ब्रह्म खण्ड · अध्याय 36
दुराचार-संसर्गदोष-शांति-कथन
श्लोक 1 (skanda.3.36.1)
श्रीसूत उवाच धनुष्कोटेस्तु माहात्म्यं भूयोऽपि प्रब्रवीम्यहम् दुराचाराभिधो यत्र स्नात्वा मुक्तो भवद्द्विजाः
śrīsūta uvāca dhanuṣkoṭestu māhātmyaṁ bhūyo'pi prabravīmyaham durācārābhidho yatra snātvā mukto bhavaddvijāḥ
श्रीसूत जी बोले - हे ब्राह्मणो, मैं पुनः धनुष्कोटि की महिमा कहता हूँ, जहाँ स्नान करके "दुराचार" नामक व्यक्ति मुक्त हो गया था।
श्लोक 2 (skanda.3.36.2)
मुनय ऊचुः दुराचाराभिधः कोऽसौ सूत तत्त्वार्थकोविद किंच पापं कृतं तेन दुराचारेण वै मुने
munaya ūcuḥ durācārābhidhaḥ ko'sau sūta tattvārthakovida kiṁca pāpaṁ kṛtaṁ tena durācāreṇa vai mune
मुनियों ने कहा - हे तत्त्वज्ञ सूत जी, वह "दुराचार" नामक व्यक्ति कौन था? हे मुनिवर, उस दुराचार ने कौन-सा पाप किया था?
श्लोक 3 (skanda.3.36.3)
कथं वा पातका न्मुक्तो धनुष्कोटौ निमज्जनात् एतच्छुश्रूषमाणानां विस्तराद्वद नो मुने
kathaṁ vā pātakā nmukto dhanuṣkoṭau nimajjanāt etacchuśrūṣamāṇānāṁ vistarādvada no mune
और धनुष्कोटि में डुबकी लगाने मात्र से वह पाप से कैसे मुक्त हुआ? हे मुनि, हम सुनने के इच्छुक हैं, कृपया विस्तार से बताइए।
श्लोक 4 (skanda.3.36.4)
श्रीसूत उवाच मुनयः श्रूयतां तस्य दुराचारस्य पातकम् स्नानेन धनुषः कोटौ यथा मुक्तश्च पातकात्
śrīsūta uvāca munayaḥ śrūyatāṁ tasya durācārasya pātakam snānena dhanuṣaḥ koṭau yathā muktaśca pātakāt
श्रीसूत जी बोले - हे मुनियो, सुनिए उस दुराचार के पाप का वृत्तांत, और यह भी कि किस प्रकार धनुष्कोटि में स्नान करके वह पाप से मुक्त हुआ।
श्लोक 5 (skanda.3.36.5)
दुराचाराभिधो विप्रो गौतमीतीरमाश्रितः कश्चिदस्ति द्विजाः पापी क्रूरकर्मरतः सदा
durācārābhidho vipro gautamītīramāśritaḥ kaścidasti dvijāḥ pāpī krūrakarmarataḥ sadā
गौतमी (गोदावरी) के तट पर रहने वाला "दुराचार" नामक एक ब्राह्मण था, हे द्विजो, जो सदा क्रूर कर्मों में लगा रहने वाला पापी था।
श्लोक 6 (skanda.3.36.6)
ब्रह्मघ्नैश्च सुरापैश्च स्तेयिभिर्गुरुतल्पगैः तदा संसर्गदुष्टोऽसौ तैः साकं न्यवसद्विजाः
brahmaghnaiśca surāpaiśca steyibhirgurutalpagaiḥ tadā saṁsargaduṣṭo'sau taiḥ sākaṁ nyavasadvijāḥ
वह ब्रह्महत्यारों, मद्यपायियों, चोरों और गुरुपत्नीगामियों के साथ रहता था; उनकी संगति से वह दूषित हो गया, हे द्विजो।
श्लोक 7 (skanda.3.36.7)
महापातकिसंसर्गं दोषेणास्य द्विजस्य वै ब्राह्मण्यं सकलं नष्टं निःशेषेण द्विजोत्तमाः
mahāpātakisaṁsargaṁ doṣeṇāsya dvijasya vai brāhmaṇyaṁ sakalaṁ naṣṭaṁ niḥśeṣeṇa dvijottamāḥ
महापातकियों की संगति के दोष से, हे श्रेष्ठ द्विजो, उस ब्राह्मण का सम्पूर्ण ब्राह्मणत्व निःशेष रूप से नष्ट हो गया।
श्लोक 8 (skanda.3.36.8)
महापातकिभिः सार्द्धं दिनमेकं तु यो द्विजः निवसेत्सादरं तस्य तत्क्षणाद्वै द्विजन्मनः
mahāpātakibhiḥ sārddhaṁ dinamekaṁ tu yo dvijaḥ nivasetsādaraṁ tasya tatkṣaṇādvai dvijanmanaḥ
जो ब्राह्मण महापातकियों के साथ आदरपूर्वक एक दिन भी रहता है, उसी क्षण उसके ब्राह्मणत्व का...
श्लोक 9 (skanda.3.36.9)
ब्राह्मणस्य तुरीयांशो नश्यत्येव न संशयः द्विदिनं सेवनात्स्पर्शाद्दर्शनाच्छयनात्तथा
brāhmaṇasya turīyāṁśo naśyatyeva na saṁśayaḥ dvidinaṁ sevanātsparśāddarśanācchayanāttathā
...चौथा भाग नष्ट हो जाता है, इसमें संदेह नहीं। दो दिन तक उनकी सेवा, स्पर्श, दर्शन अथवा साथ शयन करने से...
श्लोक 10 (skanda.3.36.10)
भोजनात्सह पंक्तौ च महापातकिभिर्द्विजाः द्वितीयभागो नश्येत ब्राह्मणस्य न संशयः
bhojanātsaha paṁktau ca mahāpātakibhirdvijāḥ dvitīyabhāgo naśyeta brāhmaṇasya na saṁśayaḥ
...तथा महापातकियों के साथ एक ही पंक्ति में भोजन करने से ब्राह्मण के ब्राह्मणत्व का दूसरा भाग नष्ट हो जाता है, इसमें संदेह नहीं।
श्लोक 11 (skanda.3.36.11)
त्रिदिनाच्च तृतीयांशो नश्यत्येव न संशयः चतुर्दिनाच्चतुर्थांशो विलयं याति हि ध्रुवम्
tridinācca tṛtīyāṁśo naśyatyeva na saṁśayaḥ caturdināccaturthāṁśo vilayaṁ yāti hi dhruvam
तीन दिन की संगति से तीसरा भाग नष्ट हो जाता है, यह निश्चित है; चार दिन की संगति से चौथा भाग निश्चय ही विलीन हो जाता है।
श्लोक 12 (skanda.3.36.12)
अतः परं तु तैः साकं शयनासनभोजनैः तत्तुल्यपातकी भूयान्महापातकसंभवात्
ataḥ paraṁ tu taiḥ sākaṁ śayanāsanabhojanaiḥ tattulyapātakī bhūyānmahāpātakasaṁbhavāt
इसके बाद भी जो उनके साथ शयन, आसन और भोजन करता रहता है, वह महापातक के कारण उन्हीं के समान महापातकी बन जाता है।
श्लोक 13 (skanda.3.36.13)
तेन ब्राह्मण्यहीनोऽयं दुराचाराभिधो द्विजाः ग्रस्तोऽभवद्भीषणेन वेतालेन बलीयसा
tena brāhmaṇyahīno'yaṁ durācārābhidho dvijāḥ grasto'bhavadbhīṣaṇena vetālena balīyasā
इस प्रकार ब्राह्मणत्व से हीन हो गया वह दुराचार नामक द्विज, हे द्विजो, एक भयंकर और बलशाली वेताल द्वारा ग्रस्त हो गया।
श्लोक 14 (skanda.3.36.14)
असौ परवशस्तेन वेतालेनातिपीडितः देशाद्देशं भ्रमन्विप्रा वनाच्चैव वनांतरम्
asau paravaśastena vetālenātipīḍitaḥ deśāddeśaṁ bhramanviprā vanāccaiva vanāṁtaram
उस वेताल के वश में पड़कर अत्यंत पीड़ित वह, हे विप्रो, देश-देश और वन-वन में भटकता फिरा।
श्लोक 15 (skanda.3.36.15)
पूर्वपुण्यविपाकेन दैवयोगेन स द्विजः रामचंद्रधनुष्कोटिं महापातकनाशनीम्
pūrvapuṇyavipākena daivayogena sa dvijaḥ rāmacaṁdradhanuṣkoṭiṁ mahāpātakanāśanīm
पूर्वजन्म के पुण्य के परिपाक और दैवयोग से वह ब्राह्मण, महापातक का नाश करने वाली रामचंद्र की धनुष्कोटि की ओर...
श्लोक 16 (skanda.3.36.16)
अनुद्रुतः पिशाचेन तेनाविष्टो ययौ द्विजाः न्यमज्जयत्स वेतालो धनुष्कोटिजले त्वमुम्
anudrutaḥ piśācena tenāviṣṭo yayau dvijāḥ nyamajjayatsa vetālo dhanuṣkoṭijale tvamum
...उस पिशाच से प्रेरित होकर, उससे आविष्ट होकर पहुँच गया, हे द्विजो; और उस वेताल ने उसे धनुष्कोटि के जल में डुबो दिया।
श्लोक 17 (skanda.3.36.17)
धनुष्कोटिजले सोऽयं वेतालेन प्रवेशितः उदतिष्ठत्क्षणादेव वेतालेन विमोचितः
dhanuṣkoṭijale so'yaṁ vetālena praveśitaḥ udatiṣṭhatkṣaṇādeva vetālena vimocitaḥ
धनुष्कोटि के जल में वेताल द्वारा डुबोया गया वह, अगले ही क्षण उठ खड़ा हुआ, वेताल से मुक्त होकर।
श्लोक 18 (skanda.3.36.18)
उत्थितोऽसौ द्विजो विप्रा धनुष्कोटिजलात्तदा स्वस्थो व्यचिंतयत्कोऽयं देशो जलधितीरतः
utthito'sau dvijo viprā dhanuṣkoṭijalāttadā svastho vyaciṁtayatko'yaṁ deśo jaladhitīrataḥ
धनुष्कोटि के जल से उठा हुआ वह ब्राह्मण, हे विप्रो, स्वस्थचित्त होकर सोचने लगा - "यह समुद्र के तट पर कौन-सा देश है,
श्लोक 19 (skanda.3.36.19)
कथं मयागतमिह गौतमीतीरवासिना इति चिंताकुलः सोऽयं धनुष्कोटिनिवासिनम्
kathaṁ mayāgatamiha gautamītīravāsinā iti ciṁtākulaḥ so'yaṁ dhanuṣkoṭinivāsinam
और गौतमी-तटवासी मैं यहाँ कैसे आ गया?" इस प्रकार चिंता से व्याकुल वह धनुष्कोटि-निवासी...
श्लोक 20 (skanda.3.36.20)
दत्तात्रेयं महात्मानं योगिप्रवरमुत्तमम् समागम्य प्रणम्यासौ दुराचारोऽभ्यभाषत
dattātreyaṁ mahātmānaṁ yogipravaramuttamam samāgamya praṇamyāsau durācāro'bhyabhāṣata
...महात्मा दत्तात्रेय, श्रेष्ठ योगियों में उत्तम, के पास जाकर, प्रणाम करके दुराचार ने कहा।
श्लोक 21 (skanda.3.36.21)
न जाने भगवन्देशः कतमोऽयं वदाधुना गौतमीतीरनिलयो दुराचाराभिधो ह्यहम्
na jāne bhagavandeśaḥ katamo'yaṁ vadādhunā gautamītīranilayo durācārābhidho hyaham
"हे भगवन्, मैं नहीं जानता यह कौन-सा देश है, अभी बताइए। मैं गौतमी-तटवासी 'दुराचार' नामक व्यक्ति हूँ।
श्लोक 22 (skanda.3.36.22)
कृपया ब्रूहि मे ब्रह्मन्मयात्र कथमागतम् इति पृष्टो मुनिस्तेन दुराचारेण सुव्रतः
kṛpayā brūhi me brahmanmayātra kathamāgatam iti pṛṣṭo munistena durācāreṇa suvrataḥ
हे ब्रह्मन्, कृपया मुझे बताइए मैं यहाँ कैसे आया।" इस प्रकार उस दुराचार द्वारा पूछे जाने पर सुव्रत मुनि ने...
श्लोक 23 (skanda.3.36.23)
ध्यात्वा मुहूर्तमवदद्दुराचारं घृणानिधिः महापातकिसंसर्गे दुराचार कृते पुरा
dhyātvā muhūrtamavadaddurācāraṁ ghṛṇānidhiḥ mahāpātakisaṁsarge durācāra kṛte purā
...क्षणभर ध्यान करके, दया के भंडार उन दत्तात्रेय ने दुराचार से कहा - "हे दुराचार, पूर्वकाल में महापातकियों की संगति से...
श्लोक 24 (skanda.3.36.24)
ब्राह्मण्यं नष्टमभवद्वेतालस्त्वां ततोऽग्रहीत् तेनाविष्टस्त्वमायातो विवशोऽत्र विमूढधीः
brāhmaṇyaṁ naṣṭamabhavadvetālastvāṁ tato'grahīt tenāviṣṭastvamāyāto vivaśo'tra vimūḍhadhīḥ
...तुम्हारा ब्राह्मणत्व नष्ट हो गया था, इसीलिए वेताल ने तुम्हें ग्रस लिया। उससे आविष्ट होकर, विवश और मोहित बुद्धि वाले तुम यहाँ लाए गए।
श्लोक 25 (skanda.3.36.25)
न्यमज्जयत्त्वां वेतालो धनुष्कोटिजलेऽत्र तु तत्र मज्जनमात्रेण विमुक्तः पातकाद्भवान्
nyamajjayattvāṁ vetālo dhanuṣkoṭijale'tra tu tatra majjanamātreṇa vimuktaḥ pātakādbhavān
उस वेताल ने तुम्हें यहाँ धनुष्कोटि के जल में डुबोया; और उस डुबकी मात्र से तुम पाप से मुक्त हो गए।
श्लोक 26 (skanda.3.36.26)
धनुष्कोटौ तु ये स्नानं पुण्ये कुर्वंति मानवाः तेषां नश्यंति वै सत्यं पंचपातकसंचयाः
dhanuṣkoṭau tu ye snānaṁ puṇye kurvaṁti mānavāḥ teṣāṁ naśyaṁti vai satyaṁ paṁcapātakasaṁcayāḥ
वास्तव में जो मनुष्य पुण्यमयी धनुष्कोटि में स्नान करते हैं, उनके पाँचों महापातकों के समूह भी नष्ट हो जाते हैं, यह सत्य है।
श्लोक 27 (skanda.3.36.27)
रामचंद्रधनुष्कोटावत्र मज्जनमात्रतः महापातकिसंसर्गदोषस्ते विलयं ययौ
rāmacaṁdradhanuṣkoṭāvatra majjanamātrataḥ mahāpātakisaṁsargadoṣaste vilayaṁ yayau
रामचंद्र की इस धनुष्कोटि में मात्र डुबकी लगाने से तुम्हारा महापातकियों की संगति का दोष विलीन हो गया।
श्लोक 28 (skanda.3.36.28)
तन्नाशादेव वेतालस्त्वां मुक्त्वा विलयं गतः त्वामग्रहीद्यो वेतालः पुरायं ब्राह्मणोऽभवत्
tannāśādeva vetālastvāṁ muktvā vilayaṁ gataḥ tvāmagrahīdyo vetālaḥ purāyaṁ brāhmaṇo'bhavat
उसी दोष के नष्ट होने से वेताल तुम्हें छोड़कर विलीन हो गया। जिस वेताल ने तुम्हें ग्रस्त किया था, वह पूर्वकाल में एक ब्राह्मण था।
श्लोक 29 (skanda.3.36.29)
सोऽयं भाद्रपदे मासे कृष्णपक्षे महालयम् पार्वणेन विधानेन पितॄणां नाकरोन्मुदा
so'yaṁ bhādrapade māse kṛṣṇapakṣe mahālayam pārvaṇena vidhānena pitṝṇāṁ nākaronmudā
उसने भाद्रपद मास के कृष्णपक्ष में विधिपूर्वक पार्वण-श्राद्ध द्वारा प्रसन्नतापूर्वक अपने पितरों का महालय-श्राद्ध नहीं किया था।
श्लोक 30 (skanda.3.36.30)
तेन स्वपितृभिः शप्तो वेतालत्वमगादयम् सोपि चास्य धनुष्कोटेरवलोकनमात्रतः
tena svapitṛbhiḥ śapto vetālatvamagādayam sopi cāsya dhanuṣkoṭeravalokanamātrataḥ
इसी कारण अपने ही पितरों द्वारा शापित होकर वह वेताल बन गया; परंतु उसने भी इस धनुष्कोटि के दर्शन मात्र से...
श्लोक 31 (skanda.3.36.31)
वेतालत्वं विहायेह विष्णुलोकम वाप्तवान् अतो भाद्रपदे मासे कृष्णपक्षे महालयम्
vetālatvaṁ vihāyeha viṣṇulokama vāptavān ato bhādrapade māse kṛṣṇapakṣe mahālayam
...वेतालत्व को त्यागकर विष्णुलोक प्राप्त कर लिया। इसलिए भाद्रपद मास के कृष्णपक्ष में महालय-श्राद्ध...
श्लोक 32 (skanda.3.36.32)
उद्दिश्य स्वपितॄन्ये तु न कुर्वन्त्यतिलोभतः महालोभयुतास्तेऽद्धा वेतालाः स्युर्न संशयः
uddiśya svapitṝnye tu na kurvantyatilobhataḥ mahālobhayutāste'ddhā vetālāḥ syurna saṁśayaḥ
...अपने पितरों के उद्देश्य से जो लोग अत्यंत लोभवश नहीं करते, वे महालोभी लोग निश्चय ही वेताल बनते हैं, इसमें संशय नहीं।
श्लोक 33 (skanda.3.36.33)
तस्माद्भाद्रपदे मासे कृष्णपक्षे महालयम् पितॄनुद्दिश्य शक्त्या ये ब्राह्मणान्वेदपारगान्
tasmādbhādrapade māse kṛṣṇapakṣe mahālayam pitṝnuddiśya śaktyā ye brāhmaṇānvedapāragān
इसलिए भाद्रपद मास के कृष्णपक्ष में जो लोग पितरों के निमित्त अपनी शक्ति के अनुसार वेदपारंगत ब्राह्मणों को...
श्लोक 34 (skanda.3.36.34)
भोजयेयुर्महान्नेन न ते विंदंति दुर्गतिम् यस्तु भाद्रपदे मासे कृष्णपक्षे महालयम्
bhojayeyurmahānnena na te viṁdaṁti durgatim yastu bhādrapade māse kṛṣṇapakṣe mahālayam
...प्रचुर अन्न से भोजन कराते हैं, वे दुर्गति को प्राप्त नहीं होते। और जो भाद्रपद मास के कृष्णपक्ष में महालय-श्राद्ध...
श्लोक 35 (skanda.3.36.35)
स्वशक्त्यनुगुणं विप्रमेकं द्वौ त्रीनकिंचनः भोजयेन्नहि दौर्गत्यं भवेदस्य कदाचन
svaśaktyanuguṇaṁ vipramekaṁ dvau trīnakiṁcanaḥ bhojayennahi daurgatyaṁ bhavedasya kadācana
...अपनी शक्ति के अनुसार एक, दो या तीन ब्राह्मणों को (अथवा निर्धन होने पर बिना भी) भोजन कराता है, उसे कभी दुर्गति नहीं होती।
श्लोक 36 (skanda.3.36.36)
अयं भाद्रपदे मासे पितॄणामनुपासनात् ययौ वेतालतां विप्रो यस्त्वां जग्राह पापिनम्
ayaṁ bhādrapade māse pitṝṇāmanupāsanāt yayau vetālatāṁ vipro yastvāṁ jagrāha pāpinam
यह भाद्रपद मास में पितरों की उपासना न करने के कारण ही वेतालत्व को प्राप्त हुआ वह ब्राह्मण था, जिसने तुम्हें, हे पापी, ग्रस लिया था।
श्लोक 37 (skanda.3.36.37)
कालो भाद्रपदमासमारभ्य वृश्चिकावधि महालयस्य कथितो मुनिभिस्तत्त्वदर्शिभिः
kālo bhādrapadamāsamārabhya vṛścikāvadhi mahālayasya kathito munibhistattvadarśibhiḥ
भाद्रपद मास से लेकर वृश्चिक-संक्रांति तक का काल महालय के लिए तत्त्वदर्शी मुनियों द्वारा कहा गया है।
श्लोक 38 (skanda.3.36.38)
मासो भाद्रपदः कालस्तत्रापि हि विशिष्यते कृष्ण पक्षो विशिष्टः स्याद्दुराचारक तत्र वै
māso bhādrapadaḥ kālastatrāpi hi viśiṣyate kṛṣṇa pakṣo viśiṣṭaḥ syāddurācāraka tatra vai
उसमें भी भाद्रपद मास विशेष है, और उसमें भी, हे दुराचार, कृष्णपक्ष विशेष माना गया है।
श्लोक 39 (skanda.3.36.39)
तस्मिञ्छुभे कृष्णपक्षे प्रथमायां तथा तिथौ श्राद्धं महालयं कुर्याद्यो नरो भक्तिपूर्वकम्
tasmiñchubhe kṛṣṇapakṣe prathamāyāṁ tathā tithau śrāddhaṁ mahālayaṁ kuryādyo naro bhaktipūrvakam
उस शुभ कृष्णपक्ष की प्रथमा तिथि को जो मनुष्य भक्तिपूर्वक महालय-श्राद्ध करता है,
श्लोक 40 (skanda.3.36.40)
तस्य प्रीणाति भगवान्पावकः सर्वपावनः स वह्निलोकमाप्नोति वह्निना सह मोदते
tasya prīṇāti bhagavānpāvakaḥ sarvapāvanaḥ sa vahnilokamāpnoti vahninā saha modate
उससे सर्वपावन भगवान अग्नि प्रसन्न होते हैं; वह वह्नि-लोक को प्राप्त होता है और अग्निदेव के साथ आनंद मनाता है।
श्लोक 41 (skanda.3.36.41)
तस्मै च ज्वलनो देवः सर्वैश्वर्यं ददात्यपि प्रथमायां तिथौ मर्त्यो यो न कुर्यान्महालयम्
tasmai ca jvalano devaḥ sarvaiśvaryaṁ dadātyapi prathamāyāṁ tithau martyo yo na kuryānmahālayam
और वे ज्वलनदेव उसे सम्पूर्ण ऐश्वर्य भी प्रदान करते हैं। परंतु जो मनुष्य प्रथमा तिथि को महालय नहीं करता,
श्लोक 42 (skanda.3.36.42)
वह्निर्गृहं दहेत्तस्य श्रियं क्षेत्रादिकं तथा वेदज्ञे ब्राह्मणे भुक्ते प्रथमायां महालये
vahnirgṛhaṁ dahettasya śriyaṁ kṣetrādikaṁ tathā vedajñe brāhmaṇe bhukte prathamāyāṁ mahālaye
अग्नि उसके घर, उसकी संपत्ति और खेत आदि को जला डालता है। प्रथमा तिथि के महालय में वेदज्ञ ब्राह्मण के भोजन कर लेने पर...
श्लोक 43 (skanda.3.36.43)
दश कल्पसहस्राणि पितरो यांति तृप्तताम् द्वितीयायां तु यो भक्त्या कुर्याच्छ्राद्धं महालयम्
daśa kalpasahasrāṇi pitaro yāṁti tṛptatām dvitīyāyāṁ tu yo bhaktyā kuryācchrāddhaṁ mahālayam
...उसके पितर दस हजार कल्पों तक तृप्ति को प्राप्त होते हैं। जो मनुष्य द्वितीया तिथि को भक्तिपूर्वक महालय-श्राद्ध करता है,
श्लोक 44 (skanda.3.36.44)
तस्य प्रीणाति भगवान्भवानीपतिरीश्वरः स कैलासमवाप्नोति शिवेन सह मोदते
tasya prīṇāti bhagavānbhavānīpatirīśvaraḥ sa kailāsamavāpnoti śivena saha modate
उससे भवानीपति भगवान ईश्वर प्रसन्न होते हैं; वह कैलास को प्राप्त होता है और शिवजी के साथ आनंद मनाता है।
श्लोक 45 (skanda.3.36.45)
विपुलां संपदं तस्मै प्रीतो दद्यान्महेश्वरः द्वितीयायां तिथौ मर्त्यो यो न कुर्यान्महालयम्
vipulāṁ saṁpadaṁ tasmai prīto dadyānmaheśvaraḥ dvitīyāyāṁ tithau martyo yo na kuryānmahālayam
प्रसन्न होकर महेश्वर उसे विपुल संपदा प्रदान करते हैं। परंतु जो मनुष्य द्वितीया तिथि को महालय नहीं करता,
श्लोक 46 (skanda.3.36.46)
तस्य वै कुपितः शंभुर्नाशयेद्ब्रह्मवर्चसम् रौरवं कालसूत्राख्यं नरकं चास्य दास्यति
tasya vai kupitaḥ śaṁbhurnāśayedbrahmavarcasam rauravaṁ kālasūtrākhyaṁ narakaṁ cāsya dāsyati
क्रुद्ध शंभु उसके ब्रह्मतेज का नाश कर देते हैं, और उसे रौरव तथा कालसूत्र नामक नरक प्रदान करते हैं।
श्लोक 47 (skanda.3.36.47)
वेदज्ञे ब्राह्मणे भुक्ते द्वितीयायां महालये विंशत्कल्प सहस्राणि पितरो यांति तृप्तताम्
vedajñe brāhmaṇe bhukte dvitīyāyāṁ mahālaye viṁśatkalpa sahasrāṇi pitaro yāṁti tṛptatām
द्वितीया तिथि के महालय में वेदज्ञ ब्राह्मण के भोजन करने पर उसके पितर बीस हजार कल्पों तक तृप्ति को प्राप्त होते हैं,
श्लोक 48 (skanda.3.36.48)
अनुग्रहात्पितॄणां च संततिश्चास्य वर्द्धते तृतीयायां नरो भक्त्या कुर्याच्छ्राद्धं महालयम्
anugrahātpitṝṇāṁ ca saṁtatiścāsya varddhate tṛtīyāyāṁ naro bhaktyā kuryācchrāddhaṁ mahālayam
और पितरों के अनुग्रह से उसकी संतति भी बढ़ती है। जो मनुष्य तृतीया तिथि को भक्तिपूर्वक महालय-श्राद्ध करता है,
श्लोक 49 (skanda.3.36.49)
तस्य प्रीणाति भगवाँल्लोकपालो धनाधिपः महापद्मादिनिधयो वर्तंते तस्य वै वशे
tasya prīṇāti bhagavāṁllokapālo dhanādhipaḥ mahāpadmādinidhayo vartaṁte tasya vai vaśe
उससे लोकपाल भगवान धनाधिप (कुबेर) प्रसन्न होते हैं; महापद्म आदि निधियाँ उसके वश में हो जाती हैं।
श्लोक 50 (skanda.3.36.50)
तस्यानुगास्त्रयो देवा ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः तृतीयायां तिथौ मर्त्यो यो न कुर्यान्महालयम्
tasyānugāstrayo devā brahmaviṣṇumaheśvarāḥ tṛtīyāyāṁ tithau martyo yo na kuryānmahālayam
ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर - ये तीनों देवता उसके अनुकूल हो जाते हैं। परंतु जो मनुष्य तृतीया तिथि को महालय नहीं करता,
श्लोक 51 (skanda.3.36.51)
धनदो भगवांस्तस्य संपदं हरति क्षणात् दारिद्यं च ददात्यस्मै बहुदुःखसमाकुलम्
dhanado bhagavāṁstasya saṁpadaṁ harati kṣaṇāt dāridyaṁ ca dadātyasmai bahuduḥkhasamākulam
भगवान धनद उसकी संपत्ति एक क्षण में हर लेते हैं, और उसे अनेक दुःखों से भरी दरिद्रता प्रदान करते हैं।
श्लोक 52 (skanda.3.36.52)
तृतीयायां तिथौ मर्त्यो यः करोति महालयम् तृप्यंति पितरस्तस्य त्रिंशत्कल्पसहस्रकम्
tṛtīyāyāṁ tithau martyo yaḥ karoti mahālayam tṛpyaṁti pitarastasya triṁśatkalpasahasrakam
तृतीया तिथि को जो मनुष्य महालय करता है, उसके पितर तीस हजार कल्पों तक तृप्त रहते हैं।
श्लोक 53 (skanda.3.36.53)
चतुर्थ्यां तु नरो भक्त्या श्राद्धं कुर्यान्महालयम् तस्य प्रीणाति भगवान्हेरंबः पार्वतीसुतः
caturthyāṁ tu naro bhaktyā śrāddhaṁ kuryānmahālayam tasya prīṇāti bhagavānheraṁbaḥ pārvatīsutaḥ
चतुर्थी को जो मनुष्य भक्तिपूर्वक महालय-श्राद्ध करता है, उससे भगवान हेरंब (गणेश), पार्वतीपुत्र, प्रसन्न होते हैं,
श्लोक 54 (skanda.3.36.54)
तस्य विघ्नाश्च नश्यंति गजवक्त्रप्रसादतः चतुर्थ्यां तु तिथौ मर्त्यो यो न कुर्यान्महालयम्
tasya vighnāśca naśyaṁti gajavaktraprasādataḥ caturthyāṁ tu tithau martyo yo na kuryānmahālayam
और गजमुख भगवान की कृपा से उसके सभी विघ्न नष्ट हो जाते हैं। परंतु जो मनुष्य चतुर्थी तिथि को महालय नहीं करता,
श्लोक 55 (skanda.3.36.55)
विघ्नेशो भगवांस्तस्य सदा विघ्नं करोति हि चण्डकोलाहलाभिख्ये नरके च पतत्यथ
vighneśo bhagavāṁstasya sadā vighnaṁ karoti hi caṇḍakolāhalābhikhye narake ca patatyatha
भगवान विघ्नेश सदैव उसके लिए विघ्न उत्पन्न करते हैं, और वह चण्डकोलाहल नामक नरक में गिरता है।
श्लोक 56 (skanda.3.36.56)
चतुर्थ्यां वै तिथौ मर्त्यो यः करोति महालयम् पितरः कल्पसाहस्रं चत्वारिंशत्प्रहर्षिताः
caturthyāṁ vai tithau martyo yaḥ karoti mahālayam pitaraḥ kalpasāhasraṁ catvāriṁśatpraharṣitāḥ
चतुर्थी तिथि को जो मनुष्य महालय करता है, उसके पितर चालीस हजार कल्पों तक अत्यंत प्रसन्न रहते हैं,
श्लोक 57 (skanda.3.36.57)
बहून्पुत्रान्प्रदास्यंति श्राद्धकर्तुर्निरंतरम् पंचम्यां तु तिथौ भक्त्या यो न कुर्यान्महालयम्
bahūnputrānpradāsyaṁti śrāddhakarturniraṁtaram paṁcamyāṁ tu tithau bhaktyā yo na kuryānmahālayam
और श्राद्धकर्ता को निरंतर बहुत-से पुत्र प्रदान करते हैं। परंतु जो पंचमी तिथि को भक्तिपूर्वक महालय नहीं करता,
श्लोक 58 (skanda.3.36.58)
तस्य लक्ष्मीर्भगवती परित्यजति मंदिरम् अलक्ष्मीः कलहाधारा तस्य प्रादुर्भवेद्गृहे
tasya lakṣmīrbhagavatī parityajati maṁdiram alakṣmīḥ kalahādhārā tasya prādurbhavedgṛhe
भगवती लक्ष्मी उसके घर को त्याग देती हैं, और कलह की आधारभूत अलक्ष्मी उसके घर में प्रकट होती है।
श्लोक 59 (skanda.3.36.59)
पचम्यां तु तिथौ मर्त्यो यः करोति महालयम् तस्य तृप्यंति पितरः पंचकल्पसहस्रके
pacamyāṁ tu tithau martyo yaḥ karoti mahālayam tasya tṛpyaṁti pitaraḥ paṁcakalpasahasrake
पंचमी तिथि को जो मनुष्य महालय करता है, उसके पितर पाँच हजार कल्पों तक तृप्त रहते हैं,
श्लोक 60 (skanda.3.36.60)
संततिं चाप्यविच्छिन्नामस्मै दास्यंति तर्पिताः पार्वती च प्रसन्ना स्यान्महदैश्वर्यदायिनी
saṁtatiṁ cāpyavicchinnāmasmai dāsyaṁti tarpitāḥ pārvatī ca prasannā syānmahadaiśvaryadāyinī
और तृप्त होकर वे उसे अखंडित संतति प्रदान करते हैं; तथा पार्वती जी प्रसन्न होकर महान ऐश्वर्य देती हैं।
श्लोक 61 (skanda.3.36.61)
षष्ठ्यां तिथौ नरो भक्त्या श्राद्धं कुर्यान्महालयम् तस्य प्रीणाति भगवान्षण्मुखः पार्वती सुतः
ṣaṣṭhyāṁ tithau naro bhaktyā śrāddhaṁ kuryānmahālayam tasya prīṇāti bhagavānṣaṇmukhaḥ pārvatī sutaḥ
षष्ठी तिथि को जो मनुष्य भक्तिपूर्वक महालय-श्राद्ध करता है, उससे भगवान षण्मुख (कार्तिकेय), पार्वतीपुत्र, प्रसन्न होते हैं,
श्लोक 62 (skanda.3.36.62)
तस्य पुत्राश्च पौत्राश्च षण्मुखस्य प्रसादतः ग्रहैर्वालग्रहैश्चैव न बाध्यंते कदाचन
tasya putrāśca pautrāśca ṣaṇmukhasya prasādataḥ grahairvālagrahaiścaiva na bādhyaṁte kadācana
और षण्मुख की कृपा से उसके पुत्र-पौत्र ग्रहों तथा बालग्रहों से कभी पीड़ित नहीं होते।
श्लोक 63 (skanda.3.36.63)
षष्ठ्यां तिथौ नरो भक्त्या यो न कुर्यान्महालयम् तस्य स्कन्दो महासेनो विमुखः स्यान्न संशयः
ṣaṣṭhyāṁ tithau naro bhaktyā yo na kuryānmahālayam tasya skando mahāseno vimukhaḥ syānna saṁśayaḥ
जो षष्ठी तिथि को भक्तिपूर्वक महालय नहीं करता, उससे महासेन स्कंद निश्चय ही विमुख हो जाते हैं।
श्लोक 64 (skanda.3.36.64)
गर्भान्निर्गतमात्रैव प्रजा तस्य विनश्यति पूतनादिग्रहकुलैर्बाध्यते च निरंतरम्
garbhānnirgatamātraiva prajā tasya vinaśyati pūtanādigrahakulairbādhyate ca niraṁtaram
उसकी संतान गर्भ से निकलते ही नष्ट हो जाती है, और वह पूतना आदि ग्रह-समूहों से निरंतर पीड़ित रहता है।
श्लोक 65 (skanda.3.36.65)
वह्निज्वालाप्रवेशाख्ये नरके च पतत्यधः षष्ठ्यां तिथौ यः श्रद्धावान्कुर्याच्छ्राद्धं महालयम्
vahnijvālāpraveśākhye narake ca patatyadhaḥ ṣaṣṭhyāṁ tithau yaḥ śraddhāvānkuryācchrāddhaṁ mahālayam
वह वह्निज्वालाप्रवेश नामक नरक में गिरता है। जो श्रद्धावान षष्ठी तिथि को महालय-श्राद्ध करता है,
श्लोक 66 (skanda.3.36.66)
षष्टिकल्पसहस्रं तु पितरो यामति तृप्तताम् पुत्रानपि प्रदास्यंति संपदं विपुलां तथा
ṣaṣṭikalpasahasraṁ tu pitaro yāmati tṛptatām putrānapi pradāsyaṁti saṁpadaṁ vipulāṁ tathā
उसके पितर साठ हजार कल्पों तक तृप्ति को प्राप्त होते हैं, और वे उसे पुत्र तथा विपुल संपदा भी प्रदान करते हैं।
श्लोक 67 (skanda.3.36.67)
सप्तम्यां तु तिथौ मर्त्यः श्राद्धं कुर्यान्महालयम् हिरण्यपाणिर्भगवानादित्यस्तस्य तुष्यति
saptamyāṁ tu tithau martyaḥ śrāddhaṁ kuryānmahālayam hiraṇyapāṇirbhagavānādityastasya tuṣyati
सप्तमी तिथि को जो मनुष्य महालय-श्राद्ध करता है, उससे स्वर्णहस्त भगवान आदित्य (सूर्य) संतुष्ट होते हैं।
श्लोक 68 (skanda.3.36.68)
अरोगो दृढगात्रः स्याद्भास्करस्य प्रसादतः हिरण्यपाणिर्भगवान्हिरण्यं पाणिना स्वयम्
arogo dṛḍhagātraḥ syādbhāskarasya prasādataḥ hiraṇyapāṇirbhagavānhiraṇyaṁ pāṇinā svayam
सूर्य की कृपा से वह नीरोग और सुदृढ़ शरीर वाला होता है। भगवान स्वर्णहस्त स्वयं अपने हाथ से स्वर्ण...
श्लोक 69 (skanda.3.36.69)
महालयश्राद्धकर्त्रे ददाति प्रीतमानसः सप्तम्यां तु तिथौ भक्त्या यो न कुर्यान्महालयम्
mahālayaśrāddhakartre dadāti prītamānasaḥ saptamyāṁ tu tithau bhaktyā yo na kuryānmahālayam
...महालय-श्राद्धकर्ता को प्रसन्नचित्त होकर प्रदान करते हैं। परंतु जो सप्तमी तिथि को भक्तिपूर्वक महालय नहीं करता,
श्लोक 70 (skanda.3.36.70)
व्याधिभिः क्षयरोगाद्यै बाध्यते स दिवानिशम् तीक्ष्णधारास्त्रशय्याख्ये नरके च पतत्यधः
vyādhibhiḥ kṣayarogādyai bādhyate sa divāniśam tīkṣṇadhārāstraśayyākhye narake ca patatyadhaḥ
वह दिन-रात क्षयरोग आदि व्याधियों से पीड़ित रहता है, और तीक्ष्णधारास्त्रशय्या नामक नरक में गिरता है।
श्लोक 71 (skanda.3.36.71)
सप्तम्यां यो नरो भक्त्या श्राद्धं कुर्यान्महालयम् सप्ततिं कल्पसाहस्रं प्रीणंति पितरोऽस्य वै
saptamyāṁ yo naro bhaktyā śrāddhaṁ kuryānmahālayam saptatiṁ kalpasāhasraṁ prīṇaṁti pitaro'sya vai
जो मनुष्य सप्तमी तिथि को भक्तिपूर्वक महालय-श्राद्ध करता है, उसके पितर सत्तर हजार कल्पों तक प्रसन्न रहते हैं,
श्लोक 72 (skanda.3.36.72)
संततिं चाप्यविच्छिन्नां दद्युः पितृगणाः सदा अष्टम्यां तु तिथौ मर्त्यः श्राद्धं कुर्यान्महाल यम्
saṁtatiṁ cāpyavicchinnāṁ dadyuḥ pitṛgaṇāḥ sadā aṣṭamyāṁ tu tithau martyaḥ śrāddhaṁ kuryānmahāla yam
और पितृगण उसे सदा अखंडित संतति प्रदान करते हैं। अष्टमी तिथि को जो मनुष्य महालय-श्राद्ध करता है,
श्लोक 73 (skanda.3.36.73)
मृत्युंजयः कृत्तिवासास्तस्य प्रीणाति शंकरः करस्थं तस्य कैवल्यं शंकरस्य प्रसादतः
mṛtyuṁjayaḥ kṛttivāsāstasya prīṇāti śaṁkaraḥ karasthaṁ tasya kaivalyaṁ śaṁkarasya prasādataḥ
उससे मृत्युंजय, गजचर्मधारी भगवान शंकर प्रसन्न होते हैं; शंकर की कृपा से कैवल्य (मोक्ष) उसके हाथ में ही रहता है।
श्लोक 74 (skanda.3.36.74)
महालयेन श्राद्धेन तुष्टे साक्षात्त्रि यंबके चतुर्दशसु लोकेषु दुर्लभं तस्य किं भवेत्
mahālayena śrāddhena tuṣṭe sākṣāttri yaṁbake caturdaśasu lokeṣu durlabhaṁ tasya kiṁ bhavet
जब स्वयं त्रिनेत्रधारी शिव महालय-श्राद्ध से संतुष्ट हो जाते हैं, तो चौदह लोकों में उसके लिए क्या दुर्लभ रह जाता है?
श्लोक 75 (skanda.3.36.75)
महालयं न कुर्याद्वै योऽष्टम्यां मूढचेतनः संसारसागरे घोरे सदा मज्जति दुःखितः
mahālayaṁ na kuryādvai yo'ṣṭamyāṁ mūḍhacetanaḥ saṁsārasāgare ghore sadā majjati duḥkhitaḥ
जो मूढ़चेता अष्टमी तिथि को महालय नहीं करता, वह सदा घोर संसार-सागर में दुःखी होकर डूबता रहता है।
श्लोक 76 (skanda.3.36.76)
कदाचिदपि तस्येष्टं नैव सिद्ध्यति भूतले वैतरिण्याख्यनरके पतत्याचंद्रतारकम्
kadācidapi tasyeṣṭaṁ naiva siddhyati bhūtale vaitariṇyākhyanarake patatyācaṁdratārakam
उसकी कोई भी इच्छा पृथ्वी पर कभी सिद्ध नहीं होती, और वह चंद्र-तारे रहने तक वैतरणी नामक नरक में पड़ा रहता है।
श्लोक 77 (skanda.3.36.77)
योऽष्टम्यां श्रद्धया श्राद्धं नरः कुर्यान्महालयम् अशीतिकल्पसाहस्रं तृप्यंति पितरोऽस्य वै
yo'ṣṭamyāṁ śraddhayā śrāddhaṁ naraḥ kuryānmahālayam aśītikalpasāhasraṁ tṛpyaṁti pitaro'sya vai
जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक अष्टमी तिथि को महालय-श्राद्ध करता है, उसके पितर अस्सी हजार कल्पों तक तृप्त रहते हैं।
श्लोक 78 (skanda.3.36.78)
आशीर्भिर्वर्द्धयंत्येनं विघ्नश्चास्य व्यपोहति संततिं चाप्यविच्छिन्नां दद्युः पितृगणाः सदा
āśīrbhirvarddhayaṁtyenaṁ vighnaścāsya vyapohati saṁtatiṁ cāpyavicchinnāṁ dadyuḥ pitṛgaṇāḥ sadā
वे आशीर्वाद से उसे समृद्ध करते हैं और उसके विघ्न दूर करते हैं; पितृगण उसे सदा अखंडित संतति प्रदान करते हैं।
श्लोक 79 (skanda.3.36.79)
नवम्यां तु तिथौ मर्त्यः श्राद्धं कुर्यान्महालयम् दुर्गादेवी भगवती तस्य प्रीणाति शांभवी
navamyāṁ tu tithau martyaḥ śrāddhaṁ kuryānmahālayam durgādevī bhagavatī tasya prīṇāti śāṁbhavī
नवमी तिथि को जो मनुष्य महालय-श्राद्ध करता है, उससे शांभवी भगवती दुर्गादेवी प्रसन्न होती हैं।
श्लोक 80 (skanda.3.36.80)
क्षयापस्मारकुष्ठा दीन्क्षुद्रप्रेतपिशाचकान् नाशयेत्तस्य सन्तुष्टा दुर्गा महिषमर्दिनी
kṣayāpasmārakuṣṭhā dīnkṣudrapretapiśācakān nāśayettasya santuṣṭā durgā mahiṣamardinī
संतुष्ट हुई महिषासुरमर्दिनी दुर्गा उसके लिए क्षयरोग, मिर्गी, कुष्ठ आदि रोगों तथा क्षुद्र प्रेत-पिशाचों का नाश कर देती हैं।
श्लोक 81 (skanda.3.36.81)
नवम्यां तु तिथौ मर्त्यो यो न कुर्यान्महालयम् अपस्मारेण पीड्येत तथैव ब्रह्मरक्षसा
navamyāṁ tu tithau martyo yo na kuryānmahālayam apasmāreṇa pīḍyeta tathaiva brahmarakṣasā
जो मनुष्य नवमी तिथि को महालय नहीं करता, वह मिर्गी से तथा ब्रह्मराक्षस से पीड़ित होता है,
श्लोक 82 (skanda.3.36.82)
अभिचारार्थकृत्याभिर्वाध्येत च निरन्तरम् नवम्यां यस्तिथौ मर्त्यः श्राद्धं कुर्यान्महालयम्
abhicārārthakṛtyābhirvādhyeta ca nirantaram navamyāṁ yastithau martyaḥ śrāddhaṁ kuryānmahālayam
और अभिचार-कृत्याओं द्वारा निरंतर सताया जाता है। जो मनुष्य नवमी तिथि को महालय-श्राद्ध करता है,
श्लोक 83 (skanda.3.36.83)
नवतिं कल्पसाहस्रं तृप्यन्ति पितरोऽस्य वै संततिं चाप्यविच्छिन्नां दद्युः पितृगणाः सदा
navatiṁ kalpasāhasraṁ tṛpyanti pitaro'sya vai saṁtatiṁ cāpyavicchinnāṁ dadyuḥ pitṛgaṇāḥ sadā
उसके पितर नब्बे हजार कल्पों तक तृप्त रहते हैं, और पितृगण उसे सदा अखंडित संतति प्रदान करते हैं।
श्लोक 84 (skanda.3.36.84)
दशम्यां तु तिथौ मर्त्यः श्राद्धं कुर्यान्महालयम् तस्यामृतकलश्चन्द्रः षोडशात्मा प्रसीदति
daśamyāṁ tu tithau martyaḥ śrāddhaṁ kuryānmahālayam tasyāmṛtakalaścandraḥ ṣoḍaśātmā prasīdati
दशमी तिथि को जो मनुष्य महालय-श्राद्ध करता है, उससे अमृतकला वाले, सोलह कलाओं से युक्त चंद्रमा प्रसन्न होते हैं।
श्लोक 85 (skanda.3.36.85)
औषधीनामधीशेऽस्मिञ्छ्राद्धेनानेन तोषिते व्रीह्यादीनि तु धान्यानि दद्युरोषधयः सदा
auṣadhīnāmadhīśe'smiñchrāddhenānena toṣite vrīhyādīni tu dhānyāni dadyuroṣadhayaḥ sadā
औषधियों के इस अधीश्वर के इस श्राद्ध से संतुष्ट होने पर, औषधियाँ सदा धान आदि अन्न प्रदान करती हैं।
श्लोक 86 (skanda.3.36.86)
यो न कुर्याद्दशम्यां तु महालयमनुत्तमम् ओषध्यो निष्फलास्तस्य कृषिश्चाप्यस्य निष्फला
yo na kuryāddaśamyāṁ tu mahālayamanuttamam oṣadhyo niṣphalāstasya kṛṣiścāpyasya niṣphalā
जो दशमी तिथि को यह सर्वोत्तम महालय नहीं करता, उसके लिए औषधियाँ निष्फल हो जाती हैं, और उसकी खेती भी निष्फल हो जाती है।
श्लोक 87 (skanda.3.36.87)
दशम्यां यस्तिथौ मर्त्यः श्राद्धंकुर्यान्महालयम् शतकल्पसहस्राणि तृप्यंति पितरोऽस्य वै
daśamyāṁ yastithau martyaḥ śrāddhaṁkuryānmahālayam śatakalpasahasrāṇi tṛpyaṁti pitaro'sya vai
दशमी तिथि को जो मनुष्य महालय-श्राद्ध करता है, उसके पितर एक लाख कल्पों तक तृप्त रहते हैं,
श्लोक 88 (skanda.3.36.88)
संततिं चाप्यविच्छिन्नां दद्युः पितृगणाः सदा एकादश्यां नरो भक्त्या श्राद्धं कुर्यान्महालयम्
saṁtatiṁ cāpyavicchinnāṁ dadyuḥ pitṛgaṇāḥ sadā ekādaśyāṁ naro bhaktyā śrāddhaṁ kuryānmahālayam
और पितृगण उसे सदा अखंडित संतति प्रदान करते हैं। एकादशी तिथि को जो मनुष्य भक्तिपूर्वक महालय-श्राद्ध करता है,
श्लोक 89 (skanda.3.36.89)
संहर्ता सर्वलोकस्य तस्य रुद्रः प्रसीदति रुद्रस्य सर्वसंहर्तुः प्रसादेन जगत्पतेः
saṁhartā sarvalokasya tasya rudraḥ prasīdati rudrasya sarvasaṁhartuḥ prasādena jagatpateḥ
उससे समस्त लोकों के संहारक रुद्र प्रसन्न होते हैं; जगत्पति, सर्वसंहारक रुद्र की कृपा से...
श्लोक 90 (skanda.3.36.90)
शत्रून्पराजय त्येष श्राद्धकर्ता निरन्तरम् ब्रह्महत्यायुतं चापि तस्य नश्यति तत्क्षणात्
śatrūnparājaya tyeṣa śrāddhakartā nirantaram brahmahatyāyutaṁ cāpi tasya naśyati tatkṣaṇāt
...यह श्राद्धकर्ता निरंतर अपने शत्रुओं को परास्त करता है, और दस हजार ब्रह्महत्याओं के समान पाप भी उसका उसी क्षण नष्ट हो जाता है।
श्लोक 91 (skanda.3.36.91)
अग्निष्टोमादियज्ञानां फलमाप्नोति पुष्कलम् एकादश्यां नरो भक्त्या यो न कुर्यान्महालयम्
agniṣṭomādiyajñānāṁ phalamāpnoti puṣkalam ekādaśyāṁ naro bhaktyā yo na kuryānmahālayam
वह अग्निष्टोम आदि यज्ञों का प्रचुर फल प्राप्त करता है। जो मनुष्य एकादशी तिथि को भक्तिपूर्वक महालय नहीं करता,
श्लोक 92 (skanda.3.36.92)
तस्य वै विमुखो रुद्रो न प्रसीदति कर्हिचित् सर्वतो वर्धमानाश्च बाधन्ते शत्रवो ह्यमुम्
tasya vai vimukho rudro na prasīdati karhicit sarvato vardhamānāśca bādhante śatravo hyamum
उससे रुद्र विमुख हो जाते हैं और कभी प्रसन्न नहीं होते; और चारों ओर बढ़ते हुए शत्रु उसे पीड़ित करते हैं।
श्लोक 93 (skanda.3.36.93)
अग्निष्टोमादिका यज्ञाः कृताश्च बहुदक्षिणाः निष्फला एव तस्य स्युर्भस्मनि न्यस्तहव्यवत्
agniṣṭomādikā yajñāḥ kṛtāśca bahudakṣiṇāḥ niṣphalā eva tasya syurbhasmani nyastahavyavat
प्रचुर दक्षिणा देकर किए गए अग्निष्टोम आदि यज्ञ भी उसके लिए भस्म में डाली गई आहुति के समान निष्फल हो जाते हैं।
श्लोक 94 (skanda.3.36.94)
ब्रह्मवातकतुल्यः स्याच्छ्राद्धाकरणदोषतः एकादश्यां तिथौ यस्तु श्राद्धं कुर्यान्महालयम्
brahmavātakatulyaḥ syācchrāddhākaraṇadoṣataḥ ekādaśyāṁ tithau yastu śrāddhaṁ kuryānmahālayam
श्राद्ध न करने के दोष से वह ब्रह्मवातक रोग से ग्रस्त के समान हो जाता है। परंतु जो एकादशी तिथि को महालय-श्राद्ध करता है,
श्लोक 95 (skanda.3.36.95)
द्विशतं कल्पसाहस्रं तृप्यंति पितरोऽस्य वै संततिं चाप्यविच्छिन्नां दद्युः पितृ गणाः सदा
dviśataṁ kalpasāhasraṁ tṛpyaṁti pitaro'sya vai saṁtatiṁ cāpyavicchinnāṁ dadyuḥ pitṛ gaṇāḥ sadā
उसके पितर दो लाख कल्पों तक तृप्त रहते हैं, और पितृगण उसे सदा अखंडित संतति प्रदान करते हैं।
श्लोक 96 (skanda.3.36.96)
द्वादश्यां तु तिथौ मर्त्यः कुर्याच्छ्राद्धं महालयम् तस्य लक्ष्मीपतिः साक्षात्प्रसीदति जनार्दनः
dvādaśyāṁ tu tithau martyaḥ kuryācchrāddhaṁ mahālayam tasya lakṣmīpatiḥ sākṣātprasīdati janārdanaḥ
द्वादशी तिथि को जो मनुष्य महालय-श्राद्ध करता है, उससे लक्ष्मीपति भगवान जनार्दन साक्षात् प्रसन्न होते हैं।
श्लोक 97 (skanda.3.36.97)
प्रसन्ने सति देवेशे देवदेवे जनार्दने चराचरं जगत्सर्वं प्रीतमेव न संशयः
prasanne sati deveśe devadeve janārdane carācaraṁ jagatsarvaṁ prītameva na saṁśayaḥ
देवेश देवाधिदेव जनार्दन के प्रसन्न होने पर, संपूर्ण चराचर जगत भी प्रसन्न ही होता है, इसमें संशय नहीं।
श्लोक 98 (skanda.3.36.98)
भूमिर्हरिप्रिया चास्य सस्यं संवर्द्धयत्यपि लक्ष्मीश्च वर्द्धते तस्य मंदिरे हरिवल्लभा
bhūmirharipriyā cāsya sasyaṁ saṁvarddhayatyapi lakṣmīśca varddhate tasya maṁdire harivallabhā
हरिप्रिया पृथ्वी उसकी फसल को समृद्ध करती है, और हरि की प्रिया लक्ष्मी उसके घर में बढ़ती हैं।
श्लोक 99 (skanda.3.36.99)
गदा कौमोदकी नाम नारायणकरस्थिता अपस्मारादिभूतानि नाशयत्येव सर्वदा
gadā kaumodakī nāma nārāyaṇakarasthitā apasmārādibhūtāni nāśayatyeva sarvadā
नारायण के हाथ में स्थित कौमोदकी नामक गदा उसकी मिर्गी आदि व्याधियों तथा भूत-बाधाओं का सदा नाश करती है।
श्लोक 100 (skanda.3.36.100)
तीक्ष्णधारं तथा चक्रं शत्रूनस्य दहत्यपि यातुधानपिशाचादीञ्छंखश्चास्य व्यपोहति
tīkṣṇadhāraṁ tathā cakraṁ śatrūnasya dahatyapi yātudhānapiśācādīñchaṁkhaścāsya vyapohati
इसी प्रकार तीक्ष्णधार चक्र उसके शत्रुओं को भस्म कर देता है, और शंख उसके लिए राक्षस-पिशाच आदि को दूर भगा देता है।
श्लोक 101 (skanda.3.36.101)
एवं सर्वात्मना पीडां वारयत्यस्य केशवः महालयं न कुर्याद्यो द्वादश्यां मनुजा धम
evaṁ sarvātmanā pīḍāṁ vārayatyasya keśavaḥ mahālayaṁ na kuryādyo dvādaśyāṁ manujā dhama
इस प्रकार केशव अपने सम्पूर्ण रूप से उसकी सब पीड़ाओं का निवारण करते हैं। किंतु जो नराधम द्वादशी तिथि को महालय नहीं करता,
श्लोक 102 (skanda.3.36.102)
तस्य क्षेत्राणि संपच्च विनश्यंति न संशयः अपस्मारादिभूतानि शत्रवश्च महाबलाः
tasya kṣetrāṇi saṁpacca vinaśyaṁti na saṁśayaḥ apasmārādibhūtāni śatravaśca mahābalāḥ
उसके खेत और संपत्ति निश्चय ही नष्ट हो जाते हैं; मिर्गी आदि भूत-बाधाएँ, महाबली शत्रु,
श्लोक 103 (skanda.3.36.103)
यातुधानाश्च बाधन्ते तं वै विष्णुपराङ्मुखम् पात्यते नरके चापि अस्थिभेदननामके
yātudhānāśca bādhante taṁ vai viṣṇuparāṅmukham pātyate narake cāpi asthibhedananāmake
और राक्षस उस विष्णुविमुख पुरुष को पीड़ित करते हैं; और वह अस्थिभेदन नामक नरक में गिराया जाता है।
श्लोक 104 (skanda.3.36.104)
द्वादश्यां भक्तियुक्तो यः श्राद्धं कुर्यान्महालयम् षट्शतं कल्पसाहस्रं प्रीणंति पितरोऽस्य वै
dvādaśyāṁ bhaktiyukto yaḥ śrāddhaṁ kuryānmahālayam ṣaṭśataṁ kalpasāhasraṁ prīṇaṁti pitaro'sya vai
द्वादशी तिथि को भक्तियुक्त होकर जो महालय-श्राद्ध करता है, उसके पितर छह लाख कल्पों तक प्रसन्न रहते हैं,
श्लोक 105 (skanda.3.36.105)
संततिं चाप्यविच्छिन्नां पितरोऽस्मै ददत्यपि त्रयोदश्यां नरो भक्त्या श्राद्धं कुर्यान्महालयम्
saṁtatiṁ cāpyavicchinnāṁ pitaro'smai dadatyapi trayodaśyāṁ naro bhaktyā śrāddhaṁ kuryānmahālayam
और पितर उसे अखंडित संतति भी प्रदान करते हैं। त्रयोदशी तिथि को जो मनुष्य भक्तिपूर्वक महालय-श्राद्ध करता है,
श्लोक 106 (skanda.3.36.106)
प्रसीदत्यस्य भगवान्कंदर्पो रतिनायकः स्रग्चंदनादयो भोगा ललनाश्च मनोरमाः
prasīdatyasya bhagavānkaṁdarpo ratināyakaḥ sragcaṁdanādayo bhogā lalanāśca manoramāḥ
उससे रति के स्वामी भगवान कंदर्प (कामदेव) प्रसन्न होते हैं। माला-चंदन आदि भोग, तथा मनोहर स्त्रियाँ -
श्लोक 107 (skanda.3.36.107)
कामदेवप्रसादेन तस्य सिद्ध्यंति सर्वदा आजन्ममरणांतं च सुखमेव स विंदते
kāmadevaprasādena tasya siddhyaṁti sarvadā ājanmamaraṇāṁtaṁ ca sukhameva sa viṁdate
कामदेव की कृपा से उसे सदा सुलभ रहती हैं; और वह जन्म से मृत्यु तक केवल सुख ही प्राप्त करता है।
श्लोक 108 (skanda.3.36.108)
यो न कुर्यात्त्रयोदश्यां न च श्राद्धं महालयम् कामदेवोऽस्य विमुखः स्त्रियो भोगांश्च नाशयेत्
yo na kuryāttrayodaśyāṁ na ca śrāddhaṁ mahālayam kāmadevo'sya vimukhaḥ striyo bhogāṁśca nāśayet
जो त्रयोदशी को महालय-श्राद्ध नहीं करता, उससे कामदेव विमुख हो जाते हैं और उसकी स्त्रियों तथा भोगों का नाश कर देते हैं।
श्लोक 109 (skanda.3.36.109)
अंगारशय्याभ्रमणे नरके पातयत्यमुम् पितॄनुद्दिश्य यः कुर्यात्त्र योदश्यां महालयम्
aṁgāraśayyābhramaṇe narake pātayatyamum pitṝnuddiśya yaḥ kuryāttra yodaśyāṁ mahālayam
वे उसे अंगारशय्या पर घुमाने वाले नरक में गिराते हैं। जो पितरों के निमित्त त्रयोदशी तिथि को महालय करता है,
श्लोक 110 (skanda.3.36.110)
सहस्रकल्पसाहस्रं प्रीणंति पितरोऽस्य वै संततिं चाप्यविच्छिन्नां दद्युः पितॄगणास्तदा
sahasrakalpasāhasraṁ prīṇaṁti pitaro'sya vai saṁtatiṁ cāpyavicchinnāṁ dadyuḥ pitṝgaṇāstadā
उसके पितर एक हजार हजार कल्पों तक प्रसन्न रहते हैं, और पितृगण उसे तब अखंडित संतति प्रदान करते हैं।
श्लोक 111 (skanda.3.36.111)
चतुर्दश्यां नरो भक्त्या श्राद्धं कुर्यान्महालयम् तस्याभीष्टप्रदानाय जागर्ति भगवाच्छिवः
caturdaśyāṁ naro bhaktyā śrāddhaṁ kuryānmahālayam tasyābhīṣṭapradānāya jāgarti bhagavācchivaḥ
चतुर्दशी तिथि को जो मनुष्य भक्तिपूर्वक महालय-श्राद्ध करता है, उसकी अभीष्ट-सिद्धि के लिए भगवान शिव सदा जागृत रहते हैं।
श्लोक 112 (skanda.3.36.112)
उपदिश्य शिवज्ञानं सायुज्यं च ददात्यपि सुरापानायुतं चापि स्वर्णस्तेयायुतं तथा
upadiśya śivajñānaṁ sāyujyaṁ ca dadātyapi surāpānāyutaṁ cāpi svarṇasteyāyutaṁ tathā
वे उसे शिवज्ञान का उपदेश देकर सायुज्य भी प्रदान करते हैं; और दस हजार मद्यपान तथा दस हजार स्वर्णचोरी के समान पाप भी...
श्लोक 113 (skanda.3.36.113)
नश्यंति तत्क्षणादेव चतुर्दश्यां महालयात् चण्डालवृषलस्त्रीणां संगदोषोऽपि नश्यति
naśyaṁti tatkṣaṇādeva caturdaśyāṁ mahālayāt caṇḍālavṛṣalastrīṇāṁ saṁgadoṣo'pi naśyati
...चतुर्दशी के महालय से उसी क्षण नष्ट हो जाते हैं; चांडाल तथा नीच स्त्री के संग का दोष भी नष्ट हो जाता है।
श्लोक 114 (skanda.3.36.114)
अश्वमेधसहस्रस्य पौंडरीकायुतस्य च पुष्कला फलसिद्धिः स्याच्चतुर्दश्यां महालयात्
aśvamedhasahasrasya pauṁḍarīkāyutasya ca puṣkalā phalasiddhiḥ syāccaturdaśyāṁ mahālayāt
चतुर्दशी के महालय से हजार अश्वमेध यज्ञों और दस हजार पौंडरीक यज्ञों का प्रचुर फल प्राप्त होता है।
श्लोक 115 (skanda.3.36.115)
यो न कुर्याच्चतुर्दश्यां श्राद्धमेतन्महालयम् स कल्पकोटिसाहस्रं कल्पकोटिशतं तथा
yo na kuryāccaturdaśyāṁ śrāddhametanmahālayam sa kalpakoṭisāhasraṁ kalpakoṭiśataṁ tathā
जो चतुर्दशी तिथि को यह महालय-श्राद्ध नहीं करता, वह करोड़ों-अरबों कल्पों तक...
श्लोक 116 (skanda.3.36.116)
संसारांधमहाकूपे पतितः स्यादनिष्कृतिः अचोरयित्वा कनकमपीत्वापि सुरां तथा
saṁsārāṁdhamahākūpe patitaḥ syādaniṣkṛtiḥ acorayitvā kanakamapītvāpi surāṁ tathā
...संसार के अंधे महाकूप में बिना किसी उपाय के पड़ा रहता है। स्वर्ण चुराए और मद्यपान किए बिना भी...
श्लोक 117 (skanda.3.36.117)
सुरापानादिभिर्दोषैर्लिप्यते स विमूढधीः कृता अपि विधानेन यज्ञाः स्युर्निष्फलास्तथा
surāpānādibhirdoṣairlipyate sa vimūḍhadhīḥ kṛtā api vidhānena yajñāḥ syurniṣphalāstathā
...वह मूढ़बुद्धि मद्यपान आदि पापों से लिप्त हो जाता है; और विधिपूर्वक किए गए यज्ञ भी उसके लिए निष्फल हो जाते हैं।
श्लोक 118 (skanda.3.36.118)
चतुर्दश्यां तिथौ यस्तु कुर्याच्छ्राद्धं महालयम् लक्षकोटिसहस्राणि लक्षकोटिशतानिच
caturdaśyāṁ tithau yastu kuryācchrāddhaṁ mahālayam lakṣakoṭisahasrāṇi lakṣakoṭiśatānica
जो चतुर्दशी तिथि को महालय-श्राद्ध करता है, उसके पितर लाखों-करोड़ों कल्पों तक...
श्लोक 119 (skanda.3.36.119)
कल्पानि पितरस्तस्य तृप्यंत्येव न संशयः नरकस्थाश्च पितरः स्वर्गं यांति प्रहर्षिताः
kalpāni pitarastasya tṛpyaṁtyeva na saṁśayaḥ narakasthāśca pitaraḥ svargaṁ yāṁti praharṣitāḥ
...निश्चय ही तृप्त रहते हैं, इसमें संशय नहीं; नरक में पड़े पितर भी प्रसन्न होकर स्वर्ग को चले जाते हैं।
श्लोक 120 (skanda.3.36.120)
संततिं चाप्यविच्छिन्नां दद्युः पितृगणास्तदा अमायां तु नरो भक्त्या श्राद्धं कुर्यान्महालयम्
saṁtatiṁ cāpyavicchinnāṁ dadyuḥ pitṛgaṇāstadā amāyāṁ tu naro bhaktyā śrāddhaṁ kuryānmahālayam
और पितृगण उसे तब अखंडित संतति प्रदान करते हैं। जो मनुष्य अमावस्या को भक्तिपूर्वक महालय-श्राद्ध करता है,
श्लोक 121 (skanda.3.36.121)
पितॄणां तस्य तृप्तिः स्यादनंता नात्र संशयः सुधामास्वाद्य या तृप्तिर्देवानां दिवि वै भवेत्
pitṝṇāṁ tasya tṛptiḥ syādanaṁtā nātra saṁśayaḥ sudhāmāsvādya yā tṛptirdevānāṁ divi vai bhavet
उसके पितरों की तृप्ति अनंत हो जाती है, इसमें संशय नहीं। देवगण स्वर्ग में अमृत का आस्वादन करके जो तृप्ति पाते हैं,
श्लोक 122 (skanda.3.36.122)
अनंता तादृशी तृप्तिरमावास्यां महालयात् अमावास्या महापुण्या पितृदेवनमस्कृता
anaṁtā tādṛśī tṛptiramāvāsyāṁ mahālayāt amāvāsyā mahāpuṇyā pitṛdevanamaskṛtā
अमावस्या के महालय से वैसी ही अनंत तृप्ति प्राप्त होती है। अमावस्या महापुण्यमयी है, पितरों और देवों दोनों से वंदित है।
श्लोक 123 (skanda.3.36.123)
शांता ह्येषा तु परमा शिवस्य च महाप्रिया तस्यां महालये श्राद्धे भोजयेद्वेदवित्तमान्
śāṁtā hyeṣā tu paramā śivasya ca mahāpriyā tasyāṁ mahālaye śrāddhe bhojayedvedavittamān
यह शांत है, परम है, और शिवजी को अत्यंत प्रिय है। उस दिन महालय-श्राद्ध में वेदज्ञ श्रेष्ठ ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए।
श्लोक 124 (skanda.3.36.124)
तेन तृप्तिः पितॄणां स्यादनंता तुष्यते शिवः ब्रह्महत्यादयः पंच पातका नाशमाप्नुयुः
tena tṛptiḥ pitṝṇāṁ syādanaṁtā tuṣyate śivaḥ brahmahatyādayaḥ paṁca pātakā nāśamāpnuyuḥ
इससे पितरों की तृप्ति अनंत हो जाती है, शिवजी संतुष्ट होते हैं, और ब्रह्महत्या आदि पाँचों महापातक नष्ट हो जाते हैं।
श्लोक 125 (skanda.3.36.125)
कृताश्च स्युर्विधानेन सर्वे यज्ञाः सदक्षिणाः अनुष्ठिताः स्युर्विधिवत्सर्वे धर्माः सनातनाः
kṛtāśca syurvidhānena sarve yajñāḥ sadakṣiṇāḥ anuṣṭhitāḥ syurvidhivatsarve dharmāḥ sanātanāḥ
मानो सदक्षिणा सभी यज्ञ विधिपूर्वक किए गए हों, और सनातन धर्म विधिवत् आचरित हुए हों।
श्लोक 126 (skanda.3.36.126)
अमावास्यादिने येन कृतं श्राद्धं महालयम् प्रत्यग्ब्रह्मैकतां ज्ञात्वा सायुज्यं यात्यसंशयम्
amāvāsyādine yena kṛtaṁ śrāddhaṁ mahālayam pratyagbrahmaikatāṁ jñātvā sāyujyaṁ yātyasaṁśayam
जिसने अमावस्या के दिन महालय-श्राद्ध किया, वह अंतर्यामी ब्रह्म के साथ अपनी एकता जानकर निःसंदेह सायुज्य को प्राप्त होता है।
श्लोक 127 (skanda.3.36.127)
यो न कुर्यादमावास्यां महालयमचेतनः ब्रह्मलोकगताश्चास्य पितरो यांति नारकम्
yo na kuryādamāvāsyāṁ mahālayamacetanaḥ brahmalokagatāścāsya pitaro yāṁti nārakam
जो अचेत मनुष्य अमावस्या को महालय नहीं करता, उसके पितर, ब्रह्मलोक में पहुँचे होने पर भी, नरक को चले जाते हैं।
श्लोक 128 (skanda.3.36.128)
संततिश्चास्य मूढस्य विच्छि द्येतैव तत्क्षणात् स एव हि महानर्थो यदमायां तिथौ नरैः
saṁtatiścāsya mūḍhasya vicchi dyetaiva tatkṣaṇāt sa eva hi mahānartho yadamāyāṁ tithau naraiḥ
और उस मूढ़ की संतति उसी क्षण विच्छिन्न हो जाती है। यही वास्तव में वह बड़ा अनर्थ है, कि अमावस्या तिथि को मनुष्यों द्वारा...
श्लोक 129 (skanda.3.36.129)
महालयार्थो विप्रेंद्रा विधिवन्नैव भोजिताः मासि भाद्रपदे प्राप्ते नृत्यंति पितृदेवताः
mahālayārtho vipreṁdrā vidhivannaiva bhojitāḥ māsi bhādrapade prāpte nṛtyaṁti pitṛdevatāḥ
...महालय के निमित्त श्रेष्ठ ब्राह्मणों को विधिवत् भोजन नहीं कराया जाता। भाद्रपद मास आने पर पितृदेवता नाचते हुए कहते हैं -
श्लोक 130 (skanda.3.36.130)
अस्मानुद्दिश्य मत्पुत्रा भोजयेयुर्द्विजोत्तमान् तेन नो नरकक्लेशो न भविष्यति दारुणः
asmānuddiśya matputrā bhojayeyurdvijottamān tena no narakakleśo na bhaviṣyati dāruṇaḥ
"हमारे निमित्त हमारे पुत्र श्रेष्ठ ब्राह्मणों को भोजन कराएँ, जिससे हमें भयंकर नरक-क्लेश न भोगना पड़े,
श्लोक 131 (skanda.3.36.131)
वासश्च स्वर्गलोके स्याद्यावदाचन्द्रतारकम् मासि भाद्रपदे प्राप्ते पितॄणां तृदिदायिनी
vāsaśca svargaloke syādyāvadācandratārakam māsi bhādrapade prāpte pitṝṇāṁ tṛdidāyinī
और चंद्र-तारे रहने तक हमारा निवास स्वर्गलोक में हो।" भाद्रपद मास आने पर, पितरों को तृप्ति देने वाला यह कर्तव्य है कि -
श्लोक 132 (skanda.3.36.132)
एकैकं भोजयेद्विप्रं प्रत्यहं भक्तिपूर्वकम् पितृमातृकुलोद्भूताः पितरस्तृप्तिमाप्नुयुः
ekaikaṁ bhojayedvipraṁ pratyahaṁ bhaktipūrvakam pitṛmātṛkulodbhūtāḥ pitarastṛptimāpnuyuḥ
...प्रतिदिन भक्तिपूर्वक एक-एक ब्राह्मण को भोजन कराया जाए; इससे पितृकुल और मातृकुल दोनों में उत्पन्न पितर तृप्ति प्राप्त करते हैं।
श्लोक 133 (skanda.3.36.133)
कृष्णपक्षे विशेषेण ब्राह्मणान्भोजयेत्सुधीः घृतसूपादिसस्यैश्च तैलाभ्यंगपुरःसरम्
kṛṣṇapakṣe viśeṣeṇa brāhmaṇānbhojayetsudhīḥ ghṛtasūpādisasyaiśca tailābhyaṁgapuraḥsaram
बुद्धिमान पुरुष को विशेषतः कृष्णपक्ष में घी, दाल-सब्जी आदि से, तेल-मालिश सहित, ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए।
श्लोक 134 (skanda.3.36.134)
सुधां पास्यंति पितरस्तस्याकल्पं प्रहर्षिताः सप्तमीं कृष्णपक्षस्य प्रारभ्य प्रत्यहं नराः
sudhāṁ pāsyaṁti pitarastasyākalpaṁ praharṣitāḥ saptamīṁ kṛṣṇapakṣasya prārabhya pratyahaṁ narāḥ
उसके पितर अत्यंत प्रसन्न होकर कल्पपर्यंत अमृत पान करते रहेंगे। कृष्णपक्ष की सप्तमी से आरंभ कर प्रतिदिन मनुष्य -
श्लोक 135 (skanda.3.36.135)
विप्रान्यावदमावास्या त्रींस्त्रीनभ्यर्च्य भोजयेत् आरभ्य द्वादशीं विप्रांस्त्रीनवश्यं तु भोजयेत्
viprānyāvadamāvāsyā trīṁstrīnabhyarcya bhojayet ārabhya dvādaśīṁ viprāṁstrīnavaśyaṁ tu bhojayet
...अमावस्या तक तीन-तीन ब्राह्मणों की पूजा करके भोजन कराएँ; द्वादशी से आरंभ करके तीन ब्राह्मणों को अवश्य भोजन कराना चाहिए।
श्लोक 136 (skanda.3.36.136)
अन्यथैश्वर्यहानिः स्यान्महादारिद्र्यभाग्भवेत् वित्तलोभं परित्यज्य विप्रान्सूपघृतादि भिः
anyathaiśvaryahāniḥ syānmahādāridryabhāgbhavet vittalobhaṁ parityajya viprānsūpaghṛtādi bhiḥ
अन्यथा ऐश्वर्य की हानि होगी और महान दरिद्रता प्राप्त होगी। धन के लोभ को त्यागकर ब्राह्मणों को दाल-घी आदि से -
श्लोक 137 (skanda.3.36.137)
पयसा पायसान्नेन दध्नापूपादिभिस्तथा पेयैर्लेह्यैश्च चोष्यैश्च भक्ष्यैश्च विविधैरपि
payasā pāyasānnena dadhnāpūpādibhistathā peyairlehyaiśca coṣyaiśca bhakṣyaiśca vividhairapi
दूध, खीर, दही, पूए आदि से, तथा विविध प्रकार के पेय, चाटने योग्य, चूसने योग्य और खाने योग्य पदार्थों से -
श्लोक 138 (skanda.3.36.138)
भोजयेद्वेदविन्मुख्यांस्तृप्तिस्तेषां यथा भवेत् तेन ब्रह्मा हरिः शंभुस्तृप्ताः स्युर्नात्र संशयः
bhojayedvedavinmukhyāṁstṛptisteṣāṁ yathā bhavet tena brahmā hariḥ śaṁbhustṛptāḥ syurnātra saṁśayaḥ
...वेदज्ञ श्रेष्ठ ब्राह्मणों को इस प्रकार भोजन कराना चाहिए कि उन्हें पूर्ण तृप्ति हो; इससे ब्रह्मा, विष्णु और शंभु भी अवश्य तृप्त होते हैं।
श्लोक 139 (skanda.3.36.139)
अग्निष्वात्तादिपितरस्तथैवेंद्रादिदेवताः बहुनात्र किमुक्तेन तुष्टं तेन जगत्त्रयम्
agniṣvāttādipitarastathaiveṁdrādidevatāḥ bahunātra kimuktena tuṣṭaṁ tena jagattrayam
तथा अग्निष्वात्त आदि पितर और इंद्र आदि देवता भी। अधिक कहने से क्या - इससे तीनों लोक ही संतुष्ट हो जाते हैं।
श्लोक 140 (skanda.3.36.140)
पार्वणेन विधानेन कुर्याच्छ्राद्धे महालयम् नरो महालयश्राद्धे पितृवंश्यान्पितॄनिव
pārvaṇena vidhānena kuryācchrāddhe mahālayam naro mahālayaśrāddhe pitṛvaṁśyānpitṝniva
पार्वण विधि से महालय-श्राद्ध करना चाहिए। मनुष्य को महालय-श्राद्ध में पितृकुल के पितरों की भाँति -
श्लोक 141 (skanda.3.36.141)
मातृवंश्यानपि पितॄन्भोजयेच्छ्रेयसे मुदा दक्षिणां च यथाशक्ति दद्याद्वित्तानुसारतः
mātṛvaṁśyānapi pitṝnbhojayecchreyase mudā dakṣiṇāṁ ca yathāśakti dadyādvittānusārataḥ
...मातृकुल के पितरों को भी अपने कल्याण के लिए प्रसन्नतापूर्वक भोजन कराना चाहिए, और अपनी शक्ति एवं धन के अनुसार दक्षिणा देनी चाहिए।
श्लोक 142 (skanda.3.36.142)
तस्मिन्महालये श्राद्धे वित्तशाठ्यं न कारयेत् दक्षिणा खलु यज्ञानां कथितेयं पुरोगवा
tasminmahālaye śrāddhe vittaśāṭhyaṁ na kārayet dakṣiṇā khalu yajñānāṁ kathiteyaṁ purogavā
उस महालय-श्राद्ध में धन की कंजूसी नहीं करनी चाहिए। दक्षिणा को यज्ञों का अग्रगामी (आगे चलने वाला बैल) कहा गया है।
श्लोक 143 (skanda.3.36.143)
अनः पुरोगवैर्हीनं करिष्यति यथाध्वनि अदक्षिणं तथा सोयं पितृयज्ञोऽपि रिष्यति
anaḥ purogavairhīnaṁ kariṣyati yathādhvani adakṣiṇaṁ tathā soyaṁ pitṛyajño'pi riṣyati
जैसे अग्रगामी बैलों के बिना गाड़ी मार्ग में नहीं चल पाती, वैसे ही दक्षिणा-रहित यह पितृयज्ञ भी नष्ट हो जाता है।
श्लोक 144 (skanda.3.36.144)
तस्माद्यज्ञेषु दातव्या दक्षिणाल्पा हि जानता विधवाभिरपि स्त्रीभिरपुत्राभिर्महालयः
tasmādyajñeṣu dātavyā dakṣiṇālpā hi jānatā vidhavābhirapi strībhiraputrābhirmahālayaḥ
इसलिए समझदार व्यक्ति को यज्ञों में अल्प दक्षिणा भी अवश्य देनी चाहिए। पुत्रहीन विधवा स्त्रियों को भी महालय...
श्लोक 145 (skanda.3.36.145)
भर्त्तॄनुद्दिश्य कर्तव्यो भूरिभोजनकर्मणा अन्यथा धर्महानिः स्यान्नरकं च महद्भवेत्
bharttṝnuddiśya kartavyo bhūribhojanakarmaṇā anyathā dharmahāniḥ syānnarakaṁ ca mahadbhavet
...अपने पतियों के निमित्त प्रचुर भोजन कराकर करना चाहिए। अन्यथा धर्म की हानि होगी और महान नरक प्राप्त होगा।
श्लोक 146 (skanda.3.36.146)
मासि भाद्रपदे प्राप्ते यो न कुर्यान्महालयम् तत्कुलं नाशमाप्नोति ब्रह्महत्यां च विंदति
māsi bhādrapade prāpte yo na kuryānmahālayam tatkulaṁ nāśamāpnoti brahmahatyāṁ ca viṁdati
भाद्रपद मास आने पर जो महालय नहीं करता, उसका कुल नाश को प्राप्त होता है और वह ब्रह्महत्या का भागी बनता है।
श्लोक 147 (skanda.3.36.147)
महालयं प्रकुर्वंति श्रद्धावंतः पितॄन्प्रति न तेषां संततिच्छेदो भवेत्संपदभंगुरा
mahālayaṁ prakurvaṁti śraddhāvaṁtaḥ pitṝnprati na teṣāṁ saṁtaticchedo bhavetsaṁpadabhaṁgurā
जो श्रद्धावान लोग पितरों के निमित्त महालय करते हैं, उनकी संतति का कभी विच्छेद नहीं होता, और उनकी संपदा क्षीण नहीं होती।
श्लोक 148 (skanda.3.36.148)
आलयं ह्यास्पदं प्रोक्तं महः कल्याणमुच्यते कल्याणानामास्पदत्वान्महालयमुदीर्यते
ālayaṁ hyāspadaṁ proktaṁ mahaḥ kalyāṇamucyate kalyāṇānāmāspadatvānmahālayamudīryate
'आलय' का अर्थ है निवासस्थान, और 'मह:' का अर्थ है कल्याण; कल्याणों का निवासस्थान होने के कारण ही इसे 'महालय' कहा जाता है।
श्लोक 149 (skanda.3.36.149)
तस्मान्महालयं मर्त्यः कुर्यात्कल्याणसिद्धये अमंगलं भवेत्तस्य न कुर्याच्चेन्महालयम्
tasmānmahālayaṁ martyaḥ kuryātkalyāṇasiddhaye amaṁgalaṁ bhavettasya na kuryāccenmahālayam
इसलिए मनुष्य को कल्याण की सिद्धि के लिए महालय अवश्य करना चाहिए; महालय न करने पर अमंगल होता है।
श्लोक 150 (skanda.3.36.150)
नकुर्याद्यद्यपि श्राद्धं मातापित्रोर्मृतेऽहनि कुर्यान्महालयश्राद्धमस्मरन्नेव बुद्धिमान्
nakuryādyadyapi śrāddhaṁ mātāpitrormṛte'hani kuryānmahālayaśrāddhamasmaranneva buddhimān
यदि माता-पिता की मृत्यु-तिथि पर श्राद्ध भूलवश न भी किया हो, तो भी बुद्धिमान पुरुष को महालय-श्राद्ध अवश्य करना चाहिए, चाहे वह उन्हें याद न भी रख पाए।
श्लोक 151 (skanda.3.36.151)
कर्तुं महालयश्राद्धं यदि शक्तिर्न विद्यते याचित्वापि नरः कुर्यात्पितृणां तन्महालयम्
kartuṁ mahālayaśrāddhaṁ yadi śaktirna vidyate yācitvāpi naraḥ kuryātpitṛṇāṁ tanmahālayam
यदि महालय-श्राद्ध करने की सामर्थ्य न हो, तो मनुष्य को माँगकर भी अपने पितरों का वह महालय करना चाहिए।
श्लोक 152 (skanda.3.36.152)
ब्राह्मणेभ्यो विशिष्टे भ्यो याचेत धनधान्यकम् पतितेभ्यो न गृह्णीयाद्धनधान्यं कदाचन
brāhmaṇebhyo viśiṣṭe bhyo yāceta dhanadhānyakam patitebhyo na gṛhṇīyāddhanadhānyaṁ kadācana
श्रेष्ठ ब्राह्मणों से धन-धान्य माँगे, पतित लोगों से कभी भी धन-धान्य ग्रहण न करे।
श्लोक 153 (skanda.3.36.153)
ब्राह्मणेभ्यो न लभ्येत यदि धान्यधनादिकम् याचेत क्षत्रियश्रेष्ठा न्महालयचिकीर्षया
brāhmaṇebhyo na labhyeta yadi dhānyadhanādikam yāceta kṣatriyaśreṣṭhā nmahālayacikīrṣayā
यदि ब्राह्मणों से धन-धान्य आदि प्राप्त न हो, तो महालय करने की इच्छा से श्रेष्ठ क्षत्रियों से माँगे।
श्लोक 154 (skanda.3.36.154)
दातारश्चेन्न भूपाला वैश्येभ्योऽपि च याचयेत् वैश्या अपि हि दातारो यदि लोके न संति वै
dātāraścenna bhūpālā vaiśyebhyo'pi ca yācayet vaiśyā api hi dātāro yadi loke na saṁti vai
यदि राजा दानी न हों, तो वैश्यों से भी माँगे; और यदि संसार में वैश्य दाता भी न हों,
श्लोक 155 (skanda.3.36.155)
दद्याद्भाद्रपदे मासे गोग्रासं पितृतृप्तये अथ वा रोदनं कुर्याद्बहिर्निर्गत्य कानने
dadyādbhādrapade māse gogrāsaṁ pitṛtṛptaye atha vā rodanaṁ kuryādbahirnirgatya kānane
तो भाद्रपद मास में पितरों की तृप्ति के लिए गाय को घास का ग्रास दे, अथवा वन में बाहर जाकर रोए,
श्लोक 156 (skanda.3.36.156)
पाणिभ्यामुदरं स्वीयमाहत्याश्रूणि वर्तयन् तेष्वरण्यप्रदेशेषु उच्चैरेवं वदेन्नरः
pāṇibhyāmudaraṁ svīyamāhatyāśrūṇi vartayan teṣvaraṇyapradeśeṣu uccairevaṁ vadennaraḥ
दोनों हाथों से अपने पेट को पीटते और आँसू बहाते हुए; उन वन-प्रदेशों में मनुष्य ऊँचे स्वर से इस प्रकार कहे -
श्लोक 157 (skanda.3.36.157)
शृण्वंतु पितरः सर्वे मत्कुलीना वचो मम अहं दरिद्रः कृपणो निर्ल्लज्जः क्रूरकर्मकृत्
śṛṇvaṁtu pitaraḥ sarve matkulīnā vaco mama ahaṁ daridraḥ kṛpaṇo nirllajjaḥ krūrakarmakṛt
"मेरे कुल के सब पितर मेरी बात सुनें - मैं दरिद्र, दीन, निर्लज्ज और क्रूरकर्मा हूँ।
श्लोक 158 (skanda.3.36.158)
प्राप्तो भाद्रपदो मासः पितृणां प्रीतिवर्द्धनः कर्त्तुं महालयश्राद्धं न च मे शक्तिरस्ति वै
prāpto bhādrapado māsaḥ pitṛṇāṁ prītivarddhanaḥ karttuṁ mahālayaśrāddhaṁ na ca me śaktirasti vai
पितरों की प्रीति बढ़ाने वाला भाद्रपद मास आ गया है, परंतु मुझमें महालय-श्राद्ध करने की सामर्थ्य नहीं है।
श्लोक 159 (skanda.3.36.159)
भ्रमित्वापि महीं कृत्स्नां न मे किंचन लभ्यते अतो महालयश्राद्धं न युष्माकं करोम्यहम्
bhramitvāpi mahīṁ kṛtsnāṁ na me kiṁcana labhyate ato mahālayaśrāddhaṁ na yuṣmākaṁ karomyaham
संपूर्ण पृथ्वी घूम लेने पर भी मुझे कुछ भी प्राप्त नहीं होता; इसलिए मैं आपका महालय-श्राद्ध नहीं कर पा रहा हूँ।
श्लोक 160 (skanda.3.36.160)
क्षमध्वं मम तद्यूयं भवंतो हि दयापराः दरिद्रो रोदनं कुर्यादेवं काननभूमिषु
kṣamadhvaṁ mama tadyūyaṁ bhavaṁto hi dayāparāḥ daridro rodanaṁ kuryādevaṁ kānanabhūmiṣu
आप दयालु हैं, इसलिए मुझे क्षमा करें।" दरिद्र पुरुष को वन-भूमि में इस प्रकार रोना चाहिए।
श्लोक 161 (skanda.3.36.161)
तस्य रोदनमाकर्ण्य पितरस्तत्कुलोद्भवाः हृष्टास्तृप्तिं प्रयांत्येव सुधां पीत्वैव निर्जराः
tasya rodanamākarṇya pitarastatkulodbhavāḥ hṛṣṭāstṛptiṁ prayāṁtyeva sudhāṁ pītvaiva nirjarāḥ
उसका विलाप सुनकर उसी कुल में उत्पन्न पितर प्रसन्न होकर, मानो अमृत पीकर, तृप्ति को प्राप्त होते हैं।
श्लोक 162 (skanda.3.36.162)
महालयार्थे विप्रौघे भुक्ते तृप्तिर्यथा भवेत् गोग्रासारण्यरुदितैः पितृ तृप्तिस्तथा भवेत्
mahālayārthe vipraughe bhukte tṛptiryathā bhavet gogrāsāraṇyaruditaiḥ pitṛ tṛptistathā bhavet
जैसे ब्राह्मण-समूह को भोजन कराने से महालय के निमित्त तृप्ति होती है, वैसे ही गोग्रास और वन-विलाप से भी पितरों की तृप्ति होती है।
श्लोक 163 (skanda.3.36.163)
मासि भाद्रपदे विघ्नो यदि स्यात्सूतकादिना यातेषु सूतकाहःसु कुर्यादावृश्चिकावधि
māsi bhādrapade vighno yadi syātsūtakādinā yāteṣu sūtakāhaḥsu kuryādāvṛścikāvadhi
यदि भाद्रपद मास में सूतक आदि के कारण विघ्न हो, तो सूतक के दिन बीत जाने पर वृश्चिक-संक्रांति तक यह कर सकता है।
श्लोक 164 (skanda.3.36.164)
बुधो महालय स्यार्थे ब्राह्मणान्वृणुयान्नव पित्रर्थमेकं वृणुयात्पितामहकृते तथा
budho mahālaya syārthe brāhmaṇānvṛṇuyānnava pitrarthamekaṁ vṛṇuyātpitāmahakṛte tathā
बुद्धिमान पुरुष को महालय के लिए नौ ब्राह्मणों का वरण करना चाहिए - पिता के लिए एक, पितामह के लिए भी एक,
श्लोक 165 (skanda.3.36.165)
प्रपितामहमुद्दिश्य तथैकं वृणुयाद्द्विजः तथा मातामहार्थं तु एकं वै वृणुयाद्द्विजम्
prapitāmahamuddiśya tathaikaṁ vṛṇuyāddvijaḥ tathā mātāmahārthaṁ tu ekaṁ vai vṛṇuyāddvijam
प्रपितामह के उद्देश्य से भी द्विज एक का वरण करे; इसी प्रकार मातामह के लिए भी एक ब्राह्मण का वरण करे।
श्लोक 166 (skanda.3.36.166)
मातुःपितामहार्थं च वृणुयाद्द्विजमेककम् वृणुयादेकमुद्दिश्य मातुश्च प्रपितामहम्
mātuḥpitāmahārthaṁ ca vṛṇuyāddvijamekakam vṛṇuyādekamuddiśya mātuśca prapitāmaham
माता के पितामह के लिए एक ब्राह्मण का वरण करे; और माता के प्रपितामह के उद्देश्य से भी एक का वरण करे।
श्लोक 167 (skanda.3.36.167)
तथैव विश्वेदेवार्थे वृणुयाद्द्वौद्वि जोत्तमौ विष्ण्वर्थं ब्राह्मणं त्वेकं वृणुयाद्वेदवित्तमम्
tathaiva viśvedevārthe vṛṇuyāddvaudvi jottamau viṣṇvarthaṁ brāhmaṇaṁ tvekaṁ vṛṇuyādvedavittamam
इसी प्रकार विश्वेदेवों के लिए दो श्रेष्ठ ब्राह्मणों का वरण करे; और विष्णु के लिए वेदज्ञ एक ब्राह्मण का वरण करे।
श्लोक 168 (skanda.3.36.168)
एवं महालयश्राद्धे ब्राह्मणान्वृणुयान्नव अथवा पितृवर्गार्थं वरयेद्विप्रमेककम्
evaṁ mahālayaśrāddhe brāhmaṇānvṛṇuyānnava athavā pitṛvargārthaṁ varayedvipramekakam
इस प्रकार महालय-श्राद्ध में नौ ब्राह्मणों का वरण करना चाहिए; अथवा पितृवर्ग के लिए एक ही ब्राह्मण का वरण कर ले।
श्लोक 169 (skanda.3.36.169)
मातामहादीन्वोद्दिश्य वरयेद्विप्रमेककम् विश्वेदेवार्थमेकं च विष्ण्वर्थं च तथापरम्
mātāmahādīnvoddiśya varayedvipramekakam viśvedevārthamekaṁ ca viṣṇvarthaṁ ca tathāparam
मातामह आदि के उद्देश्य से एक ब्राह्मण का वरण करे; विश्वेदेवों के लिए एक, और विष्णु के लिए एक और।
श्लोक 170 (skanda.3.36.170)
एवं वै वरयेद्विप्राश्चतुरस्तु महालये ब्राह्मणान्वेदसंपन्नान्सुशीलान्वरयेत्सुधीः
evaṁ vai varayedviprāścaturastu mahālaye brāhmaṇānvedasaṁpannānsuśīlānvarayetsudhīḥ
इस प्रकार महालय में चार ब्राह्मणों का वरण किया जा सकता है। बुद्धिमान को वेदसंपन्न और सुशील ब्राह्मणों का ही वरण करना चाहिए।
श्लोक 171 (skanda.3.36.171)
दुःशीलान्वरयेद्यस्तु स वै श्राद्धस्य घातकः मासि भाद्रपदे प्राप्ते कृष्णपक्षे विशेषतः
duḥśīlānvarayedyastu sa vai śrāddhasya ghātakaḥ māsi bhādrapade prāpte kṛṣṇapakṣe viśeṣataḥ
जो दुःशील ब्राह्मणों का वरण करता है, वह श्राद्ध का घातक ही होता है। भाद्रपद मास आने पर, विशेषतः कृष्णपक्ष में -
श्लोक 172 (skanda.3.36.172)
कुर्या न्महालयश्राद्धं यो नरः श्रद्धया सह स स्नातः सर्वतीर्थेषु दुराचार महामते
kuryā nmahālayaśrāddhaṁ yo naraḥ śraddhayā saha sa snātaḥ sarvatīrtheṣu durācāra mahāmate
...जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक महालय-श्राद्ध करता है, हे बुद्धिमान दुराचार, वह मानो समस्त तीर्थों में स्नान कर चुका हो।
श्लोक 173 (skanda.3.36.173)
अग्निष्टोमादयो यज्ञाः शतमप्यमुना कृताः तुलापुरुषमुख्यानि दानान्यपि कृतानि वै
agniṣṭomādayo yajñāḥ śatamapyamunā kṛtāḥ tulāpuruṣamukhyāni dānānyapi kṛtāni vai
मानो उसने सौ अग्निष्टोम आदि यज्ञ किए हों, और तुलापुरुष आदि प्रमुख दान भी किए हों।
श्लोक 174 (skanda.3.36.174)
चांद्रायणादिकृच्छ्राणि कृतान्येव न संशयः चतुर्णां सांगवेदानां पारायणफलं लभेत्
cāṁdrāyaṇādikṛcchrāṇi kṛtānyeva na saṁśayaḥ caturṇāṁ sāṁgavedānāṁ pārāyaṇaphalaṁ labhet
मानो उसने चांद्रायण आदि व्रत भी सम्पन्न किए हों, इसमें संशय नहीं; उसे चारों वेदों के सांग पारायण का फल प्राप्त होता है।
श्लोक 175 (skanda.3.36.175)
गायत्र्यादिमहामंत्रजपपुण्यं लभेत्तथा इतिहासपुराणानां पारायणफलं लभेत्
gāyatryādimahāmaṁtrajapapuṇyaṁ labhettathā itihāsapurāṇānāṁ pārāyaṇaphalaṁ labhet
उसे गायत्री आदि महामंत्रों के जप का पुण्य भी प्राप्त होता है, तथा इतिहास-पुराणों के पारायण का फल भी।
श्लोक 176 (skanda.3.36.176)
महालयसमं पुण्यं वृत्तं नास्ति महीतले ब्रह्मविष्णुमहेशानलोकप्राप्तिर्महालयात्
mahālayasamaṁ puṇyaṁ vṛttaṁ nāsti mahītale brahmaviṣṇumaheśānalokaprāptirmahālayāt
पृथ्वी पर महालय के समान कोई पुण्यकारी व्रत नहीं है; महालय से ब्रह्मा, विष्णु और महेश के लोकों की प्राप्ति होती है।
श्लोक 177 (skanda.3.36.177)
महालयादिकं श्राद्धं नित्यं काम्यमपीष्यते तस्मादकरणे तस्य प्रत्यवायो महान्भवेत्
mahālayādikaṁ śrāddhaṁ nityaṁ kāmyamapīṣyate tasmādakaraṇe tasya pratyavāyo mahānbhavet
महालय आदि श्राद्ध को नित्य भी माना जाता है और काम्य भी; इसलिए इसे न करने से बड़ा पाप होता है।
श्लोक 178 (skanda.3.36.178)
करणादिष्टसिद्धिश्च भविष्यति न संशयः महालयस्य करणाद्भूतवेतालकादयः
karaṇādiṣṭasiddhiśca bhaviṣyati na saṁśayaḥ mahālayasya karaṇādbhūtavetālakādayaḥ
और इसे करने से निश्चय ही अभीष्ट की सिद्धि होगी। महालय करने से भूत, वेताल आदि,
श्लोक 179 (skanda.3.36.179)
अपस्मारग्रहाश्चापि शाकिनीडाकिनीगणाः यातुधानाः पिशाचाश्च वेतालाश्च भयानकाः
apasmāragrahāścāpi śākinīḍākinīgaṇāḥ yātudhānāḥ piśācāśca vetālāśca bhayānakāḥ
मिर्गी के ग्रह, शाकिनी-डाकिनी के समूह, राक्षस, पिशाच तथा भयानक वेताल -
श्लोक 180 (skanda.3.36.180)
नश्यंति तत्क्षणादेव भूतान्यन्यानि वै तथा महालयस्यकरणाद्विपुलां श्रियमश्नुते
naśyaṁti tatkṣaṇādeva bhūtānyanyāni vai tathā mahālayasyakaraṇādvipulāṁ śriyamaśnute
ये और अन्य समस्त भूत-प्रेत उसी क्षण नष्ट हो जाते हैं। महालय करने से मनुष्य विपुल संपदा प्राप्त करता है।
श्लोक 181 (skanda.3.36.181)
पुरा दशरथो राजा वसिष्ठस्योपदेशतः मासि भाद्रपदे प्राप्ते कृत्वा श्राद्धं महालयम्
purā daśaratho rājā vasiṣṭhasyopadeśataḥ māsi bhādrapade prāpte kṛtvā śrāddhaṁ mahālayam
पूर्वकाल में राजा दशरथ ने वसिष्ठ के उपदेश से, भाद्रपद मास आने पर महालय-श्राद्ध करके,
श्लोक 182 (skanda.3.36.182)
रामादींश्च तुरः पुत्रान्प्राप्तवांल्लोकसंमतान् विश्वातिशायिनीं लक्ष्मीं प्रपेदे कीर्तिमुत्तमाम्
rāmādīṁśca turaḥ putrānprāptavāṁllokasaṁmatān viśvātiśāyinīṁ lakṣmīṁ prapede kīrtimuttamām
राम आदि लोकसम्मत चार पुत्रों को प्राप्त किया, और सर्वोत्कृष्ट लक्ष्मी तथा उत्तम कीर्ति को प्राप्त हुए।
श्लोक 183 (skanda.3.36.183)
महालयस्य करणाद्ययाती राजसत्तमः यदुमुख्यान्महापुत्रान्प्रपेदे वंशवर्द्धनान्
mahālayasya karaṇādyayātī rājasattamaḥ yadumukhyānmahāputrānprapede vaṁśavarddhanān
महालय करने से श्रेष्ठ राजा ययाति ने यदु आदि कुल-वर्धक महापुत्रों को प्राप्त किया,
श्लोक 184 (skanda.3.36.184)
अनन्यदुर्लभं स्वर्गं प्रपेदे श्राद्धपुण्यतः दुष्यंतो भरतं लेभे महालयविधानतः
ananyadurlabhaṁ svargaṁ prapede śrāddhapuṇyataḥ duṣyaṁto bharataṁ lebhe mahālayavidhānataḥ
और श्राद्ध के पुण्य से अन्यत्र दुर्लभ स्वर्ग को प्राप्त हुए। दुष्यंत ने महालय-विधान से भरत को प्राप्त किया।
श्लोक 185 (skanda.3.36.185)
महालय विधानेन दमयंतीपतिर्नलः कृच्छ्रं महत्तरं तीर्त्वा पुनर्लेभे महीमिमाम्
mahālaya vidhānena damayaṁtīpatirnalaḥ kṛcchraṁ mahattaraṁ tīrtvā punarlebhe mahīmimām
महालय के विधान से दमयंती के पति नल ने महान संकट पार करके इस पृथ्वी को पुनः प्राप्त किया,
श्लोक 186 (skanda.3.36.186)
निजग्राह कलिं घोरं पुष्करं चाप्यरातिनम् इन्द्रसेनाभिधानं च पुत्रं लेभेऽतिधार्मिकम्
nijagrāha kaliṁ ghoraṁ puṣkaraṁ cāpyarātinam indrasenābhidhānaṁ ca putraṁ lebhe'tidhārmikam
घोर कलि को तथा शत्रु पुष्कर को परास्त किया, और अत्यंत धार्मिक पुत्र इंद्रसेन को प्राप्त किया।
श्लोक 187 (skanda.3.36.187)
हरिश्चंद्रो महाराजो महालयविधानतः विश्वामित्रकृताद्दुःखान्मुक्तः सत्यवतां वरः
hariścaṁdro mahārājo mahālayavidhānataḥ viśvāmitrakṛtādduḥkhānmuktaḥ satyavatāṁ varaḥ
महालय-विधान से महाराज हरिश्चंद्र, सत्यवादियों में श्रेष्ठ, विश्वामित्र द्वारा दिए गए दुःखों से मुक्त हुए,
श्लोक 188 (skanda.3.36.188)
लेभे चंद्रवतीं भार्यां लोहिताश्वं सुतं पुनः महालयविधानेन कृतवीर्यसुतो बली
lebhe caṁdravatīṁ bhāryāṁ lohitāśvaṁ sutaṁ punaḥ mahālayavidhānena kṛtavīryasuto balī
और अपनी पत्नी चंद्रवती तथा पुत्र लोहिताश्व को पुनः प्राप्त किया। महालय-विधान से कृतवीर्य के बलवान पुत्र (कार्तवीर्य) ने...
श्लोक 189 (skanda.3.36.189)
अष्टादशानां द्वीपानामाधिपत्यमवाप्तवान् रामोऽपि दण्डकारण्ये महालयविधानतः
aṣṭādaśānāṁ dvīpānāmādhipatyamavāptavān rāmo'pi daṇḍakāraṇye mahālayavidhānataḥ
...अठारह द्वीपों का आधिपत्य प्राप्त किया। दंडकारण्य में राम ने भी महालय-विधान से,
श्लोक 190 (skanda.3.36.190)
हत्वा तु रावणं संख्ये सीतां पुनरवाप्तवान् महालयस्य करणाद्धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः
hatvā tu rāvaṇaṁ saṁkhye sītāṁ punaravāptavān mahālayasya karaṇāddharmaputro yudhiṣṭhiraḥ
रावण को युद्ध में मारकर सीता को पुनः प्राप्त किया। महालय करने से धर्मपुत्र युधिष्ठिर ने...
श्लोक 191 (skanda.3.36.191)
दुःखसागरमुत्तीर्य धार्तराष्ट्राञ्जघान च महालयस्यकरणाद्वसिष्ठो मुनिसत्तमः
duḥkhasāgaramuttīrya dhārtarāṣṭrāñjaghāna ca mahālayasyakaraṇādvasiṣṭho munisattamaḥ
...दुःख के सागर को पार करके धृतराष्ट्र के पुत्रों का वध किया। महालय करने से मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठ,
श्लोक 192 (skanda.3.36.192)
अत्रिर्भृगुश्च कुत्सश्च गौतमश्चांगिरास्तथा कश्यपश्च भरद्वाजो विश्वा मित्रश्च कुम्भजः
atrirbhṛguśca kutsaśca gautamaścāṁgirāstathā kaśyapaśca bharadvājo viśvā mitraśca kumbhajaḥ
अत्रि, भृगु, कुत्स, गौतम, अंगिरा, कश्यप, भरद्वाज, विश्वामित्र और कुंभज (अगस्त्य),
श्लोक 193 (skanda.3.36.193)
पराशरो मृकण्डश्च ये चान्ये मुनिसत्तमाः विधाय विधिवच्छ्राद्धं महालयमनुत्तमम्
parāśaro mṛkaṇḍaśca ye cānye munisattamāḥ vidhāya vidhivacchrāddhaṁ mahālayamanuttamam
पराशर, मृकंडु तथा अन्य जो भी मुनिश्रेष्ठ थे - उन सबने विधिपूर्वक इस सर्वोत्तम महालय-श्राद्ध को करके,
श्लोक 194 (skanda.3.36.194)
अणिमाद्यष्टसिद्धीनां व्रतानां तपसां तथा निवासभूता संजातास्तथा विश्वातिशायिनः
aṇimādyaṣṭasiddhīnāṁ vratānāṁ tapasāṁ tathā nivāsabhūtā saṁjātāstathā viśvātiśāyinaḥ
अणिमा आदि आठों सिद्धियों, व्रतों और तपस्याओं के निवासस्थान बन गए, तथा विश्व में सबसे श्रेष्ठ हो गए।
श्लोक 195 (skanda.3.36.195)
जीवन्मुक्ताश्च ते सर्वे ह्यभवन्मुनिसत्तमाः अतो महालयश्राद्धं कर्तव्यं भूतिमिच्छता
jīvanmuktāśca te sarve hyabhavanmunisattamāḥ ato mahālayaśrāddhaṁ kartavyaṁ bhūtimicchatā
वे सभी जीवन्मुक्त मुनिश्रेष्ठ बन गए। इसलिए ऐश्वर्य की इच्छा रखने वाले को महालय-श्राद्ध अवश्य करना चाहिए।
श्लोक 196 (skanda.3.36.196)
अतोऽद्यापि दुराचार न कुर्याद्यो महालयम् भूतवेतालकादिभ्यो भूयात्तस्य महद्भयम्
ato'dyāpi durācāra na kuryādyo mahālayam bhūtavetālakādibhyo bhūyāttasya mahadbhayam
इसलिए, हे दुराचार, आज भी जो महालय नहीं करता, उसे भूत-वेताल आदि से बड़ा भय प्राप्त हो।
श्लोक 197 (skanda.3.36.197)
महालयस्या करणाद्वेतालत्वमवाप्नुयात् त्वयाविष्टमिदं भूतं विप्रः सन्पूर्वजन्मनि
mahālayasyā karaṇādvetālatvamavāpnuyāt tvayāviṣṭamidaṁ bhūtaṁ vipraḥ sanpūrvajanmani
महालय न करने से मनुष्य वेतालत्व को प्राप्त हो सकता है। जिस भूत ने तुम्हें आविष्ट किया था, वह पूर्वजन्म में एक ब्राह्मण था,
श्लोक 198 (skanda.3.36.198)
नाम्ना वेदनिधिः पुण्यो भरद्वाजस्य चात्मनः कुशस्थल्यभिधाने च वसन्ग्रामे महामनाः
nāmnā vedanidhiḥ puṇyo bharadvājasya cātmanaḥ kuśasthalyabhidhāne ca vasangrāme mahāmanāḥ
नाम से 'वेदनिधि', भरद्वाज-वंशी, पुण्यात्मा तथा महामना, जो कुशस्थली नामक गाँव में रहता था।
श्लोक 199 (skanda.3.36.199)
न चकार विधानेन श्राद्धमेतन्महालयम् ततोयं पितृणां शापाद्वेतालत्वमवाप्तवान्
na cakāra vidhānena śrāddhametanmahālayam tatoyaṁ pitṛṇāṁ śāpādvetālatvamavāptavān
उसने विधिपूर्वक यह महालय-श्राद्ध नहीं किया; इसलिए वह पितरों के शाप से वेतालत्व को प्राप्त हुआ।
श्लोक 200 (skanda.3.36.200)
तस्माद्भाद्र पदे मासे दुराचार पितॄन्प्रति ब्राह्मणान्भोजयान्नेन षड्रसेन सभक्तिकम्
tasmādbhādra pade māse durācāra pitṝnprati brāhmaṇānbhojayānnena ṣaḍrasena sabhaktikam
इसलिए, हे दुराचार, भाद्रपद मास में पितरों के निमित्त छहों रसों से युक्त अन्न द्वारा भक्तिपूर्वक ब्राह्मणों को भोजन कराओ।
श्लोक 201 (skanda.3.36.201)
दारिद्र्यं तेन ते न स्यात्सुखीचैव भवान्भवेत् महापातकि संसर्गं मा कुरु त्वमितः परम्
dāridryaṁ tena te na syātsukhīcaiva bhavānbhavet mahāpātaki saṁsargaṁ mā kuru tvamitaḥ param
इससे तुम्हें दरिद्रता नहीं होगी और तुम सुखी रहोगे। अब से महापातकियों की संगति मत करना।
श्लोक 202 (skanda.3.36.202)
त्वयानुभूतं यद्दुःखं वेतालग्रहणोद्भवम् गच्छ त्वमनुजानामि स्वदेशं प्रति मा चिरम्
tvayānubhūtaṁ yadduḥkhaṁ vetālagrahaṇodbhavam gaccha tvamanujānāmi svadeśaṁ prati mā ciram
वेताल के ग्रहण से उत्पन्न जो दुःख तुमने भोगा, वह अब समाप्त हुआ। जाओ, मैं तुम्हें आज्ञा देता हूँ - अपने देश की ओर बिना विलंब लौट जाओ।
श्लोक 203 (skanda.3.36.203)
इतीरितः स मुनिना दत्तात्रेयेण योगिना तं प्रणम्य ययौ देशं कृतार्थेनांतरात्मना
itīritaḥ sa muninā dattātreyeṇa yoginā taṁ praṇamya yayau deśaṁ kṛtārthenāṁtarātmanā
योगी मुनि दत्तात्रेय द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर, उन्हें प्रणाम करके वह कृतार्थ अंतःकरण से अपने देश की ओर चल पड़ा।
श्लोक 204 (skanda.3.36.204)
गत्वा च स्वगृहं विप्रो दुराचारो द्विजोत्तमाः विमुक्तवेताल भयो गतपातककंचुकः
gatvā ca svagṛhaṁ vipro durācāro dvijottamāḥ vimuktavetāla bhayo gatapātakakaṁcukaḥ
अपने घर जाकर वह ब्राह्मण दुराचार, हे श्रेष्ठ द्विजो, वेताल के भय से मुक्त और पाप के आवरण से रहित होकर,
श्लोक 205 (skanda.3.36.205)
दत्तात्रेयेरितेनासौ मार्गेण प्रीतमानसः त्यक्तपातकिसंसर्गः स्वाश्रमाचारतत्परः
dattātreyeritenāsau mārgeṇa prītamānasaḥ tyaktapātakisaṁsargaḥ svāśramācāratatparaḥ
दत्तात्रेय द्वारा बताए गए मार्ग पर चलकर प्रसन्नचित्त होकर पापियों की संगति त्यागकर अपने आश्रमधर्म के आचरण में तत्पर हो गया।
श्लोक 206 (skanda.3.36.206)
रामचंद्रधनुष्कोटितीर्थ मज्जनगौरवात् देहांते परमां मुक्तिं दुराचारो ययौ तदा
rāmacaṁdradhanuṣkoṭitīrtha majjanagauravāt dehāṁte paramāṁ muktiṁ durācāro yayau tadā
रामचंद्र की धनुष्कोटि में स्नान के गौरव से दुराचार ने देहांत के समय परम मुक्ति प्राप्त की।
श्लोक 207 (skanda.3.36.207)
श्रीसूत उवाच एवं वः कथितं पुण्यं दुराचरविमोक्षणम् सेयं पुण्या धनुष्कोटिर्महापातकनाशिनी
śrīsūta uvāca evaṁ vaḥ kathitaṁ puṇyaṁ durācaravimokṣaṇam seyaṁ puṇyā dhanuṣkoṭirmahāpātakanāśinī
श्रीसूत जी बोले - इस प्रकार मैंने तुम्हें दुराचार की मुक्ति की पुण्य कथा सुनाई। यह पुण्यमयी धनुष्कोटि महापातकों का नाश करने वाली है।
श्लोक 208 (skanda.3.36.208)
यत्र हि स्नानमात्रेण दुराचारो विमोचितः अथवा धनुषः कोटेरियत्ता किं हि वै भवेत्
yatra hi snānamātreṇa durācāro vimocitaḥ athavā dhanuṣaḥ koṭeriyattā kiṁ hi vai bhavet
जहाँ मात्र स्नान से दुराचार मुक्त हो गया, वहाँ धनुष्कोटि की महिमा की सीमा भला क्या हो सकती है?
श्लोक 209 (skanda.3.36.209)
या निष्कृतिविहीनानि पापान्यपि विनाशयेत् प्रायश्चित्तविहीनानि यानि पापानि संति वै
yā niṣkṛtivihīnāni pāpānyapi vināśayet prāyaścittavihīnāni yāni pāpāni saṁti vai
यह उन पापों को भी नष्ट कर देती है जिनका कोई प्रायश्चित्त नहीं है, तथा जो पाप प्रायश्चित्तरहित हैं -
श्लोक 210 (skanda.3.36.210)
तान्यप्यत्र विनश्यंति धनुष्कोटौ निमज्जनात् शूद्रेण पूजितं लिंगं विष्णुं वा यो नमेद्द्विजः
tānyapyatra vinaśyaṁti dhanuṣkoṭau nimajjanāt śūdreṇa pūjitaṁ liṁgaṁ viṣṇuṁ vā yo nameddvijaḥ
वे भी यहाँ धनुष्कोटि में डुबकी लगाने से नष्ट हो जाते हैं। जो ब्राह्मण शूद्र द्वारा पूजित शिवलिंग या विष्णु-प्रतिमा को नमस्कार करता है,
श्लोक 211 (skanda.3.36.211)
प्रायश्चित्तं न तस्योक्तं स्मृतिभिः परमर्षिभिः नश्येत्तस्यापि तत्पापं धनुष्कोटिनिमज्ज नात्
prāyaścittaṁ na tasyoktaṁ smṛtibhiḥ paramarṣibhiḥ naśyettasyāpi tatpāpaṁ dhanuṣkoṭinimajja nāt
उसके लिए परम ऋषियों की स्मृतियों में कोई प्रायश्चित्त नहीं बताया गया; परंतु उसका वह पाप भी धनुष्कोटि में डुबकी लगाने से नष्ट हो जाता है।
श्लोक 212 (skanda.3.36.212)
विप्रनिंदाकृतां नृणां प्रायश्चित्तं न विद्यते विश्वासघातकानां च कृतघ्नानां न निष्कृतिः
vipraniṁdākṛtāṁ nṛṇāṁ prāyaścittaṁ na vidyate viśvāsaghātakānāṁ ca kṛtaghnānāṁ na niṣkṛtiḥ
ब्राह्मणों की निंदा करने वालों के लिए कोई प्रायश्चित्त नहीं है; विश्वासघातियों तथा कृतघ्नों के लिए भी कोई निष्कृति नहीं है।
श्लोक 213 (skanda.3.36.213)
भ्रातृभार्यारतानां च प्रायश्चित्तं न विद्यते शूद्रान्ने नियतानां च श्रुतिनिंदारतात्मनाम्
bhrātṛbhāryāratānāṁ ca prāyaścittaṁ na vidyate śūdrānne niyatānāṁ ca śrutiniṁdāratātmanām
भाई की पत्नी में आसक्त लोगों के लिए भी कोई प्रायश्चित्त नहीं है; न ही शूद्रों का अन्न नियमित रूप से खाने वालों के लिए, न ही वेद-निंदा में रत रहने वालों के लिए।
श्लोक 214 (skanda.3.36.214)
कन्याविक्रयिणां विप्रा हयविक्रयिणां तथा देवविक्रयिणां वेदविक्रये निर तात्मनाम्
kanyāvikrayiṇāṁ viprā hayavikrayiṇāṁ tathā devavikrayiṇāṁ vedavikraye nira tātmanām
हे विप्रो, कन्या बेचने वालों के लिए, घोड़ा बेचने वालों के लिए, देवता बेचने वालों के लिए, तथा वेद बेचने में लगे रहने वालों के लिए -
श्लोक 215 (skanda.3.36.215)
धर्मविकयिणां पुंसां व्रतविक्रयिणां तथा तीर्थविक्रयिणां पुंसां प्रायश्चित्तं न विद्यते
dharmavikayiṇāṁ puṁsāṁ vratavikrayiṇāṁ tathā tīrthavikrayiṇāṁ puṁsāṁ prāyaścittaṁ na vidyate
धर्म बेचने वाले पुरुषों के लिए, व्रत बेचने वालों के लिए, तथा तीर्थ बेचने वाले पुरुषों के लिए भी कोई प्रायश्चित्त नहीं है।
श्लोक 216 (skanda.3.36.216)
तेषां पापानि नश्यंति धनुष्कोटौ निम ज्जनात् मातृद्रोहपितृद्रोहयतिद्रोहरतात्मनाम्
teṣāṁ pāpāni naśyaṁti dhanuṣkoṭau nima jjanāt mātṛdrohapitṛdrohayatidroharatātmanām
उनके भी पाप धनुष्कोटि में डुबकी लगाने से नष्ट हो जाते हैं - माता, पिता या संन्यासी से द्रोह करने में रत रहने वालों के भी,
श्लोक 217 (skanda.3.36.217)
गुरुनिंदापराणां च शिवनिंदारतात्मनाम् विष्णुनिंदापराणां च यतिनिंदारतात्मनाम्
guruniṁdāparāṇāṁ ca śivaniṁdāratātmanām viṣṇuniṁdāparāṇāṁ ca yatiniṁdāratātmanām
गुरु की निंदा करने वालों के, शिव की निंदा में रत रहने वालों के, विष्णु की निंदा करने वालों के, तथा संन्यासियों की निंदा में रत रहने वालों के,
श्लोक 218 (skanda.3.36.218)
सत्कथादूषकाणां च प्रायश्चित्तं न विद्यते तेषां चात्र धनुष्कोटौ स्नानाच्छुद्धिर्भविष्यति
satkathādūṣakāṇāṁ ca prāyaścittaṁ na vidyate teṣāṁ cātra dhanuṣkoṭau snānācchuddhirbhaviṣyati
तथा सत्कथाओं को दूषित करने वालों के, जिनके लिए कोई प्रायश्चित्त नहीं है - उनके लिए भी यहाँ धनुष्कोटि में स्नान से शुद्धि होगी।
श्लोक 219 (skanda.3.36.219)
एवं वः कथितं विप्रा धनुष्कोटेस्तु वैभवम् यच्छ्रुत्वा सर्वपापेभ्यो मुच्यते मानवो भुवि
evaṁ vaḥ kathitaṁ viprā dhanuṣkoṭestu vaibhavam yacchrutvā sarvapāpebhyo mucyate mānavo bhuvi
इस प्रकार, हे विप्रो, मैंने तुम्हें धनुष्कोटि की महिमा बताई, जिसे सुनकर मनुष्य इस पृथ्वी पर सभी पापों से मुक्त हो जाता है।