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ब्रह्म खण्ड · अध्याय 92

ज्ञाति-व्यवस्था एवं धर्मारण्य-श्रवण-माहात्म्य वर्णन

अध्याय 91अध्याय-सूचीअध्याय 93

श्लोक 1 (skanda.3.92.1)

नारद उवाच । ज्ञातिभेदे तु संजाते तस्मिन्मोहेरके पुरे । त्रैविद्यैः किं कृतं ब्रह्मंस्तन्ममाचक्ष्व पृच्छतः ।

nārada uvāca jñātibhede tu saṁjāte tasmin moherake pure traividyaiḥ kiṁ kṛtaṁ brahmaṁs tan mamācakṣva pṛcchataḥ

नारद ने कहा - जब उस मोहेरक नगर में ज्ञातियों में भेद उत्पन्न हो गया, तब हे ब्रह्मन्, त्रैविद्य ब्राह्मणों ने क्या किया? यह मुझे बताइए, मैं पूछ रहा हूँ।

श्लोक 2 (skanda.3.92.2)

ब्रह्मोवाच । स्वस्थाने वाडवाः सर्वे हर्षनिर्भरमानसाः । अग्निहोत्रपरा केऽपि केऽपि यज्ञपरायणाः ।

brahmovāca svasthāne vāḍavāḥ sarve harṣanirbharamānasāḥ agnihotraparā ke'pi ke'pi yajñaparāyaṇāḥ

ब्रह्मा ने कहा - अपने-अपने स्थान पर सभी ब्राह्मण हर्ष से भरे मन वाले थे। कोई अग्निहोत्र में लीन थे, कोई यज्ञ में तत्पर थे,

श्लोक 3 (skanda.3.92.3)

केऽपि चाग्निसमाधानाः केऽपि स्मार्ता निरंतरम् । पुराणन्यायवेत्तारो वेदवेदांगवादिनः ।

ke'pi cāgnisamādhānāḥ ke'pi smārtā nirantaram purāṇanyāyavettāro vedavedāṅgavādinaḥ

कोई अग्नि की उपासना में निरंतर लगे रहते थे, कोई सदा स्मार्त कर्मों में लीन थे; वे पुराण और न्याय के ज्ञाता थे, वेद और वेदांगों के वक्ता थे।

श्लोक 4 (skanda.3.92.4)

सुखेन स्वान्सदाचारान्कुर्वन्तो ब्रह्मवादिनः । एवं धर्मसमाचारान्कुर्वतां कुशलात्मनाम् ।

sukhena svān sadācārān kurvanto brahmavādinaḥ evaṁ dharmasamācārān kurvatāṁ kuśalātmanām

वे सुखपूर्वक अपने सदाचार का पालन करते हुए ब्रह्मवादी थे। इस प्रकार जब वे कुशल-आत्मा ब्राह्मण धर्माचरण में लगे हुए थे,

श्लोक 5 (skanda.3.92.5)

स्थानाचारान्कुलाचारानधिदेव्याश्च भाषितान् । धर्मशास्त्रस्थितं सर्वं काजेशैरुदितं च यत् । परंपरागतं धर्म मूचुस्ते वाडवोत्तमाः ।

sthānācārān kulācārān adhidevyāś ca bhāṣitān dharmaśāstrasthitaṁ sarvaṁ kājeśair uditaṁ ca yat paraṁparāgataṁ dharmaṁ mūcus te vāḍavottamāḥ

तब उन श्रेष्ठ ब्राह्मणों ने स्थान के आचार, कुल के आचार, अधिष्ठात्री देवी के कहे गये वचन, तथा धर्मशास्त्र में स्थित और काजेश द्वारा कहा गया जो कुछ भी था - वह सब परंपरागत धर्म आपस में कहा।

श्लोक 6 (skanda.3.92.6)

ब्राह्मणा ऊचुः । उपास्ते यश्च लिखितं रक्तपादैस्तु वाडवाः । ज्ञातिश्रेष्ठः स विज्ञेयो वलिर्देयस्ततः परम् ।

brāhmaṇā ūcuḥ upāste yaś ca likhitaṁ raktapādais tu vāḍavāḥ jñātiśreṣṭhaḥ sa vijñeyo valir deyas tataḥ param

ब्राह्मणों ने कहा - जो ब्राह्मण रक्तपाद (लाल चरण-चिह्न) से लिखित को मान्य रखता है, वह ज्ञाति में श्रेष्ठ जाना जाए, और उसके बाद उसे बलि दी जाए।

श्लोक 7 (skanda.3.92.7)

रक्तचंदनं प्रसाध्याथ प्रसिद्धं स्वकुलं तथा । कुंकुमारक्तपादैस्तैर्गंधपुष्पादिचर्चितैः ।

raktacaṁdanaṁ prasādhyātha prasiddhaṁ svakulaṁ tathā kuṁkumāraktapādais tair gaṁdhapuṣpādicarcitaiḥ

लाल चंदन तैयार करके तथा अपने प्रसिद्ध कुल का उल्लेख करके, कुंकुम से रंगे उन चरण-चिह्नों को गंध-पुष्प आदि से पूजकर,

श्लोक 8 (skanda.3.92.8)

संभूय लिखितं तच्च रक्तपादं तदुच्यते । रामस्य लेख्यं ते सर्वे पूजयंतु समाहिताः ।

saṁbhūya likhitaṁ tac ca raktapādaṁ tad ucyate rāmasya lekhyaṁ te sarve pūjayaṁtu samāhitāḥ

सबने मिलकर जो लिखा जाता है, वही 'रक्तपाद' कहलाता है। श्रीराम के इस लेख्य को सब एकाग्रचित्त होकर पूजें।

श्लोक 9 (skanda.3.92.9)

रामस्य करमुद्रां च पूजयंतु द्विजाः सदा । येषां दोषाः सदाचारे व्यभिचारादयो यदि ।

rāmasya karamudrāṁ ca pūjayaṁtu dvijāḥ sadā yeṣāṁ doṣāḥ sadācāre vyabhicārādayo yadi

द्विजों को सदा श्रीराम की करमुद्रा (हस्त-चिह्न) का भी पूजन करना चाहिए। यदि जिनका आचरण में दोष हो - जैसे व्यभिचार आदि -

श्लोक 10 (skanda.3.92.10)

तेषां दण्डो विधेयस्तु य उक्तो विधिवद्विजैः । चिह्नं न राममुद्राया यावद्दंडं ददाति न ।

teṣāṁ daṇḍo vidheyas tu ya ukto vidhivad dvijaiḥ cihnaṁ na rāmamudrāyā yāvad daṁḍaṁ dadāti na

उन पर विधिपूर्वक ब्राह्मणों द्वारा कहा गया दंड लगाया जाए। जब तक वह दंड नहीं देता, तब तक उस पर श्रीराम की मुद्रा का चिह्न नहीं होगा।

श्लोक 11 (skanda.3.92.11)

विना दण्डप्रदानेन मुद्राचिह्नं न धार्यते । मुद्राहस्ताश्च विज्ञेया वाडवा नृपसत्तम ।

vinā daṇḍapradānena mudrācihnaṁ na dhāryate mudrāhastāś ca vijñeyā vāḍavā nṛpasattama

बिना दंड दिए मुद्रा का चिह्न धारण नहीं किया जा सकता। हे नृपश्रेष्ठ, जो ब्राह्मण मुद्राधारी हैं, वे ही मान्य समझे जाएँ।

श्लोक 12 (skanda.3.92.12)

पुत्रे जाते पिता दद्याच्छ्रीमात्रे तु बलिं सदा । पलानि विंशतिः सर्प्पिर्गुडः पंचपलानि च ।

putre jāte pitā dadyāc chrīmātre tu baliṁ sadā palāni viṁśatiḥ sarpir guḍaḥ pañcapalāni ca

पुत्र उत्पन्न होने पर पिता को सदा श्रीमाता को बलि देनी चाहिए - बीस पल घी और पाँच पल गुड़,

श्लोक 13 (skanda.3.92.13)

कुंकुमादिभिरभ्यर्च्य जातमात्रः सुतस्तदा । षष्ठे च दिवसे राजन्षष्ठीं पूजयते सदा ।

kuṁkumādibhir abhyarcya jātamātraḥ sutas tadā ṣaṣṭhe ca divase rājan ṣaṣṭhīṁ pūjayate sadā

कुंकुम आदि से पूजा करके, जैसे ही पुत्र जन्मे। फिर छठे दिन, हे राजन्, सदा षष्ठी देवी की पूजा करनी चाहिए।

श्लोक 14 (skanda.3.92.14)

दद्यात्तत्र बलिं साज्यं कुर्याद्धि बलिपंचकम् । पंचप्रस्थान्बलीन्दद्यात्सवस्त्राञ्छ्रीफलैर्युतान् ।

dadyāt tatra baliṁ sājyaṁ kuryād dhi balipañcakam pañcaprasthān balīn dadyāt savastrāñ chrīphalair yutān

वहाँ घी सहित बलि देनी चाहिए और पाँच प्रकार की बलि करनी चाहिए; वस्त्र और श्रीफल (नारियल) सहित पाँच प्रस्थ की बलि देनी चाहिए।

श्लोक 15 (skanda.3.92.15)

कुंकुमादिभिरभ्यर्च्य श्रीमात्रे भक्तिपूर्वकम् । वितशाठ्यं न कुर्वीत कुले संततिवृद्धये ।

kuṁkumādibhir abhyarcya śrīmātre bhaktipūrvakam vitaśāṭhyaṁ na kurvīta kule saṁtativṛddhaye

कुंकुम आदि से भक्तिपूर्वक श्रीमाता की पूजा करके, कुल में संतति की वृद्धि के लिए कभी छल नहीं करना चाहिए।

श्लोक 16 (skanda.3.92.16)

तद्धि चार्पयता द्रव्यं वृद्धौ यद्ध्रीणितं पुनः । जन्मनोऽनन्तरं कार्यं जातकर्म यथाविधि ।

tad dhi cārpayatā dravyaṁ vṛddhau yad dhrīṇitaṁ punaḥ janmano'nantaraṁ kāryaṁ jātakarma yathāvidhi

जो धन इस प्रकार अर्पित किया जाता है, वह पुनः वृद्धि में सहायक होता है। जन्म के अनंतर विधिपूर्वक जातकर्म संस्कार करना चाहिए।

श्लोक 17 (skanda.3.92.17)

विप्रानुकीर्तिता याश्च वृत्तिः सापि विभज्यते । प्रथमा लभ्यमाना च वृत्तिर्वै यावती पुनः ।

viprānukīrtitā yāś ca vṛttiḥ sāpi vibhajyate prathamā labhyamānā ca vṛttir vai yāvatī punaḥ

ब्राह्मणों के लिए जो वृत्ति (जीविका-भाग) घोषित की गई है, वह भी विभाजित की जाती है। पहले जो वृत्ति प्राप्त होती है, वह जितनी भी हो,

श्लोक 18 (skanda.3.92.18)

तस्या वृत्तेरर्द्धभागो गोत्रदेव्यै तु कल्प्यताम् । द्विगुणं वणिजा चैव पुत्रं जाते भवेदिति ।

tasyā vṛtter ardhabhāgo gotradevyai tu kalpyatām dviguṇaṁ vaṇijā caiva putraṁ jāte bhaved iti

उसका आधा भाग गोत्र-देवी के लिए निश्चित किया जाए। वणिकों के लिए यह कहा गया है कि पुत्र उत्पन्न होने पर देवी को दुगुना भाग दिया जाए।

श्लोक 19 (skanda.3.92.19)

मांडलीयाश्च ये शूद्रास्तेषामर्ककरं त्विदम् । अडालजानां त्रिगुणं गोभुजानां चतुर्गुणम् ।

māṇḍalīyāś ca ye śūdrās teṣām arkakaraṁ tv idam aḍālajānāṁ triguṇaṁ gobhujānāṁ caturguṇam

और जो मांडलीय शूद्र हैं, उनके लिए यह अर्क-कर (नियत देय) है; अडालज वालों के लिए तिगुना और गोभुज वालों के लिए चौगुना।

श्लोक 20 (skanda.3.92.20)

इत्येतत्कथितं सर्वमन्यच्च शूद्रजातिषु । यस्य दोषस्तु हत्यायाः समुद्भूतो विधेर्वशात् ।

ity etat kathitaṁ sarvam anyac ca śūdrajātiṣu yasya doṣas tu hatyāyāḥ samudbhūto vidhervaśāt

इस प्रकार यह सब कहा गया, और अन्य शूद्र जातियों के विषय में भी। जिसका दोष विधि के वशीभूत होकर हत्या तक पहुँच जाए,

श्लोक 21 (skanda.3.92.21)

दण्डस्तु विधिवत्तस्य कर्त्तव्यो वेदशास्त्रिभिः । अन्यायो न्यायवादी स्यान्निर्द्दोषे दोषदायकः ।

daṇḍas tu vidhivat tasya kartavyo vedaśāstribhiḥ anyāyo nyāyavādī syān nirdoṣe doṣadāyakaḥ

उसका दंड वेदशास्त्र के ज्ञाताओं द्वारा विधिपूर्वक किया जाए। जो न्यायवादी निर्दोष को दोष देता है, वही अन्याय है -

श्लोक 22 (skanda.3.92.22)

पंक्तिभेदस्य कर्ता च गोसहस्रवधः स्मृतः । वृत्तिभागविभजनं तथा न्यायविचारणम् । श्रीरामदूतकस्याग्रे कर्त्तव्यमिति निश्चयः ।

paṅktibhedasya kartā ca gosahasravadhaḥ smṛtaḥ vṛttibhāgavibhajanaṁ tathā nyāyavicāraṇam śrīrāmadūtakasyāgre kartavyam iti niścayaḥ

पंक्तिभेद करने वाला सहस्र गौओं के वध के समान माना गया है। वृत्ति के भाग का विभाजन तथा न्याय का विचार, श्रीराम के दूत (हनुमान) के सम्मुख ही किया जाना निश्चित है।

श्लोक 23 (skanda.3.92.23)

तस्य पूजां प्रकुर्वीत तदा कालेऽथवा सदा । तैलेन लेपयेत्तस्य देहे वै विघ्नशांतये ।

tasya pūjāṁ prakurvīta tadā kāle'thavā sadā tailena lepayet tasya dehe vai vighnaśāṁtaye

उस दूत की पूजा समय पर, या सदा ही, करनी चाहिए; विघ्नों की शांति के लिए उसके शरीर पर तेल का लेपन करना चाहिए।

श्लोक 24 (skanda.3.92.24)

धूपं दीपं फलं दद्यात्पुष्पैर्नानाविधैः किल । पूजितो हनुमानेव ददाति तस्य वांछितम् ।

dhūpaṁ dīpaṁ phalaṁ dadyāt puṣpair nānāvidhaiḥ kila pūjito hanumān eva dadāti tasya vāṁchitam

धूप, दीप, फल तथा नाना प्रकार के पुष्प अर्पित करने चाहिए; इस प्रकार पूजित हनुमान ही उसकी इच्छा पूर्ण करते हैं।

श्लोक 25 (skanda.3.92.25)

प्रतिपुत्रं तु तस्याग्रे कुर्यान्नान्यत्र कुत्रचित् । श्रीमाताबकुलस्वामिभागधेयं तु पूर्वतः ।

pratiputraṁ tu tasyāgre kuryān nānyatra kutracit śrīmātābakulasvāmibhāgadheyaṁ tu pūrvataḥ

प्रत्येक पुत्र के लिए यह पूजा उन्हीं के सम्मुख की जाए, अन्यत्र कहीं नहीं। पहले श्रीमाता और बकुलस्वामी का भाग दिया जाए,

श्लोक 26 (skanda.3.92.26)

पश्चात्प्रतिग्रहं विप्रैः कर्त्तव्यमिति निश्चितम् । समागमेषु विप्राणां न्यायान्यायविनिर्णये ।

paścāt pratigrahaṁ vipraiḥ kartavyam iti niścitam samāgameṣu viprāṇāṁ nyāyānyāyavinirṇaye

और उसके बाद ही ब्राह्मणों द्वारा प्रतिग्रह (दान ग्रहण) किया जाना चाहिए - यह निश्चित है। ब्राह्मणों की सभाओं में, न्याय-अन्याय के निर्णय में,

श्लोक 27 (skanda.3.92.27)

निर्णयं हृदये धृत्वा तत्रस्थं श्रावयेद्द्विजान् । केवलं धर्मबुद्ध्या च पक्षपातं विवर्जयेत् ।

nirṇayaṁ hṛdaye dhṛtvā tatrasthaṁ śrāvayed dvijān kevalaṁ dharmabuddhyā ca pakṣapātaṁ vivarjayet

निर्णय को हृदय में धारण करके, वहाँ उपस्थित द्विजों को सुनाना चाहिए। केवल धर्मबुद्धि से ही निर्णय लेकर पक्षपात का त्याग करना चाहिए।

श्लोक 28 (skanda.3.92.28)

सर्वेषां संमतं कार्यं तद्ध्यविकृतमेव च । आकारितस्ततो विप्रः सभायां भयमेति चेत् ।

sarveṣāṁ saṁmataṁ kāryaṁ tad dhy avikṛtam eva ca ākāritas tato vipraḥ sabhāyāṁ bhayam eti cet

जो सबको सम्मत हो, वही कार्य करना चाहिए, और उसे अपरिवर्तित रखना चाहिए। यदि सभा में बुलाया गया कोई ब्राह्मण भयभीत हो जाए,

श्लोक 29 (skanda.3.92.29)

न तस्य वाक्यं श्रोतव्यं निर्णीतार्थनिवारणे । यस्य वर्जस्तु क्रियते मिलित्वा सर्व वाडवैः ।

na tasya vākyaṁ śrotavyaṁ nirṇītārthanivāraṇe yasya varjas tu kriyate militvā sarva vāḍavaiḥ

तो निर्णीत विषय को टालने के लिए उसकी बात नहीं सुननी चाहिए। जिस किसी का सभी ब्राह्मण मिलकर बहिष्कार कर दें,

श्लोक 30 (skanda.3.92.30)

खानपानादिकं सर्वं कार्यं तेन विवर्जयेत् । तस्य कन्या न दातव्या तत्संसर्गी च तादृशः ।

khānapānādikaṁ sarvaṁ kāryaṁ tena vivarjayet tasya kanyā na dātavyā tatsaṁsargī ca tādṛśaḥ

उसके साथ खान-पान आदि सब कार्य त्याग देना चाहिए। उसे कन्या नहीं देनी चाहिए, और जो उसका संसर्गी हो, उसे भी नहीं।

श्लोक 31 (skanda.3.92.31)

ततो दंडं प्रकुर्वीत सर्वैरेव द्विजोत्तमैः । भोजनं कन्यकादानमिति दाशरथेर्मतम् ।

tato daṁḍaṁ prakurvīta sarvair eva dvijottamaiḥ bhojanaṁ kanyakādānam iti dāśarather matam

तब सभी श्रेष्ठ ब्राह्मणों को मिलकर दंड देना चाहिए - भोजन और कन्यादान का त्याग - यही दाशरथि (श्रीराम) का मत है।

श्लोक 32 (skanda.3.92.32)

यत्किंचित्कुरुते पापं लब्धुं स्थलमथापि वा । शुष्कार्द्रं वसते चान्ने तस्मादन्नं परित्यजेत् ।

yat kiṁcit kurute pāpaṁ labdhuṁ sthalam athāpi vā śuṣkārdraṁ vasate cānne tasmād annaṁ parityajet

जो कोई स्थान पाने के लिए या जीविका के लिए कुछ भी पाप करता है, और सूखे-गीले अन्न में भी वैसा ही बर्ताव करता है, उसके साथ अन्न-व्यवहार का त्याग कर देना चाहिए।

श्लोक 33 (skanda.3.92.33)

कुर्वंस्तत्पापभागी स्यात्तस्य दंडो यथाविधि । न्यायं न पश्यते यस्तु शक्तौ सत्यां सदा यतः ।

kurvaṁs tat pāpabhāgī syāt tasya daṁḍo yathāvidhi nyāyaṁ na paśyate yas tu śaktau satyāṁ sadā yataḥ

जो उसके साथ बना रहता है, वह भी उस पाप का भागी होता है; उसे भी विधिपूर्वक दंड मिलना चाहिए। और जो शक्ति होते हुए भी सदा न्याय नहीं देखता,

श्लोक 34 (skanda.3.92.34)

पापभागी स विज्ञेय इति सत्यं न संशयः । उत्कोचं यस्तु गृह्णाति पापिनां दुष्टकर्मिणाम् ।

pāpabhāgī sa vijñeya iti satyaṁ na saṁśayaḥ utkocaṁ yas tu gṛhṇāti pāpināṁ duṣṭakarmiṇām

वह पापभागी जाना जाए - यह सत्य है, इसमें कोई संशय नहीं। जो पापियों और दुष्टकर्मियों से घूस लेता है,

श्लोक 35 (skanda.3.92.35)

सकलं च भवेत्तस्य पापं नैवात्र संशयः । तस्यान्नं गृह्यते नैव कन्यापि न कदाचन ।

sakalaṁ ca bhavet tasya pāpaṁ naivātra saṁśayaḥ tasyānnaṁ gṛhyate naiva kanyāpi na kadācana

उन सबका पाप उसी को लगता है, इसमें कोई संदेह नहीं। उसका अन्न कभी ग्रहण न करें, न ही उसकी कन्या कभी स्वीकार करें।

श्लोक 36 (skanda.3.92.36)

हितमाचरते यस्तु पुत्राणामपि वै नरः । स एतान्नियमान्सर्वान्पालयेन्नात्र संशयः ।

hitam ācarate yas tu putrāṇām api vai naraḥ sa etān niyamān sarvān pālayen nātra saṁśayaḥ

किन्तु जो मनुष्य अपने पुत्रों तक का भी हित सोचकर आचरण करता है, वही इन सभी नियमों का पालन करे - इसमें कोई संशय नहीं।

श्लोक 37 (skanda.3.92.37)

एवं पत्रं लिखित्वा तु वाडवास्ते प्रहर्षिताः । प्राप्ते कलियुगे घोरे यथा पापं न कुर्वते । इति ज्ञात्वा तु सर्वे ते न्यायधर्मं प्रचक्रिरे ।

evaṁ patraṁ likhitvā tu vāḍavās te praharṣitāḥ prāpte kaliyuge ghore yathā pāpaṁ na kurvate iti jñātvā tu sarve te nyāyadharmaṁ pracakrire

इस प्रकार पत्र (चार्टर) लिखकर वे ब्राह्मण हर्षित हुए, यह सोचकर कि घोर कलियुग के आने पर वे पाप नहीं करेंगे; यह जानकर उन सबने यह न्यायधर्म स्थापित किया।

श्लोक 38 (skanda.3.92.38)

व्यास उवाच । कलौ प्राप्ते द्विजाः सर्वे स्थानभ्रष्टा यतस्ततः । पक्षमुत्कलं ग्रहीष्यंति तथा स्युः पक्षपातिनः ।

vyāsa uvāca kalau prāpte dvijāḥ sarve sthānabhraṣṭā yatastataḥ pakṣam utkalaṁ grahīṣyaṁti tathā syuḥ pakṣapātinaḥ

व्यास ने कहा - कलियुग के आने पर सभी ब्राह्मण अपने स्थान से भ्रष्ट होकर इधर-उधर भटकेंगे, अनुचित पक्ष ग्रहण करेंगे और पक्षपाती हो जाएँगे।

श्लोक 39 (skanda.3.92.39)

भोक्ष्यंते म्लेच्छकग्रामान्कोलाविध्वंसिभिः किल । वेदभ्रष्टाश्च ते विप्रा भविष्यंति कलौ युगे ।

bhokṣyaṁte mlecchakagrāmān kolāvidhvaṁsibhiḥ kila vedabhraṣṭāś ca te viprā bhaviṣyaṁti kalau yuge

वे म्लेच्छों के गाँवों में, कोल-विध्वंसकों के बीच जीवनयापन करेंगे; और वे ब्राह्मण कलियुग में वेदभ्रष्ट हो जाएँगे।

श्लोक 40 (skanda.3.92.40)

युधिष्ठिर उवाच । देशेदेशे गमिष्यंति ते विप्रा वणिजस्तथा । कथं वै ज्ञायते सर्वै केन चिह्नेन मारिष । यस्मिन्गोत्रे समुत्पन्ना वाडवा ये महाबलाः ।

yudhiṣṭhira uvāca deśedeśe gamiṣyaṁti te viprā vaṇijas tathā kathaṁ vai jñāyate sarvai kena cihnena mariṣa yasmin gotre samutpannā vāḍavā ye mahābalāḥ

युधिष्ठिर ने कहा - वे ब्राह्मण और वैसे ही वणिक भी देश-देश में जाएँगे; हे माननीय, वे सब किस प्रकार, किस चिह्न से पहचाने जाएँगे? जिस गोत्र में वे महाबली ब्राह्मण उत्पन्न हुए हों -

श्लोक 41 (skanda.3.92.41)

व्यास उवाच । ज्ञायते गोत्रसंज्ञाऽथ केचिच्चैव पराक्रमैः । यस्ययस्य च यत्कर्म तस्य तस्यावटंककः ।

vyāsa uvāca jñāyate gotrasaṁjñā'tha kecic caiva parākramaiḥ yasya yasya ca yat karma tasya tasyāvaṭaṁkakaḥ

व्यास ने कहा - वे गोत्र-नाम से पहचाने जाते हैं, और कुछ अपने पराक्रम से भी। जिस-जिसका जो कर्म होता है, वही उसका 'अवटंक' (उपनाम) बन जाता है।

श्लोक 42 (skanda.3.92.42)

अवटंकैर्हि ज्ञायंते नान्यथा ज्ञायते क्वचित् । गोत्रैश्च प्रवरैश्चैव अवटंकैर्नृपात्मज । ज्ञायंते हि द्विजा राजन्मोढ ब्राह्मणसत्तमाः ।

avaṭaṁkair hi jñāyaṁte nānyathā jñāyate kvacit gotraiś ca pravaraiś caiva avaṭaṁkair nṛpātmaja jñāyaṁte hi dvijā rājan moḍha brāhmaṇasattamāḥ

अवटंकों से ही वे पहचाने जाते हैं, अन्यथा कहीं भी नहीं पहचाने जाते। गोत्रों, प्रवरों और अवटंकों से ही, हे राजकुमार, वे मोढ ब्राह्मणश्रेष्ठ द्विज पहचाने जाते हैं, हे राजन्।

श्लोक 43 (skanda.3.92.43)

युधिष्ठिर उवाच । गोत्रैश्च प्रवरैश्चैव श्रुता एते तवाननात् । कां वा शाखामधीयानास्तन्मे ब्रूहि पितामह ।

yudhiṣṭhira uvāca gotraiś ca pravaraiś caiva śrutā ete tavānanāt kāṁ vā śākhām adhīyānās tan me brūhi pitāmaha

युधिष्ठिर ने कहा - गोत्रों और प्रवरों के विषय में मैंने आपके मुख से सुना। किन्तु वे किस शाखा का अध्ययन करते हैं, यह मुझे बताइए, हे पितामह।

श्लोक 44 (skanda.3.92.44)

व्यास उवाच । ज्ञायंते यत्रयत्रस्था माध्यंदिनीया महाबलाः । कौथमीं च समाश्रित्य केचिद्विप्रा गुणान्विताः ।

vyāsa uvāca jñāyaṁte yatrayatrasthā mādhyaṁdinīyā mahābalāḥ kauthamīṁ ca samāśritya kecid viprā guṇānvitāḥ

व्यास ने कहा - जहाँ-जहाँ वे रहते हैं, वहाँ वे प्रबल माध्यंदिनीय शाखा के अनुयायी माने जाते हैं; और कुछ गुणवान ब्राह्मण कौथुम शाखा का आश्रय लेते हैं,

श्लोक 45 (skanda.3.92.45)

ऋगथर्वणजा शाखा नष्टा सा च महामते । एवं वै वर्तमानास्ते वाडवा धर्मसंभवाः ।

ṛgatharvaṇajā śākhā naṣṭā sā ca mahāmate evaṁ vai vartamānās te vāḍavā dharmasaṁbhavāḥ

और, हे महामते, ऋक् तथा अथर्व से उत्पन्न शाखा लुप्त हो चुकी है। इस प्रकार धर्म से उत्पन्न वे ब्राह्मण इस रूप में विद्यमान रहे,

श्लोक 46 (skanda.3.92.46)

धर्मारण्ये महाभागाः पुत्रपौत्रान्विताऽभवन् । शूद्राः सर्वे महाभागाः पुत्रपौत्र समावृताः ।

dharmāraṇye mahābhāgāḥ putrapautrānvitā'bhavan śūdrāḥ sarve mahābhāgāḥ putrapautra samāvṛtāḥ

धर्मारण्य में वे महाभाग (श्रेष्ठ) पुत्र-पौत्रों से युक्त हुए। सभी महाभाग शूद्र भी पुत्र-पौत्रों से घिरे हुए थे,

श्लोक 47 (skanda.3.92.47)

धर्मारण्ये महातीर्थे सर्वे ते द्विजसेवकाः । अभवन्रामभक्ताश्च रामाज्ञां पालयंति च ।

dharmāraṇye mahātīrthe sarve te dvijasevakāḥ abhavan rāmabhaktāś ca rāmājñāṁ pālayaṁti ca

धर्मारण्य नामक उस महातीर्थ में, वे सब ब्राह्मणों की सेवा करने वाले थे; वे श्रीराम के भक्त बने और श्रीराम की आज्ञा का पालन करते हैं।

श्लोक 48 (skanda.3.92.48)

आज्ञामत्याऽऽदरेणेह हनूमंतश्च वीर्यवान् । पालयेत्सोऽपि चेदानीं सुप्राप्ते वै कलौ युगे ।

ājñām atyādareṇeha hanūmaṁtaś ca vīryavān pālayet so'pi cedānīṁ suprāpte vai kalau yuge

यहाँ अत्यंत आदर के साथ, बलशाली हनुमान भी उस आज्ञा का पालन करते हैं - अब भी, इस कलियुग के पूर्णतः प्राप्त होने पर भी।

श्लोक 49 (skanda.3.92.49)

अदृष्टरूपी हनुमांस्तत्र भ्रमति नित्यशः । त्रैविद्या वाडवा यत्र चातुर्विद्यास्तथैव च ।

adṛṣṭarūpī hanumāṁs tatra bhramati nityaśaḥ traividyā vāḍavā yatra cāturvidyās tathaiva ca

अदृश्य रूप में हनुमान वहाँ सदा विचरण करते हैं - जहाँ त्रैविद्य ब्राह्मण रहते हैं, और वैसे ही चातुर्विद्य भी।

श्लोक 50 (skanda.3.92.50)

सभायामुपविष्टा येऽन्यायात्पापं प्रकुर्वते । जयो हि न्यायकर्तॄणामजयोऽन्यायकारिणाम् ।

sabhāyām upaviṣṭā ye'nyāyāt pāpaṁ prakurvate jayo hi nyāyakartṝṇām ajayo'nyāyakāriṇām

सभा में बैठे जो लोग अन्याय से पाप करते हैं - न्याय करने वालों की ही जय होती है, और अन्याय करने वालों की पराजय।

श्लोक 51 (skanda.3.92.51)

सापराधे यस्तु पुत्रे ताते भ्रातरि चापि वा । पक्षपातं प्रकुर्वीत तस्य कुप्यति वायुजः ।

sāparādhe yas tu putre tāte bhrātari cāpi vā pakṣapātaṁ prakurvīta tasya kupyati vāyujaḥ

जो अपने दोषी पुत्र, पिता या भाई के प्रति भी पक्षपात करता है, उस पर वायुपुत्र (हनुमान) क्रोधित होते हैं।

श्लोक 52 (skanda.3.92.52)

कुपितो हनुमानेष धननाशं करोति वै । पुत्रनाशं करोत्येव धामनाशं तथैव च ।

kupito hanumān eṣa dhananāśaṁ karoti vai putranāśaṁ karoty eva dhāmanāśaṁ tathaiva ca

क्रोधित हुए यह हनुमान धन का नाश करते हैं, पुत्र का नाश भी करते हैं, और वैसे ही घर का भी नाश करते हैं।

श्लोक 53 (skanda.3.92.53)

सेवार्थं निर्मितः शूद्रो न विप्रान्परिषेवते । वृत्तिं वा न ददात्येव हनुमांस्तस्य कुप्यति ।

sevārthaṁ nirmitaḥ śūdro na viprān pariṣevate vṛttiṁ vā na dadāty eva hanumāṁs tasya kupyati

सेवा के लिए बनाया गया शूद्र यदि ब्राह्मणों की सेवा नहीं करता या उन्हें वृत्ति नहीं देता, तो हनुमान उस पर क्रोधित होते हैं।

श्लोक 54 (skanda.3.92.54)

अर्थनाशं पुत्रनाशं स्थाननाशं महाभयम् । कुरुते वायुपुत्रो हि रामवाक्यमनुस्मरन् ।

arthanāśaṁ putranāśaṁ sthānanāśaṁ mahābhayam kurute vāyuputro hi rāmavākyam anusmaran

धन का नाश, पुत्र का नाश, स्थान का नाश और महाभय - यह सब वायुपुत्र श्रीराम के वचन का स्मरण करते हुए करते हैं।

श्लोक 55 (skanda.3.92.55)

यत्र कुत्र स्थिता विप्राः शूद्रा वा नृपसत्तम । न निर्द्धना भवेयुस्ते प्रसादाद्राघवस्य च ।

yatra kutra sthitā viprāḥ śūdrā vā nṛpasattama na nirddhanā bhaveyus te prasādād rāghavasya ca

हे नृपश्रेष्ठ, जहाँ कहीं भी ब्राह्मण या शूद्र रहते हों, वे राघव की कृपा से कभी निर्धन नहीं होंगे।

श्लोक 56 (skanda.3.92.56)

यो मूढश्चाप्यधर्मात्मा पापपाषंडमाश्रितः । निजान्विप्रान्परित्यज्य परज्ञातींश्च मन्यते ।

yo mūḍhaś cāpy adharmātmā pāpapāṣaṁḍam āśritaḥ nijān viprān parityajya parajñātīṁś ca manyate

किन्तु जो मूढ़ और अधर्मात्मा, पाप-पाखंड का आश्रय लेकर, अपने ब्राह्मणों को त्यागकर दूसरी ज्ञातियों का सम्मान करता है,

श्लोक 57 (skanda.3.92.57)

तस्य पूर्वकृतं पुण्यं भस्मीभवति नान्यथा । अन्येषां दीयते दानं स्वल्पं वा यदि वा बहु ।

tasya pūrvakṛtaṁ puṇyaṁ bhasmībhavati nānyathā anyeṣāṁ dīyate dānaṁ svalpaṁ vā yadi vā bahu

उसका पहले किया हुआ पुण्य निश्चय ही भस्म हो जाता है। यदि दूसरों को दान दिया जाए, चाहे थोड़ा हो या बहुत,

श्लोक 58 (skanda.3.92.58)

यथा भवति वै पूर्वं ब्रह्मविष्णुशिवैः कृतम् । तस्य देवा न गृह्णंति हृव्यं कव्यं च पूर्वजाः ।

yathā bhavati vai pūrvaṁ brahmaviṣṇuśivaiḥ kṛtam tasya devā na gṛhṇaṁti hṛvyaṁ kavyaṁ ca pūrvajāḥ

जैसा कि पहले ब्रह्मा, विष्णु और शिव द्वारा स्थापित किया गया था - उस दान का हव्य देवता ग्रहण नहीं करते, न ही कव्य पितर ग्रहण करते हैं।

श्लोक 59 (skanda.3.92.59)

वंचयित्वा निजान्विप्रानन्येभ्यः प्रददेत्तु यः । तस्य जन्मार्जितं पुण्यं भस्मीभवति तत्क्षणात् ।

vaṁcayitvā nijān viprān anyebhyaḥ pradadet tu yaḥ tasya janmārjitaṁ puṇyaṁ bhasmībhavati tatkṣaṇāt

जो अपने ब्राह्मणों को ठगकर दूसरों को दान देता है, उसका जन्मभर का अर्जित पुण्य उसी क्षण भस्म हो जाता है।

श्लोक 60 (skanda.3.92.60)

ब्रह्मविष्णुशिवैश्चैव पूजिता ये द्विजोत्तमाः । तेषां ये विमुखाः शूद्रा रौरवे निवसंति ते ।

brahmaviṣṇuśivaiś caiva pūjitā ye dvijottamāḥ teṣāṁ ye vimukhāḥ śūdrā raurave nivasaṁti te

जिन उत्तम द्विजों की पूजा स्वयं ब्रह्मा, विष्णु और शिव ने की है, उनसे विमुख होने वाले शूद्र रौरव नरक में निवास करते हैं।

श्लोक 61 (skanda.3.92.61)

यो लौल्याच्च कुलाचारं गोत्राचारं प्रलोपयेत् । स्वाचारं यो न कुर्वीत कदाचिद्वै विमोहितः ।

yo laulyāc ca kulācāraṁ gotrācāraṁ pralopayet svācāraṁ yo na kurvīta kadācid vai vimohitaḥ

जो चंचलता से कुलाचार या गोत्राचार का लोप करता है, अथवा जो मोहवश कभी अपने आचार का पालन नहीं करता,

श्लोक 62 (skanda.3.92.62)

सर्वनाशो भवेत्तस्य भस्मीभवति तत्क्षणात् । तस्मात्सर्वः कुलाचारः स्थानाचारस्तथैव च ।

sarvanāśo bhavet tasya bhasmībhavati tatkṣaṇāt tasmāt sarvaḥ kulācāraḥ sthānācāras tathaiva ca

उसका सर्वनाश हो जाता है, वह उसी क्षण भस्म हो जाता है। इसलिए कुलाचार, स्थानाचार,

श्लोक 63 (skanda.3.92.63)

गोत्राचारः पालनीयो यथावित्तानुसारतः । एवं ते कथितं राजन्धर्मारण्यं पुरातनम् ।

gotrācāraḥ pālanīyo yathāvittānusārataḥ evaṁ te kathitaṁ rājan dharmāraṇyaṁ purātanam

और गोत्राचार का पालन अपनी सामर्थ्य के अनुसार करना चाहिए। हे राजन्, इस प्रकार तुम्हें यह प्राचीन धर्मारण्य बताया गया,

श्लोक 64 (skanda.3.92.64)

स्थापितं देवदेवैश्च ब्रह्मविष्णुशिवादिभिः । धर्मारण्यं कृतयुगे त्रेतायां सत्यमंदिरम् । द्वापरे वेदभवनं कालौ मोहेरकं स्मृतम् ।

sthāpitaṁ devadevaiś ca brahmaviṣṇuśivādibhiḥ dharmāraṇyaṁ kṛtayuge tretāyāṁ satyamaṁdiram dvāpare vedabhavanaṁ kālau moherakaṁ smṛtam

जो देवाधिदेव ब्रह्मा, विष्णु, शिव आदि द्वारा स्थापित किया गया - कृतयुग में धर्मारण्य, त्रेतायुग में सत्यमंदिर, द्वापर में वेदभवन, और कलियुग में मोहेरक नाम से स्मरण किया जाता है।

श्लोक 65 (skanda.3.92.65)

ब्रह्मोवाच । य इदं शृणुयात्पुत्र श्रद्धया परया युतः । धर्मारण्यस्य माहात्म्यं सर्वकिल्बिषनाशनम् ।

brahmovāca ya idaṁ śṛṇuyāt putra śraddhayā parayā yutaḥ dharmāraṇyasya māhātmyaṁ sarvakilbiṣanāśanam

ब्रह्मा ने कहा - हे पुत्र, जो कोई भी परम श्रद्धा से युक्त होकर धर्मारण्य की इस महिमा को सुनता है, जो समस्त पापों का नाश करने वाली है,

श्लोक 66 (skanda.3.92.66)

मनोवाक्कायजनितं पातकं त्रिविधं च यत् । तत्सर्वं नाशमायाति श्रवणात्कीर्तनात्सुकृत् ।

manovākkāyajanitaṁ pātakaṁ trividhaṁ ca yat tat sarvaṁ nāśam āyāti śravaṇāt kīrtanāt sukṛt

मन, वचन और शरीर से उत्पन्न जो त्रिविध पाप है, वह सब श्रवण और कीर्तन मात्र से ही, उस सुकृत के प्रभाव से, नाश को प्राप्त हो जाता है।

श्लोक 67 (skanda.3.92.67)

धन्यं यशस्यमायुष्यं सुखसंतानदायकम् । माहात्म्यं शृणुयाद्वत्स सर्वसौख्याप्तये नरः ।

dhanyaṁ yaśasyam āyuṣyaṁ sukhasaṁtānadāyakam māhātmyaṁ śṛṇuyād vatsa sarvasaukhyāptaye naraḥ

यह महिमा धन्य, यशस्वी, आयुष्यकारी तथा सुख और संतान देने वाली है। हे वत्स, सभी सुखों की प्राप्ति के लिए मनुष्य को यह महिमा सुननी चाहिए।

श्लोक 68 (skanda.3.92.68)

सर्वतीर्थेषु यत्पुण्यं सर्वक्षेत्रेषु यत्फलम् । तत्फलं समवाप्नोति धर्मारण्यस्य सेवनात् ।

sarvatīrtheṣu yat puṇyaṁ sarvakṣetreṣu yat phalam tat phalaṁ samavāpnoti dharmāraṇyasya sevanāt

सभी तीर्थों में जो पुण्य है, सभी क्षेत्रों में जो फल है - वही फल धर्मारण्य की सेवा से प्राप्त होता है।

श्लोक 69 (skanda.3.92.69)

नारद उवाच । धर्मारण्यस्य माहात्म्यं यच्छ्रुतं त्वन्मुखांबुजात् । धर्मवाप्यां यत्र धर्म्मस्तपस्तेपे सुदुष्कुरम् ।

nārada uvāca dharmāraṇyasya māhātmyaṁ yac chrutaṁ tvan mukhāṁbujāt dharmavāpyāṁ yatra dharmas tapas tepe suduṣkuram

नारद ने कहा - आपके मुखकमल से जो धर्मारण्य की यह महिमा मैंने सुनी - जहाँ धर्मवापी में स्वयं धर्म ने अत्यंत कठिन तपस्या की थी -

श्लोक 70 (skanda.3.92.70)

तस्य क्षेत्रस्य महिमा मया त्वत्तोऽवधारितः । स्वस्ति तेऽस्तु गमिष्यामि धर्मारण्यदिदृक्षया । तत्र वाक्यजलौघेन पावितोऽहं चतुर्मुख ।

tasya kṣetrasya mahimā mayā tvatto'vadhāritaḥ svasti te'stu gamiṣyāmi dharmāraṇyadidṛkṣayā tatra vākyajalaughena pāvito'haṁ caturmukha

उस क्षेत्र की महिमा मैंने आपसे भलीभाँति जान ली है। आपका कल्याण हो, मैं धर्मारण्य को देखने की इच्छा से अब जाऊँगा। हे चतुर्मुख, वहाँ मैं आपके वचनों की धारा से पहले ही पवित्र हो चुका हूँ।

श्लोक 71 (skanda.3.92.71)

व्यास उवाच । इदमाख्यानकं सर्वं कथितं पांडुनंदन । यच्छ्रुत्वा गोसहस्रस्य फलं प्राप्नोति मानवः ।

vyāsa uvāca idam ākhyānakaṁ sarvaṁ kathitaṁ pāṁḍunaṁdana yac chrutvā gosahasrasya phalaṁ prāpnoti mānavaḥ

व्यास ने कहा - हे पांडुनंदन, यह संपूर्ण आख्यान तुम्हें सुनाया गया; इसे सुनकर मनुष्य सहस्र गौओं के दान का फल प्राप्त करता है।

श्लोक 72 (skanda.3.92.72)

अपुत्रो लभते पुत्रान्निर्द्धनो धनवान्भवेत् । रोगी रोगात्प्रमुच्येत बद्धो मुच्येत बंधनात् ।

aputro labhate putrān nirddhano dhanavān bhavet rogī rogāt pramucyeta baddho mucyeta baṁdhanāt

पुत्रहीन को पुत्र मिलते हैं, निर्धन धनवान हो जाता है; रोगी रोग से मुक्त होता है, बंधन में पड़ा बंधन से मुक्त होता है।

श्लोक 73 (skanda.3.92.73)

विद्यार्थी लभते विद्यामुत्तमां कर्मसाधनाम् । तीर्थयात्राफलं तस्य कोटिकन्याफलं लभेत् ।

vidyārthī labhate vidyām uttamāṁ karmasādhanām tīrthayātrāphalaṁ tasya koṭikanyāphalaṁ labhet

विद्यार्थी उत्तम विद्या प्राप्त करता है, जो सत्कर्म का साधन है; उसे तीर्थयात्रा का फल तथा करोड़ कन्यादानों का फल प्राप्त होता है।

श्लोक 74 (skanda.3.92.74)

यः श्रृणोति नरो भक्त्या नारी वाथ नरोत्तम । निरयं नैव पश्यंति एकोत्तरशतैः सह ।

yaḥ śṛṇoti naro bhaktyā nārī vātha narottama nirayaṁ naiva paśyaṁti ekottaraśataiḥ saha

हे नरोत्तम, जो पुरुष या स्त्री भक्तिपूर्वक इसे सुनता है, वह अपनी एक सौ एक पीढ़ियों सहित नरक कभी नहीं देखता।

श्लोक 75 (skanda.3.92.75)

शुभे देशे निवेश्याथ क्षौमवस्त्रादिभिस्तथा । पुराणपुस्तकं राजन्प्रयतः शिष्टसंमतः ।

śubhe deśe niveśyātha kṣaumavastrādibhis tathā purāṇapustakaṁ rājan prayataḥ śiṣṭasaṁmataḥ

शुभ स्थान में इसे स्थापित करके तथा रेशमी वस्त्रों आदि से सुसज्जित करके, हे राजन्, संयमी और शिष्टजन-सम्मत व्यक्ति इस पुराण-पुस्तक की,

श्लोक 76 (skanda.3.92.76)

अर्चयेच्च यथा न्यायं गंधमाल्यैः पृथक्पृथक् । समाप्तौ नृप ग्रंथस्य वाचकस्यानुपूजनम् ।

arcayec ca yathā nyāyaṁ gaṁdhamālyaiḥ pṛthakpṛthak samāptau nṛpa graṁthasya vācakasyānupūjanam

गंध और माला से यथाविधि, अलग-अलग, इसकी पूजा करे। हे राजन्, ग्रंथ की समाप्ति पर वाचक (पाठ करने वाले) का भी पूजन करना चाहिए,

श्लोक 77 (skanda.3.92.77)

दानादिभिर्यथान्यायं संपूर्णफलहेतवे । मुद्रिकां कुंडले चैव ब्रह्मसूत्रं हिरण्मयम् ।

dānādibhir yathānyāyaṁ saṁpūrṇaphalahetave mudrikāṁ kuṁḍale caiva brahmasūtraṁ hiraṇmayam

दान आदि द्वारा यथान्याय, संपूर्ण फल की प्राप्ति के लिए - अंगूठी, कुंडल और स्वर्णमय यज्ञोपवीत,

श्लोक 78 (skanda.3.92.78)

वस्त्राणि च विचित्राणि गंधमाल्यानुलेपनैः । देववत्पूजनं कृत्वा गां च दद्यात्पयस्विनीम् ।

vastrāṇi ca vicitrāṇi gaṁdhamālyānulepanaiḥ devavat pūjanaṁ kṛtvā gāṁ ca dadyāt payasvinīm

विविध वस्त्र, गंध, माला और अनुलेपन सहित। देवता के समान पूजन करके, दुधारू गाय भी दान में देनी चाहिए।

श्लोक 79 (skanda.3.92.79)

एवं विधानतः श्रुत्वा धर्मारण्यकथानकम् । धर्मारण्यनिवासस्य फलमाप्नोत्यसंशयम् ।

evaṁ vidhānataḥ śrutvā dharmāraṇyakathānakam dharmāraṇyanivāsasya phalam āpnoty asaṁśayam

इस प्रकार विधिपूर्वक धर्मारण्य की इस कथा को सुनकर, मनुष्य निःसंदेह धर्मारण्य में निवास का फल प्राप्त करता है।

श्लोक 80 (skanda.3.92.80)

इति श्रीस्कांदे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां तृतीये ब्रह्मखण्डे पूर्वभागे धर्मारण्यमाहात्म्ये धर्मारण्यनिवासिव्यवस्थावर्णनपूर्वक धर्मारण्यपुराणश्रवणमाहात्म्यवर्णनं नाम चत्वारिंशोऽध्यायः ।

iti śrī skāṁde mahāpurāṇe ekāśītisāhasryāṁ saṁhitāyāṁ tṛtīye brahmakhaṇḍe pūrvabhāge dharmāraṇyamāhātmye dharmāraṇyanivāsivyavasthāvarṇanapūrvaka dharmāraṇyapurāṇaśravaṇamāhātmyavarṇanaṁ nāma catvāriṁśo'dhyāyaḥ

इस प्रकार श्री स्कन्द महापुराण की इक्यासी हज़ार श्लोकों वाली संहिता के तृतीय ब्रह्मखण्ड के पूर्वभाग में, धर्मारण्य-माहात्म्य में, धर्मारण्य-निवासी-व्यवस्था-वर्णनपूर्वक 'धर्मारण्य-पुराण-श्रवण-माहात्म्य-वर्णन' नामक चालीसवाँ अध्याय संपूर्ण हुआ।

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