ब्रह्म खण्ड · अध्याय 35
शृगाल-वानर की मुक्ति
श्लोक 1 (skanda.3.35.1)
यज्ञदेव उवाच दुर्वासर्षे महाप्राज्ञ परापरविचक्षण दुर्विनीताभिधः कोऽयं योऽसौ गुर्वंगनामगात्
yajñadeva uvāca durvāsarṣe mahāprājña parāparavicakṣaṇa durvinītābhidhaḥ ko'yaṁ yo'sau gurvaṁganāmagāt
यज्ञदेव ने कहा - "हे दुर्वासर्षि! हे महाप्राज्ञ, परापर के ज्ञाता! यह दुर्विनीत नामक कौन था, जो गुरुपत्नी के पास गया था?"
श्लोक 2 (skanda.3.35.2)
कस्य पुत्रो धनुष्कोटौ स्नानेन स कथं द्विजः तत्क्षणान्मुमुचे पापाद्गुरुस्त्रीगमसंभवात् एतन्मे श्रद्धधानस्य विस्तराद्वक्तुमर्हसि
kasya putro dhanuṣkoṭau snānena sa kathaṁ dvijaḥ tatkṣaṇānmumuce pāpādgurustrīgamasaṁbhavāt etanme śraddhadhānasya vistarādvaktumarhasi
"वह किसका पुत्र था, और वह द्विज धनुष्कोटि में स्नान करके गुरुस्त्रीगमन से उत्पन्न पाप से उसी क्षण कैसे मुक्त हुआ? श्रद्धापूर्वक सुनने वाले मुझे यह विस्तार से बताइए।"
श्लोक 3 (skanda.3.35.3)
दुर्वासा उवाच पांड्यदेशे पुरा कश्चिद्ब्राह्मणोभूद्बहुश्रुतः
durvāsā uvāca pāṁḍyadeśe purā kaścidbrāhmaṇobhūdbahuśrutaḥ
दुर्वासा ने कहा - "प्राचीन काल में पांड्य देश में एक अत्यंत विद्वान ब्राह्मण था,"
श्लोक 4 (skanda.3.35.4)
इध्मवाहाभिधो नाम्ना तस्य भार्या रुचिंस्तथा बभूव तस्य तनयो दुर्विनीताभिधो द्विजः
idhmavāhābhidho nāmnā tasya bhāryā ruciṁstathā babhūva tasya tanayo durvinītābhidho dvijaḥ
"जो इध्मवाह नाम से विख्यात था; उसकी पत्नी का नाम रुचि था। उसके एक पुत्र हुआ, जो दुर्विनीत नामक द्विज कहलाया।"
श्लोक 5 (skanda.3.35.5)
बाल्ये वयसि पुत्रस्य ममार जनकोऽस्य
bālye vayasi putrasya mamāra janako'sya
पुत्र के बाल्यकाल में ही इसके पिता का देहांत हो गया।
श्लोक 6 (skanda.3.35.6)
दुर्विनीतः पितुस्तस्य स कृत्वा चौर्ध्वदैहिकम्
durvinītaḥ pitustasya sa kṛtvā caurdhvadaihikam
दुर्विनीत ने अपने पिता के अंत्येष्टि-संस्कार संपन्न करके,
श्लोक 7 (skanda.3.35.7)
कंचित्कालं गृहेऽवात्सीन्मात्रा विधवया सह ततो दुर्भिक्षमभवद्वादशाब्दमवर्षणात्
kaṁcitkālaṁ gṛhe'vātsīnmātrā vidhavayā saha tato durbhikṣamabhavadvādaśābdamavarṣaṇāt
कुछ समय तक अपनी विधवा माता के साथ घर में रहा; तत्पश्चात वर्षा न होने से बारह वर्ष का दुर्भिक्ष पड़ा।
श्लोक 8 (skanda.3.35.8)
ततो देशांतरमगान्मात्रा साकं द्विजोत्तम गोकर्णं स समासाद्य सुभिक्षं धान्यसंचयैः
tato deśāṁtaramagānmātrā sākaṁ dvijottama gokarṇaṁ sa samāsādya subhikṣaṁ dhānyasaṁcayaiḥ
तब हे द्विजोत्तम! वह अपनी माता के साथ दूसरे देश को गया, और गोकर्ण पहुँचा, जो अन्न के भंडारों से सुभिक्ष था,
श्लोक 9 (skanda.3.35.9)
उवास सुचिरं कालं मात्रा विधवया सह ततो बहुतिथे काले दुर्विनीतो गते सति
uvāsa suciraṁ kālaṁ mātrā vidhavayā saha tato bahutithe kāle durvinīto gate sati
वहाँ वह अपनी विधवा माता के साथ बहुत समय तक रहा। फिर बहुत समय बीत जाने पर दुर्विनीत,
श्लोक 10 (skanda.3.35.10)
पूर्वदुष्कर्मपाकेन मूढबुद्धिरहो बत अनंगशरविद्धांगो रागाद्विकृतमानसः
pūrvaduṣkarmapākena mūḍhabuddhiraho bata anaṁgaśaraviddhāṁgo rāgādvikṛtamānasaḥ
पूर्व दुष्कर्म के फल के परिपाक से - हाय! - मूढ़बुद्धि होकर, कामदेव के बाणों से बिंधे अंगों वाला, राग से विकृतचित्त होकर,
श्लोक 11 (skanda.3.35.11)
मामेति वादिनीमंबां बलादाकृष्य पातकी बुभुजे काममोहात्मा मैथुनेन द्विजोत्तम
māmeti vādinīmaṁbāṁ balādākṛṣya pātakī bubhuje kāmamohātmā maithunena dvijottama
हे द्विजोत्तम! उस पापी ने कामवश मोहित होकर "यह क्या!" कहती हुई अपनी माता को बलपूर्वक खींचकर उसके साथ बलात्कारपूर्वक संभोग किया।
श्लोक 12 (skanda.3.35.12)
स खिन्नो दुर्विनीतोऽयं रेतःसेकादनंतरम् मनसा चिंतयन्पापं रुरोदभृशदुःखितः
sa khinno durvinīto'yaṁ retaḥsekādanaṁtaram manasā ciṁtayanpāpaṁ rurodabhṛśaduḥkhitaḥ
यह दुर्विनीत, वीर्यस्खलन के तुरंत बाद ही खिन्न होकर, मन में अपने पाप का चिंतन करते हुए अत्यंत दुःखी होकर रोने लगा।
श्लोक 13 (skanda.3.35.13)
अहोतिपापकृदहं महापातकिनां वरः अगमं जननीं यस्मात्कामबाणवशानुगः
ahotipāpakṛdahaṁ mahāpātakināṁ varaḥ agamaṁ jananīṁ yasmātkāmabāṇavaśānugaḥ
"हाय! मैं अत्यंत पापकर्मा हूँ, महापातकियों में श्रेष्ठ हूँ, क्योंकि कामबाण के वशीभूत होकर मैंने अपनी ही माता के साथ गमन किया!"
श्लोक 14 (skanda.3.35.14)
इति संचित्य मनसा स तत्र मुनिसन्निधौ जुगुप्तमानश्चात्मानं तान्मुनीनिदमब्रवीत्
iti saṁcitya manasā sa tatra munisannidhau juguptamānaścātmānaṁ tānmunīnidamabravīt
मन में ऐसा सोचकर और स्वयं से घृणा करते हुए उसने वहाँ मुनियों के समक्ष उन मुनियों से यह कहा -
श्लोक 15 (skanda.3.35.15)
गुरुस्त्रीगमपापस्य प्रायश्चित्तं ममद्विजाः वदध्वं शास्त्रतत्त्वज्ञाः कृपया मयि केवलम्
gurustrīgamapāpasya prāyaścittaṁ mamadvijāḥ vadadhvaṁ śāstratattvajñāḥ kṛpayā mayi kevalam
"हे शास्त्रतत्त्वज्ञ द्विजो! केवल मुझ पर कृपा करके गुरुस्त्रीगमन के पाप का प्रायश्चित्त बताइए।"
श्लोक 16 (skanda.3.35.16)
मरणान्निष्कृतिः स्याच्चेन्मरिष्यामि न संशयः भवद्भिरुच्यते यत्तु प्रायश्चित्तं ममाधुना
maraṇānniṣkṛtiḥ syāccenmariṣyāmi na saṁśayaḥ bhavadbhirucyate yattu prāyaścittaṁ mamādhunā
"यदि मृत्यु से ही मुक्ति हो सकती है, तो मैं निःसंदेह मर जाऊँगा; आप लोग अभी मेरे लिए जो भी प्रायश्चित्त बताएँगे,"
श्लोक 17 (skanda.3.35.17)
करिष्ये तद्द्विजाः सत्यं मरणं वान्यदैव वा तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य केचित्तत्रमुनीश्वराः
kariṣye taddvijāḥ satyaṁ maraṇaṁ vānyadaiva vā tacchrutvā vacanaṁ tasya kecittatramunīśvarāḥ
"हे द्विजो! मैं वह सत्य ही करूँगा, चाहे मृत्यु हो या कुछ और।" उसकी यह बात सुनकर वहाँ के कुछ मुनीश्वरों ने,
श्लोक 18 (skanda.3.35.18)
अनेन साकं वार्ता तु दोषायेति विनिश्चिताः मौनित्वं भेजिरे केचिन्मुनयः केचिदा भृशम्
anena sākaṁ vārtā tu doṣāyeti viniścitāḥ maunitvaṁ bhejire kecinmunayaḥ kecidā bhṛśam
यह निश्चय करके कि इससे बातचीत करना भी दोषपूर्ण है, मौन धारण कर लिया; और कुछ मुनि अत्यंत क्रोधित हो उठे।
श्लोक 19 (skanda.3.35.19)
दुष्टात्मा मातृगामी त्वं महापातकिनां वरः गच्छगच्छेतिबहुशो वाचमूचुर्द्विजोत्तमाः
duṣṭātmā mātṛgāmī tvaṁ mahāpātakināṁ varaḥ gacchagacchetibahuśo vācamūcurdvijottamāḥ
"तू दुष्टात्मा है, मातृगामी है, महापातकियों में श्रेष्ठ है; चला जा, चला जा!" - उन श्रेष्ठ द्विजों ने बार-बार ऐसे वचन कहे।
श्लोक 20 (skanda.3.35.20)
तान्निवार्य कृपाशीलः सर्वज्ञः करुणानिधिः कृष्णद्वैपायनस्तत्र दुर्विनीतमभाषत
tānnivārya kṛpāśīlaḥ sarvajñaḥ karuṇānidhiḥ kṛṣṇadvaipāyanastatra durvinītamabhāṣata
उन्हें रोककर कृपाशील, सर्वज्ञ, करुणानिधान कृष्णद्वैपायन (व्यास) ने वहाँ दुर्विनीत से कहा -
श्लोक 21 (skanda.3.35.21)
गच्छाशु रामसेतौ त्वं धनुष्कोटौ सहांबया मकरस्थे रवौ माघे मासमेकं निरंतरम्
gacchāśu rāmasetau tvaṁ dhanuṣkoṭau sahāṁbayā makarasthe ravau māghe māsamekaṁ niraṁtaram
"तुम शीघ्र ही अपनी माता के साथ रामसेतु, धनुष्कोटि को जाओ; माघ मास में जब सूर्य मकर राशि में हो, तब एक मास तक निरंतर,"
श्लोक 22 (skanda.3.35.22)
जितेंद्रियो जितक्रोधः परद्रोहविवर्जितः एकमासं निराहारः कुरु स्नानं सहांबया
jiteṁdriyo jitakrodhaḥ paradrohavivarjitaḥ ekamāsaṁ nirāhāraḥ kuru snānaṁ sahāṁbayā
"जितेंद्रिय, जितक्रोध और परद्रोह से रहित होकर, एक मास तक निराहार रहकर अपनी माता के साथ स्नान करो।"
श्लोक 23 (skanda.3.35.23)
पूतो भविष्यस्यद्धा गुरुस्त्री गमदोषतः यत्पातकं न नश्येत सेतुस्नानेन तन्नहि
pūto bhaviṣyasyaddhā gurustrī gamadoṣataḥ yatpātakaṁ na naśyeta setusnānena tannahi
"तुम गुरुस्त्रीगमन के दोष से निश्चय ही पवित्र हो जाओगे; ऐसा कोई पाप नहीं है जो सेतु-स्नान से नष्ट न हो।"
श्लोक 24 (skanda.3.35.24)
श्रुतिस्मृतिपुराणेषु धनुष्कोटिप्रशंसनम् बहुधा भण्यते पंचमहापातकनाशनम्
śrutismṛtipurāṇeṣu dhanuṣkoṭipraśaṁsanam bahudhā bhaṇyate paṁcamahāpātakanāśanam
"श्रुति, स्मृति और पुराणों में धनुष्कोटि की प्रशंसा अनेक प्रकार से कही गई है, जो पंच महापातकों का नाश करने वाली है।"
श्लोक 25 (skanda.3.35.25)
तस्मात्त्वं त्वरया गच्छ धनुष्कोटिं सहांबया प्रमाणं कुरु मद्वाक्यं वेदवाक्यमिव द्विज
tasmāttvaṁ tvarayā gaccha dhanuṣkoṭiṁ sahāṁbayā pramāṇaṁ kuru madvākyaṁ vedavākyamiva dvija
"इसलिए तुम शीघ्र ही अपनी माता के साथ धनुष्कोटि जाओ; हे द्विज! मेरे वचन को वेदवाक्य के समान प्रमाण मानो।"
श्लोक 26 (skanda.3.35.26)
श्रीरामधनुषः कोटौ स्नातस्य द्विज पुत्रक महापातककोट्योपि नैव लक्ष्या इतीव हि
śrīrāmadhanuṣaḥ koṭau snātasya dvija putraka mahāpātakakoṭyopi naiva lakṣyā itīva hi
"हे द्विज पुत्र! श्रीराम के धनुष की कोटि में स्नान करने वाले के लिए तो करोड़ों महापातक भी कुछ नहीं गिने जाते।"
श्लोक 27 (skanda.3.35.27)
प्रायश्चित्तांतरं प्रोक्तं मन्वादिस्मृतिभिः स्मृतौ तद्गच्छत्वं धनुष्कोटिं महापातक नाशिनीम्
prāyaścittāṁtaraṁ proktaṁ manvādismṛtibhiḥ smṛtau tadgacchatvaṁ dhanuṣkoṭiṁ mahāpātaka nāśinīm
"स्मृतियों में मनु आदि द्वारा अन्य प्रायश्चित्त भी बताए गए हैं; परंतु तुम महापातकनाशिनी धनुष्कोटि को ही जाओ।"
श्लोक 28 (skanda.3.35.28)
इतीरितोऽथ व्यासेन दुर्विनीतोद्विजोत्तमाः मात्रा साकं धनुष्कोटिं नत्वा व्यासं च निर्ययौ
itīrito'tha vyāsena durvinītodvijottamāḥ mātrā sākaṁ dhanuṣkoṭiṁ natvā vyāsaṁ ca niryayau
हे द्विजोत्तमो! व्यास द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर दुर्विनीत ने व्यास को प्रणाम करके अपनी माता के साथ धनुष्कोटि की ओर प्रस्थान किया।
श्लोक 29 (skanda.3.35.29)
मकरस्थे रवौ माघे मासमात्रं निरंतरम् मात्रा सह निराहारो जितक्रोधो जितेंद्रियः
makarasthe ravau māghe māsamātraṁ niraṁtaram mātrā saha nirāhāro jitakrodho jiteṁdriyaḥ
माघ मास में जब सूर्य मकर राशि में था, एक पूरे मास तक अपनी माता के साथ निराहार रहकर, क्रोध और इंद्रियों को जीतकर,
श्लोक 30 (skanda.3.35.30)
श्रीरामधनुषः कोटौ सस्नौ संकल्पपूर्वकम् रामनाथं नमस्कुर्वं स्त्रिकालं भक्तिपूर्वकम्
śrīrāmadhanuṣaḥ koṭau sasnau saṁkalpapūrvakam rāmanāthaṁ namaskurvaṁ strikālaṁ bhaktipūrvakam
उसने संकल्पपूर्वक श्रीराम के धनुष की कोटि में स्नान किया, और भक्तिपूर्वक त्रिकाल रामनाथ को नमस्कार किया।
श्लोक 31 (skanda.3.35.31)
मासांते पारणां कृत्वा मात्रा सह विशुद्धधीः व्यासांतिकं पुनः प्रायात्तस्मै वृत्तं निवेदितुम्
māsāṁte pāraṇāṁ kṛtvā mātrā saha viśuddhadhīḥ vyāsāṁtikaṁ punaḥ prāyāttasmai vṛttaṁ niveditum
मास के अंत में अपनी माता के साथ पारणा करके, अब विशुद्ध बुद्धि वाला होकर, वह अपना वृत्तांत बताने के लिए पुनः व्यास के पास गया।
श्लोक 32 (skanda.3.35.32)
स प्रणम्य पुनर्व्यासं दुर्विनीतोऽब्रवीद्वचः
sa praṇamya punarvyāsaṁ durvinīto'bravīdvacaḥ
व्यास को फिर से प्रणाम करके दुर्विनीत ने यह वचन कहा -
श्लोक 33 (skanda.3.35.33)
दुर्विनीत उवाच भगवन्करुणासिंधो द्वैपायन महत्तम भवतः कृपया रामधनुष्कोटौ सहांबया माघमासे निराहारो मासमात्रमतंद्रितः
durvinīta uvāca bhagavankaruṇāsiṁdho dvaipāyana mahattama bhavataḥ kṛpayā rāmadhanuṣkoṭau sahāṁbayā māghamāse nirāhāro māsamātramataṁdritaḥ
दुर्विनीत ने कहा - "हे भगवन! हे करुणासिंधु, महत्तम द्वैपायन! आपकी कृपा से माता के साथ माघ मास में एक पूरे महीने तक निराहार, सजग रहकर,"
श्लोक 34 (skanda.3.35.34)
अहं त्वकरवं स्नानं नमस्कुर्वन्महेश्वरम् इतः परं मया व्यास भगवन्भक्तवत्सल
ahaṁ tvakaravaṁ snānaṁ namaskurvanmaheśvaram itaḥ paraṁ mayā vyāsa bhagavanbhaktavatsala
"मैंने रामधनुष्कोटि में स्नान किया, महेश्वर को नमस्कार करते हुए। हे व्यास! हे भगवन! हे भक्तवत्सल! अब इसके आगे,"
श्लोक 35 (skanda.3.35.35)
यत्कर्त्तव्यं मुने तत्त्वं ममोपदिश तत्त्वतः इति तस्य वचः श्रुत्वा दुर्विनीतस्य वै मुनिः बभाषे दुर्विनीतं तं व्यासो नारायणांशकः
yatkarttavyaṁ mune tattvaṁ mamopadiśa tattvataḥ iti tasya vacaḥ śrutvā durvinītasya vai muniḥ babhāṣe durvinītaṁ taṁ vyāso nārāyaṇāṁśakaḥ
"हे मुने! अब मुझे क्या करना है, वह मुझे यथार्थ रूप में बताइए।" दुर्विनीत के इस वचन को सुनकर नारायण के अंश मुनि व्यास ने उस दुर्विनीत से कहा -
श्लोक 36 (skanda.3.35.36)
व्यास उवाच दुर्विनीत गतं तेऽद्य पातकं मातृसंगजम्
vyāsa uvāca durvinīta gataṁ te'dya pātakaṁ mātṛsaṁgajam
व्यास ने कहा - "हे दुर्विनीत! तुम्हारा मातृसंगजनित पाप आज नष्ट हो गया है।"
श्लोक 37 (skanda.3.35.37)
मातुश्च पातकं नष्टं त्वत्संगतिनिमि त्तजम् संदेहो नात्र कर्तव्यः सत्यमुक्तं मया तव
mātuśca pātakaṁ naṣṭaṁ tvatsaṁgatinimi ttajam saṁdeho nātra kartavyaḥ satyamuktaṁ mayā tava
"और तुम्हारे संग से उत्पन्न हुआ तुम्हारी माता का पाप भी नष्ट हो गया है; इसमें कोई संदेह मत करो - मैंने तुमसे सत्य कहा है।"
श्लोक 38 (skanda.3.35.38)
बांधवाः स्वजनाः सर्वे तथान्ये ब्राह्मणाश्च ये सर्वे त्वां संग्रहीष्यंति दुर्विनीतां बया सह
bāṁdhavāḥ svajanāḥ sarve tathānye brāhmaṇāśca ye sarve tvāṁ saṁgrahīṣyaṁti durvinītāṁ bayā saha
"तुम्हारे सभी बंधु-बांधव, स्वजन, तथा अन्य ब्राह्मण भी - सब तुम्हें, हे दुर्विनीत, तुम्हारी माता सहित स्वीकार करेंगे।"
श्लोक 39 (skanda.3.35.39)
मत्प्रसादाद्धनुष्कोटौ विशुद्धस्त्वं निमज्जनात् दारसंग्रहणं कृत्वा गार्हस्थ्यं धर्ममाचर
matprasādāddhanuṣkoṭau viśuddhastvaṁ nimajjanāt dārasaṁgrahaṇaṁ kṛtvā gārhasthyaṁ dharmamācara
"मेरी कृपा से धनुष्कोटि में स्नान से तुम शुद्ध हो चुके हो; अब विवाह करके गृहस्थ धर्म का आचरण करो।"
श्लोक 40 (skanda.3.35.40)
त्यज त्वं प्राणिहिंसां च धर्मं भज सनातनम् सेवस्व सज्जनान्नित्यं भक्तियुक्तेन चेतसा
tyaja tvaṁ prāṇihiṁsāṁ ca dharmaṁ bhaja sanātanam sevasva sajjanānnityaṁ bhaktiyuktena cetasā
"प्राणिहिंसा को त्याग दो, और सनातन धर्म का पालन करो; सज्जनों की सदा भक्तिपूर्ण चित्त से सेवा करो।"
श्लोक 41 (skanda.3.35.41)
संध्योपासनमुख्यानि नित्यकर्माणि न त्यज निगृहीष्वेन्द्रियग्राममर्चयस्व हरं हरिम्
saṁdhyopāsanamukhyāni nityakarmāṇi na tyaja nigṛhīṣvendriyagrāmamarcayasva haraṁ harim
"संध्या-उपासना आदि नित्यकर्मों को कभी मत त्यागो; इंद्रियसमूह को वश में रखो, और हर और हरि दोनों का पूजन करो।"
श्लोक 42 (skanda.3.35.42)
परापवादं मा ब्रूया मासूयां भज कर्हिचित् अन्यस्याभ्युदयं दृष्ट्वा संतापं कृणु मा वृथा
parāpavādaṁ mā brūyā māsūyāṁ bhaja karhicit anyasyābhyudayaṁ dṛṣṭvā saṁtāpaṁ kṛṇu mā vṛthā
"किसी की निंदा मत करो, और कभी ईर्ष्या मत करो; दूसरे की उन्नति देखकर व्यर्थ ही संताप मत करो।"
श्लोक 43 (skanda.3.35.43)
मातृवत्परदा रांश्च त्वन्नित्यमवलोकय अधीतवेदानखिलान्माविस्मर कदाचन
mātṛvatparadā rāṁśca tvannityamavalokaya adhītavedānakhilānmāvismara kadācana
"पराई स्त्रियों को सदा माता के समान देखो; तुमने जितने भी वेद पढ़े हैं, उन्हें कभी मत भूलना।"
श्लोक 44 (skanda.3.35.44)
अतिथीन्मावमन्यस्व श्राद्धं पितृदिने कुरु पैशून्यं मा वदस्व त्वं स्वप्नेऽप्यन्स्य कर्हिचित्
atithīnmāvamanyasva śrāddhaṁ pitṛdine kuru paiśūnyaṁ mā vadasva tvaṁ svapne'pyansya karhicit
"अतिथियों का अपमान मत करो; पितृदिवस पर श्राद्ध करो; किसी की चुगली स्वप्न में भी कभी मत करना।"
श्लोक 45 (skanda.3.35.45)
इतिहासपुराणानि धर्मशास्त्राणि संततम् अवलोकय वेदांतं वेदांगानि तथा पुनः
itihāsapurāṇāni dharmaśāstrāṇi saṁtatam avalokaya vedāṁtaṁ vedāṁgāni tathā punaḥ
"इतिहास-पुराणों और धर्मशास्त्रों का निरंतर अध्ययन करो; तथा वेदांत और वेदांगों का भी बार-बार अध्ययन करो।"
श्लोक 46 (skanda.3.35.46)
हरिशंकरना मानि मुक्तलज्जोऽनुकीर्त्तय जाबालोपनिषन्मंत्रैस्त्रिपुंड्रोद्धूलनं कुरु
hariśaṁkaranā māni muktalajjo'nukīrttaya jābālopaniṣanmaṁtraistripuṁḍroddhūlanaṁ kuru
"निर्लज्ज होकर (संकोच त्यागकर) हरि और शंकर के नामों का सदा कीर्तन करो; जाबाल उपनिषद के मंत्रों से त्रिपुंड्र धारण करो।"
श्लोक 47 (skanda.3.35.47)
रुद्राक्षान्धारय सदा शौचाचारपरो भव तुलस्या बिल्वपत्रैश्च नारायणहरावुभौ
rudrākṣāndhāraya sadā śaucācāraparo bhava tulasyā bilvapatraiśca nārāyaṇaharāvubhau
"सदा रुद्राक्ष धारण करो और शौच-आचार में तत्पर रहो; तुलसीदल और बिल्वपत्र से नारायण और हर दोनों की,"
श्लोक 48 (skanda.3.35.48)
एकं कालं द्विकालं वा त्रिकालं चार्चयस्य भोः तुलसीदलसंमिश्रं सिक्तं पादोदकेन च
ekaṁ kālaṁ dvikālaṁ vā trikālaṁ cārcayasya bhoḥ tulasīdalasaṁmiśraṁ siktaṁ pādodakena ca
"हे भद्र! एक बार, दो बार, या तीन बार पूजा करो; तुलसीदल मिश्रित और चरणामृत से सिंचित,"
श्लोक 49 (skanda.3.35.49)
नैवेद्यान्नं सदा भुंक्ष्व शंभुनारायणाग्रतः कुरु त्वं वैश्वदेवाख्यं बलिमन्नविशुद्धये
naivedyānnaṁ sadā bhuṁkṣva śaṁbhunārāyaṇāgrataḥ kuru tvaṁ vaiśvadevākhyaṁ balimannaviśuddhaye
"शंभु और नारायण के आगे अर्पित नैवेद्य का ही सदा भोजन करो; अन्न की शुद्धि के लिए वैश्वदेव नामक बलि करो।"
श्लोक 50 (skanda.3.35.50)
यतीश्वरान्ब्रह्मनिष्ठान्तर्पयान्नैर्गृहागतान् वृद्धानन्याननाथांश्च रोगिणो ब्रह्मचारिणः
yatīśvarānbrahmaniṣṭhāntarpayānnairgṛhāgatān vṛddhānanyānanāthāṁśca rogiṇo brahmacāriṇaḥ
"घर आए हुए ब्रह्मनिष्ठ यतीश्वरों को, वृद्धों को, अनाथों को, रोगियों को और ब्रह्मचारियों को अन्न से तृप्त करो।"
श्लोक 51 (skanda.3.35.51)
कुरु त्वं मातृशुश्रूषामौपासनपरो भव पंचाक्षरं महामंत्रं प्रणवेन समन्वितम्
kuru tvaṁ mātṛśuśrūṣāmaupāsanaparo bhava paṁcākṣaraṁ mahāmaṁtraṁ praṇavena samanvitam
"अपनी माता की सेवा करो, और औपासन (गृह्याग्नि) की उपासना में तत्पर रहो; प्रणव सहित पंचाक्षर महामंत्र का,"
श्लोक 52 (skanda.3.35.52)
तथैवाष्टाक्षरं मंत्रमन्यमंत्रानपि द्विज जप त्वं प्रयतो भूत्वा ध्यायन्मंत्राधिदेवताः
tathaivāṣṭākṣaraṁ maṁtramanyamaṁtrānapi dvija japa tvaṁ prayato bhūtvā dhyāyanmaṁtrādhidevatāḥ
"तथा अष्टाक्षर मंत्र और अन्य मंत्रों का भी, हे द्विज! पवित्र होकर जप करो, मंत्र के अधिष्ठाता देवताओं का ध्यान करते हुए।"
श्लोक 53 (skanda.3.35.53)
एवमन्यांस्तथा धर्मान्स्मृत्युक्तान्त्सर्वदा कुरु एवं कृतव्रतस्ते स्याद्देहांते मुक्तिरप्यलम्
evamanyāṁstathā dharmānsmṛtyuktāntsarvadā kuru evaṁ kṛtavrataste syāddehāṁte muktirapyalam
"इसी प्रकार अन्य धर्मों का भी, जो स्मृतियों में कहे गए हैं, सदा पालन करो; इस प्रकार व्रतपालन करने पर देहांत में तुम्हें मुक्ति भी प्राप्त होगी।"
श्लोक 54 (skanda.3.35.54)
इत्युक्तो व्यासमुनिना दुर्विनीतः प्रणम्य तम् तदुक्तमखिलं कृत्वा देहांते मुक्तिमाप्तवान्
ityukto vyāsamuninā durvinītaḥ praṇamya tam taduktamakhilaṁ kṛtvā dehāṁte muktimāptavān
व्यास मुनि द्वारा इस प्रकार उपदेश दिए जाने पर दुर्विनीत ने उन्हें प्रणाम किया, और जो कुछ बताया गया था वह सब करके देहांत में मुक्ति प्राप्त की।
श्लोक 55 (skanda.3.35.55)
तन्मातापि मृता काले धनुष्कोटिनिमज्जनात अवाप परमां मुक्तिमपुनर्भवदायिनीम्
tanmātāpi mṛtā kāle dhanuṣkoṭinimajjanāta avāpa paramāṁ muktimapunarbhavadāyinīm
उसकी माता ने भी समय आने पर मृत्यु होने पर, धनुष्कोटि में स्नान के प्रभाव से, पुनर्जन्म से मुक्ति देने वाली परम मुक्ति प्राप्त की।
श्लोक 56 (skanda.3.35.56)
दुर्वासा उवाच एवं ते दुर्विनीतस्य तन्मातुश्च विमोक्षणम् धनुष्कोट्यभिषेकेण यज्ञदेव मयेरितम्
durvāsā uvāca evaṁ te durvinītasya tanmātuśca vimokṣaṇam dhanuṣkoṭyabhiṣekeṇa yajñadeva mayeritam
दुर्वासा ने कहा - "हे यज्ञदेव! इस प्रकार मैंने तुम्हें धनुष्कोटि के अभिषेक से दुर्विनीत और उसकी माता की मुक्ति की कथा सुनाई।"
श्लोक 57 (skanda.3.35.57)
पुत्रमेनं त्वमप्याशु ब्रह्महत्याविशुद्धये समादाय व्रज ब्रह्मन्धनुष्कोटिं विमुक्तिदाम्
putramenaṁ tvamapyāśu brahmahatyāviśuddhaye samādāya vraja brahmandhanuṣkoṭiṁ vimuktidām
"हे ब्राह्मण! तुम भी इस अपने पुत्र की ब्रह्महत्या की शुद्धि के लिए इसे शीघ्र लेकर मुक्तिदायिनी धनुष्कोटि जाओ।"
श्लोक 58 (skanda.3.35.58)
सिंधुद्वीप उवाच इति दुर्वाससा प्रोक्तो यज्ञदेवो निजं सुतम् समादाय ययौ राम धनुष्कोटिं विमुक्तिदाम्
siṁdhudvīpa uvāca iti durvāsasā prokto yajñadevo nijaṁ sutam samādāya yayau rāma dhanuṣkoṭiṁ vimuktidām
सिंधुद्वीप ने कहा - "दुर्वासा द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर यज्ञदेव अपने पुत्र को लेकर मुक्तिदायिनी राम-धनुष्कोटि गया।"
श्लोक 59 (skanda.3.35.59)
गत्वा निवासमकरोत्षण्मासं तत्र स द्विजः पुत्रेण साकं नियतो हे सृगालप्लवंगमौ
gatvā nivāsamakarotṣaṇmāsaṁ tatra sa dvijaḥ putreṇa sākaṁ niyato he sṛgālaplavaṁgamau
हे सियार और वानर! वहाँ जाकर वह ब्राह्मण अपने पुत्र के साथ नियमपूर्वक छह महीने तक निवास करता रहा।
श्लोक 60 (skanda.3.35.60)
स सस्नौ च धनुष्कोटौ षण्मासं वै स पुत्रकः षण्मासांते यज्ञदेवं प्राह वागशरीरिणी
sa sasnau ca dhanuṣkoṭau ṣaṇmāsaṁ vai sa putrakaḥ ṣaṇmāsāṁte yajñadevaṁ prāha vāgaśarīriṇī
और उस पुत्र ने धनुष्कोटि में पूरे छह मास तक स्नान किया; छह मास के अंत में एक आकाशवाणी ने यज्ञदेव से कहा -
श्लोक 61 (skanda.3.35.61)
विमुक्ता यज्ञदेवस्य ब्रह्महत्या सुतस्य ते स्वर्णस्तेयात्सुरापानात्किरातीसंगमात्तथा
vimuktā yajñadevasya brahmahatyā sutasya te svarṇasteyātsurāpānātkirātīsaṁgamāttathā
"हे यज्ञदेव! तुम्हारे पुत्र की ब्रह्महत्या मुक्त हो गई है, तथा स्वर्णचोरी, सुरापान और किरातिनी-संगम से भी वह मुक्त हो गया है।"
श्लोक 62 (skanda.3.35.62)
अन्येभ्योपि हि पापेभ्यो विमुक्तोयं सुतस्तव संशयं मा कुरुष्व त्वं यज्ञदेव द्विजोत्तम
anyebhyopi hi pāpebhyo vimuktoyaṁ sutastava saṁśayaṁ mā kuruṣva tvaṁ yajñadeva dvijottama
"तुम्हारा यह पुत्र अन्य पापों से भी मुक्त हो गया है; हे यज्ञदेव! हे द्विजोत्तम! तुम कोई संशय मत करो।"
श्लोक 63 (skanda.3.35.63)
इत्युक्त्वा विररामाथ सा तु वाग शरीरिणी तदाऽशरीरिणीवाक्यं यज्ञदेवः स शुश्रुवान्
ityuktvā virarāmātha sā tu vāga śarīriṇī tadā'śarīriṇīvākyaṁ yajñadevaḥ sa śuśruvān
यह कहकर वह आकाशवाणी शांत हो गई; और यज्ञदेव ने उस आकाशवाणी के वचन को सुना।
श्लोक 64 (skanda.3.35.64)
संतुष्टः पुत्रसहितो रामनाथं निषेव्य च धनुष्कोटिं नमस्कृत्य पुत्रेण सहि तस्तदा
saṁtuṣṭaḥ putrasahito rāmanāthaṁ niṣevya ca dhanuṣkoṭiṁ namaskṛtya putreṇa sahi tastadā
प्रसन्न होकर, पुत्र सहित रामनाथ की सेवा-आराधना करके, और पुत्र सहित धनुष्कोटि को नमस्कार करके,
श्लोक 65 (skanda.3.35.65)
स्वदेशं प्रययौ हृष्टः स्वग्रामं स्वगृहं तथा सपुत्रदारः सुचिरं सुखमास्ते सुनिर्वृतः
svadeśaṁ prayayau hṛṣṭaḥ svagrāmaṁ svagṛhaṁ tathā saputradāraḥ suciraṁ sukhamāste sunirvṛtaḥ
वह प्रसन्नतापूर्वक अपने देश, अपने गाँव, अपने घर को गया; और पुत्र-पत्नी सहित बहुत समय तक अत्यंत संतुष्ट होकर सुखपूर्वक रहा।
श्लोक 66 (skanda.3.35.66)
सिन्धुद्वीप उवाच गोमायुवानरावेवं युवयोः कथितं मया यज्ञदेवसुतस्यास्य सुमतेः परिमोक्षणम्
sindhudvīpa uvāca gomāyuvānarāvevaṁ yuvayoḥ kathitaṁ mayā yajñadevasutasyāsya sumateḥ parimokṣaṇam
सिंधुद्वीप ने कहा - "हे सियार और वानर! इस प्रकार मैंने तुम दोनों को यज्ञदेव के इस पुत्र सुमति की पूर्ण मुक्ति की कथा सुनाई।"
श्लोक 67 (skanda.3.35.67)
पातकेभ्यो महद्भ्यश्च धनुष्कोटौ निमज्जनात् युवामतो धनुष्कोटिं गच्छतं पापशुद्धये नान्यथा पापशुद्धिः स्यात्प्रायश्चित्तायुतैरपि
pātakebhyo mahadbhyaśca dhanuṣkoṭau nimajjanāt yuvāmato dhanuṣkoṭiṁ gacchataṁ pāpaśuddhaye nānyathā pāpaśuddhiḥ syātprāyaścittāyutairapi
"धनुष्कोटि में स्नान करने से बड़े-बड़े पातक भी नष्ट हो जाते हैं; इसलिए तुम दोनों पाप-शुद्धि के लिए धनुष्कोटि जाओ - अन्यथा दस हजार प्रायश्चित्तों से भी पाप-शुद्धि संभव नहीं।"
श्लोक 68 (skanda.3.35.68)
श्रीसूत उवाच सिन्धुद्वीपस्य वचनमिति श्रुत्वा द्विजो त्तमाः
śrīsūta uvāca sindhudvīpasya vacanamiti śrutvā dvijo ttamāḥ
श्री सूतजी ने कहा - "हे द्विजोत्तमो! सिंधुद्वीप के इस वचन को सुनकर,"
श्लोक 69 (skanda.3.35.69)
सृगालवानरावाशु विलंघितमहापथौ धनुष्कोटिं प्रयासेन गत्वा स्नात्वा च तज्जले
sṛgālavānarāvāśu vilaṁghitamahāpathau dhanuṣkoṭiṁ prayāsena gatvā snātvā ca tajjale
सियार और वानर दोनों तुरंत महामार्ग को पार करते हुए बड़े प्रयास से धनुष्कोटि पहुँचे, और उसके जल में स्नान किया।
श्लोक 70 (skanda.3.35.70)
विमुक्तौ सर्वपापेभ्यो विमानवरसंस्थितौ देवैः कुसुमवर्षेण कीर्यमाणौ सुतेजसौ
vimuktau sarvapāpebhyo vimānavarasaṁsthitau devaiḥ kusumavarṣeṇa kīryamāṇau sutejasau
सभी पापों से मुक्त होकर, उत्तम विमान पर विराजमान होकर, देवताओं द्वारा पुष्पवर्षा से आच्छादित होते हुए, तेजस्वी होकर,
श्लोक 71 (skanda.3.35.71)
हारकेयूरमुकुटकटकादिविभूषितौ देवस्त्रीधूयमानाभ्यां चामराभ्यां विराजितौ गत्वा देवपुरीं रम्यामिंद्र स्यार्द्धासनं गतौ
hārakeyūramukuṭakaṭakādivibhūṣitau devastrīdhūyamānābhyāṁ cāmarābhyāṁ virājitau gatvā devapurīṁ ramyāmiṁdra syārddhāsanaṁ gatau
हार, केयूर, मुकुट, कंकण आदि से विभूषित होकर, देवांगनाओं द्वारा हिलाए जाते चँवरों से सुशोभित होकर, वे रमणीय देवपुरी को गए और इंद्र के अर्धासन को प्राप्त हुए।
श्लोक 72 (skanda.3.35.72)
श्रीसूत उवाच युष्माकमेवं कथितं सृगालस्य कपेरपि
śrīsūta uvāca yuṣmākamevaṁ kathitaṁ sṛgālasya kaperapi
श्री सूतजी ने कहा - "इस प्रकार मैंने तुम्हें सियार और वानर की भी यह कथा सुनाई है,"
श्लोक 73 (skanda.3.35.73)
पापाद्विमोक्षणं विप्रा धनुष्कोटौ निमजनात् भक्त्या य इममध्यायं शृणोति पठतेऽपि वा
pāpādvimokṣaṇaṁ viprā dhanuṣkoṭau nimajanāt bhaktyā ya imamadhyāyaṁ śṛṇoti paṭhate'pi vā
"जो धनुष्कोटि में स्नान से पापमुक्ति की कथा है, हे विप्रो! जो कोई भी भक्तिपूर्वक इस अध्याय को सुनता है या पढ़ता है,"
श्लोक 74 (skanda.3.35.74)
स्नानजं फलमाप्नोति धनुष्कोटौ स मानवः योगिवृंदैरसुलभां मुक्तिमप्याशु विंदति
snānajaṁ phalamāpnoti dhanuṣkoṭau sa mānavaḥ yogivṛṁdairasulabhāṁ muktimapyāśu viṁdati
वह मनुष्य धनुष्कोटि में स्नान का फल प्राप्त करता है, और योगिवृंदों को भी दुर्लभ मुक्ति को शीघ्र प्राप्त कर लेता है।