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ब्रह्म खण्ड · अध्याय 94

गोकर्ण महिमा

अध्याय 93अध्याय-सूचीअध्याय 95

श्लोक 1 (skanda.3.94.1)

॥ सूत उवाच ॥ अथान्यदपि वक्ष्यामि माहात्म्यं त्रिपुरद्विषः ॥ श्रुतमात्रेण येनाशु च्छिद्यंते सर्वसंशयाः

sūta uvāca athānyadapi vakṣyāmi māhātmyaṁ tripuradviṣaḥ śrutamātreṇa yenāśu cchidyaṁte sarvasaṁśayāḥ

सूत जी ने कहा — अब मैं त्रिपुरारि का एक और माहात्म्य बताऊँगा, जिसे केवल सुन लेने मात्र से समस्त संशय तुरन्त दूर हो जाते हैं।

श्लोक 2 (skanda.3.94.2)

अतः परतरं नास्ति किंचित्पापविशोधनम् ॥ सर्वानंदकरं श्रीमत्सर्वकामार्थसाधम्

ataḥ parataraṁ nāsti kiṁcitpāpaviśodhanam sarvānaṁdakaraṁ śrīmatsarvakāmārthasādham

पाप के शमन के लिए इससे बढ़कर और कुछ नहीं है; यह समस्त आनंद देने वाला, श्रीमान् और सभी कामनाओं तथा अर्थों को सिद्ध करने वाला है।

श्लोक 3 (skanda.3.94.3)

दीर्घायुर्विजयारोग्यभुक्तिमुक्तिफलप्रदम् ॥ यदनन्येन भावेन महे शाराधनं परम्

dīrghāyurvijayārogyabhuktimuktiphalapradam yadananyena bhāvena mahe śārādhanaṁ param

यह दीर्घायु, विजय, आरोग्य, भोग और मोक्ष का फल देता है — अर्थात् अनन्य भाव से महेश्वर की परम आराधना।

श्लोक 4 (skanda.3.94.4)

आर्द्राणामपि शुष्काणामल्पानां महतामपि ॥ एतदेव विनिर्दिष्टं प्रायश्चितमथोत्तमम्

ārdrāṇāmapi śuṣkāṇāmalpānāṁ mahatāmapi etadeva vinirdiṣṭaṁ prāyaścitamathottamam

ताजे हों या पुराने, छोटे हों या बड़े पाप — इन सबके लिए यही परम प्रायश्चित बताया गया है।

श्लोक 5 (skanda.3.94.5)

सर्वकालेऽप्यभेद्यानामघानां क्षयकारणम् ॥ महामुनिविनिर्दिष्टैः प्रायश्चित्तैरथोत्तमैः

sarvakāle'pyabhedyānāmaghānāṁ kṣayakāraṇam mahāmunivinirdiṣṭaiḥ prāyaścittairathottamaiḥ

यह सर्वकाल में भी अभेद्य पापों के क्षय का कारण है, महामुनियों द्वारा बताए गए उत्तम प्रायश्चित्तों से भी बढ़कर।

श्लोक 6 (skanda.3.94.6)

इयमेव परं श्रेयः सर्वशास्त्रविनिश्चितम्॥ यद्भक्त्या परमेशस्य पूजनं परमो दयम्

iyameva paraṁ śreyaḥ sarvaśāstraviniścitam yadbhaktyā parameśasya pūjanaṁ paramo dayam

यही परम श्रेय है, समस्त शास्त्रों द्वारा निश्चित — कि भक्तिपूर्वक परमेश्वर की पूजा ही परम उपाय है।

श्लोक 7 (skanda.3.94.7)

जानताऽजानता वापि येन केनापि हेतुना ॥ यत्किंचिपि देवाय कृतं कर्म विमुक्तिदम्

jānatā'jānatā vāpi yena kenāpi hetunā yatkiṁcipi devāya kṛtaṁ karma vimuktidam

जानते हुए अथवा अनजाने में, किसी भी कारण से देवता के लिए किया गया जो भी कर्म हो, वह मुक्तिदायक होता है।

श्लोक 8 (skanda.3.94.8)

माघे कृष्णचतुर्द्दश्यामुपवासोऽति दुर्लभः॥ तत्रापि दुर्लभं मन्ये रात्रौ जागरणं नृणाम्

māghe kṛṣṇacaturddaśyāmupavāso'ti durlabhaḥ tatrāpi durlabhaṁ manye rātrau jāgaraṇaṁ nṛṇām

माघ मास की कृष्ण चतुर्दशी को उपवास करना अत्यंत दुर्लभ है; उससे भी दुर्लभ मैं मनुष्यों का रात्रि में जागरण करना मानता हूँ।

श्लोक 9 (skanda.3.94.9)

अतीव दुर्लभं मन्ये शिवलिंगस्य दर्शनम् ॥ सुदुर्लभतरं मन्ये पूजनं परमेशितुः

atīva durlabhaṁ manye śivaliṁgasya darśanam sudurlabhataraṁ manye pūjanaṁ parameśituḥ

शिवलिंग का दर्शन मैं अत्यंत दुर्लभ मानता हूँ; उससे भी अधिक दुर्लभ परमेश्वर की पूजा मानता हूँ।

श्लोक 10 (skanda.3.94.10)

भवकोटिशतोत्पन्नषुण्यराशिविपाकतः॥ लभ्यते वा पुनस्तत्र बिल्वपत्रार्चनं विभोः

bhavakoṭiśatotpannaṣuṇyarāśivipākataḥ labhyate vā punastatra bilvapatrārcanaṁ vibhoḥ

सैकड़ों करोड़ जन्मों में संचित पुण्य-राशि के परिपाक से ही वहाँ भगवान की बिल्वपत्र से अर्चना प्राप्त होती है।

श्लोक 11 (skanda.3.94.11)

वर्षाणामयुतं येन स्नातं गंगासरिज्जले । सकृद्बिल्वार्चनेनैव तत्फलं लभते नरः

varṣāṇāmayutaṁ yena snātaṁ gaṁgāsarijjale sakṛdbilvārcanenaiva tatphalaṁ labhate naraḥ

जिस फल को दस हजार वर्षों तक गंगाजल में स्नान करने से प्राप्त किया जाता है, वही फल मनुष्य एक बार बिल्वपत्र से पूजा करने पर पा लेता है।

श्लोक 12 (skanda.3.94.12)

यानियानि तु पुण्यानि लीनानीह युगेयुगे ॥ माघेऽसितचतुर्दश्यां तानि तिष्ठंति कृत्स्नशः

yāniyāni tu puṇyāni līnānīha yugeyuge māghe'sitacaturdaśyāṁ tāni tiṣṭhaṁti kṛtsnaśaḥ

युग-युग में जो भी पुण्य संचित हुए हैं, वे सब माघ की कृष्ण चतुर्दशी में सम्पूर्ण रूप से निवास करते हैं।

श्लोक 13 (skanda.3.94.13)

एतामेव प्रशंसंति लोके ब्रह्मादयः सुराः ॥ मुनयश्च वशिष्ठाद्या माघेऽसितचतुर्दशीम्

etāmeva praśaṁsaṁti loke brahmādayaḥ surāḥ munayaśca vaśiṣṭhādyā māghe'sitacaturdaśīm

इस माघ की कृष्ण चतुर्दशी की प्रशंसा लोक में ब्रह्मादि देवता और वशिष्ठ आदि मुनि करते हैं।

श्लोक 14 (skanda.3.94.14)

अत्रोपवासः केनापि कृतः क्रतुशताधिकैः ॥ रात्रौ जागरणं पुण्यं कल्पकोटितपोऽधिकम्

atropavāsaḥ kenāpi kṛtaḥ kratuśatādhikaiḥ rātrau jāgaraṇaṁ puṇyaṁ kalpakoṭitapo'dhikam

इस दिन किसी के द्वारा किया गया उपवास सैकड़ों यज्ञों से बढ़कर है; रात्रि में किया गया पुण्यमय जागरण करोड़ों कल्पों के तप से भी अधिक है।

श्लोक 15 (skanda.3.94.15)

एकेन बिल्वपत्रेण शिवलिंगार्चनं कृतम् ॥ त्रैलोक्ये तस्य पुण्यस्य को वा सादृश्यमिच्छति

ekena bilvapatreṇa śivaliṁgārcanaṁ kṛtam trailokye tasya puṇyasya ko vā sādṛśyamicchati

एक ही बिल्वपत्र से किया गया शिवलिंग-पूजन — त्रिलोक में उस पुण्य की तुलना और कौन चाहेगा?

श्लोक 16 (skanda.3.94.16)

अत्रानुवर्ण्यते गाथा पुण्या परमशोभना ॥ गोपनीयापि कारुण्याद्गौतमेन प्रकाशिता

atrānuvarṇyate gāthā puṇyā paramaśobhanā gopanīyāpi kāruṇyādgautamena prakāśitā

यहाँ एक पुण्यमय, परम शोभन कथा वर्णित की जाती है, जो गोपनीय होते हुए भी गौतम मुनि द्वारा करुणावश प्रकट की गई थी।

श्लोक 17 (skanda.3.94.17)

इक्ष्वाकुवंशजः श्रीमान्राजा परम धार्मिकः॥ आसीन्मित्रसहोनाम श्रेष्ठः सर्वधनुर्भृताम्

ikṣvākuvaṁśajaḥ śrīmānrājā parama dhārmikaḥ āsīnmitrasahonāma śreṣṭhaḥ sarvadhanurbhṛtām

इक्ष्वाकु वंश में उत्पन्न एक श्रीमान, परम धार्मिक राजा हुए, जिनका नाम मित्रसह था, जो समस्त धनुर्धरों में श्रेष्ठ थे।

श्लोक 18 (skanda.3.94.18)

स राजा सकलास्त्रज्ञः शास्त्रज्ञः श्रुतिपारगः ॥ वीरोऽत्यंतबलोत्साहो नित्योद्योगी दयानिधिः

sa rājā sakalāstrajñaḥ śāstrajñaḥ śrutipāragaḥ vīro'tyaṁtabalotsāho nityodyogī dayānidhiḥ

वे राजा समस्त अस्त्रों के ज्ञाता, शास्त्रज्ञ, वेदपारंगत थे; वीर, अत्यंत बलवान और उत्साही, सदा उद्योगी और दया के भंडार थे।

श्लोक 19 (skanda.3.94.19)

पुण्यानामिव संघातस्तेजसामिव पंजरः ॥ आश्चर्याणामिव क्षेत्रं यस्य मूर्तिर्विराजते

puṇyānāmiva saṁghātastejasāmiva paṁjaraḥ āścaryāṇāmiva kṣetraṁ yasya mūrtirvirājate

उनकी मूर्ति मानो पुण्यों का समूह, तेजों का पिंजरा और आश्चर्यों का क्षेत्र-सी सुशोभित होती थी।

श्लोक 20 (skanda.3.94.20)

हृदयं दययाक्रांतं श्रियाक्रांतं च तद्वपुः ॥ चरणौ यस्य सामंतचूडामणिमरीचिभिः ॥ एकदा मृगयाकेलिलोलुपः स महीपतिः ॥ विवेश गह्वरं घोरं बलेन महतावृतः

hṛdayaṁ dayayākrāṁtaṁ śriyākrāṁtaṁ ca tadvapuḥ caraṇau yasya sāmaṁtacūḍāmaṇimarīcibhiḥ ekadā mṛgayākelilolupaḥ sa mahīpatiḥ viveśa gahvaraṁ ghoraṁ balena mahatāvṛtaḥ

उनका हृदय दया से आक्रांत था और शरीर श्री से; उनके चरण सामंतों के मुकुट-मणियों की किरणों से स्पर्शित होते थे। एक बार मृगया-क्रीड़ा में लोलुप वह राजा विशाल सेना से घिरा हुआ एक घोर वन में प्रविष्ट हुआ।

श्लोक 21 (skanda.3.94.21)

तत्र विव्याध विशिखैः शार्दूलान्गवयान्मृगान् ॥ रुरून्वराहान्महिषान्मृगेंद्रानपि भूरिशः

tatra vivyādha viśikhaiḥ śārdūlāngavayānmṛgān rurūnvarāhānmahiṣānmṛgeṁdrānapi bhūriśaḥ

वहाँ उसने बाणों से अनेक सिंहों, नीलगायों, मृगों, हिरणों, वराहों, भैंसों और सिंहों तक को भेद डाला।

श्लोक 22 (skanda.3.94.22)

स रथी मृगयासक्तो गहनं दंशित श्चरन् ॥ कमपि ज्वलनाकारं निजघान निशाचरम्

sa rathī mṛgayāsakto gahanaṁ daṁśita ścaran kamapi jvalanākāraṁ nijaghāna niśācaram

मृगया में तल्लीन, कवच धारण किए हुए वह रथी घने वन में विचरण करते हुए, अग्नि के समान दिखने वाले किसी निशाचर का वध कर बैठा।

श्लोक 23 (skanda.3.94.23)

तस्यानुजः शुचाविष्टो दृष्ट्वा दूरे तिरोहितः ॥ भ्रातरं निहतं दृष्ट्वा चिंतयामास चेतसा

tasyānujaḥ śucāviṣṭo dṛṣṭvā dūre tirohitaḥ bhrātaraṁ nihataṁ dṛṣṭvā ciṁtayāmāsa cetasā

उस निशाचर का छोटा भाई शोकाकुल होकर दूर से यह देखकर छिप गया; अपने भाई को मरा देख उसने मन में सोचा —

श्लोक 24 (skanda.3.94.24)

नन्वेष राजा दुर्द्धर्षो देवानां रक्षसामपि ॥ छद्मनैव प्रजेतव्यो मम शत्रुर्न चान्यथा

nanveṣa rājā durddharṣo devānāṁ rakṣasāmapi chadmanaiva prajetavyo mama śatrurna cānyathā

'यह राजा तो देवताओं और राक्षसों के लिए भी दुर्जेय है; मेरा यह शत्रु छल से ही जीता जा सकता है, अन्यथा नहीं।'

श्लोक 25 (skanda.3.94.25)

इति व्यवसितः पापो राक्षसो मनुजाकृतिः ॥ आससाद नृपश्रेष्ठमुत्पात इव मूर्तिमान्

iti vyavasitaḥ pāpo rākṣaso manujākṛtiḥ āsasāda nṛpaśreṣṭhamutpāta iva mūrtimān

ऐसा निश्चय करके वह पापी राक्षस मनुष्य का रूप धारण कर, मानो साक्षात् उत्पात हो, उस श्रेष्ठ राजा के पास पहुँचा।

श्लोक 26 (skanda.3.94.26)

तं विनम्राकृतिं दृष्ट्वा भृत्यतां कर्तुमागतम् ॥ चक्रे महानसाध्यक्षमज्ञानात्स महीपतिः

taṁ vinamrākṛtiṁ dṛṣṭvā bhṛtyatāṁ kartumāgatam cakre mahānasādhyakṣamajñānātsa mahīpatiḥ

उसे विनम्र रूप में सेवा करने आया देख, उसके सच्चे स्वरूप से अनजान राजा ने अज्ञानवश उसे अपने महानस (रसोई) का अध्यक्ष नियुक्त कर दिया।

श्लोक 27 (skanda.3.94.27)

अथ तस्मिन्वने राजा किंचित्कालं विहृत्य सः ॥ निवृत्तो मृगयां हित्वा स्वपुरीं पुनराययौ

atha tasminvane rājā kiṁcitkālaṁ vihṛtya saḥ nivṛtto mṛgayāṁ hitvā svapurīṁ punarāyayau

तत्पश्चात् उस वन में कुछ काल तक विहार करके राजा ने मृगया छोड़कर पुनः अपनी नगरी की ओर प्रस्थान किया।

श्लोक 28 (skanda.3.94.28)

तस्य राजेंद्रमुख्यस्य मदयंतीतिनामतः ॥ दमयन्ती नलस्येव विदिता वल्लभा सती

tasya rājeṁdramukhyasya madayaṁtītināmataḥ damayantī nalasyeva viditā vallabhā satī

उस श्रेष्ठ राजा की मदयंती नामक एक सती, प्रिय पत्नी थी, जो नल की दमयंती के समान विख्यात थी।

श्लोक 29 (skanda.3.94.29)

एतस्मिन्समये राजा निमंत्र्य मुनिपुंगवम् ॥ वशिष्ठं गृहमानिन्ये संप्राप्ते पितृवासरे

etasminsamaye rājā nimaṁtrya munipuṁgavam vaśiṣṭhaṁ gṛhamāninye saṁprāpte pitṛvāsare

इसी समय, पितृ-दिवस आने पर राजा ने मुनिश्रेष्ठ वशिष्ठ को निमंत्रित करके अपने घर बुलाया।

श्लोक 30 (skanda.3.94.30)

रक्षसा सूदरूपेण संमिश्रितनरामिषम् ॥ शाकामिषं पुरः क्षिप्तं दृष्ट्वा गुरुरथाब्रवीत्

rakṣasā sūdarūpeṇa saṁmiśritanarāmiṣam śākāmiṣaṁ puraḥ kṣiptaṁ dṛṣṭvā gururathābravīt

रसोइए के रूप में छद्म धारण किए राक्षस द्वारा नरमांस मिलाकर आगे रखी गई शाक-सामग्री को देखकर गुरु ने कहा —

श्लोक 31 (skanda.3.94.31)

धिग्धिङ्नरामिषं राजं स्त्वयैतच्छद्मकारिणा ॥ खलेनोपहृतं मेऽद्य अतो रक्षो भविष्यसि

dhigdhiṅnarāmiṣaṁ rājaṁ stvayaitacchadmakāriṇā khalenopahṛtaṁ me'dya ato rakṣo bhaviṣyasi

'धिक्कार है, धिक्कार है! हे राजन्! यह नरमांस आज तुझ छलिया दुष्ट ने मुझे परोसा है! अतः तू राक्षस बन जाएगा!'

श्लोक 32 (skanda.3.94.32)

रक्षःकृतमविज्ञाय शप्त्वैवं स गुरुस्ततः ॥ पुनर्विमृश्य तं शापं चकार द्वादशाब्दिकम्

rakṣaḥkṛtamavijñāya śaptvaivaṁ sa gurustataḥ punarvimṛśya taṁ śāpaṁ cakāra dvādaśābdikam

राक्षस के कृत्य को न जानते हुए, इस प्रकार शाप देकर गुरु ने पुनः विचार कर उस शाप को बारह वर्षों तक सीमित कर दिया।

श्लोक 33 (skanda.3.94.33)

राजापि कोपितः प्राह यदिदं मे न चेष्टितम् ॥ न ज्ञातं च वृथा शप्तो गुरुं चैव शपाम्यहम्

rājāpi kopitaḥ prāha yadidaṁ me na ceṣṭitam na jñātaṁ ca vṛthā śapto guruṁ caiva śapāmyaham

राजा भी कुपित होकर बोला — 'चूँकि यह मेरा किया हुआ नहीं है, और मुझे जानकारी भी नहीं थी, तथा मुझे व्यर्थ ही शाप दिया गया है, अतः मैं भी गुरु को शाप दूँगा!'

श्लोक 34 (skanda.3.94.34)

इत्यपोंजलिनादाय गुरुं शप्तुं समुद्यतः ॥ पतित्वा पादयोस्तस्य मदयन्ती न्यवारयत्

ityapoṁjalinādāya guruṁ śaptuṁ samudyataḥ patitvā pādayostasya madayantī nyavārayat

अंजलि में जल लेकर गुरु को शाप देने के लिए उद्यत होते ही, मदयंती उनके चरणों में गिरकर उन्हें रोकने लगी।

श्लोक 35 (skanda.3.94.35)

ततो निवृत्तः शापाच्च तस्या वचनगौरवात् ॥ तत्याज पादयोरंभः पादौ कल्मषतां गतौ

tato nivṛttaḥ śāpācca tasyā vacanagauravāt tatyāja pādayoraṁbhaḥ pādau kalmaṣatāṁ gatau

तब उसके वचनों के गौरव से शाप देने से निवृत्त होकर उसने वह जल अपने ही पैरों पर छोड़ दिया, जिससे उसके पैर कलुषित हो गए।

श्लोक 36 (skanda.3.94.36)

कल्मषांघ्रिरिति ख्यातस्ततः प्रभृति पार्थिवः ॥ बभूव गुरुशापेन राक्षसो वनगोचरः

kalmaṣāṁghririti khyātastataḥ prabhṛti pārthivaḥ babhūva guruśāpena rākṣaso vanagocaraḥ

तभी से वह राजा कल्माषपाद ('दागी-चरण') के नाम से विख्यात हुआ, और गुरु के शाप से वन में विचरने वाला राक्षस बन गया।

श्लोक 37 (skanda.3.94.37)

स बिभ्रद्राक्षसं रूपं घोरं कालां तकोपमम् ॥ चखाद विविधाञ्जंतून्मानुषादीन्वनेचरः

sa bibhradrākṣasaṁ rūpaṁ ghoraṁ kālāṁ takopamam cakhāda vividhāñjaṁtūnmānuṣādīnvanecaraḥ

मृत्यु के समान भयंकर वह राक्षस-रूप धारण करके, वन में विचरण करते हुए, मनुष्यों सहित विविध जीवों को खाने लगा।

श्लोक 38 (skanda.3.94.38)

स कदाचिद्वने क्वापि रममाणौ किशोरकौ ॥ अपश्यदंतकाकारो नवोढौ मुनिदंपती

sa kadācidvane kvāpi ramamāṇau kiśorakau apaśyadaṁtakākāro navoḍhau munidaṁpatī

एक बार वन में कहीं वह भयंकर, मृत्यु के समान रूप धारण किए उसने वहाँ क्रीड़ा करते हुए नवविवाहित युवा मुनि-दंपती को देखा।

श्लोक 39 (skanda.3.94.39)

राक्षसो मानुषाहारः किशोरमुनिनंदनम् ॥ जग्धुं जग्राह शापार्तो व्याघ्रो मृगशिशुं यथा

rākṣaso mānuṣāhāraḥ kiśoramuninaṁdanam jagdhuṁ jagrāha śāpārto vyāghro mṛgaśiśuṁ yathā

शापग्रस्त, मनुष्य-भक्षी वह राक्षस उस युवा मुनि-पुत्र को खाने के लिए वैसे पकड़ लिया जैसे बाघ मृगशिशु को पकड़ लेता है।

श्लोक 40 (skanda.3.94.40)

रक्षोगृहीतं भर्तारं दृष्ट्वा भीताथ तत्प्रिया ॥ उवाच करुणं बाला क्रंदंती भृशवेपिता

rakṣogṛhītaṁ bhartāraṁ dṛṣṭvā bhītātha tatpriyā uvāca karuṇaṁ bālā kraṁdaṁtī bhṛśavepitā

अपने पति को राक्षस द्वारा पकड़ा हुआ देखकर वह युवा पत्नी अत्यंत भयभीत और कांपती हुई करुण स्वर में रोते हुए बोली —

श्लोक 41 (skanda.3.94.41)

भोभो मामा कृथाः पापं सूर्यवंशयशोधर ॥ मदयंतीपतिस्त्वं हि राजेंद्रो न तु राक्षसः

bhobho māmā kṛthāḥ pāpaṁ sūryavaṁśayaśodhara madayaṁtīpatistvaṁ hi rājeṁdro na tu rākṣasaḥ

'हे हे! यह पाप मत कीजिए, हे सूर्यवंश के यश-धारक! आप तो मदयंती के पति, राजेन्द्र हैं, राक्षस नहीं!'

श्लोक 42 (skanda.3.94.42)

न खाद मम भर्त्तारं प्राणात्प्रियतमं प्रभो ॥ आर्त्तानां शरणार्त्तानां त्वमेव हि यतो गतिः

na khāda mama bharttāraṁ prāṇātpriyatamaṁ prabho ārttānāṁ śaraṇārttānāṁ tvameva hi yato gatiḥ

'मेरे प्राणों से भी प्रिय मेरे पति को मत खाइए, हे प्रभु! क्योंकि आप ही आर्तों और शरण चाहने वालों की एकमात्र गति हैं।'

श्लोक 43 (skanda.3.94.43)

पापानामिव संघातैः किं मे दुष्टैर्जडासुभिः ॥ देहेन चातिभारेण विना भर्त्रा महात्मना

pāpānāmiva saṁghātaiḥ kiṁ me duṣṭairjaḍāsubhiḥ dehena cātibhāreṇa vinā bhartrā mahātmanā

'मेरे इस पापों के समूह जैसे, दुष्ट, जड़ जीवन का और इस भारी शरीर का क्या प्रयोजन, अपने महात्मा पति के बिना?'

श्लोक 44 (skanda.3.94.44)

मलीमसेन पापेन पांचभौतेन किं सुखम् ॥ बालोयं वेदविच्छांतस्तपस्वी बहुशास्त्रवित्

malīmasena pāpena pāṁcabhautena kiṁ sukham bāloyaṁ vedavicchāṁtastapasvī bahuśāstravit

'इस मलिन, पापयुक्त पांचभौतिक शरीर में क्या सुख है? यह बालक तो वेदज्ञ, शांत, तपस्वी और बहुशास्त्रज्ञ है।'

श्लोक 45 (skanda.3.94.45)

अतोऽस्य प्राणदानेन जगद्रक्षा त्वया कृता। कृपां कुरु महाराज बालायां ब्राह्मणस्त्रियाम्

ato'sya prāṇadānena jagadrakṣā tvayā kṛtā kṛpāṁ kuru mahārāja bālāyāṁ brāhmaṇastriyām

'अतः इसे प्राण देकर आप सम्पूर्ण जगत् की रक्षा करेंगे; हे महाराज! इस बाल ब्राह्मणी पर कृपा कीजिए।'

श्लोक 46 (skanda.3.94.46)

अनाथकृपणार्तेषु सघृणाः खलु साधवः ॥ || इत्थमभ्यर्थितः सोऽपि पुरुषादः स निर्घृणः

anāthakṛpaṇārteṣu saghṛṇāḥ khalu sādhavaḥ || itthamabhyarthitaḥ so'pi puruṣādaḥ sa nirghṛṇaḥ

'अनाथों, दीनों और आर्तों पर सज्जन सदा दयालु होते हैं' — इस प्रकार प्रार्थना किए जाने पर भी वह नरभक्षी, निर्दयी राक्षस नहीं पिघला।

श्लोक 47 (skanda.3.94.47)

चखाद शिर उत्कृत्य विप्रपुत्रं दुराशयः॥ अथ साध्वी कृशा दीना विलप्य भृशदुःखिता

cakhāda śira utkṛtya vipraputraṁ durāśayaḥ atha sādhvī kṛśā dīnā vilapya bhṛśaduḥkhitā

उस दुष्ट-हृदय ने ब्राह्मण-पुत्र का सिर काटकर उसे खा लिया। तब वह सती, दुर्बल, दीन और अत्यंत दुःखी होकर विलाप करने लगी।

श्लोक 48 (skanda.3.94.48)

आहृत्य भर्तुरस्थीनि चितां चक्रे तथोल्बणाम् ॥ भर्तारमनुगच्छंती संविशंती हुताशनम्

āhṛtya bharturasthīni citāṁ cakre tatholbaṇām bhartāramanugacchaṁtī saṁviśaṁtī hutāśanam

अपने पति की अस्थियाँ एकत्र करके उसने एक विशाल चिता बनाई; अपने पति का अनुगमन करती हुई वह अग्नि में प्रविष्ट हो गई।

श्लोक 49 (skanda.3.94.49)

राजानं राक्षसाकारं शापास्त्रेण जघान तम् ॥ रेरे पार्थिव पापात्मंस्त्वया मे भक्षितः पतिः

rājānaṁ rākṣasākāraṁ śāpāstreṇa jaghāna tam rere pārthiva pāpātmaṁstvayā me bhakṣitaḥ patiḥ

उसने राक्षस-रूपी उस राजा को शाप-अस्त्र से आघात किया — 'रे रे पापात्मा राजा! तूने मेरे पति को खा लिया!'

श्लोक 50 (skanda.3.94.50)

अतः पतिव्रतायास्त्वं शापं भुंक्ष्व यथोल्बणम्॥ अद्यप्रभृति नारीषु यदा त्वमपि संगतः । तदा मृतिस्तवेत्युक्त्वा विवेश ज्वलनं सती

ataḥ pativratāyāstvaṁ śāpaṁ bhuṁkṣva yatholbaṇam adyaprabhṛti nārīṣu yadā tvamapi saṁgataḥ tadā mṛtistavetyuktvā viveśa jvalanaṁ satī

'अतः एक पतिव्रता के इस भीषण शाप को भोग — आज से जब भी तू किसी स्त्री से संगम करेगा, तभी तेरी मृत्यु होगी!' — ऐसा कहकर वह सती अग्नि में प्रविष्ट हो गई।

श्लोक 51 (skanda.3.94.51)

सोऽपि राजा गुरोः शापमुपभुज्य कृतावधिम् ॥ पुनः स्वरूपमादाय स्वगृहं मुदितो ययौ

so'pi rājā guroḥ śāpamupabhujya kṛtāvadhim punaḥ svarūpamādāya svagṛhaṁ mudito yayau

वह राजा भी गुरु के शाप को उसकी अवधि तक भोगकर, पुनः अपना स्वरूप पाकर प्रसन्नतापूर्वक अपने घर गया।

श्लोक 52 (skanda.3.94.52)

ज्ञात्वा विप्रसतीशापं तत्पत्नी रतिलालसम् ॥ पतिं निवारयामास वैधव्यातिबिभ्यती

jñātvā viprasatīśāpaṁ tatpatnī ratilālasam patiṁ nivārayāmāsa vaidhavyātibibhyatī

ब्राह्मणी के शाप को जानकर उसकी पत्नी, वैधव्य से अत्यंत भयभीत होकर, रति की इच्छा रखने वाले पति को रोकने लगी।

श्लोक 53 (skanda.3.94.53)

अनपत्यः स निर्विण्णो राज्यभोगेषु पार्थिवः ॥ विसृज्य सकलं लक्ष्मीं ययौ भूयोऽपि काननम्

anapatyaḥ sa nirviṇṇo rājyabhogeṣu pārthivaḥ visṛjya sakalaṁ lakṣmīṁ yayau bhūyo'pi kānanam

संतानहीन होकर, राज्य-भोग से विरक्त वह राजा समस्त वैभव त्यागकर पुनः वन की ओर चला गया।

श्लोक 54 (skanda.3.94.54)

सूर्यवंशप्रतिष्ठित्यै वशिष्ठो मुनिसत्तमः ॥ तस्यामुत्पादयामास मदयंत्यां सुतोत्तमम्

sūryavaṁśapratiṣṭhityai vaśiṣṭho munisattamaḥ tasyāmutpādayāmāsa madayaṁtyāṁ sutottamam

सूर्यवंश की प्रतिष्ठा के लिए मुनिश्रेष्ठ वशिष्ठ ने मदयंती में एक उत्तम पुत्र उत्पन्न किया।

श्लोक 55 (skanda.3.94.55)

विसृष्टराज्यो राजापि विचरन्सकलां महीम् ॥ आयांतीं पृष्ठतोऽपश्यत्पिशाचीं घोररूपिणीम्

visṛṣṭarājyo rājāpi vicaransakalāṁ mahīm āyāṁtīṁ pṛṣṭhato'paśyatpiśācīṁ ghorarūpiṇīm

राज्य त्याग चुके वह राजा सम्पूर्ण पृथ्वी पर विचरण करते हुए, अपने पीछे आती हुई एक भयंकर रूप वाली पिशाचिनी को देखने लगे।

श्लोक 56 (skanda.3.94.56)

सा हि मूर्तिमती घोरा ब्रह्महत्या दुरत्यया ॥ यदासौ शापविभ्रष्टो मुनिपुत्रमभक्षयत्

sā hi mūrtimatī ghorā brahmahatyā duratyayā yadāsau śāpavibhraṣṭo muniputramabhakṣayat

वह साक्षात् मूर्तिमती, भयंकर, दुस्तर ब्रह्महत्या ही थी, जो तब उत्पन्न हुई थी जब वह शापग्रस्त होकर मुनि-पुत्र को खा गया था।

श्लोक 57 (skanda.3.94.57)

तेनात्मकर्मणा. यांतीं ब्रह्महत्यां स पृष्ठतः ॥ बुबुधे मुनिवर्याणामुपदेशेन भूपतिः

tenātmakarmaṇā. yāṁtīṁ brahmahatyāṁ sa pṛṣṭhataḥ bubudhe munivaryāṇāmupadeśena bhūpatiḥ

अपने ही उस कर्म के कारण, महर्षियों के उपदेश से राजा ने समझ लिया कि यह पीछे आ रही ब्रह्महत्या ही है।

श्लोक 58 (skanda.3.94.58)

तस्या निर्वेशमन्विच्छन्राजा निर्विण्णमानसः ॥ नानाक्षेत्राणि तीर्थानि चचार बहुवत्सरम्

tasyā nirveśamanvicchanrājā nirviṇṇamānasaḥ nānākṣetrāṇi tīrthāni cacāra bahuvatsaram

उससे मुक्ति चाहते हुए, निराश मन वाला राजा अनेक वर्षों तक विविध क्षेत्रों और तीर्थों में भ्रमण करता रहा।

श्लोक 59 (skanda.3.94.59)

यदा सर्वेषु तीर्थेषु स्नात्वापि च मुहुर्मुहुः ॥ न निवृत्ता ब्रह्महत्या मिथिलामाययौ तदा ॥ बाह्योद्यानगतस्तस्याश्चिंतया परयार्दितः

yadā sarveṣu tīrtheṣu snātvāpi ca muhurmuhuḥ na nivṛttā brahmahatyā mithilāmāyayau tadā bāhyodyānagatastasyāściṁtayā parayārditaḥ

जब बार-बार समस्त तीर्थों में स्नान करने पर भी ब्रह्महत्या निवृत्त नहीं हुई, तब वह मिथिला आया; नगर के बाहरी उद्यान में जाकर, उसकी चिंता से अत्यंत पीड़ित होकर —

श्लोक 60 (skanda.3.94.60)

ददर्श मुनिमायांतं गौतमं विमलाशयम्॥ हुताशनमिवाशेषतपस्विजनसेवितम्

dadarśa munimāyāṁtaṁ gautamaṁ vimalāśayam hutāśanamivāśeṣatapasvijanasevitam

— उसने विमल हृदय वाले गौतम मुनि को आते देखा, जो समस्त तपस्वियों द्वारा हुताशन की भाँति सेवित थे।

श्लोक 61 (skanda.3.94.61)

विवस्वंतमिवात्यंतं घनदोषतमोनुदम् ॥ शशांकमिव निःशंकमवदातगुणोदयम्

vivasvaṁtamivātyaṁtaṁ ghanadoṣatamonudam śaśāṁkamiva niḥśaṁkamavadātaguṇodayam

वे मानो सूर्य के समान थे, दोषों के घोर अंधकार को दूर करने वाले; चंद्रमा के समान निःशंक, निर्मल गुणों के उदय-स्रोत थे।

श्लोक 62 (skanda.3.94.62)

महेश्वरमिव श्रीमद्द्विजराजकलाधरम् ॥ शांतं शिष्यगणोपेतं तपसामेकभाजनम्

maheśvaramiva śrīmaddvijarājakalādharam śāṁtaṁ śiṣyagaṇopetaṁ tapasāmekabhājanam

चंद्रकला धारण करने वाले महेश्वर के समान श्रीमान, शांत, शिष्य-समूह से घिरे, तपस्या के एकमात्र आधार।

श्लोक 63 (skanda.3.94.63)

उपसृत्य स राजेंद्रः प्रणनाम मुहुर्मुहुः ॥ गौतमोऽपि मुनिश्रेष्ठो राजानं रविवंशजम्

upasṛtya sa rājeṁdraḥ praṇanāma muhurmuhuḥ gautamo'pi muniśreṣṭho rājānaṁ ravivaṁśajam

उनके निकट जाकर वह राजेन्द्र बार-बार प्रणाम करने लगा; मुनिश्रेष्ठ गौतम ने भी सूर्यवंशी राजा का —

श्लोक 64 (skanda.3.94.64)

अभिनंद्य मुनिः प्रीत्या संस्मितं समभाषत

abhinaṁdya muniḥ prītyā saṁsmitaṁ samabhāṣata

— प्रेमपूर्वक अभिनंदन करते हुए, मुस्कराते हुए उससे बातचीत की।

श्लोक 65 (skanda.3.94.65)

॥ गौतम उवाच ॥ कच्चित्ते कुशलं राजन्कच्चित्ते पदमव्ययम्

gautama uvāca kaccitte kuśalaṁ rājankaccitte padamavyayam

गौतम ने कहा — 'हे राजन्! क्या तुम्हारा कुशल है? क्या तुम्हारा पद अविचल है?'

श्लोक 66 (skanda.3.94.66)

कुशलिन्यः प्रजाः कच्चिदवरोधजनोपि वा ॥ किमर्थमिह संप्राप्तो विसृज्य सकलां श्रियम्

kuśalinyaḥ prajāḥ kaccidavarodhajanopi vā kimarthamiha saṁprāpto visṛjya sakalāṁ śriyam

'क्या प्रजा कुशल है, अंतःपुर के लोग भी कुशल हैं? समस्त वैभव त्यागकर तुम यहाँ किसलिए आए हो?'

श्लोक 67 (skanda.3.94.67)

किं च ध्यायसि भो राजन्दीर्घमुष्णं च निःश्वसन्

kiṁ ca dhyāyasi bho rājandīrghamuṣṇaṁ ca niḥśvasan

'और हे राजन्! तुम इतना लंबा, गर्म निःश्वास लेते हुए किसका ध्यान कर रहे हो?'

श्लोक 68 (skanda.3.94.68)

राजोवाच ॥ सर्वे कुशलिनो ब्रह्मन्वयं त्वदनुकंपया॥ राज्ञामुत्तमवंश्यानां ब्रह्मायत्ता हि संपदः ॥ किं नु मां बाधते त्वेषा पिशाची घोररूपिणी

rājovāca sarve kuśalino brahmanvayaṁ tvadanukaṁpayā rājñāmuttamavaṁśyānāṁ brahmāyattā hi saṁpadaḥ kiṁ nu māṁ bādhate tveṣā piśācī ghorarūpiṇī

राजा ने कहा — 'हे ब्रह्मन्! आपकी कृपा से हम सब कुशल हैं; क्योंकि श्रेष्ठ वंश वाले राजाओं की संपत्ति ब्राह्मणों पर ही निर्भर है। परन्तु मुझे तो यह भयंकर रूप वाली पिशाचिनी सता रही है।'

श्लोक 69 (skanda.3.94.69)

अलक्षिता मदपरैर्भर्त्सयंती पदेपदे ॥ यन्मया शापदग्धेन कृतमहो दुरत्ययम् ॥ न शांतिर्जायते तस्य प्रायश्चित्तसहस्रकैः

alakṣitā madaparairbhartsayaṁtī padepade yanmayā śāpadagdhena kṛtamaho duratyayam na śāṁtirjāyate tasya prāyaścittasahasrakaiḥ

'औरों को न दिखते हुए भी वह पग-पग पर मुझे भर्त्सना करती है, क्योंकि मैंने शापग्रस्त होकर वह दुस्तर कर्म किया था; हजारों प्रायश्चित्तों से भी उसकी शांति नहीं होती।'

श्लोक 70 (skanda.3.94.70)

इष्टाश्च विविधा यज्ञाः कोशसर्वस्वदक्षिणाः ॥ सरित्सरांसि स्नातानि यानि पूज्यानि भूतले ॥ निषेवितानि सर्वाणि क्षेत्राणि भ्रमता मया

iṣṭāśca vividhā yajñāḥ kośasarvasvadakṣiṇāḥ saritsarāṁsi snātāni yāni pūjyāni bhūtale niṣevitāni sarvāṇi kṣetrāṇi bhramatā mayā

'मैंने अपने समस्त कोष को दक्षिणा में देकर विविध यज्ञ किए हैं; पृथ्वी पर जो भी पूज्य नदियाँ और सरोवर हैं, उन सबमें स्नान किया है; भ्रमण करते हुए मैंने समस्त क्षेत्रों का सेवन किया है।'

श्लोक 71 (skanda.3.94.71)

जप्तान्यखिलमंत्राणि ध्याताः सकलदेवताः ॥ महाव्रतानि चीर्णानि पर्णमूलफलाशिना

japtānyakhilamaṁtrāṇi dhyātāḥ sakaladevatāḥ mahāvratāni cīrṇāni parṇamūlaphalāśinā

'मैंने समस्त मंत्रों का जप किया है, सभी देवताओं का ध्यान किया है, और पत्ते-जड़-फल खाकर महाव्रतों का पालन किया है।'

श्लोक 72 (skanda.3.94.72)

तानि सर्वाणि कुर्वंति स्वस्थं मां न कदाचन ॥ अद्य मे जन्मसाफल्यं संप्राप्तमिव लक्ष्यते

tāni sarvāṇi kurvaṁti svasthaṁ māṁ na kadācana adya me janmasāphalyaṁ saṁprāptamiva lakṣyate

'ये सब मुझे कभी भी स्वस्थ नहीं करते। परन्तु आज मुझे लगता है मानो मेरे जन्म की सफलता प्राप्त हो गई है,

श्लोक 73 (skanda.3.94.73)

यतस्त्वद्दर्शनादेव ममात्मानंदभागभूत् ॥ अन्विच्छँल्लभते क्वापि वर्षपूगैर्मनोरथम्

yatastvaddarśanādeva mamātmānaṁdabhāgabhūt anviccham̐llabhate kvāpi varṣapūgairmanoratham

क्योंकि आपके दर्शन मात्र से ही मेरी आत्मा आनंद से भर गई है; इच्छा करने वाला कहीं-न-कहीं वर्षों के बाद अपना मनोरथ पा ही लेता है।'

श्लोक 74 (skanda.3.94.74)

इत्येवं जनवादोऽपि संप्राप्तो मयि सत्यताम् ॥ आजन्मसंचितानां तु पुण्यानामुदयोदये

ityevaṁ janavādo'pi saṁprāpto mayi satyatām ājanmasaṁcitānāṁ tu puṇyānāmudayodaye

'इस प्रकार यह लोकोक्ति भी मेरे लिए सत्य सिद्ध हुई है; क्योंकि जन्म से संचित पुण्यों के उदय होने पर —

श्लोक 75 (skanda.3.94.75)

यद्भवान्भवभीतानां त्राता नयनगोचरः ॥ कस्माद्देशादिहायातो भवान्भवभयापहः

yadbhavānbhavabhītānāṁ trātā nayanagocaraḥ kasmāddeśādihāyāto bhavānbhavabhayāpahaḥ

— आप, संसार से भयभीतों के त्राता, उनकी दृष्टि के सम्मुख आ जाते हैं। हे संसार-भय-हारी! आप किस देश से यहाँ पधारे हैं?'

श्लोक 76 (skanda.3.94.76)

दूरभ्रमणविश्रांतं शंके त्वामिह चागतम् ॥ दृष्ट्वाश्चर्यमिवात्यर्थं मुदितोसि मुखश्रिया

dūrabhramaṇaviśrāṁtaṁ śaṁke tvāmiha cāgatam dṛṣṭvāścaryamivātyarthaṁ muditosi mukhaśriyā

'मुझे लगता है आप कहीं दूर की यात्रा से विश्राम हेतु यहाँ आए हैं; फिर भी मानो कोई आश्चर्य देखकर आप मुखश्री से अत्यंत प्रसन्न प्रतीत होते हैं।'

श्लोक 77 (skanda.3.94.77)

आनंदयसि मे चेतः प्रेम्णा संभाषणादिव ॥ अद्य मे तव पादाब्जशरणस्य कृतैनसः ॥ शांतिं कुरु महाभाग येनाहं सुखमाप्नुयाम्

ānaṁdayasi me cetaḥ premṇā saṁbhāṣaṇādiva adya me tava pādābjaśaraṇasya kṛtainasaḥ śāṁtiṁ kuru mahābhāga yenāhaṁ sukhamāpnuyām

'आप प्रेमपूर्ण वार्तालाप से मानो मेरे चित्त को आनंदित कर रहे हैं। हे महाभाग! आज आपके चरण-कमलों की शरण में आए, पापी मुझको शांति प्रदान कीजिए, जिससे मुझे सुख प्राप्त हो।'

श्लोक 78 (skanda.3.94.78)

इति तेन समादिष्टो गौतमः करुणानिधिः ॥ समादिदेश घोराणामघानां साधु निष्कृतिम्

iti tena samādiṣṭo gautamaḥ karuṇānidhiḥ samādideśa ghorāṇāmaghānāṁ sādhu niṣkṛtim

इस प्रकार उससे प्रार्थित होकर करुणानिधि गौतम ने उसके भयंकर पापों का उचित प्रायश्चित बताया।

श्लोक 79 (skanda.3.94.79)

गौतम उवाच ॥ साधु राजेंद्र धन्योऽसि महा घेभ्यो भयं त्यज

gautama uvāca sādhu rājeṁdra dhanyo'si mahā ghebhyo bhayaṁ tyaja

गौतम ने कहा — 'साधु, हे राजेन्द्र! तुम धन्य हो, इन महान पापों से उत्पन्न भय को त्याग दो।'

श्लोक 80 (skanda.3.94.80)

शिवे त्रातरि भक्तानां क्व भयं शरणैषिणाम् ॥ शृणु राजन्महाभाग क्षेत्रमन्यत्प्रतिष्ठितम्

śive trātari bhaktānāṁ kva bhayaṁ śaraṇaiṣiṇām śṛṇu rājanmahābhāga kṣetramanyatpratiṣṭhitam

'जब शिव ही भक्तों के रक्षक हैं, तो शरण चाहने वालों को कैसा भय? हे महाभाग राजन्! सुनो, एक अन्य प्रतिष्ठित क्षेत्र के विषय में।'

श्लोक 81 (skanda.3.94.81)

महापातकसंहारि गोकर्णाख्यं मनोरमम्॥ यत्र स्थितिर्न पापानां महद्भ्यो महतामपि

mahāpātakasaṁhāri gokarṇākhyaṁ manoramam yatra sthitirna pāpānāṁ mahadbhyo mahatāmapi

'महापातकों का संहार करने वाला, मनोहर गोकर्ण नामक क्षेत्र है, जहाँ बड़े-से-बड़े पाप भी टिक नहीं सकते।'

श्लोक 82 (skanda.3.94.82)

स्मृतो ह्यशेषपापघ्नो यत्र संनिहितः शिवः ॥ यथा कैलासशिखरे यथा मंदारमूर्द्धनि

smṛto hyaśeṣapāpaghno yatra saṁnihitaḥ śivaḥ yathā kailāsaśikhare yathā maṁdāramūrddhani

'वहाँ शिव स्वयं संनिहित हैं, इसलिए मात्र स्मरण करने से ही यह समस्त पापों का नाश करता है — जैसे कैलास शिखर पर, जैसे मंदाराचल के शीर्ष पर।'

श्लोक 83 (skanda.3.94.83)

निवासो निश्चितः शंभोस्तथा गोकर्णमण्डले ॥ नाग्निना न शशांकेन न ताराग्रहनायकैः

nivāso niścitaḥ śaṁbhostathā gokarṇamaṇḍale nāgninā na śaśāṁkena na tārāgrahanāyakaiḥ

'वैसे ही शंभु का निवास गोकर्ण-मंडल में निश्चित है। न अग्नि से, न चंद्रमा से, न तारा-ग्रहों के स्वामियों से —

श्लोक 84 (skanda.3.94.84)

तमो निस्तीर्यते सम्य ग्यथा सवितृदर्शनात् ॥ तथैव नेतरैस्तीर्थैर्न च क्षेत्रैर्मनोरमैः

tamo nistīryate samya gyathā savitṛdarśanāt tathaiva netaraistīrthairna ca kṣetrairmanoramaiḥ

— जितना पूर्ण रूप से सूर्य-दर्शन से अंधकार दूर होता है, उतना ही अन्य किसी तीर्थ या मनोहर क्षेत्र से नहीं होता।'

श्लोक 85 (skanda.3.94.85)

सद्यः पापविशुद्धिः स्याद्यथा गोकर्णदर्शनात् ॥ अपि पापशतं कृत्वा ब्रह्म हत्यादि मानवः

sadyaḥ pāpaviśuddhiḥ syādyathā gokarṇadarśanāt api pāpaśataṁ kṛtvā brahma hatyādi mānavaḥ

'गोकर्ण-दर्शन से जैसी तत्काल पाप-शुद्धि होती है, वैसी अन्यत्र नहीं। ब्रह्महत्या आदि सैकड़ों पाप करने वाला मनुष्य भी —

श्लोक 86 (skanda.3.94.86)

सकृत्प्रविश्य गोकर्णं न बिभेति ह्यघात्क्वचित् ॥ तत्र सर्वे महात्मानस्तपसा शांतिमागताः

sakṛtpraviśya gokarṇaṁ na bibheti hyaghātkvacit tatra sarve mahātmānastapasā śāṁtimāgatāḥ

— एक बार गोकर्ण में प्रवेश कर लेने पर किसी पाप से नहीं डरता। वहाँ समस्त महात्मा तपस्या से शांति को प्राप्त हुए हैं।'

श्लोक 87 (skanda.3.94.87)

इन्द्रोपेंद्रविरिंच्याद्यैः सेव्यते सिद्धिकांक्षिभिः ॥ तत्रैकेन दिनेनापि यत्कृतं व्रतमुत्तमम्

indropeṁdraviriṁcyādyaiḥ sevyate siddhikāṁkṣibhiḥ tatraikena dinenāpi yatkṛtaṁ vratamuttamam

'यह इंद्र, विष्णु, ब्रह्मा आदि सिद्धि-कामनाशीलों द्वारा सेवित है। वहाँ एक ही दिन किया गया उत्तम व्रत —

श्लोक 88 (skanda.3.94.88)

तदन्यत्राब्दलक्षेण कृतं भवति तत्समम् ॥ यत्रेंद्रब्रह्मविष्ण्वादिदेवानां हितकाम्यया

tadanyatrābdalakṣeṇa kṛtaṁ bhavati tatsamam yatreṁdrabrahmaviṣṇvādidevānāṁ hitakāmyayā

— अन्यत्र लाख वर्षों तक किए गए व्रत के समान फल देता है। जहाँ इंद्र, ब्रह्मा, विष्णु आदि देवताओं के हित की कामना से —

श्लोक 89 (skanda.3.94.89)

महाबलाभिधानेन देवः संनिहितः स्वयम् ॥ घोरेण तपसा लब्धं रावणाख्येन रक्षसा

mahābalābhidhānena devaḥ saṁnihitaḥ svayam ghoreṇa tapasā labdhaṁ rāvaṇākhyena rakṣasā

— महाबल नामक देव स्वयं संनिहित हैं। वह लिंग, जो रावण नामक राक्षस ने घोर तप से प्राप्त किया था —

श्लोक 90 (skanda.3.94.90)

तल्लिंगं स्थापयामास गोकर्णे गणनायकः ॥ इन्द्रो ब्रह्मा मुकुन्दश्च विश्वेदेवा मरुद्गणाः

talliṁgaṁ sthāpayāmāsa gokarṇe gaṇanāyakaḥ indro brahmā mukundaśca viśvedevā marudgaṇāḥ

— उसे गणनायक (गणेश) ने गोकर्ण में स्थापित किया। इंद्र, ब्रह्मा, विष्णु, विश्वेदेव, मरुद्गण —

श्लोक 91 (skanda.3.94.91)

आदित्या वसवो दस्रौ शशांकश्च दिवाकरः ॥ एते विमानगतयो देवास्ते सह पार्षदैः

ādityā vasavo dasrau śaśāṁkaśca divākaraḥ ete vimānagatayo devāste saha pārṣadaiḥ

— आदित्यगण, वसुगण, दोनों अश्विनीकुमार, चंद्रमा और सूर्य — ये सभी देवता विमानों में आरूढ़ होकर, अपने पार्षदों सहित —

श्लोक 92 (skanda.3.94.92)

पूर्वद्वारं निषेवन्ते देवदेवस्य शूलिनः ॥ योन्यो मृत्युः स्वयं साक्षाच्चित्रगुप्तश्च पावकः

pūrvadvāraṁ niṣevante devadevasya śūlinaḥ yonyo mṛtyuḥ svayaṁ sākṣāccitraguptaśca pāvakaḥ

— देवाधिदेव शूलपाणि के पूर्वी द्वार की सेवा करते हैं। अन्य — साक्षात् स्वयं मृत्यु, चित्रगुप्त और अग्नि —

श्लोक 93 (skanda.3.94.93)

पितृभिः सह रुद्रैश्च दक्षिणद्वारमाश्रितः ॥ वरुणः सरितां नाथो गंगादिसरितां गणैः

pitṛbhiḥ saha rudraiśca dakṣiṇadvāramāśritaḥ varuṇaḥ saritāṁ nātho gaṁgādisaritāṁ gaṇaiḥ

— पितरों और रुद्रों सहित दक्षिणी द्वार का आश्रय लेते हैं। नदियों के स्वामी वरुण, गंगा आदि नदी-समूहों सहित —

श्लोक 94 (skanda.3.94.94)

आसेवते महादेवं पश्चिमद्वारमाश्रितः ॥ तथा वायुः कुबेरश्च देवेशी भद्रकर्णिका

āsevate mahādevaṁ paścimadvāramāśritaḥ tathā vāyuḥ kuberaśca deveśī bhadrakarṇikā

— पश्चिमी द्वार में स्थित होकर महादेव की सेवा करते हैं; इसी प्रकार वायु, कुबेर और देवी भद्रकर्णिका —

श्लोक 95 (skanda.3.94.95)

मातृभिश्चंडिकाद्याभिरुत्तरद्वारमाश्रिता ॥ विश्वावसुश्चित्ररथश्चित्रसेनो महाबलः

mātṛbhiścaṁḍikādyābhiruttaradvāramāśritā viśvāvasuścitrarathaścitraseno mahābalaḥ

— चंडिका आदि मातृकाओं सहित उत्तरी द्वार में स्थित हैं। विश्वावसु, चित्ररथ और महाबली चित्रसेन —

श्लोक 96 (skanda.3.94.96)

सह गन्धर्ववर्गैश्च पूजयंति महाबलम् ॥ रंभा घृताची मेना च पूर्वचित्तिस्तिलोत्तमा

saha gandharvavargaiśca pūjayaṁti mahābalam raṁbhā ghṛtācī menā ca pūrvacittistilottamā

— गंधर्व-गणों सहित महाबल की पूजा करते हैं; रंभा, घृताची, मेना, पूर्वचित्ति और तिलोत्तमा —

श्लोक 97 (skanda.3.94.97)

नृत्यंति पुरतः शम्भोरुर्वश्याद्याः सुरस्त्रियः ॥ वशिष्ठः कश्यपः कण्वो विश्वामित्रो महा तपाः

nṛtyaṁti purataḥ śambhorurvaśyādyāḥ surastriyaḥ vaśiṣṭhaḥ kaśyapaḥ kaṇvo viśvāmitro mahā tapāḥ

— उर्वशी आदि देवांगनाओं सहित शंभु के सम्मुख नृत्य करती हैं। वशिष्ठ, कश्यप, कण्व, महातपस्वी विश्वामित्र —

श्लोक 98 (skanda.3.94.98)

जैमिनिश्च भरद्वाजो जाबालिः क्रतुरंगिराः ॥ एते वयं च राजेंद्र सर्वे ब्रह्मर्षयोऽमलाः

jaiminiśca bharadvājo jābāliḥ kraturaṁgirāḥ ete vayaṁ ca rājeṁdra sarve brahmarṣayo'malāḥ

— जैमिनि, भरद्वाज, जाबालि, क्रतु, अंगिरा — ये सब, हे राजेन्द्र, और हम सब भी, समस्त निर्मल ब्रह्मर्षि —

श्लोक 99 (skanda.3.94.99)

देवं महाबलं भक्त्या समंतात्पर्यु पास्महे ॥ मरीचिना सहात्रिश्च दक्षाद्याश्च मुनीश्वराः

devaṁ mahābalaṁ bhaktyā samaṁtātparyu pāsmahe marīcinā sahātriśca dakṣādyāśca munīśvarāḥ

— भक्तिपूर्वक चारों ओर से महाबल देव की उपासना करते हैं। मरीचि सहित अत्रि, तथा दक्ष आदि मुनीश्वर —

श्लोक 100 (skanda.3.94.100)

सनकाद्या महात्मान उपविष्टा उपासते ॥ तथैव मुनयः साध्या अजिनांबर धारिणः

sanakādyā mahātmāna upaviṣṭā upāsate tathaiva munayaḥ sādhyā ajināṁbara dhāriṇaḥ

— और सनकादि महात्मा बैठकर उनकी उपासना करते हैं; इसी प्रकार मुनि, साध्यगण, मृगचर्म-वस्त्रधारी —

श्लोक 101 (skanda.3.94.101)

दंडिनो व्रतमुण्डाश्च स्नातका ब्रह्मचारिणः ॥ त्वगस्थिमात्रावयवास्तपसा दग्धकिल्बिषाः

daṁḍino vratamuṇḍāśca snātakā brahmacāriṇaḥ tvagasthimātrāvayavāstapasā dagdhakilbiṣāḥ

— दंडधारी, व्रत से मुंडित, स्नातक, ब्रह्मचारी, जिनके अंग केवल त्वचा और हड्डी मात्र रह गए हैं, जिनके पाप तप से जलकर नष्ट हो गए हैं —

श्लोक 102 (skanda.3.94.102)

सेवन्ते परया भक्त्या देवदेवं पिनाकिनम् ॥ तथा देवाः सगन्धर्वाः पितरः सिद्धचारणाः

sevante parayā bhaktyā devadevaṁ pinākinam tathā devāḥ sagandharvāḥ pitaraḥ siddhacāraṇāḥ

— वे परम भक्ति से पिनाकधारी देवाधिदेव की सेवा करते हैं; उसी प्रकार गंधर्वों सहित देवगण, पितर, सिद्ध-चारण —

श्लोक 103 (skanda.3.94.103)

विद्याधराः किंपुरुषाः किन्नरा गुह्यकाः खगाः ॥ नागाः पिशाचा वेताला दैतेयाश्च महाबलाः

vidyādharāḥ kiṁpuruṣāḥ kinnarā guhyakāḥ khagāḥ nāgāḥ piśācā vetālā daiteyāśca mahābalāḥ

— विद्याधर, किन्नर, किंपुरुष, गुह्यक, पक्षी, नाग, पिशाच, वेताल और महाबली दैत्य —

श्लोक 104 (skanda.3.94.104)

नानाविभवसंपन्ना नानाभूषणवाहनाः ॥ विमानैः सूर्यसंकाशैरग्निवर्णैः शशिप्रभैः

nānāvibhavasaṁpannā nānābhūṣaṇavāhanāḥ vimānaiḥ sūryasaṁkāśairagnivarṇaiḥ śaśiprabhaiḥ

— विविध वैभव, विविध आभूषण-वाहनों से युक्त होकर, सूर्य-सदृश, अग्नि-वर्ण, चंद्र-प्रभा वाले विमानों में —

श्लोक 105 (skanda.3.94.105)

विद्युत्पुंजनिभैरन्यैः समं तात्परिवारितम् ॥ प्रस्तुवंति प्रगायंति पठंति प्रणमंति च

vidyutpuṁjanibhairanyaiḥ samaṁ tātparivāritam prastuvaṁti pragāyaṁti paṭhaṁti praṇamaṁti ca

— और बिजली के समूह जैसे अन्य विमानों में, चारों ओर से घिरे हुए, उनकी स्तुति करते हैं, गान करते हैं, पाठ करते हैं, प्रणाम करते हैं।

श्लोक 106 (skanda.3.94.106)

प्रनृत्यंति प्रहृष्यंति गोकर्णे पृथिवीपते ॥ लभंतेऽभीप्सितान्कामान्रमंते च यथा सुखम्

pranṛtyaṁti prahṛṣyaṁti gokarṇe pṛthivīpate labhaṁte'bhīpsitānkāmānramaṁte ca yathā sukham

— वे नृत्य करते हैं, प्रसन्न होते हैं, हे पृथ्वीपते! गोकर्ण में वे अपनी इच्छित कामनाएँ पाते हैं और यथेच्छ रमण करते हैं।'

श्लोक 107 (skanda.3.94.107)

गोकर्णसदृशं क्षेत्रं नास्ति ब्रह्मांडगोलके ॥ तत्र घोरं तपस्तप्तमगस्त्येन महात्मना

gokarṇasadṛśaṁ kṣetraṁ nāsti brahmāṁḍagolake tatra ghoraṁ tapastaptamagastyena mahātmanā

'ब्रह्मांड-गोलक में गोकर्ण के समान कोई क्षेत्र नहीं है। वहाँ महात्मा अगस्त्य ने घोर तप किया,

श्लोक 108 (skanda.3.94.108)

तथा सनत्कुमारेण प्रियव्रतसुतैरपि ॥ अग्निना देववर्येण कन्दर्पेण च पार्थिव

tathā sanatkumāreṇa priyavratasutairapi agninā devavaryeṇa kandarpeṇa ca pārthiva

वैसे ही सनत्कुमार ने, प्रियव्रत के पुत्रों ने, देवश्रेष्ठ अग्नि ने और कंदर्प (कामदेव) ने भी, हे राजन्,

श्लोक 109 (skanda.3.94.109)

तथा देव्या भद्रकाल्या शिशुमारेण धीमता ॥ दुर्मुखेन फणींद्रेण मणिनागाह्वयेन च

tathā devyā bhadrakālyā śiśumāreṇa dhīmatā durmukhena phaṇīṁdreṇa maṇināgāhvayena ca

वैसे ही देवी भद्रकाली ने, बुद्धिमान शिशुमार ने, नागराज दुर्मुख ने और मणिनाग नामक ने —

श्लोक 110 (skanda.3.94.110)

इलावर्तादिभिर्नागैर्गरुडेन बलीयसा ॥ रक्षसा रावणेनापि कुम्भकर्णाह्वयेन तु

ilāvartādibhirnāgairgaruḍena balīyasā rakṣasā rāvaṇenāpi kumbhakarṇāhvayena tu

इलावर्त आदि नागों ने, बलशाली गरुड़ ने, राक्षस रावण ने स्वयं, और कुम्भकर्ण नामक ने भी —

श्लोक 111 (skanda.3.94.111)

विभीषणेन पुण्येन तपस्तप्तं महात्मना ॥ एते चान्ये च गीर्वाणाः सिद्धदानवमानवाः

vibhīṣaṇena puṇyena tapastaptaṁ mahātmanā ete cānye ca gīrvāṇāḥ siddhadānavamānavāḥ

पुण्यात्मा महात्मा विभीषण ने तप किया। ये और अन्य देवगण, सिद्ध, दानव, मानव —

श्लोक 112 (skanda.3.94.112)

गोकर्णे देवदेवेशं शिवमाराध्य भक्तितः ॥ स्वनामांकानि लिंगानि स्थापयित्वा सहस्रशः

gokarṇe devadeveśaṁ śivamārādhya bhaktitaḥ svanāmāṁkāni liṁgāni sthāpayitvā sahasraśaḥ

गोकर्ण में देवाधिदेव शिव की भक्तिपूर्वक आराधना करके, हजारों की संख्या में अपने नामांकित लिंग स्थापित कर —

श्लोक 113 (skanda.3.94.113)

लेभिरे परमां सिद्धिं तथा तीर्थानि चक्रिरे ॥ अत्र स्थानानि सर्वेषां देवानां संति पार्थिव

lebhire paramāṁ siddhiṁ tathā tīrthāni cakrire atra sthānāni sarveṣāṁ devānāṁ saṁti pārthiva

परम सिद्धि को प्राप्त हुए और तीर्थ भी बनाए। यहाँ, हे राजन्, समस्त देवताओं के स्थान विद्यमान हैं —

श्लोक 114 (skanda.3.94.114)

विष्णोश्च देवदेवस्य ब्रह्मणः परमेष्ठिनः ॥ कार्त्तिकेयस्य वीरस्य गजवक्त्रस्य चानघ

viṣṇośca devadevasya brahmaṇaḥ parameṣṭhinaḥ kārttikeyasya vīrasya gajavaktrasya cānagha

— देवाधिदेव विष्णु के, परमेष्ठी ब्रह्मा के, वीर कार्तिकेय के, और हे निष्पाप! गजमुख गणेश के भी,

श्लोक 115 (skanda.3.94.115)

धर्मस्य क्षेत्रपालस्य दुर्गायाश्च महामते ॥ गोकर्णे शिवलिंगानि विद्यंते कोटिकोटिशः

dharmasya kṣetrapālasya durgāyāśca mahāmate gokarṇe śivaliṁgāni vidyaṁte koṭikoṭiśaḥ

धर्म के, क्षेत्रपाल के और हे महामते! दुर्गा के भी। गोकर्ण में शिवलिंग करोड़ों-करोड़ों की संख्या में विद्यमान हैं।'

श्लोक 116 (skanda.3.94.116)

असंख्यातानि तीर्थानि तिष्ठंति च पदेपदे ॥ बहुनात्र किमुक्तेन गोकर्णस्थानि पार्थिव

asaṁkhyātāni tīrthāni tiṣṭhaṁti ca padepade bahunātra kimuktena gokarṇasthāni pārthiva

'असंख्य तीर्थ पग-पग पर स्थित हैं। इस विषय में अधिक कहने से क्या लाभ, हे राजन् — गोकर्ण में सब कुछ विद्यमान है।'

श्लोक 117 (skanda.3.94.117)

सर्वाण्यश्मानि लिंगानि तीर्थान्यंभांसि सर्वशः ॥ गोकर्णे शिवलिंगानां तीर्थानामपि भूरिशः

sarvāṇyaśmāni liṁgāni tīrthānyaṁbhāṁsi sarvaśaḥ gokarṇe śivaliṁgānāṁ tīrthānāmapi bhūriśaḥ

'वहाँ सभी पत्थर लिंग हैं, सभी जल तीर्थ हैं, सर्वथा। गोकर्ण में शिवलिंग और तीर्थ दोनों ही अत्यंत प्रचुर हैं।'

श्लोक 118 (skanda.3.94.118)

गीयते महिमा राजन्पुराणेषु महर्षिभिः ॥ गोकर्णे कोटितीर्थं च तीर्थानां मुख्यतां गतम्

gīyate mahimā rājanpurāṇeṣu maharṣibhiḥ gokarṇe koṭitīrthaṁ ca tīrthānāṁ mukhyatāṁ gatam

'हे राजन्! इसकी महिमा महर्षियों द्वारा पुराणों में गाई गई है। गोकर्ण में कोटितीर्थ ने समस्त तीर्थों में मुख्यता प्राप्त की है।'

श्लोक 119 (skanda.3.94.119)

सर्वेषां शिवलिंगानां सार्वभौमो महाबलः ॥ कृते महाबलः श्वेतस्त्रेतायामतिलोहितः

sarveṣāṁ śivaliṁgānāṁ sārvabhaumo mahābalaḥ kṛte mahābalaḥ śvetastretāyāmatilohitaḥ

'समस्त शिवलिंगों में महाबल सार्वभौम (सम्राट) हैं। कृतयुग में महाबल श्वेत वर्ण के थे, त्रेतायुग में अत्यंत लाल,

श्लोक 120 (skanda.3.94.120)

द्वापरे पीत वर्णश्च कलौ श्यामो भविष्यति ॥ आक्रांतं सप्तपातालं कुर्वन्नपि महाबलः

dvāpare pīta varṇaśca kalau śyāmo bhaviṣyati ākrāṁtaṁ saptapātālaṁ kurvannapi mahābalaḥ

द्वापर में पीत वर्ण, और कलियुग में श्याम हो जाएँगे। सातों पातालों को व्याप्त करते हुए भी महाबल,

श्लोक 121 (skanda.3.94.121)

प्राप्ते कलियुगे घोरे मृदुतामुपयास्यति ॥ पश्चिमांबुधितीरस्थं गोकर्णक्षेत्रमुत्तमम्

prāpte kaliyuge ghore mṛdutāmupayāsyati paścimāṁbudhitīrasthaṁ gokarṇakṣetramuttamam

घोर कलियुग आने पर कोमलता को प्राप्त होंगे। पश्चिमी समुद्र के तट पर स्थित यह उत्तम गोकर्ण क्षेत्र —

श्लोक 122 (skanda.3.94.122)

ब्रह्महत्यादिपापानि दहतीति किमद्भुतम् ॥ ये चात्र ब्रह्महंतारो ये च भूतद्रुहः शठाः

brahmahatyādipāpāni dahatīti kimadbhutam ye cātra brahmahaṁtāro ye ca bhūtadruhaḥ śaṭhāḥ

ब्रह्महत्या आदि पापों को जला देता है — इसमें आश्चर्य ही क्या है? यहाँ जो ब्रह्महत्यारे हैं, जो प्राणि-द्रोही दुष्ट हैं,

श्लोक 123 (skanda.3.94.123)

ये सर्वगुणहीनाश्च परदाररताश्च ये ॥ ये दुर्वृत्ता दुराचारा दुःशीलाः कृपणाश्च ये

ye sarvaguṇahīnāśca paradāraratāśca ye ye durvṛttā durācārā duḥśīlāḥ kṛpaṇāśca ye

जो समस्त गुणों से रहित हैं, जो परस्त्रीरत हैं, जो दुर्वृत्त, दुराचारी, दुःशील और कृपण हैं,

श्लोक 124 (skanda.3.94.124)

लुब्धाः क्रूराः खला मूढाः स्ते नाश्चैवातिकामिनः ॥ ते सर्वे प्राप्य गोकर्णं स्नात्वा तीर्थजलेषु च

lubdhāḥ krūrāḥ khalā mūḍhāḥ ste nāścaivātikāminaḥ te sarve prāpya gokarṇaṁ snātvā tīrthajaleṣu ca

जो लोभी, क्रूर, दुष्ट, मूर्ख, चोर और अत्यंत कामी हैं — वे सब गोकर्ण पहुँचकर, तीर्थ-जलों में स्नान करके —

श्लोक 125 (skanda.3.94.125)

देवं महाबलं दृष्ट्वा प्रयाताः शांकरं पदम् ॥ तत्र पुण्यासु तिथिषु पुण्य र्क्षे पुण्यवासरे

devaṁ mahābalaṁ dṛṣṭvā prayātāḥ śāṁkaraṁ padam tatra puṇyāsu tithiṣu puṇya rkṣe puṇyavāsare

और महाबल देव का दर्शन करके शांकर पद को प्राप्त हुए हैं। वहाँ पुण्य तिथियों में, पुण्य नक्षत्र में, पुण्य वार में —

श्लोक 126 (skanda.3.94.126)

येऽर्चयंति महेशानं ते रुद्राः स्युर्न संशयः ॥ यदा कदाचिद्गोकर्णं यो वा को वापि मानवः

ye'rcayaṁti maheśānaṁ te rudrāḥ syurna saṁśayaḥ yadā kadācidgokarṇaṁ yo vā ko vāpi mānavaḥ

जो महेशान की अर्चना करते हैं, वे निःसंदेह रुद्र हो जाते हैं। जब कभी भी, जो भी मनुष्य गोकर्ण जाकर —

श्लोक 127 (skanda.3.94.127)

प्रविश्य पूजयेदीशं स गच्छेद्ब्रह्मणः पदम् ॥ रवींदुसौम्यवारेषु यदा दर्शो भविष्यति

praviśya pūjayedīśaṁ sa gacchedbrahmaṇaḥ padam ravīṁdusaumyavāreṣu yadā darśo bhaviṣyati

प्रविष्ट होकर ईश की पूजा करता है, वह ब्रह्मा के पद को प्राप्त होता है। रवि, सोम अथवा बुध वार में जब अमावस्या हो,

श्लोक 128 (skanda.3.94.128)

तदा जलनिधौ स्नानं दानं च पितृतर्पणम् ॥ शिवपूजा जपो होमो व्रतचर्या द्विजार्चनम्

tadā jalanidhau snānaṁ dānaṁ ca pitṛtarpaṇam śivapūjā japo homo vratacaryā dvijārcanam

तब समुद्र में स्नान, दान, पितृ-तर्पण, शिव-पूजा, जप, होम, व्रत-चर्या और ब्राह्मण-अर्चना —

श्लोक 129 (skanda.3.94.129)

यत्किंचिद्वा कृतं कर्म तदनंतफलप्रदम् ॥ व्यतीपातादियोगेषु रविसंक्रमणेषु च

yatkiṁcidvā kṛtaṁ karma tadanaṁtaphalapradam vyatīpātādiyogeṣu ravisaṁkramaṇeṣu ca

जो भी कर्म किया जाए, वह अनंत फल देने वाला होता है। व्यतीपात आदि योगों में, सूर्य-संक्रमणों में,

श्लोक 130 (skanda.3.94.130)

महाप्रदोषवेलासु शिव पूजा विमुक्तिदा ॥ अथैकां ते प्रवक्ष्यामि तिथिं पार्थिव मुक्तिदाम्

mahāpradoṣavelāsu śiva pūjā vimuktidā athaikāṁ te pravakṣyāmi tithiṁ pārthiva muktidām

और महाप्रदोष की वेला में शिव-पूजा मुक्तिदायिनी है। अब, हे राजन्, मैं तुम्हें एक ऐसी मुक्तिदायिनी तिथि बताऊँगा —

श्लोक 131 (skanda.3.94.131)

यस्यां किल महाव्याधो लेभे शंभोः परं पदम् ॥ माघमासे महापुण्या या सा कृष्णचतुर्दशी

yasyāṁ kila mahāvyādho lebhe śaṁbhoḥ paraṁ padam māghamāse mahāpuṇyā yā sā kṛṣṇacaturdaśī

— जिसमें एक महाव्याध ने शंभु के परम पद को प्राप्त किया था — वह अत्यंत पुण्यमयी माघ मास की कृष्ण चतुर्दशी।'

श्लोक 132 (skanda.3.94.132)

शिवलिंगं बिल्वपत्रं दुर्लभं हि चतुष्टयम् ॥ अहो बलवती माया यया शैवी महातिथिः

śivaliṁgaṁ bilvapatraṁ durlabhaṁ hi catuṣṭayam aho balavatī māyā yayā śaivī mahātithiḥ

'शिवलिंग, बिल्वपत्र — यह चार वस्तुओं का संयोग ही दुर्लभ है। अहो, माया कितनी बलवती है, जिससे यह महान शैव तिथि,

श्लोक 133 (skanda.3.94.133)

नोपोष्यते जनैर्मूढैर्महामूकैरिव त्रयी ॥ उपवासो जागरणं सन्निधिः परमेशितुः

nopoṣyate janairmūḍhairmahāmūkairiva trayī upavāso jāgaraṇaṁ sannidhiḥ parameśituḥ

मूर्ख लोगों द्वारा उपवास से नहीं मनाई जाती, मानो वेदत्रयी ही मूक हो गई हो! उपवास, जागरण और परमेश्वर का सान्निध्य —

श्लोक 134 (skanda.3.94.134)

गोकर्णं शिवलोकस्य नृणां सोपानपद्धतिः ॥ शृणु राजन्नहमपि गोकर्णा दधुनागतः

gokarṇaṁ śivalokasya nṛṇāṁ sopānapaddhatiḥ śṛṇu rājannahamapi gokarṇā dadhunāgataḥ

गोकर्ण मनुष्यों के लिए शिवलोक की सोपान-श्रेणी है। सुनो राजन्, मैं भी अभी गोकर्ण से ही आया हूँ,

श्लोक 135 (skanda.3.94.135)

उपास्यैनां शिवतिथिं विलोक्य च महोत्सवम् ॥ अस्यां शिवतिथौ सर्वे महोत्सवदिदृक्षवः

upāsyaināṁ śivatithiṁ vilokya ca mahotsavam asyāṁ śivatithau sarve mahotsavadidṛkṣavaḥ

इस शिव-तिथि की उपासना करके और महोत्सव देखकर। इस शिव-तिथि पर, महोत्सव देखने के इच्छुक सभी लोग —

श्लोक 136 (skanda.3.94.136)

आगताः सर्वदेशेभ्यश्चातुर्वर्णा महाजनाः ॥ स्त्रियो वृद्धाश्च बालाश्च चतुराश्रमवासिनः

āgatāḥ sarvadeśebhyaścāturvarṇā mahājanāḥ striyo vṛddhāśca bālāśca caturāśramavāsinaḥ

— सभी देशों से चारों वर्णों के महाजन आए; स्त्रियाँ, वृद्ध, बालक और चारों आश्रमों के निवासी —

श्लोक 137 (skanda.3.94.137)

आगत्य दृष्ट्वा देवेशं लेभिरे कृतकृत्यताम् ॥ अथाहमप्यमी शिष्या ऋषयश्च तथाऽपरे

āgatya dṛṣṭvā deveśaṁ lebhire kṛtakṛtyatām athāhamapyamī śiṣyā ṛṣayaśca tathā'pare

आकर देवाधिदेव का दर्शन करके कृतकृत्य हुए। फिर मैं भी इन शिष्यों, अन्य ऋषियों —

श्लोक 138 (skanda.3.94.138)

राजर्षयश्च राजेंद्र सनकाद्याः सुरर्षयः ॥ स्नात्वा सर्वेषु तीर्थेषु समुपास्य महाबलम्

rājarṣayaśca rājeṁdra sanakādyāḥ surarṣayaḥ snātvā sarveṣu tīrtheṣu samupāsya mahābalam

राजर्षियों, हे राजेन्द्र, और सनकादि देवर्षियों सहित — समस्त तीर्थों में स्नान करके, महाबल की भलीभाँति उपासना करके —

श्लोक 139 (skanda.3.94.139)

लब्ध्वा च जन्मसाफल्यं प्रयाताः सर्वतोदिशम् ॥ अमुनाद्य नरेंद्रेण जनकेन यियक्षुणा

labdhvā ca janmasāphalyaṁ prayātāḥ sarvatodiśam amunādya nareṁdreṇa janakena yiyakṣuṇā

और जन्म की सफलता प्राप्त करके सभी दिशाओं की ओर प्रस्थान कर गए। आज इस यज्ञेच्छुक राजा जनक द्वारा —

श्लोक 140 (skanda.3.94.140)

निमंत्रितोऽहं संप्राप्तो गोकर्णाच्छिवमंदिरात् ॥ प्रत्यागमं किमप्यंग दृष्ट्वाश्चर्यमहं पथि ॥ महानंदेन मनसा कृतार्थोऽस्मि महीपते

nimaṁtrito'haṁ saṁprāpto gokarṇācchivamaṁdirāt pratyāgamaṁ kimapyaṁga dṛṣṭvāścaryamahaṁ pathi mahānaṁdena manasā kṛtārtho'smi mahīpate

निमंत्रित होकर मैं शिव-मंदिर गोकर्ण से यहाँ पहुँचा हूँ। लौटते समय मार्ग में कुछ आश्चर्यजनक देखकर, हे मित्र, मैं अत्यंत आनंदित चित्त से कृतार्थ हुआ हूँ, हे पृथ्वीपते!'

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