ब्रह्म खण्ड · अध्याय 93
पंचाक्षर मंत्र का माहात्म्य
श्लोक 1 (skanda.3.93.1)
॥श्रीगणेशाय नमः॥ श्रीगुरुभ्यो नमः ॥ अथ ब्रह्मोत्तरखंडमारंभः ॥ ॐ नमः शिवाय ॥ ज्योतिर्मात्रस्वरूपाय निर्मलज्ञानचक्षुषे ॥ नमः शिवाय शांताय ब्रह्मणे लिंगमूर्त्तये
śrīgaṇeśāya namaḥ śrīgurubhyo namaḥ atha brahmottarakhaṁḍamāraṁbhaḥ oṁ namaḥ śivāya jyotirmātrasvarūpāya nirmalajñānacakṣuṣe namaḥ śivāya śāṁtāya brahmaṇe liṁgamūrttaye
श्री गणेश को नमस्कार। श्री गुरुओं को नमस्कार। अब ब्रह्मोत्तर खण्ड का आरम्भ होता है। ॐ, शिव को नमस्कार। शुद्ध ज्ञान-चक्षु, केवल ज्योति-स्वरूप, शान्त, ब्रह्मस्वरूप, लिंगमूर्ति शिव को नमस्कार है।
श्लोक 2 (skanda.3.93.2)
ऋषय ऊचुः ॥ आख्यातं भवता सूत विष्णोर्माहात्म्यमुत्तमम्॥ समस्ताघहरं पुण्यं समसेन श्रुतं च नः
ṛṣaya ūcuḥ ākhyātaṁ bhavatā sūta viṣṇormāhātmyamuttamam samastāghaharaṁ puṇyaṁ samasena śrutaṁ ca naḥ
ऋषियों ने कहा — हे सूत! आपने विष्णु का उत्तम माहात्म्य, जो समस्त पापों का नाश करने वाला और पुण्यमय है, हमें संक्षेप में सुनाया है।
श्लोक 3 (skanda.3.93.3)
इदानीं श्रोतुमिच्छामो माहात्म्यं त्रिपुरद्विषः ॥ तद्भक्तानां च माहात्म्यमशेषाघहरं परम्
idānīṁ śrotumicchāmo māhātmyaṁ tripuradviṣaḥ tadbhaktānāṁ ca māhātmyamaśeṣāghaharaṁ param
अब हम त्रिपुरारि (शिव) का माहात्म्य सुनना चाहते हैं, तथा उनके भक्तों का वह परम माहात्म्य भी, जो समस्त पापों का सम्पूर्ण नाश करने वाला है।
श्लोक 4 (skanda.3.93.4)
तन्मंत्राणां च माहात्म्यं तथैव द्विजसत्तम ॥ तत्कथायाश्च तद्भक्तेः प्रभावमनुवर्णय
tanmaṁtrāṇāṁ ca māhātmyaṁ tathaiva dvijasattama tatkathāyāśca tadbhakteḥ prabhāvamanuvarṇaya
और हे द्विजश्रेष्ठ! उसी प्रकार उनके मंत्रों का माहात्म्य भी बताइए, तथा उनकी कथा और उनकी भक्ति के प्रभाव का वर्णन कीजिए।
श्लोक 5 (skanda.3.93.5)
सूत उवाच ॥ एतावदेव मर्त्यानां परं श्रेयः सनातनम्॥ यदीश्वरकथायां वै जाता भक्तिरहैतुकी
sūta uvāca etāvadeva martyānāṁ paraṁ śreyaḥ sanātanam yadīśvarakathāyāṁ vai jātā bhaktirahaitukī
सूत जी ने कहा — मनुष्यों के लिए यही सनातन परम कल्याण है कि ईश्वर की कथा में निष्काम (हेतुरहित) भक्ति उत्पन्न हो जाए।
श्लोक 6 (skanda.3.93.6)
अतस्तद्भक्तिलेशस्य माहात्म्यं वर्ण्यते मया ॥ अपि कल्पायुषा नालं वक्तुं विस्तरतः क्वचित्
atastadbhaktileśasya māhātmyaṁ varṇyate mayā api kalpāyuṣā nālaṁ vaktuṁ vistarataḥ kvacit
अतः मैं उसी भक्ति के एक अंश मात्र का माहात्म्य वर्णन करता हूँ; कल्प भर की आयु पाकर भी उसे विस्तार से पूर्ण रूप से कहना संभव नहीं है।
श्लोक 7 (skanda.3.93.7)
सर्वेषामपि पुण्यानां सर्वेषां श्रेयसामपि ॥ सर्वेषामपि यज्ञानां जपयज्ञः परः स्मृतः
sarveṣāmapi puṇyānāṁ sarveṣāṁ śreyasāmapi sarveṣāmapi yajñānāṁ japayajñaḥ paraḥ smṛtaḥ
समस्त पुण्य-कर्मों में, समस्त कल्याण-साधनों में और समस्त यज्ञों में जप-यज्ञ को सर्वश्रेष्ठ माना गया है।
श्लोक 8 (skanda.3.93.8)
तत्रादौ जपयज्ञस्य फलं स्वस्त्ययनं महत् ॥ शैवं षडक्षरं दिव्यं मंत्रमाहुर्महर्षयः
tatrādau japayajñasya phalaṁ svastyayanaṁ mahat śaivaṁ ṣaḍakṣaraṁ divyaṁ maṁtramāhurmaharṣayaḥ
उन जपों में सबसे पहले महान कल्याणकारी फल देने वाला जो मंत्र है, उसे महर्षिगण दिव्य शैव षडक्षर मंत्र (ॐ नमः शिवाय) कहते हैं।
श्लोक 9 (skanda.3.93.9)
देवानां परमो देवो यथा वै त्रिपुरांतकः ॥ मंत्राणां परमो मंत्रस्तथा शैवः षडक्षरः
devānāṁ paramo devo yathā vai tripurāṁtakaḥ maṁtrāṇāṁ paramo maṁtrastathā śaivaḥ ṣaḍakṣaraḥ
जैसे त्रिपुरांतक (शिव) देवताओं में परम देव हैं, वैसे ही शैव षडक्षर मंत्र समस्त मंत्रों में परम मंत्र है।
श्लोक 10 (skanda.3.93.10)
एष पंचाक्षरो मंत्रो जप्तॄणां मुक्तिदायकः॥ संसेव्यते मुनिश्रेष्ठैरशेषैः सिद्धिकांक्षिभिः
eṣa paṁcākṣaro maṁtro japtṝṇāṁ muktidāyakaḥ saṁsevyate muniśreṣṭhairaśeṣaiḥ siddhikāṁkṣibhiḥ
यह पंचाक्षर मंत्र (नमः शिवाय) जप करने वालों को मुक्ति देने वाला है; सिद्धि की कामना करने वाले समस्त श्रेष्ठ मुनियों द्वारा इसका सेवन किया जाता है।
श्लोक 11 (skanda.3.93.11)
अस्यैवाक्षरमाहात्म्यं नालं वक्तुं चतुर्मुखः॥ श्रुतयो यत्र सिद्धांतं गताः परमनिर्वृताः
asyaivākṣaramāhātmyaṁ nālaṁ vaktuṁ caturmukhaḥ śrutayo yatra siddhāṁtaṁ gatāḥ paramanirvṛtāḥ
इसके अक्षरों का माहात्म्य तो चतुर्मुख ब्रह्मा भी वर्णन करने में समर्थ नहीं हैं, जिस मंत्र में स्वयं वेद भी परम आनंद को प्राप्त होकर अपने सिद्धांत तक पहुँचे हैं।
श्लोक 12 (skanda.3.93.12)
सर्वज्ञः परिपूर्णश्च सच्चिदानंदलक्षणः ॥ स शिवो यत्र रमते शैवे पंचाक्षरे शुभे
sarvajñaḥ paripūrṇaśca saccidānaṁdalakṣaṇaḥ sa śivo yatra ramate śaive paṁcākṣare śubhe
सर्वज्ञ, परिपूर्ण और सच्चिदानंद-स्वरूप वे शिव इसी शुभ शैव पंचाक्षर मंत्र में रमण करते हैं।
श्लोक 13 (skanda.3.93.13)
एतेन मंत्रराजेन सर्वोपनिषदात्मना ॥ लेभिरे मुनयः सर्वे परं ब्रह्म निरामयम्
etena maṁtrarājena sarvopaniṣadātmanā lebhire munayaḥ sarve paraṁ brahma nirāmayam
सम्पूर्ण उपनिषदों के सार-स्वरूप इस मंत्रराज के द्वारा ही समस्त मुनियों ने उस परम, निर्दोष ब्रह्म को प्राप्त किया।
श्लोक 14 (skanda.3.93.14)
नमस्कारेण जीवत्वं शिवेऽत्र परमात्मनि ॥ ऐक्यं गतमतो मंत्रः परब्रह्ममयो ह्यसौ
namaskāreṇa jīvatvaṁ śive'tra paramātmani aikyaṁ gatamato maṁtraḥ parabrahmamayo hyasau
इस मंत्र में जो 'नमः' पद है, उसके द्वारा जीवत्व यहाँ परमात्मा शिव के साथ ऐक्य को प्राप्त हो जाता है; इसीलिए यह मंत्र स्वयं परब्रह्मस्वरूप है।
श्लोक 15 (skanda.3.93.15)
भवपाशनिबद्धानां देहिनां हितकाम्यया ॥ आहोंनमः शिवायेति मंत्रमाद्यं शिवः स्वयम्
bhavapāśanibaddhānāṁ dehināṁ hitakāmyayā āhoṁnamaḥ śivāyeti maṁtramādyaṁ śivaḥ svayam
संसार के पाश में बँधे हुए प्राणियों के हित की कामना से स्वयं शिव ने "ॐ नमः शिवाय" इस आदि मंत्र को प्रकट किया है।
श्लोक 16 (skanda.3.93.16)
किं तस्य बहुभिर्मंत्रैः किं तीर्थैः किं तपोऽध्वरैः ॥ यस्योंनमः शिवायेति मंत्रो हृदयगोचरः
kiṁ tasya bahubhirmaṁtraiḥ kiṁ tīrthaiḥ kiṁ tapo'dhvaraiḥ yasyoṁnamaḥ śivāyeti maṁtro hṛdayagocaraḥ
जिसके हृदय में "ॐ नमः शिवाय" यह मंत्र सदा विराजमान है, उसे और अनेक मंत्रों से, तीर्थों से, तप और यज्ञों से क्या प्रयोजन?
श्लोक 17 (skanda.3.93.17)
तावद्भ्रमंति संसारे दारुणे दुःखसंकुले ॥ यावन्नोच्चारयंतीमं मंत्रं देहभृतः सकृत्
tāvadbhramaṁti saṁsāre dāruṇe duḥkhasaṁkule yāvannoccārayaṁtīmaṁ maṁtraṁ dehabhṛtaḥ sakṛt
संसार में यह दारुण, दुःखों से भरा हुआ भ्रमण तभी तक चलता है, जब तक प्राणी इस मंत्र का एक बार भी उच्चारण नहीं करते।
श्लोक 18 (skanda.3.93.18)
मंत्राधिराजराजोऽयं सर्ववेदांतशेखरः ॥ सर्वज्ञाननिधानं च सोऽयं चैव षडक्षरः
maṁtrādhirājarājo'yaṁ sarvavedāṁtaśekharaḥ sarvajñānanidhānaṁ ca so'yaṁ caiva ṣaḍakṣaraḥ
यह षडक्षर मंत्र समस्त मंत्रों का अधिराज है, सम्पूर्ण वेदांत का शिखर है, और यही समस्त ज्ञान का भंडार है।
श्लोक 19 (skanda.3.93.19)
कैवल्यमार्गदीपोऽयमविद्यासिंधुवाडवः ॥ महापातकदावाग्निः सोऽयं मंत्रः षडक्षरः
kaivalyamārgadīpo'yamavidyāsiṁdhuvāḍavaḥ mahāpātakadāvāgniḥ so'yaṁ maṁtraḥ ṣaḍakṣaraḥ
यह मंत्र मोक्ष-मार्ग का दीपक है, अविद्या-रूपी समुद्र को सुखाने वाली बडवाग्नि है; यही षडक्षर मंत्र महापातकों को भस्म करने वाली दावाग्नि है।
श्लोक 20 (skanda.3.93.20)
तस्मात्सर्वप्रदो मंत्रः सोऽयं पञ्चाक्षरः स्मृतः ॥ स्त्रीभिः शूद्रैश्च संकीर्णैर्धार्यते मुक्तिकांक्षिभिः
tasmātsarvaprado maṁtraḥ so'yaṁ pañcākṣaraḥ smṛtaḥ strībhiḥ śūdraiśca saṁkīrṇairdhāryate muktikāṁkṣibhiḥ
इसीलिए यह पंचाक्षर मंत्र सर्वदाता माना गया है; मुक्ति की कामना करने वाली स्त्रियाँ, शूद्र और वर्णसंकर लोग भी इसे धारण करते हैं।
श्लोक 21 (skanda.3.93.21)
नास्य दीक्षा न होमश्च न संस्कारो न तर्पणम् ॥ न कालो नोपदेशश्च सदा शुचिरयं मनुः
nāsya dīkṣā na homaśca na saṁskāro na tarpaṇam na kālo nopadeśaśca sadā śucirayaṁ manuḥ
इसके लिए न दीक्षा आवश्यक है, न होम, न संस्कार, न तर्पण; न कोई काल-नियम है और न उपदेश की आवश्यकता — यह मंत्र सदा ही पवित्र है।
श्लोक 22 (skanda.3.93.22)
महापातकविच्छित्त्यै शिव इत्यक्षरद्वयम् ॥ अलं नमस्कियायुक्तो मुक्तये परिकल्पते
mahāpātakavicchittyai śiva ityakṣaradvayam alaṁ namaskiyāyukto muktaye parikalpate
महापातकों के विनाश के लिए केवल 'शिव' यह दो अक्षर ही पर्याप्त हैं; नमस्कार-क्रिया से युक्त होकर यह मुक्ति देने में समर्थ माना गया है।
श्लोक 23 (skanda.3.93.23)
उपदिष्टः सद्गुरुणा जप्तः क्षेत्रे च पावने ॥ सद्यो यथेप्सितां सिद्धिं ददातीति किमद्भुतम्
upadiṣṭaḥ sadguruṇā japtaḥ kṣetre ca pāvane sadyo yathepsitāṁ siddhiṁ dadātīti kimadbhutam
यदि सद्गुरु द्वारा उपदिष्ट होकर किसी पवित्र क्षेत्र में इसका जप किया जाए, तो यह तत्काल इच्छित सिद्धि प्रदान करता है — इसमें आश्चर्य ही क्या है?
श्लोक 24 (skanda.3.93.24)
अतः सद्गुरुमाश्रित्य ग्राह्योऽयं मंत्रनायकः॥ पुण्यक्षेत्रेषु जप्तव्यः सद्यः सिद्धिं प्रयच्छति
ataḥ sadgurumāśritya grāhyo'yaṁ maṁtranāyakaḥ puṇyakṣetreṣu japtavyaḥ sadyaḥ siddhiṁ prayacchati
अतः सद्गुरु की शरण लेकर यह मंत्र-नायक ग्रहण करने योग्य है; पुण्य-क्षेत्रों में इसका जप करना चाहिए, यह तत्काल सिद्धि प्रदान करता है।
श्लोक 25 (skanda.3.93.25)
गुरवो निर्मलाः शांताः साधवो मितभाषिणः ॥ कामक्रोधविनिर्मुक्ताः सदाचारा जितेंद्रियाः
guravo nirmalāḥ śāṁtāḥ sādhavo mitabhāṣiṇaḥ kāmakrodhavinirmuktāḥ sadācārā jiteṁdriyāḥ
(ऐसे) गुरु निर्मल, शांत, सज्जन, मितभाषी, काम-क्रोध से मुक्त, सदाचारी और जितेन्द्रिय होते हैं।
श्लोक 26 (skanda.3.93.26)
एतैः कारुण्यतो दत्तो मंत्रः क्षिप्रं प्रसिद्ध्यति ॥ क्षेत्राणि जपयोग्यानि समासात्कथयाम्यहम्
etaiḥ kāruṇyato datto maṁtraḥ kṣipraṁ prasiddhyati kṣetrāṇi japayogyāni samāsātkathayāmyaham
ऐसे गुरुओं द्वारा करुणावश दिया गया मंत्र शीघ्र ही सिद्ध हो जाता है; अब मैं संक्षेप में जप के योग्य क्षेत्रों को बताता हूँ।
श्लोक 27 (skanda.3.93.27)
प्रयागं पुष्करं रम्यं केदारं सेतुबंधनम् ॥ गोकर्णं नैमिषारण्यं सद्यः सिद्धिकरं नृणाम्
prayāgaṁ puṣkaraṁ ramyaṁ kedāraṁ setubaṁdhanam gokarṇaṁ naimiṣāraṇyaṁ sadyaḥ siddhikaraṁ nṛṇām
प्रयाग, रमणीय पुष्कर, केदार, सेतुबन्ध, गोकर्ण, नैमिषारण्य — ये सभी क्षेत्र मनुष्यों को तत्काल सिद्धि प्रदान करने वाले हैं।
श्लोक 28 (skanda.3.93.28)
अत्रानुवर्ण्यते सद्भिरितिहासः पुरातनः॥ असकृद्वा सकृद्वापि शृण्वतां मंगलप्रदः
atrānuvarṇyate sadbhiritihāsaḥ purātanaḥ asakṛdvā sakṛdvāpi śṛṇvatāṁ maṁgalapradaḥ
यहाँ सज्जनों द्वारा वर्णित एक प्राचीन इतिहास कहा जा रहा है, जो इसे बार-बार अथवा एक बार भी सुनने वालों के लिए मंगलकारी है।
श्लोक 29 (skanda.3.93.29)
मथुरायां यदुश्रेष्ठो दाशार्ह इति विश्रुतः ॥ बभूव राजा मतिमान्महोत्साहो महाबलः
mathurāyāṁ yaduśreṣṭho dāśārha iti viśrutaḥ babhūva rājā matimānmahotsāho mahābalaḥ
मथुरा में दाशार्ह नाम से विख्यात यदुश्रेष्ठ एक राजा हुए — जो बुद्धिमान, महान उत्साही और महाबली थे।
श्लोक 30 (skanda.3.93.30)
शास्त्रज्ञो नयवाक्छूरो धैर्यवानमितद्युतिः ॥ अप्रधृष्यः सुगंभीरः संग्रामेष्वनिवर्त्तितः
śāstrajño nayavākchūro dhairyavānamitadyutiḥ apradhṛṣyaḥ sugaṁbhīraḥ saṁgrāmeṣvanivarttitaḥ
वे शास्त्रों के ज्ञाता, नीति और वाणी में निपुण, शूरवीर, धैर्यवान, अपार तेजस्वी, अजेय, अत्यंत गंभीर और युद्ध में कभी पीठ न दिखाने वाले थे।
श्लोक 31 (skanda.3.93.31)
महारथो महेष्वासो नानाशास्त्रार्थकोविदः॥ वदान्यो रूपसंपन्नो युवा लक्ष णसंयुतः
mahāratho maheṣvāso nānāśāstrārthakovidaḥ vadānyo rūpasaṁpanno yuvā lakṣa ṇasaṁyutaḥ
वे महारथी और महान धनुर्धर थे, विविध शास्त्रों के अर्थ में निपुण, उदार, रूपसम्पन्न, युवा और समस्त शुभ लक्षणों से युक्त थे।
श्लोक 32 (skanda.3.93.32)
स काशिराजतनयामुपयेमे वराननाम् ॥ कांतां कलावतीं नाम रूपशीलगुणान्विताम्
sa kāśirājatanayāmupayeme varānanām kāṁtāṁ kalāvatīṁ nāma rūpaśīlaguṇānvitām
उन्होंने काशिराज की सुन्दर मुख वाली पुत्री, कलावती नामक मनोहर कन्या से विवाह किया, जो रूप, शील और गुणों से सम्पन्न थी।
श्लोक 33 (skanda.3.93.33)
कृतोद्वाहः स राजेंद्रः संप्राप्य निजमंदिरम्॥ रात्रौ तां शयनारूढां संगमाय समाह्वयत्
kṛtodvāhaḥ sa rājeṁdraḥ saṁprāpya nijamaṁdiram rātrau tāṁ śayanārūḍhāṁ saṁgamāya samāhvayat
विवाह सम्पन्न कर वह राजेन्द्र अपने भवन में पहुँचकर, रात्रि में शय्या पर स्थित उस रानी को संगम के लिए बुलाने लगा।
श्लोक 34 (skanda.3.93.34)
सा स्वभर्त्रा समाहूता बहुशः प्रार्थिता सती ॥ न बबंध मनस्तस्मिन्न चागच्छ तदंतिकम्
sā svabhartrā samāhūtā bahuśaḥ prārthitā satī na babaṁdha manastasminna cāgaccha tadaṁtikam
अपने पति द्वारा बार-बार बुलाए जाने और प्रार्थना किए जाने पर भी वह सती अपना मन उसमें नहीं लगा सकी और न ही उसके निकट गई।
श्लोक 35 (skanda.3.93.35)
संगमाय यदाहूता नागता निजवल्लभा ॥ बलादाहर्तुकामस्तामुदतिष्ठन्महीपतिः
saṁgamāya yadāhūtā nāgatā nijavallabhā balādāhartukāmastāmudatiṣṭhanmahīpatiḥ
जब संगम के लिए बुलाई गई अपनी प्रिय पत्नी वह नहीं आई, तो वह राजा उसे बलपूर्वक ले जाने की इच्छा से उठ खड़ा हुआ।
श्लोक 36 (skanda.3.93.36)
॥ राज्ञ्युवाच ॥ मा मां स्पृश महाराज कारणज्ञां व्रते स्थिताम् ॥ धर्माधर्मौ विजानासि मा कार्षीः साहसं मयि
rājñyuvāca mā māṁ spṛśa mahārāja kāraṇajñāṁ vrate sthitām dharmādharmau vijānāsi mā kārṣīḥ sāhasaṁ mayi
रानी ने कहा — हे महाराज! मुझे मत छुइए, मैं कारण जानने वाली हूँ और व्रत में स्थित हूँ। आप धर्म और अधर्म दोनों को जानते हैं; मेरे साथ दुःसाहस मत कीजिए।
श्लोक 37 (skanda.3.93.37)
क्वचित्प्रियेण भुक्तं यद्रोचते तु मनीषिणाम् ॥ दंपत्योः प्रीतियोगेन संगमः प्रीतिवर्द्धनः
kvacitpriyeṇa bhuktaṁ yadrocate tu manīṣiṇām daṁpatyoḥ prītiyogena saṁgamaḥ prītivarddhanaḥ
कभी-कभी प्रिय के द्वारा भोगा गया विषय ही बुद्धिमानों को रुचिकर लगता है; पति-पत्नी का प्रेमपूर्ण संगम ही प्रेम को बढ़ाने वाला होता है।
श्लोक 38 (skanda.3.93.38)
प्रियं यदा मे जायेत तदा संगस्तु ते मयि ॥ का प्रीतिः किं सुखं पुंसां बलाद्भोगेन योषिताम्
priyaṁ yadā me jāyeta tadā saṁgastu te mayi kā prītiḥ kiṁ sukhaṁ puṁsāṁ balādbhogena yoṣitām
जब मेरे मन में प्रेम उत्पन्न होगा, तभी आपका मेरे साथ संगम होगा; बलपूर्वक स्त्रियों को भोगने से पुरुषों को कौन-सी प्रीति और कौन-सा सुख मिलता है?
श्लोक 39 (skanda.3.93.39)
अप्रीतां रोगिणीं नारीमंतर्वत्नीं धृतव्रताम् ॥ रजस्वलामकामां च न कामेत बलात्पुमान्
aprītāṁ rogiṇīṁ nārīmaṁtarvatnīṁ dhṛtavratām rajasvalāmakāmāṁ ca na kāmeta balātpumān
जो स्त्री अप्रसन्न हो, रोगिणी हो, गर्भवती हो, व्रत धारण किए हो, रजस्वला हो अथवा कामरहित हो, उसे पुरुष को बलपूर्वक नहीं चाहना चाहिए।
श्लोक 40 (skanda.3.93.40)
प्रीणनं लालनं पोषं रंजनं मार्दवं दयाम्॥ कृत्वा वधूमुपगमेद्युवतीं प्रेमवान्पतिः ॥ युवतौ कुसुमे चैव विधेयं सुखमिच्छता
prīṇanaṁ lālanaṁ poṣaṁ raṁjanaṁ mārdavaṁ dayām kṛtvā vadhūmupagamedyuvatīṁ premavānpatiḥ yuvatau kusume caiva vidheyaṁ sukhamicchatā
प्रेमी पति को चाहिए कि वह प्रसन्नता, दुलार, पालन-पोषण, आनंद, कोमलता और दया दिखाकर ही अपनी युवा पत्नी के पास जाए; सुख चाहने वाले को युवती के साथ पुष्प के समान ही कोमल व्यवहार करना चाहिए।
श्लोक 41 (skanda.3.93.41)
इत्युक्तोऽपि तया साध्व्या स राजा स्मरविह्वलः ॥ बलादाकृष्य तां हस्ते परिरेभे रिरंसया
ityukto'pi tayā sādhvyā sa rājā smaravihvalaḥ balādākṛṣya tāṁ haste parirebhe riraṁsayā
सती-साध्वी पत्नी द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर भी काम से विह्वल हुआ वह राजा उसका हाथ बलपूर्वक पकड़कर संगम की इच्छा से उसका आलिंगन करने लगा।
श्लोक 42 (skanda.3.93.42)
तां स्पृष्टमात्रां सहसा तप्तायःपिंडसन्निभाम् ॥ निर्दहंतीमिवात्मानं तत्याज भयविह्वलः
tāṁ spṛṣṭamātrāṁ sahasā taptāyaḥpiṁḍasannibhām nirdahaṁtīmivātmānaṁ tatyāja bhayavihvalaḥ
छूते ही वह अचानक तपे हुए लोहे के पिण्ड के समान प्रतीत हुई, मानो वह स्वयं को जला रही हो; भय से विह्वल होकर राजा ने उसे छोड़ दिया।
श्लोक 43 (skanda.3.93.43)
राजोवाच ॥ अहो सुमहदाश्चर्यमिदं दृष्टं तव प्रिये ॥ कथमग्निसमं जातं वपुः पल्लवकोमलम्
rājovāca aho sumahadāścaryamidaṁ dṛṣṭaṁ tava priye kathamagnisamaṁ jātaṁ vapuḥ pallavakomalam
राजा ने कहा — हे प्रिये! यह मैंने तुझमें कैसा महान आश्चर्य देखा है! तेरा कोमल, नवपल्लव-सा शरीर अग्नि के समान कैसे हो गया?
श्लोक 44 (skanda.3.93.44)
इत्थं सुविस्मितो राजा भीतः सा राजवल्लभा ॥ प्रत्युवाच विहस्यैनं विनयेन शुचिस्मिता
itthaṁ suvismito rājā bhītaḥ sā rājavallabhā pratyuvāca vihasyainaṁ vinayena śucismitā
इस प्रकार अत्यंत विस्मित और भयभीत हुए राजा को, उस राजप्रिया ने मुस्कराते हुए विनयपूर्वक उत्तर दिया।
श्लोक 45 (skanda.3.93.45)
राज्ञ्युवाच ॥ राजन्मम पुरा बाल्ये दुर्वासा मुनिपुंगवः॥ शैवीं पंचाक्षरीं विद्यां कारुण्येनोपदिष्टवान्
rājñyuvāca rājanmama purā bālye durvāsā munipuṁgavaḥ śaivīṁ paṁcākṣarīṁ vidyāṁ kāruṇyenopadiṣṭavān
रानी ने कहा — हे राजन्! पूर्वकाल में मेरे बाल्यकाल में मुनिश्रेष्ठ दुर्वासा ने करुणावश मुझे शैव पंचाक्षरी विद्या का उपदेश दिया था।
श्लोक 46 (skanda.3.93.46)
तेन मंत्रानुभावेन ममांगं कलुषोज्झितम् ॥ स्प्रष्टुं न शक्यते पुंभिः सपापैर्देवैवर्जितैः
tena maṁtrānubhāvena mamāṁgaṁ kaluṣojjhitam spraṣṭuṁ na śakyate puṁbhiḥ sapāpairdevaivarjitaiḥ
उसी मंत्र के प्रभाव से मेरा शरीर सभी कलुषों से मुक्त हो गया है; पापी और देवताओं द्वारा त्यागे गए पुरुषों के द्वारा इसे छुआ नहीं जा सकता।
श्लोक 47 (skanda.3.93.47)
त्वया राजन्प्रकृतिना कुलटागणिकादयः ॥ मदिरास्वादनिरता निषेव्यंते सदा स्त्रियः
tvayā rājanprakṛtinā kulaṭāgaṇikādayaḥ madirāsvādaniratā niṣevyaṁte sadā striyaḥ
हे राजन्! आप स्वभाव से ही सदा कुलटा, गणिका आदि तथा मदिरापान में लीन स्त्रियों का सेवन करते रहे हैं।
श्लोक 48 (skanda.3.93.48)
न स्नानं क्रियते नित्यं न मंत्रो जप्यते शुचिः ॥ नाराध्यते त्वयेशानः कथं मां स्प्रष्टुमर्हसि
na snānaṁ kriyate nityaṁ na maṁtro japyate śuciḥ nārādhyate tvayeśānaḥ kathaṁ māṁ spraṣṭumarhasi
न आप नित्य स्नान करते हैं, न पवित्र मंत्र का जप करते हैं, और न ही आप ईशान (शिव) की आराधना करते हैं — फिर आप मुझे छूने योग्य कैसे हो सकते हैं?
श्लोक 49 (skanda.3.93.49)
राजोवाच॥ तां समाख्याहि सुश्रोणि शैवीं पंचाक्षरीं शुभाम् ॥ विद्याविध्वस्तपापोऽहं त्वयीच्छामि रतिं प्रिये
rājovāca tāṁ samākhyāhi suśroṇi śaivīṁ paṁcākṣarīṁ śubhām vidyāvidhvastapāpo'haṁ tvayīcchāmi ratiṁ priye
राजा ने कहा — हे सुश्रोणि! मुझे वह शुभ शैव पंचाक्षरी विद्या बताओ; उस विद्या से मेरे पाप नष्ट हो जाएँ, हे प्रिये! मैं तुम्हारे साथ रति चाहता हूँ।
श्लोक 50 (skanda.3.93.50)
राज्ञ्युवाच ॥ नाहं तवोपदेशं वै कुर्यां मम गुरुर्भवान् ॥ उपातिष्ठ गुरुं राजन्गर्गं मंत्र विदांवरम्
rājñyuvāca nāhaṁ tavopadeśaṁ vai kuryāṁ mama gururbhavān upātiṣṭha guruṁ rājangargaṁ maṁtra vidāṁvaram
रानी ने कहा — मैं आपको उपदेश नहीं दे सकती, क्योंकि आप मेरे गुरु के समान हैं; हे राजन्! आप मंत्रवेत्ताओं में श्रेष्ठ गुरु गर्ग के पास जाइए।
श्लोक 51 (skanda.3.93.51)
सूत उवाच ॥ इति संभाषमाणौ तौ दंपती गर्गसन्निधिम् ॥ प्राप्य तच्चरणौ मूर्ध्ना ववंदाते कृताञ्जली
sūta uvāca iti saṁbhāṣamāṇau tau daṁpatī gargasannidhim prāpya taccaraṇau mūrdhnā vavaṁdāte kṛtāñjalī
सूत जी ने कहा — इस प्रकार बातचीत करते हुए वे दोनों पति-पत्नी गर्ग मुनि के पास पहुँचे और हाथ जोड़कर उनके चरणों में मस्तक झुकाकर प्रणाम किया।
श्लोक 52 (skanda.3.93.52)
अथ राजा गुरुं प्रीतमभिपूज्य पुनःपुनः ॥ समाचष्ट विनीतात्मा रहस्यात्ममनोरथम्
atha rājā guruṁ prītamabhipūjya punaḥpunaḥ samācaṣṭa vinītātmā rahasyātmamanoratham
तब राजा ने प्रसन्न गुरु की बार-बार पूजा करके, विनम्र होकर अपने हृदय की गुप्त इच्छा उनसे कह सुनाई।
श्लोक 53 (skanda.3.93.53)
राजोवाच ॥ कृतार्थं मां कुरु गुरो संप्राप्तं करुणार्द्रधीः ॥ शैवीं पंचाक्षरीं विद्यामुपदेष्टुं त्वमर्हसि
rājovāca kṛtārthaṁ māṁ kuru guro saṁprāptaṁ karuṇārdradhīḥ śaivīṁ paṁcākṣarīṁ vidyāmupadeṣṭuṁ tvamarhasi
राजा ने कहा — हे गुरुदेव! आपके पास आए हुए मुझे कृतार्थ कीजिए; करुणा से द्रवित हृदय होकर आप ही शैव पंचाक्षरी विद्या का उपदेश देने योग्य हैं।
श्लोक 54 (skanda.3.93.54)
अनाज्ञातं यदाज्ञातं यत्कृतं राजकर्मणा ॥ तत्पापं येन शुद्ध्येत तन्मंत्रं देहि मे गुरो
anājñātaṁ yadājñātaṁ yatkṛtaṁ rājakarmaṇā tatpāpaṁ yena śuddhyeta tanmaṁtraṁ dehi me guro
राजकार्य करते हुए जो भी पाप जाने अथवा अनजाने में हुआ हो, हे गुरुदेव! मुझे वह मंत्र दीजिए जिससे वह पाप शुद्ध हो जाए।
श्लोक 55 (skanda.3.93.55)
एवमभ्यर्थितो राज्ञा गर्गो ब्राह्मणपुंगवः ॥ तौ निनाय महापुण्यं कालिंद्यास्तटमुत्तमम्
evamabhyarthito rājñā gargo brāhmaṇapuṁgavaḥ tau nināya mahāpuṇyaṁ kāliṁdyāstaṭamuttamam
राजा द्वारा इस प्रकार प्रार्थना किए जाने पर ब्राह्मणश्रेष्ठ गर्ग उन दोनों को कालिन्दी (यमुना) के अत्यंत पवित्र और उत्तम तट पर ले गए।
श्लोक 56 (skanda.3.93.56)
तत्र पुण्यतरोर्मूले निषण्णोऽथ गुरुः स्वयम् ॥ पुण्यतीर्थजले स्नातं राजानं समुपोषितम्
tatra puṇyatarormūle niṣaṇṇo'tha guruḥ svayam puṇyatīrthajale snātaṁ rājānaṁ samupoṣitam
वहाँ पवित्र वृक्ष के नीचे स्वयं विराजमान होकर गुरु ने उस राजा को, जो पवित्र तीर्थ-जल में स्नान करके उपवास कर चुका था, स्वीकार किया।
श्लोक 57 (skanda.3.93.57)
प्राङ्मुखं चोपवेश्याथ नत्वा शिवपदाम्बुजम् ॥ तन्मस्तके करं न्यस्य ददौ मंत्रं शिवात्मकम्
prāṅmukhaṁ copaveśyātha natvā śivapadāmbujam tanmastake karaṁ nyasya dadau maṁtraṁ śivātmakam
राजा को पूर्वाभिमुख बिठाकर और शिव के चरणकमलों को नमन करके, गुरु ने उसके मस्तक पर हाथ रखकर उसे शिवस्वरूप मंत्र प्रदान किया।
श्लोक 58 (skanda.3.93.58)
तन्मंत्रधारणादेव तद्गुरोर्हस्तसंगमात्॥ निर्ययुस्तस्य वपुषो वायसाः शतकोटयः
tanmaṁtradhāraṇādeva tadgurorhastasaṁgamāt niryayustasya vapuṣo vāyasāḥ śatakoṭayaḥ
उस मंत्र को धारण करते ही और गुरु के हाथ के स्पर्श से, राजा के शरीर से करोड़ों-करोड़ कौवे निकल पड़े।
श्लोक 59 (skanda.3.93.59)
ते दग्धपक्षाः क्रोशंतो निपतंतो महीतले ॥ भस्मीभूतास्ततः सर्वे दृश्यंते स्म सहस्रशः
te dagdhapakṣāḥ krośaṁto nipataṁto mahītale bhasmībhūtāstataḥ sarve dṛśyaṁte sma sahasraśaḥ
उन कौवों के पंख जले हुए थे, वे चीत्कार करते हुए पृथ्वी पर गिर रहे थे, और फिर वे सब हजारों की संख्या में भस्म होते हुए दिखाई देने लगे।
श्लोक 60 (skanda.3.93.60)
दृष्ट्वा तद्वायसकुलं दह्यमानं सुविस्मितौ ॥ राजा च राजमहिषी तं गुरुं पर्यपृच्छताम्
dṛṣṭvā tadvāyasakulaṁ dahyamānaṁ suvismitau rājā ca rājamahiṣī taṁ guruṁ paryapṛcchatām
कौवों के उस झुण्ड को जलते हुए देखकर अत्यंत विस्मित हुए राजा और महारानी ने उस गुरु से प्रश्न पूछा।
श्लोक 61 (skanda.3.93.61)
भगवन्निदमाश्चर्यं कथं जातं शरीरतः ॥ वायसानां कुलं दृष्टं किमेतत्साधु भण्यताम्
bhagavannidamāścaryaṁ kathaṁ jātaṁ śarīrataḥ vāyasānāṁ kulaṁ dṛṣṭaṁ kimetatsādhu bhaṇyatām
(उन्होंने पूछा) — हे भगवन्! शरीर से यह आश्चर्य कैसे उत्पन्न हुआ? यह कौवों का झुण्ड देखा गया है, कृपया बताइए यह क्या है?
श्लोक 62 (skanda.3.93.62)
श्रीगुरुरुवाच ॥ राजन्भवसहस्रेषु भवता परिधावता ॥ संचितानि दुरन्तानि संति पापान्यनेकशः
śrīgururuvāca rājanbhavasahasreṣu bhavatā paridhāvatā saṁcitāni durantāni saṁti pāpānyanekaśaḥ
श्री गुरु ने कहा — हे राजन्! अनेक हजारों जन्मों में परिभ्रमण करते हुए तुमने अनेक प्रकार के अनंत पाप संचित किए हैं।
श्लोक 63 (skanda.3.93.63)
तेषु जन्मसहस्रेषु यानि पुण्यानि संति ते ॥ तेषामाधिक्यतः क्वापि जायते पुण्ययोनिषु
teṣu janmasahasreṣu yāni puṇyāni saṁti te teṣāmādhikyataḥ kvāpi jāyate puṇyayoniṣu
उन हजारों जन्मों में जो पुण्य तुमने अर्जित किए हैं, उनकी अधिकता के कारण ही कभी-कभी पुण्य-योनियों में जन्म प्राप्त होता है।
श्लोक 64 (skanda.3.93.64)
तथा पापीयसीं योनिं क्वचित्पापेन गच्छति ॥ साम्ये पुण्यान्ययोश्चैव मानुषीं योनिमाप्तवान्
tathā pāpīyasīṁ yoniṁ kvacitpāpena gacchati sāmye puṇyānyayoścaiva mānuṣīṁ yonimāptavān
वैसे ही पाप के कारण कभी अत्यंत पापयुक्त योनि प्राप्त होती है; और जब पुण्य तथा पाप दोनों समान हो जाते हैं, तब मनुष्य-योनि प्राप्त होती है।
श्लोक 65 (skanda.3.93.65)
शैवी पंचाक्षरी विद्या यदा ते हृदयं गता। अघानां कोटयस्त्वत्तः काकरूपेण निर्गताः
śaivī paṁcākṣarī vidyā yadā te hṛdayaṁ gatā aghānāṁ koṭayastvattaḥ kākarūpeṇa nirgatāḥ
जब शैव पंचाक्षरी विद्या तुम्हारे हृदय में प्रविष्ट हुई, तब तुमसे करोड़ों पाप कौवों के रूप में बाहर निकल गए।
श्लोक 66 (skanda.3.93.66)
कोटयो ब्रह्महत्यानामगम्यागम्यकोटयः॥ स्वर्णस्तेयसुरापानभ्रूणहत्या दिकोटयः ॥ भवकोटिसहस्रेषु येऽन्ये पातकराशयः
koṭayo brahmahatyānāmagamyāgamyakoṭayaḥ svarṇasteyasurāpānabhrūṇahatyā dikoṭayaḥ bhavakoṭisahasreṣu ye'nye pātakarāśayaḥ
ब्रह्महत्या के करोड़ों पाप, गम्य-अगम्य स्त्री-गमन के करोड़ों पाप, स्वर्ण-चोरी, मदिरा-पान, भ्रूण-हत्या आदि के करोड़ों पाप, तथा हजारों करोड़ जन्मों में संचित अन्य जितने भी पाप-समूह थे —
श्लोक 67 (skanda.3.93.67)
क्षणाद्भस्मीभवंत्येव शैवे पंचाक्षरे धृते ॥ आसंस्तवाद्य राजेंद्र दग्धाः पातककोटयः
kṣaṇādbhasmībhavaṁtyeva śaive paṁcākṣare dhṛte āsaṁstavādya rājeṁdra dagdhāḥ pātakakoṭayaḥ
— ये सब शैव पंचाक्षर मंत्र को धारण करते ही क्षणभर में भस्म हो जाते हैं; हे राजेन्द्र! आज तुम्हारे करोड़ों पाप जलकर भस्म हो गए हैं।
श्लोक 68 (skanda.3.93.68)
अनया सह पूतात्मा विहरस्व यथासुखम् ॥ इत्याभाष्य मुनिश्रेष्ठस्तं मंत्रमुपदिश्य च
anayā saha pūtātmā viharasva yathāsukham ityābhāṣya muniśreṣṭhastaṁ maṁtramupadiśya ca
अब पवित्र आत्मा होकर इसके साथ सुखपूर्वक विचरण करो। ऐसा कहकर और उसे वह मंत्र उपदेश देकर मुनिश्रेष्ठ (गर्ग) ने —
श्लोक 69 (skanda.3.93.69)
ताभ्यां विस्मितचित्ताभ्यां सहितः स्वगृहे ययौ ॥ गुरुवर्यमनुज्ञाप्य मुदितौ तौ च दंपती
tābhyāṁ vismitacittābhyāṁ sahitaḥ svagṛhe yayau guruvaryamanujñāpya muditau tau ca daṁpatī
— उन दोनों आश्चर्यचकित पति-पत्नी ने श्रेष्ठ गुरु से आज्ञा लेकर, प्रसन्न होकर एक साथ अपने घर की ओर प्रस्थान किया।
श्लोक 70 (skanda.3.93.70)
ततः स्वभवनं प्राप्य रेजतुःस्म महाद्युती॥ राजा दृढं समाश्लिष्य पत्नीं चन्दनशीतलाम्॥ संतोषं परमं लेभे निःस्वः प्राप्य यथा धनम्
tataḥ svabhavanaṁ prāpya rejatuḥsma mahādyutī rājā dṛḍhaṁ samāśliṣya patnīṁ candanaśītalām saṁtoṣaṁ paramaṁ lebhe niḥsvaḥ prāpya yathā dhanam
तत्पश्चात् अपने भवन में पहुँचकर वे दोनों महातेजस्वी शोभायमान हुए; राजा ने चन्दन के समान शीतल अपनी पत्नी का दृढ़ आलिंगन करके ऐसा परम संतोष प्राप्त किया जैसे कोई निर्धन व्यक्ति धन पाकर पाता है।
श्लोक 71 (skanda.3.93.71)
अशेषवेदोपनिषत्पुराणशास्त्रावतंसोऽयमघांतकारी ॥ पंचाक्षरस्यैव महाप्रभावो मया समासात्कथितो वरिष्ठः
aśeṣavedopaniṣatpurāṇaśāstrāvataṁso'yamaghāṁtakārī paṁcākṣarasyaiva mahāprabhāvo mayā samāsātkathito variṣṭhaḥ
इस प्रकार समस्त वेद, उपनिषद्, पुराण और शास्त्रों का शिरोभूषण, पाप का नाशक — पंचाक्षर मंत्र का यह श्रेष्ठ महाप्रभाव मैंने संक्षेप में कह दिया है।