ब्रह्म खण्ड · अध्याय 38
कद्रू-कृत-छल-दोष-शांति-कथा
श्लोक 1 (skanda.3.38.1)
ऋषय ऊचुः सूत कद्रुः कथं मुक्ता क्षीरकुंडनिमज्जनात् छलं कथं कृतवती सपत्न्यां पापनिश्चया
ṛṣaya ūcuḥ sūta kadruḥ kathaṁ muktā kṣīrakuṁḍanimajjanāt chalaṁ kathaṁ kṛtavatī sapatnyāṁ pāpaniścayā
ऋषियों ने कहा - हे सूत, कद्रू क्षीरकुंड में डूबकर कैसे मुक्त हुई? पापनिश्चय वाली उसने अपनी सौत के साथ किस प्रकार छल किया?
श्लोक 2 (skanda.3.38.2)
कस्य पुत्री च सा कद्रूः सपत्नीसा च कस्य वै किमर्थमजयत्कद्रूः स्वसपत्नीं छलेन तु एतन्नः श्रद्दधानानां ब्रूहि सूत कृपानिधे
kasya putrī ca sā kadrūḥ sapatnīsā ca kasya vai kimarthamajayatkadrūḥ svasapatnīṁ chalena tu etannaḥ śraddadhānānāṁ brūhi sūta kṛpānidhe
वह कद्रू किसकी पुत्री थी, और उसकी सौत किसकी पुत्री थी? कद्रू ने किस कारण अपनी सौत को छल से जीता? हे कृपानिधि सूत, श्रद्धावान हम लोगों को यह बताइए।
श्लोक 3 (skanda.3.38.3)
श्रीसूत उवाच शृणुध्वं मुनयः सर्वे इतिहासं महाफलम् पुरा कृतयुगे विप्राः प्रजापतिसुते उभे
śrīsūta uvāca śṛṇudhvaṁ munayaḥ sarve itihāsaṁ mahāphalam purā kṛtayuge viprāḥ prajāpatisute ubhe
श्रीसूत जी बोले - हे मुनियो, महान फल देने वाला यह इतिहास सुनो। पूर्वकाल में कृतयुग में, हे विप्रो, प्रजापति की दो पुत्रियाँ थीं,
श्लोक 4 (skanda.3.38.4)
कद्रूश्च विनता चेति भगिन्यौ संबभूवतुः भार्ये ते कश्यपस्यास्तां कद्रूश्च विनता तथा
kadrūśca vinatā ceti bhaginyau saṁbabhūvatuḥ bhārye te kaśyapasyāstāṁ kadrūśca vinatā tathā
कद्रू और विनता नामक दो बहनें; वे दोनों कश्यप की पत्नियाँ बनीं - कद्रू और विनता।
श्लोक 5 (skanda.3.38.5)
विनता सुषुवे पुत्रावरुणं गरुडं तथा भर्त्तुः सकाशात्कद्रूश्च लेभे सर्पान्बहून्सुतान्
vinatā suṣuve putrāvaruṇaṁ garuḍaṁ tathā bharttuḥ sakāśātkadrūśca lebhe sarpānbahūnsutān
विनता ने अरुण और गरुड़ नामक दो पुत्रों को जन्म दिया; और अपने पति से कद्रू ने अनेक सर्प-पुत्र प्राप्त किए,
श्लोक 6 (skanda.3.38.6)
अनंतवासुकिमुखान्विषदर्पसमन्वितान् एकदा तु भगिन्यौ ते कद्रूश्च विनता तथा
anaṁtavāsukimukhānviṣadarpasamanvitān ekadā tu bhaginyau te kadrūśca vinatā tathā
अनंत और वासुकि आदि, जो विष के मद से युक्त थे। एक बार वे दोनों बहनें, कद्रू और विनता,
श्लोक 7 (skanda.3.38.7)
अपश्यतां समायांतमुच्चैःश्रवसमं तिकात् विलोक्य कद्रूस्तुरगं विनतामिदमब्रवीत्
apaśyatāṁ samāyāṁtamuccaiḥśravasamaṁ tikāt vilokya kadrūsturagaṁ vinatāmidamabravīt
दूर से आते हुए उच्चैःश्रवा नामक घोड़े को देखकर, उस घोड़े को देखकर कद्रू ने विनता से यह कहा।
श्लोक 8 (skanda.3.38.8)
श्वेतोऽश्ववालो नीलो वा विनते ब्रूहि तत्त्वतः इत्युक्त्वा विनता विप्राः कद्रूं तामिदमब्र वीत् तुरंगः श्वेतवालो मे प्रतिभाति सुमध्यमे किं वा त्वं मन्यसे कद्रूरिति तां विनताऽब्रवीत्
śveto'śvavālo nīlo vā vinate brūhi tattvataḥ ityuktvā vinatā viprāḥ kadrūṁ tāmidamabra vīt turaṁgaḥ śvetavālo me pratibhāti sumadhyame kiṁ vā tvaṁ manyase kadrūriti tāṁ vinatā'bravīt
"हे विनते, सच-सच बताओ, घोड़े की पूँछ सफेद है या काली?" ऐसा कहने पर, हे विप्रो, विनता ने कद्रू से कहा - "मुझे तो, हे सुमध्यमे, यह घोड़ा श्वेत-पूँछ वाला प्रतीत होता है; तुम क्या मानती हो, कद्रू?" ऐसा विनता ने उससे कहा।
श्लोक 9 (skanda.3.38.9)
पृष्ट्वैवं विनतां कद्रूर्बभाषे स्वमतं च सा कृष्णवालमहं मन्ये हयमेनमनिंदिते
pṛṣṭvaivaṁ vinatāṁ kadrūrbabhāṣe svamataṁ ca sā kṛṣṇavālamahaṁ manye hayamenamaniṁdite
इस प्रकार विनता से पूछकर कद्रू ने अपना मत बताया - "हे निर्दोष, मैं तो इस घोड़े की पूँछ को काला मानती हूँ।"
श्लोक 10 (skanda.3.38.10)
ततः पराजये कृत्वा दासीभावं पणं मिथः व्यतिष्ठेतां महाभागे सपत्न्यौ ते द्विजोत्तमाः
tataḥ parājaye kṛtvā dāsībhāvaṁ paṇaṁ mithaḥ vyatiṣṭhetāṁ mahābhāge sapatnyau te dvijottamāḥ
तब हारने वाली को दासी बनाने की शर्त लगाकर, हे श्रेष्ठ द्विजो, वे महाभागा सौतें अपनी-अपनी बात पर अड़ी रहीं।
श्लोक 11 (skanda.3.38.11)
ततः कद्रूर्निजसुतान्वासुकिप्रमुखानहीन् तस्या नाहं यथा दासी तथा कुरुत पुत्रकाः
tataḥ kadrūrnijasutānvāsukipramukhānahīn tasyā nāhaṁ yathā dāsī tathā kuruta putrakāḥ
तब कद्रू ने वासुकि आदि अपने सर्प-पुत्रों से कहा - "पुत्रो, ऐसा करो कि मैं उसकी दासी न बनूँ।
श्लोक 12 (skanda.3.38.12)
तस्याभीप्सितसिद्ध्यर्थमित्यवोचद्भृशा तुरा युष्माभिरुच्चैःश्रवसो बालः प्रच्छाद्यतामिति
tasyābhīpsitasiddhyarthamityavocadbhṛśā turā yuṣmābhiruccaiḥśravaso bālaḥ pracchādyatāmiti
अपनी इच्छा-सिद्धि के लिए अत्यंत उत्सुक होकर उसने कहा - "तुम लोग उच्चैःश्रवा की पूँछ को ढक दो।"
श्लोक 13 (skanda.3.38.13)
नांगीचक्रुर्मतं तस्या नागाः कद्रू रुषा तदा अशपत्कुपिता पुत्राञ्ज्वलंती रोषमूर्च्छिता
nāṁgīcakrurmataṁ tasyā nāgāḥ kadrū ruṣā tadā aśapatkupitā putrāñjvalaṁtī roṣamūrcchitā
नागों ने उसकी बात नहीं मानी; तब क्रोध में जलती हुई, रोष से मूर्च्छित कद्रू ने कुपित होकर अपने पुत्रों को शाप दिया।
श्लोक 14 (skanda.3.38.14)
पारीक्षितस्य सर्वेऽद्धा यूयं सत्रे मरिष्यथ इति शापे कृते मात्रा त्रस्तः कर्कोटकस्तदा
pārīkṣitasya sarve'ddhā yūyaṁ satre mariṣyatha iti śāpe kṛte mātrā trastaḥ karkoṭakastadā
"तुम सब निश्चय ही परीक्षित के सर्प-सत्र में मर जाओगे।" माता द्वारा इस प्रकार शाप दिए जाने पर, कर्कोटक तब भयभीत होकर,
श्लोक 15 (skanda.3.38.15)
प्रणम्य पादयोः कद्रूं दीनो वचनमब्रवीत् अहमुच्चैःश्रवोवालं विधास्याम्यंजनप्रभम्
praṇamya pādayoḥ kadrūṁ dīno vacanamabravīt ahamuccaiḥśravovālaṁ vidhāsyāmyaṁjanaprabham
कद्रू के चरणों में प्रणाम करके दीनतापूर्वक बोला - "मैं उच्चैःश्रवा की पूँछ को काजल के समान काला कर दूँगा।
श्लोक 16 (skanda.3.38.16)
मा भीरंब त्वया कार्येत्यवादीच्छापविक्लवः श्वेतमुच्चैःश्रवोवालं ततः कर्कोटकोरगः
mā bhīraṁba tvayā kāryetyavādīcchāpaviklavaḥ śvetamuccaiḥśravovālaṁ tataḥ karkoṭakoragaḥ
हे माता, भयभीत मत हो, यह तुम्हारे लिए किया जाएगा" - शाप से विचलित होकर उसने ऐसा कहा। तब सर्प कर्कोटक ने उच्चैःश्रवा की श्वेत पूँछ को,
श्लोक 17 (skanda.3.38.17)
छादयित्वा स्वभोगेन व्यतनोदंजनद्युतिम् अथ ते विनताकद्र्वौ दास्ये कृतपणे उभे
chādayitvā svabhogena vyatanodaṁjanadyutim atha te vinatākadrvau dāsye kṛtapaṇe ubhe
अपने ही शरीर से लपेटकर काजल के समान काला कर दिया। फिर विनता और कद्रू दोनों, दासत्व की शर्त लगाकर,
श्लोक 18 (skanda.3.38.18)
देवराजहयं द्रष्टुं संरंभादभ्यगच्छ ताम् शशांकशंखमाणिक्यमुक्तैरावतकारणम्
devarājahayaṁ draṣṭuṁ saṁraṁbhādabhyagaccha tām śaśāṁkaśaṁkhamāṇikyamuktairāvatakāraṇam
देवराज के घोड़े को देखने के लिए उत्सुकतापूर्वक उसके पास गईं, शशांक, शंख, माणिक्य और मुक्ता से बने ऐरावत हाथी को पार करके,
श्लोक 19 (skanda.3.38.19)
युगांतकालशयनं योगनिद्राकृतो हरेः अतीत्य कद्रूविनते समुद्रं सरितां पतिम्
yugāṁtakālaśayanaṁ yoganidrākṛto hareḥ atītya kadrūvinate samudraṁ saritāṁ patim
तथा प्रलयकाल की शय्या पर योगनिद्रा में लीन हरि को भी पार करके, कद्रू और विनता समुद्र को, जो नदियों का स्वामी है, पार करके,
श्लोक 20 (skanda.3.38.20)
ददृशतुर्हयं गत्वा देवराजस्य वाहनम् कृष्णवालं हयं दृष्ट्वा विनता दुःखिताऽभवत्
dadṛśaturhayaṁ gatvā devarājasya vāhanam kṛṣṇavālaṁ hayaṁ dṛṣṭvā vinatā duḥkhitā'bhavat
जाकर देवराज के वाहन उस घोड़े को देखा। घोड़े की पूँछ को काली देखकर विनता दुःखी हो गई।
श्लोक 21 (skanda.3.38.21)
दुःखितां विनतां कद्रूर्दासीकृत्ये न्ययुंक्त सा एतस्मिन्नंतरे तार्क्ष्योऽप्यंडमुद्भिद्य वह्निवत्
duḥkhitāṁ vinatāṁ kadrūrdāsīkṛtye nyayuṁkta sā etasminnaṁtare tārkṣyo'pyaṁḍamudbhidya vahnivat
कद्रू ने दुःखी विनता को दासी के कार्य में नियुक्त किया। इसी बीच तार्क्ष्य (गरुड़) भी अपने अंडे को अग्नि के समान फोड़कर,
श्लोक 22 (skanda.3.38.22)
प्रादुर्बभूव विप्रेंद्रा गिरिमात्रशरीरवान् दृष्ट्वा तद्देहमाहात्म्यमभूत्त्रस्तं जगत्त्रयम्
prādurbabhūva vipreṁdrā girimātraśarīravān dṛṣṭvā taddehamāhātmyamabhūttrastaṁ jagattrayam
पर्वत जैसे विशाल शरीर वाला होकर प्रकट हुआ, हे श्रेष्ठ विप्रो। उसके शरीर की महिमा देखकर तीनों लोक भयभीत हो गए।
श्लोक 23 (skanda.3.38.23)
ततस्तं तुष्टुवुर्देवा गरुडं पक्षिणां वरम् दृष्ट्वा तद्देहमाहात्म्यं त्रस्तं स्याद्भुवनत्रयम्
tatastaṁ tuṣṭuvurdevā garuḍaṁ pakṣiṇāṁ varam dṛṣṭvā taddehamāhātmyaṁ trastaṁ syādbhuvanatrayam
तब देवताओं ने पक्षियों में श्रेष्ठ उस गरुड़ की स्तुति की; क्योंकि उसके शरीर की महिमा देखकर तीनों भुवन त्रस्त हो गए थे।
श्लोक 24 (skanda.3.38.24)
इत्यालोच्योपसंहृत्य देहमत्यंतभीषणम् अरुणं पृष्ठमारोप्य मातुरंतिकमभ्यगात्
ityālocyopasaṁhṛtya dehamatyaṁtabhīṣaṇam aruṇaṁ pṛṣṭhamāropya māturaṁtikamabhyagāt
ऐसा सोचकर उसने अपने अत्यंत भयंकर शरीर को समेट लिया, और अरुण को अपनी पीठ पर बिठाकर माता के पास गया।
श्लोक 25 (skanda.3.38.25)
अथाह विनतां कद्रूः प्रणतामतिविह्वलाम् चेटि नागालयं गंतुमुद्योगो मम वर्तते
athāha vinatāṁ kadrūḥ praṇatāmativihvalām ceṭi nāgālayaṁ gaṁtumudyogo mama vartate
तब कद्रू ने अत्यंत विह्वल और झुकी हुई विनता से कहा - "हे दासी, मेरा नागलोक जाने का विचार है।
श्लोक 26 (skanda.3.38.26)
त्वत्पुत्रो गरुडोतो मां मत्पुत्रांश्च वहत्विति ततश्च विनता पुत्रं गरुडं प्रत्यभाषत
tvatputro garuḍoto māṁ matputrāṁśca vahatviti tataśca vinatā putraṁ garuḍaṁ pratyabhāṣata
तेरा पुत्र गरुड़ मुझे और मेरे पुत्रों को ढोए।" तब विनता ने अपने पुत्र गरुड़ से कहा।
श्लोक 27 (skanda.3.38.27)
अहं कद्रूमिमां वक्ष्ये त्वं सर्पान्वह तत्सुतान् तथेति गरुडो मातुः प्रत्यगृह्णद्वचो द्विजाः
ahaṁ kadrūmimāṁ vakṣye tvaṁ sarpānvaha tatsutān tatheti garuḍo mātuḥ pratyagṛhṇadvaco dvijāḥ
"मैं इस कद्रू को ढोऊँगी, तुम उसके सर्प-पुत्रों को ढोना।" "ऐसा ही होगा," कहकर गरुड़ ने माता की बात स्वीकार की, हे द्विजो।
श्लोक 28 (skanda.3.38.28)
अवहद्विनता कद्रूं सर्वांस्तान्गरुडोऽवहत् रविसामीप्यगाः सर्पास्तत्करैराहतास्तदा
avahadvinatā kadrūṁ sarvāṁstāngaruḍo'vahat ravisāmīpyagāḥ sarpāstatkarairāhatāstadā
विनता ने कद्रू को ढोया, और गरुड़ ने उन सब सर्पों को ढोया। सूर्य के समीप जाने पर सर्प उसकी किरणों से झुलस गए।
श्लोक 29 (skanda.3.38.29)
अस्तौषीद्वज्रिणं कद्रूः सुतानां तापशांतये सर्वतापं जलासारैर्देवराजोऽप्यशामयत
astauṣīdvajriṇaṁ kadrūḥ sutānāṁ tāpaśāṁtaye sarvatāpaṁ jalāsārairdevarājo'pyaśāmayata
कद्रू ने पुत्रों की जलन शांत करने के लिए इंद्र की स्तुति की; देवराज ने भी जल की वर्षा से सारी जलन शांत कर दी।
श्लोक 30 (skanda.3.38.30)
नीयमानास्तदा सर्पा गरुडेन बलीयसा गत्वा तं देशमचिरादवदन्विनतासुतम्
nīyamānāstadā sarpā garuḍena balīyasā gatvā taṁ deśamacirādavadanvinatāsutam
तब बलवान गरुड़ द्वारा ले जाए जा रहे सर्पों ने, कुछ दूर जाकर, शीघ्र ही विनतापुत्र से कहा।
श्लोक 31 (skanda.3.38.31)
वयं द्वीपांतरं गंतुं सर्वे द्रष्टुं कृतत्वराः वह त्वमस्मान्गरुड चेटीसुत ततः क्षणात्
vayaṁ dvīpāṁtaraṁ gaṁtuṁ sarve draṣṭuṁ kṛtatvarāḥ vaha tvamasmāngaruḍa ceṭīsuta tataḥ kṣaṇāt
"हम सब दूसरे द्वीप में जाकर देखने के लिए उत्सुक हैं; हे गरुड़, हे दासीपुत्र, तुरंत हमें वहाँ ले चलो।
श्लोक 32 (skanda.3.38.32)
ततो मातर मप्राक्षीद्विनतां गरुडो द्विजाः अहं कस्माद्वहामीमांस्त्वं चेमां वहसे सदा
tato mātara maprākṣīdvinatāṁ garuḍo dvijāḥ ahaṁ kasmādvahāmīmāṁstvaṁ cemāṁ vahase sadā
तब गरुड़ ने माता विनता से पूछा, हे द्विजो - "मैं इन सर्पों को क्यों ढोता हूँ, और तुम इसे (कद्रू को) सदा क्यों ढोती हो?
श्लोक 33 (skanda.3.38.33)
चेटीपुत्रेति मामेते कि भणंति सरीसृपाः सर्वमेतद्वद त्वं मे मातस्तत्त्वेन पृच्छतः
ceṭīputreti māmete ki bhaṇaṁti sarīsṛpāḥ sarvametadvada tvaṁ me mātastattvena pṛcchataḥ
ये सरीसृप मुझे 'दासीपुत्र' क्यों कहते हैं? हे माता, तुम मुझे यह सब सत्यतः बताओ, क्योंकि मैं पूछ रहा हूँ।
श्लोक 34 (skanda.3.38.34)
पृष्टैवं जननी तेन गरुडं प्राब्रवीत्सुतम् भगिन्या क्रूरया पुत्र च्छलेनाहं पराजिता
pṛṣṭaivaṁ jananī tena garuḍaṁ prābravītsutam bhaginyā krūrayā putra cchalenāhaṁ parājitā
इस प्रकार पूछे जाने पर माता ने पुत्र गरुड़ से कहा - "हे पुत्र, अपनी क्रूर बहन के छल से मैं पराजित हुई।
श्लोक 35 (skanda.3.38.35)
तस्या दासी भवाम्यद्य चेटीपुत्रस्ततो भवान् अतस्त्वं वहसे सर्पान्वहाम्येनामहं सदा
tasyā dāsī bhavāmyadya ceṭīputrastato bhavān atastvaṁ vahase sarpānvahāmyenāmahaṁ sadā
तब से मैं उसकी दासी हूँ, इसलिए तुम भी 'दासीपुत्र' कहलाते हो। इसीलिए तुम सर्पों को ढोते हो, और मैं सदा उसे ढोती हूँ।"
श्लोक 36 (skanda.3.38.36)
इत्यादि सर्ववृत्तांतमादितोऽस्मै न्यवेदयत् अथ तां गरुडोऽवा दीन्मातरं विनतासुतः
ityādi sarvavṛttāṁtamādito'smai nyavedayat atha tāṁ garuḍo'vā dīnmātaraṁ vinatāsutaḥ
इस प्रकार उसने आदि से सारा वृत्तांत उसे बता दिया। तब विनतापुत्र गरुड़ ने अपनी माता से कहा।
श्लोक 37 (skanda.3.38.37)
अस्माद्दास्याद्विमोक्षार्थं किं कार्यं ते मयाधुना इति पृष्टा सुतेनाथ विनता तमभाषत
asmāddāsyādvimokṣārthaṁ kiṁ kāryaṁ te mayādhunā iti pṛṣṭā sutenātha vinatā tamabhāṣata
"इस दासत्व से मुक्ति के लिए मुझे अभी क्या करना चाहिए?" पुत्र द्वारा इस प्रकार पूछे जाने पर विनता ने उससे कहा।
श्लोक 38 (skanda.3.38.38)
सर्पान्पृच्छस्व गरुड मम मातृविमोक्षणे युष्माकं मातुः किं कार्यं मयेति वदताधुना
sarpānpṛcchasva garuḍa mama mātṛvimokṣaṇe yuṣmākaṁ mātuḥ kiṁ kāryaṁ mayeti vadatādhunā
"हे गरुड़, मेरी माता की मुक्ति के लिए सर्पों से पूछो कि मुझसे अब उन्हें क्या चाहिए, यह पूछकर बताओ।"
श्लोक 39 (skanda.3.38.39)
इति मात्रा समुदितो गरुडः पन्नगान्प्रति गत्वाऽपृच्छद्विज श्रेष्ठास्तेऽप्येनमवदंस्तदा
iti mātrā samudito garuḍaḥ pannagānprati gatvā'pṛcchadvija śreṣṭhāste'pyenamavadaṁstadā
माता द्वारा इस प्रकार प्रेरित होकर गरुड़ सर्पों के पास जाकर पूछा; और उन्होंने, हे श्रेष्ठ द्विजो, तब उससे कहा।
श्लोक 40 (skanda.3.38.40)
यदा हरिष्यसे शीघ्रं सुधां त्वममरालयात् दास्यान्मुक्ता भवेन्माता वैनतेय तवाद्य हि
yadā hariṣyase śīghraṁ sudhāṁ tvamamarālayāt dāsyānmuktā bhavenmātā vainateya tavādya hi
"जब तुम शीघ्र ही देवलोक से अमृत ले आओगे, तब हे वैनतेय, तुम्हारी माता आज ही दासत्व से मुक्त हो जाएगी।"
श्लोक 41 (skanda.3.38.41)
ततो मातरमागम्य गरुडः प्रणतोऽब्रवीत् सुधामंब ममानेतुं गच्छतो भक्ष्यमर्पय
tato mātaramāgamya garuḍaḥ praṇato'bravīt sudhāmaṁba mamānetuṁ gacchato bhakṣyamarpaya
तब गरुड़ ने माता के पास आकर प्रणाम करते हुए कहा - "हे माता, अमृत लाने के लिए जा रहा हूँ, मुझे भोजन दो।"
श्लोक 42 (skanda.3.38.42)
इतीरिता सुतं प्राह माता तं विनता सुतम् समुद्रमध्ये वर्तंते शबराः कतिचित्सुत
itīritā sutaṁ prāha mātā taṁ vinatā sutam samudramadhye vartaṁte śabarāḥ katicitsuta
इस प्रकार पूछे जाने पर माता विनता ने पुत्र से कहा - "हे पुत्र, समुद्र के बीच कुछ शबर (वनवासी शिकारी) रहते हैं;
श्लोक 43 (skanda.3.38.43)
तान्भक्षयित्वा शबरानमृतं त्वमिहानय तत्र कश्चिद्द्विजः कामी शवरीसंगकौतुकी
tānbhakṣayitvā śabarānamṛtaṁ tvamihānaya tatra kaściddvijaḥ kāmī śavarīsaṁgakautukī
उन शबरों को खाकर तुम यहाँ अमृत ले आओ। परंतु वहाँ एक कामी ब्राह्मण भी है, जो शबरी-संग में रत है -
श्लोक 44 (skanda.3.38.44)
त्यज तं ब्राह्मणं कंठं दहंतं ब्रह्मतेजसा पक्षादीनि तवांगानि पांतु देवा मरुन्मुखाः
tyaja taṁ brāhmaṇaṁ kaṁṭhaṁ dahaṁtaṁ brahmatejasā pakṣādīni tavāṁgāni pāṁtu devā marunmukhāḥ
उस ब्राह्मण को छोड़ देना, वह ब्रह्मतेज से तुम्हारा गला जला देगा। मरुतों के अध्यक्ष देवगण तुम्हारे पंख आदि अंगों की रक्षा करें।"
श्लोक 45 (skanda.3.38.45)
इति स्वमातुराशीर्भिर्गरुडो वर्धितो ययौ शबरालयमभ्येत्य तस्य भक्षय तो मुखम्
iti svamāturāśīrbhirgaruḍo vardhito yayau śabarālayamabhyetya tasya bhakṣaya to mukham
इस प्रकार माता के आशीर्वाद से बलशाली होकर गरुड़ चल पड़ा। शबरों के निवास पर पहुँचकर उसने उन्हें निगलने के लिए मुँह खोला।
श्लोक 46 (skanda.3.38.46)
आवृतं प्राविशन्व्याधा वयांसीव दरीं गिरेः अथ स ब्राह्मणोऽप्यागात्तत्कंठं मुनिपुंगवाः
āvṛtaṁ prāviśanvyādhā vayāṁsīva darīṁ gireḥ atha sa brāhmaṇo'pyāgāttatkaṁṭhaṁ munipuṁgavāḥ
जैसे पक्षी पर्वत की गुफा में प्रवेश करते हैं, वैसे ही शिकारी उसके खुले मुँह में प्रवेश कर गए। तब वह ब्राह्मण भी उसके गले में जा पहुँचा, हे मुनिश्रेष्ठो।
श्लोक 47 (skanda.3.38.47)
कण्ठं दहन्तं विप्रं तमुवाच विनतासुतः विप्र पापोऽप्यवध्यो हि निर्याहि त्वमतो बहिः
kaṇṭhaṁ dahantaṁ vipraṁ tamuvāca vinatāsutaḥ vipra pāpo'pyavadhyo hi niryāhi tvamato bahiḥ
गला जलाते हुए उस ब्राह्मण से विनतापुत्र ने कहा - "हे विप्र, पापी ब्राह्मण भी अवध्य है, इसलिए तुम बाहर निकल जाओ।"
श्लोक 48 (skanda.3.38.48)
एवमुक्तस्तदा विप्रो गरुडं प्रत्यभाषत किराती मम भार्यापि निर्गंतव्या मया सह
evamuktastadā vipro garuḍaṁ pratyabhāṣata kirātī mama bhāryāpi nirgaṁtavyā mayā saha
इस प्रकार कहे जाने पर ब्राह्मण ने गरुड़ से कहा - "मेरी शबरी पत्नी को भी मेरे साथ बाहर आना होगा।"
श्लोक 49 (skanda.3.38.49)
एवमस्त्विति तं विप्रमुवाच पतगेश्वरः ततः स गरुडो विप्रमुज्जगार सभार्यकम्
evamastviti taṁ vipramuvāca patageśvaraḥ tataḥ sa garuḍo vipramujjagāra sabhāryakam
"ऐसा ही हो," यह कहकर पक्षिराज ने उस ब्राह्मण से कहा; तब गरुड़ ने उस ब्राह्मण को उसकी पत्नी सहित उगल दिया।
श्लोक 50 (skanda.3.38.50)
विप्रोऽप्यभीप्सितान्देशान्निषाद्या सह निर्ययौ शबरान्भक्षयित्वाऽथ गरुडः पक्षिणां वरः
vipro'pyabhīpsitāndeśānniṣādyā saha niryayau śabarānbhakṣayitvā'tha garuḍaḥ pakṣiṇāṁ varaḥ
वह ब्राह्मण भी उस निषाद स्त्री के साथ अपने इच्छित प्रदेशों को चला गया। शबरों को खाकर पक्षियों में श्रेष्ठ गरुड़ ने,
श्लोक 51 (skanda.3.38.51)
आत्मनः पितरं वेगात्कश्यपं समुपेयिवान् कुत्र यासीति तत्पृष्टो गरुडस्तम भाषत
ātmanaḥ pitaraṁ vegātkaśyapaṁ samupeyivān kutra yāsīti tatpṛṣṭo garuḍastama bhāṣata
शीघ्र ही अपने पिता कश्यप के पास पहुँचा। "कहाँ जा रहे हो?" यह पूछे जाने पर गरुड़ ने उनसे कहा।
श्लोक 52 (skanda.3.38.52)
मातुर्दास्यविमोक्षाय सुधामाहर्तुमागमम् बहून्किराताञ्जग्ध्वापि तृप्तिर्मम न जायते
māturdāsyavimokṣāya sudhāmāhartumāgamam bahūnkirātāñjagdhvāpi tṛptirmama na jāyate
"माता को दासत्व से मुक्त कराने के लिए अमृत लाने आया हूँ। अनेक शबरों को खाकर भी मुझे तृप्ति नहीं हो रही;
श्लोक 53 (skanda.3.38.53)
अपर्यंतक्षुधा ब्रह्मन्बाधते मामह र्निशम् तन्निवृत्तिप्रदं भक्ष्यं ममार्पय तपोधन
aparyaṁtakṣudhā brahmanbādhate māmaha rniśam tannivṛttipradaṁ bhakṣyaṁ mamārpaya tapodhana
हे ब्रह्मन्, अनंत भूख मुझे रात-दिन पीड़ित कर रही है; इसे शांत करने वाला भोजन मुझे दीजिए, हे तपोधन,
श्लोक 54 (skanda.3.38.54)
येनाहं शक्नुयां तात सुधामाहर्तुमोजसा इतीरितः सुतं प्राह कश्यपो विनतोद्भवम्
yenāhaṁ śaknuyāṁ tāta sudhāmāhartumojasā itīritaḥ sutaṁ prāha kaśyapo vinatodbhavam
जिससे मैं, हे तात, बलपूर्वक अमृत ला सकूँ।" इस प्रकार कहे जाने पर कश्यप ने विनतापुत्र से कहा।
श्लोक 55 (skanda.3.38.55)
कश्यप उवाच मुनिर्विभावसुर्नाम्ना पुरासीत्तस्य सानुजः सुप्रतीक इति भ्राता तावुभौ वंशवैरिणौ
kaśyapa uvāca munirvibhāvasurnāmnā purāsīttasya sānujaḥ supratīka iti bhrātā tāvubhau vaṁśavairiṇau
कश्यप बोले - "पूर्वकाल में विभावसु नामक एक मुनि था, और उसका छोटा भाई सुप्रतीक नाम का था; वे दोनों भाई कुल-संपत्ति को लेकर परस्पर वैरी बन गए थे।
श्लोक 56 (skanda.3.38.56)
अन्योन्यं शेपतुर्विप्रा महाक्रोधसमाकुलौ गजोऽभवत्सुप्रतीकः कूर्मोऽभूच्च विभावसुः
anyonyaṁ śepaturviprā mahākrodhasamākulau gajo'bhavatsupratīkaḥ kūrmo'bhūcca vibhāvasuḥ
अत्यंत क्रोध से भरे उन दोनों ने, हे विप्रो, एक-दूसरे को शाप दे दिया; सुप्रतीक हाथी बन गया और विभावसु कछुआ बन गया।
श्लोक 57 (skanda.3.38.57)
एवं वित्तविवादात्तौ शेपतुर्भ्रातरौ मिथः गजः षड्यो जनोच्छ्रायो द्विगुणायामसंयुतः
evaṁ vittavivādāttau śepaturbhrātarau mithaḥ gajaḥ ṣaḍyo janocchrāyo dviguṇāyāmasaṁyutaḥ
इस प्रकार धन-विवाद के कारण वे दोनों भाई परस्पर शापित हुए। वह हाथी छह योजन ऊँचा और उससे दोगुना लंबा है,
श्लोक 58 (skanda.3.38.58)
कूर्मस्त्रियोजनोच्छ्रयो दशयोजनविस्तृतः बद्धवैरावुभावेतौ सरस्यस्मिन्विहंगम
kūrmastriyojanocchrayo daśayojanavistṛtaḥ baddhavairāvubhāvetau sarasyasminvihaṁgama
और वह कछुआ तीन योजन ऊँचा और दस योजन चौड़ा है। हे पक्षी, परस्पर वैर बाँधे हुए वे दोनों इसी सरोवर में,
श्लोक 59 (skanda.3.38.59)
पूर्ववैरमनुस्मृत्य युध्येते जेतुमिच्छया उभौ तौ भक्षयित्वा त्वं सुधामाहर तृप्तिमान्
pūrvavairamanusmṛtya yudhyete jetumicchayā ubhau tau bhakṣayitvā tvaṁ sudhāmāhara tṛptimān
पूर्ववैर का स्मरण करके विजय की इच्छा से लड़ रहे हैं। उन दोनों को खाकर, तृप्त होकर तुम अमृत ले आओ।"
श्लोक 60 (skanda.3.38.60)
एवं पित्रेरितः पक्षी गत्वा तद्गजकच्छपौ समुद्धत्य महाकायौ महाबलपराक्रमौ
evaṁ pitreritaḥ pakṣī gatvā tadgajakacchapau samuddhatya mahākāyau mahābalaparākramau
पिता द्वारा इस प्रकार निर्देशित होकर पक्षी वहाँ गया, और उस विशाल शरीर वाले, अत्यंत बलशाली हाथी और कछुए को उठाकर,
श्लोक 61 (skanda.3.38.61)
वहन्नखाभ्यां संतीर्थं विळंबाभिधमभ्यगात् तत्रागतं समालोक्य पक्षिराजं द्विजोसमाः
vahannakhābhyāṁ saṁtīrthaṁ viḷaṁbābhidhamabhyagāt tatrāgataṁ samālokya pakṣirājaṁ dvijosamāḥ
पंजों से पकड़े हुए विलंब नामक तीर्थ में पहुँचा। वहाँ आए हुए पक्षिराज को देखकर, हे द्विजतुल्यो,
श्लोक 62 (skanda.3.38.62)
तत्तीरजो महावृक्षो रोहिणाख्यो महोच्छ्रयः वैनतेयमिदं प्राह महाबलपराक्रमम्
tattīrajo mahāvṛkṣo rohiṇākhyo mahocchrayaḥ vainateyamidaṁ prāha mahābalaparākramam
उस तट पर उगे रोहिण नामक अत्यंत ऊँचे विशाल वृक्ष ने वैनतेय (गरुड़) से, जो महान बल और पराक्रम से युक्त था, यह कहा -
श्लोक 63 (skanda.3.38.63)
एनामारुह मच्छाखां शतयोजनमायताम् स्थित्वात्र गजकूर्मौ त्वं भक्षयस्व खगोत्तम
enāmāruha macchākhāṁ śatayojanamāyatām sthitvātra gajakūrmau tvaṁ bhakṣayasva khagottama
"मेरी सौ योजन लंबी इस शाखा पर चढ़ जाओ; यहाँ बैठकर, हे श्रेष्ठ पक्षी, तुम इन हाथी-कछुओं को खा लो।"
श्लोक 64 (skanda.3.38.64)
इत्युक्तस्तरुणा पक्षी स तत्रास्ते मनोजवः तद्भारात्सा तरोः शाखा भग्नाऽभूद्द्विजसत्तमाः
ityuktastaruṇā pakṣī sa tatrāste manojavaḥ tadbhārātsā taroḥ śākhā bhagnā'bhūddvijasattamāḥ
वृक्ष द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर, मनोवेगी वह पक्षी वहाँ बैठ गया; परंतु उस भार से वृक्ष की वह शाखा टूट गई, हे श्रेष्ठ द्विजो।
श्लोक 65 (skanda.3.38.65)
वालखिल्यमुनींस्तस्मिल्लँबमानानधोमुखान् दृष्ट्वा तत्पातशंकावाँस्तां शाखां गरुडोऽग्रहीत्
vālakhilyamunīṁstasmillaṁbamānānadhomukhān dṛṣṭvā tatpātaśaṁkāvāṁstāṁ śākhāṁ garuḍo'grahīt
उस शाखा पर उलटे लटके हुए वालखिल्य मुनियों को देखकर, उनके गिर पड़ने की आशंका से गरुड़ ने उस शाखा को स्वयं पकड़ लिया।
श्लोक 66 (skanda.3.38.66)
गजकूर्मो च तां शाखां गृहीत्वा यांतमं बरे पिता तस्याब्रवीत्तत्र गरुडं विनतासुतम्
gajakūrmo ca tāṁ śākhāṁ gṛhītvā yāṁtamaṁ bare pitā tasyābravīttatra garuḍaṁ vinatāsutam
हाथी, कछुए और उस शाखा को लेकर आकाश में जाते हुए, उसके पिता ने वहाँ विनतापुत्र गरुड़ से कहा।
श्लोक 67 (skanda.3.38.67)
त्यजेमां निर्जने शैले शाखां तं विनतोद्भव इत्युक्तः स तथा गत्वा शाखां निष्पुरुषे नगे
tyajemāṁ nirjane śaile śākhāṁ taṁ vinatodbhava ityuktaḥ sa tathā gatvā śākhāṁ niṣpuruṣe nage
"इस शाखा को किसी निर्जन पर्वत पर छोड़ दो, हे विनतापुत्र।" इस प्रकार कहे जाने पर वह गया, और उस निर्जन पर्वत पर,
श्लोक 68 (skanda.3.38.68)
विन्यस्याभक्षयत्पक्षी तौ तदा गजकच्छपौ अथोत्पातः समभवत्तस्मिन्नवसरे दिवि
vinyasyābhakṣayatpakṣī tau tadā gajakacchapau athotpātaḥ samabhavattasminnavasare divi
शाखा को रखकर पक्षी ने तब हाथी और कछुए को खा लिया। तभी उसी अवसर पर आकाश में एक अपशकुन हुआ।
श्लोक 69 (skanda.3.38.69)
दृष्ट्वोत्पातं बलारातिः पप्रच्छ स्वपुरोहितम् उत्पातकारणं जीव किमत्रेति पुनःपुनः बृहस्पतिस्तदा शक्रं प्रोवाच द्विजसत्तमाः
dṛṣṭvotpātaṁ balārātiḥ papraccha svapurohitam utpātakāraṇaṁ jīva kimatreti punaḥpunaḥ bṛhaspatistadā śakraṁ provāca dvijasattamāḥ
उस अपशकुन को देखकर इंद्र ने अपने पुरोहित से बार-बार पूछा - "हे जीव, इसका कारण क्या है?" तब बृहस्पति ने इंद्र से कहा, हे श्रेष्ठ द्विजो।
श्लोक 70 (skanda.3.38.70)
बृहस्पतिरुवाच काश्यपो हि मुनिः पूर्वमयजत्क्रतुना हरे
bṛhaspatiruvāca kāśyapo hi muniḥ pūrvamayajatkratunā hare
बृहस्पति बोले - "हे हरि, पूर्वकाल में कश्यप मुनि ने एक यज्ञ किया था,
श्लोक 71 (skanda.3.38.71)
सर्वान्नृषीन्सुरान्सिद्धान्यक्षान्गंधर्वकिन्नरान् यज्ञसंभारसिद्ध्यर्थं प्रेषयामास स द्विजाः
sarvānnṛṣīnsurānsiddhānyakṣāngaṁdharvakinnarān yajñasaṁbhārasiddhyarthaṁ preṣayāmāsa sa dvijāḥ
और यज्ञ-सामग्री एकत्र करने के लिए उसने सभी ऋषियों, देवों, सिद्धों, यक्षों, गंधर्वों और किन्नरों को भेजा था, हे द्विजो।
श्लोक 72 (skanda.3.38.72)
वालखिल्यान्ससंभारान्ह्रस्वानंगुष्ठमात्रकान् मज्जतो गोष्पदजले दृष्ट्वा हसितवान्भवान्
vālakhilyānsasaṁbhārānhrasvānaṁguṣṭhamātrakān majjato goṣpadajale dṛṣṭvā hasitavānbhavān
अंगूठे के बराबर छोटे-छोटे, सामग्री से लदे वालखिल्य मुनियों को गाय के खुर के जल में डूबते देखकर आपने उनका उपहास किया था।
श्लोक 73 (skanda.3.38.73)
भवतावमताः क्रुद्धा वालखिल्यास्तदा हरे जुहुवुर्यज्ञवह्नौ ते क्रोधेन ज्वलिताननाः
bhavatāvamatāḥ kruddhā vālakhilyāstadā hare juhuvuryajñavahnau te krodhena jvalitānanāḥ
हे हरि, आपके द्वारा अपमानित होकर क्रुद्ध वालखिल्यों ने, क्रोध से जलते मुख वाले होकर, यज्ञाग्नि में आहुति डालते हुए कहा -
श्लोक 74 (skanda.3.38.74)
देवेंद्रभयदः शत्रुः कश्यपस्य सुतोऽस्त्विति तस्य पुत्रोऽद्य गरुडः सुधाहरणकौतुकी
deveṁdrabhayadaḥ śatruḥ kaśyapasya suto'stviti tasya putro'dya garuḍaḥ sudhāharaṇakautukī
'कश्यप का ऐसा पुत्र हो जो देवेंद्र के लिए भय उत्पन्न करने वाला शत्रु हो।' उन्हीं का वह पुत्र, आज अमृत हरण की उत्सुकता वाला गरुड़,
श्लोक 75 (skanda.3.38.75)
समागच्छति तद्धेतुरयमुत्पात आगतः इत्युक्तः सोऽब्रवीदिंद्रो देवानग्निपुरोगमान्
samāgacchati taddheturayamutpāta āgataḥ ityuktaḥ so'bravīdiṁdro devānagnipurogamān
निकट आ रहा है; यही इस अपशकुन का कारण है।" इस प्रकार कहे जाने पर इंद्र ने अग्नि आदि देवताओं से कहा -
श्लोक 76 (skanda.3.38.76)
सुधामाहर्तुमायाति पक्षी सा रक्ष्यतामिति इतींद्रप्रेरिता देवा ररक्षुः सायुधाः सुधाम्
sudhāmāhartumāyāti pakṣī sā rakṣyatāmiti itīṁdrapreritā devā rarakṣuḥ sāyudhāḥ sudhām
"अमृत हरण करने के लिए एक पक्षी आ रहा है, उसकी रक्षा करो।" इस प्रकार इंद्र से प्रेरित होकर देवताओं ने शस्त्रधारी होकर अमृत की रक्षा की।
श्लोक 77 (skanda.3.38.77)
पक्षिराजस्तदाभ्यागाद्देवानायुधधारिणः महाबलं ते गरुडं दृष्ट्वाऽकम्पंत वै सुराः
pakṣirājastadābhyāgāddevānāyudhadhāriṇaḥ mahābalaṁ te garuḍaṁ dṛṣṭvā'kampaṁta vai surāḥ
तब पक्षिराज वहाँ आया; शस्त्रधारी उस महाबली गरुड़ को देखकर देवगण काँप उठे।
श्लोक 78 (skanda.3.38.78)
गरुडस्य सुराणां च ततो युद्धमभून्महत् अखंडि पक्षितुण्डेन भौवनोऽमृतपालकः
garuḍasya surāṇāṁ ca tato yuddhamabhūnmahat akhaṁḍi pakṣituṇḍena bhauvano'mṛtapālakaḥ
तब गरुड़ और देवताओं में भयंकर युद्ध हुआ। अमृत की रक्षा करने वाला भुवन-रक्षक पक्षी की चोंच से खंड-खंड कर दिया गया।
श्लोक 79 (skanda.3.38.79)
तदा निजघ्नुगर्रुडं देवाः शस्त्रैरनेकशः अतीव गरुडो देवैर्बाधितः शस्त्रपाणिभिः
tadā nijaghnugarruḍaṁ devāḥ śastrairanekaśaḥ atīva garuḍo devairbādhitaḥ śastrapāṇibhiḥ
तब देवताओं ने अनेक प्रकार के शस्त्रों से गरुड़ पर प्रहार किया; शस्त्रधारी देवताओं से अत्यंत पीड़ित होकर गरुड़ ने,
श्लोक 80 (skanda.3.38.80)
पक्षाभ्यामाक्षिपद्दूरे देवानग्निपुरोगमान् तत्पक्षविक्षिता देवास्तदा परमकोपनाः
pakṣābhyāmākṣipaddūre devānagnipurogamān tatpakṣavikṣitā devāstadā paramakopanāḥ
अपने पंखों से अग्नि आदि देवताओं को दूर फेंक दिया। उसके पंखों से आहत देवता तब अत्यंत क्रुद्ध होकर,
श्लोक 81 (skanda.3.38.81)
नाराचान्भिंदि पालांश्च नानाशस्त्राणि चाक्षिपन् ततस्तु गरुडो वेगाद्देवदृष्टिविलोपिनीम्
nārācānbhiṁdi pālāṁśca nānāśastrāṇi cākṣipan tatastu garuḍo vegāddevadṛṣṭivilopinīm
बाण, चक्र और नाना प्रकार के शस्त्र उस पर फेंकने लगे। तब गरुड़ ने वेगपूर्वक, देवताओं की दृष्टि को नष्ट करने वाली,
श्लोक 82 (skanda.3.38.82)
धूलिमुत्थापयामास पक्षाभ्यां विनतासुतः वायुना शमयामासुस्तान्पांसूंस्त्रिदशोत्तमाः
dhūlimutthāpayāmāsa pakṣābhyāṁ vinatāsutaḥ vāyunā śamayāmāsustānpāṁsūṁstridaśottamāḥ
धूल अपने पंखों से उड़ा दी, वह विनतापुत्र; उस धूल को श्रेष्ठ देवताओं ने वायु से शांत किया।
श्लोक 83 (skanda.3.38.83)
रुद्रान्वसूंस्तथादित्यान्मरुतोऽन्यान्सुरांस्तथा गरुडः पक्षतुंडाभ्यां व्यथितानकरोद्द्विजाः
rudrānvasūṁstathādityānmaruto'nyānsurāṁstathā garuḍaḥ pakṣatuṁḍābhyāṁ vyathitānakaroddvijāḥ
रुद्रगण, वसुगण, आदित्यगण, मरुद्गण तथा अन्य देवताओं को भी, गरुड़ ने अपने पंख और चोंच से व्यथित कर दिया, हे द्विजो।
श्लोक 84 (skanda.3.38.84)
पलायितेषु देवेषु सोऽद्राक्षीज्ज्वलनं पुरः ज्वलंतं परितस्त्वग्निं शमापयितुमुद्ययौ
palāyiteṣu deveṣu so'drākṣījjvalanaṁ puraḥ jvalaṁtaṁ paritastvagniṁ śamāpayitumudyayau
देवताओं के भाग जाने पर उसने सामने प्रज्वलित अग्नि देखी; चारों ओर जल रही उस अग्नि को शांत करने के लिए वह आगे बढ़ा।
श्लोक 85 (skanda.3.38.85)
स सहस्रमुखो भूत्वा तैः पिबञ्छतशो नदीः तमग्निं नाशयामास तैः पयोभिस्त्वरान्वितः
sa sahasramukho bhūtvā taiḥ pibañchataśo nadīḥ tamagniṁ nāśayāmāsa taiḥ payobhistvarānvitaḥ
वह सहस्रमुख होकर उन मुखों से सैकड़ों नदियों का जल पी गया, और उन्हीं जलों से शीघ्रतापूर्वक उस अग्नि को बुझा दिया।
श्लोक 86 (skanda.3.38.86)
सितधारं भ्रमच्चक्रं सुधारक्षकमंतिके दृष्ट्वा तदरिरंध्रेण संक्षिप्तांगोतराविशत्
sitadhāraṁ bhramaccakraṁ sudhārakṣakamaṁtike dṛṣṭvā tadariraṁdhreṇa saṁkṣiptāṁgotarāviśat
अमृत की रक्षा करने वाला तीक्ष्ण-धार वाला घूमता हुआ चक्र निकट देखकर, उसके ब्लेडों के बीच के अंतराल से अपने शरीर को संकुचित करके वह भीतर प्रविष्ट हो गया।
श्लोक 87 (skanda.3.38.87)
ततो ददर्श द्वौ सर्पो व्यक्तास्यौ भीषणाकृती याभ्यां दृष्टोपि भस्म स्यात्तौ सर्पौ गरुडस्तदा
tato dadarśa dvau sarpo vyaktāsyau bhīṣaṇākṛtī yābhyāṁ dṛṣṭopi bhasma syāttau sarpau garuḍastadā
तब उसने खुले मुँह वाले, भयंकर आकृति वाले दो सर्प देखे, जिनकी दृष्टि मात्र से भी भस्म हो जाना संभव था; उन दोनों सर्पों को तब गरुड़ ने,
श्लोक 88 (skanda.3.38.88)
आच्छिद्य पक्षतुंडाभ्यां गृहीत्वाऽमृतमुद्ययौ यंत्रमुत्पाट्य चोद्यंतं गरुडं प्राह माधवः
ācchidya pakṣatuṁḍābhyāṁ gṛhītvā'mṛtamudyayau yaṁtramutpāṭya codyaṁtaṁ garuḍaṁ prāha mādhavaḥ
पंख और चोंच से चीरकर, अमृत लेकर ऊपर उठा, यंत्र को उखाड़ते हुए। ऊपर उठते हुए गरुड़ से माधव (विष्णु) ने कहा।
श्लोक 89 (skanda.3.38.89)
तव तुष्टोऽस्मि पक्षीश वरं वरय सुव्रत अथ पक्षी तमाह स्म कमलानायकं हरिम्
tava tuṣṭo'smi pakṣīśa varaṁ varaya suvrata atha pakṣī tamāha sma kamalānāyakaṁ harim
"हे पक्षीश्वर, मैं तुमसे प्रसन्न हूँ, हे सुव्रत, वर माँगो।" तब पक्षी ने कमलानाथ हरि से कहा।
श्लोक 90 (skanda.3.38.90)
तवोपरि स्थितिर्मे स्यान्मा भूतां च जरामृती तथास्त्विति हरिः प्राह वरं मद्व्रियतामिति
tavopari sthitirme syānmā bhūtāṁ ca jarāmṛtī tathāstviti hariḥ prāha varaṁ madvriyatāmiti
"मेरा स्थान आपके ऊपर हो, और मुझे बुढ़ापा तथा मृत्यु न हो।" "ऐसा ही हो," कहकर हरि ने कहा - "अब मेरा वर भी माँगो।"
श्लोक 91 (skanda.3.38.91)
इत्युक्तस्तं हरिः प्राह मम त्वं वाहनं भव स्यंदनोपरि केतुश्च मम त्वं विनतासुत
ityuktastaṁ hariḥ prāha mama tvaṁ vāhanaṁ bhava syaṁdanopari ketuśca mama tvaṁ vinatāsuta
इस प्रकार कहे जाने पर हरि ने उससे कहा - "तुम मेरे वाहन बनो; और मेरे रथ की ध्वजा भी तुम ही बनो, हे विनतापुत्र।"
श्लोक 92 (skanda.3.38.92)
तथास्त्विति खगोप्याह कमलापतिमच्युतम् हृतामृतं खगं श्रुत्वा तत आखंडलो जवात्
tathāstviti khagopyāha kamalāpatimacyutam hṛtāmṛtaṁ khagaṁ śrutvā tata ākhaṁḍalo javāt
"ऐसा ही होगा," पक्षी ने भी कमलापति अच्युत से कहा। पक्षी द्वारा अमृत हरण किए जाने की बात सुनकर इंद्र ने तब शीघ्रता से,
श्लोक 93 (skanda.3.38.93)
अभिद्रुत्याशु कुलिशं पक्षे चिक्षेप पक्षिणः ततो विहस्य गरुडः पाकशासनमब्रवीत्
abhidrutyāśu kuliśaṁ pakṣe cikṣepa pakṣiṇaḥ tato vihasya garuḍaḥ pākaśāsanamabravīt
दौड़कर उस पक्षी के पंख पर अपना वज्र फेंका। तब गरुड़ ने हँसकर इंद्र से कहा।
श्लोक 94 (skanda.3.38.94)
कुलिशस्य निपातान्मे न हरे कापि वेदना सफलो वज्रपातस्ते भूयाच्च सुरनायक
kuliśasya nipātānme na hare kāpi vedanā saphalo vajrapātaste bhūyācca suranāyaka
"हे हरि, तुम्हारे वज्र के गिरने से मुझे कोई पीड़ा नहीं हुई; फिर भी हे देवनायक, तुम्हारा यह वज्रपात सफल हो जाए।"
श्लोक 95 (skanda.3.38.95)
इतीरयन्पत्रमेकं व्यसृजत्पक्षतस्तदा शोभनं पर्णमस्येति सुपर्ण इति सोभ वत्
itīrayanpatramekaṁ vyasṛjatpakṣatastadā śobhanaṁ parṇamasyeti suparṇa iti sobha vat
ऐसा कहते हुए उसने तब अपने पंख से एक पंख गिरा दिया; और "इसका पंख सुंदर है" इस कारण वह 'सुपर्ण' नाम से प्रसिद्ध हो गया।
श्लोक 96 (skanda.3.38.96)
तस्मिन्सुपर्णे हेमाभे सर्वे विस्मयमाययुः ततस्तु गरुडः शक्रमब्रवीद्द्विजपुंगवाः
tasminsuparṇe hemābhe sarve vismayamāyayuḥ tatastu garuḍaḥ śakramabravīddvijapuṁgavāḥ
उस स्वर्ण-आभा वाले सुपर्ण को देखकर सभी को आश्चर्य हुआ। तब गरुड़ ने इंद्र से कहा, हे श्रेष्ठ द्विजो।
श्लोक 97 (skanda.3.38.97)
भवता साकमखिलं जगदेतच्चराचरम् देवेंद्र सततं वोढुममोघा शक्तिरस्ति मे
bhavatā sākamakhilaṁ jagadetaccarācaram deveṁdra satataṁ voḍhumamoghā śaktirasti me
"हे देवेंद्र, मुझमें इतनी अमोघ शक्ति है कि मैं तुम्हारे सहित इस संपूर्ण चराचर जगत को सदा वहन कर सकूँ।
श्लोक 98 (skanda.3.38.98)
नाखण्डलसहस्रं मे रणे लभ्यं हरे भवेत् इति ब्रुवाणं गरुडमब्रवीत्पाकशासनः
nākhaṇḍalasahasraṁ me raṇe labhyaṁ hare bhavet iti bruvāṇaṁ garuḍamabravītpākaśāsanaḥ
हे हरि, युद्ध में हजार इंद्र भी मुझसे नहीं पार पा सकते।" इस प्रकार कहते हुए गरुड़ से इंद्र ने कहा।
श्लोक 99 (skanda.3.38.99)
किं तेऽमृतेन कार्यं स्याद्दीयताममृतं मम इमां सुधां भवान्दद्याद्येभ्यो हि विनतोद्भव
kiṁ te'mṛtena kāryaṁ syāddīyatāmamṛtaṁ mama imāṁ sudhāṁ bhavāndadyādyebhyo hi vinatodbhava
"तुम्हें अमृत से क्या प्रयोजन है? मुझे यह अमृत दे दो। हे विनतापुत्र, तुम जिन्हें भी यह अमृत दोगे,
श्लोक 100 (skanda.3.38.100)
तेऽधुनाऽमृतपानेन जरामरणवर्जिताः अस्मद्भ्योऽधिकवीर्याः स्युर्बाधेरंस्त्रिदशांस्तथा
te'dhunā'mṛtapānena jarāmaraṇavarjitāḥ asmadbhyo'dhikavīryāḥ syurbādheraṁstridaśāṁstathā
वे अमृतपान से अब बुढ़ापे और मृत्यु से रहित होकर हम देवताओं से भी अधिक बलवान हो जाएँगे, और तीनों लोक के देवताओं को सताएँगे।"
श्लोक 101 (skanda.3.38.101)
इति ब्रुवंतं देवेन्द्रं गरुडोऽप्यब्रवीद्द्विजाः यत्रैतत्स्थापयिष्यामि तत्रागत्य भवानिदम्
iti bruvaṁtaṁ devendraṁ garuḍo'pyabravīddvijāḥ yatraitatsthāpayiṣyāmi tatrāgatya bhavānidam
इस प्रकार कहते हुए देवेंद्र से गरुड़ ने भी कहा, हे द्विजो - "जहाँ मैं इसे रखूँगा, वहाँ आकर तुम इसे -
श्लोक 102 (skanda.3.38.102)
गृह्णातु झटितीत्युक्तो गरुडं प्राह वृत्रहा प्रीतोऽहं तव दास्यामि वरं वृणु महामते
gṛhṇātu jhaṭitītyukto garuḍaṁ prāha vṛtrahā prīto'haṁ tava dāsyāmi varaṁ vṛṇu mahāmate
तुरंत ग्रहण कर लेना।" इस प्रकार कहे जाने पर वृत्रहा (इंद्र) ने गरुड़ से कहा - "मैं तुमसे प्रसन्न हूँ, वर माँगो, हे महामते।"
श्लोक 103 (skanda.3.38.103)
इत्युक्तवन्तं गरुडः पाकशासनमब्रवीत् दास्ये छलप्रयोक्तारो मम मातुः सरीसृपाः
ityuktavantaṁ garuḍaḥ pākaśāsanamabravīt dāsye chalaprayoktāro mama mātuḥ sarīsṛpāḥ
इस प्रकार कहे जाने पर गरुड़ ने इंद्र से कहा - "मेरी माता के साथ छल करने वाले सरीसृप,
श्लोक 104 (skanda.3.38.104)
भक्ष्या भवंतु नित्यं मे पाकशासन वृत्रहन् इति तेनेरितः शकस्तथास्त्वित्यवदच्च तम्
bhakṣyā bhavaṁtu nityaṁ me pākaśāsana vṛtrahan iti teneritaḥ śakastathāstvityavadacca tam
हे वृत्रहन्, सदा मेरा भक्ष्य बन जाएँ।" इस प्रकार उसके द्वारा कहे जाने पर इंद्र ने कहा - "ऐसा ही हो।"
श्लोक 105 (skanda.3.38.105)
अथायं गरुडो विप्रा धारयन्नमृतं ययौ यांतं तमनुयाति स्म गरुडं पाकशासनः
athāyaṁ garuḍo viprā dhārayannamṛtaṁ yayau yāṁtaṁ tamanuyāti sma garuḍaṁ pākaśāsanaḥ
फिर यह गरुड़, हे विप्रो, अमृत को धारण करके चल पड़ा; और जाते हुए उस गरुड़ के पीछे-पीछे इंद्र भी चला।
श्लोक 106 (skanda.3.38.106)
वेगेन स द्विजश्रेष्ठाः सुधाहरणकौतुकी मातुरभ्याशमागत्य सर्पान्प्राह स पक्षिराट्
vegena sa dvijaśreṣṭhāḥ sudhāharaṇakautukī māturabhyāśamāgatya sarpānprāha sa pakṣirāṭ
शीघ्रतापूर्वक, हे श्रेष्ठ द्विजो, अमृत लाने की उत्सुकता से भरा वह पक्षिराज माता के पास पहुँचकर सर्पों से बोला।
श्लोक 107 (skanda.3.38.107)
कुशेषु न्यस्यते सर्पास्सुधैवमधुना मया स्नात्वा तद्भुङ्ध्वममृतं शुचयः सुसमाहिताः
kuśeṣu nyasyate sarpāssudhaivamadhunā mayā snātvā tadbhuṅdhvamamṛtaṁ śucayaḥ susamāhitāḥ
"हे सर्पो, मैंने अभी यह अमृत कुश की घास पर रख दिया है; स्नान करके, शुद्ध और पूर्ण एकाग्र होकर इस अमृत का पान करो।
श्लोक 108 (skanda.3.38.108)
मोक्षोऽपि मम मातुः स्याद्दासीभावाद्धि पन्नगाः तथास्त्वित्यवदन्सर्पा गरुडं विनतासुतम्
mokṣo'pi mama mātuḥ syāddāsībhāvāddhi pannagāḥ tathāstvityavadansarpā garuḍaṁ vinatāsutam
और मेरी माता को भी दासत्व से मुक्ति मिले, हे सर्पो।" "ऐसा ही हो," सर्पों ने विनतापुत्र गरुड़ से कहा।
श्लोक 109 (skanda.3.38.109)
मुक्ता तदैव विनता दासीभावाद्द्विजोत्तमाः सर्पास्तेऽमृतभक्षार्थं स्नातुं सर्वे ययुस्तदा
muktā tadaiva vinatā dāsībhāvāddvijottamāḥ sarpāste'mṛtabhakṣārthaṁ snātuṁ sarve yayustadā
उसी क्षण विनता दासत्व से मुक्त हो गई, हे श्रेष्ठ द्विजो; और वे सर्प अमृत पीने के लिए स्नान करने चले गए।
श्लोक 110 (skanda.3.38.110)
तस्मिन्नवसरे शक्रस्तामादाय सुधां ययौ स्नात्वागत्य भुजंगास्ते तत्रादृष्ट्वा तदा सुधाम्
tasminnavasare śakrastāmādāya sudhāṁ yayau snātvāgatya bhujaṁgāste tatrādṛṣṭvā tadā sudhām
उसी अवसर पर इंद्र उस अमृत को लेकर चला गया। स्नान करके लौटे उन सर्पों ने वहाँ अमृत को न पाकर,
श्लोक 111 (skanda.3.38.111)
जिह्वाभिर्लिलिहुर्द र्भानेषु न्यस्ता सुधेति हि तदाप्रभृति सर्पाणां जिह्वा दर्भाग्रपाटिताः
jihvābhirlilihurda rbhāneṣu nyastā sudheti hi tadāprabhṛti sarpāṇāṁ jihvā darbhāgrapāṭitāḥ
'यहीं अमृत रखा गया था' यह सोचकर कुश की पत्तियों को अपनी जीभ से चाटा। तभी से सर्पों की जीभ कुश की नोकों से चिर गई,
श्लोक 112 (skanda.3.38.112)
द्विधाभवन्मुनिश्रेष्ठा द्विजिह्वास्तेन ते स्मृताः सुधासंयोगतो दर्भाः प्रय युश्च पवित्रताम्
dvidhābhavanmuniśreṣṭhā dvijihvāstena te smṛtāḥ sudhāsaṁyogato darbhāḥ praya yuśca pavitratām
और दो भागों में बँट गई, हे श्रेष्ठ मुनियो; इसीलिए वे 'द्विजिह्व' (दुजीभे) कहलाए। अमृत के संपर्क से कुश की घास भी पवित्रता को प्राप्त हो गई।
श्लोक 113 (skanda.3.38.113)
मोचयित्वा च गरुडो दासीभावात्स्वमातरम् शशापकुपितः कद्रूं छद्मना जितमातरम्
mocayitvā ca garuḍo dāsībhāvātsvamātaram śaśāpakupitaḥ kadrūṁ chadmanā jitamātaram
अपनी माता को दासत्व से मुक्त कराकर गरुड़ ने क्रुद्ध होकर, छल से माता को जीतने वाली कद्रू को शाप दिया।
श्लोक 114 (skanda.3.38.114)
कद्रूस्त्वं जननीं यन्मे छलेन जितवत्यसि भर्तुस्त्वं परिचर्यायामतो नार्हा भविष्यसि
kadrūstvaṁ jananīṁ yanme chalena jitavatyasi bhartustvaṁ paricaryāyāmato nārhā bhaviṣyasi
"हे कद्रू, जिस कारण तूने छल से मेरी माता को जीता है, इसलिए तू अब से पति की सेवा के अयोग्य होगी।"
श्लोक 115 (skanda.3.38.115)
शप्त्वैवं गरुडः कद्रूं प्रययौ स यथेच्छया कद्रूश्च विनता चोभे ययतुर्भर्तुरंतिकम्
śaptvaivaṁ garuḍaḥ kadrūṁ prayayau sa yathecchayā kadrūśca vinatā cobhe yayaturbharturaṁtikam
इस प्रकार कद्रू को शाप देकर गरुड़ अपनी इच्छानुसार चला गया; और कद्रू तथा विनता दोनों अपने पति के पास गईं।
श्लोक 116 (skanda.3.38.116)
कश्यपो विमुखस्तत्र कद्रूं कोपादथाब्रवीत् यस्माच्छलेन विनतां कद्रूर्निर्जितवत्यसि
kaśyapo vimukhastatra kadrūṁ kopādathābravīt yasmācchalena vinatāṁ kadrūrnirjitavatyasi
वहाँ कश्यप ने विमुख होकर क्रोधपूर्वक कद्रू से कहा - "जिस कारण तूने छल से विनता को पराजित किया है,
श्लोक 117 (skanda.3.38.117)
अतो मत्परिचर्यायां न योग्यासि दुरात्मिके स्त्रियं वा पुरुषं वापि नारी वा पुरुषोऽपि वा
ato matparicaryāyāṁ na yogyāsi durātmike striyaṁ vā puruṣaṁ vāpi nārī vā puruṣo'pi vā
इसीलिए हे दुरात्मे, तू मेरी सेवा के योग्य नहीं है। चाहे स्त्री हो या पुरुष, चाहे नारी हो या पुरुष,
श्लोक 118 (skanda.3.38.118)
छलाद्विजयते योऽसौ स महापातकी भवेत् छलाद्विजयिना सार्धं संभाष्य ब्रह्महा भवेत्
chalādvijayate yo'sau sa mahāpātakī bhavet chalādvijayinā sārdhaṁ saṁbhāṣya brahmahā bhavet
जो भी छल से विजय प्राप्त करता है, वह महापातकी होता है; और छल से विजय पाने वाले के साथ बातचीत करने वाला ब्रह्महत्यारे के समान हो जाता है -
श्लोक 119 (skanda.3.38.119)
स्तेयी सुरापी विज्ञेयो गुरुदाररतश्च सः संसर्गदोषदुष्टश्च मुनिभिः परिकीर्त्यते
steyī surāpī vijñeyo gurudārarataśca saḥ saṁsargadoṣaduṣṭaśca munibhiḥ parikīrtyate
वह चोर, मद्यपायी और गुरुपत्नीगामी के समान माना जाता है; मुनियों द्वारा उसे संसर्ग-दोष से दूषित कहा गया है।
श्लोक 120 (skanda.3.38.120)
त्वया संभाषणाद्दोषो मम स्यान्नरकप्रदः तस्मात्प्रयाहि कद्रूस्त्वं मत्समीपाद्धि दारुणे
tvayā saṁbhāṣaṇāddoṣo mama syānnarakapradaḥ tasmātprayāhi kadrūstvaṁ matsamīpāddhi dāruṇe
तुझसे बातचीत करने से मुझे नरक देने वाला दोष लगेगा। इसलिए हे कद्रू, तू दारुण, मेरे पास से चली जा।
श्लोक 121 (skanda.3.38.121)
छलजेत्रा सपंक्तौ यो भुंजीत मनुजो भुवि तेन संभाषणात्सद्यः पतेद्धि नरकार्णवे
chalajetrā sapaṁktau yo bhuṁjīta manujo bhuvi tena saṁbhāṣaṇātsadyaḥ pateddhi narakārṇave
छल से विजय पाने वाले के साथ एक पंक्ति में जो मनुष्य इस पृथ्वी पर भोजन करता है, उससे बात करने मात्र से वह तुरंत नरक-सागर में गिर जाता है।
श्लोक 122 (skanda.3.38.122)
विलोक्य च्छलजेतारं तस्य पापस्य शांतये आदित्यं वा जलं वापि पावकं वा विलोकयेत्
vilokya cchalajetāraṁ tasya pāpasya śāṁtaye ādityaṁ vā jalaṁ vāpi pāvakaṁ vā vilokayet
छल से विजय पाने वाले को देखकर, उस पाप की शांति के लिए, सूर्य को, या जल को, या अग्नि को देखना चाहिए।
श्लोक 123 (skanda.3.38.123)
छलजेता यत्र तिष्ठेदाश्रमेऽपि गृहेऽपिवा वस्तव्यं न हि तत्रान्यैर्वसन्नरकमश्नुते
chalajetā yatra tiṣṭhedāśrame'pi gṛhe'pivā vastavyaṁ na hi tatrānyairvasannarakamaśnute
जहाँ भी छल से विजय पाने वाला रहे, चाहे आश्रम में या घर में, वहाँ अन्य लोगों को नहीं रहना चाहिए; वहाँ रहने वाला नरक को प्राप्त होता है।
श्लोक 124 (skanda.3.38.124)
अतो निर्याहि निर्याहि मम त्वं दृष्टिमार्गतः स्वाश्रमात्सरलामेनां विनतां जितवत्यसि
ato niryāhi niryāhi mama tvaṁ dṛṣṭimārgataḥ svāśramātsaralāmenāṁ vinatāṁ jitavatyasi
इसलिए तू मेरी दृष्टि के मार्ग से निकल जा, निकल जा - जिसने अपने ही सरल आश्रम में विनता को जीता है।
श्लोक 125 (skanda.3.38.125)
इति धिक्कृत्य सहसा कद्रूं तां कश्यपस्तदा विनतां स्वच्छशीलां तां स्वीचकार महामतिः
iti dhikkṛtya sahasā kadrūṁ tāṁ kaśyapastadā vinatāṁ svacchaśīlāṁ tāṁ svīcakāra mahāmatiḥ
इस प्रकार कद्रू को तुरंत धिक्कार कर, महामति कश्यप ने स्वच्छ आचरण वाली विनता को स्वीकार कर लिया।
श्लोक 126 (skanda.3.38.126)
कद्रूरित्थं सपरुषं कथिता कश्यपेन सा रुदंती भृशदुःखार्ता पादयोस्तस्य चापतत्
kadrūritthaṁ saparuṣaṁ kathitā kaśyapena sā rudaṁtī bhṛśaduḥkhārtā pādayostasya cāpatat
इस प्रकार कश्यप द्वारा कठोर वचन कहे जाने पर, वह कद्रू अत्यंत दुःखी होकर रोते हुए उनके चरणों में गिर पड़ी।
श्लोक 127 (skanda.3.38.127)
पतितां पादयोर्दृष्ट्वा कश्यपो मुनिपुंगवः न जग्राहैव कद्रूं तां स्मरन्पापं तया कृतम्
patitāṁ pādayordṛṣṭvā kaśyapo munipuṁgavaḥ na jagrāhaiva kadrūṁ tāṁ smaranpāpaṁ tayā kṛtam
चरणों में गिरी हुई उसे देखकर मुनिश्रेष्ठ कश्यप ने, उसके किए हुए पाप का स्मरण करते हुए, कद्रू को स्वीकार नहीं किया।
श्लोक 128 (skanda.3.38.128)
ततः प्रणम्य विनता कश्यपं वाक्यमब्रवीत् भगवन्भगिनीमेनां स्वीकुरुष्व कृपानिधे
tataḥ praṇamya vinatā kaśyapaṁ vākyamabravīt bhagavanbhaginīmenāṁ svīkuruṣva kṛpānidhe
तब विनता ने प्रणाम करके कश्यप से कहा - "हे भगवन्, हे कृपानिधि, इस मेरी बहन को स्वीकार कीजिए।
श्लोक 129 (skanda.3.38.129)
अज्ञानान्मुग्धया पापं कद्र्वा यदधुना कृतम् क्षंतुमर्हसि तत्सर्वं दयाशीला हि साधवः
ajñānānmugdhayā pāpaṁ kadrvā yadadhunā kṛtam kṣaṁtumarhasi tatsarvaṁ dayāśīlā hi sādhavaḥ
कद्रू ने अभी जो पाप अज्ञानवश किया है, उसे क्षमा करने योग्य आप हैं, क्योंकि साधुजन दयालु स्वभाव के होते हैं।"
श्लोक 130 (skanda.3.38.130)
जनन्या गरुडस्यैव कथितः कश्यपो मुनिः उवाच विनते नैनां विना पापस्य निष्कृतिम्
jananyā garuḍasyaiva kathitaḥ kaśyapo muniḥ uvāca vinate naināṁ vinā pāpasya niṣkṛtim
गरुड़ की माता द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर, मुनि कश्यप ने विनता से कहा - "इसके पाप की निष्कृति के बिना मैं इसे नहीं...
श्लोक 131 (skanda.3.38.131)
ग्रहीष्यामि दुराचारां त्रिस्त्वां शपथयाम्यहम् कश्यपस्य वचः श्रुत्वा विनता पुनरब्रवीत्
grahīṣyāmi durācārāṁ tristvāṁ śapathayāmyaham kaśyapasya vacaḥ śrutvā vinatā punarabravīt
...ग्रहण करूँगा; मैं तीन बार शपथ लेता हूँ।" कश्यप के वचन सुनकर विनता ने पुनः कहा।
श्लोक 132 (skanda.3.38.132)
भगिन्या मम पापस्य ब्रह्मंस्त्वं ब्रूहि निष्कृतिम् येनेयं परिचर्यायां तव योग्या भविष्यति
bhaginyā mama pāpasya brahmaṁstvaṁ brūhi niṣkṛtim yeneyaṁ paricaryāyāṁ tava yogyā bhaviṣyati
"हे ब्रह्मन्, मेरी बहन के पाप की निष्कृति आप बताइए, जिससे यह आपकी सेवा के योग्य हो जाए।"
श्लोक 133 (skanda.3.38.133)
तयैवमुदितो विप्रा मारीचः कश्यपस्तदा ध्यात्वा मुहूर्तं मनसा पश्चादिदमभाषत
tayaivamudito viprā mārīcaḥ kaśyapastadā dhyātvā muhūrtaṁ manasā paścādidamabhāṣata
उसके इस प्रकार कहने पर, हे विप्रो, मरीचिपुत्र कश्यप ने मन में क्षणभर विचार करके फिर यह कहा।
श्लोक 134 (skanda.3.38.134)
दक्षिणांबुनिधेस्तीरे फुल्लग्रामे विमुक्तिदे अस्ति क्षीरसरोनाम तीर्थं पापविनाशनम्
dakṣiṇāṁbunidhestīre phullagrāme vimuktide asti kṣīrasaronāma tīrthaṁ pāpavināśanam
"दक्षिण सागर के तट पर, मुक्तिदायी फुल्लग्राम में, क्षीरसर नामक एक तीर्थ है, जो पाप का नाशक है।
श्लोक 135 (skanda.3.38.135)
तत्तीर्थस्नानमात्रेण दोषश्चास्या विनश्यति प्रायश्चित्तायुतेनापि तत्तीर्थे मज्जनं विना
tattīrthasnānamātreṇa doṣaścāsyā vinaśyati prāyaścittāyutenāpi tattīrthe majjanaṁ vinā
उस तीर्थ में स्नान मात्र से इसका दोष नष्ट हो जाएगा; दस हजार प्रायश्चित्त करने पर भी उस तीर्थ में डुबकी लगाए बिना,
श्लोक 136 (skanda.3.38.136)
न नश्यत्येष दोषो ऽस्यास्तदेषा यातु तत्सरः भर्त्रैवमुदिते कद्रूस्तं प्रणम्य द्विजोत्तमम्
na naśyatyeṣa doṣo 'syāstadeṣā yātu tatsaraḥ bhartraivamudite kadrūstaṁ praṇamya dvijottamam
यह दोष नष्ट नहीं होगा; इसलिए यह उस सरोवर को जाए।" पति द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर कद्रू ने उस श्रेष्ठ ब्राह्मण को प्रणाम करके,
श्लोक 137 (skanda.3.38.137)
तत्क्षणात्प्रययौ क्षीरं सरः पुत्रसहायिनी सा कद्रूः पुत्र सहिता गत्वा कतिपयैर्दिनैः
tatkṣaṇātprayayau kṣīraṁ saraḥ putrasahāyinī sā kadrūḥ putra sahitā gatvā katipayairdinaiḥ
उसी क्षण अपने पुत्रों के साथ क्षीरसर की ओर प्रस्थान किया। वह कद्रू पुत्रों सहित कुछ दिनों तक यात्रा करके,
श्लोक 138 (skanda.3.38.138)
प्राप्य क्षीरसरः पुण्यं प्रयता विजितेंद्रिया सस्नौ नियमपूर्वं च संकल्प्य क्षीरकुंडके
prāpya kṣīrasaraḥ puṇyaṁ prayatā vijiteṁdriyā sasnau niyamapūrvaṁ ca saṁkalpya kṣīrakuṁḍake
पवित्र क्षीरसर को प्राप्त होकर, शुद्ध और जितेंद्रिय होकर, नियमपूर्वक संकल्प करके क्षीरकुंड में स्नान किया।
श्लोक 139 (skanda.3.38.139)
उपोष्य त्रिदिनं सस्नौ तस्मिन्क्षीरसरोजले चतुर्थे दिवसे तस्यां कुर्वत्यां स्नानमादरात् अदेहा व्योमगावाणी समुत्तस्थौ द्विजोत्तमाः
upoṣya tridinaṁ sasnau tasminkṣīrasarojale caturthe divase tasyāṁ kurvatyāṁ snānamādarāt adehā vyomagāvāṇī samuttasthau dvijottamāḥ
तीन दिन उपवास करके उसने उस क्षीरसर के जल में स्नान किया; चौथे दिन जब वह आदरपूर्वक स्नान कर रही थी, तब एक अशरीरी आकाशवाणी हुई, हे श्रेष्ठ द्विजो।
श्लोक 140 (skanda.3.38.140)
अशरीरिण्युवाच कद्रूस्त्वं मज्जनादत्र च्छलजेतृत्वदोषतः
aśarīriṇyuvāca kadrūstvaṁ majjanādatra cchalajetṛtvadoṣataḥ
अशरीरिणी वाणी ने कहा - "हे कद्रू, यहाँ स्नान करने से, छल से विजय पाने के दोष से,
श्लोक 141 (skanda.3.38.141)
विमुक्ता भर्तृशुश्रूषायोग्या चासि न संशयः शापोपि गरुडोक्तस्ते लयं यातोऽत्र मज्जनात्
vimuktā bhartṛśuśrūṣāyogyā cāsi na saṁśayaḥ śāpopi garuḍoktaste layaṁ yāto'tra majjanāt
तू मुक्त हो गई है और अब पति-सेवा के योग्य है, इसमें संशय नहीं। गरुड़ द्वारा दिया गया शाप भी इस स्नान से समाप्त हो गया है।
श्लोक 142 (skanda.3.38.142)
गच्छ भर्तृसकाशं त्वं सोऽपि त्वां स्वीकरिष्यति इत्युक्त्वा विररामाथ व्योमवागशरीरिणी
gaccha bhartṛsakāśaṁ tvaṁ so'pi tvāṁ svīkariṣyati ityuktvā virarāmātha vyomavāgaśarīriṇī
अपने पति के पास जा, वे भी तुझे स्वीकार करेंगे।" ऐसा कहकर वह आकाशवाणी शांत हो गई।
श्लोक 143 (skanda.3.38.143)
तस्यै वाचे नमस्कृत्य कद्रूः सा प्रीतमानसा तीर्थं प्रदक्षिणीकृत्य नत्वा पुत्रसमन्विता
tasyai vāce namaskṛtya kadrūḥ sā prītamānasā tīrthaṁ pradakṣiṇīkṛtya natvā putrasamanvitā
उस वाणी को नमस्कार करके, प्रसन्नचित्त कद्रू ने तीर्थ की प्रदक्षिणा करके, प्रणाम करके, पुत्रों सहित,
श्लोक 144 (skanda.3.38.144)
प्रययौ भर्तुरभ्याशं तच्छुश्रूषणकौतुकात् आगतातां समालोक्य स्नातां क्षीरसरोजले
prayayau bharturabhyāśaṁ tacchuśrūṣaṇakautukāt āgatātāṁ samālokya snātāṁ kṣīrasarojale
उसकी सेवा करने की उत्सुकता से अपने पति के पास प्रस्थान किया। क्षीरसर के जल में स्नान करके आई हुई उसे देखकर,
श्लोक 145 (skanda.3.38.145)
ज्ञात्वा विधूतपापां च कश्यपः स समाधिना अंगीचकार पत्नीं तामात्मशुश्रूषणोचि ताम्
jñātvā vidhūtapāpāṁ ca kaśyapaḥ sa samādhinā aṁgīcakāra patnīṁ tāmātmaśuśrūṣaṇoci tām
और समाधि द्वारा यह जानकर कि उसका पाप धुल गया है, कश्यप ने अपनी सेवा के योग्य उस पत्नी को स्वीकार कर लिया।
श्लोक 146 (skanda.3.38.146)
एवं वः कथितं विप्राः कद्रूपापविमोक्षणम् मज्जनान्मुक्तिदं पुंसां पुण्ये क्षीरसरोजले
evaṁ vaḥ kathitaṁ viprāḥ kadrūpāpavimokṣaṇam majjanānmuktidaṁ puṁsāṁ puṇye kṣīrasarojale
हे विप्रो, इस प्रकार मैंने तुम्हें कद्रू की पाप-मुक्ति की कथा सुनाई, कि किस प्रकार पुण्यमय क्षीरसर में स्नान करने से मनुष्यों को मुक्ति मिलती है।
श्लोक 147 (skanda.3.38.147)
यः शृणोतीममध्यायं पठते वापि मानवः स क्षीरकुंडस्नानस्य लभते फलमुत्तमम्
yaḥ śṛṇotīmamadhyāyaṁ paṭhate vāpi mānavaḥ sa kṣīrakuṁḍasnānasya labhate phalamuttamam
जो मनुष्य इस अध्याय को सुनता है या पढ़ता है, वह क्षीरकुंड-स्नान का सर्वोत्तम फल प्राप्त करता है।
श्लोक 148 (skanda.3.38.148)
अश्वमेधादियज्ञानां समग्रं फलमश्नुते गंगादिसर्वतीर्थेषु स स्नातो भवति ध्रुवम्
aśvamedhādiyajñānāṁ samagraṁ phalamaśnute gaṁgādisarvatīrtheṣu sa snāto bhavati dhruvam
वह अश्वमेध आदि यज्ञों का सम्पूर्ण फल प्राप्त करता है; वह निश्चय ही गंगा आदि समस्त तीर्थों में स्नान किए हुए के समान हो जाता है।
श्लोक 149 (skanda.3.38.149)
यः पठेदिममध्यायं क्षीरकुंडप्रशंसनम् गोसहस्रप्रदातॄणां प्राप्नोत्यविकलं फलम्
yaḥ paṭhedimamadhyāyaṁ kṣīrakuṁḍapraśaṁsanam gosahasrapradātṝṇāṁ prāpnotyavikalaṁ phalam
जो इस क्षीरकुंड-प्रशंसा नामक अध्याय को पढ़ता है, वह हजार गायों का दान करने वालों के समान सम्पूर्ण फल प्राप्त करता है।