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ब्रह्म खण्ड · अध्याय 6

देवी की उत्पत्ति तथा महिषासुर-युद्ध का वर्णन

अध्याय 5अध्याय-सूचीअध्याय 7

श्लोक 1 (skanda.3.6.1)

ऋषय ऊचुः । द्वैपायनविनेय त्वं सूत पौराणिकोत्तम । देवीपत्तनपर्यंतं चक्रतीर्थमनुत्तमम्

ṛṣaya ūcuḥ dvaipāyanavineya tvaṁ sūta paurāṇikottama devīpattanaparyaṁtaṁ cakratīrthamanuttamam

ऋषियों ने कहा — हे द्वैपायन (व्यास) के शिष्य, हे पुराणों में श्रेष्ठ सूत, देवीपत्तन तक फैला हुआ वह अनुपम चक्रतीर्थ —

श्लोक 2 (skanda.3.6.2)

इत्यब्रवीः पुरास्माकमतः पृच्छाम किंचन । देवीपुरं हि तत्कुत्र यदन्तं चक्रतीर्थकम्

ityabravīḥ purāsmākamataḥ pṛcchāma kiṁcana devīpuraṁ hi tatkutra yadantaṁ cakratīrthakam

— यह आपने पहले हमें बताया था; अतः अब हम कुछ और पूछते हैं। वह देवीपुर कहाँ है, जहाँ चक्रतीर्थ का अंत होता है?

श्लोक 3 (skanda.3.6.3)

देवीपत्तन मित्याख्या कथं तस्याभवत्तथा । श्रीरामसेतुमूले च स्नातानां पापिनामपिः

devīpattana mityākhyā kathaṁ tasyābhavattathā śrīrāmasetumūle ca snātānāṁ pāpināmapiḥ

वहाँ 'देवीपत्तन' यह नाम कैसे पड़ा? और श्रीराम-सेतु के मूल में स्नान करने वाले पापियों के लिए भी —

श्लोक 4 (skanda.3.6.4)

कीदृशं वा भवेत्पुण्यं चक्रतीर्थे तथैव च । एतच्चान्यान्विशे षांश्च ब्रूहि पौराणिकोत्तम

kīdṛśaṁ vā bhavetpuṇyaṁ cakratīrthe tathaiva ca etaccānyānviśe ṣāṁśca brūhi paurāṇikottama

— कैसा पुण्य होता है, तथा उसी प्रकार चक्रतीर्थ में भी? हे पुराणों में श्रेष्ठ, यह तथा अन्य विशेष बातें भी हमें बताइए।

श्लोक 5 (skanda.3.6.5)

श्रीसूत उवाच । सर्वमेतत्प्रवक्ष्यामि शृणुध्वं मुनिपुंगवाः । पठतां शृण्वतां चैतदाख्यानं पापनाश नम्

śrīsūta uvāca sarvametatpravakṣyāmi śṛṇudhvaṁ munipuṁgavāḥ paṭhatāṁ śṛṇvatāṁ caitadākhyānaṁ pāpanāśa nam

श्री सूत जी ने कहा — हे मुनिश्रेष्ठो, मैं यह सब बताऊँगा, सुनिए। यह आख्यान पढ़ने और सुनने वालों के पाप का नाश करने वाला है।

श्लोक 6 (skanda.3.6.6)

यत्र पाषाणनवकं स्थापयित्वा रघूद्वहः । बबन्ध प्रथमं सेतुं समुद्रे मैथिलीपतिः

yatra pāṣāṇanavakaṁ sthāpayitvā raghūdvahaḥ babandha prathamaṁ setuṁ samudre maithilīpatiḥ

जिस स्थान पर नौ पत्थरों को स्थापित करके रघुकुल के धारक, मैथिली के स्वामी ने समुद्र पर सर्वप्रथम सेतु बाँधा था —

श्लोक 7 (skanda.3.6.7)

देवीपुरं तु तत्रैव यदन्तं चक्रतीर्थकम् । देवीपत्तनमित्याख्या यथा तस्य समागता

devīpuraṁ tu tatraiva yadantaṁ cakratīrthakam devīpattanamityākhyā yathā tasya samāgatā

— वहीं देवीपुर है, जहाँ चक्रतीर्थ का अंत होता है। उसका देवीपत्तन नाम कैसे पड़ा —

श्लोक 8 (skanda.3.6.8)

तद्ब्रवीमि मुनिश्रेष्ठाः शृणुध्वं श्रद्धया सह । पुरा देवासुरे युद्धे देवैर्नाशितपुत्रिणी । दितिः प्रोवाच तनयामात्मनः शोकमोहिता

tadbravīmi muniśreṣṭhāḥ śṛṇudhvaṁ śraddhayā saha purā devāsure yuddhe devairnāśitaputriṇī ditiḥ provāca tanayāmātmanaḥ śokamohitā

— वही मैं बताता हूँ, हे मुनिश्रेष्ठो, श्रद्धापूर्वक सुनिए। प्राचीन काल में देव-असुर युद्ध में, देवताओं द्वारा जिसके पुत्र नष्ट कर दिए गए थे, वह दिति शोक-विह्वल होकर अपनी पुत्री से बोली —

श्लोक 9 (skanda.3.6.9)

दितिरुवाच । याहि पुत्रि तपः कर्तुं तपोवनमनुत्तमम्

ditiruvāca yāhi putri tapaḥ kartuṁ tapovanamanuttamam

दिति ने कहा — "हे पुत्री, तपस्या करने के लिए उस अनुपम तपोवन में जाओ,

श्लोक 10 (skanda.3.6.10)

पुत्रार्थं तव सुश्रोणि नियता नियतेन्द्रिया । इन्द्रादयो न शिष्येरन्येन पुत्रेण वै सुराः

putrārthaṁ tava suśroṇi niyatā niyatendriyā indrādayo na śiṣyeranyena putreṇa vai surāḥ

— हे सुश्रोणि, पुत्र-प्राप्ति के लिए संयमित तथा जितेन्द्रिय होकर। इन्द्र आदि देवता किसी अन्य प्रकार के पुत्र से पराजित नहीं हो सकते।"

श्लोक 11 (skanda.3.6.11)

उदिता तनया चैवं जनन्या तां प्रणम्य सा । स्वीकृत्य माहिषं रूपं वनं पञ्चाग्निमध्यगा

uditā tanayā caivaṁ jananyā tāṁ praṇamya sā svīkṛtya māhiṣaṁ rūpaṁ vanaṁ pañcāgnimadhyagā

माता द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर, उस पुत्री ने उन्हें प्रणाम कर, भैंस का रूप धारण किया, और पंचाग्नि के मध्य वन में रहकर —

श्लोक 12 (skanda.3.6.12)

तपोऽतप्यत सा घोरं तेन लोकाश्चकंपिरे । तस्यां तपः प्रकुर्वंत्यां त्रिलोक्यासीद्भयातुरा

tapo'tapyata sā ghoraṁ tena lokāścakaṁpire tasyāṁ tapaḥ prakurvaṁtyāṁ trilokyāsīdbhayāturā

— घोर तप किया, जिससे सभी लोक कंपायमान हो गए। उसके तप करते समय त्रिलोक भयभीत हो गया।

श्लोक 13 (skanda.3.6.13)

इन्द्रादयः सुर गणा मोहमापुर्द्विजोत्तमाः । सुपार्श्वस्तपसा तस्या मुनिः क्षुब्धोऽवदत्तु ताम्

indrādayaḥ sura gaṇā mohamāpurdvijottamāḥ supārśvastapasā tasyā muniḥ kṣubdho'vadattu tām

हे द्विजोत्तमो, इन्द्र आदि देवगण मोहित हो गए। उसके तप से क्षुब्ध होकर सुपार्श्व मुनि ने उससे कहा —

श्लोक 14 (skanda.3.6.14)

सुपार्श्व उवाच । परितुष्टोऽस्मि सुश्रोणि पुत्रस्तव भविष्यति । मुखेन महिषाकारो वपुषा नररूपवान्

supārśva uvāca parituṣṭo'smi suśroṇi putrastava bhaviṣyati mukhena mahiṣākāro vapuṣā nararūpavān

सुपार्श्व ने कहा — "हे सुश्रोणि, मैं प्रसन्न हूँ; तुम्हें पुत्र होगा, जो मुख से भैंस के आकार वाला किंतु शरीर से मनुष्य-रूप वाला होगा।

श्लोक 15 (skanda.3.6.15)

महिषो नामपुत्रस्ते भविष्यत्यतिवीर्यवान् । पीडयिष्यति यः स्वर्गं देवेन्द्रं च ससैनिकम्

mahiṣo nāmaputraste bhaviṣyatyativīryavān pīḍayiṣyati yaḥ svargaṁ devendraṁ ca sasainikam

तुम्हारा पुत्र महिष नाम से अत्यंत पराक्रमी होगा, जो स्वर्ग को तथा सेना सहित देवेन्द्र को पीड़ित करेगा।"

श्लोक 16 (skanda.3.6.16)

सुपार्श्वस्त्वेवमुक्त्वा तां विनिवार्य तपस्तथा । आगच्छदात्मनो लोकमनुनीय तपस्विनीम्

supārśvastvevamuktvā tāṁ vinivārya tapastathā āgacchadātmano lokamanunīya tapasvinīm

सुपार्श्व ने इस प्रकार कहकर, उस तपस्विनी को समझा-बुझाकर उसका तप रुकवाकर, अपने लोक को प्रस्थान किया।

श्लोक 17 (skanda.3.6.17)

अथ जज्ञे स महिषो यथोक्तं ब्रह्मणा पुरा । व्यवर्द्धत महावीर्यः पर्वणीव महोदधिः

atha jajñe sa mahiṣo yathoktaṁ brahmaṇā purā vyavarddhata mahāvīryaḥ parvaṇīva mahodadhiḥ

फिर वह महिष उत्पन्न हुआ, जैसा कि पहले ब्रह्मा ने कहा था; वह पर्व-तिथि पर महासागर के समान महापराक्रमी होकर बढ़ने लगा।

श्लोक 18 (skanda.3.6.18)

ततः पुत्रो विप्रचित्तेर्विद्युन्माल्यसुराग्रणीः । अन्येऽप्यसुरवर्यास्ते संति ये भूतले द्विजाः

tataḥ putro vipracittervidyunmālyasurāgraṇīḥ anye'pyasuravaryāste saṁti ye bhūtale dvijāḥ

तब विप्रचित्ति का पुत्र, असुरों में अग्रणी विद्युन्माली, तथा हे द्विजो, पृथ्वी पर जो भी अन्य श्रेष्ठ असुर थे —

श्लोक 19 (skanda.3.6.19)

ते सर्वे महिषस्यास्य श्रुत्वा दत्तवरं मुदा । समागम्य मुनिश्रेष्ठाः प्रावदन्महिषासुरम्

te sarve mahiṣasyāsya śrutvā dattavaraṁ mudā samāgamya muniśreṣṭhāḥ prāvadanmahiṣāsuram

— वे सभी, हे मुनिश्रेष्ठो, इस महिष को दिए गए वर को आनंदपूर्वक सुनकर, एकत्र होकर महिषासुर से कहने लगे —

श्लोक 20 (skanda.3.6.20)

स्वर्गाधिपत्यमस्माकं पूर्व मसीन्महामते । देवैर्विष्णुं समाश्रित्य राज्यं नो हृतमोजसा

svargādhipatyamasmākaṁ pūrva masīnmahāmate devairviṣṇuṁ samāśritya rājyaṁ no hṛtamojasā

"हे महामते, स्वर्ग का आधिपत्य पहले हमारा था; देवताओं ने विष्णु की शरण लेकर बलपूर्वक हमारा राज्य छीन लिया।

श्लोक 21 (skanda.3.6.21)

तद्राज्यमानय वलादस्माकं महिषासुर । वीर्यं प्रकटयस्वाद्य प्रभावमपि चात्मनः

tadrājyamānaya valādasmākaṁ mahiṣāsura vīryaṁ prakaṭayasvādya prabhāvamapi cātmanaḥ

हे महिषासुर, बलपूर्वक हमारा वह राज्य ले आओ। आज अपना पराक्रम प्रकट करो, तथा अपना प्रभाव भी।

श्लोक 22 (skanda.3.6.22)

अतुल्यबलवीर्यस्त्वं ब्रह्मदत्तवरोद्धतः । पुलोमजापतिं युद्धे जहि देवगणैः सह

atulyabalavīryastvaṁ brahmadattavaroddhataḥ pulomajāpatiṁ yuddhe jahi devagaṇaiḥ saha

तुम अतुल्य बल-पराक्रम वाले हो, ब्रह्मा के वरदान से उद्धत हो; युद्ध में पुलोमजा के पति (इन्द्र) को देवगणों सहित मार डालो।"

श्लोक 23 (skanda.3.6.23)

दनुजैरेवमुक्तोऽसौ योद्धुकामोऽमरैः सह । महा वीर्योऽथ महिषः प्रययावमरावतीम्

danujairevamukto'sau yoddhukāmo'maraiḥ saha mahā vīryo'tha mahiṣaḥ prayayāvamarāvatīm

दनुजों द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर, वह महापराक्रमी महिष, देवताओं से युद्ध की इच्छा से अमरावती की ओर प्रस्थान कर गया।

श्लोक 24 (skanda.3.6.24)

देवानामसुराणां च संवत्सरशतं रणम् । पुरा बभूव विप्रेंद्रास्तुमुलं रोमहर्षणम्

devānāmasurāṇāṁ ca saṁvatsaraśataṁ raṇam purā babhūva vipreṁdrāstumulaṁ romaharṣaṇam

हे विप्रेन्द्रो, प्राचीन काल में देवताओं और असुरों के बीच सौ वर्षों तक चलने वाला भयंकर, रोमांचकारी युद्ध हुआ।

श्लोक 25 (skanda.3.6.25)

देववृन्दं ततो भी त्या पुरस्कृत्य पुरन्दरम् । कांदिशीकमभूद्विप्रा ब्रह्माणं च ययौ तदा

devavṛndaṁ tato bhī tyā puraskṛtya purandaram kāṁdiśīkamabhūdviprā brahmāṇaṁ ca yayau tadā

हे विप्रो, देवताओं का समूह, भय से पुरंदर (इन्द्र) को आगे करके, चारों दिशाओं में तितर-बितर हो गया, और तब ब्रह्मा के पास गया।

श्लोक 26 (skanda.3.6.26)

ब्रह्मा तानमरासर्वान्समादाय ययौ पुनः । नारायणशिवौ यत्र वर्तेते विश्वपालकौ

brahmā tānamarāsarvānsamādāya yayau punaḥ nārāyaṇaśivau yatra vartete viśvapālakau

ब्रह्मा उन सभी देवताओं को साथ लेकर पुनः वहाँ गए जहाँ विश्व के दोनों पालनकर्ता नारायण और शिव विद्यमान थे।

श्लोक 27 (skanda.3.6.27)

तत्र गत्वा नमस्कृत्य स्तुत्वा स्तोत्रैरनेकशः । ब्रह्मा निवेदयामास महिषासुरचेष्टितम्

tatra gatvā namaskṛtya stutvā stotrairanekaśaḥ brahmā nivedayāmāsa mahiṣāsuraceṣṭitam

वहाँ जाकर, नमस्कार कर, अनेक स्तोत्रों से स्तुति करके, ब्रह्मा ने महिषासुर की करतूतों का वर्णन किया —

श्लोक 28 (skanda.3.6.28)

सुराणामसुरैः पीडां देवयोः शंभुकृष्णयोः । इंद्राग्नियमसूर्येंदुकुबेरवरुणादिकान्

surāṇāmasuraiḥ pīḍāṁ devayoḥ śaṁbhukṛṣṇayoḥ iṁdrāgniyamasūryeṁdukuberavaruṇādikān

— असुरों द्वारा देवताओं की, स्वयं शंभु और कृष्ण दोनों देवों की, तथा इन्द्र, अग्नि, यम, सूर्य, चंद्र, कुबेर, वरुण आदि की पीड़ा का —

श्लोक 29 (skanda.3.6.29)

निराकृत्याधिकारेषु तेषां तिष्ठत्ययं स्वयम् । अन्येषां देववृंदानामधिकारेपि तिष्ठति

nirākṛtyādhikāreṣu teṣāṁ tiṣṭhatyayaṁ svayam anyeṣāṁ devavṛṁdānāmadhikārepi tiṣṭhati

— कि यह उनके अधिकार से उन्हें हटाकर स्वयं उन पर बैठा है, और अन्य देवसमूहों के अधिकार पर भी बैठा हुआ है।

श्लोक 30 (skanda.3.6.30)

निरस्तं देववृंदं तत्स्वर्लोकादवनीतले । मनुष्यवद्विचरते महिषासुरबाधितम्

nirastaṁ devavṛṁdaṁ tatsvarlokādavanītale manuṣyavadvicarate mahiṣāsurabādhitam

वह देवसमूह स्वर्गलोक से निकाला जाकर, महिषासुर से पीड़ित होकर, मनुष्यों के समान पृथ्वीतल पर विचरण कर रहा है।

श्लोक 31 (skanda.3.6.31)

एतज्ज्ञापयितुं देवौ युवयोरहमागतः । सार्द्धं देव गणैरत्र रक्षतं तान्समागतान्

etajjñāpayituṁ devau yuvayorahamāgataḥ sārddhaṁ deva gaṇairatra rakṣataṁ tānsamāgatān

यह बताने के लिए, हे दोनों देवो, मैं आपके पास आया हूँ। यहाँ आए हुए देवगणों सहित इनकी रक्षा कीजिए।"

श्लोक 32 (skanda.3.6.32)

ब्रह्मणो वचनं श्रुत्वा रमेश्वरमहेश्वरौ । कोपात्करालवदनौ दुष्प्रेक्ष्यौ तौ बभूवतुः

brahmaṇo vacanaṁ śrutvā rameśvaramaheśvarau kopātkarālavadanau duṣprekṣyau tau babhūvatuḥ

ब्रह्मा के वचन सुनकर रमेश्वर (विष्णु) और महेश्वर (शिव), दोनों क्रोध से भीषण मुख वाले तथा देखे न जा सकने योग्य हो गए।

श्लोक 33 (skanda.3.6.33)

अत्यन्तकोपज्वलितान्मुखाद्विष्णोरथ द्विजाः । निश्चक्राम महत्तेजः शंभोः स्रष्टुस्तथैव च

atyantakopajvalitānmukhādviṣṇoratha dvijāḥ niścakrāma mahattejaḥ śaṁbhoḥ sraṣṭustathaiva ca

हे द्विजो, अत्यंत क्रोध से जलते हुए विष्णु के मुख से एक महान तेज निकला; और उसी प्रकार शंभु तथा स्रष्टा (ब्रह्मा) के मुख से भी।

श्लोक 34 (skanda.3.6.34)

अपरेषां सुराणां च देहादिंद्रशरीरतः । तेजः समुदभूत्क्रूरं तदेकं समजायत

apareṣāṁ surāṇāṁ ca dehādiṁdraśarīrataḥ tejaḥ samudabhūtkrūraṁ tadekaṁ samajāyata

तथा अन्य देवताओं के शरीर से, और इन्द्र के शरीर से भी एक भयंकर तेज उत्पन्न हुआ; और वह सब मिलकर एक हो गया।

श्लोक 35 (skanda.3.6.35)

तेषां तु तेजसां राशिर्ज्वलत्पर्वतसंनिभः । ददृशे देववृंदैस्तैर्ज्वालाव्याप्तदिगंतरः

teṣāṁ tu tejasāṁ rāśirjvalatparvatasaṁnibhaḥ dadṛśe devavṛṁdaistairjvālāvyāptadigaṁtaraḥ

उन सबके उस तेज-राशि को, जो जलते हुए पर्वत के समान था तथा जिसकी ज्वालाओं से दिशाएँ व्याप्त थीं, उन देवसमूहों ने देखा।

श्लोक 36 (skanda.3.6.36)

तेजसां समुदायोऽसौ नारी काचि दभूत्तदा । शिवतेजो मुखमभूद्विष्णुतेजो भुजौ द्विजाः

tejasāṁ samudāyo'sau nārī kāci dabhūttadā śivatejo mukhamabhūdviṣṇutejo bhujau dvijāḥ

उन तेजों का वह समुदाय तब एक स्त्री के रूप में परिणत हो गया। शिव के तेज से उसका मुख बना; हे द्विजो, विष्णु के तेज से उसकी भुजाएँ बनीं।

श्लोक 37 (skanda.3.6.37)

ब्रह्मतेजस्तु चरणौ मध्यमैंद्रेण तेजसा । यमस्य तेजसा केशाः कुचौ चंद्रस्य तेजसा

brahmatejastu caraṇau madhyamaiṁdreṇa tejasā yamasya tejasā keśāḥ kucau caṁdrasya tejasā

ब्रह्मा के तेज से उसके दोनों चरण बने; इन्द्र के तेज से उसका मध्य-भाग (कमर) बना; यम के तेज से उसके केश बने; चंद्रमा के तेज से उसके स्तन बने।

श्लोक 38 (skanda.3.6.38)

जंघोरू कल्पितौ विप्रा वरुणस्य तु तेजसा । नितंबः पृथिवीतेजः पादांगुल्योऽर्कतेजसा

jaṁghorū kalpitau viprā varuṇasya tu tejasā nitaṁbaḥ pṛthivītejaḥ pādāṁgulyo'rkatejasā

हे विप्रो, वरुण के तेज से उसकी पिंडलियाँ और जंघाएँ बनीं; पृथ्वी के तेज से नितंब बने; सूर्य के तेज से पैरों की अंगुलियाँ बनीं।

श्लोक 39 (skanda.3.6.39)

करांगुल्यो वसूनां च तेजसा कल्पितास्तथा । कुबेरतेजसा विप्रा नासिकापरिकल्पिता

karāṁgulyo vasūnāṁ ca tejasā kalpitāstathā kuberatejasā viprā nāsikāparikalpitā

वसुओं के तेज से उसकी हाथों की अंगुलियाँ बनीं; हे विप्रो, कुबेर के तेज से उसकी नासिका बनी।

श्लोक 40 (skanda.3.6.40)

नवप्रजापतीनां च तेजसा दंतपंक्तयः । चक्षुर्द्वयं समजनि हव्यवाहनतेजसा

navaprajāpatīnāṁ ca tejasā daṁtapaṁktayaḥ cakṣurdvayaṁ samajani havyavāhanatejasā

नव प्रजापतियों के तेज से दाँतों की पंक्तियाँ बनीं; अग्नि के तेज से उसके दोनों नेत्र उत्पन्न हुए।

श्लोक 41 (skanda.3.6.41)

उभे संध्ये भ्रुवौ जाते श्रवणे वायुतेजसा । इतरेषां च देवानां तेजोभिरतिदारुणैः

ubhe saṁdhye bhruvau jāte śravaṇe vāyutejasā itareṣāṁ ca devānāṁ tejobhiratidāruṇaiḥ

दोनों संध्याएँ उसकी दोनों भौंहें बनीं; वायु के तेज से उसके कान बने। और अन्य देवताओं के अत्यंत भीषण तेजों से —

श्लोक 42 (skanda.3.6.42)

कृतान्यावयवा नारी दुर्गा परमभास्वरा । बभूव दुर्धर्षतरा सर्वैरपि सुरासुरैः

kṛtānyāvayavā nārī durgā paramabhāsvarā babhūva durdharṣatarā sarvairapi surāsuraiḥ

— उसके अन्य अंग बने — वह परम तेजस्विनी स्त्री दुर्गा, समस्त देवों और असुरों के लिए भी अत्यंत दुर्धर्ष हो गई।

श्लोक 43 (skanda.3.6.43)

सर्ववृंदारकानीकतेजःसंघसमुद्भवा । तां दृष्ट्वा प्रीतिमापुस्ते देवा महिषबाधिताः

sarvavṛṁdārakānīkatejaḥsaṁghasamudbhavā tāṁ dṛṣṭvā prītimāpuste devā mahiṣabādhitāḥ

समस्त देवसमूह के तेज-संघ से उत्पन्न उस देवी को देखकर, महिष से पीड़ित उन देवताओं को प्रसन्नता प्राप्त हुई।

श्लोक 44 (skanda.3.6.44)

ततो रुद्रा दयो देवा विनिष्कृष्यायुधान्निजात् । आयुधानि ददुस्तस्यै शूलादीनि द्विजोत्तमाः

tato rudrā dayo devā viniṣkṛṣyāyudhānnijāt āyudhāni dadustasyai śūlādīni dvijottamāḥ

तब रुद्र आदि देवताओं ने, हे द्विजोत्तमो, अपने-अपने आयुधों को निकालकर, शूल आदि आयुध उसे दिए।

श्लोक 45 (skanda.3.6.45)

भूषणानि ददुस्तस्यै वस्त्रमाल्यानि चंदनम् । सापि देवी तदा वस्त्रैर्भूषणैश्चंदनादिभिः

bhūṣaṇāni dadustasyai vastramālyāni caṁdanam sāpi devī tadā vastrairbhūṣaṇaiścaṁdanādibhiḥ

उन्होंने उसे आभूषण, वस्त्र, माला तथा चंदन दिए। वह देवी भी तब वस्त्रों, आभूषणों, चंदन आदि से —

श्लोक 46 (skanda.3.6.46)

कुसुमैरायुधैर्हारैर्भूषिता परिचारकैः । साट्टहासं प्रमुंचंती भैरवी भैरवस्वना

kusumairāyudhairhārairbhūṣitā paricārakaiḥ sāṭṭahāsaṁ pramuṁcaṁtī bhairavī bhairavasvanā

— फूलों, आयुधों, हारों तथा परिचारकों से सुसज्जित होकर, अट्टहास करती हुई, भैरवी, भयंकर स्वर वाली —

श्लोक 47 (skanda.3.6.47)

ननाद कंपयतीव रोदसी देवसेविता । देव्या भैरवनादेन चचाल सकलं जगत्

nanāda kaṁpayatīva rodasī devasevitā devyā bhairavanādena cacāla sakalaṁ jagat

— देवताओं द्वारा सेवित होकर, मानो द्युलोक और पृथ्वी दोनों को कँपाती हुई गर्जना करने लगी। देवी की उस भैरव-गर्जना से समस्त जगत काँप उठा।

श्लोक 48 (skanda.3.6.48)

सिंहवाहनमारूढां देवीं ताममरास्तदा । मुनयः सिद्धगंधर्वास्तुष्टुवुर्जयश ब्दतः

siṁhavāhanamārūḍhāṁ devīṁ tāmamarāstadā munayaḥ siddhagaṁdharvāstuṣṭuvurjayaśa bdataḥ

सिंह-वाहन पर आरूढ़ उस देवी की तब देवताओं, मुनियों, सिद्धों तथा गंधर्वों ने जय-जयकार के साथ स्तुति की।

श्लोक 49 (skanda.3.6.49)

अतिभीषणनादेन देव्याः क्षुब्धं जगत्त्रयम् । दृष्ट्वा देवारयो दैत्याः समुत्तस्थुरुदायुधाः

atibhīṣaṇanādena devyāḥ kṣubdhaṁ jagattrayam dṛṣṭvā devārayo daityāḥ samuttasthurudāyudhāḥ

देवी की उस अत्यंत भीषण गर्जना से त्रिलोक क्षुब्ध हो गया — यह देखकर देवताओं के शत्रु दैत्य आयुध उठाकर खड़े हो गए।

श्लोक 50 (skanda.3.6.50)

महिषोऽपि महाक्रोधात्समुद्यत महायुधः । तं शब्दमवलक्ष्याथ ययावसुरसंवृतः

mahiṣo'pi mahākrodhātsamudyata mahāyudhaḥ taṁ śabdamavalakṣyātha yayāvasurasaṁvṛtaḥ

महिष भी अत्यंत क्रोध से अपने महान आयुध उठाए हुए, उस शब्द को सुनकर, असुरों से घिरा हुआ आगे बढ़ा।

श्लोक 51 (skanda.3.6.51)

व्यलोकयत्ततो देवीं तेजोव्याप्तजगत्त्रयीम् । सायुधानंतबाह्वाढयां नादकंपितभूतलाम्

vyalokayattato devīṁ tejovyāptajagattrayīm sāyudhānaṁtabāhvāḍhayāṁ nādakaṁpitabhūtalām

उसने तब उस देवी को देखा, जिसका तेज त्रिलोक में व्याप्त था, जो अनंत आयुधधारी भुजाओं से समृद्ध थी, जिसकी गर्जना से पृथ्वी कंपायमान हो रही थी,

श्लोक 52 (skanda.3.6.52)

क्षोभिताशेषशेषादिमहानागपरंपराम् । विलोक्य देवीमसुराः समनह्यन्नुदायुधाः

kṣobhitāśeṣaśeṣādimahānāgaparaṁparām vilokya devīmasurāḥ samanahyannudāyudhāḥ

— जिससे शेष आदि समस्त महानागों की परंपरा क्षुब्ध हो गई थी। देवी को देखकर असुरों ने आयुध उठाकर स्वयं को सन्नद्ध किया।

श्लोक 53 (skanda.3.6.53)

ततो देव्या तया सार्द्धमसुराणामभूद्रणः । अस्त्रैः शस्त्रैः शरैश्चक्रैर्गदाभिर्मुसलैरपि

tato devyā tayā sārddhamasurāṇāmabhūdraṇaḥ astraiḥ śastraiḥ śaraiścakrairgadābhirmusalairapi

तब उस देवी के साथ असुरों का युद्ध हुआ, अस्त्रों, शस्त्रों, बाणों, चक्रों, गदाओं तथा मूसलों से भी।

श्लोक 54 (skanda.3.6.54)

गजाश्वरथपादातैरसंख्येयैर्महावलः । महिषो युयुधे तत्र देव्या साकमरिंदमः

gajāśvarathapādātairasaṁkhyeyairmahāvalaḥ mahiṣo yuyudhe tatra devyā sākamariṁdamaḥ

अगणित हाथियों, घोड़ों, रथों तथा पैदल सेना से युक्त होकर, वह महाबली अरिंदम महिष वहाँ देवी के साथ युद्ध करने लगा।

श्लोक 55 (skanda.3.6.55)

लक्षको टिसहस्राणि प्रधानासुरयूथपाः । एकैकस्य तु सेनायास्तेषां संख्या न विद्यते

lakṣako ṭisahasrāṇi pradhānāsurayūthapāḥ ekaikasya tu senāyāsteṣāṁ saṁkhyā na vidyate

प्रधान असुर-सेनापति लाखों-करोड़ों की संख्या में थे; उनमें से प्रत्येक की सेना की संख्या भी ज्ञात नहीं है।

श्लोक 56 (skanda.3.6.56)

ते सर्वे युगपद्देवीं शस्त्रैरावव्रुरोजसा । सापि देवी ततो भीमा दैत्यमुक्तास्त्रसंचयम्

te sarve yugapaddevīṁ śastrairāvavrurojasā sāpi devī tato bhīmā daityamuktāstrasaṁcayam

वे सभी एक साथ बलपूर्वक अपने शस्त्रों से देवी को घेरने लगे। किंतु वह भीषण देवी दैत्यों द्वारा छोड़े गए अस्त्रों के उस समूह को —

श्लोक 57 (skanda.3.6.57)

बिभेद लीलया बाणैः स्वकार्मुकविनिःसृतैः । ससर्ज दैत्यकायेषु बाणपूगान्यनेकशः

bibheda līlayā bāṇaiḥ svakārmukaviniḥsṛtaiḥ sasarja daityakāyeṣu bāṇapūgānyanekaśaḥ

— अपने धनुष से छूटे बाणों द्वारा लीलापूर्वक भेद डाला, और दैत्यों के शरीरों पर अनेक प्रकार से बाणों के समूह बरसाए।

श्लोक 58 (skanda.3.6.58)

देव्याश्रयबला द्देवा निर्भया दैत्ययूथपैः । युयुधुः संयुगे शस्त्रैरस्त्रैरप्यायुधांतरैः

devyāśrayabalā ddevā nirbhayā daityayūthapaiḥ yuyudhuḥ saṁyuge śastrairastrairapyāyudhāṁtaraiḥ

देवी के आश्रय से बल पाकर देवता निर्भय होकर, दैत्य-सेनापतियों के साथ शस्त्रों, अस्त्रों तथा अन्य आयुधों से युद्ध करने लगे।

श्लोक 59 (skanda.3.6.59)

ततो देवा बलोत्सिक्ता देवीशक्त्युपबृंहिताः । निःशेषमसुरान्सर्वानायु धैर्निरमूलयन्

tato devā balotsiktā devīśaktyupabṛṁhitāḥ niḥśeṣamasurānsarvānāyu dhairniramūlayan

तब बलशाली देवताओं ने, देवी की शक्ति से पुष्ट होकर, समस्त असुरों को अपने आयुधों से समूल नष्ट कर दिया।

श्लोक 60 (skanda.3.6.60)

स्वसैन्ये तु क्षयं याते संक्षुब्धो महिषासुरः । चापमादाय वेगेन विकृष्य च महास्वनम्

svasainye tu kṣayaṁ yāte saṁkṣubdho mahiṣāsuraḥ cāpamādāya vegena vikṛṣya ca mahāsvanam

किंतु अपनी सेना के नष्ट हो जाने पर, अत्यंत क्षुब्ध महिषासुर ने अपना धनुष लेकर वेगपूर्वक तथा महानाद करते हुए उसे खींचा —

श्लोक 61 (skanda.3.6.61)

संधाय मुमुचे बाणान्देव सैन्येषु भूसुराः । इंद्रे तु दशसाहस्रं यमे पंचसहस्रकम्

saṁdhāya mumuce bāṇāndeva sainyeṣu bhūsurāḥ iṁdre tu daśasāhasraṁ yame paṁcasahasrakam

— हे ब्राह्मणो, और संधान करके देव-सेना पर बाण छोड़े: इन्द्र पर दस हजार, यम पर पाँच हजार,

श्लोक 62 (skanda.3.6.62)

वरुणे चाष्टसाहस्रं कुबेरे षट्सहस्रकम् । सूर्ये चंद्रे च वह्नौ च वायौ वसुषु चाश्विनोः

varuṇe cāṣṭasāhasraṁ kubere ṣaṭsahasrakam sūrye caṁdre ca vahnau ca vāyau vasuṣu cāśvinoḥ

— वरुण पर आठ हजार, कुबेर पर छह हजार; तथा सूर्य, चंद्र, अग्नि, वायु, वसुओं तथा दोनों अश्विनी कुमारों पर —

श्लोक 63 (skanda.3.6.63)

अन्येष्वपि च देवेषु महिषो दानवेश्वरः । प्रत्येकमयुतं बाणान्मुमुचे बलिनां वरः

anyeṣvapi ca deveṣu mahiṣo dānaveśvaraḥ pratyekamayutaṁ bāṇānmumuce balināṁ varaḥ

— तथा अन्य देवताओं पर भी, दानवों के स्वामी, बलवानों में श्रेष्ठ महिष ने प्रत्येक पर दस-दस हजार बाण छोड़े।

श्लोक 64 (skanda.3.6.64)

पलायंते ततो देवा महिषासुरमर्द्दिताः । देवीं शरणमाजग्मुस्त्राहित्राहीतिवादिनः

palāyaṁte tato devā mahiṣāsuramardditāḥ devīṁ śaraṇamājagmustrāhitrāhītivādinaḥ

तब महिषासुर से पीड़ित होकर देवता भाग खड़े हुए, और "बचाओ, बचाओ" पुकारते हुए देवी की शरण में आए।

श्लोक 65 (skanda.3.6.65)

ततो देवी गणान्स्वस्य भूतवेतालकादिकान् । यूयं नाशयत क्षिप्रमासुरं बलमित्यशात्

tato devī gaṇānsvasya bhūtavetālakādikān yūyaṁ nāśayata kṣipramāsuraṁ balamityaśāt

तब देवी ने भूत-वेताल आदि अपने गणों को आज्ञा दी — "तुम शीघ्र ही असुर-सेना का नाश करो।

श्लोक 66 (skanda.3.6.66)

अहं तु महिषं युद्धे योधयामि वलोद्धतम् । ततो देव्या गणैः सर्वमासुरं क्षतमाशु वै

ahaṁ tu mahiṣaṁ yuddhe yodhayāmi valoddhatam tato devyā gaṇaiḥ sarvamāsuraṁ kṣatamāśu vai

मैं स्वयं युद्ध में बलोद्धत महिष से युद्ध करूँगी।" तब देवी के गणों द्वारा समस्त असुर-सेना शीघ्र ही नष्ट कर दी गई।

श्लोक 67 (skanda.3.6.67)

ततः सैन्यं क्षयं नीते गणै र्देवीप्रचोदितैः । योद्धुकामः स महिषो गणैः साकं व्यतिष्ठत

tataḥ sainyaṁ kṣayaṁ nīte gaṇai rdevīpracoditaiḥ yoddhukāmaḥ sa mahiṣo gaṇaiḥ sākaṁ vyatiṣṭhata

फिर देवी द्वारा प्रेरित गणों द्वारा सेना के नष्ट हो जाने पर, युद्ध का इच्छुक वह महिष गणों के सामने डट गया।

श्लोक 68 (skanda.3.6.68)

अत्रांतरे महानादः सुचक्षुश्च महाहनुः । महाचंडो महाभक्षो महोदरम होत्कटौ

atrāṁtare mahānādaḥ sucakṣuśca mahāhanuḥ mahācaṁḍo mahābhakṣo mahodarama hotkaṭau

इसी बीच महानाद, सुचक्षु, महाहनु, महाचंड, महाभक्ष, तथा महोदर और महोत्कट —

श्लोक 69 (skanda.3.6.69)

पञ्चास्यः पादचूडश्च बहुनेत्रः प्रबाहुकः । एकाक्षस्त्वेकपादश्च बहुपादोऽप्यपादकः

pañcāsyaḥ pādacūḍaśca bahunetraḥ prabāhukaḥ ekākṣastvekapādaśca bahupādo'pyapādakaḥ

— पंचास्य, पादचूड़, बहुनेत्र, प्रबाहुक, एकाक्ष, एकपाद, बहुपाद तथा अपादक —

श्लोक 70 (skanda.3.6.70)

एते चान्ये च बहवो महिषासुर मंत्रिणः । योद्धुकामा रणे देव्याः पुरतस्त्ववतस्थिरे

ete cānye ca bahavo mahiṣāsura maṁtriṇaḥ yoddhukāmā raṇe devyāḥ puratastvavatasthire

— ये तथा अन्य अनेक महिषासुर के मंत्री, युद्ध की इच्छा से देवी के समक्ष रणभूमि में जा डटे।

श्लोक 71 (skanda.3.6.71)

सिंहं वाहनमारुह्य ततो देवी मनोजवम् । प्रलयांबुदनिर्घोषं चापमादाय भैरवम्

siṁhaṁ vāhanamāruhya tato devī manojavam pralayāṁbudanirghoṣaṁ cāpamādāya bhairavam

तब देवी ने मन के समान वेगवान् अपने सिंह-वाहन पर आरूढ़ होकर, प्रलयकालीन मेघों की सी गर्जना करने वाला भयंकर धनुष लेकर,

श्लोक 72 (skanda.3.6.72)

विस्फोट्य मुमुचे बाणान्वज्रवेगसमान्युधि । दशलक्षगजैश्चापि शतलक्षैश्च वाजिभिः

visphoṭya mumuce bāṇānvajravegasamānyudhi daśalakṣagajaiścāpi śatalakṣaiśca vājibhiḥ

— उसे टंकारते हुए युद्ध में वज्र के समान वेगवान बाण छोड़े। और दस लाख हाथियों, सौ लाख घोड़ों,

श्लोक 73 (skanda.3.6.73)

शतलक्षै रथैश्चापि लक्षायुतपदातिभिः । युक्तो महाहनुर्दैत्यो देव्या युधि निपातितः

śatalakṣai rathaiścāpi lakṣāyutapadātibhiḥ yukto mahāhanurdaityo devyā yudhi nipātitaḥ

— सौ लाख रथों, तथा असंख्य पैदल सेना से युक्त वह दैत्य महाहनु देवी द्वारा युद्ध में गिरा दिया गया।

श्लोक 74 (skanda.3.6.74)

सैन्ये च तस्य निहता देव्या बाणैर्द्विजोत्तमाः । लक्षकोटिसहस्राणि प्रधानासुरनायकाः

sainye ca tasya nihatā devyā bāṇairdvijottamāḥ lakṣakoṭisahasrāṇi pradhānāsuranāyakāḥ

और उसकी सेना में, हे द्विजोत्तमो, हजारों-करोड़ों प्रधान असुर-सेनापति देवी के बाणों से मारे गए।

श्लोक 75 (skanda.3.6.75)

महिषस्य हि विद्यन्ते महाबलपराक्रमाः । एकैकस्य प्रधानस्य चतुरङ्गबलं तथा

mahiṣasya hi vidyante mahābalaparākramāḥ ekaikasya pradhānasya caturaṅgabalaṁ tathā

क्योंकि महिष के पास महाबली-पराक्रमी सेनापति थे; उनमें से प्रत्येक प्रधान के पास चतुरंग सेना भी थी।

श्लोक 76 (skanda.3.6.76)

महाहनोर्यथा विप्रास्तथैवास्ति महद्बलम् । तत्सर्वं निहतं देव्या शरैः कांचनपुंखितैः

mahāhanoryathā viprāstathaivāsti mahadbalam tatsarvaṁ nihataṁ devyā śaraiḥ kāṁcanapuṁkhitaiḥ

हे विप्रो, जैसे महाहनु की, वैसे ही सबकी महान सेना थी। वह सब देवी द्वारा स्वर्ण-पंख वाले बाणों से नष्ट कर दी गई।

श्लोक 77 (skanda.3.6.77)

याममात्रेण विप्रेंद्रास्तदद्भुतमिवाभवत्

yāmamātreṇa vipreṁdrāstadadbhutamivābhavat

हे विप्रेन्द्रो, यह सब मानो एक अद्भुत घटना के समान केवल एक याम (तीन घंटे) मात्र में घटित हो गया।

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