ब्रह्म खण्ड · अध्याय 4
दुर्दम की कथा तथा चक्रतीर्थ-विभाजन का वर्णन
श्लोक 1 (skanda.3.4.1)
ऋषय ऊचुः । भगवन्राक्षसः कोऽसौ सूत पौराणिकोत्तम । विष्णुभक्तं महात्मानं यो गालवमबाधत
ṛṣaya ūcuḥ bhagavanrākṣasaḥ ko'sau sūta paurāṇikottama viṣṇubhaktaṁ mahātmānaṁ yo gālavamabādhata
ऋषियों ने कहा — हे भगवन्, हे पुराणों में श्रेष्ठ सूत, वह राक्षस कौन था जिसने विष्णु-भक्त महात्मा गालव को पीड़ित किया?
श्लोक 2 (skanda.3.4.2)
श्रीसूत उवाच । वक्ष्यामि राक्षसं क्रूरं तं विप्राः शृणुतादरात् । यथा स राक्षसो जातो मुनीनां शापवैभवात्
śrīsūta uvāca vakṣyāmi rākṣasaṁ krūraṁ taṁ viprāḥ śṛṇutādarāt yathā sa rākṣaso jāto munīnāṁ śāpavaibhavāt
श्री सूत जी ने कहा — हे विप्रो, मैं उस क्रूर राक्षस के विषय में बताता हूँ, आदरपूर्वक सुनिए, कि वह राक्षस मुनियों के शाप के प्रभाव से किस प्रकार बना।
श्लोक 3 (skanda.3.4.3)
पुरा कैलासशिखरे हालास्ये शिवमंदिरे । चतुर्विशतिसाहस्रा मुनयो ब्रह्मवादिनः
purā kailāsaśikhare hālāsye śivamaṁdire caturviśatisāhasrā munayo brahmavādinaḥ
प्राचीन काल में कैलास शिखर पर, हालास्य में, शिव-मंदिर में, चौबीस हजार ब्रह्मवादी मुनि —
श्लोक 4 (skanda.3.4.4)
वसिष्ठात्रिमुखाः सर्वे शिवभक्ता महौजसः । भस्मोद्धूलितसर्वांगास्त्रिपुंड्रांकितमस्तकाः
vasiṣṭhātrimukhāḥ sarve śivabhaktā mahaujasaḥ bhasmoddhūlitasarvāṁgāstripuṁḍrāṁkitamastakāḥ
— वसिष्ठ और अत्रि आदि सभी महातेजस्वी शिवभक्त, समस्त अंगों में भस्म लगाए हुए, ललाट पर त्रिपुंड्र धारण किए हुए —
श्लोक 5 (skanda.3.4.5)
रुद्राक्ष मालाभरणाः पंचाक्षरजपे रताः । हालास्यनाथं भूतेशं चंद्रचूडमुमापतिम्
rudrākṣa mālābharaṇāḥ paṁcākṣarajape ratāḥ hālāsyanāthaṁ bhūteśaṁ caṁdracūḍamumāpatim
— रुद्राक्ष-माला से अलंकृत, पंचाक्षर मंत्र के जप में तत्पर, हालास्य के स्वामी, भूतेश, चंद्रचूड़ उमापति की —
श्लोक 6 (skanda.3.4.6)
उपासांचक्रिरे मुक्त्यै मधुरापुरवासिनः । कदाचित्तत्र गंधर्वो विश्वावसुसुतो बली
upāsāṁcakrire muktyai madhurāpuravāsinaḥ kadācittatra gaṁdharvo viśvāvasusuto balī
— मधुरापुरी के निवासियों ने मुक्ति के लिए उपासना की। एक बार वहाँ विश्वावसु का पुत्र, बलवान गंधर्व —
श्लोक 7 (skanda.3.4.7)
दुर्द्दमोनाम विप्रेंद्रा विटगोष्ठीपरायणः । ललनाशतसंयुक्तो विवस्त्रः सलिलाशये
durddamonāma vipreṁdrā viṭagoṣṭhīparāyaṇaḥ lalanāśatasaṁyukto vivastraḥ salilāśaye
— हे विप्रेन्द्रो, दुर्दम नामक, विटों की संगति में लीन, सौ स्त्रियों के साथ, वस्त्रहीन होकर जलाशय में —
श्लोक 8 (skanda.3.4.8)
चिक्रीड स विवस्त्राभिः साकं युवतिभिर्मुदा । हालास्यनाथतीर्थं तद्वसिष्ठो मुनिभिः सह
cikrīḍa sa vivastrābhiḥ sākaṁ yuvatibhirmudā hālāsyanāthatīrthaṁ tadvasiṣṭho munibhiḥ saha
— उन वस्त्रहीन युवतियों के साथ आनंदपूर्वक क्रीड़ा करने लगा। उसी समय वसिष्ठ मुनियों के साथ हालास्यनाथ-तीर्थ से —
श्लोक 9 (skanda.3.4.9)
माध्यंदिनं कर्तुमना ययौ शंकरमंदिरात् । तानृषीनवलोक्याथ रामास्ता भयकातराः
mādhyaṁdinaṁ kartumanā yayau śaṁkaramaṁdirāt tānṛṣīnavalokyātha rāmāstā bhayakātarāḥ
— मध्याह्न-कृत्य करने के विचार से गए। उन ऋषियों को देखकर वे स्त्रियाँ भयभीत होकर —
श्लोक 10 (skanda.3.4.10)
वासांस्याच्छादयामासुर्दुर्द्दमो न तु साहसी । ततो वसिष्ठः कुपितः शशापैनं गत त्रपम्
vāsāṁsyācchādayāmāsurdurddamo na tu sāhasī tato vasiṣṭhaḥ kupitaḥ śaśāpainaṁ gata trapam
— अपने वस्त्रों से अपने आपको ढँकने लगीं, किंतु ढीठ दुर्दम ने ऐसा नहीं किया। तब क्रोधित वसिष्ठ ने निर्लज्ज हुए उसे शाप दिया —
श्लोक 11 (skanda.3.4.11)
वसिष्ठ उवाच । यस्माद्दुर्दम गंधर्व दृष्ट्वास्माँल्लज्जया त्वया । वासो नाच्छादितं शीघ्रं याहि राक्षसतां ततः
vasiṣṭha uvāca yasmāddurdama gaṁdharva dṛṣṭvāsmā~llajjayā tvayā vāso nācchāditaṁ śīghraṁ yāhi rākṣasatāṁ tataḥ
वसिष्ठ ने कहा — "हे गंधर्व दुर्दम, चूँकि तूने हमें देखकर लज्जावश शीघ्र अपना वस्त्र नहीं ढका, अतः तू राक्षस बन जा!"
श्लोक 12 (skanda.3.4.12)
इत्युक्त्वा ता स्त्रियः प्राह वसिष्ठो मुनिपुंगवः । यस्मादाच्छादितं वस्त्रं दृष्ट्वास्माँल्ललनोत्तमाः
ityuktvā tā striyaḥ prāha vasiṣṭho munipuṁgavaḥ yasmādācchāditaṁ vastraṁ dṛṣṭvāsmā~llalanottamāḥ
यह कहकर मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठ ने उन स्त्रियों से कहा — "हे श्रेष्ठ ललनाओ, चूँकि तुमने हमें देखकर अपने वस्त्रों से अपने आपको ढक लिया —
श्लोक 13 (skanda.3.4.13)
ततो न युष्माञ्छपिष्यामि गन्छध्वं त्रिदिवं ततः । एवमुक्ता वसिष्ठेन रामाः प्रांजलयस्तदा
tato na yuṣmāñchapiṣyāmi ganchadhvaṁ tridivaṁ tataḥ evamuktā vasiṣṭhena rāmāḥ prāṁjalayastadā
— इसलिए मैं तुम्हें शाप नहीं दूँगा; अब तुम स्वर्ग को जाओ।" वसिष्ठ द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर वे स्त्रियाँ हाथ जोड़कर —
श्लोक 14 (skanda.3.4.14)
प्रणिपत्य वसिष्ठं तं भक्तिनम्रेण चेतसा । मुनिमंडलमध्ये तं वसिष्ठमिदमब्रुवन्
praṇipatya vasiṣṭhaṁ taṁ bhaktinamreṇa cetasā munimaṁḍalamadhye taṁ vasiṣṭhamidamabruvan
— भक्तिपूर्ण नम्र चित्त से वसिष्ठ को प्रणाम कर, मुनियों की सभा के मध्य वसिष्ठ से यह कहने लगीं —
श्लोक 15 (skanda.3.4.15)
रामा ऊचुः । भगवन्सर्वधर्मज्ञ चतुरानननंदन । दयासिंधोऽवलोक्यास्मान्न कोपं कर्तुमर्हसि
rāmā ūcuḥ bhagavansarvadharmajña caturānananaṁdana dayāsiṁdho'valokyāsmānna kopaṁ kartumarhasi
स्त्रियों ने कहा — "हे भगवन्, हे सर्वधर्मज्ञ, हे चतुरानन-नंदन, हे दयासिंधो, हमें देखकर आपको क्रोध नहीं करना चाहिए।
श्लोक 16 (skanda.3.4.16)
पतिरेवहि नारीणां भूषणं परमुच्यते । पतिहीना तु या नारी शतपुत्रापि सा मुने
patirevahi nārīṇāṁ bhūṣaṇaṁ paramucyate patihīnā tu yā nārī śataputrāpi sā mune
क्योंकि पति ही स्त्रियों का परम आभूषण कहा जाता है। हे मुने, जो स्त्री पति-रहित है, वह चाहे सौ पुत्रों वाली भी हो —
श्लोक 17 (skanda.3.4.17)
विधवेत्युच्यते लोके तत्स्त्रीणां मरणं स्मृतम् । तत्प्रसादं कुरु मुने पत्यावस्माक मादरात्
vidhavetyucyate loke tatstrīṇāṁ maraṇaṁ smṛtam tatprasādaṁ kuru mune patyāvasmāka mādarāt
— लोक में विधवा कहलाती है; यह स्त्रियों के लिए मरण के समान माना गया है। अतः हे मुने, हमारे आदर हेतु हमारे पति पर कृपा कीजिए।
श्लोक 18 (skanda.3.4.18)
एकोऽपराधः क्षंतव्यो मुनिभिस्तत्त्वदर्शिभिः । क्षमां कुरु दयासिंधो युष्मच्छिष्येऽत्र दुर्दमे
eko'parādhaḥ kṣaṁtavyo munibhistattvadarśibhiḥ kṣamāṁ kuru dayāsiṁdho yuṣmacchiṣye'tra durdame
तत्त्वदर्शी मुनियों को एक अपराध क्षमा करना चाहिए। हे दयासिंधो, अपने ही इस शिष्य दुर्दम पर क्षमा कीजिए।"
श्लोक 19 (skanda.3.4.19)
वसिष्ठः प्रार्थितस्त्वैवं दुर्दम स्यांगनाजनैः । प्रोवाच वचनं भूयः प्रसन्नः स द्विजोत्तमाः
vasiṣṭhaḥ prārthitastvaivaṁ durdama syāṁganājanaiḥ provāca vacanaṁ bhūyaḥ prasannaḥ sa dvijottamāḥ
दुर्दम की उन स्त्रियों द्वारा इस प्रकार प्रार्थना किए जाने पर, हे द्विजोत्तमो, प्रसन्न होकर वसिष्ठ ने पुनः यह वचन कहा —
श्लोक 20 (skanda.3.4.20)
न मे स्याद्वचनं मिथ्या कदाचिदपि सुभ्रुवः । उपायं वः प्रवक्ष्यामि शृणुध्वं श्रद्धया सह
na me syādvacanaṁ mithyā kadācidapi subhruvaḥ upāyaṁ vaḥ pravakṣyāmi śṛṇudhvaṁ śraddhayā saha
"हे सुभ्रुओ, मेरा वचन कभी भी मिथ्या नहीं हो सकता। किंतु मैं तुम्हें एक उपाय बताता हूँ, श्रद्धापूर्वक सुनो।
श्लोक 21 (skanda.3.4.21)
षोडशाब्दावधिः शापो भर्तुर्वो भविता ध्रुवम् । षोडशाब्दावधौ चैष दुर्दमो राक्षसाकृतिः
ṣoḍaśābdāvadhiḥ śāpo bharturvo bhavitā dhruvam ṣoḍaśābdāvadhau caiṣa durdamo rākṣasākṛtiḥ
तुम्हारे पति का यह शाप निश्चय ही सोलह वर्षों तक ही रहेगा। और उन सोलह वर्षों के अंत में यह दुर्दम राक्षस-रूप में —
श्लोक 22 (skanda.3.4.22)
यदृच्छयाचक्र तीर्थं गमिष्यति सुरांगनाः । आस्ते तत्र महायोगी गालवो विष्णुतत्परः
yadṛcchayācakra tīrthaṁ gamiṣyati surāṁganāḥ āste tatra mahāyogī gālavo viṣṇutatparaḥ
— हे देवांगनाओ, संयोगवश चक्रतीर्थ जाएगा। वहाँ विष्णु-परायण महायोगी गालव निवास करते हैं।
श्लोक 23 (skanda.3.4.23)
भक्ष्यार्थं तं मुनिं सोऽयं राक्षसोभिगमिष्यति । ततो गालवरक्षार्थं प्रेरितं चक्रमुत्तमम्
bhakṣyārthaṁ taṁ muniṁ so'yaṁ rākṣasobhigamiṣyati tato gālavarakṣārthaṁ preritaṁ cakramuttamam
वह राक्षस उस मुनि को खाने के लिए उनके पास जाएगा। तब गालव की रक्षा के लिए भेजा गया वह उत्तम चक्र —
श्लोक 24 (skanda.3.4.24)
विष्णुनास्य शिरो रामा हरिष्यति न संशयः । ततः स्वरूपमासाद्य शापान्मुक्तः सुदुर्दमः
viṣṇunāsya śiro rāmā hariṣyati na saṁśayaḥ tataḥ svarūpamāsādya śāpānmuktaḥ sudurdamaḥ
— विष्णु द्वारा, हे स्त्रियो, उसका सिर काट देगा, इसमें संदेह नहीं। तब अपने स्वरूप को प्राप्त कर, शाप से मुक्त होकर वह दुर्दम —
श्लोक 25 (skanda.3.4.25)
पतिर्वस्त्रिदिवं भूयो गंतास्त्यत्र न संशयः । ततस्त्रिदिवमासाद्य दुर्द्दमोऽयं पतिर्हि वः
patirvastridivaṁ bhūyo gaṁtāstyatra na saṁśayaḥ tatastridivamāsādya durddamo'yaṁ patirhi vaḥ
— तुम्हारा यह पति फिर स्वर्ग को जाएगा, इसमें संदेह नहीं। फिर स्वर्ग को प्राप्त कर तुम्हारा यह पति दुर्दम —
श्लोक 26 (skanda.3.4.26)
रमयिष्यति सुन्दर्यो युष्मान्सुन्दरवेषभृत् । श्रीसूत उवाच । इत्युक्त्वा तु वसिष्ठस्ता दुर्दमस्य वरांगनाः
ramayiṣyati sundaryo yuṣmānsundaraveṣabhṛt śrīsūta uvāca ityuktvā tu vasiṣṭhastā durdamasya varāṁganāḥ
— सुंदर रूप धारण कर तुम स्त्रियों को आनंदित करेगा।" श्री सूत जी ने कहा — दुर्दम की उन सुंदरी स्त्रियों से इस प्रकार कहकर वसिष्ठ —
श्लोक 27 (skanda.3.4.27)
स्वाश्रमं प्रययौ तूर्णं हालास्येश्वरभक्तिमान् । अथ रामास्तमालिंग्य दुर्द्दमं पतिमातुराः
svāśramaṁ prayayau tūrṇaṁ hālāsyeśvarabhaktimān atha rāmāstamāliṁgya durddamaṁ patimāturāḥ
— हालास्येश्वर के भक्त वसिष्ठ शीघ्र अपने आश्रम को चले गए। तब वे विह्वल स्त्रियाँ अपने पति दुर्दम का आलिंगन कर —
श्लोक 28 (skanda.3.4.28)
रुरुदुः शोकसंविग्ना दुःखसागरमध्यगाः । पश्यंतीषु तास्वेव दुर्दमो राक्षसोऽभवत्
ruruduḥ śokasaṁvignā duḥkhasāgaramadhyagāḥ paśyaṁtīṣu tāsveva durdamo rākṣaso'bhavat
— शोक से व्याकुल होकर, दुःख-सागर में डूबकर रोने लगीं। और उनके देखते-देखते ही दुर्दम राक्षस बन गया —
श्लोक 29 (skanda.3.4.29)
महादंष्ट्रो महाकायो रक्तश्मश्रुशिरोरुहः । तं दृष्ट्वा भयसंविग्ना जग्मू रामास्त्रिविष्टपम्
mahādaṁṣṭro mahākāyo raktaśmaśruśiroruhaḥ taṁ dṛṣṭvā bhayasaṁvignā jagmū rāmāstriviṣṭapam
— बड़ी-बड़ी दाढ़ों वाला, विशाल शरीर वाला, लाल दाढ़ी-केश वाला। उसे देखकर भयभीत होकर वे स्त्रियाँ स्वर्ग को चली गईं।
श्लोक 30 (skanda.3.4.30)
ततो राक्षसवेषोऽयं दुर्दमो भैरवाकृतिः । भक्षयन्प्राणिनः सर्वान्देशाद्देशं वनाद्वनम्
tato rākṣasaveṣo'yaṁ durdamo bhairavākṛtiḥ bhakṣayanprāṇinaḥ sarvāndeśāddeśaṁ vanādvanam
तब राक्षस-वेष धारण किए, भैरव के समान भयंकर रूप वाला यह दुर्दम, सभी प्राणियों को खाते हुए, देश-देश, वन-वन —
श्लोक 31 (skanda.3.4.31)
भ्रमन्न निलवेगोऽसौ धर्मतीर्थं ततो ययौ । एवं षोडशवर्षाणि भ्रमतोऽस्य ययुस्तदा
bhramanna nilavego'sau dharmatīrthaṁ tato yayau evaṁ ṣoḍaśavarṣāṇi bhramato'sya yayustadā
— वायु के समान वेग से भटकते हुए, फिर धर्मतीर्थ गया। इस प्रकार भटकते हुए उसके सोलह वर्ष व्यतीत हो गए।
श्लोक 32 (skanda.3.4.32)
ततस्तु षोडशाब्दांते राक्षसोयं मुनीश्वराः । भक्षितुं गालवमुनिं धर्मतीर्थनिवासिनम्
tatastu ṣoḍaśābdāṁte rākṣasoyaṁ munīśvarāḥ bhakṣituṁ gālavamuniṁ dharmatīrthanivāsinam
फिर, हे मुनीश्वरो, उन सोलह वर्षों के अंत में यह राक्षस, धर्मतीर्थ में निवास करने वाले मुनि गालव को खाने के लिए —
श्लोक 33 (skanda.3.4.33)
उपाद्रवद्वायुवेगः सचास्तौषीज्जनार्दनम् । गालवेन स्तुतो विष्णुस्तदा चक्रमचोदयत्
upādravadvāyuvegaḥ sacāstauṣījjanārdanam gālavena stuto viṣṇustadā cakramacodayat
— वायु के समान वेग से आक्रमण किया; और गालव ने तब जनार्दन की स्तुति की। गालव द्वारा स्तुति किए गए विष्णु ने तब चक्र को —
श्लोक 34 (skanda.3.4.34)
रक्षितुं गाल वमुनिं राक्षसेन प्रपीडितम् । अथागत्य हरेश्चक्रं राक्षसस्य शिरोऽहरत्
rakṣituṁ gāla vamuniṁ rākṣasena prapīḍitam athāgatya hareścakraṁ rākṣasasya śiro'harat
— राक्षस द्वारा अत्यंत पीड़ित मुनि गालव की रक्षा के लिए भेजा। तब वहाँ पहुँचकर हरि के चक्र ने राक्षस का सिर काट डाला।
श्लोक 35 (skanda.3.4.35)
ततोऽयं राक्षसं देहं त्यक्त्वा दिव्यकलेवरः । विमानवरमारुह्य दुर्दमः पुष्पवर्षितः
tato'yaṁ rākṣasaṁ dehaṁ tyaktvā divyakalevaraḥ vimānavaramāruhya durdamaḥ puṣpavarṣitaḥ
तब यह दुर्दम अपने राक्षस-शरीर को त्यागकर, दिव्य शरीर धारण कर, उत्तम विमान पर आरूढ़ होकर, पुष्पों की वर्षा से आच्छादित होकर —
श्लोक 36 (skanda.3.4.36)
प्रांजलिः प्रणतो भूत्वा ववन्दे तं सुदर्शनम् । तुष्टाव श्रुतिरम्याभिर्वाग्भिरग्र्याभिरादरात्
prāṁjaliḥ praṇato bhūtvā vavande taṁ sudarśanam tuṣṭāva śrutiramyābhirvāgbhiragryābhirādarāt
— हाथ जोड़कर, प्रणाम कर उस सुदर्शन की वंदना की, और आदरपूर्वक श्रवण-मधुर श्रेष्ठ वाणी से उसकी स्तुति करने लगा।
श्लोक 37 (skanda.3.4.37)
दुर्दम उवाच । सुदर्शन नमस्तेऽस्तु विष्णुहस्तैकभूषण । नमस्तेऽसुरसंहर्त्रे सहस्रादित्यतेजसे
durdama uvāca sudarśana namaste'stu viṣṇuhastaikabhūṣaṇa namaste'surasaṁhartre sahasrādityatejase
दुर्दम ने कहा — "हे सुदर्शन, विष्णु के हाथ के एकमात्र आभूषण, आपको नमस्कार है! असुरों के संहारक, सहस्र सूर्यों के तेज वाले आपको नमस्कार है!
श्लोक 38 (skanda.3.4.38)
कृपालेशेन भवतस्त्यक्त्वाहं राक्षसीं तनुम् । स्वरूपमभजं विष्णोश्चक्रायुध नमोऽस्तु ते
kṛpāleśena bhavatastyaktvāhaṁ rākṣasīṁ tanum svarūpamabhajaṁ viṣṇoścakrāyudha namo'stu te
आपकी कृपा के लेशमात्र से मैंने अपनी राक्षसी देह त्याग दी और अपने स्वरूप को प्राप्त किया। हे विष्णु के आयुध, आपको नमस्कार है।
श्लोक 39 (skanda.3.4.39)
अनुजानीहि मां गन्तुं त्रिदिवं विष्णुवल्लभ । भार्या मे परिशोचंति विरहातुरचेतसः
anujānīhi māṁ gantuṁ tridivaṁ viṣṇuvallabha bhāryā me pariśocaṁti virahāturacetasaḥ
हे विष्णुवल्लभ, मुझे स्वर्ग जाने की अनुमति दीजिए; विरह से व्याकुल चित्त वाली मेरी पत्नियाँ शोक कर रही हैं।
श्लोक 40 (skanda.3.4.40)
त्वन्मनस्को भविष्यामि यावज्जीवं यथाह्यहम् । तथा कृपां कुरुष्व त्वं मयि चक्र नमोऽस्तु ते
tvanmanasko bhaviṣyāmi yāvajjīvaṁ yathāhyaham tathā kṛpāṁ kuruṣva tvaṁ mayi cakra namo'stu te
मैं जीवनभर आप में मन लगाए रखूँगा; हे चक्र, मुझ पर वैसी ही कृपा कीजिए — आपको नमस्कार है।"
श्लोक 41 (skanda.3.4.41)
एवं स्तुतं विष्णुचक्रं दुर्दमेन सभक्तिकम् । अनुजग्राह सहसा तथास्त्विति मुनीश्वराः
evaṁ stutaṁ viṣṇucakraṁ durdamena sabhaktikam anujagrāha sahasā tathāstviti munīśvarāḥ
हे मुनीश्वरो, दुर्दम द्वारा इस प्रकार भक्तिपूर्वक स्तुति किए जाने पर विष्णु-चक्र ने तुरंत ही "ऐसा ही हो" कहकर उस पर अनुग्रह किया।
श्लोक 42 (skanda.3.4.42)
चक्रायुधाभ्यनुज्ञातो दुर्दमो गालवं मुनिम् । प्रणम्य तेनानुज्ञातो गन्धर्वस्त्रिदिवं ययौ
cakrāyudhābhyanujñāto durdamo gālavaṁ munim praṇamya tenānujñāto gandharvastridivaṁ yayau
चक्रायुध की अनुमति पाकर दुर्दम ने मुनि गालव को प्रणाम किया; और उनकी भी अनुमति पाकर वह गंधर्व स्वर्ग को चला गया।
श्लोक 43 (skanda.3.4.43)
दुर्दमे तु गते स्वर्गं गालवो मुनिपुंगवः । स चक्रं प्रार्थयामास विष्ण्वायुधमनुत्तमम्
durdame tu gate svargaṁ gālavo munipuṁgavaḥ sa cakraṁ prārthayāmāsa viṣṇvāyudhamanuttamam
दुर्दम के स्वर्ग चले जाने पर मुनिश्रेष्ठ गालव ने विष्णु के उस अनुपम आयुध, चक्र से प्रार्थना की —
श्लोक 44 (skanda.3.4.44)
चक्रायुध नमामि त्वां महासुरविमर्द्दन । देवीपट्टण पर्यंते धर्मतीर्थे ह्यनुत्तमे
cakrāyudha namāmi tvāṁ mahāsuravimarddana devīpaṭṭaṇa paryaṁte dharmatīrthe hyanuttame
"हे चक्रायुध, महासुरों के संहारक, मैं आपको नमस्कार करता हूँ! देवीपट्टण तक फैले इस अनुपम धर्मतीर्थ में —
श्लोक 45 (skanda.3.4.45)
सन्निधानं कुरुष्व त्वं सर्वपापविनाशनम् । त्वत्सन्निधानात्सर्वेषां स्नातानां पापिनामिह
sannidhānaṁ kuruṣva tvaṁ sarvapāpavināśanam tvatsannidhānātsarveṣāṁ snātānāṁ pāpināmiha
— आप अपना सान्निध्य बनाए रखें, जो समस्त पापों का नाशक हो। यहाँ आपके सान्निध्य से स्नान करने वाले समस्त पापियों का —
श्लोक 46 (skanda.3.4.46)
पापनाशं कुरुष्व त्वं मोक्षं च कुरु शाश्वतम् । चक्रतीर्थमिति ख्यातिं लोकस्य परिकल्पय
pāpanāśaṁ kuruṣva tvaṁ mokṣaṁ ca kuru śāśvatam cakratīrthamiti khyātiṁ lokasya parikalpaya
— पाप-नाश कीजिए, तथा शाश्वत मोक्ष प्रदान कीजिए। इस स्थान को लोक में चक्रतीर्थ नाम से प्रसिद्ध कीजिए।
श्लोक 47 (skanda.3.4.47)
त्वत्सन्निधानादत्रत्यमुनीनां भयनाशनम् । इतः परं भवत्वार्य चक्रायुध नमोऽस्तु ते
tvatsannidhānādatratyamunīnāṁ bhayanāśanam itaḥ paraṁ bhavatvārya cakrāyudha namo'stu te
हे आर्य, आपके सान्निध्य से यहाँ के मुनियों के भय का नाश इसके बाद सदा होता रहे। हे चक्रायुध, आपको नमस्कार है।
श्लोक 48 (skanda.3.4.48)
भूतप्रेतपिशाचेभ्यो भयं मा भवतु प्रभो । इति संप्रार्थितं चक्रं गालवेन मुनीश्वराः
bhūtapretapiśācebhyo bhayaṁ mā bhavatu prabho iti saṁprārthitaṁ cakraṁ gālavena munīśvarāḥ
हे प्रभो, भूत-प्रेत-पिशाचों से भय न हो।" हे मुनीश्वरो, गालव द्वारा इस प्रकार प्रार्थना किए जाने पर वह चक्र —
श्लोक 49 (skanda.3.4.49)
तथैवा स्त्विति सम्भाष्य तस्मिंस्तीर्थे तिरोहितम् । श्रीसूत उवाच । एवं वः कथितो विप्रा राक्षसस्स भवो मया
tathaivā stviti sambhāṣya tasmiṁstīrthe tirohitam śrīsūta uvāca evaṁ vaḥ kathito viprā rākṣasassa bhavo mayā
— "ऐसा ही हो" कहकर उसी तीर्थ में अंतर्धान हो गया। श्री सूत जी ने कहा — हे विप्रो, इस प्रकार मैंने आपको उस राक्षस की उत्पत्ति का वर्णन सुनाया,
श्लोक 50 (skanda.3.4.50)
माहात्म्यं चक्र तीर्थस्य कथितं च मलापहम् । यच्छ्रुत्वा सर्वपापेभ्यो मुच्यते मानवो भुवि
māhātmyaṁ cakra tīrthasya kathitaṁ ca malāpaham yacchrutvā sarvapāpebhyo mucyate mānavo bhuvi
तथा मलनाशक चक्रतीर्थ का माहात्म्य भी बताया; जिसे सुनकर मनुष्य इस पृथ्वी पर समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 51 (skanda.3.4.51)
ऋषय ऊचुः । व्यासशिष्य महाप्राज्ञ सूत पौराणिकोत्तम । आरभ्य दर्भशयनमादेवीपत्तनावधि
ṛṣaya ūcuḥ vyāsaśiṣya mahāprājña sūta paurāṇikottama ārabhya darbhaśayanamādevīpattanāvadhi
ऋषियों ने कहा — हे व्यास-शिष्य, हे महाप्राज्ञ, हे पुराणों में श्रेष्ठ सूत, दर्भशयन से लेकर देवीपत्तन तक —
श्लोक 52 (skanda.3.4.52)
बहुव्यायामसंयुक्तं चक्रतीर्थमनुत्तमम् । ययौ विच्छिन्नतां मध्ये कथं कथय सांप्रतम्
bahuvyāyāmasaṁyuktaṁ cakratīrthamanuttamam yayau vicchinnatāṁ madhye kathaṁ kathaya sāṁpratam
— विशाल विस्तार वाला यह अनुपम चक्रतीर्थ बीच में विच्छिन्न कैसे हो गया? यह अब हमें बताइए।
श्लोक 53 (skanda.3.4.53)
एनं मनसि तिष्ठन्तं संशयं छेत्तुमर्हसि । श्रीसूत उवाच । पुरा हि पर्वताः सर्वे जातपक्षा मनोजवाः
enaṁ manasi tiṣṭhantaṁ saṁśayaṁ chettumarhasi śrīsūta uvāca purā hi parvatāḥ sarve jātapakṣā manojavāḥ
हमारे मन में स्थित इस संशय का आप निवारण कीजिए। श्री सूत जी ने कहा — प्राचीन काल में समस्त पर्वतों के पंख थे, वे मन के समान वेगवान थे —
श्लोक 54 (skanda.3.4.54)
पर्यंतपर्वतै सार्द्धं चेरुराकाशमार्गगाः । नगरेषु च राष्ट्रेषु ग्रामेषु च वनेषु च
paryaṁtaparvatai sārddhaṁ cerurākāśamārgagāḥ nagareṣu ca rāṣṭreṣu grāmeṣu ca vaneṣu ca
— और सीमावर्ती पर्वतों सहित वे आकाश-मार्ग से विचरण करते थे, नगरों, राज्यों, गाँवों तथा वनों के ऊपर से।
श्लोक 55 (skanda.3.4.55)
आप्लुत्याप्लुत्य तिष्ठंति पर्वताः सर्वतो भुवि । आक्रम्याक्रम्य तिष्ठंति यत्रयत्र महीधराः
āplutyāplutya tiṣṭhaṁti parvatāḥ sarvato bhuvi ākramyākramya tiṣṭhaṁti yatrayatra mahīdharāḥ
बार-बार कूदकर पर्वत सर्वत्र पृथ्वी पर आ बैठते थे; जहाँ-जहाँ वे पर्वत आक्रमण करके बैठ जाते थे,
श्लोक 56 (skanda.3.4.56)
तत्रतत्र नरा गावस्तथान्ये प्राणिसंचयाः । मरणं सहसा प्रापुः पीड्यमाना महीधरैः
tatratatra narā gāvastathānye prāṇisaṁcayāḥ maraṇaṁ sahasā prāpuḥ pīḍyamānā mahīdharaiḥ
— वहाँ-वहाँ मनुष्य, गायें तथा अन्य प्राणी-समूह, पर्वतों से पीड़ित होकर सहसा मृत्यु को प्राप्त होते थे।
श्लोक 57 (skanda.3.4.57)
ब्राह्मणादिषु वर्णेषु नष्टेषु समनन्तरम् । यज्ञाद्यभावात्सहसा देवता व्यसनं ययुः
brāhmaṇādiṣu varṇeṣu naṣṭeṣu samanantaram yajñādyabhāvātsahasā devatā vyasanaṁ yayuḥ
ब्राह्मण आदि वर्णों के क्रमशः नष्ट होने पर, यज्ञ आदि के अभाव के कारण देवता सहसा संकट में पड़ गए।
श्लोक 58 (skanda.3.4.58)
तत इन्द्रो महाक्रुद्धो वज्रमादाय वेगवान् । चिच्छेद सहसा पक्षान्पर्वतानां तरस्विनाम्
tata indro mahākruddho vajramādāya vegavān ciccheda sahasā pakṣānparvatānāṁ tarasvinām
तब इन्द्र अत्यंत क्रोधित होकर वज्र लेकर वेगपूर्वक उन तीव्रगामी पर्वतों के पंखों को सहसा काट डाला।
श्लोक 59 (skanda.3.4.59)
छिद्यमानच्छदाः सर्वे वासवेन महीधराः । अनन्यशरणा भूत्वा समुद्रं प्राविशन्भयात्
chidyamānacchadāḥ sarve vāsavena mahīdharāḥ ananyaśaraṇā bhūtvā samudraṁ prāviśanbhayāt
वासव (इन्द्र) द्वारा पंख काटे जाने पर, अन्य कोई शरण न पाकर, समस्त पर्वत भय से समुद्र में प्रविष्ट हो गए।
श्लोक 60 (skanda.3.4.60)
अचलेषु च सर्वेषु पतत्सु लवणार्णवे । निपेतुरर्णवभ्रांत्या चक्रतीर्थेपि केचन
acaleṣu ca sarveṣu patatsu lavaṇārṇave nipeturarṇavabhrāṁtyā cakratīrthepi kecana
और जब सभी पर्वत लवण-समुद्र में गिरने लगे, तब समुद्र समझने की भ्रांति से कुछ पर्वत चक्रतीर्थ में भी आ गिरे।
श्लोक 61 (skanda.3.4.61)
पतितैः पर्वतैस्तैस्तु मध्यतः पूरितोदरम् । चक्रतीर्थं महापुण्यं मध्ये विच्छेदमाययौ
patitaiḥ parvataistaistu madhyataḥ pūritodaram cakratīrthaṁ mahāpuṇyaṁ madhye vicchedamāyayau
उन गिरे हुए पर्वतों से बीच का भाग भर जाने के कारण, वह महापुण्य चक्रतीर्थ मध्य में विच्छिन्न हो गया।
श्लोक 62 (skanda.3.4.62)
यदृच्छया महाशैलाः पार्श्वयोस्तत्र नापतन् । अतो वै दर्भशयने तथा देवीपुरेऽपि च
yadṛcchayā mahāśailāḥ pārśvayostatra nāpatan ato vai darbhaśayane tathā devīpure'pi ca
संयोगवश वे बड़े-बड़े पर्वत उसके दोनों ओर नहीं गिरे; इसीलिए दर्भशयन में तथा देवीपुर में भी,
श्लोक 63 (skanda.3.4.63)
विच्छिन्नमध्यं तद्द्वेधा विभक्तमिव दृश्यते । मध्यतः पतितैः शैलैश्चक्रतीर्थं स्थलीकृतम्
vicchinnamadhyaṁ taddvedhā vibhaktamiva dṛśyate madhyataḥ patitaiḥ śailaiścakratīrthaṁ sthalīkṛtam
— बीच का भाग विच्छिन्न होकर मानो दो भागों में विभक्त-सा दिखाई देता है। बीच में गिरे हुए पर्वतों से चक्रतीर्थ का वह भाग स्थल बन गया।
श्लोक 64 (skanda.3.4.64)
श्रीसूत उवाच । युष्माकमेवं कथितं मुनीन्द्रा यन्मध्यतस्तीर्थमिदं स्थली कृतम् । यथा महीध्राः सहसा बिडौजसा विच्छिन्नपक्षा इह पेतुरुन्नताः
śrīsūta uvāca yuṣmākamevaṁ kathitaṁ munīndrā yanmadhyatastīrthamidaṁ sthalī kṛtam yathā mahīdhrāḥ sahasā biḍaujasā vicchinnapakṣā iha peturunnatāḥ
श्री सूत जी ने कहा — हे मुनीन्द्रो, इस प्रकार मैंने आपको बताया कि यह तीर्थ मध्य में किस प्रकार स्थल बन गया — किस प्रकार बलशाली इन्द्र द्वारा सहसा पंख काटे गए ऊँचे-ऊँचे पर्वत यहाँ आ गिरे।