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ब्रह्म खण्ड · अध्याय 95

गोकर्ण में चांडाली का उद्धार

अध्याय 94अध्याय-सूचीअध्याय 96

श्लोक 1 (skanda.3.95.1)

॥ राजोवाच ॥ किं दृष्टं भवता ब्रह्मन्नाश्चर्यं पथि कुत्र वा ॥ तन्ममाख्याहि येनाहं कृतकृत्यत्वमाप्नुयाम्

rājovāca kiṁ dṛṣṭaṁ bhavatā brahmannāścaryaṁ pathi kutra vā tanmamākhyāhi yenāhaṁ kṛtakṛtyatvamāpnuyām

राजा ने कहा — हे ब्रह्मन्! आपने मार्ग में कहाँ और क्या आश्चर्य देखा? वह मुझे बताइए, जिससे मैं भी कृतकृत्य हो सकूँ।

श्लोक 2 (skanda.3.95.2)

गौतम उवाच ॥ गोकर्णादहमागच्छन्क्वापि देशे विशांपते ॥ जाते मध्याह्नसमये लब्ध वान्विमलं सरः

gautama uvāca gokarṇādahamāgacchankvāpi deśe viśāṁpate jāte madhyāhnasamaye labdha vānvimalaṁ saraḥ

गौतम ने कहा — हे राजन्! गोकर्ण से आते हुए मैंने किसी देश में, मध्याह्न होने पर, एक निर्मल सरोवर पाया।

श्लोक 3 (skanda.3.95.3)

तत्रोपस्पृश्य सलिलं विनीय च पथिश्रमम् ॥ सुस्निग्धशीतलच्छायं न्यग्रोधं समुपाश्रयम्

tatropaspṛśya salilaṁ vinīya ca pathiśramam susnigdhaśītalacchāyaṁ nyagrodhaṁ samupāśrayam

वहाँ जल का स्पर्श करके और मार्ग की थकान दूर करके मैंने अत्यंत स्निग्ध, शीतल छाया वाले एक वटवृक्ष का आश्रय लिया।

श्लोक 4 (skanda.3.95.4)

अथाविदूरे चांडालीं वृद्धामंधां कृशाकृतिम् ॥ शुष्यन्मुखीं निराहारां बहुरोगनिपीडिताम्

athāvidūre cāṁḍālīṁ vṛddhāmaṁdhāṁ kṛśākṛtim śuṣyanmukhīṁ nirāhārāṁ bahuroganipīḍitām

तब कुछ ही दूरी पर मैंने एक वृद्धा, अंधी, कृशकाय चांडाल स्त्री देखी, जिसका मुख सूखा हुआ था, जो निराहार थी, अनेक रोगों से पीड़ित थी,

श्लोक 5 (skanda.3.95.5)

कुष्ठव्रणपरीतांगीमुद्यत्कृमिकुलाकुलाम् ॥ पूयशोणितसंसक्तजरत्पटल सत्कटीम्

kuṣṭhavraṇaparītāṁgīmudyatkṛmikulākulām pūyaśoṇitasaṁsaktajaratpaṭala satkaṭīm

जिसका शरीर कुष्ठ-व्रणों से भरा था और कीड़ों से खदबदा रहा था, जिसकी कमर पर बँधा जीर्ण वस्त्र पीप और रक्त से सना था,

श्लोक 6 (skanda.3.95.6)

महायक्ष्मगलस्थेन कंठसंरोधविह्वलाम् ॥ विनष्टदंतामव्यक्तां विलुठंतीं मुहुर्मुहुः

mahāyakṣmagalasthena kaṁṭhasaṁrodhavihvalām vinaṣṭadaṁtāmavyaktāṁ viluṭhaṁtīṁ muhurmuhuḥ

जो गले में स्थित महारोग यक्ष्मा से कंठावरोध होने के कारण विह्वल थी, जिसके दाँत नष्ट हो चुके थे, जो अस्पष्ट वाणी में बार-बार लोटती-पोटती थी,

श्लोक 7 (skanda.3.95.7)

चंडार्ककिरणस्पृष्टखरोष्णरजसाप्लुताम्॥ विण्मूत्रपूयदिग्धांगीमसृग्गंधदुरासदाम्

caṁḍārkakiraṇaspṛṣṭakharoṣṇarajasāplutām viṇmūtrapūyadigdhāṁgīmasṛggaṁdhadurāsadām

जो तीखी सूर्य-किरणों से स्पर्शित तप्त धूल से आप्लावित थी, जिसका शरीर मल-मूत्र-पीप से सना था, जो रक्त की गंध से दुर्गम्य थी,

श्लोक 8 (skanda.3.95.8)

कफरोगबहुश्वासश्लथन्नाडीबहुव्यथाम् ॥ विध्वस्तकेशावयवामपश्यं मरणोन्मुखीम्

kapharogabahuśvāsaślathannāḍībahuvyathām vidhvastakeśāvayavāmapaśyaṁ maraṇonmukhīm

जो कफ-रोग, अनेक बार साँस लेने और शिथिल नाड़ी से बहुत व्यथित थी, जिसके केश और अंग विध्वस्त हो चुके थे — मैंने उसे मरणासन्न देखा।

श्लोक 9 (skanda.3.95.9)

तादृग्व्यथां च तां वीक्ष्य कृपयाहं परिप्लुतः ॥ प्रतीक्षन्मरणं तस्याः क्षणं तत्रैव संस्थितः

tādṛgvyathāṁ ca tāṁ vīkṣya kṛpayāhaṁ pariplutaḥ pratīkṣanmaraṇaṁ tasyāḥ kṣaṇaṁ tatraiva saṁsthitaḥ

उसकी ऐसी व्यथा देखकर मैं करुणा से आप्लावित हो गया, और उसकी मृत्यु की प्रतीक्षा करते हुए एक क्षण के लिए वहीं ठहर गया।

श्लोक 10 (skanda.3.95.10)

अथांतरिक्षपदवीं सिंचंतमिव रश्मिभिः ॥ दिव्यं विमानमानीतमद्राक्षं शिवकिंकरैः

athāṁtarikṣapadavīṁ siṁcaṁtamiva raśmibhiḥ divyaṁ vimānamānītamadrākṣaṁ śivakiṁkaraiḥ

तभी मैंने आकाश-मार्ग को मानो अपनी किरणों से सींचता हुआ, शिव के किंकरों द्वारा लाया गया एक दिव्य विमान देखा।

श्लोक 11 (skanda.3.95.11)

तस्मिन्रवींदुवह्नीनां तेजसामिव पंजरे ॥ विमाने सूर्यसंकाशानपश्यं शिवकिंकरान्

tasminravīṁduvahnīnāṁ tejasāmiva paṁjare vimāne sūryasaṁkāśānapaśyaṁ śivakiṁkarān

सूर्य, चंद्र और अग्नि के तेजों के पिंजर-सा उस विमान में मैंने सूर्य के समान तेजस्वी शिव के किंकरों को देखा।

श्लोक 12 (skanda.3.95.12)

ते वै त्रिशूलखट्वांगटंकचर्मासिपाणयः ॥ चंद्रार्धभूषणाः सांद्रचंद्रकुंदोरुवर्चसः

te vai triśūlakhaṭvāṁgaṭaṁkacarmāsipāṇayaḥ caṁdrārdhabhūṣaṇāḥ sāṁdracaṁdrakuṁdoruvarcasaḥ

वे त्रिशूल, खट्वांग, टंक, ढाल और तलवार हाथों में धारण किए हुए थे, अर्धचंद्र से भूषित, चंद्रमा और कुंद पुष्प के समान सघन कांति वाले थे।

श्लोक 13 (skanda.3.95.13)

किरीटकुंडलभ्राजन्महाहिवलयोज्ज्वलाः ॥ शिवानुगा मया दृष्टा श्चत्वारः शुभलक्षणाः

kirīṭakuṁḍalabhrājanmahāhivalayojjvalāḥ śivānugā mayā dṛṣṭā ścatvāraḥ śubhalakṣaṇāḥ

मुकुट-कुंडलों से चमकते, महासर्प-कंकणों से उज्ज्वल — मैंने ऐसे शुभ लक्षणों वाले शिव के चार अनुचरों को देखा।

श्लोक 14 (skanda.3.95.14)

तानापतत आलोक्य विमानस्थान्सुविस्मितः ॥ उपसृत्यांतिके वेगादपृच्छं गगने स्थितान्

tānāpatata ālokya vimānasthānsuvismitaḥ upasṛtyāṁtike vegādapṛcchaṁ gagane sthitān

विमान में स्थित उन्हें उतरते देखकर मैं अत्यंत विस्मित हुआ; वेगपूर्वक निकट जाकर मैंने आकाश में स्थित उनसे पूछा —

श्लोक 15 (skanda.3.95.15)

नमोनमो वस्त्रिदशोत्तमेभ्यस्त्रिलोचनश्रीचरणानुगेभ्यः ॥ त्रिलोकरक्षाविधिमावहद्भ्यस्त्रिशूलचर्मासिगदाधरेभ्यः

namonamo vastridaśottamebhyastrilocanaśrīcaraṇānugebhyaḥ trilokarakṣāvidhimāvahadbhyastriśūlacarmāsigadādharebhyaḥ

'त्रिदेवों में श्रेष्ठ, त्रिलोचन के श्रीचरणों के अनुगामी, त्रिलोक-रक्षा का कार्य वहन करने वाले, त्रिशूल-चर्म-असि-गदा धारण करने वालो, तुम्हें बार-बार नमस्कार है —

श्लोक 16 (skanda.3.95.16)

विदिता हि मया यूयं महेश्वरपदा नुगाः ॥ इयं वो लोकरक्षार्था गतिराहो विनोदजा

viditā hi mayā yūyaṁ maheśvarapadā nugāḥ iyaṁ vo lokarakṣārthā gatirāho vinodajā

मैं जानता हूँ कि आप महेश्वर के चरणों के अनुगामी हैं; क्या यह आपकी यात्रा लोक-रक्षा के लिए है, या किसी विनोद से उत्पन्न?'

श्लोक 17 (skanda.3.95.17)

उत सर्वजनाघौघविजयाय कृतोद्यमाः ॥ ब्रूत कारुण्यतो मह्यं यस्माद्यूयमिहागताः

uta sarvajanāghaughavijayāya kṛtodyamāḥ brūta kāruṇyato mahyaṁ yasmādyūyamihāgatāḥ

'अथवा क्या आप समस्त लोगों के पाप-समूह को जीतने के लिए उद्यत हुए हैं? कृपापूर्वक मुझे बताइए कि आप यहाँ किसलिए पधारे हैं।'

श्लोक 18 (skanda.3.95.18)

शिवदूता ऊचुः ॥ एषाग्रे दृश्यते वृद्धा चांडाली मरणोन्मुखी ॥ एतामानेतुमायाताः संदिष्टा प्रभुणा वयम्

śivadūtā ūcuḥ eṣāgre dṛśyate vṛddhā cāṁḍālī maraṇonmukhī etāmānetumāyātāḥ saṁdiṣṭā prabhuṇā vayam

शिवदूतों ने कहा — 'यह आगे दिखाई देने वाली वृद्धा चांडाली मरणासन्न है। हम इसे लेने के लिए, प्रभु की आज्ञा से आए हैं।'

श्लोक 19 (skanda.3.95.19)

इत्युक्ते शिवदूतैस्तैरपृच्छं पुनरप्यहम् ॥ विस्मयाविष्टचित्तस्तान्कृतांजलिरवस्थितः

ityukte śivadūtaistairapṛcchaṁ punarapyaham vismayāviṣṭacittastānkṛtāṁjaliravasthitaḥ

शिवदूतों द्वारा ऐसा कहे जाने पर, विस्मयचकित चित्त होकर, हाथ जोड़कर खड़े हुए मैंने पुनः उनसे पूछा —

श्लोक 20 (skanda.3.95.20)

अहो पापीयसी घोरा चांडाली कथमर्हति ॥ दिव्यं विमानमारोढुं शुनीवाध्वरमंडलम्

aho pāpīyasī ghorā cāṁḍālī kathamarhati divyaṁ vimānamāroḍhuṁ śunīvādhvaramaṁḍalam

'अहो! यह अत्यंत पापिनी, भयंकर चांडाली दिव्य विमान पर चढ़ने योग्य कैसे हो सकती है — जैसे कोई कुतिया यज्ञ-मंडल में प्रवेश करे?'

श्लोक 21 (skanda.3.95.21)

आजन्मतोऽशुचिप्राया पापां पापा नुगामिनीम् ॥ कथमेनां दुराचारां शिवलोकं निनीषथ

ājanmato'śuciprāyā pāpāṁ pāpā nugāminīm kathamenāṁ durācārāṁ śivalokaṁ ninīṣatha

'जन्म से ही अशुद्ध, पापिनी, पाप का अनुगमन करने वाली — इस दुराचारिणी को आप शिवलोक कैसे ले जाना चाहते हैं?'

श्लोक 22 (skanda.3.95.22)

अस्या नास्ति शिवज्ञानं नास्ति घोरतरं तपः ॥ सत्यं नास्ति दया नास्ति कथमेनां निनीषथ

asyā nāsti śivajñānaṁ nāsti ghorataraṁ tapaḥ satyaṁ nāsti dayā nāsti kathamenāṁ ninīṣatha

'इसे न शिव-ज्ञान है, न घोर तप; न सत्य है, न दया — फिर आप इसे कैसे ले जाना चाहते हैं?'

श्लोक 23 (skanda.3.95.23)

पशुमांसकृताहारा वारुणीपूरितोदराम् ॥ जीवहिंसारतां नित्यं कथमेनां निनीषथ

paśumāṁsakṛtāhārā vāruṇīpūritodarām jīvahiṁsāratāṁ nityaṁ kathamenāṁ ninīṣatha

'पशु-मांस खाने वाली, मदिरा से भरे उदर वाली, नित्य जीव-हिंसा में रत — इसे आप कैसे ले जाना चाहते हैं?'

श्लोक 24 (skanda.3.95.24)

न च पंचाक्षरी जप्ता न कृतं शिवपूजनम्॥ न ध्यातो भगवाञ्छंभुः कथमेनां निनीषथ

na ca paṁcākṣarī japtā na kṛtaṁ śivapūjanam na dhyāto bhagavāñchaṁbhuḥ kathamenāṁ ninīṣatha

'न इसने पंचाक्षरी का जप किया, न शिव-पूजन किया, न भगवान शंभु का ध्यान किया — इसे आप कैसे ले जाना चाहते हैं?'

श्लोक 25 (skanda.3.95.25)

नोपोषिता शिवतिथिर्न कृतं शिवपूजनम् ॥ भूतसौहृदं न जानाति न च बिल्वशिवार्पणम्॥ नेष्टापूर्तादिकं वापि कथमेनां निनीषथ

nopoṣitā śivatithirna kṛtaṁ śivapūjanam bhūtasauhṛdaṁ na jānāti na ca bilvaśivārpaṇam neṣṭāpūrtādikaṁ vāpi kathamenāṁ ninīṣatha

'न इसने शिव-तिथि का उपवास किया, न शिव-पूजन किया, न इसे भूतों के प्रति स्नेह ज्ञात है, न बिल्व-शिवार्पण, न इष्ट-पूर्त आदि किया — इसे आप कैसे ले जाना चाहते हैं?'

श्लोक 26 (skanda.3.95.26)

न च स्नातानि तीर्थानि न दानानि कृतानि च ॥ न च व्रतानि चीर्णानि कथमेनां निनीषथ

na ca snātāni tīrthāni na dānāni kṛtāni ca na ca vratāni cīrṇāni kathamenāṁ ninīṣatha

'न इसने तीर्थों में स्नान किया, न दान दिए, न व्रत किए — इसे आप कैसे ले जाना चाहते हैं?'

श्लोक 27 (skanda.3.95.27)

ईक्षणे परिहर्त्तव्या किमु संभाषणादिषु ॥ सत्संगरहितां चंडां कथमेनां निनीषथ

īkṣaṇe pariharttavyā kimu saṁbhāṣaṇādiṣu satsaṁgarahitāṁ caṁḍāṁ kathamenāṁ ninīṣatha

'यह तो देखने में ही त्याज्य है, बातचीत की तो बात ही क्या; सत्संग-रहित इस चंडी को आप कैसे ले जाना चाहते हैं?'

श्लोक 28 (skanda.3.95.28)

जन्मांतरार्जितं किंचिदस्याः सुकृतमस्ति वा ॥ तत्कथं कुष्ठरोगण कृमिभिः परिभूयते

janmāṁtarārjitaṁ kiṁcidasyāḥ sukṛtamasti vā tatkathaṁ kuṣṭharogaṇa kṛmibhiḥ paribhūyate

'क्या इसका पूर्वजन्म में अर्जित कोई पुण्य है? यदि है, तो यह कुष्ठ-रोग और कीड़ों से इस प्रकार क्यों पीड़ित है?'

श्लोक 29 (skanda.3.95.29)

अहो ईश्वरचर्येयं दुर्विभाव्या शरीरिणाम् ॥ पापात्मानोऽपि नीयंते कारुण्यात्परमं पदम्

aho īśvaracaryeyaṁ durvibhāvyā śarīriṇām pāpātmāno'pi nīyaṁte kāruṇyātparamaṁ padam

'अहो! ईश्वर की यह लीला प्राणियों के लिए अत्यंत दुर्विभाव्य है — कि पापात्मा भी करुणावश परम पद को ले जाए जाते हैं!'

श्लोक 30 (skanda.3.95.30)

इत्युक्तास्ते मया दूता देवदेवस्य शूलिनः ॥ प्रत्यूचुर्मामथ प्रीत्या सर्वसंशयभेदिनः

ityuktāste mayā dūtā devadevasya śūlinaḥ pratyūcurmāmatha prītyā sarvasaṁśayabhedinaḥ

इस प्रकार मेरे द्वारा कहे जाने पर, समस्त संशयों को दूर करने वाले, त्रिशूलधारी देवाधिदेव के वे दूत मुझे प्रेमपूर्वक उत्तर देने लगे।

श्लोक 31 (skanda.3.95.31)

शिवदूता ऊचुः ॥ ब्रह्मन्सुमहदाश्चर्यं शृणु कौतूहलं यदि ॥ इमामुद्दिश्य चांडालीं यदुक्तं भवताधुना

śivadūtā ūcuḥ brahmansumahadāścaryaṁ śṛṇu kautūhalaṁ yadi imāmuddiśya cāṁḍālīṁ yaduktaṁ bhavatādhunā

शिवदूतों ने कहा — 'हे ब्रह्मन्! यदि जिज्ञासा हो तो सुनो — इस चांडाली के विषय में जो अभी आपने कहा, उसमें एक अत्यंत महान आश्चर्य छिपा है।'

श्लोक 32 (skanda.3.95.32)

आसीदियं पूर्वभवे काचिद्ब्राह्मणकन्यका ॥ सुमित्रानाम संपूर्णसोमबिम्बसमानना

āsīdiyaṁ pūrvabhave kācidbrāhmaṇakanyakā sumitrānāma saṁpūrṇasomabimbasamānanā

'यह अपने पूर्वजन्म में किसी ब्राह्मण की पुत्री थी, जिसका नाम सुमित्रा था, जिसका मुख पूर्ण चंद्रबिंब के समान था,

श्लोक 33 (skanda.3.95.33)

उत्फुल्लमल्लिकादामसुकुमारांगलक्षणा ॥ कैकेयद्विजमुख्यस्य कस्यचित्तनया सती

utphullamallikādāmasukumārāṁgalakṣaṇā kaikeyadvijamukhyasya kasyacittanayā satī

जिसके सुकुमार अंग खिली हुई मल्लिका-माला के समान लक्षित थे, जो कैकेय देश के किसी श्रेष्ठ ब्राह्मण की सती पुत्री थी।'

श्लोक 34 (skanda.3.95.34)

तां सर्वलक्षणोपेतां रतेर्मूर्तिमिवापराम्॥ वर्द्धमानां पितुर्गेहे वीक्ष्यासन्विस्मिता जनाः

tāṁ sarvalakṣaṇopetāṁ ratermūrtimivāparām varddhamānāṁ piturgehe vīkṣyāsanvismitā janāḥ

सर्वलक्षणों से युक्त, मानो रति की दूसरी मूर्ति, अपने पिता के घर में बढ़ती हुई उसे देखकर लोग विस्मित होते थे।

श्लोक 35 (skanda.3.95.35)

दिनेदिने वर्धमाना बंधुभिर्लालिता भृशम् ॥ सा शनैर्यौवनं भेजे स्मरस्येव महाधनुः

dinedine vardhamānā baṁdhubhirlālitā bhṛśam sā śanairyauvanaṁ bheje smarasyeva mahādhanuḥ

दिन-प्रतिदिन बढ़ती हुई, बंधुओं द्वारा अत्यंत लाड़-प्यार पाती हुई, वह धीरे-धीरे युवावस्था को प्राप्त हुई, मानो कामदेव का महाधनुष स्वयं आकार ले रहा हो।

श्लोक 36 (skanda.3.95.36)

अथ सा बंधुवर्गैश्च समेतेन कुमारिका ॥ पित्रा प्रदत्ता कस्मैचिद्विधिना द्विजसूनवे

atha sā baṁdhuvargaiśca sametena kumārikā pitrā pradattā kasmaicidvidhinā dvijasūnave

तब उस कुमारी को उसके बंधुओं के परामर्श से पिता ने विधिपूर्वक किसी ब्राह्मण-पुत्र को दे दिया।

श्लोक 37 (skanda.3.95.37)

सा भर्त्तारमनुप्राप्य नवयौवनशालिनी ॥ कंचित्कालं शुभाचारा रेमे बंधुभिरावृता

sā bharttāramanuprāpya navayauvanaśālinī kaṁcitkālaṁ śubhācārā reme baṁdhubhirāvṛtā

पति को प्राप्त कर नवयौवना वह सुशील नारी कुछ काल तक बंधुओं से घिरी हुई प्रसन्नतापूर्वक रहती रही।

श्लोक 38 (skanda.3.95.38)

अथ कालवशात्तस्याः पतिस्तीव्र रुजार्दितः ॥ रूपयौवनकांतोपि पंचत्वमगमन्मुने

atha kālavaśāttasyāḥ patistīvra rujārditaḥ rūpayauvanakāṁtopi paṁcatvamagamanmune

किंतु हे मुने! कालवश उसका रूप-यौवन-संपन्न पति भी तीव्र रोग से पीड़ित होकर मृत्यु को प्राप्त हो गया।

श्लोक 39 (skanda.3.95.39)

मृते भर्त्तरि दुःखेन विदग्धहदया सती ॥ उवास कतिचिन्मासान्सुशीला विजितें द्रिया

mṛte bharttari duḥkhena vidagdhahadayā satī uvāsa katicinmāsānsuśīlā vijiteṁ driyā

पति के मरने पर, दुःख से जलते हृदय वाली वह सती, सुशील और जितेन्द्रिय होकर कुछ महीनों तक इसी प्रकार रही।

श्लोक 40 (skanda.3.95.40)

अथ यौवनभारेण जृंभमाणेन नित्यशः ॥ बभूव हृदयं तस्याः कंदपर्परिकंपितम्

atha yauvanabhāreṇa jṛṁbhamāṇena nityaśaḥ babhūva hṛdayaṁ tasyāḥ kaṁdaparparikaṁpitam

किंतु फिर सदा बढ़ते हुए यौवन के भार से उसका हृदय कामदेव के वेग से कम्पित होने लगा।

श्लोक 41 (skanda.3.95.41)

सा गुप्ता बन्धुवर्गेण शासितापि महोत्तमैः ॥ न शशाक मनो रोद्धं मदनाकृष्टमंगना

sā guptā bandhuvargeṇa śāsitāpi mahottamaiḥ na śaśāka mano roddhaṁ madanākṛṣṭamaṁganā

बंधु-समूह द्वारा सुरक्षित और महान लोगों द्वारा अनुशासित होते हुए भी वह स्त्री, काम से आकृष्ट मन को रोक न सकी।

श्लोक 42 (skanda.3.95.42)

सा तीव्रमन्मथाविष्टा रूपयौवनशालिनी ॥ विधवापि विशेषेण जारमार्गरताभवत्

sā tīvramanmathāviṣṭā rūpayauvanaśālinī vidhavāpi viśeṣeṇa jāramārgaratābhavat

तीव्र काम-वेग से आविष्ट, रूप-यौवन-संपन्न वह विधवा होते हुए भी विशेष रूप से जार-मार्ग में रत हो गई।

श्लोक 43 (skanda.3.95.43)

न ज्ञाता केनचिदपि जारिणीति विचक्षणा ॥ जुगूहात्मदुराचारं कंचित्कालमसत्तमा

na jñātā kenacidapi jāriṇīti vicakṣaṇā jugūhātmadurācāraṁ kaṁcitkālamasattamā

चतुर होने के कारण किसी को भी उसके व्यभिचार का ज्ञान नहीं हुआ; उस अत्यंत दुष्ट स्त्री ने कुछ समय तक अपना दुराचार छिपाए रखा।

श्लोक 44 (skanda.3.95.44)

तां दोहदसमाक्रांतां घननीलमुखस्तनीम् ॥ कालेन बंधुवर्गोपि बुबोध विटदूषिताम्

tāṁ dohadasamākrāṁtāṁ ghananīlamukhastanīm kālena baṁdhuvargopi bubodha viṭadūṣitām

किंतु समय के साथ उसके बंधुजनों को भी ज्ञात हो गया कि वह गर्भ-दोहद से आक्रांत, काले पड़ते मुख-स्तन वाली, किसी विट (व्यभिचारी) द्वारा दूषित हो गई है।

श्लोक 45 (skanda.3.95.45)

इति भीतो महाक्लेशाच्चिंता लेभे दुरत्ययाम् ॥ स्त्रियः कामेन नश्यंति ब्राह्मणा हीनसेवया

iti bhīto mahākleśācciṁtā lebhe duratyayām striyaḥ kāmena naśyaṁti brāhmaṇā hīnasevayā

इससे भयभीत होकर उन्हें महान क्लेश से दुस्तर चिंता हुई — 'स्त्रियाँ काम से नष्ट होती हैं, और ब्राह्मण नीचों की सेवा से;

श्लोक 46 (skanda.3.95.46)

राजानो ब्रह्मदंडेन यतयो भोगसंग्रहात्॥ लीढं शुना तथैवान्नं सुरया वार्पितं पयः

rājāno brahmadaṁḍena yatayo bhogasaṁgrahāt līḍhaṁ śunā tathaivānnaṁ surayā vārpitaṁ payaḥ

राजा ब्रह्म-दंड से, यति भोग-संग्रह से नष्ट होते हैं — जैसे कुत्ते द्वारा चाटा गया अन्न, या मदिरा में मिला दूध व्यर्थ हो जाता है,

श्लोक 47 (skanda.3.95.47)

रूपं कुष्ठरुजाविष्टं कुलं नश्यति कुस्त्रिया॥ इति सर्वे समालोच्य समेताः पतिसोदराः

rūpaṁ kuṣṭharujāviṣṭaṁ kulaṁ naśyati kustriyā iti sarve samālocya sametāḥ patisodarāḥ

वैसे ही रूप कुष्ठ-रोग से और कुल दुष्ट स्त्री से नष्ट होता है।' — इस प्रकार सब विचार करके, पति के सभी भाई एकत्र हुए,

श्लोक 48 (skanda.3.95.48)

तत्यजुर्गोत्रतो दूरं गृहीत्वा सकचग्रहम् ॥ सघटोत्सर्गमुत्सृष्टा सा नारी सर्वबन्धुभिः

tatyajurgotrato dūraṁ gṛhītvā sakacagraham saghaṭotsargamutsṛṣṭā sā nārī sarvabandhubhiḥ

और उसके बालों को पकड़कर उसे कुल से दूर त्याग दिया; समस्त बंधुओं द्वारा केवल एक घड़ा देकर निकाल दी गई,

श्लोक 49 (skanda.3.95.49)

विचरंती च शूद्रेण रममाणा रतिप्रिया ॥ सा ययौ स्त्री बहिर्यामा दृष्टा शूद्रेण केनचित्

vicaraṁtī ca śūdreṇa ramamāṇā ratipriyā sā yayau strī bahiryāmā dṛṣṭā śūdreṇa kenacit

रति-प्रिया वह स्त्री रात्रि में गाँव के बाहर एक शूद्र के साथ रमण करती विचरण करने लगी, और किसी शूद्र द्वारा वहाँ देखी गई।

श्लोक 50 (skanda.3.95.50)

स तां दृष्ट्वा वरारोहाँ पीनोन्नतपयोधराम् ॥ गृहं निनाय साम्ना च विधवां शूद्रनायकः ॥ सा नारी तस्य महिषी भूत्वा तेन दिवानिशम्

sa tāṁ dṛṣṭvā varārohām̐ pīnonnatapayodharām gṛhaṁ nināya sāmnā ca vidhavāṁ śūdranāyakaḥ sā nārī tasya mahiṣī bhūtvā tena divāniśam

उसे सुंदर, पीन-उन्नत स्तनों वाली देखकर उस शूद्र-प्रमुख ने साम-नीति से उस विधवा को अपने घर ले गया; वह स्त्री उसकी पत्नी बनकर दिन-रात उसके साथ —

श्लोक 51 (skanda.3.95.51)

रममाणा क्वचिद्देशे न्यवसद्गृहवल्लभा ॥ तत्र सा पिशिताहारा नित्यमापीतवारुणी

ramamāṇā kvaciddeśe nyavasadgṛhavallabhā tatra sā piśitāhārā nityamāpītavāruṇī

रमण करती हुई किसी देश में उसकी प्रिय पत्नी बनकर रहने लगी; वहाँ वह मांसाहारी और नित्य मदिरापान करने वाली हो गई।

श्लोक 52 (skanda.3.95.52)

लेभे सुतं च शूद्रेण रममाणा रतिप्रिया ॥ कदाचिद्भर्त्तरि क्वापि याते पीतसुरा तु सा

lebhe sutaṁ ca śūdreṇa ramamāṇā ratipriyā kadācidbharttari kvāpi yāte pītasurā tu sā

रति-प्रिया वह स्त्री शूद्र के साथ रमण करती हुई एक पुत्र प्राप्त कर बैठी। एक बार जब उसका पति कहीं गया हुआ था, मदिरा पीकर वह —

श्लोक 53 (skanda.3.95.53)

इयेष पिशिताहारं मदिरामदविह्वला ॥ अथ मेषेषु बद्धेषु गोभिः सह बहिर्व्रजे

iyeṣa piśitāhāraṁ madirāmadavihvalā atha meṣeṣu baddheṣu gobhiḥ saha bahirvraje

— मदिरा से उन्मत्त होकर मांस खाने की इच्छा करने लगी; तब रात्रि के प्रारंभ में जब बाहर व्रज में भेड़ें गायों के साथ बँधी थीं,

श्लोक 54 (skanda.3.95.54)

ययौ कृपाणमादाय सा तमींधे निशामुखे ॥ अविमृश्य मदावेशान्मेषबुद्ध्यामिषप्रिया

yayau kṛpāṇamādāya sā tamīṁdhe niśāmukhe avimṛśya madāveśānmeṣabuddhyāmiṣapriyā

वह तलवार लेकर निकली, रात्रि के प्रारंभ में; बिना विचारे, मद के वेग से, मांस-प्रिया वह स्त्री, भेड़ समझकर,

श्लोक 55 (skanda.3.95.55)

एकं जघानं गोवत्सं क्रोशंतं निशि दुर्भगा ॥ निहतं गृहमानीय ज्ञात्वा गोवत्समंगना

ekaṁ jaghānaṁ govatsaṁ krośaṁtaṁ niśi durbhagā nihataṁ gṛhamānīya jñātvā govatsamaṁganā

रात में चीत्कार करते हुए एक गोवत्स को मार डाला; मृत पशु को घर लाकर, उसे गोवत्स जानकर,

श्लोक 56 (skanda.3.95.56)

भीता शिवशिवेत्याह केनचित्पुण्यकर्मणा ॥ सा मुहूर्तमिति ध्यात्वा पिशितासवलालसा

bhītā śivaśivetyāha kenacitpuṇyakarmaṇā sā muhūrtamiti dhyātvā piśitāsavalālasā

वह स्त्री भयभीत होकर 'शिव शिव' पुकार उठी — यह किसी पूर्व पुण्य-कर्म के प्रभाव से हुआ। एक क्षण ऐसा सोचकर, मांस-मदिरा की लालसा से,

श्लोक 57 (skanda.3.95.57)

छित्त्वा तमेव गोवत्सं चकाराहारमीप्सितम् ॥ गोवत्सार्धशरीरेण कृताहाराथ सा पुनः

chittvā tameva govatsaṁ cakārāhāramīpsitam govatsārdhaśarīreṇa kṛtāhārātha sā punaḥ

उसने उसी गोवत्स को काटकर इच्छित भोजन बना लिया; गोवत्स के आधे शरीर से भोजन करके वह फिर —

श्लोक 58 (skanda.3.95.58)

तदर्धदेहं निक्षिप्य बहिश्चुक्रोश कैतवात् ॥ अहो व्याघ्रेण भग्नोऽयं जग्धो गोवत्सको व्रजे

tadardhadehaṁ nikṣipya bahiścukrośa kaitavāt aho vyāghreṇa bhagno'yaṁ jagdho govatsako vraje

— उसका आधा शरीर फेंककर बाहर छल से चिल्लाई — 'अहो! व्रज में यह गोवत्स बाघ द्वारा तोड़ा-खाया गया है!'

श्लोक 59 (skanda.3.95.59)

इति तस्याः समाक्रंदः सर्वगेहेषु शुश्रुवे । अथ सर्वे शूद्रजनाः समागम्यांतिके स्थिताः

iti tasyāḥ samākraṁdaḥ sarvageheṣu śuśruve atha sarve śūdrajanāḥ samāgamyāṁtike sthitāḥ

उसकी यह चीत्कार सभी घरों में सुनी गई; तब सभी शूद्रजन एकत्र होकर निकट आ खड़े हुए,

श्लोक 60 (skanda.3.95.60)

हतं गोवत्समालोक्य व्याघ्रेणेति शुचं ययुः ॥ गतेषु तेषु सर्वेषु व्युष्टायां च ततो निशि

hataṁ govatsamālokya vyāghreṇeti śucaṁ yayuḥ gateṣu teṣu sarveṣu vyuṣṭāyāṁ ca tato niśi

और गोवत्स को मरा देखकर बाघ द्वारा मारा गया मानकर शोक करने लगे। जब वे सब चले गए और वह रात्रि बीत गई,

श्लोक 61 (skanda.3.95.61)

तद्भर्ता गृहमागत्य दृष्टवान्गृहविड्वरम् । एवं बहुतिथे काले गते सा शूद्ववल्लभा

tadbhartā gṛhamāgatya dṛṣṭavāngṛhaviḍvaram evaṁ bahutithe kāle gate sā śūdvavallabhā

तब उसका पति घर आकर घर की गंदगी देख बैठा। इस प्रकार बहुत समय बीत जाने पर वह शूद्र-प्रिया —

श्लोक 62 (skanda.3.95.62)

कालस्य वशमापन्ना जगाम यममंदिरम् । यमोपि धर्ममालोक्य तस्याः कर्म च पौर्विकम्

kālasya vaśamāpannā jagāma yamamaṁdiram yamopi dharmamālokya tasyāḥ karma ca paurvikam

— काल के वश में आकर यमलोक चली गई। यम ने भी धर्म को देखकर और उसके पूर्वकर्मों को देखकर,

श्लोक 63 (skanda.3.95.63)

निर्वत्र्य निरयावासाञ्चक्रे चंडालजातिकाम् ॥ सापि भ्रष्टा यमपुराच्चांडालीगर्भमाश्रिता

nirvatrya nirayāvāsāñcakre caṁḍālajātikām sāpi bhraṣṭā yamapurāccāṁḍālīgarbhamāśritā

उसे नरकों में भुगताकर चांडाल-जाति में जन्म दिलाया; और वह यमपुरी से छूटकर एक चांडाल स्त्री के गर्भ में गई।

श्लोक 64 (skanda.3.95.64)

ततो बभूव जात्यंधा प्रशांतांगारमेचका ॥ तत्पिता कोपि चांडालो देशे कुत्रचिदास्थितः

tato babhūva jātyaṁdhā praśāṁtāṁgāramecakā tatpitā kopi cāṁḍālo deśe kutracidāsthitaḥ

वहाँ वह जन्म से अंधी, बुझे हुए अंगारे के समान श्याम उत्पन्न हुई; उसका पिता कोई चांडाल किसी देश में रहता था,

श्लोक 65 (skanda.3.95.65)

तां तादृशीमपि सुतां कृपया पर्यपोषयत् ॥ अभोज्येन कदन्नेन शुना लीढेन पूतिना

tāṁ tādṛśīmapi sutāṁ kṛpayā paryapoṣayat abhojyena kadannena śunā līḍhena pūtinā

जिसने ऐसी पुत्री होने पर भी दया से उसका पालन-पोषण किया — अखाद्य, कदन्न, कुत्ते द्वारा चाटा हुआ दुर्गंधित भोजन देकर,

श्लोक 66 (skanda.3.95.66)

अपेयैश्च रसैर्मात्रा पोषिता सा दिनेदिने ॥ जात्यंधा सापि कालेन बाल्ये कुष्ठरुजार्दिता

apeyaiśca rasairmātrā poṣitā sā dinedine jātyaṁdhā sāpi kālena bālye kuṣṭharujārditā

और अपेय रसों से माता द्वारा दिन-प्रतिदिन पोषित वह जन्मांधा भी काल के साथ बाल्यावस्था में कुष्ठ-रोग से पीड़ित हो गई,

श्लोक 67 (skanda.3.95.67)

ऊढा न केनचिद्वापि चांडालेनातिदुर्भगा ॥ अतीतबाल्ये सा काले विध्वस्तपितृमातृका

ūḍhā na kenacidvāpi cāṁḍālenātidurbhagā atītabālye sā kāle vidhvastapitṛmātṛkā

और अत्यंत अभागिन वह किसी भी चांडाल से विवाहित नहीं हुई। बाल्यावस्था बीतने पर, समय के साथ, माता-पिता दोनों को खोकर,

श्लोक 68 (skanda.3.95.68)

दुर्भगेति परित्यक्ता बंधुभिश्च सहोदरैः ॥ ततः क्षुधार्दिता दीना शोचन्ती विगतेक्षणा

durbhageti parityaktā baṁdhubhiśca sahodaraiḥ tataḥ kṣudhārditā dīnā śocantī vigatekṣaṇā

वह बंधुओं और भाई-बहनों द्वारा अभागिनी कहकर त्याग दी गई; फिर भूख से पीड़ित, दीन, शोक करती, दृष्टिहीन —

श्लोक 69 (skanda.3.95.69)

गृहीतयष्टिः कृच्छ्रेण संचचाल सलोष्टिका ॥ पत्तनेष्वपि सर्वेषु याचमाना दिनेदिने

gṛhītayaṣṭiḥ kṛcchreṇa saṁcacāla saloṣṭikā pattaneṣvapi sarveṣu yācamānā dinedine

— लाठी पकड़कर वह अत्यंत कठिनाई से चलती रही, मिट्टी का पात्र लिए हुए, सभी नगरों में दिन-प्रतिदिन भीख माँगती हुई,

श्लोक 70 (skanda.3.95.70)

चांडालोच्छिष्टपिंडेन जठराग्निमतर्पयत्॥ एवं कृच्छ्रेण महता नीत्वा सुबहुलं वयः

cāṁḍālocchiṣṭapiṁḍena jaṭharāgnimatarpayat evaṁ kṛcchreṇa mahatā nītvā subahulaṁ vayaḥ

चांडालों के उच्छिष्ट अन्न से अपनी जठराग्नि तृप्त करती रही। इस प्रकार अत्यंत कठिनाई से बहुत लंबी आयु व्यतीत करके,

श्लोक 71 (skanda.3.95.71)

जरया ग्रस्तसर्वांगी दुःखमाप दुरत्ययम् ॥ निरन्नपानवसना सा कदाचिन्महाजनान्

jarayā grastasarvāṁgī duḥkhamāpa duratyayam nirannapānavasanā sā kadācinmahājanān

जरा से समस्त अंग ग्रसित होने पर उसने दुस्तर दुःख पाया; अन्न-पान-वस्त्र से रहित उसने एक बार बड़े जनसमूहों को —

श्लोक 72 (skanda.3.95.72)

आयास्यंत्यां शिवतिथौ गच्छतो बुबुधेऽध्वगान्॥ तस्यां तु देवयात्रायां देशदेशांतयायिनाम्

āyāsyaṁtyāṁ śivatithau gacchato bubudhe'dhvagān tasyāṁ tu devayātrāyāṁ deśadeśāṁtayāyinām

शिव-तिथि के आगमन पर जाते देखा और देश-देशांतर से आए हुए उस देव-यात्रियों के काफिले को पहचाना —

श्लोक 73 (skanda.3.95.73)

विप्राणां साग्निहोत्राणां सस्त्रीकाणां महात्मनाम्॥ राज्ञां च सावरोधानां सहस्तिरथवाजिनाम्

viprāṇāṁ sāgnihotrāṇāṁ sastrīkāṇāṁ mahātmanām rājñāṁ ca sāvarodhānāṁ sahastirathavājinām

— अग्निहोत्री ब्राह्मणों को, अपनी पत्नियों सहित, महात्माओं को; अंतःपुर सहित राजाओं को, हाथी-रथ-अश्वों सहित,

श्लोक 74 (skanda.3.95.74)

सपरीवारघोषाणां यानच्छत्रादिशोभिनाम् ॥ तथान्येषां च विट्शूद्रसंकीर्णानां सहस्रशः

saparīvāraghoṣāṇāṁ yānacchatrādiśobhinām tathānyeṣāṁ ca viṭśūdrasaṁkīrṇānāṁ sahasraśaḥ

परिवार के कोलाहल से युक्त, वाहन-छत्र आदि से सुशोभित; और वैसे ही हजारों वैश्य-शूद्र मिश्रित अन्य लोगों को —

श्लोक 75 (skanda.3.95.75)

हसतां गायतां क्वापि नृत्यतामथ धावताम् ॥ जिघ्रतां पिबतां कामाद्गच्छतां प्रतिगर्जताम्

hasatāṁ gāyatāṁ kvāpi nṛtyatāmatha dhāvatām jighratāṁ pibatāṁ kāmādgacchatāṁ pratigarjatām

— कहीं हँसते, गाते, कहीं नाचते, कहीं दौड़ते, कहीं सूँघते, कहीं इच्छानुसार पीते हुए, जाते हुए, गर्जना करते हुए।

श्लोक 76 (skanda.3.95.76)

संप्रयाणे मनुष्याणां संभ्रमः सुमहानभूत् ॥ इति सर्वेषु गच्छत्सु गोकर्णं शिवमंदिरम्

saṁprayāṇe manuṣyāṇāṁ saṁbhramaḥ sumahānabhūt iti sarveṣu gacchatsu gokarṇaṁ śivamaṁdiram

लोगों के इस प्रस्थान में अत्यंत महान् कोलाहल हुआ। इस प्रकार जब सब लोग शिव-मंदिर गोकर्ण की ओर जा रहे थे,

श्लोक 77 (skanda.3.95.77)

पश्यंति दिविजाः सर्वे विमानस्थाः सकौतुकाः ॥ अथेयमपि चांडाली वसनाशनतृष्णया

paśyaṁti divijāḥ sarve vimānasthāḥ sakautukāḥ atheyamapi cāṁḍālī vasanāśanatṛṣṇayā

तब विमानों में स्थित समस्त देवगण कुतूहलपूर्वक यह देख रहे थे। तब यह चांडाली भी वस्त्र और भोजन की लालसा से —

श्लोक 78 (skanda.3.95.78)

महाजनान्याचयितुं चचाल च शनैःशनैः ॥ करावलंबेनान्यस्याः प्राग्जन्मार्जितकर्मणा ॥ दिनैः कतिपयैर्याती गोकर्णं क्षेत्रमाययौ

mahājanānyācayituṁ cacāla ca śanaiḥśanaiḥ karāvalaṁbenānyasyāḥ prāgjanmārjitakarmaṇā dinaiḥ katipayairyātī gokarṇaṁ kṣetramāyayau

धीरे-धीरे उन महाजनों से भिक्षा माँगने के लिए चल पड़ी, दूसरे के हाथ का सहारा लेकर; पूर्वजन्म-अर्जित कर्म के प्रभाव से, कुछ ही दिनों में चलती हुई वह गोकर्ण क्षेत्र में आ पहुँची।

श्लोक 79 (skanda.3.95.79)

ततो विदूरे मार्गस्य निषण्णा विवृतांजलिः ॥ याचमाना मुहुः पांथान्बभाषे कृपणं वचः

tato vidūre mārgasya niṣaṇṇā vivṛtāṁjaliḥ yācamānā muhuḥ pāṁthānbabhāṣe kṛpaṇaṁ vacaḥ

वहाँ मार्ग से कुछ दूर बैठकर, हाथ फैलाकर, बार-बार यात्रियों से भीख माँगती हुई वह दीन वचन बोलने लगी —

श्लोक 80 (skanda.3.95.80)

प्राग्जन्मार्जितपापौघैः पीडितायाश्चिरं मम ॥ आहारमात्रदानेन दयां कुरुत भो जनाः

prāgjanmārjitapāpaughaiḥ pīḍitāyāściraṁ mama āhāramātradānena dayāṁ kuruta bho janāḥ

'पूर्वजन्म-अर्जित पापों के समूह से चिरकाल से पीड़ित मुझ पर, केवल आहार-मात्र देकर, हे लोगो! दया करो।'

श्लोक 81 (skanda.3.95.81)

त्रातारः परमार्तानां दातारः परमाशिषाम् ॥ कर्तारो बहुपुण्यानां दयां कुरुत भो जनाः ॥ र१ ॥ वसनाशनहीनायां स्वपितायां महीतले ॥ महापांसुनिमग्नायां दयां कुरुत भो जनाः

trātāraḥ paramārtānāṁ dātāraḥ paramāśiṣām kartāro bahupuṇyānāṁ dayāṁ kuruta bho janāḥ ra1 vasanāśanahīnāyāṁ svapitāyāṁ mahītale mahāpāṁsunimagnāyāṁ dayāṁ kuruta bho janāḥ

'परम आर्तों के त्राता, परम आशीषों के दाता, बहुत पुण्यों के कर्ता — हे लोगो! दया करो। वस्त्र-अन्न-रहित, धरती पर सोई हुई, महाधूल में सनी हुई मुझ पर दया करो, हे लोगो!'

श्लोक 82 (skanda.3.95.82)

महाशीतातपार्त्तायां पीडितायां महारुजा ॥ अन्धायां मयि वृद्धायां दयां कुरुत भो जनाः

mahāśītātapārttāyāṁ pīḍitāyāṁ mahārujā andhāyāṁ mayi vṛddhāyāṁ dayāṁ kuruta bho janāḥ

'अत्यंत शीत और आतप से पीड़ित, महारोग से पीड़ित, अंधी, वृद्धा मुझ पर दया करो, हे लोगो!'

श्लोक 83 (skanda.3.95.83)

चिरोपवासदीप्तायां जठराग्निविवर्धनैः ॥ संदह्यमानसर्वांग्यां दयां कुरुत भो जनाः

ciropavāsadīptāyāṁ jaṭharāgnivivardhanaiḥ saṁdahyamānasarvāṁgyāṁ dayāṁ kuruta bho janāḥ

'दीर्घकाल के उपवास से जलती हुई, बढ़ती जठराग्नि से समस्त अंगों में जलती हुई मुझ पर दया करो, हे लोगो!'

श्लोक 84 (skanda.3.95.84)

अनुपार्जितपुण्यायां जन्मांतरशतेष्वपि ॥ पापायां मंदभाग्यायां दयां कुरुत भो जनाः

anupārjitapuṇyāyāṁ janmāṁtaraśateṣvapi pāpāyāṁ maṁdabhāgyāyāṁ dayāṁ kuruta bho janāḥ

'सैकड़ों जन्मों में भी अर्जित पुण्य से रहित, पापिनी, मंदभागिनी मुझ पर दया करो, हे लोगो!'

श्लोक 85 (skanda.3.95.85)

एवमभ्यर्थयंत्यास्तु चांडाल्याः प्रसृतेंऽजलौ ॥ एकः पुण्यतमः पांथः प्राक्षिपद्बिल्वमंजरीम्

evamabhyarthayaṁtyāstu cāṁḍālyāḥ prasṛteṁ'jalau ekaḥ puṇyatamaḥ pāṁthaḥ prākṣipadbilvamaṁjarīm

इस प्रकार प्रार्थना करती उस चांडाली के फैले हुए हाथों में एक अत्यंत पुण्यात्मा यात्री ने बिल्व की एक मंजरी डाल दी।

श्लोक 86 (skanda.3.95.86)

तामंचलौ निपतितां सा विमृश्य पुनः पुनः ॥ अभक्ष्येत्येव मत्वाथ दूरे प्राक्षिपदातुरा

tāmaṁcalau nipatitāṁ sā vimṛśya punaḥ punaḥ abhakṣyetyeva matvātha dūre prākṣipadāturā

अपने आँचल में गिरी उस मंजरी को बार-बार परखकर, उसे अखाद्य मानकर, व्यथित होकर उसने उसे दूर फेंक दिया।

श्लोक 87 (skanda.3.95.87)

तस्याः करेण निर्मुक्ता रात्रौ सा बिल्वमंजरी ॥ पपात कस्यचिद्दिष्ट्या शिवलिंगस्य मस्तके

tasyāḥ kareṇa nirmuktā rātrau sā bilvamaṁjarī papāta kasyaciddiṣṭyā śivaliṁgasya mastake

उसके हाथ से रात्रि में छूटी वह बिल्व-मंजरी, संयोग से, किसी शिवलिंग के मस्तक पर जा गिरी।

श्लोक 88 (skanda.3.95.88)

सैवं शिवचतुर्दश्यां रात्रौ पांथजनान्मुहुः ॥ याचमानापि यत्किंचिन्न लेभे दैवयोगतः

saivaṁ śivacaturdaśyāṁ rātrau pāṁthajanānmuhuḥ yācamānāpi yatkiṁcinna lebhe daivayogataḥ

इस प्रकार शिव-चतुर्दशी की रात्रि में यात्रियों से बार-बार माँगते हुए भी दैवयोगवश उसे कुछ भी प्राप्त नहीं हुआ।

श्लोक 89 (skanda.3.95.89)

तत्रोषितानया रात्रिर्भद्रकाल्यास्तु पृष्ठतः ॥ किंचिदुत्तरतः स्थानं तदर्धेनातिदूरतः

tatroṣitānayā rātrirbhadrakālyāstu pṛṣṭhataḥ kiṁciduttarataḥ sthānaṁ tadardhenātidūrataḥ

वह उस रात्रि वहीं, भद्रकाली के पीछे, कुछ उत्तर में, उससे भी काफी दूर स्थान में बिताई —

श्लोक 90 (skanda.3.95.90)

ततः प्रभाते भ्रष्टाशा शोकेन महताप्लुता ॥ शनैर्निववृते दीना स्वदेशायैव केवला

tataḥ prabhāte bhraṣṭāśā śokena mahatāplutā śanairnivavṛte dīnā svadeśāyaiva kevalā

— फिर प्रातःकाल आशा भंग होकर, महान शोक से आप्लावित, वह दीना धीरे-धीरे अकेली अपने ही देश की ओर लौट चली।

श्लोक 91 (skanda.3.95.91)

श्रांता चिरोपवासेन निपतन्ती पदेपदे ॥ क्रंदंती वहुरोगार्ता वेपमाना भृशातुरा

śrāṁtā ciropavāsena nipatantī padepade kraṁdaṁtī vahurogārtā vepamānā bhṛśāturā

दीर्घ उपवास से थकी हुई, पग-पग पर गिरती हुई, रोती हुई, अनेक रोगों से पीड़ित, कांपती हुई, अत्यंत व्याकुल,

श्लोक 92 (skanda.3.95.92)

दह्यमानार्कतापेन नग्नदेहा सयष्टिका॥ अतीत्यैतावतीं भूमिं निपपात विचेतना

dahyamānārkatāpena nagnadehā sayaṣṭikā atītyaitāvatīṁ bhūmiṁ nipapāta vicetanā

सूर्य की तपन से जलती हुई, नग्न देह, लाठी के सहारे, कुछ ही भूमि पार करके वह चेतनाहीन होकर गिर पड़ी।

श्लोक 93 (skanda.3.95.93)

अथ विश्वेश्वरः शंभुः करुणामृतवारिधिः॥ एनामानयतेत्त्यस्मान्युयुजे सविमानकान्

atha viśveśvaraḥ śaṁbhuḥ karuṇāmṛtavāridhiḥ enāmānayatettyasmānyuyuje savimānakān

तब करुणा के अमृत-सागर विश्वेश्वर शंभु ने हमें विमान सहित यह आज्ञा दी — 'इसे यहाँ ले आओ।'

श्लोक 94 (skanda.3.95.94)

एषा प्रवृत्तिश्चांडाल्यास्तवेह परिकीर्त्तिता॥ तथा संदर्शिता शंभोः कृपणेषु कृपालुता॥ कर्मणः परिपाकोत्थां गतिं पश्य महामते ॥ अधमापि परं स्थानमारोहति निरामयम्

eṣā pravṛttiścāṁḍālyāstaveha parikīrttitā tathā saṁdarśitā śaṁbhoḥ kṛpaṇeṣu kṛpālutā karmaṇaḥ paripākotthāṁ gatiṁ paśya mahāmate adhamāpi paraṁ sthānamārohati nirāmayam

यह चांडाली की सम्पूर्ण कथा तुम्हें यहाँ सुनाई गई है, तथा दीनों पर शंभु की करुणा भी इससे दर्शाई गई है। हे महामते! कर्म के परिपाक से उत्पन्न इस गति को देखो — अधम प्राणी भी उस परम, निरामय स्थान पर आरूढ़ हो जाता है।

श्लोक 95 (skanda.3.95.95)

यदेतया पूर्वभवे नान्नदानादिकं कृतम् ॥ क्षुत्पिपासादिभिः क्लेशैस्तस्मादिह निपीड्यते

yadetayā pūrvabhave nānnadānādikaṁ kṛtam kṣutpipāsādibhiḥ kleśaistasmādiha nipīḍyate

चूँकि इसने पूर्वजन्म में अन्नदान आदि नहीं किया, इसलिए यह यहाँ भूख-प्यास आदि क्लेशों से पीड़ित हुई।

श्लोक 96 (skanda.3.95.96)

यदेषा मदवेगांधा चक्रे पापं महोल्बणम्॥ कर्मणा तेन जात्यंधा बभूवात्रैव जन्मनि

yadeṣā madavegāṁdhā cakre pāpaṁ maholbaṇam karmaṇā tena jātyaṁdhā babhūvātraiva janmani

मद के वेग से अंधी होकर इसने जो महापाप किया, उसी कर्म से यह इस जन्म में जन्मांधा हुई।

श्लोक 97 (skanda.3.95.97)

अपि विज्ञाय गोवत्सं यदेषाऽभक्षयत्पुरा ॥ कर्मणा तेन चांडाली बभूवेह विगर्हिता

api vijñāya govatsaṁ yadeṣā'bhakṣayatpurā karmaṇā tena cāṁḍālī babhūveha vigarhitā

गोवत्स जानते हुए भी पहले इसने जो उसे खाया, उसी कर्म से यह यहाँ निंदित चांडाली बनी।

श्लोक 98 (skanda.3.95.98)

यदेषार्यपथं हित्वा जारमार्गरता पुरा ॥ तेन पापेन केनापि दुर्वृत्ता दुर्भगापि वा

yadeṣāryapathaṁ hitvā jāramārgaratā purā tena pāpena kenāpi durvṛttā durbhagāpi vā

आर्य-पथ छोड़कर जार-मार्ग में रत रहने के उस पाप से यह दुर्वृत्त और अभागिनी भी हुई।

श्लोक 99 (skanda.3.95.99)

यदाश्लिष्य मदाविष्टा जारेण विधवा पुरा ॥ तेन पापेन महता बहुकुष्ठव्रणान्विता

yadāśliṣya madāviṣṭā jāreṇa vidhavā purā tena pāpena mahatā bahukuṣṭhavraṇānvitā

पहले विधवा होते हुए मद से आविष्ट होकर जार का आलिंगन करने के उस महापाप से यह अनेक कुष्ठ-व्रणों से युक्त हुई।

श्लोक 100 (skanda.3.95.100)

कामार्त्ता यदियं स्वैरं शूद्रेण रमिता पुरा ॥ महासृक्पूयकृमिभिः पीड्यते तेन पाप्मना

kāmārttā yadiyaṁ svairaṁ śūdreṇa ramitā purā mahāsṛkpūyakṛmibhiḥ pīḍyate tena pāpmanā

पहले काम से पीड़ित होकर स्वेच्छा से शूद्र के साथ रमण करने के उस पाप से यह अत्यधिक रक्त-पीप-कीड़ों से पीड़ित होती है।

श्लोक 101 (skanda.3.95.101)

सुव्रतानि न चीर्णानि नेष्टापूतार्दिकं कृतम् ॥ सर्वभोगविहीनेयं दूयते तेन पाप्मना

suvratāni na cīrṇāni neṣṭāpūtārdikaṁ kṛtam sarvabhogavihīneyaṁ dūyate tena pāpmanā

सुव्रत न करने, इष्ट-पूर्त आदि न करने के उस पाप से यह समस्त भोगों से रहित होकर कष्ट पाती है।

श्लोक 102 (skanda.3.95.102)

यदेतया पूर्वभवे सुरा पीता विमूढया ॥ महायक्ष्मार्तिहृच्छूलैः पीड्यते तेन पाप्मना

yadetayā pūrvabhave surā pītā vimūḍhayā mahāyakṣmārtihṛcchūlaiḥ pīḍyate tena pāpmanā

पहले मोहवश मदिरा पीने के उस पाप से यह महायक्ष्मा और शूल पीड़ा से पीड़ित होती है।

श्लोक 103 (skanda.3.95.103)

अत्रैव सर्वमर्त्येषु पापचिह्नानि कृत्स्नशः ॥ लक्ष्यते मुनिशार्दूल सविवेकैर्महात्मभिः

atraiva sarvamartyeṣu pāpacihnāni kṛtsnaśaḥ lakṣyate muniśārdūla savivekairmahātmabhiḥ

यहीं, इसी मर्त्य-लोक में, हे मुनिश्रेष्ठ! विवेकशील महात्माओं द्वारा समस्त पापों के चिह्न सम्पूर्ण रूप से देखे जाते हैं।

श्लोक 104 (skanda.3.95.104)

अत्र ये बहुरोगार्त्ता ये पुत्रधनवर्जिताः

atra ye bahurogārttā ye putradhanavarjitāḥ

यहाँ जो लोग अनेक रोगों से पीड़ित हैं, जो पुत्र-धन से वंचित हैं,

श्लोक 105 (skanda.3.95.105)

ये च दुर्लक्षणक्लिष्टा याचका विगतह्रियः ॥ वासोन्नपानशयनभूषणाभ्यंजनादिभिः

ye ca durlakṣaṇakliṣṭā yācakā vigatahriyaḥ vāsonnapānaśayanabhūṣaṇābhyaṁjanādibhiḥ

जो दुर्लक्षणों से पीड़ित हैं, जो लज्जारहित भिखारी हैं, जो वस्त्र-अन्न-पान-शय्या-आभूषण-अभ्यंजन आदि से —

श्लोक 106 (skanda.3.95.106)

हीना विरूपा निर्विद्या विकलांगाः कुभोजनाः ॥ ये दुर्भाग्या निंदिताश्च ये चान्ये परसेवकाः

hīnā virūpā nirvidyā vikalāṁgāḥ kubhojanāḥ ye durbhāgyā niṁditāśca ye cānye parasevakāḥ

— हीन, कुरूप, विद्याहीन, अपंग, कुभोजन वाले हैं, जो अभागे और निंदित हैं, तथा जो अन्य पराए सेवक हैं —

श्लोक 107 (skanda.3.95.107)

एते पूर्वभवे सर्वे सुमहत्पापकारिणः ॥ एवं विमृश्य यत्नेन दृष्ट्वा लोकजनस्थितिम्

ete pūrvabhave sarve sumahatpāpakāriṇaḥ evaṁ vimṛśya yatnena dṛṣṭvā lokajanasthitim

ये सब पूर्वजन्म में अत्यंत महापाप करने वाले थे। इस प्रकार यत्नपूर्वक विचार करके, लोक-स्थिति को देखकर,

श्लोक 108 (skanda.3.95.108)

बुधो न कुरुते पापं यदि कुर्यात्स आत्महा ॥ देहोऽयं मानुषो जंतोर्बहुकर्मैकभाजनम्

budho na kurute pāpaṁ yadi kuryātsa ātmahā deho'yaṁ mānuṣo jaṁtorbahukarmaikabhājanam

बुद्धिमान पाप नहीं करता; यदि करे, तो वह आत्मघाती है। यह मनुष्य-देह प्राणी के अनेक कर्मों का एकमात्र भाजन है।

श्लोक 109 (skanda.3.95.109)

सदा सत्कर्म सेवेत दुष्कर्म सततं त्यजेत् ॥ पुण्यं सुखार्थी कुर्वीत दुःखार्थी पापमाचरेत्

sadā satkarma seveta duṣkarma satataṁ tyajet puṇyaṁ sukhārthī kurvīta duḥkhārthī pāpamācaret

सदा सत्कर्म का सेवन करना चाहिए, दुष्कर्म का सदा त्याग करना चाहिए; सुख चाहने वाला पुण्य करे, दुःख चाहने वाला पाप करे।

श्लोक 110 (skanda.3.95.110)

द्वयोरेकतरे लोके गृहीते कुशलो जनः ॥ इमं मानुषमाश्रित्य देहं परमदुर्लभम्

dvayorekatare loke gṛhīte kuśalo janaḥ imaṁ mānuṣamāśritya dehaṁ paramadurlabham

इन दोनों में से एक मार्ग को चुनकर, यह अत्यंत दुर्लभ मानव-देह पाकर, कुशल व्यक्ति —

श्लोक 111 (skanda.3.95.111)

य आत्महितवान्कश्चिद्देवमेकं समाश्रयेत् ॥ अथ पापानि सर्वाणि कुर्वन्नपि सदा नरः

ya ātmahitavānkaściddevamekaṁ samāśrayet atha pāpāni sarvāṇi kurvannapi sadā naraḥ

जो अपना हित चाहता है, वह एक ही देवता की शरण ले। और सतत सभी पाप करते हुए भी मनुष्य —

श्लोक 112 (skanda.3.95.112)

शिवमेकमतिर्ध्यायेत्स संतरति पातकम् ॥ मृता पूर्वभवे त्वेषा यदा प्राप्ता यमालये

śivamekamatirdhyāyetsa saṁtarati pātakam mṛtā pūrvabhave tveṣā yadā prāptā yamālaye

यदि एक शिव में ही एकाग्रचित्त होकर ध्यान करे, तो वह पाप को तर जाता है। जब पूर्वजन्म में मरकर यह स्त्री यमलोक पहुँची,

श्लोक 113 (skanda.3.95.113)

तदा वितर्कः सुमहानासीद्यमसभासदाम् ॥ यद्यपि ब्राह्मणी त्वेषा सत्कुलाचारदूषिता

tadā vitarkaḥ sumahānāsīdyamasabhāsadām yadyapi brāhmaṇī tveṣā satkulācāradūṣitā

तब यम की सभा में बड़ा भारी विचार-विमर्श हुआ — 'यद्यपि यह ब्राह्मणी है, तथापि इसने सत्कुल के आचार को दूषित किया है;

श्लोक 114 (skanda.3.95.114)

अतोऽस्माभिरिहानीता निरयं यातु वा न वा ॥ अनया साधितो बाल्ये पुण्यलेशोऽस्ति वा न वा

ato'smābhirihānītā nirayaṁ yātu vā na vā anayā sādhito bālye puṇyaleśo'sti vā na vā

अतः हमारे द्वारा यहाँ लाई गई यह नरक जाए या न जाए? क्या इसने बाल्यावस्था में कोई पुण्य-लेश किया था या नहीं?'

श्लोक 115 (skanda.3.95.115)

अथापि सुविमृश्यैवं धार्यो दंडोऽत्र नान्यथा ॥ बहुजन्मसहस्रेषु कृतपुण्यविपाकतः

athāpi suvimṛśyaivaṁ dhāryo daṁḍo'tra nānyathā bahujanmasahasreṣu kṛtapuṇyavipākataḥ

'फिर भी भलीभाँति विचार करके ही यहाँ दंड धारण किया जाना चाहिए, अन्यथा नहीं — क्योंकि हजारों जन्मों में किए गए पुण्य के परिपाक से ही

श्लोक 116 (skanda.3.95.116)

नृणां ब्रह्मकुले जन्म लभ्यते हि कथंचन ॥ अतोस्याः पूर्वपूर्वेषु कृताघं नास्ति जन्मसु

nṛṇāṁ brahmakule janma labhyate hi kathaṁcana atosyāḥ pūrvapūrveṣu kṛtāghaṁ nāsti janmasu

मनुष्यों को किसी प्रकार ब्रह्मकुल में जन्म प्राप्त होता है; अतः इसने पूर्व-पूर्व जन्मों में कोई पाप नहीं किया होगा।

श्लोक 117 (skanda.3.95.117)

अन्यथा सत्कुले जन्म कथमेषा प्रपद्यते॥ अत्रैव जन्मन्यनया कृतमंहो दुरत्ययम्

anyathā satkule janma kathameṣā prapadyate atraiva janmanyanayā kṛtamaṁho duratyayam

अन्यथा यह सत्कुल में जन्म कैसे प्राप्त करती? इसी जन्म में इसने यह दुस्तर पाप किया है।'

श्लोक 118 (skanda.3.95.118)

अथापि नरकावासं प्रायशो नेयमर्हति ॥ किंतु गोवत्सकं हत्वा विमृश्यागतसाध्वसा

athāpi narakāvāsaṁ prāyaśo neyamarhati kiṁtu govatsakaṁ hatvā vimṛśyāgatasādhvasā

'फिर भी यह प्रायः नरक-वास के योग्य नहीं है; किंतु गोवत्स को मारकर, विचार करने पर आए साहस से,

श्लोक 119 (skanda.3.95.119)

एषा शिवशिवेत्याह प्राग्जन्मार्जितकर्मणा ॥ यदेषा पापविच्छित्त्यै सकृदप्युरुमंगलम्

eṣā śivaśivetyāha prāgjanmārjitakarmaṇā yadeṣā pāpavicchittyai sakṛdapyurumaṁgalam

इसने 'शिव शिव' कहा — पूर्वजन्म-अर्जित कर्म के कारण। चूँकि पाप के नाश के लिए एक बार भी यह अत्यंत मंगलकारी

श्लोक 120 (skanda.3.95.120)

शिवनाम वदेद्भक्त्या तर्हि गच्छेत्परं पदम् ॥ एकजन्मकृतस्यास्य दारुणस्यापि यत्फलम्

śivanāma vadedbhaktyā tarhi gacchetparaṁ padam ekajanmakṛtasyāsya dāruṇasyāpi yatphalam

शिव-नाम भक्तिपूर्वक बोलने से भी परम पद प्राप्त हो जाता है — अतः इस एक जन्म में किए इस भीषण कर्म का जो भी फल हो,

श्लोक 121 (skanda.3.95.121)

क्रमेणानुभवत्वेषा भूत्वा चांडालजातिका ॥ अस्मादन्यतमः को वा नरकोऽस्ति नृणा मिह

krameṇānubhavatveṣā bhūtvā cāṁḍālajātikā asmādanyatamaḥ ko vā narako'sti nṛṇā miha

वह इसे चांडाल-जाति में जन्म लेकर क्रमशः भोग लेने दो; क्योंकि मनुष्यों के लिए इससे बढ़कर और कौन-सा नरक है यहाँ?

श्लोक 122 (skanda.3.95.122)

अनेकक्लेशसंघातैर्यन्मुहुः परिपीडनम् ॥ दुष्कुले जन्म दारिद्र्यं महाव्याधिर्विमूढता

anekakleśasaṁghātairyanmuhuḥ paripīḍanam duṣkule janma dāridryaṁ mahāvyādhirvimūḍhatā

— अनेक क्लेशों के समूह से बार-बार होने वाला यह परिपीड़न — दुष्कुल में जन्म, दरिद्रता, महाव्याधि, मूढ़ता —

श्लोक 123 (skanda.3.95.123)

एकैक एव नरकः सर्वे वा चाथ किं पुनः ॥ प्राग्जन्मपुण्यभारेण यन्नाम विवशाऽब्रवीत्

ekaika eva narakaḥ sarve vā cātha kiṁ punaḥ prāgjanmapuṇyabhāreṇa yannāma vivaśā'bravīt

इनमें से एक-एक ही नरक है, फिर सब मिलकर तो क्या ही कहना! किंतु पूर्वजन्म के पुण्य-भार से जो उसने विवश होकर भी नाम लिया —

श्लोक 124 (skanda.3.95.124)

तेनैषान्यभवे भूरि पुण्यमंते करिष्यति ॥ तेन पुण्येन महता निस्तीर्याघौघया तनाः

tenaiṣānyabhave bhūri puṇyamaṁte kariṣyati tena puṇyena mahatā nistīryāghaughayā tanāḥ

उसी से यह अन्य जन्म में अंत में बहुत पुण्य करेगी; और उस महान पुण्य से पाप-समूह को पार करके,

श्लोक 125 (skanda.3.95.125)

नीता तत्पुरुषैरंते प्रयास्यति परं पदम् ॥ एतादृशानां मर्त्यानां शास्तारो न वयं क्वचित् ॥ विचार्य स्वयमेवेशो यद्युक्तं तत्करोतु सः

nītā tatpuruṣairaṁte prayāsyati paraṁ padam etādṛśānāṁ martyānāṁ śāstāro na vayaṁ kvacit vicārya svayameveśo yadyuktaṁ tatkarotu saḥ

अंत में उन्हीं (शिव के) पुरुषों द्वारा ले जाई जाकर परम पद को प्राप्त होगी। ऐसे मनुष्यों के हम कहीं भी न्यायाधीश नहीं हैं; ईश्वर स्वयं ही विचार करके जो उचित हो वह करें।'

श्लोक 126 (skanda.3.95.126)

एवं वैवस्वतपुरे सर्वैर्यमपुरोगमैः ॥ विमृश्य चित्रगुप्ताद्यैरियं मुक्ताऽपतद्भुवि

evaṁ vaivasvatapure sarvairyamapurogamaiḥ vimṛśya citraguptādyairiyaṁ muktā'patadbhuvi

इस प्रकार वैवस्वत (यम) की नगरी में यम-प्रमुख सभी, चित्रगुप्त आदि द्वारा विचार किए जाने पर यह मुक्त होकर पृथ्वी पर गिर पड़ी।

श्लोक 127 (skanda.3.95.127)

आदौ यदेषा शिवनाम नारी प्रमादतो वाप्य सती जगाद ॥ तेनेह भूयः सुकृतेन शंभोर्बिल्वांकुराराधनपुण्यमाप

ādau yadeṣā śivanāma nārī pramādato vāpya satī jagāda teneha bhūyaḥ sukṛtena śaṁbhorbilvāṁkurārādhanapuṇyamāpa

चूँकि प्रारंभ में इस स्त्री ने, प्रमादवश ही सही, सती रहते हुए शिव-नाम का उच्चारण किया था, इसी सुकृत से इसने यहाँ पुनः शंभु की बिल्व-अंकुर से आराधना का पुण्य प्राप्त किया।

श्लोक 128 (skanda.3.95.128)

श्रीगोकर्णे शिवतिथावुपोष्य शिवमस्तके ॥ कृत्वा जागरणं ह्येषा चक्रे बिल्वार्पणं निशि

śrīgokarṇe śivatithāvupoṣya śivamastake kṛtvā jāgaraṇaṁ hyeṣā cakre bilvārpaṇaṁ niśi

श्री गोकर्ण में शिव-तिथि पर उपवास करके, शिव के मस्तक पर जागरण करके, इसने रात्रि में बिल्वार्पण किया।

श्लोक 129 (skanda.3.95.129)

अकामतः कृतस्यास्य पुण्यस्यैव च यत्फलम् ॥ अद्यैव भोक्ष्यते सेयं पश्यतस्तव नो मृषा

akāmataḥ kṛtasyāsya puṇyasyaiva ca yatphalam adyaiva bhokṣyate seyaṁ paśyatastava no mṛṣā

बिना कामना के किए गए इस पुण्य का जो भी फल है, वह आज ही, तुम्हारे देखते-देखते यह भोगेगी — यह मिथ्या नहीं है।

श्लोक 130 (skanda.3.95.130)

गौतम उवाच ॥ इत्युक्त्वा शिवदूतास्ते तस्याश्चांडालयोनितः ॥ जीवलेशं समाकृष्य युयुजुर्दिव्यतेजसा

gautama uvāca ityuktvā śivadūtāste tasyāścāṁḍālayonitaḥ jīvaleśaṁ samākṛṣya yuyujurdivyatejasā

गौतम ने कहा — ऐसा कहकर शिव के उन दूतों ने उसके चांडाल-शरीर से जीवन के अंतिम अंश को खींचकर दिव्य तेज से युक्त कर दिया।

श्लोक 131 (skanda.3.95.131)

तां दिव्यदेहसंक्रांतां तेजोराशिसमुज्ज्वलाम्॥ विमाने स्थापयामासुः प्रीतास्ते शिवकिंकराः

tāṁ divyadehasaṁkrāṁtāṁ tejorāśisamujjvalām vimāne sthāpayāmāsuḥ prītāste śivakiṁkarāḥ

दिव्य देह में परिवर्तित, तेज-राशि से देदीप्यमान उसे उन प्रसन्न शिव-किंकरों ने विमान में स्थापित किया।

श्लोक 132 (skanda.3.95.132)

अथ सा परमोदाररूपलावण्यशालिनी ॥ दिव्यभूषणदीप्तांगी दिव्यांबरविधारिणी

atha sā paramodārarūpalāvaṇyaśālinī divyabhūṣaṇadīptāṁgī divyāṁbaravidhāriṇī

तब वह परम उदार रूप-लावण्य से सुशोभित, दिव्य आभूषणों से दीप्त अंगों वाली, दिव्य वस्त्र धारण किए हुए —

श्लोक 133 (skanda.3.95.133)

देहेन दिव्यगंधेन दिव्यतेजोविकाशिना ॥ दिव्यमाल्यावतंसेन विरराज विमानगा

dehena divyagaṁdhena divyatejovikāśinā divyamālyāvataṁsena virarāja vimānagā

— दिव्य सुगंधित, दिव्य तेज से विकसित देह वाली, दिव्य माला से सुशोभित होकर विमान में बैठी हुई शोभित हुई।

श्लोक 134 (skanda.3.95.134)

रत्नच्छत्रपताकाद्यैर्गीतवादित्रनिस्वनैः ॥ मध्ये सा शिवदूतानां मोदमाना वरानना

ratnacchatrapatākādyairgītavāditranisvanaiḥ madhye sā śivadūtānāṁ modamānā varānanā

रत्न-छत्र-पताका आदि से, गीत-वाद्य की ध्वनियों से युक्त होकर, वह सुंदर मुख वाली शिव-दूतों के मध्य आनंदित हुई।

श्लोक 135 (skanda.3.95.135)

अनुभूतानि जन्मानि स्मृत्वास्मृत्वा पुनःपुनः ॥ भीता त्रस्ता दृढा श्चर्यं दृष्ट्वा स्वप्नमिवोत्थिता

anubhūtāni janmāni smṛtvāsmṛtvā punaḥpunaḥ bhītā trastā dṛḍhā ścaryaṁ dṛṣṭvā svapnamivotthitā

अनुभव किए हुए जन्मों को बार-बार स्मरण करते हुए, वह भयभीत, त्रस्त, अत्यंत आश्चर्यचकित होकर, मानो स्वप्न से जगी हो, ऐसे उठी।

श्लोक 136 (skanda.3.95.136)

काहं केऽमी महासिद्धाः कोयं लोको मनोरमः ॥ क्व गतं मे वपुः कष्टं चंडचांडालगोत्रजम्

kāhaṁ ke'mī mahāsiddhāḥ koyaṁ loko manoramaḥ kva gataṁ me vapuḥ kaṣṭaṁ caṁḍacāṁḍālagotrajam

'मैं कौन हूँ? ये महासिद्ध कौन हैं? यह मनोहर लोक कौन-सा है? मेरा वह कष्टमय, भयंकर चांडाल-कुल में जन्मा शरीर कहाँ गया?'

श्लोक 137 (skanda.3.95.137)

अहो सुमहदाश्चर्यं दृष्टं मायाविलासजम् ॥ यन्मे भवसहस्रेषु भ्रातंभ्रांतं पुनःपुनः

aho sumahadāścaryaṁ dṛṣṭaṁ māyāvilāsajam yanme bhavasahasreṣu bhrātaṁbhrāṁtaṁ punaḥpunaḥ

'अहो! मैंने माया की लीला से उत्पन्न यह अत्यंत महान आश्चर्य देखा — कि मैं हजारों जन्मों में बार-बार भटकती रही,

श्लोक 138 (skanda.3.95.138)

अहो ईश्वरपूजाया माहात्म्यं विस्मयावहम् ॥ पत्रमात्रेण संतुष्टो यो ददाति निजं पदम्

aho īśvarapūjāyā māhātmyaṁ vismayāvaham patramātreṇa saṁtuṣṭo yo dadāti nijaṁ padam

अहो! ईश्वर-पूजा का यह माहात्म्य कितना विस्मयकारी है — कि केवल एक पत्ते से संतुष्ट होकर वे अपना ही पद दे देते हैं!'

श्लोक 139 (skanda.3.95.139)

इति तां जातनिर्वेदां स्मरन्तीं भगवत्पदम् ॥ दिव्यं विमानमारोप्य ते महेश्वरकिंकराः

iti tāṁ jātanirvedāṁ smarantīṁ bhagavatpadam divyaṁ vimānamāropya te maheśvarakiṁkarāḥ

इस प्रकार वैराग्य को प्राप्त, भगवान के पद का स्मरण करती उस स्त्री को, महेश्वर के उन किंकरों ने दिव्य विमान पर बिठाकर,

श्लोक 140 (skanda.3.95.140)

आलोकयत्सु सर्वेषु लोकेशेषु सविस्मयम् ॥ आमंत्र्य तामथानिन्युः परमेश्वरसन्निधिम्

ālokayatsu sarveṣu lokeśeṣu savismayam āmaṁtrya tāmathāninyuḥ parameśvarasannidhim

समस्त लोकपालों के विस्मयपूर्वक देखते हुए, फिर आमंत्रित करके परमेश्वर के सन्निधान में ले गए।

श्लोक 141 (skanda.3.95.141)

राजन्सुमहदाश्चर्यमाख्यातं गिरिजा पतेः ॥ माहात्म्यं भक्तिलेशस्य सर्वाघौघविनाशनम्

rājansumahadāścaryamākhyātaṁ girijā pateḥ māhātmyaṁ bhaktileśasya sarvāghaughavināśanam

हे राजन्! इस प्रकार गिरिजापति (शिव) का यह अत्यंत महान आश्चर्य, तथा भक्ति के एक अंशमात्र का यह माहात्म्य, जो समस्त पाप-समूहों का नाशक है, बताया गया।

श्लोक 142 (skanda.3.95.142)

राजोवाच ॥ भगवन्परमेशस्य कीदृशो लोक उत्तमः ॥ तस्य मे लक्षणं ब्रूहि यद्यस्ति मयि ते दया

rājovāca bhagavanparameśasya kīdṛśo loka uttamaḥ tasya me lakṣaṇaṁ brūhi yadyasti mayi te dayā

राजा ने कहा — हे भगवन्! परमेश्वर का वह उत्तम लोक कैसा है? यदि आपको मुझ पर दया है, तो उसके लक्षण मुझे बताइए।

श्लोक 143 (skanda.3.95.143)

गौतम उवाच ॥ ब्रह्मादिसुरनाथानां लोकेष्वपि सुदुर्लभः ॥ य आनंदः सदा यत्र स लोकः पारमेश्वरः

gautama uvāca brahmādisuranāthānāṁ lokeṣvapi sudurlabhaḥ ya ānaṁdaḥ sadā yatra sa lokaḥ pārameśvaraḥ

गौतम ने कहा — जहाँ सदा वह आनंद है, जो ब्रह्मादि देवताओं के लोकों में भी अत्यंत दुर्लभ है, वही परमेश्वर का लोक है।

श्लोक 144 (skanda.3.95.144)

सर्वातिगमनं यत्र ज्योतिर्यत्र प्रतिष्ठितम् ॥ क्वापि नास्ति तमोयोगः स लोकः पारमेश्वरः

sarvātigamanaṁ yatra jyotiryatra pratiṣṭhitam kvāpi nāsti tamoyogaḥ sa lokaḥ pārameśvaraḥ

जहाँ सबका अतिक्रमण होकर केवल ज्योति ही प्रतिष्ठित है, जहाँ कहीं भी अंधकार का संयोग नहीं है, वही परमेश्वर का लोक है।

श्लोक 145 (skanda.3.95.145)

गुणवृत्ति विनिस्तीर्य संप्राप्ता यत्र योगिनः ॥ न पतेयुः पुनः सर्वे स लोकः पारमेश्वरः

guṇavṛtti vinistīrya saṁprāptā yatra yoginaḥ na pateyuḥ punaḥ sarve sa lokaḥ pārameśvaraḥ

गुणों की वृत्ति को पार करके जहाँ पहुँचे हुए योगी पुनः कभी नहीं गिरते, वही परमेश्वर का लोक है।

श्लोक 146 (skanda.3.95.146)

यत्र वासं न कुर्वंति क्रोधलोभमदादयः ॥ यत्रावस्था न जन्माद्याः स लोकः पारमेश्वरः

yatra vāsaṁ na kurvaṁti krodhalobhamadādayaḥ yatrāvasthā na janmādyāḥ sa lokaḥ pārameśvaraḥ

जहाँ क्रोध, लोभ, मद आदि निवास नहीं करते, जहाँ जन्म आदि अवस्थाएँ नहीं हैं, वही परमेश्वर का लोक है।

श्लोक 147 (skanda.3.95.147)

सर्वेषां निगमानां च यदेकं क्षेत्रमुच्यते ॥ यस्मान्नास्ति परं वित्तं तत्पदं पारमेश्वरम्

sarveṣāṁ nigamānāṁ ca yadekaṁ kṣetramucyate yasmānnāsti paraṁ vittaṁ tatpadaṁ pārameśvaram

जो समस्त वेदों का एक ही क्षेत्र कहा जाता है, जिससे बढ़कर कोई धन (प्राप्ति) नहीं है, वही परमेश्वर का परम पद है।

श्लोक 148 (skanda.3.95.148)

प्रत्याहारासन ध्यानप्राणसंयमनादिभिः ॥ यत्र योगपथैः प्राप्तुं यतते योगिनः सदा

pratyāhārāsana dhyānaprāṇasaṁyamanādibhiḥ yatra yogapathaiḥ prāptuṁ yatate yoginaḥ sadā

प्रत्याहार, आसन, ध्यान, प्राणायाम आदि योग-मार्गों से जिसे प्राप्त करने के लिए योगीजन सदा प्रयत्नशील रहते हैं,

श्लोक 149 (skanda.3.95.149)

यत्र देवः सदानंदनिर्मलज्ञानरूपया ॥ अस्ति देव्या सह क्रीडञ्स लोकः पारमेश्वरः

yatra devaḥ sadānaṁdanirmalajñānarūpayā asti devyā saha krīḍañsa lokaḥ pārameśvaraḥ

जहाँ देव सदानंद और निर्मल-ज्ञान-स्वरूपा देवी के साथ क्रीड़ा करते हैं, वही परमेश्वर का लोक है।

श्लोक 150 (skanda.3.95.150)

जन्मानेकसहस्रेषु संभृतैः पुण्यराशिभिः ॥ आरूढाः पुरुषा नार्यः क्रीडन्ते यत्र संगताः

janmānekasahasreṣu saṁbhṛtaiḥ puṇyarāśibhiḥ ārūḍhāḥ puruṣā nāryaḥ krīḍante yatra saṁgatāḥ

अनेक हजारों जन्मों में संचित पुण्य-राशियों से वहाँ आरूढ़ हुए पुरुष और स्त्रियाँ मिलकर क्रीड़ा करते हैं।

श्लोक 151 (skanda.3.95.151)

तेजो राशौ समालीना दुर्विभाव्ये मनोरमे ॥ अहोरात्रादिसंस्थानं न विंदंति कदाचन

tejo rāśau samālīnā durvibhāvye manorame ahorātrādisaṁsthānaṁ na viṁdaṁti kadācana

उस दुर्विभाव्य, मनोहर तेज-राशि में लीन होकर वे कभी भी दिन-रात्रि आदि की गणना नहीं जानते।

श्लोक 152 (skanda.3.95.152)

स लोकः परमेशस्य दुर्लभो हि कुयोगिनः ॥ एतद्भक्ति सुपूर्णा ये तैरेव प्रतिपद्यते

sa lokaḥ parameśasya durlabho hi kuyoginaḥ etadbhakti supūrṇā ye taireva pratipadyate

परमेश का वह लोक कुयोगी के लिए दुर्लभ ही है; उसकी भक्ति से जो पूर्ण हैं, वे ही उसे प्राप्त करते हैं।

श्लोक 153 (skanda.3.95.153)

ये तत्कथाश्रवणकीर्तनजातहर्षा ये सर्वभूतसुहृदः प्रशमैकनिष्ठाः ॥ संसारचक्रमतिवाह्य निरस्तमोहास्ते शांकरं पदमवाप्य सुखं रमन्ते

ye tatkathāśravaṇakīrtanajātaharṣā ye sarvabhūtasuhṛdaḥ praśamaikaniṣṭhāḥ saṁsāracakramativāhya nirastamohāste śāṁkaraṁ padamavāpya sukhaṁ ramante

जिन्हें उसकी कथा सुनने-गाने से हर्ष होता है, जो समस्त प्राणियों के मित्र हैं, जो एकमात्र शांति में निष्ठावान हैं — वे संसार-चक्र को पार कर, मोह त्यागकर, शांकर पद को प्राप्त होकर सुखपूर्वक रमण करते हैं।

श्लोक 154 (skanda.3.95.154)

तथा त्वमपि राजेंद्र गोकर्णं गिरिशालयम् ॥ गत्वा प्रशमिताघौघः कृतकृत्यत्वमाप्नुहि

tathā tvamapi rājeṁdra gokarṇaṁ giriśālayam gatvā praśamitāghaughaḥ kṛtakṛtyatvamāpnuhi

वैसे ही तुम भी, हे राजेन्द्र! गिरीश (शिव) के आलय गोकर्ण जाकर, पाप-समूह को शांत करके, कृतकृत्यता प्राप्त करो।

श्लोक 155 (skanda.3.95.155)

तत्र सर्वेषु कालेषु स्नात्वाभ्यर्च्य महाबलम् ॥ कृत्वा शिवचतुर्दश्यामुपवासं समाहितः

tatra sarveṣu kāleṣu snātvābhyarcya mahābalam kṛtvā śivacaturdaśyāmupavāsaṁ samāhitaḥ

वहाँ सर्वदा स्नान करके महाबल की अर्चना करके, शिव-चतुर्दशी को सावधानीपूर्वक उपवास करके,

श्लोक 156 (skanda.3.95.156)

कृत्वा जागरणं रात्रौ बिल्वैरभ्यर्च्य शंकरम् ॥ सर्वपापविनिर्मुक्तः शिवलोकमवाप्स्यसि

kṛtvā jāgaraṇaṁ rātrau bilvairabhyarcya śaṁkaram sarvapāpavinirmuktaḥ śivalokamavāpsyasi

रात्रि में जागरण करके बिल्वपत्रों से शंकर की अर्चना करके, समस्त पापों से मुक्त होकर तुम शिवलोक को प्राप्त करोगे।

श्लोक 157 (skanda.3.95.157)

एष ते विमलो राजन्नुपदेशो मया कृतः ॥ स्वस्ति तेऽस्तु गमिष्यामि मिथिलाधिपतेः पुरीम्

eṣa te vimalo rājannupadeśo mayā kṛtaḥ svasti te'stu gamiṣyāmi mithilādhipateḥ purīm

हे राजन्! यह मैंने तुम्हें यह निर्मल उपदेश दिया है। तुम्हारा कल्याण हो; अब मैं मिथिला के अधिपति की नगरी जाऊँगा।

श्लोक 158 (skanda.3.95.158)

इत्यामन्त्र्य मुनिः प्रीत्या गौतमो मिथिलां ययौ ॥ सोऽपि हृष्टमना राजा गोकर्णं प्रत्यपद्यत

ityāmantrya muniḥ prītyā gautamo mithilāṁ yayau so'pi hṛṣṭamanā rājā gokarṇaṁ pratyapadyata

इस प्रकार प्रेमपूर्वक विदा लेकर मुनि गौतम मिथिला चले गए; वह राजा भी प्रसन्नचित्त होकर गोकर्ण की ओर चल पड़ा।

श्लोक 159 (skanda.3.95.159)

तत्र दृष्ट्वा महादेवं स्नात्वाभ्यर्च्य महाबलम् ॥ निर्धूताशेषपापौघो लेभे शम्भोः परं पदम्

tatra dṛṣṭvā mahādevaṁ snātvābhyarcya mahābalam nirdhūtāśeṣapāpaugho lebhe śambhoḥ paraṁ padam

वहाँ महादेव का दर्शन करके, स्नान करके, महाबल की अर्चना करके, समस्त पाप-समूह से मुक्त होकर उसने शंभु के परम पद को प्राप्त किया।

श्लोक 160 (skanda.3.95.160)

य इमां शृणुयान्नित्यं कथां शैवीं मनोहराम् ॥ श्रावयेद्वा जनो भक्त्या स याति परमां गतिम्

ya imāṁ śṛṇuyānnityaṁ kathāṁ śaivīṁ manoharām śrāvayedvā jano bhaktyā sa yāti paramāṁ gatim

जो कोई इस मनोहर शैव कथा को नित्य सुनता है, या भक्तिपूर्वक दूसरों को सुनाता है, वह परम गति को प्राप्त होता है।

श्लोक 161 (skanda.3.95.161)

श्रद्दधानः सकृद्वापि य इमां शृणुयात्कथाम् ॥ त्रिःसप्तकुलजैः सार्धं शिवलोकमवाप्नुयात्

śraddadhānaḥ sakṛdvāpi ya imāṁ śṛṇuyātkathām triḥsaptakulajaiḥ sārdhaṁ śivalokamavāpnuyāt

जो श्रद्धापूर्वक इस कथा को एक बार भी सुनता है, वह इक्कीस पीढ़ियों के कुल सहित शिवलोक को प्राप्त करता है।

श्लोक 162 (skanda.3.95.162)

इति कथितमशेषं श्रेयसामादिबीजं भवशतदुरितघ्नं ध्वस्तमोहांधकारम् ॥ चरितममरगेयं मन्मथारेरुदारं सततमपि निषेव्यं स्वस्तिमद्भिश्च लोकैः

iti kathitamaśeṣaṁ śreyasāmādibījaṁ bhavaśataduritaghnaṁ dhvastamohāṁdhakāram caritamamarageyaṁ manmathārerudāraṁ satatamapi niṣevyaṁ svastimadbhiśca lokaiḥ

इस प्रकार यह समस्त कल्याणों का आदि बीज, सैकड़ों जन्मों के पापों का नाशक, मोह-अंधकार का ध्वंसक चरित्र — देवताओं द्वारा भी गाया जाने वाला, कामदेव के शत्रु (शिव) का यह उदार चरित्र सम्पूर्ण रूप से कहा गया, जो कल्याण चाहने वाले समस्त लोकों द्वारा सदा ही सेवनीय है।

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