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ब्रह्म खण्ड · अध्याय 5

विधूम-चरित तथा उदयन-जन्म का वर्णन

अध्याय 4अध्याय-सूचीअध्याय 6

श्लोक 1 (skanda.3.5.1)

श्रीसूत उवाच । प्रस्तुत्य चक्रतीर्थं तु पुण्यं पापविनाशनम् । पुनरप्यद्भुतं किञ्चित्प्रब्रवीमि मुनीश्वराः

śrīsūta uvāca prastutya cakratīrthaṁ tu puṇyaṁ pāpavināśanam punarapyadbhutaṁ kiñcitprabravīmi munīśvarāḥ

श्री सूत जी ने कहा — हे मुनीश्वरो, पुण्यमय, पापनाशक चक्रतीर्थ का प्रसंग आरंभ करके, मैं पुनः एक अद्भुत कथा और बताता हूँ।

श्लोक 2 (skanda.3.5.2)

विधूमनामा हि वसुर्देवस्त्री चाप्यलंबुषा । ब्रह्मशापान्महाघोरात्पुरा प्राप्तौ मनुष्यताम्

vidhūmanāmā hi vasurdevastrī cāpyalaṁbuṣā brahmaśāpānmahāghorātpurā prāptau manuṣyatām

विधूम नामक एक वसु, तथा अलंबुषा नामक देव-स्त्री, दोनों ने प्राचीन काल में ब्रह्मा के महाघोर शाप से मनुष्यत्व को प्राप्त किया था।

श्लोक 3 (skanda.3.5.3)

चक्रतीर्थे महापुण्ये स्नात्वा शापाद्विमोचितौ । ऋषय ऊचुः । सूतसूत महाप्राज्ञ पुराणार्थविशारद

cakratīrthe mahāpuṇye snātvā śāpādvimocitau ṛṣaya ūcuḥ sūtasūta mahāprājña purāṇārthaviśārada

महापुण्य चक्रतीर्थ में स्नान करके वे दोनों शाप से मुक्त हो गए। ऋषियों ने कहा — हे सूत, हे सूत, हे महाप्राज्ञ, पुराणों के अर्थ में निपुण —

श्लोक 4 (skanda.3.5.4)

प्राज्ञत्वाद्व्यासशिष्य त्वादज्ञातं ते न किंचन । ब्रह्मा केनापराधेन सहालंबुसया वसुम्

prājñatvādvyāsaśiṣya tvādajñātaṁ te na kiṁcana brahmā kenāparādhena sahālaṁbusayā vasum

— आप व्यास जी के प्राज्ञ शिष्य हैं, अतः आपसे कुछ भी अज्ञात नहीं है। किस अपराध के कारण ब्रह्मा ने अलंबुषा सहित उस वसु को —

श्लोक 5 (skanda.3.5.5)

पुरा विधूमनामानं शप्तवांश्चतुराननः । ब्रह्मशापेन घोरेण कयोस्तौ पुत्रतां गतौ

purā vidhūmanāmānaṁ śaptavāṁścaturānanaḥ brahmaśāpena ghoreṇa kayostau putratāṁ gatau

— प्राचीन काल में विधूम नामक उस वसु को चतुरानन ब्रह्मा ने शाप क्यों दिया? उस घोर ब्रह्मशाप से वे दोनों किनके पुत्र-रूप में उत्पन्न हुए?

श्लोक 6 (skanda.3.5.6)

शापस्यान्तः कथमभूद्ब्रह्मणा शप्तयोस्तयोः । एतन्नः श्रद्दधानानां विस्तराद्वक्तुमर्हसि

śāpasyāntaḥ kathamabhūdbrahmaṇā śaptayostayoḥ etannaḥ śraddadhānānāṁ vistarādvaktumarhasi

ब्रह्मा द्वारा शापित उन दोनों के शाप का अंत कैसे हुआ? हे श्रद्धावानों को, आप यह विस्तार से बताने योग्य हैं।

श्लोक 7 (skanda.3.5.7)

श्रीसूत उवाच । पुरा हि भगवान्ब्रह्मा स्वयम्भूश्चतुराननः । सावित्र्या च सरस्वत्या पार्श्वयोः प्रविराजितः

śrīsūta uvāca purā hi bhagavānbrahmā svayambhūścaturānanaḥ sāvitryā ca sarasvatyā pārśvayoḥ pravirājitaḥ

श्री सूत जी ने कहा — प्राचीन काल में भगवान् ब्रह्मा, स्वयंभू, चतुरानन, अपने दोनों ओर सावित्री और सरस्वती से सुशोभित होकर —

श्लोक 8 (skanda.3.5.8)

सनातनेन मुनिना सनकेन च धीमता । सनत्कुमारनाम्ना च नारदेन महात्मना

sanātanena muninā sanakena ca dhīmatā sanatkumāranāmnā ca nāradena mahātmanā

— सनातन मुनि, बुद्धिमान सनक, सनत्कुमार नामक तथा महात्मा नारद द्वारा —

श्लोक 9 (skanda.3.5.9)

सनन्दनादिभिश्चान्यैः सेव्यमानो मुनीश्वरैः । सुपर्ववृन्दजुष्टेन स्तूयमानो बिडौजसा

sanandanādibhiścānyaiḥ sevyamāno munīśvaraiḥ suparvavṛndajuṣṭena stūyamāno biḍaujasā

— तथा सनंदन आदि अन्य मुनीश्वरों द्वारा सेवित; देवसमूहों द्वारा संयुक्त इंद्र द्वारा स्तुति किए जाते हुए —

श्लोक 10 (skanda.3.5.10)

आदित्यादि ग्रहैश्चैव स्तूयमानपदांबुजः । सिद्धैः साध्यैर्मरुद्भिश्च किंनरैश्च समावृतः

ādityādi grahaiścaiva stūyamānapadāṁbujaḥ siddhaiḥ sādhyairmarudbhiśca kiṁnaraiśca samāvṛtaḥ

— सूर्य आदि ग्रहों द्वारा उनके चरण-कमलों की स्तुति होते हुए, सिद्धों, साध्यों, मरुतों तथा किन्नरों से घिरे हुए,

श्लोक 11 (skanda.3.5.11)

गणैः किंपुरुषाणां च वसुभिश्चाष्टभिर्वृतः । उर्वशीप्रमुखानां च स्वर्वेश्यानां मनोरमम्

gaṇaiḥ kiṁpuruṣāṇāṁ ca vasubhiścāṣṭabhirvṛtaḥ urvaśīpramukhānāṁ ca svarveśyānāṁ manoramam

— किंपुरुषों के गणों तथा आठों वसुओं से घिरे हुए; उर्वशी आदि प्रमुख स्वर्ग की अप्सराओं के मनोहर —

श्लोक 12 (skanda.3.5.12)

नृत्यं वादित्रसहितं वीक्ष्यमाणो मुहुर्मुहुः । गोष्ठीं चक्रे सभामध्ये सत्यलोके कदाचन

nṛtyaṁ vāditrasahitaṁ vīkṣyamāṇo muhurmuhuḥ goṣṭhīṁ cakre sabhāmadhye satyaloke kadācana

— वाद्यों सहित नृत्य को बार-बार देखते हुए, एक बार सत्यलोक में सभा के मध्य एक गोष्ठी आयोजित की।

श्लोक 13 (skanda.3.5.13)

मेघगर्जितगम्भीरो जनानां नंदयन्मुहुः । वीणावेणुमृदंगानां ध्वनिस्तत्र व्यसर्पत

meghagarjitagambhīro janānāṁ naṁdayanmuhuḥ vīṇāveṇumṛdaṁgānāṁ dhvanistatra vyasarpata

वहाँ वीणा, वंशी तथा मृदंग की ध्वनि फैलने लगी, जो मेघ-गर्जन के समान गंभीर थी और लोगों को बार-बार आनंदित करती थी।

श्लोक 14 (skanda.3.5.14)

गंगातरंगमालानां शीकरस्पर्शशीतलः । पवमानः सुखस्पर्शो मन्दं मन्दं ववौ तदा

gaṁgātaraṁgamālānāṁ śīkarasparśaśītalaḥ pavamānaḥ sukhasparśo mandaṁ mandaṁ vavau tadā

गंगा की तरंग-मालाओं की फुहारों के स्पर्श से शीतल, सुखद स्पर्श वाला पवन उस समय धीरे-धीरे बहने लगा।

श्लोक 15 (skanda.3.5.15)

पर्यायेण तदा सर्वा ननृतुर्देवयोषितः । नृत्यश्रमेण खिन्नासु वेश्यास्वन्यासु सादरम्

paryāyeṇa tadā sarvā nanṛturdevayoṣitaḥ nṛtyaśrameṇa khinnāsu veśyāsvanyāsu sādaram

तब सभी देव-स्त्रियाँ बारी-बारी से नृत्य करने लगीं; और जब अन्य अप्सराएँ नृत्य के परिश्रम से थक गईं, तब आदरपूर्वक —

श्लोक 16 (skanda.3.5.16)

अलंबुसा देवनारी रूपयौ वनशालिनी । मदयन्ती जनान्सर्वान्सभामध्ये ननर्त वै

alaṁbusā devanārī rūpayau vanaśālinī madayantī janānsarvānsabhāmadhye nanarta vai

— यौवन और सौंदर्य से शोभित देवांगना अलंबुषा, समस्त उपस्थित जनों को मुग्ध करती हुई सभा के मध्य नृत्य करने लगी।

श्लोक 17 (skanda.3.5.17)

तस्मिन्नवसरे तस्या नृत्यंत्याः संसदि द्विजाः । वस्त्रमाभ्यंतरं वायुर्लीलया समुदक्षिपत्

tasminnavasare tasyā nṛtyaṁtyāḥ saṁsadi dvijāḥ vastramābhyaṁtaraṁ vāyurlīlayā samudakṣipat

हे द्विजो, उसी अवसर पर, सभा में नृत्य करती हुई उसके भीतरी वस्त्र को वायु ने लीलापूर्वक उड़ा दिया।

श्लोक 18 (skanda.3.5.18)

तत्क्षिप्ते वसने स्पष्टमूरुमूलमदृश्यत । तथाभूतां तु तां दृष्ट्वा सर्वे ब्रह्मादयो ह्रिया

tatkṣipte vasane spaṣṭamūrumūlamadṛśyata tathābhūtāṁ tu tāṁ dṛṣṭvā sarve brahmādayo hriyā

वस्त्र के इस प्रकार उड़ जाने पर उसकी जंघा का मूल स्पष्ट दिखाई देने लगा। उसे इस अवस्था में देखकर ब्रह्मा आदि सभी देवगण लज्जावश —

श्लोक 19 (skanda.3.5.19)

सभामध्ये समासीना निमीलित दृशोऽभवन् । विधूमनामा तु वसुः कामबाणप्रपीडितः

sabhāmadhye samāsīnā nimīlita dṛśo'bhavan vidhūmanāmā tu vasuḥ kāmabāṇaprapīḍitaḥ

— सभा के मध्य बैठे-बैठे ही अपने नेत्र मूँद लिए। किंतु विधूम नामक वसु, काम-बाण से पीड़ित होकर —

श्लोक 20 (skanda.3.5.20)

तामेव ब्रह्मभवने दृष्ट्वानिलहृतांशुकाम् । हर्षसंफुल्लनयनो हृष्टरोमा ततोऽभवत्

tāmeva brahmabhavane dṛṣṭvānilahṛtāṁśukām harṣasaṁphullanayano hṛṣṭaromā tato'bhavat

— ब्रह्मा के उस भवन में वायु द्वारा वस्त्र-हरण की गई उसे देखकर, हर्ष से उसके नेत्र खिल गए और रोमांच हो आया।

श्लोक 21 (skanda.3.5.21)

अलंबुसायां तस्यां तु जातकामं विलोक्य तम् । वसुं विधूमनामानं शशाप चतुराननः

alaṁbusāyāṁ tasyāṁ tu jātakāmaṁ vilokya tam vasuṁ vidhūmanāmānaṁ śaśāpa caturānanaḥ

उस अलंबुषा के प्रति काम-भाव उत्पन्न हुए उस विधूम नामक वसु को देखकर, चतुरानन ब्रह्मा ने उसे शाप दिया —

श्लोक 22 (skanda.3.5.22)

यस्मात्त्वमीदृशं कार्यं विधूम कृतवानसि । तस्माद्धि मर्त्यलोके त्वं मानुषत्वमवाप्स्यसि

yasmāttvamīdṛśaṁ kāryaṁ vidhūma kṛtavānasi tasmāddhi martyaloke tvaṁ mānuṣatvamavāpsyasi

"हे विधूम, चूँकि तूने ऐसा कार्य किया है, इसलिए तू मृत्युलोक में मनुष्यत्व को प्राप्त होगा।

श्लोक 23 (skanda.3.5.23)

इयं च देवयोषित्ते तत्र भार्या भविष्यति । एवं स ब्रह्मणा शप्तो विधूमः खिन्नमानसः

iyaṁ ca devayoṣitte tatra bhāryā bhaviṣyati evaṁ sa brahmaṇā śapto vidhūmaḥ khinnamānasaḥ

और यह देव-स्त्री भी वहाँ तेरी पत्नी बनेगी।" इस प्रकार ब्रह्मा द्वारा शापित होकर, दुःखी मन वाला विधूम —

श्लोक 24 (skanda.3.5.24)

प्रसादयामास वसुर्ब्रह्माणं प्रणिपत्य तु । विधूम उवाच । अस्य शापस्य घोरस्य भगवन्भक्तवत्सल

prasādayāmāsa vasurbrahmāṇaṁ praṇipatya tu vidhūma uvāca asya śāpasya ghorasya bhagavanbhaktavatsala

— उस वसु ने ब्रह्मा को प्रणाम कर उन्हें प्रसन्न करने का प्रयत्न किया। विधूम ने कहा — "हे भगवन्, हे भक्तवत्सल, इस घोर शाप के —

श्लोक 25 (skanda.3.5.25)

नाहमर्होऽस्मि देवेश रक्ष मां करुणानिधे । एवं प्रसादितस्तेन भारतीपतिरव्ययः

nāhamarho'smi deveśa rakṣa māṁ karuṇānidhe evaṁ prasāditastena bhāratīpatiravyayaḥ

— मैं योग्य नहीं हूँ, हे देवेश; हे करुणानिधे, मेरी रक्षा कीजिए।" इस प्रकार उसके द्वारा प्रसन्न किए जाने पर वह अव्यय भारतीपति (ब्रह्मा) —

श्लोक 26 (skanda.3.5.26)

कृपया परया युक्तो विधूमं प्राह सांत्वयन् । ब्रह्मोवाच । त्वयि शापोऽप्ययं दत्तो न चासत्यं ब्रवीम्यहम्

kṛpayā parayā yukto vidhūmaṁ prāha sāṁtvayan brahmovāca tvayi śāpo'pyayaṁ datto na cāsatyaṁ bravīmyaham

— परम कृपा से युक्त होकर विधूम को सांत्वना देते हुए बोले। ब्रह्मा ने कहा — "यह शाप तुझे दिया जा चुका है, और मैं असत्य नहीं कहता।

श्लोक 27 (skanda.3.5.27)

ततोऽवधिं कल्पयामि शापस्यास्य तवाधुना । मर्त्यभावं समापन्नः सहालंबुसयाऽनया

tato'vadhiṁ kalpayāmi śāpasyāsya tavādhunā martyabhāvaṁ samāpannaḥ sahālaṁbusayā'nayā

अतः अब मैं तेरे इस शाप की अवधि निर्धारित करता हूँ। इस अलंबुषा सहित मनुष्य-भाव को प्राप्त होकर —

श्लोक 28 (skanda.3.5.28)

तत्र भूत्वा महाराजः शासयित्वा चिरं महीम् । पुत्रमप्रतिमं त्वस्यां जनयित्वा महीपतिम्

tatra bhūtvā mahārājaḥ śāsayitvā ciraṁ mahīm putramapratimaṁ tvasyāṁ janayitvā mahīpatim

— वहाँ महाराज बनकर, दीर्घकाल तक पृथ्वी का शासन करके, इसमें एक अनुपम राजपुत्र को उत्पन्न करके —

श्लोक 29 (skanda.3.5.29)

अभिषिच्य च राज्ये तं राज्यरक्षाविचक्षणम् । एतच्छापस्य शांत्यर्थं दक्षिणस्योदधेस्तटे । फुल्लग्रामसमीपस्थे चक्रतीर्थे महत्तरे

abhiṣicya ca rājye taṁ rājyarakṣāvicakṣaṇam etacchāpasya śāṁtyarthaṁ dakṣiṇasyodadhestaṭe phullagrāmasamīpasthe cakratīrthe mahattare

— तथा राज्य-रक्षा में निपुण उसे राज्य पर अभिषिक्त करके — इस शाप की शांति के लिए, दक्षिणी समुद्र के तट पर, फुल्लग्राम के समीप स्थित उस महान चक्रतीर्थ में,

श्लोक 30 (skanda.3.5.30)

अनया भार्यया सार्द्धं यदा स्नानं करिष्यसि । तदा त्वं मानुषं भावं जीर्णत्वचमिवोरगः

anayā bhāryayā sārddhaṁ yadā snānaṁ kariṣyasi tadā tvaṁ mānuṣaṁ bhāvaṁ jīrṇatvacamivoragaḥ

— इस अपनी पत्नी के साथ जब तू स्नान करेगा, तब तू अपने मानव-भाव को वैसे ही त्याग देगा, जैसे सर्प अपनी जीर्ण त्वचा को त्यागता है —

श्लोक 31 (skanda.3.5.31)

विसृज्य भार्यया सार्द्धं स्वं लोकं प्रतिपत्स्यसे । चक्रतीर्थे विना स्नानं न नश्येच्छाप ईदृशः

visṛjya bhāryayā sārddhaṁ svaṁ lokaṁ pratipatsyase cakratīrthe vinā snānaṁ na naśyecchāpa īdṛśaḥ

— और पत्नी सहित अपने लोक को प्राप्त होगा। चक्रतीर्थ में स्नान किए बिना यह शाप नष्ट नहीं होगा।"

श्लोक 32 (skanda.3.5.32)

इति ब्रह्मवचः श्रुत्वा विधूमो नातिहृष्टवान् । स्ववेश्म प्राविशत्तूर्णमामंत्र्य चतुराननम्

iti brahmavacaḥ śrutvā vidhūmo nātihṛṣṭavān svaveśma prāviśattūrṇamāmaṁtrya caturānanam

ब्रह्मा का यह वचन सुनकर विधूम अधिक प्रसन्न नहीं हुआ; चतुरानन से अनुमति लेकर वह शीघ्र अपने भवन में गया।

श्लोक 33 (skanda.3.5.33)

चिंतयामास तत्रासौ मर्त्यतां यास्यतो मम । को वा पिता भवेद्भूमौ का वा माता भविष्यति

ciṁtayāmāsa tatrāsau martyatāṁ yāsyato mama ko vā pitā bhavedbhūmau kā vā mātā bhaviṣyati

वहाँ उसने विचार किया — "मृत्युलोक को जाने वाले मेरे लिए पृथ्वी पर पिता कौन होगा, और माता कौन होगी?

श्लोक 34 (skanda.3.5.34)

बहुधेत्थं समालोच्य विधूमो निश्चिकाय सः । कौशांबीनगरे राजा शतानीक इति श्रुतः

bahudhetthaṁ samālocya vidhūmo niścikāya saḥ kauśāṁbīnagare rājā śatānīka iti śrutaḥ

इस प्रकार बहुत विचार करके विधूम ने निश्चय किया — कौशांबी नगर में शतानीक नामक विख्यात राजा है —

श्लोक 35 (skanda.3.5.35)

अस्ति वीरो महाभागो भार्या चापि पतिव्रता । तस्य विष्णुमतीनाम विष्णोः श्रीरिव वल्लभा

asti vīro mahābhāgo bhāryā cāpi pativratā tasya viṣṇumatīnāma viṣṇoḥ śrīriva vallabhā

— वीर तथा महाभाग्यशाली, और उनकी पत्नी भी पतिव्रता है; उनकी विष्णुमती नामक प्रिय पत्नी विष्णु की लक्ष्मी के समान है।

श्लोक 36 (skanda.3.5.36)

तमेव पितरं कृत्वा मातरं च विधाय ताम् । संभविष्यामि भूलोके स्वकर्मपरिपाकतः

tameva pitaraṁ kṛtvā mātaraṁ ca vidhāya tām saṁbhaviṣyāmi bhūloke svakarmaparipākataḥ

उन्हीं को पिता तथा उन्हीं को माता बनाकर, मैं अपने कर्मों के परिपाक से भूलोक में उत्पन्न होऊँगा।"

श्लोक 37 (skanda.3.5.37)

ततः स माल्यवन्तं च पुष्पदंतं बलोत्कटम् । त्रीनाहूयात्मनो भृत्यान्वृत्तमेतन्न्यवे दयत्

tataḥ sa mālyavantaṁ ca puṣpadaṁtaṁ balotkaṭam trīnāhūyātmano bhṛtyānvṛttametannyave dayat

तब उसने माल्यवान्, पुष्पदंत तथा बलोत्कट — इन तीनों अपने सेवकों को बुलाकर यह सारा वृत्तांत बताया।

श्लोक 38 (skanda.3.5.38)

भृत्याः शृणुत भद्रं वो ब्रह्मशापान्महाभयात् । जनिष्यामि शतानीकाद्विष्णुमत्यामहं सुतः

bhṛtyāḥ śṛṇuta bhadraṁ vo brahmaśāpānmahābhayāt janiṣyāmi śatānīkādviṣṇumatyāmahaṁ sutaḥ

"हे सेवको, सुनो, तुम्हारा कल्याण हो — ब्रह्मा के महाभयंकर शाप के कारण मैं शतानीक से विष्णुमती के गर्भ से पुत्र-रूप में उत्पन्न होऊँगा।

श्लोक 39 (skanda.3.5.39)

इति श्रुत्वा वचो भृत्यास्तस्या प्राणा बहिश्चराः । वाष्पपूर्णमुखाः सर्वे विधूमं वाक्यमब्रुवन्

iti śrutvā vaco bhṛtyāstasyā prāṇā bahiścarāḥ vāṣpapūrṇamukhāḥ sarve vidhūmaṁ vākyamabruvan

यह वचन सुनकर सेवकों के प्राण मानो शरीर से बाहर निकलने लगे; सभी अश्रुपूर्ण मुख वाले होकर विधूम से यह कहने लगे —

श्लोक 40 (skanda.3.5.40)

भृत्या ऊचुः । त्वद्वियोगं वयं सर्वे त्रयोऽपि न सहामहे । तस्मान्मानुष भावत्वमस्माभिः सह यास्यसि

bhṛtyā ūcuḥ tvadviyogaṁ vayaṁ sarve trayo'pi na sahāmahe tasmānmānuṣa bhāvatvamasmābhiḥ saha yāsyasi

सेवकों ने कहा — "हम तीनों ही आपके वियोग को सहन नहीं कर सकते। अतः आप हमारे साथ ही मनुष्य-भाव को प्राप्त होंगे।

श्लोक 41 (skanda.3.5.41)

शतानीकस्य राजर्षेर्मंत्री योऽयं युगन्धरः । सेनानीर्विप्रतीकश्च योऽयं प्राग्रसरो रणे

śatānīkasya rājarṣermaṁtrī yo'yaṁ yugandharaḥ senānīrvipratīkaśca yo'yaṁ prāgrasaro raṇe

राजर्षि शतानीक के जो युगंधर नामक मंत्री हैं, तथा जो विप्रतीक नामक सेनापति, रण में सबसे आगे रहने वाले —

श्लोक 42 (skanda.3.5.42)

नर्मकर्मसु हृद्विप्रो वल्लभाख्यो महांश्च यः । तेषां पुत्रास्त्रयोऽप्येते भविष्यामो न संशयः

narmakarmasu hṛdvipro vallabhākhyo mahāṁśca yaḥ teṣāṁ putrāstrayo'pyete bhaviṣyāmo na saṁśayaḥ

— तथा विनोद-कार्यों में हृदय के प्रिय, वल्लभ नामक महान् जो ब्राह्मण हैं — इन तीनों के हम तीनों पुत्र बनेंगे, इसमें संदेह नहीं।

श्लोक 43 (skanda.3.5.43)

शतानीकस्य राजर्षेः पुत्रभावं गतस्य ते । शुश्रूषां संविधास्यामस्तेषु तेषु च कर्मसु । तानेवंवादिनः सोऽयं विधूमो वाक्यमब्रवीत्

śatānīkasya rājarṣeḥ putrabhāvaṁ gatasya te śuśrūṣāṁ saṁvidhāsyāmasteṣu teṣu ca karmasu tānevaṁvādinaḥ so'yaṁ vidhūmo vākyamabravīt

राजर्षि शतानीक के पुत्र बने आप की, उन-उन कार्यों में हम सेवा करेंगे।" इस प्रकार कहने वाले उनसे उस विधूम ने यह वचन कहा —

श्लोक 44 (skanda.3.5.44)

विधूम उवाच । जानेऽहं भवतां स्नेहं तादृशं मय्य नुत्तमम्

vidhūma uvāca jāne'haṁ bhavatāṁ snehaṁ tādṛśaṁ mayya nuttamam

विधूम ने कहा — "मैं तुम्हारा मेरे प्रति ऐसा अनुपम स्नेह जानता हूँ।

श्लोक 45 (skanda.3.5.45)

तथापि कथयाम्यद्य तच्छृणुध्वं हितं वचः । ब्रह्मशापेन घोरेण स्वेन दुष्कर्मणा कृतम्

tathāpi kathayāmyadya tacchṛṇudhvaṁ hitaṁ vacaḥ brahmaśāpena ghoreṇa svena duṣkarmaṇā kṛtam

फिर भी आज मैं कहता हूँ, इस हितकारी वचन को सुनो। यह मेरे अपने दुष्कर्म के कारण ब्रह्मा के घोर शाप से हुआ है।

श्लोक 46 (skanda.3.5.46)

कुत्सितं मानुषं भावमहमेकोऽनुवर्तये । विहितं न हि युष्माकमेतच्छापानुवर्तनम्

kutsitaṁ mānuṣaṁ bhāvamahameko'nuvartaye vihitaṁ na hi yuṣmākametacchāpānuvartanam

यह निंदित मानव-भाव मुझे अकेले ही भोगना चाहिए। यह शाप-पालन तुम लोगों के लिए विहित नहीं है।

श्लोक 47 (skanda.3.5.47)

जुगुप्सितेऽतो मानुष्ये मा कुरुध्वं मनोऽधुना । अतः शापावधिर्यावन्मद्वियोगो विषह्यताम्

jugupsite'to mānuṣye mā kurudhvaṁ mano'dhunā ataḥ śāpāvadhiryāvanmadviyogo viṣahyatām

अतः इस निंदित मनुष्य-भाव में अभी अपना मन मत लगाओ; अतः जब तक शाप की अवधि है, तब तक मेरा वियोग सहन करो।"

श्लोक 48 (skanda.3.5.48)

इत्युक्तवन्तं ते सर्वे माल्यवत्प्रमुखास्तदा । ऊचुः प्रणम्य शिरसा प्रार्थयंतः पुनःपुनः

ityuktavantaṁ te sarve mālyavatpramukhāstadā ūcuḥ praṇamya śirasā prārthayaṁtaḥ punaḥpunaḥ

इस प्रकार कहने वाले उनसे माल्यवान आदि सभी ने तब सिर झुकाकर प्रणाम कर, बार-बार प्रार्थना करते हुए यह कहा —

श्लोक 49 (skanda.3.5.49)

रक्षित्वा कृपया ह्यस्मान्मा कुरुष्व च साहसम् । परित्यजसि नः सर्वान्भक्तानद्य निरागसः

rakṣitvā kṛpayā hyasmānmā kuruṣva ca sāhasam parityajasi naḥ sarvānbhaktānadya nirāgasaḥ

"कृपापूर्वक हमारी रक्षा कीजिए, और यह दुःसाहस मत कीजिए। आज आप हम सभी निर्दोष भक्तों को त्याग रहे हैं।

श्लोक 50 (skanda.3.5.50)

त्वद्वियोगान्महाघोरान्मानुष्यमपि कुत्सितम् । बहु मन्यामहे देव तस्मान्नस्त्राहि सांप्रतम्

tvadviyogānmahāghorānmānuṣyamapi kutsitam bahu manyāmahe deva tasmānnastrāhi sāṁpratam

हे देव, हम आपके भीषण वियोग से तो निंदित मनुष्यत्व को भी अच्छा मानते हैं; अतः अभी हमारी रक्षा कीजिए।"

श्लोक 51 (skanda.3.5.51)

एवं स याचमानांस्त्रीनन्वमन्यत भृत्यकान् । तैस्त्रिभिः सहितः सोऽयं कौशांबीं गन्तुमैच्छत

evaṁ sa yācamānāṁstrīnanvamanyata bhṛtyakān taistribhiḥ sahitaḥ so'yaṁ kauśāṁbīṁ gantumaicchata

इस प्रकार प्रार्थना करने वाले उन तीनों सेवकों को उसने स्वीकृति दे दी; उन तीनों सहित वह कौशांबी जाने की इच्छा करने लगा।

श्लोक 52 (skanda.3.5.52)

एतस्मिन्नेव काले तु सोमवंशविवर्द्धनः । अर्जुनाभिजने जातो जनमेजयसंभवः

etasminneva kāle tu somavaṁśavivarddhanaḥ arjunābhijane jāto janamejayasaṁbhavaḥ

इसी समय, चंद्रवंश की वृद्धि करने वाला, अर्जुन के वंश में उत्पन्न, जनमेजय के वंशज —

श्लोक 53 (skanda.3.5.53)

शतानीको महीपालः पृथिवीमन्वपालयत् । बुद्धिमान्नीतिमान्वाग्मी प्रजापालनतत्परः

śatānīko mahīpālaḥ pṛthivīmanvapālayat buddhimānnītimānvāgmī prajāpālanatatparaḥ

— राजा शतानीक पृथ्वी का पालन करते थे — बुद्धिमान, नीतिमान, वाक्पटु, प्रजा-पालन में तत्पर,

श्लोक 54 (skanda.3.5.54)

चतुरंगबलोपेतो विक्रमैकधनो युवा । स कौशांबीं महाराजो नगरीमध्युवास वै

caturaṁgabalopeto vikramaikadhano yuvā sa kauśāṁbīṁ mahārājo nagarīmadhyuvāsa vai

— चतुरंग सेना से युक्त, केवल पराक्रम ही जिसका धन था, ऐसा युवा। वह महाराज कौशांबी नगरी में निवास करते थे।

श्लोक 55 (skanda.3.5.55)

तस्य मन्त्ररहस्यज्ञो मन्त्री जातो युगंधरः । सेनानीर्विप्रतीकश्च तस्य प्राग्रसरो रणे

tasya mantrarahasyajño mantrī jāto yugaṁdharaḥ senānīrvipratīkaśca tasya prāgrasaro raṇe

उनके मंत्र-रहस्यों के ज्ञाता मंत्री युगंधर थे; और रण में सबसे आगे रहने वाले उनके सेनापति विप्रतीक थे।

श्लोक 56 (skanda.3.5.56)

नर्मकर्मसु तस्यासीद्वल्लभाख्यः सखा द्विजः । तस्य विष्णुमती नाम विष्णोः श्रीरिव वल्लभा

narmakarmasu tasyāsīdvallabhākhyaḥ sakhā dvijaḥ tasya viṣṇumatī nāma viṣṇoḥ śrīriva vallabhā

विनोद-कार्यों में उनके मित्र वल्लभ नामक ब्राह्मण थे। और उनकी विष्णुमती नामक प्रिय पत्नी विष्णु की लक्ष्मी के समान थी।

श्लोक 57 (skanda.3.5.57)

स सर्वगुणसंपन्नः शतानीको महामतिः । पुत्रमात्मसमं तस्यां भार्यायां नान्वविंदत

sa sarvaguṇasaṁpannaḥ śatānīko mahāmatiḥ putramātmasamaṁ tasyāṁ bhāryāyāṁ nānvaviṁdata

सर्वगुणसंपन्न, महाबुद्धिमान वह शतानीक अपनी उस पत्नी से अपने समान पुत्र प्राप्त नहीं कर सके।

श्लोक 58 (skanda.3.5.58)

आत्मानमसुतं ज्ञात्वा स भृशं पर्यतप्यत । स युगंधरमाहूय मंत्रिणं मन्त्रवित्तमम्

ātmānamasutaṁ jñātvā sa bhṛśaṁ paryatapyata sa yugaṁdharamāhūya maṁtriṇaṁ mantravittamam

अपने आपको पुत्रहीन जानकर वे अत्यंत दुःखी हो गए। उन्होंने अपने मंत्र-विद्या में निपुण मंत्री युगंधर को बुलाकर —

श्लोक 59 (skanda.3.5.59)

पुत्रलाभः कथं मे स्यादिति कार्यममन्त्रयत् । युगन्धरो मही पालं पुत्रालाभेन पीडितम् । हर्षयन्वचसा स्वेन वाक्यमेतदभाषत

putralābhaḥ kathaṁ me syāditi kāryamamantrayat yugandharo mahī pālaṁ putrālābhena pīḍitam harṣayanvacasā svena vākyametadabhāṣata

— "मुझे पुत्र-प्राप्ति कैसे हो," इस विषय पर विचार किया। युगंधर ने पुत्र-प्राप्ति के अभाव से पीड़ित राजा को अपने वचनों से प्रसन्न करते हुए यह कहा —

श्लोक 60 (skanda.3.5.60)

युगन्धर उवाच । अस्ति शांडिल्यनामा तु महर्षिः सत्यवाक्छुचिः

yugandhara uvāca asti śāṁḍilyanāmā tu maharṣiḥ satyavākchuciḥ

युगंधर ने कहा — "शांडिल्य नामक एक महर्षि हैं, सत्यवादी, पवित्र —

श्लोक 61 (skanda.3.5.61)

शत्रुमित्रसमो दांतस्तपःस्वाध्यायतत्परः । तमेव मुनिमासाद्य ज्वलंतमिव पावकम्

śatrumitrasamo dāṁtastapaḥsvādhyāyatatparaḥ tameva munimāsādya jvalaṁtamiva pāvakam

— शत्रु-मित्र में समान, संयमी, तप-स्वाध्याय में तत्पर। उन्हीं अग्नि के समान तेजस्वी मुनि के पास जाकर,

श्लोक 62 (skanda.3.5.62)

पुत्रमात्मसमं राजन्प्रार्थयेथा विनीतवत् । कृपावान्स महर्षिस्तु पुत्रं ते दास्यति ध्रुवम्

putramātmasamaṁ rājanprārthayethā vinītavat kṛpāvānsa maharṣistu putraṁ te dāsyati dhruvam

हे राजन्, विनम्रतापूर्वक अपने समान पुत्र की प्रार्थना कीजिए; वह कृपालु महर्षि निश्चय ही आपको पुत्र प्रदान करेंगे।

श्लोक 63 (skanda.3.5.63)

इति तद्वचनं श्रुत्वा हर्षसंफुल्ललोचनः । मंत्रिणा तेन संयुक्तस्तस्यागादाश्रमं मुनेः

iti tadvacanaṁ śrutvā harṣasaṁphullalocanaḥ maṁtriṇā tena saṁyuktastasyāgādāśramaṁ muneḥ

यह वचन सुनकर, हर्ष से जिनके नेत्र खिल गए थे, वे उस मंत्री के साथ उस मुनि के आश्रम को गए।

श्लोक 64 (skanda.3.5.64)

तमाश्रमे समासीनं प्रणनाम महीपतिः । शांडिल्यस्तु महातेजा राजानं प्राप्तमाश्रमम्

tamāśrame samāsīnaṁ praṇanāma mahīpatiḥ śāṁḍilyastu mahātejā rājānaṁ prāptamāśramam

राजा ने आश्रम में बैठे हुए उन्हें प्रणाम किया। और महातेजस्वी शांडिल्य ने आश्रम में आए हुए राजा को —

श्लोक 65 (skanda.3.5.65)

दृष्ट्वा पाद्यादिभिः पूज्य स्वागतं व्याजहार सः । शांडिल्य उवाच । शतानीक किमर्थं त्वमाश्रमं प्राप्तवान्मम

dṛṣṭvā pādyādibhiḥ pūjya svāgataṁ vyājahāra saḥ śāṁḍilya uvāca śatānīka kimarthaṁ tvamāśramaṁ prāptavānmama

— देखकर पाद्य आदि से उनका सम्मान कर स्वागत किया। शांडिल्य ने कहा — "हे शतानीक, तुम किस कारण मेरे आश्रम में आए हो?

श्लोक 66 (skanda.3.5.66)

यत्कर्तव्यमिदानीं ते तद्वदस्व करोम्यहम् । मुनिमेवं वदंतं तं प्रत्यवादीद्युगंधरः

yatkartavyamidānīṁ te tadvadasva karomyaham munimevaṁ vadaṁtaṁ taṁ pratyavādīdyugaṁdharaḥ

अब तुम्हारा जो कार्य करना है, वह बताओ, मैं वह करूँगा।" इस प्रकार कहने वाले मुनि को युगंधर ने उत्तर दिया —

श्लोक 67 (skanda.3.5.67)

भगवन्नेष वै राजा पुत्रालाभेन कर्षितः । भवंतं शरणं प्राप्तः सांप्रतं पुत्रकारणात्

bhagavanneṣa vai rājā putrālābhena karṣitaḥ bhavaṁtaṁ śaraṇaṁ prāptaḥ sāṁprataṁ putrakāraṇāt

"हे भगवन्, पुत्र न होने से दुःखी यह राजा अभी पुत्र के कारण आपकी शरण में आए हैं।

श्लोक 68 (skanda.3.5.68)

अस्यापुत्रत्वजं दुःखं त्वमपाकर्तुमर्हसि । इति तस्य वचः श्रुत्वा शांडिल्यो मुनिसत्तमः

asyāputratvajaṁ duḥkhaṁ tvamapākartumarhasi iti tasya vacaḥ śrutvā śāṁḍilyo munisattamaḥ

आप इसके पुत्रहीनता से उत्पन्न दुःख को दूर करने योग्य हैं।" उसका यह वचन सुनकर मुनिसत्तम शांडिल्य ने —

श्लोक 69 (skanda.3.5.69)

पुत्रलाभवरं तस्मै प्रतिजज्ञे नृपाय वै । स राज्ञो वरदः श्रीमान्कौशांबीमेत्य सादरम्

putralābhavaraṁ tasmai pratijajñe nṛpāya vai sa rājño varadaḥ śrīmānkauśāṁbīmetya sādaram

— उस राजा को पुत्र-प्राप्ति का वर देने का वचन दिया। वे श्रीमान् वरदाता आदरपूर्वक कौशांबी आकर —

श्लोक 70 (skanda.3.5.70)

पुत्रेष्ट्या पुत्रकामस्य याजकोऽभून्महामुनिः । ततो मुनिप्रसादेन राजा दशरथोपमः

putreṣṭyā putrakāmasya yājako'bhūnmahāmuniḥ tato muniprasādena rājā daśarathopamaḥ

— पुत्र की कामना करने वाले राजा के पुत्रेष्टि यज्ञ के याजक बने। फिर मुनि के अनुग्रह से दशरथ के समान वह राजा —

श्लोक 71 (skanda.3.5.71)

यज्वा राममिव प्राप सहस्रानीकमात्मजम् । एवं विधूमः संजज्ञे शतानीकान्नृपोत्तमात्

yajvā rāmamiva prāpa sahasrānīkamātmajam evaṁ vidhūmaḥ saṁjajñe śatānīkānnṛpottamāt

— यज्ञ करके राम के समान अपना पुत्र सहस्रानीक प्राप्त किया। इस प्रकार विधूम, राजश्रेष्ठ शतानीक से उत्पन्न हुआ।

श्लोक 72 (skanda.3.5.72)

अत्रांतरे मंत्रिवरस्सेनानीस्तु महीपतेः । द्विजो नर्मवयस्यश्च पुत्रान्प्रापुः कुलोचितान्

atrāṁtare maṁtrivarassenānīstu mahīpateḥ dvijo narmavayasyaśca putrānprāpuḥ kulocitān

इसी बीच राजा के प्रमुख मंत्री, सेनापति, तथा विनोद-मित्र ब्राह्मण ने भी अपने कुल के योग्य पुत्रों को प्राप्त किया।

श्लोक 73 (skanda.3.5.73)

पुत्रो युगंधरस्यासीन्माल्यवान्नाम भृत्यकः । यौगंधरायणो नाम्ना मन्त्रशास्त्रेषु कोविदः

putro yugaṁdharasyāsīnmālyavānnāma bhṛtyakaḥ yaugaṁdharāyaṇo nāmnā mantraśāstreṣu kovidaḥ

युगंधर का पुत्र वह सेवक माल्यवान् था, जो यौगंधरायण नाम से मंत्र-शास्त्रों में निपुण जाना गया।

श्लोक 74 (skanda.3.5.74)

विप्रतीकस्य तनयः पुष्पदन्तो बभूव ह । रुमण्वानिति विख्यातः परसैन्यविमर्दनः

vipratīkasya tanayaḥ puṣpadanto babhūva ha rumaṇvāniti vikhyātaḥ parasainyavimardanaḥ

विप्रतीक का पुत्र पुष्पदंत हुआ, जो रुमण्वान् नाम से विख्यात, शत्रु-सेना का विमर्दक हुआ।

श्लोक 75 (skanda.3.5.75)

वल्लभस्य तदा जज्ञे तनयो वै बलोत्कटः । वसंतक इति ख्यातो नर्मकर्मसु कोविदः

vallabhasya tadā jajñe tanayo vai balotkaṭaḥ vasaṁtaka iti khyāto narmakarmasu kovidaḥ

वल्लभ को तब वह पुत्र उत्पन्न हुआ जो बलोत्कट था, जो वसंतक नाम से विनोद-कार्यों में निपुण विख्यात हुआ।

श्लोक 76 (skanda.3.5.76)

अथ ते ववृधुः सर्वे राजपुत्रपुरोगमाः । पञ्चहायनतां तेषु यातेषु तदनंतरम्

atha te vavṛdhuḥ sarve rājaputrapurogamāḥ pañcahāyanatāṁ teṣu yāteṣu tadanaṁtaram

फिर वे सभी, राजकुमार को आगे रखकर, बड़े होने लगे; और उसके पश्चात् जब वे पाँच वर्ष के हुए,

श्लोक 77 (skanda.3.5.77)

अलंबुसापि स्वर्वेश्या भूपतेः कृतवर्मणः । अयोध्यायां महापुर्यां कन्या जाता मृगावती

alaṁbusāpi svarveśyā bhūpateḥ kṛtavarmaṇaḥ ayodhyāyāṁ mahāpuryāṁ kanyā jātā mṛgāvatī

— अलंबुषा भी, वह स्वर्ग की अप्सरा, महापुरी अयोध्या में राजा कृतवर्मा की कन्या मृगावती नाम से उत्पन्न हुई।

श्लोक 78 (skanda.3.5.78)

एवं विधूममुख्यास्ते जज्ञिरे क्षितिमण्डले । अत्रांतरे महासत्त्वो दुष्टसानुचरो बली

evaṁ vidhūmamukhyāste jajñire kṣitimaṇḍale atrāṁtare mahāsattvo duṣṭasānucaro balī

इस प्रकार विधूम आदि प्रमुख लोग पृथ्वी-मंडल पर उत्पन्न हुए। इसी बीच एक महाबली, दुष्ट अनुचरों वाला —

श्लोक 79 (skanda.3.5.79)

अहिदंष्ट्र इति ख्यातो महादैत्यो बलोत्कटः । युक्तः स्थूलशिरोनामा सहायेन दुरात्मना

ahidaṁṣṭra iti khyāto mahādaityo balotkaṭaḥ yuktaḥ sthūlaśironāmā sahāyena durātmanā

— अहिदंष्ट्र नामक एक महाबली महादैत्य, स्थूलशिर नामक दुरात्मा सहायक के साथ मिलकर —

श्लोक 80 (skanda.3.5.80)

रुरोध देवनगरं बबाध विबुधानपि । वर्तमाने दिवि महासमरे सुररक्षसाम्

rurodha devanagaraṁ babādha vibudhānapi vartamāne divi mahāsamare surarakṣasām

— देवनगरी को घेर लिया और देवताओं को भी पीड़ित करने लगा। स्वर्ग में देवों और राक्षसों का महासमर चलते समय —

श्लोक 81 (skanda.3.5.81)

आनिनाय शतानीकं सहायार्थं पुरंदरः । स यौवराज्ये तनयं विधाय विधिना नृपः

ānināya śatānīkaṁ sahāyārthaṁ puraṁdaraḥ sa yauvarājye tanayaṁ vidhāya vidhinā nṛpaḥ

— इन्द्र ने सहायता के लिए शतानीक को बुलाया। उस राजा ने विधिपूर्वक अपने पुत्र को युवराज-पद पर स्थापित करके —

श्लोक 82 (skanda.3.5.82)

प्रतस्थे रथमास्थाय युद्धाय दितिजैः सह । नीतो मातलिनाभ्येत्य सादरं स धनुर्धरः

pratasthe rathamāsthāya yuddhāya ditijaiḥ saha nīto mātalinābhyetya sādaraṁ sa dhanurdharaḥ

— रथ पर आरूढ़ होकर दितिपुत्रों (दैत्यों) से युद्ध के लिए प्रस्थान किया। मातलि द्वारा आदरपूर्वक लाया गया वह धनुर्धर —

श्लोक 83 (skanda.3.5.83)

विधाय प्रेक्षकान्देवाञ्जघान दितिजान्रणे । अथ दैत्याधिपः सोऽपि निहतः समरे दिवि

vidhāya prekṣakāndevāñjaghāna ditijānraṇe atha daityādhipaḥ so'pi nihataḥ samare divi

— देवताओं को केवल दर्शक बनाकर, युद्ध में दितिपुत्रों का वध कर डाला। फिर वह दैत्याधिप भी स्वर्ग के उस समर में मारा गया।

श्लोक 84 (skanda.3.5.84)

ततः शक्रस्य वचसा परेतं नृपपुंगवम् । रथमारोप्य सहसा कौशांबीं मातलिर्ययौ

tataḥ śakrasya vacasā paretaṁ nṛpapuṁgavam rathamāropya sahasā kauśāṁbīṁ mātaliryayau

किंतु तब शक्र (इन्द्र) के वचन से, उस मृत राजश्रेष्ठ को रथ पर चढ़ाकर मातलि तुरंत कौशांबी गया।

श्लोक 85 (skanda.3.5.85)

नीत्वा महीतलमसौ तत्सुताय न्यवेदयत् । ततः सहस्रानीकोपि विलप्य वहुदुखितः

nītvā mahītalamasau tatsutāya nyavedayat tataḥ sahasrānīkopi vilapya vahudukhitaḥ

उसे पृथ्वीतल पर लाकर उसने उसके पुत्र को सौंप दिया। तब सहस्रानीक भी विलाप करते हुए, अत्यंत दुःखी होकर —

श्लोक 86 (skanda.3.5.86)

मंत्रिभिः सह संभूय प्रेतकार्यं न्यवर्तयत् । मृतं ज्ञात्वा पतिं राज्ञी सहैवानुममार च

maṁtribhiḥ saha saṁbhūya pretakāryaṁ nyavartayat mṛtaṁ jñātvā patiṁ rājñī sahaivānumamāra ca

— मंत्रियों के साथ मिलकर अंत्येष्टि-कार्य संपन्न किया। और अपने पति को मृत जानकर रानी भी उनके साथ ही सती हो गई।

श्लोक 87 (skanda.3.5.87)

महिष्या सह संप्राप्ते भूपाले कीर्तिशेषताम् । भेजे राज्यं शतानीकतनयो मंत्रिणां गिरा

mahiṣyā saha saṁprāpte bhūpāle kīrtiśeṣatām bheje rājyaṁ śatānīkatanayo maṁtriṇāṁ girā

राजा के अपनी महिषी सहित कीर्तिशेष हो जाने पर, मंत्रियों की सलाह से शतानीक-पुत्र ने राज्य को धारण किया।

श्लोक 88 (skanda.3.5.88)

युगन्धरे विप्रतीके वल्लभे च मृते सति । यौगन्धरायणमुखास्तत्पुत्राः सर्व एव हि

yugandhare vipratīke vallabhe ca mṛte sati yaugandharāyaṇamukhāstatputrāḥ sarva eva hi

युगंधर, विप्रतीक तथा वल्लभ के मर जाने पर, यौगंधरायण आदि उनके पुत्रों ने ही —

श्लोक 89 (skanda.3.5.89)

शतानीक सुतस्यास्य तत्तत्कार्यमकुर्वत । एवं स पालयामास महीं राजसुतो बली

śatānīka sutasyāsya tattatkāryamakurvata evaṁ sa pālayāmāsa mahīṁ rājasuto balī

— इस शतानीक-पुत्र के वे-वे कार्य संपन्न किए। इस प्रकार वह बलशाली राजपुत्र पृथ्वी का पालन करने लगा।

श्लोक 90 (skanda.3.5.90)

याते काले महेन्द्रेण सनन्दनमहोत्सवे । निमंत्रितस्तत्कथितां भाविनीमशृणोत्कथाम्

yāte kāle mahendreṇa sanandanamahotsave nimaṁtritastatkathitāṁ bhāvinīmaśṛṇotkathām

समय बीतने पर, महेन्द्र द्वारा सनंदन के महोत्सव में आमंत्रित होकर, उसने उनके द्वारा कही गई भावी घटनाओं की कथा सुनी।

श्लोक 91 (skanda.3.5.91)

स्वर्योषिद्ब्रह्मणः शापादयोध्यायायामलंबुसा । जाता मृगावती कन्या भूपतेः कृतवर्मणः

svaryoṣidbrahmaṇaḥ śāpādayodhyāyāyāmalaṁbusā jātā mṛgāvatī kanyā bhūpateḥ kṛtavarmaṇaḥ

"ब्रह्मा के शाप से वह स्वर्ग की स्त्री अलंबुषा अयोध्या में राजा कृतवर्मा की मृगावती नामक कन्या के रूप में उत्पन्न हुई।

श्लोक 92 (skanda.3.5.92)

विधूम नामा च वसुस्त्वं नाकललनां पुरा । तामेव ब्रह्मसदने दृष्ट्वानिलहृतांशुकाम्

vidhūma nāmā ca vasustvaṁ nākalalanāṁ purā tāmeva brahmasadane dṛṣṭvānilahṛtāṁśukām

और तुम विधूम नामक वसु थे; प्राचीन काल में ब्रह्मा के सदन में उसी देवांगना को, वायु द्वारा जिसका वस्त्र हरण हुआ था, देखकर —

श्लोक 93 (skanda.3.5.93)

तदैव मादनाक्रांतः शापान्मर्त्यत्वमागतः । सैव ते दयिता राजन्भाविनी न चिरात्सखे

tadaiva mādanākrāṁtaḥ śāpānmartyatvamāgataḥ saiva te dayitā rājanbhāvinī na cirātsakhe

— तभी काम-विह्वल होकर तुम शाप से मनुष्यत्व को प्राप्त हुए। हे राजन्, हे सखे, वही तुम्हारी प्रिया शीघ्र ही बनने वाली है।

श्लोक 94 (skanda.3.5.94)

यदा त्वमात्मनः पुत्रं राज्ये संस्थाप्य भूपते । मृगावत्या स्त्रिया सार्द्धं दक्षिणस्योदधेस्तटे

yadā tvamātmanaḥ putraṁ rājye saṁsthāpya bhūpate mṛgāvatyā striyā sārddhaṁ dakṣiṇasyodadhestaṭe

हे राजन्, जब तुम अपने पुत्र को राज्य पर स्थापित करके, अपनी पत्नी मृगावती के साथ दक्षिणी समुद्र के तट पर —

श्लोक 95 (skanda.3.5.95)

चक्रतीर्थे महापुण्ये फुल्लग्रामसमीपतः । स्नानं करिष्यसि तदा शापान्मुक्तो भविष्यसि

cakratīrthe mahāpuṇye phullagrāmasamīpataḥ snānaṁ kariṣyasi tadā śāpānmukto bhaviṣyasi

— फुल्लग्राम के समीप स्थित महापुण्य चक्रतीर्थ में स्नान करोगे, तब तुम शाप से मुक्त हो जाओगे।"

श्लोक 96 (skanda.3.5.96)

इति प्रोवाच भगवन्सत्यलोके पितामहः । इतींद्रवचनं श्रुत्वा सहस्रानीकभूपतिः

iti provāca bhagavansatyaloke pitāmahaḥ itīṁdravacanaṁ śrutvā sahasrānīkabhūpatiḥ

ऐसा भगवान् पितामह (ब्रह्मा) ने सत्यलोक में कहा था।" इन्द्र का यह वचन सुनकर राजा सहस्रानीक —

श्लोक 97 (skanda.3.5.97)

तथोद्वाहकृतोत्साहः समामंत्र्य शचीपतिम् । कौशांबीं प्रस्थितो हृष्टः स तिलोत्तमया पथि

tathodvāhakṛtotsāhaḥ samāmaṁtrya śacīpatim kauśāṁbīṁ prasthito hṛṣṭaḥ sa tilottamayā pathi

— विवाह के लिए उत्साहित हो गया, और शचीपति (इन्द्र) से विदा लेकर आनंदपूर्वक कौशांबी के लिए प्रस्थान किया; मार्ग में तिलोत्तमा के साथ —

श्लोक 98 (skanda.3.5.98)

स्मरन्किमपि तां कांतां भाषमाणामनन्यधीः । ध्यायञ्छतक्रतुवचो नालुलोके महीपतिः

smarankimapi tāṁ kāṁtāṁ bhāṣamāṇāmananyadhīḥ dhyāyañchatakratuvaco nāluloke mahīpatiḥ

— उस प्रियतमा (मृगावती) का किंचित् स्मरण करते हुए, अन्यमनस्क होकर, इन्द्र के वचनों का चिंतन करते हुए राजा ने बोलती हुई (तिलोत्तमा) की ओर ध्यान नहीं दिया।

श्लोक 99 (skanda.3.5.99)

सा शशाप नृपं सुभ्रूरनादरतिर स्कृता । आहूयमानोपि मया सहस्रानीक भूपते

sā śaśāpa nṛpaṁ subhrūranādaratira skṛtā āhūyamānopi mayā sahasrānīka bhūpate

उस सुभ्रू ने उसके इस अनादर से तिरस्कृत होकर राजा को शाप दे दिया — "हे राजा सहस्रानीक, मेरे द्वारा बुलाए जाने पर भी —

श्लोक 100 (skanda.3.5.100)

मृगावतीं हृदा ध्यायन्किमर्थं मामुपेक्षसे । सौभाग्यमत्ता मानिन्यो न सहंतेऽवधीर णाम्

mṛgāvatīṁ hṛdā dhyāyankimarthaṁ māmupekṣase saubhāgyamattā māninyo na sahaṁte'vadhīra ṇām

— हृदय में मृगावती का ध्यान करते हुए तुम मुझे क्यों उपेक्षित कर रहे हो? सौभाग्य से मत्त मानिनी स्त्रियाँ अनादर सहन नहीं करतीं।

श्लोक 101 (skanda.3.5.101)

मामवज्ञाय यां राजन्हृदा ध्यायसि सांप्रतम् । तया चतुर्दशसमा वियुक्तस्त्वं भविष्यसि

māmavajñāya yāṁ rājanhṛdā dhyāyasi sāṁpratam tayā caturdaśasamā viyuktastvaṁ bhaviṣyasi

हे राजन्, जिसका तुम मेरा अनादर करके अभी हृदय में ध्यान कर रहे हो, उससे तुम चौदह वर्षों तक वियुक्त रहोगे।"

श्लोक 102 (skanda.3.5.102)

इति शप्तवतीं राजा तामु वाच तिलोत्तमाम् । तामेव यदि लभ्येयं तनुजां कृतवर्मणः

iti śaptavatīṁ rājā tāmu vāca tilottamām tāmeva yadi labhyeyaṁ tanujāṁ kṛtavarmaṇaḥ

इस प्रकार शाप देने वाली उस तिलोत्तमा से राजा ने कहा — "यदि मुझे कृतवर्मा की उस पुत्री की प्राप्ति हो जाए —

श्लोक 103 (skanda.3.5.103)

चतुर्दशसमा दुःखं सहिष्ये तद्वियोगजम् । इत्युक्त्वा तद्गतमना नृपः प्रायान्निजां पुरीम्

caturdaśasamā duḥkhaṁ sahiṣye tadviyogajam ityuktvā tadgatamanā nṛpaḥ prāyānnijāṁ purīm

— तो उसके वियोग से उत्पन्न दुःख को मैं चौदह वर्षों तक सहन कर लूँगा।" यह कहकर, उसी के प्रति मन लगाए हुए राजा अपनी नगरी को चला गया।

श्लोक 104 (skanda.3.5.104)

ततः कालेन तनया भूपतेः कृतवर्मणः । तमाससाद दयिता सर्वस्वं पुष्पधन्वनः

tataḥ kālena tanayā bhūpateḥ kṛtavarmaṇaḥ tamāsasāda dayitā sarvasvaṁ puṣpadhanvanaḥ

फिर समय बीतने पर राजा कृतवर्मा की वह पुत्री, पुष्पधन्वा (काम) के समस्त वैभव-स्वरूप प्रियतमा, उसे प्राप्त हुई —

श्लोक 105 (skanda.3.5.105)

मृगावती समासाद्य विला सतरुवल्लरीम् । विभ्रमांभोधिलहरीं ननंद मदनद्युतिः

mṛgāvatī samāsādya vilā sataruvallarīm vibhramāṁbhodhilaharīṁ nanaṁda madanadyutiḥ

— लता के समान चंचल, विभ्रम-सागर की लहर के समान मृगावती, काम के समान तेजस्विनी, उसे प्राप्त कर आनंदित हुई।

श्लोक 106 (skanda.3.5.106)

सा तस्माद्गर्भमाधत्त भवानीवेंदुशेखरात् । पांडिम्ना शशिलेखेव पीपूषक्षालिता बभौ

sā tasmādgarbhamādhatta bhavānīveṁduśekharāt pāṁḍimnā śaśilekheva pīpūṣakṣālitā babhau

उससे उसे गर्भ धारण हुआ, जैसे भवानी को इंदुशेखर से; और अपनी विवर्णता से वह अमृत-स्नात चंद्र-रेखा के समान शोभित हुई।

श्लोक 107 (skanda.3.5.107)

सुन्दरी दौर्हृदव्यक्तेरथ पौरंदरीव दिक् । रराज राजमहिषी रजनीकरगर्भिणी

sundarī daurhṛdavyakteratha pauraṁdarīva dik rarāja rājamahiṣī rajanīkaragarbhiṇī

वह सुंदरी, अपनी दोहद-अवस्था के प्रकट होने पर, चंद्रमा को गर्भ में धारण किए हुए, इन्द्र की दिशा (पूर्व) के समान शोभित हुई।

श्लोक 108 (skanda.3.5.108)

सा दौर्हृदवशाद्राज्ञी यंयं काममकाम यत् । सुदुर्लभमपिप्रेम्णा तत्तत्सर्वं समाहरत्

sā daurhṛdavaśādrājñī yaṁyaṁ kāmamakāma yat sudurlabhamapipremṇā tattatsarvaṁ samāharat

दोहद के वशीभूत हुई उस रानी ने जो-जो कामना की, चाहे वह कितनी ही दुर्लभ क्यों न हो, राजा ने प्रेमवश वह सब उसके लिए ला दिया।

श्लोक 109 (skanda.3.5.109)

पत्यौ समीहितकरे सा कदाचिन्मृगावती । स्वेच्छया वै मतिं चक्रे रक्तवापीनिमज्जने

patyau samīhitakare sā kadācinmṛgāvatī svecchayā vai matiṁ cakre raktavāpīnimajjane

एक बार अपने पति के इच्छापूर्ति के लिए तत्पर होने पर, मृगावती ने स्वेच्छा से एक लाल जल वाले सरोवर में स्नान करने का विचार किया।

श्लोक 110 (skanda.3.5.110)

अभिलाषं सविज्ञाय मृगावत्या महीपतिः । कौसुम्भसलिलैः पूर्णां क्षणाद्वापीमकारयत्

abhilāṣaṁ savijñāya mṛgāvatyā mahīpatiḥ kausumbhasalilaiḥ pūrṇāṁ kṣaṇādvāpīmakārayat

मृगावती की अभिलाषा जानकर राजा ने तुरंत ही कुसुम्भ-रंजित जल से भरा एक सरोवर बनवा दिया।

श्लोक 111 (skanda.3.5.111)

तस्मिन्रक्तजले राज्ञी स्नानं सादरमातनोत् । ततस्तां रक्ततोयार्द्रां फुल्लकिंशुकसन्निभाम्

tasminraktajale rājñī snānaṁ sādaramātanot tatastāṁ raktatoyārdrāṁ phullakiṁśukasannibhām

उस लाल जल में रानी ने आदरपूर्वक स्नान किया। तब लाल जल से भीगी, खिले हुए पलाश के फूल के समान —

श्लोक 112 (skanda.3.5.112)

राजस्त्रीमामिषधिया सुपर्णकुलसंभवः । जहार विकटः पक्षी मुग्धां दग्धविधेर्वशात्

rājastrīmāmiṣadhiyā suparṇakulasaṁbhavaḥ jahāra vikaṭaḥ pakṣī mugdhāṁ dagdhavidhervaśāt

— उस राज-महिषी को मांस समझकर, गरुड़-कुल में उत्पन्न एक भयंकर पक्षी ने दग्ध-विधि के वशीभूत होकर उस भोली रानी का हरण कर लिया।

श्लोक 113 (skanda.3.5.113)

नीत्वा विहायसा दूरं स तामचलसन्निभः । तत्याजमोहविवशामुदयाचलकंदरे

nītvā vihāyasā dūraṁ sa tāmacalasannibhaḥ tatyājamohavivaśāmudayācalakaṁdare

पर्वत के समान वह पक्षी उसे आकाश-मार्ग से दूर ले जाकर, मूर्च्छा से विवश उस रानी को उदयाचल की एक कंदरा में छोड़ गया।

श्लोक 114 (skanda.3.5.114)

लब्धसंज्ञा शनैः कंपविलोलतनुवल्लरी । दृग्भ्यामुत्पलतुल्याभ्यां मुहुरश्रूण्यवर्तयत्

labdhasaṁjñā śanaiḥ kaṁpavilolatanuvallarī dṛgbhyāmutpalatulyābhyāṁ muhuraśrūṇyavartayat

धीरे-धीरे होश में आने पर, कंपन से चंचल लता के समान शरीर वाली वह, कमल के समान अपने नेत्रों से बार-बार आँसू बहाने लगी।

श्लोक 115 (skanda.3.5.115)

हा नाथ मंदभाग्याहं त्वद्वियोगेनपीडिता । का गतिः क्व नु गच्छामि द्रक्ष्यामि त्वन्मुखं कदा

hā nātha maṁdabhāgyāhaṁ tvadviyogenapīḍitā kā gatiḥ kva nu gacchāmi drakṣyāmi tvanmukhaṁ kadā

"हाय नाथ! मैं अभागिनी आपके वियोग से पीड़ित हूँ। मेरी क्या गति है? मैं कहाँ जाऊँ? आपका मुख मैं कब देखूँगी?"

श्लोक 116 (skanda.3.5.116)

इत्युक्त्वा गजसिंहानां पुरोभूद्वधकांक्षिणी । सा सर्वकेसरिगजैस्त्यक्ता न निधनं गता

ityuktvā gajasiṁhānāṁ purobhūdvadhakāṁkṣiṇī sā sarvakesarigajaistyaktā na nidhanaṁ gatā

यह कहकर मृत्यु की कामना से वह हाथियों और सिंहों के समक्ष जा खड़ी हुई; किंतु समस्त सिंहों और हाथियों द्वारा छोड़े जाने पर भी वह मृत्यु को प्राप्त नहीं हुई।

श्लोक 117 (skanda.3.5.117)

आपत्काले नृणां नूनं मरणं नैव लभ्यते । अतिदीनं समाकर्ण्य तस्याः क्रंदितमुन्मुखाः

āpatkāle nṛṇāṁ nūnaṁ maraṇaṁ naiva labhyate atidīnaṁ samākarṇya tasyāḥ kraṁditamunmukhāḥ

सचमुच विपत्ति के समय मनुष्यों को मृत्यु प्राप्त नहीं होती। उसके अत्यंत करुण क्रंदन को सुनकर, मुख ऊपर उठाए हुए —

श्लोक 118 (skanda.3.5.118)

मृगा निष्पंदगतयो न तृणान्यप्यभक्षयन् । ततस्तां करुणासिंधुर्मुनिपुत्रस्तथास्थिताम्

mṛgā niṣpaṁdagatayo na tṛṇānyapyabhakṣayan tatastāṁ karuṇāsiṁdhurmuniputrastathāsthitām

— मृग भी निश्चल होकर घास तक नहीं खा रहे थे। तब करुणा के सागर मुनि-पुत्र ने उसे उस अवस्था में देखकर —

श्लोक 119 (skanda.3.5.119)

रुदतीं कृपया राज्ञीं समानीय स्वमाश्रमम् । न्यवेदयच्च तां राज्ञीं गुरवे जमदग्नये । जमदग्निस्तु धर्मात्मा तामाश्वासयदंतिके

rudatīṁ kṛpayā rājñīṁ samānīya svamāśramam nyavedayacca tāṁ rājñīṁ gurave jamadagnaye jamadagnistu dharmātmā tāmāśvāsayadaṁtike

— कृपापूर्वक रोती हुई रानी को अपने आश्रम में लाकर अपने गुरु जमदग्नि को सौंप दिया। धर्मात्मा जमदग्नि ने उसे समीप बिठाकर आश्वस्त किया।

श्लोक 120 (skanda.3.5.120)

जमदग्निरुवाच । तथा जानीहि मां भद्रे कृतवर्मा यथा तव

jamadagniruvāca tathā jānīhi māṁ bhadre kṛtavarmā yathā tava

जमदग्नि ने कहा — "हे भद्रे, मुझे वैसे ही जानो, जैसे तुम्हारे लिए कृतवर्मा हैं।"

श्लोक 121 (skanda.3.5.121)

एवमाश्वासिता तत्र कृपया जमदग्निना । चक्रे तत्रैव सा वासमाश्रमे मुनिसंकुले

evamāśvāsitā tatra kṛpayā jamadagninā cakre tatraiva sā vāsamāśrame munisaṁkule

जमदग्नि द्वारा वहाँ कृपापूर्वक इस प्रकार आश्वस्त होकर, उसने मुनियों से भरे उसी आश्रम में निवास किया।

श्लोक 122 (skanda.3.5.122)

ततस्स्वल्पेन कालेन विशाखमिव पार्वती । असूत तनयं बाला शौर्यधैर्यगुणान्वितम्

tatassvalpena kālena viśākhamiva pārvatī asūta tanayaṁ bālā śauryadhairyaguṇānvitam

फिर थोड़े ही समय में, पार्वती के विशाख (कार्तिकेय) को जन्म देने के समान, उस बाला ने शौर्य और धैर्य के गुणों से युक्त पुत्र को जन्म दिया।

श्लोक 123 (skanda.3.5.123)

सूतिकागृहकृत्यानि यानि कार्याणि बंधुभिः । चक्रिरे मातृवत्तानि मृगावत्या मुनिस्त्रियः

sūtikāgṛhakṛtyāni yāni kāryāṇi baṁdhubhiḥ cakrire mātṛvattāni mṛgāvatyā munistriyaḥ

प्रसूति-गृह के जो भी कार्य संबंधियों द्वारा किए जाते हैं, वे सभी मुनि-पत्नियों ने माता के समान मृगावती के लिए किए।

श्लोक 124 (skanda.3.5.124)

तं सुजातं नृपसुतं कापि वागशरीरिणी । उदयाचलजातत्वाच्चकारोदयनाभिधम्

taṁ sujātaṁ nṛpasutaṁ kāpi vāgaśarīriṇī udayācalajātatvāccakārodayanābhidham

उस सुजात राजकुमार का, उदयाचल पर उत्पन्न होने के कारण, किसी अशरीरी वाणी ने उदयन नाम रख दिया।

श्लोक 125 (skanda.3.5.125)

आश्रमे स मुनीन्द्रेण कृतचूडादिकव्रतः । जग्राह सकला विद्या जमदग्नेर्महामुनेः

āśrame sa munīndreṇa kṛtacūḍādikavrataḥ jagrāha sakalā vidyā jamadagnermahāmuneḥ

आश्रम में मुनीन्द्र (जमदग्नि) द्वारा चूड़ाकर्म आदि संस्कार किए जाने पर, उसने महामुनि जमदग्नि से समस्त विद्याएँ प्राप्त कीं।

श्लोक 126 (skanda.3.5.126)

युवा नृपसुतः सोऽयं कदाचिन्मृगयापरः । अपश्यदेकं भुजगं व्याधेन दृढसंयतम्

yuvā nṛpasutaḥ so'yaṁ kadācinmṛgayāparaḥ apaśyadekaṁ bhujagaṁ vyādhena dṛḍhasaṁyatam

वह युवा राजकुमार एक बार शिकार में तत्पर होकर, एक व्याध द्वारा दृढ़तापूर्वक बाँधे गए सर्प को देखने लगा।

श्लोक 127 (skanda.3.5.127)

उवाच स कृपायुक्तो व्याध मुंच भुजंगमम् । किं करिष्यस्यनेन त्वं नैनं हिंसितुर्महसि

uvāca sa kṛpāyukto vyādha muṁca bhujaṁgamam kiṁ kariṣyasyanena tvaṁ nainaṁ hiṁsiturmahasi

उसने कृपापूर्वक कहा — "हे व्याध, इस सर्प को छोड़ दो। इससे तुम क्या करोगे? तुम्हें इसे मारना उचित नहीं है।"

श्लोक 128 (skanda.3.5.128)

तमुवाच ततो व्याधः सर्पेणानेन पूरुष । धनधान्यादिकं लप्स्ये ग्रामेषु नगरेषु च

tamuvāca tato vyādhaḥ sarpeṇānena pūruṣa dhanadhānyādikaṁ lapsye grāmeṣu nagareṣu ca

तब उस व्याध ने उससे कहा — "हे पुरुष, इस सर्प से मुझे गाँवों और नगरों में धन-धान्य आदि प्राप्त होगा।

श्लोक 129 (skanda.3.5.129)

अतोहं जीविकामेनं नैव मोक्ष्ये कथंचन । इत्युक्त्वा पेटिकायां तं वबंध शबराधमः

atohaṁ jīvikāmenaṁ naiva mokṣye kathaṁcana ityuktvā peṭikāyāṁ taṁ vabaṁdha śabarādhamaḥ

अतः यह मेरी आजीविका है, इसे मैं किसी भी प्रकार नहीं छोडूँगा।" यह कहकर उस नीच शबर ने उसे एक पिटारी में बाँध दिया।

श्लोक 130 (skanda.3.5.130)

बद्धमालोक्य भुजगं शबराय धनार्थिने । अमोचयत्स्वजननीदत्तं दत्त्वा स कंकणम्

baddhamālokya bhujagaṁ śabarāya dhanārthine amocayatsvajananīdattaṁ dattvā sa kaṁkaṇam

सर्प को इस प्रकार बंधा हुआ देखकर, उसने धन के इच्छुक उस शबर को अपनी माता द्वारा दिया गया कंकण देकर उसे मुक्त करा दिया।

श्लोक 131 (skanda.3.5.131)

मोचितस्तेन सर्पोऽसौ नरो भूत्वा कृतांजलिः । सख्यं कृत्वा च सहसा तं पातालं निनाय वै

mocitastena sarpo'sau naro bhūtvā kṛtāṁjaliḥ sakhyaṁ kṛtvā ca sahasā taṁ pātālaṁ nināya vai

उसके द्वारा मुक्त किया गया वह सर्प, मनुष्य बनकर, हाथ जोड़कर, तुरंत उससे मित्रता कर, उसे पाताल ले गया।

श्लोक 132 (skanda.3.5.132)

किन्नराख्येन नागेन धृतराष्ट्रसुतेन सः । पातालं प्राविशत्तत्र न्यवसत्पूजितस्सुखम्

kinnarākhyena nāgena dhṛtarāṣṭrasutena saḥ pātālaṁ prāviśattatra nyavasatpūjitassukham

धृतराष्ट्र के पुत्र, किन्नर नामक उस नाग के साथ वह पाताल में प्रविष्ट हुआ; वहाँ वह सम्मानपूर्वक सुखपूर्वक रहा।

श्लोक 133 (skanda.3.5.133)

धृतराष्ट्रस्य तनयां भगिनीं किन्नरस्य च । ललिताख्यां गुणोपेतां प्रियां भेजे नृपात्मजः

dhṛtarāṣṭrasya tanayāṁ bhaginīṁ kinnarasya ca lalitākhyāṁ guṇopetāṁ priyāṁ bheje nṛpātmajaḥ

उस राजकुमार ने धृतराष्ट्र की पुत्री, किन्नर की बहन, गुणों से युक्त ललिता नामक प्रिया को अपनाया।

श्लोक 134 (skanda.3.5.134)

सा तस्माज्जनयामास पुत्रमप्रतिमौजसम् । ततः सा ललिता प्राह त्वरितोदयनं प्रति

sā tasmājjanayāmāsa putramapratimaujasam tataḥ sā lalitā prāha tvaritodayanaṁ prati

उससे उसने अनुपम तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया। फिर उस ललिता ने शीघ्रता से उदयन से कहा —

श्लोक 135 (skanda.3.5.135)

ललितोवाच । अहं विद्या धरी पूर्वं सुकर्णी नाम नामतः । शापात्सर्पत्वमाप्तास्मि शापांतो गर्भ एष मे

lalitovāca ahaṁ vidyā dharī pūrvaṁ sukarṇī nāma nāmataḥ śāpātsarpatvamāptāsmi śāpāṁto garbha eṣa me

ललिता ने कहा — "मैं पहले सुकर्णी नामक एक विद्याधरी थी; शाप से मैंने सर्प-योनि को प्राप्त किया, और मेरा यह गर्भ ही शाप का अंत है।

श्लोक 136 (skanda.3.5.136)

ततोऽमुं प्रतिगृह्णीष्व पुत्रमप्रतिमौजसम् । तांबूलीं स्रजमम्लानां वीणां घोषवतीमपि

tato'muṁ pratigṛhṇīṣva putramapratimaujasam tāṁbūlīṁ srajamamlānāṁ vīṇāṁ ghoṣavatīmapi

अतः इस अनुपम तेजस्वी पुत्र को, इस ताम्बूल-लता, अम्लान माला, तथा घोषवती नामक वीणा सहित ग्रहण करो।"

श्लोक 137 (skanda.3.5.137)

तथेति प्रतिजग्राह तत्सर्वं नृपनंदनः । पश्यतां सर्वसर्पाणां साप्यगच्छद्विहायसम्

tatheti pratijagrāha tatsarvaṁ nṛpanaṁdanaḥ paśyatāṁ sarvasarpāṇāṁ sāpyagacchadvihāyasam

"ऐसा ही हो" कहकर राजकुमार ने वह सब ग्रहण किया। और वह भी समस्त सर्पों के देखते-देखते आकाश-मार्ग से चली गई।

श्लोक 138 (skanda.3.5.138)

ततः सोऽपि गृहीत्वा तु वीणां मालां च पुत्रकम् । दुःखितामात्मजननीं द्रष्टुकामस्त्वरान्वितः

tataḥ so'pi gṛhītvā tu vīṇāṁ mālāṁ ca putrakam duḥkhitāmātmajananīṁ draṣṭukāmastvarānvitaḥ

तब वह भी वीणा, माला तथा पुत्र को लेकर, अपनी दुःखी माता को देखने की इच्छा से शीघ्रतापूर्वक —

श्लोक 139 (skanda.3.5.139)

श्वशुरादीननुज्ञाप्य सहसा स्वाश्रमं ययौ । जननीं शोकसंतप्तामाश्वस्तां जमदग्निना

śvaśurādīnanujñāpya sahasā svāśramaṁ yayau jananīṁ śokasaṁtaptāmāśvastāṁ jamadagninā

— अपने ससुर आदि से अनुमति लेकर तुरंत अपने आश्रम को गया, जहाँ शोक-संतप्त उसकी माता को जमदग्नि ने आश्वस्त किया था।

श्लोक 140 (skanda.3.5.140)

समेत्य तोषयामास वृत्तं चास्यै न्यवेदयत् । तदा प्रहृष्टहृदया सा बभूव मृगावती

sametya toṣayāmāsa vṛttaṁ cāsyai nyavedayat tadā prahṛṣṭahṛdayā sā babhūva mṛgāvatī

उससे मिलकर उसने उसे प्रसन्न किया, और उसे सारा वृत्तांत बताया। तब मृगावती का हृदय अत्यंत हर्षित हो गया।

श्लोक 141 (skanda.3.5.141)

अत्रांतरे स शबरः कौशांब्यां वणिजं ययौ । सहस्रानीकनामांकं विक्रेतुं मणिकंकणम्

atrāṁtare sa śabaraḥ kauśāṁbyāṁ vaṇijaṁ yayau sahasrānīkanāmāṁkaṁ vikretuṁ maṇikaṁkaṇam

इसी बीच वह शबर कौशांबी में एक व्यापारी के पास गया, सहस्रानीक के नाम से अंकित उस मणि-कंकण को बेचने के लिए।

श्लोक 142 (skanda.3.5.142)

राजमुद्रां समालोक्य कंकणे स वणिग्वरः । शबरेण समं गत्वा सर्वं राज्ञे न्यवेदयत्

rājamudrāṁ samālokya kaṁkaṇe sa vaṇigvaraḥ śabareṇa samaṁ gatvā sarvaṁ rājñe nyavedayat

कंकण पर राज-मुद्रा देखकर उस श्रेष्ठ व्यापारी ने शबर के साथ जाकर राजा को सारा वृत्तांत बताया।

श्लोक 143 (skanda.3.5.143)

ततः सहस्रानीकोऽयं तत्प्राप्य मणिकंकणम् । मृगावतीविप्रयोगविषाग्निपरिपीडितः

tataḥ sahasrānīko'yaṁ tatprāpya maṇikaṁkaṇam mṛgāvatīviprayogaviṣāgniparipīḍitaḥ

तब वह सहस्रानीक, उस मणि-कंकण को प्राप्त कर, मृगावती के वियोग की विष-अग्नि से पहले से ही पीड़ित होकर —

श्लोक 144 (skanda.3.5.144)

तद्बाहुसंगपीयूष शीकरासारशीतलम् । कंकणं हृदये न्यस्य विललाप सुदुःखितः

tadbāhusaṁgapīyūṣa śīkarāsāraśītalam kaṁkaṇaṁ hṛdaye nyasya vilalāpa suduḥkhitaḥ

— उस बाहु-संग के अमृत-कण के समान शीतल कंकण को हृदय पर रखकर, अत्यंत दुःखी होकर विलाप करने लगा।

श्लोक 145 (skanda.3.5.145)

उवाच च कथं लब्धं कंकणं शबर त्वया । स चैवमुक्तस्तत्प्राप्ति क्रमं तस्मै न्यवेदयत्

uvāca ca kathaṁ labdhaṁ kaṁkaṇaṁ śabara tvayā sa caivamuktastatprāpti kramaṁ tasmai nyavedayat

और उसने कहा — "हे शबर, यह कंकण तुझे कैसे प्राप्त हुआ?" इस प्रकार पूछे जाने पर उसने उसे उसकी प्राप्ति का सारा वृत्तांत बताया।

श्लोक 146 (skanda.3.5.146)

शबरस्य वचः श्रुत्वा सहस्रानीकभूपतिः । प्रतस्थे मंत्रिभिः सार्द्धं प्रियालोकनकौतुकी

śabarasya vacaḥ śrutvā sahasrānīkabhūpatiḥ pratasthe maṁtribhiḥ sārddhaṁ priyālokanakautukī

शबर के वचन सुनकर राजा सहस्रानीक, अपनी प्रिया को देखने के लिए उत्सुक होकर, मंत्रियों सहित प्रस्थान कर गया।

श्लोक 147 (skanda.3.5.147)

यत्रेंदुभास्क रमुखा लभंते सहसोदयम् । तमेव गिरिमुद्दिश्य सहसा सोऽभ्यगच्छत

yatreṁdubhāska ramukhā labhaṁte sahasodayam tameva girimuddiśya sahasā so'bhyagacchata

जहाँ चंद्रमा और सूर्य आदि सहसा उदित होते हैं, उसी पर्वत की ओर वह शीघ्रता से चल पड़ा।

श्लोक 148 (skanda.3.5.148)

किंचिन्मार्गं समुल्लंघ्य तस्थौ विश्रांतसैनिकः । तस्मिन्विनिद्रे दयितासंगमध्यानतत्परे

kiṁcinmārgaṁ samullaṁghya tasthau viśrāṁtasainikaḥ tasminvinidre dayitāsaṁgamadhyānatatpare

कुछ मार्ग पार करके, थके हुए सैनिकों सहित उसने विश्राम किया। जब वह नींद-रहित होकर अपनी प्रिया से मिलन के ध्यान में तत्पर था —

श्लोक 149 (skanda.3.5.149)

वसंतको विचित्रास्तु कथयामास वै कथाः । तत्कथाश्रवणेनैव तां रात्रिं स निनाय वै

vasaṁtako vicitrāstu kathayāmāsa vai kathāḥ tatkathāśravaṇenaiva tāṁ rātriṁ sa nināya vai

— वसंतक ने उसे विविध अद्भुत कथाएँ सुनाईं; और उन्हीं कथाओं को सुनते-सुनते उसने वह रात्रि व्यतीत की।

श्लोक 150 (skanda.3.5.150)

ततः कालेन ककुभं प्राप्य जंभारिपालिताम् । जमदग्न्याश्रमं गत्वा निर्वैरहरिकुंजरम्

tataḥ kālena kakubhaṁ prāpya jaṁbhāripālitām jamadagnyāśramaṁ gatvā nirvairaharikuṁjaram

फिर समय पाकर जंभारि (इन्द्र) द्वारा रक्षित उस दिशा (पूर्व) को प्राप्त कर, जहाँ सिंह और हाथी भी वैररहित होकर रहते थे, वह जमदग्नि के आश्रम में गया —

श्लोक 151 (skanda.3.5.151)

तपस्यंतं मुनिं दृष्ट्वा शिरसा प्रणनाम सः । आशीर्वादेन स मुनिः प्रतिजग्राह तं नृपम्

tapasyaṁtaṁ muniṁ dṛṣṭvā śirasā praṇanāma saḥ āśīrvādena sa muniḥ pratijagrāha taṁ nṛpam

वहाँ तप करते हुए मुनि को देखकर उसने सिर झुकाकर प्रणाम किया। उस मुनि ने आशीर्वाद से उस राजा को स्वीकार किया।

श्लोक 152 (skanda.3.5.152)

विधिवत्पूजयामास पाद्यार्घ्याचमनीयकैः । उवाच च महीपालं धर्मार्थसहितं वचः

vidhivatpūjayāmāsa pādyārghyācamanīyakaiḥ uvāca ca mahīpālaṁ dharmārthasahitaṁ vacaḥ

उन्होंने पाद्य, अर्घ्य तथा आचमनीय जल से विधिपूर्वक उनका पूजन किया, और राजा से धर्म-अर्थ से युक्त यह वचन कहा —

श्लोक 153 (skanda.3.5.153)

नरनाथ मृगावत्यां जातोऽयं तनयस्तव । यशोनिधिर्महातेजा रामचंद्र इवापरः

naranātha mṛgāvatyāṁ jāto'yaṁ tanayastava yaśonidhirmahātejā rāmacaṁdra ivāparaḥ

"हे नरनाथ, तुम्हारा यह पुत्र मृगावती से उत्पन्न हुआ है, यशोनिधि, महातेजस्वी, मानो दूसरा रामचंद्र।

श्लोक 154 (skanda.3.5.154)

भविष्यति दिशां जेता सिंहसंहननो युवा । पौत्र एष महाभाग तथा द्युदयनात्मजः

bhaviṣyati diśāṁ jetā siṁhasaṁhanano yuvā pautra eṣa mahābhāga tathā dyudayanātmajaḥ

यह दिशाओं का विजेता, सिंह के समान गठन वाला युवक बनेगा। हे महाभाग, यह तुम्हारा पौत्र भी है, उदयन का पुत्र।

श्लोक 155 (skanda.3.5.155)

इयं मृगावती भार्या पाति व्रत्यपरायणा । तदेतांस्त्रीन्महाराज प्रतिगृह्णीष्व मा चिरम्

iyaṁ mṛgāvatī bhāryā pāti vratyaparāyaṇā tadetāṁstrīnmahārāja pratigṛhṇīṣva mā ciram

यह तुम्हारी पत्नी मृगावती है, व्रत-परायण। अतः हे महाराज, बिना विलंब किए इन तीनों को ग्रहण करो।"

श्लोक 156 (skanda.3.5.156)

उक्त्वैवं मुनिना दत्तांस्तान्गृहीत्वा महीपतिः । प्रियासहायः स्वपुरीं प्रतस्थे मंत्रिभिर्वृतः

uktvaivaṁ muninā dattāṁstāngṛhītvā mahīpatiḥ priyāsahāyaḥ svapurīṁ pratasthe maṁtribhirvṛtaḥ

इस प्रकार कहकर, मुनि द्वारा दिए गए उन सबको ग्रहण कर राजा, अपनी प्रिया सहित, मंत्रियों से घिरा हुआ, अपनी नगरी को प्रस्थान कर गया।

श्लोक 157 (skanda.3.5.157)

ततः प्रविश्य कौशांबीं नगरीं स नृपोत्तमः । स्मरञ्छक्रस्य वचनं मानुषं जन्म कुत्सयन्

tataḥ praviśya kauśāṁbīṁ nagarīṁ sa nṛpottamaḥ smarañchakrasya vacanaṁ mānuṣaṁ janma kutsayan

फिर कौशांबी नगरी में प्रवेश कर, उस राजश्रेष्ठ ने, इन्द्र के वचन का स्मरण करते हुए तथा अपने मानव-जन्म की निंदा करते हुए —

श्लोक 158 (skanda.3.5.158)

महीमुदयनायैव ददौ पुत्राय धीमते । तस्मिन्नुदयने पुत्र राज्यपालनदक्षिणे

mahīmudayanāyaiva dadau putrāya dhīmate tasminnudayane putra rājyapālanadakṣiṇe

— अपने बुद्धिमान पुत्र उदयन को ही राज्य दे दिया। उस पुत्र उदयन के, जो राज्य-पालन में निपुण था,

श्लोक 159 (skanda.3.5.159)

राज्यभारं विनिक्षिप्य स शापविनिवृत्तये । वसंतकरुमण्वद्भ्यां मृगावत्या च भार्यया

rājyabhāraṁ vinikṣipya sa śāpavinivṛttaye vasaṁtakarumaṇvadbhyāṁ mṛgāvatyā ca bhāryayā

— राज्य-भार सौंप दिए जाने पर, शाप की निवृत्ति के लिए वह, वसंतक और रुमण्वान् सहित, तथा अपनी पत्नी मृगावती सहित,

श्लोक 160 (skanda.3.5.160)

यौगन्धरायणेनापि मंत्रिपुत्रेण संयुतः । चक्रतीर्थे महापुण्ये दक्षिणस्योदधेस्तटे

yaugandharāyaṇenāpi maṁtriputreṇa saṁyutaḥ cakratīrthe mahāpuṇye dakṣiṇasyodadhestaṭe

— तथा मंत्रि-पुत्र यौगंधरायण सहित, दक्षिणी समुद्र के तट पर स्थित महापुण्य चक्रतीर्थ में —

श्लोक 161 (skanda.3.5.161)

स्नानं कर्तुं ययौ तूर्णं सर्वतीर्थोत्त मोत्तमे । वाहनैर्वातरंहोभिरचिराल्लवणोदधिम्

snānaṁ kartuṁ yayau tūrṇaṁ sarvatīrthotta mottame vāhanairvātaraṁhobhiracirāllavaṇodadhim

— जो समस्त तीर्थों में सर्वोत्तम था, स्नान करने के लिए शीघ्र गया; वायु के समान वेगवान वाहनों से वह शीघ्र ही लवण-समुद्र को प्राप्त हुआ।

श्लोक 162 (skanda.3.5.162)

संप्राप्य चक्रतीर्थं च स्नानं चक्रुर्यथाविधि । तेषु च स्नातमात्रेषु चक्रतीर्थे नृपादिषु

saṁprāpya cakratīrthaṁ ca snānaṁ cakruryathāvidhi teṣu ca snātamātreṣu cakratīrthe nṛpādiṣu

चक्रतीर्थ को प्राप्त कर उन्होंने विधिपूर्वक स्नान किया। और चक्रतीर्थ में राजा आदि के स्नान करते ही —

श्लोक 163 (skanda.3.5.163)

विनष्टं तत्क्षणादेव मानुष्यमतिकुत्सितम् । ततो विधूतपापास्ते स्वं रूपं प्रतिपेदिरे

vinaṣṭaṁ tatkṣaṇādeva mānuṣyamatikutsitam tato vidhūtapāpāste svaṁ rūpaṁ pratipedire

— उनका वह अत्यंत निंदित मानव-रूप उसी क्षण नष्ट हो गया। फिर पाप-मुक्त होकर उन्होंने अपने स्वरूप को पुनः प्राप्त किया।

श्लोक 164 (skanda.3.5.164)

दिव्यांबरधराः सर्वे दिव्यमाल्यानुलेपनाः । विमानानि महार्हाणि समारुह्य विभूषिताः

divyāṁbaradharāḥ sarve divyamālyānulepanāḥ vimānāni mahārhāṇi samāruhya vibhūṣitāḥ

सभी दिव्य वस्त्र धारण किए हुए, दिव्य माला-अनुलेपन से सुसज्जित, बहुमूल्य विमानों पर आरूढ़ होकर, विभूषित —

श्लोक 165 (skanda.3.5.165)

तत्तीर्थं बहु मन्वानाः स्वशापच्छेदकारणम् । पश्यतां सर्वलोकानां स्वर्गलोकं ययुस्तदा

tattīrthaṁ bahu manvānāḥ svaśāpacchedakāraṇam paśyatāṁ sarvalokānāṁ svargalokaṁ yayustadā

— उस तीर्थ को अपने शाप के छेदन का कारण मानकर, समस्त लोकों के देखते-देखते तब स्वर्गलोक को चले गए।

श्लोक 166 (skanda.3.5.166)

तदाप्रभृति ते सर्वे ज्ञात्वा तत्तीर्थवैभवम् । पावने चक्रतीर्थेऽस्मिन्स्नानं कुर्वंति सर्वदा

tadāprabhṛti te sarve jñātvā tattīrthavaibhavam pāvane cakratīrthe'sminsnānaṁ kurvaṁti sarvadā

उसी समय से समस्त प्राणी उस तीर्थ के माहात्म्य को जानकर इस पवित्र चक्रतीर्थ में सदा स्नान करते हैं।

श्लोक 167 (skanda.3.5.167)

एवं प्रभावं तत्तीर्थं ये समागत्य मानवाः । स्नानं सकृच्च कुर्वंति ते सर्वे स्वर्गवासिनः

evaṁ prabhāvaṁ tattīrthaṁ ye samāgatya mānavāḥ snānaṁ sakṛcca kurvaṁti te sarve svargavāsinaḥ

इस प्रकार के प्रभाव वाले उस तीर्थ में जो मनुष्य आकर एक बार भी स्नान करते हैं, वे सभी स्वर्गवासी हो जाते हैं।

श्लोक 168 (skanda.3.5.168)

एवं वः कथितं विप्रा विधूमचरितं महत् । यः पठेदिममध्यायं शृणुयाद्वा समाहितः । यं यं कामयते कामं तं सर्वं शीघ्रमाप्नुयात्

evaṁ vaḥ kathitaṁ viprā vidhūmacaritaṁ mahat yaḥ paṭhedimamadhyāyaṁ śṛṇuyādvā samāhitaḥ yaṁ yaṁ kāmayate kāmaṁ taṁ sarvaṁ śīghramāpnuyāt

हे विप्रो, इस प्रकार मैंने आपको विधूम का यह महान चरित्र बताया। जो इस अध्याय को पढ़ता है अथवा एकाग्रचित्त होकर सुनता है, वह जिस-जिस कामना को चाहता है, वह सब उसे शीघ्र प्राप्त हो जाती है।

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