यामिषं बली । निरामिषः स्वयं वेगाभिदुद्राव भीषणः
tvadgṛhītamathālokya gṛdhraḥ kopyāmiṣaṁ balī nirāmiṣaḥ svayaṁ vegābhidudrāva bhīṣaṇaḥ
तुम्हारे द्वारा लिए गए उस मांस को देखकर कोई शक्तिशाली, स्वयं मांसरहित गीध वेगपूर्वक तुम्हारी ओर भयंकर रूप से दौड़ा।
श्लोक 28 (skanda.3.96.28)
ततस्तं वीक्ष्य वित्रस्ता विद्रुतासि वरानने ॥ तेनानुयाता घोरेण मांसपिंडजिघृक्षया
tatastaṁ vīkṣya vitrastā vidrutāsi varānane tenānuyātā ghoreṇa māṁsapiṁḍajighṛkṣayā
तब उसे देखकर भयभीत होकर, हे वरानने! तुम भाग गईं, उस मांस-पिंड को छीनने की इच्छा से उस भयंकर पक्षी द्वारा पीछा की गईं।
श्लोक 29 (skanda.3.96.29)
दिष्ट्या श्रीगिरिमासाद्य श्रांता तत्र शिवालयम् ॥ प्रदक्षिणं परिक्रम्य ध्वजाग्रे समुपस्थिता
diṣṭyā śrīgirimāsādya śrāṁtā tatra śivālayam pradakṣiṇaṁ parikramya dhvajāgre samupasthitā
सौभाग्य से श्रीगिरि पर पहुँचकर, थकी हुई तुमने वहाँ शिवालय की प्रदक्षिणा करके ध्वज के शिखर पर आश्रय लिया।
श्लोक 30 (skanda.3.96.30)
अथानुसृत्य सहसा तीक्ष्णतुंडो विहंगमः ॥ त्वां निहत्य निपात्याधो मांसमादाय जग्मिवान्
athānusṛtya sahasā tīkṣṇatuṁḍo vihaṁgamaḥ tvāṁ nihatya nipātyādho māṁsamādāya jagmivān
तब उस तीक्ष्ण-चोंच वाले पक्षी ने पीछा करके अचानक तुम्हें मारकर नीचे गिरा दिया और मांस लेकर चला गया।
श्लोक 31 (skanda.3.96.31)
प्रदक्षिणप्रक्रमणाद्देवदेवस्य शूलिनः॥ तस्याग्रे मरणाच्चैव जातासीह नृपांगना
pradakṣiṇaprakramaṇāddevadevasya śūlinaḥ tasyāgre maraṇāccaiva jātāsīha nṛpāṁganā
त्रिशूलधारी देवाधिदेव की प्रदक्षिणा के फल से, तथा उनके सम्मुख ही मृत्यु होने से, तुम यहाँ राजरानी बनकर जन्मीं।
श्लोक 32 (skanda.3.96.32)
राज्ञ्युवाच ॥ श्रुतं सर्वमशेषेण प्राग्जन्मचरेितं मया ॥ जातं च महदाश्चर्यं भक्तिश्च मम चेतसि ॥ अथान्यच्छ्रोतुमिच्छामि त्रिकालज्ञ महामते ॥ इदं शरीरमुत्सृज्य यास्यावः कां गतिं पुनः । |
rājñyuvāca śrutaṁ sarvamaśeṣeṇa prāgjanmacareitaṁ mayā jātaṁ ca mahadāścaryaṁ bhaktiśca mama cetasi athānyacchrotumicchāmi trikālajña mahāmate idaṁ śarīramutsṛjya yāsyāvaḥ kāṁ gatiṁ punaḥ |
रानी ने कहा — मैंने अपना सम्पूर्ण पूर्वजन्म-चरित्र सुन लिया। मेरे मन में महान आश्चर्य और भक्ति दोनों उत्पन्न हुए हैं। अब, हे त्रिकालज्ञ महामते! मैं अन्य बात सुनना चाहती हूँ — इस शरीर को त्यागकर हम फिर किस गति को प्राप्त होंगे?
श्लोक 33 (skanda.3.96.33)
राजोवाच ॥ अतो भवे जनिष्येऽहं द्वितीये सैंधवो नृपः
rājovāca ato bhave janiṣye'haṁ dvitīye saiṁdhavo nṛpaḥ
राजा ने कहा — इस जन्म से दूसरे जन्म में मैं सिंधु देश का राजा बनूँगा।
श्लोक 34 (skanda.3.96.34)
सृंजयेशसुता त्वं हि मामेव प्रतिपत्स्यसे ॥ तृतीये तु भवे राजा सौराष्ट्रे भविताऽस्म्यहम्
sṛṁjayeśasutā tvaṁ hi māmeva pratipatsyase tṛtīye tu bhave rājā saurāṣṭre bhavitā'smyaham
तुम सृंजयराज की पुत्री होकर मुझे ही पति रूप में प्राप्त करोगी। तीसरे जन्म में मैं सौराष्ट्र का राजा बनूँगा।
श्लोक 35 (skanda.3.96.35)
कलिंगराजतनया त्वं मे पत्नी भविष्यसि ॥ चतुर्थे तु भविष्यामि भवे गांधारभूमिपः
kaliṁgarājatanayā tvaṁ me patnī bhaviṣyasi caturthe tu bhaviṣyāmi bhave gāṁdhārabhūmipaḥ
कलिंग-राज की पुत्री होकर तुम मेरी पत्नी बनोगी। चौथे जन्म में मैं गांधार देश का राजा बनूँगा।
श्लोक 36 (skanda.3.96.36)
मागधी राजतनया तत्र त्वं मम गेहिनी ॥ पंचमेऽवंतिनाथोऽहं भविष्यामि भवांतरे
māgadhī rājatanayā tatra tvaṁ mama gehinī paṁcame'vaṁtinātho'haṁ bhaviṣyāmi bhavāṁtare
मगध-राज की पुत्री होकर तुम वहाँ मेरी गृहिणी बनोगी। पाँचवें जन्म में मैं अवंति का स्वामी बनूँगा।
श्लोक 37 (skanda.3.96.37)
दाशार्हराजतनया त्वमेव मम वल्लभा॥ अस्माज् जन्मनि षष्ठेऽहमानर्ते भविता नृपः
dāśārharājatanayā tvameva mama vallabhā asmāj janmani ṣaṣṭhe'hamānarte bhavitā nṛpaḥ
दाशार्ह-राज की पुत्री होकर तुम ही मेरी प्रिया बनोगी। इससे छठे जन्म में मैं आनर्त देश का राजा बनूँगा।
श्लोक 38 (skanda.3.96.38)
ययातिवंशजा कन्या भूत्वा मामेव यास्यसि ॥ पांड्यराजकुमारोऽहँ सप्तमे भविता भवे
yayātivaṁśajā kanyā bhūtvā māmeva yāsyasi pāṁḍyarājakumāro'ham̐ saptame bhavitā bhave
ययाति-वंश में उत्पन्न कन्या बनकर तुम पुनः मुझे ही प्राप्त होगी। सातवें जन्म में मैं पांड्य-राजकुमार बनूँगा।
श्लोक 39 (skanda.3.96.39)
तत्र मत्सदृशो नान्यो रूपौदार्यगुणादिभिः ॥ सर्वशास्त्रार्थतत्त्वज्ञो बलवान्दृढविक्रमः
tatra matsadṛśo nānyo rūpaudāryaguṇādibhiḥ sarvaśāstrārthatattvajño balavāndṛḍhavikramaḥ
वहाँ रूप, उदारता आदि गुणों में मेरे समान कोई अन्य नहीं होगा; मैं समस्त शास्त्रों के अर्थ-तत्त्व का ज्ञाता, बलवान, दृढ़ पराक्रमी,
श्लोक 40 (skanda.3.96.40)
सर्वलक्षणसंपन्नः सर्वलोकमनोरमः ॥ पद्मवर्ण इति ख्यातः पद्ममित्रसमद्युतिः
sarvalakṣaṇasaṁpannaḥ sarvalokamanoramaḥ padmavarṇa iti khyātaḥ padmamitrasamadyutiḥ
समस्त शुभ लक्षणों से सम्पन्न, सम्पूर्ण जगत् को मनभावन, पद्मवर्ण नाम से विख्यात, सूर्य के समान कांतिमान होऊँगा।
श्लोक 41 (skanda.3.96.41)
भविता त्वं च वैदर्भी रूपेणाप्रतिमा भुवि ॥ नाम्ना वसुमती ख्याता रूपावयवशोभिनी
bhavitā tvaṁ ca vaidarbhī rūpeṇāpratimā bhuvi nāmnā vasumatī khyātā rūpāvayavaśobhinī
और तुम विदर्भ की राजकुमारी होकर पृथ्वी पर रूप में अनुपम, वसुमती नाम से विख्यात, सुंदर अंगों वाली होगी,
श्लोक 42 (skanda.3.96.42)
सर्व राजकुमाराणां मनोनयननंदिनी ॥ सा त्वं स्वयंवरे सर्वान्विहाय नृपनंदनान्
sarva rājakumārāṇāṁ manonayananaṁdinī sā tvaṁ svayaṁvare sarvānvihāya nṛpanaṁdanān
समस्त राजकुमारों के मन और नेत्रों को आनंदित करने वाली। तुम स्वयंवर में उन सभी राजकुमारों को त्यागकर —
श्लोक 43 (skanda.3.96.43)
वरं प्राप्स्यसि मामेव दमयंतीव नैषधम् ॥ सोऽहं जित्वा नृपान्सर्वान्प्राप्य त्वां वरवर्णिनीम्
varaṁ prāpsyasi māmeva damayaṁtīva naiṣadham so'haṁ jitvā nṛpānsarvānprāpya tvāṁ varavarṇinīm
— जैसे दमयंती ने नैषध (नल) को चुना, वैसे ही मुझे ही वर के रूप में चुनोगी। मैं उन समस्त राजाओं को जीतकर तुम्हें, हे सुंदरी, प्राप्त करके —
श्लोक 44 (skanda.3.96.44)
स्वराष्ट्रस्थोऽखिलान्भोगान्भोक्ष्ये वर्षगणान्बहून् ॥ इष्ट्वा च विविधैर्यज्ञैर्वाजिमेधादिभिः शुभैः
svarāṣṭrastho'khilānbhogānbhokṣye varṣagaṇānbahūn iṣṭvā ca vividhairyajñairvājimedhādibhiḥ śubhaiḥ
अपने राज्य में स्थित होकर अनेक वर्षों तक समस्त भोग भोगूँगा, और अश्वमेध आदि विविध शुभ यज्ञों से यजन करके,
श्लोक 45 (skanda.3.96.45)
संतर्प्य पितृदेवर्षीन्दानैश्च द्विजसत्तमान् ॥ संपूज्य देवदेवेशं शंकरं लोकशंकरम्
saṁtarpya pitṛdevarṣīndānaiśca dvijasattamān saṁpūjya devadeveśaṁ śaṁkaraṁ lokaśaṁkaram
दान द्वारा पितरों, देवताओं, ऋषियों और श्रेष्ठ ब्राह्मणों को संतुष्ट करके, लोक-कल्याणकारी देवाधिदेव शंकर की पूजा करके,
श्लोक 46 (skanda.3.96.46)
पुत्रे राज्यधुरं न्यस्य गंतास्मि तपसे वनम् ॥ तत्रागस्त्यान्मुनिवराद्ब्रह्मज्ञानमवाप्य च
putre rājyadhuraṁ nyasya gaṁtāsmi tapase vanam tatrāgastyānmunivarādbrahmajñānamavāpya ca
राज्य का भार पुत्र को सौंपकर तप के लिए वन को जाऊँगा। वहाँ श्रेष्ठ मुनि अगस्त्य से ब्रह्मज्ञान प्राप्त करके,
श्लोक 47 (skanda.3.96.47)
त्वया सह गमिष्यामि शिवस्य परमं पदम् । चतुर्दश्यां चतुर्दश्यामेवं संपूज्य शंकरम्
tvayā saha gamiṣyāmi śivasya paramaṁ padam caturdaśyāṁ caturdaśyāmevaṁ saṁpūjya śaṁkaram
तुम्हारे साथ ही मैं शिव के परम पद को प्राप्त करूँगा। इस प्रकार प्रत्येक चतुर्दशी को शंकर की पूजा करके —
श्लोक 48 (skanda.3.96.48)
सप्तजन्मसु राजस्त्वं भविष्यति वरानने ॥ इत्येतत्सुकृतं लब्धं पूज़ादर्शनमात्रतः ॥ क्व सारमेयो दुष्टात्मा क्वेदृशी बत सङ्गतिः
saptajanmasu rājastvaṁ bhaviṣyati varānane ityetatsukṛtaṁ labdhaṁ pūja़ādarśanamātrataḥ kva sārameyo duṣṭātmā kvedṛśī bata saṅgatiḥ
— हे वरानने! तुम सात जन्मों तक रानी बनोगी — इस प्रकार यह पुण्य केवल पूजा के दर्शन-मात्र से प्राप्त हुआ। कहाँ मैं दुष्टात्मा कुत्ता, और कहाँ ऐसी संगति — अहो, कैसा आश्चर्य है!
श्लोक 49 (skanda.3.96.49)
सूत उवाच॥ इत्युक्तो निजनाथेन सा राज्ञी शुभलक्षणा
sūta uvāca ityukto nijanāthena sā rājñī śubhalakṣaṇā
सूत जी ने कहा — अपने पति द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर, वह शुभलक्षणा रानी —
श्लोक 50 (skanda.3.96.50)
परं विस्मयमापन्ना पूजयामास तं मुदा ॥ सोऽपि राजा तया सार्द्धं भुक्त्वा भोगान्यथेप्सितान्
paraṁ vismayamāpannā pūjayāmāsa taṁ mudā so'pi rājā tayā sārddhaṁ bhuktvā bhogānyathepsitān
— अत्यंत विस्मित होकर हर्षपूर्वक उसकी पूजा करने लगी। वह राजा भी उसके साथ यथेच्छ भोगों को भोगकर,
श्लोक 51 (skanda.3.96.51)
जगाम सप्तजन्मांते शंभोस्तत्परमं पदम् ॥ य एतच्छिवपूजाया माहात्म्यं परमाद्भुतम् ॥ शृणुयात्कीर्तयेद्वापि स गच्छेत्परमं पदम्
jagāma saptajanmāṁte śaṁbhostatparamaṁ padam ya etacchivapūjāyā māhātmyaṁ paramādbhutam śṛṇuyātkīrtayedvāpi sa gacchetparamaṁ padam
सात जन्मों के अंत में शंभु के उसी परम पद को प्राप्त हुआ। जो कोई भी शिव-पूजा के इस परम अद्भुत माहात्म्य को सुनता है अथवा कीर्तन करता है, वह परम पद को प्राप्त होता है।