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ब्रह्म खण्ड · अध्याय 7

महिषासुर-वध तथा देवीपत्तन-नामकरण का वर्णन

अध्याय 6अध्याय-सूचीअध्याय 8

श्लोक 1 (skanda.3.7.1)

श्रीसूत उवाच । स्वसैन्यमवलोक्याथ महिषो दानवेश्वरः । हतं देव्या महाक्रोधाच्चंडकोपमथाब्रवीत्

śrīsūta uvāca svasainyamavalokyātha mahiṣo dānaveśvaraḥ hataṁ devyā mahākrodhāccaṁḍakopamathābravīt

श्री सूत जी ने कहा — तब देवी द्वारा अपनी सेना को नष्ट हुआ देखकर, दानवेश्वर महिष ने अत्यंत क्रोधित होकर चंडकोप से कहा —

श्लोक 2 (skanda.3.7.2)

महिष उवाच । चंडकोप महावीर्य युद्ध्यस्वैनां दुरात्मिकाम् । तथास्त्विति स चोक्त्वाथ चंडकोपः प्रतापवान्

mahiṣa uvāca caṁḍakopa mahāvīrya yuddhyasvaināṁ durātmikām tathāstviti sa coktvātha caṁḍakopaḥ pratāpavān

महिष ने कहा — "हे महापराक्रमी चंडकोप, इस दुरात्मा से युद्ध करो।" "ऐसा ही हो" कहकर वह प्रतापी चंडकोप —

श्लोक 3 (skanda.3.7.3)

अवाकिरद्बाणवर्षैर्देवीं समरमूर्द्धनि । बाणजालानि तस्याशु चंडकोपस्य लीलया

avākiradbāṇavarṣairdevīṁ samaramūrddhani bāṇajālāni tasyāśu caṁḍakopasya līlayā

— रणभूमि में देवी पर बाणों की वर्षा करने लगा। चंडकोप के उन बाणजालों को देवी अंबिका ने शीघ्र ही लीलापूर्वक —

श्लोक 4 (skanda.3.7.4)

छित्त्वा जघान शस्त्रेण चंडकोपस्य सांबिका । चकर्त वाजिनोऽप्यस्य सारथिं च ध्वजं धनुः

chittvā jaghāna śastreṇa caṁḍakopasya sāṁbikā cakarta vājino'pyasya sārathiṁ ca dhvajaṁ dhanuḥ

— काटकर, अपने अस्त्र से चंडकोप पर प्रहार किया; उसके घोड़ों को, तथा उसके सारथि, ध्वज और धनुष को भी काट डाला।

श्लोक 5 (skanda.3.7.5)

उन्ममाथ रथं चापि तं बाणैर्हृद्यताडयत् । स भग्नधन्वा विरथो हताश्वो हतसारथिः

unmamātha rathaṁ cāpi taṁ bāṇairhṛdyatāḍayat sa bhagnadhanvā viratho hatāśvo hatasārathiḥ

उसने उसके रथ को भी तोड़ डाला, और बाणों से उसे हृदय में मारा। धनुष टूटा हुआ, रथहीन, अश्व-रहित, सारथि-रहित हुआ वह —

श्लोक 6 (skanda.3.7.6)

चंडकोपस्ततो देवीं खड्गचर्मधरोऽभ्यगात् । खड्गेन सिंहमाजघ्ने देव्या वाहं महासुरः

caṁḍakopastato devīṁ khaḍgacarmadharo'bhyagāt khaḍgena siṁhamājaghne devyā vāhaṁ mahāsuraḥ

— चंडकोप तब खड्ग और ढाल धारण कर देवी की ओर बढ़ा। उस महासुर ने अपनी तलवार से देवी के सिंह-वाहन पर प्रहार किया।

श्लोक 7 (skanda.3.7.7)

देवीमपि भुजे सव्ये खड्गेन प्रजघान सः । खङ्गो देव्या भुजे सव्ये व्यशीर्यत सहस्रधा

devīmapi bhuje savye khaḍgena prajaghāna saḥ khaṅgo devyā bhuje savye vyaśīryata sahasradhā

उसने देवी की बाईं भुजा पर भी खड्ग से प्रहार किया। किंतु वह खड्ग देवी की बाईं भुजा पर लगकर सहस्र टुकड़ों में टूट गया।

श्लोक 8 (skanda.3.7.8)

ततः शूले न महता चंडकोपं तदांबिका । जघान हृदये सोऽपि पपात च ममार च

tataḥ śūle na mahatā caṁḍakopaṁ tadāṁbikā jaghāna hṛdaye so'pi papāta ca mamāra ca

तब अंबिका ने अपने महान शूल से चंडकोप को हृदय में मारा, और वह भी गिरकर मर गया।

श्लोक 9 (skanda.3.7.9)

चंडकोपे हते तस्मिन्महावीर्ये महाबले । चित्रभानुर्गजारूढो देवीं तामभ्यधावत

caṁḍakope hate tasminmahāvīrye mahābale citrabhānurgajārūḍho devīṁ tāmabhyadhāvata

उस महापराक्रमी, महाबली चंडकोप के मारे जाने पर, चित्रभानु हाथी पर सवार होकर उस देवी की ओर दौड़ा।

श्लोक 10 (skanda.3.7.10)

दिव्यां शक्तिं ससर्जाथ महाघंटारवाकुलाम् । न्यवारयत हुंकारैर्देवी शक्तिं निराकुलाम्

divyāṁ śaktiṁ sasarjātha mahāghaṁṭāravākulām nyavārayata huṁkārairdevī śaktiṁ nirākulām

उसने एक महाघंटा की ध्वनि से युक्त दिव्य शक्ति चलाई। देवी ने निर्विकार होकर हुंकार से उस शक्ति को रोक दिया।

श्लोक 11 (skanda.3.7.11)

ततः शूलेन सा देवी चित्रभानुं व्यदारयत् । मृते तस्मिंस्ततो युद्धे करालो द्रुतमभ्यगात्

tataḥ śūlena sā devī citrabhānuṁ vyadārayat mṛte tasmiṁstato yuddhe karālo drutamabhyagāt

तब देवी ने अपने शूल से चित्रभानु को विदीर्ण कर दिया। उसके मरने पर, फिर करालनामक असुर युद्ध में शीघ्रता से आगे बढ़ा।

श्लोक 12 (skanda.3.7.12)

करमुष्टिप्रहारेण सोऽपि देव्या निपातितः । ततो देवी मदोन्मत्तं गदया व्यसुमातनोत्

karamuṣṭiprahāreṇa so'pi devyā nipātitaḥ tato devī madonmattaṁ gadayā vyasumātanot

वह भी देवी के मुष्टि-प्रहार से मार गिराया गया। तब देवी ने मदोन्मत्त एक अन्य असुर को गदा से निष्प्राण कर दिया।

श्लोक 13 (skanda.3.7.13)

बाष्कलं पट्टिशेनापि चक्रेणापि तथांतिकम् । प्राहिणोद्यमलोकाय दुर्गा देवी द्विजोत्तमाः

bāṣkalaṁ paṭṭiśenāpi cakreṇāpi tathāṁtikam prāhiṇodyamalokāya durgā devī dvijottamāḥ

हे द्विजोत्तमो, देवी दुर्गा ने पट्टिश से बाष्कल को तथा चक्र से अंतिक को भी यमलोक भेज दिया।

श्लोक 14 (skanda.3.7.14)

एवमन्यान्महाकायान्मंत्रिणो महिषस्य च । शूलेन प्रोथयित्वाथ प्राहिणोद्यमसादनम्

evamanyānmahākāyānmaṁtriṇo mahiṣasya ca śūlena prothayitvātha prāhiṇodyamasādanam

इस प्रकार महिष के अन्य विशालकाय मंत्रियों को भी शूल से बींधकर उसने यमलोक भेज दिया।

श्लोक 15 (skanda.3.7.15)

आत्मसैन्ये हते त्वेवं दुर्गया महिषासुरः । माहिषेणाथ रूपेण गणान्देव्या अभक्षयत्

ātmasainye hate tvevaṁ durgayā mahiṣāsuraḥ māhiṣeṇātha rūpeṇa gaṇāndevyā abhakṣayat

इस प्रकार दुर्गा द्वारा अपनी सेना नष्ट हो जाने पर, महिषासुर ने भैंसे के रूप में देवी के गणों को खाना आरंभ कर दिया।

श्लोक 16 (skanda.3.7.16)

तुण्डेन निजघानैकान्सुराघातैस्तथापरान् । निश्वासवायुभिश्चान्यान्पातयामास रोषितः

tuṇḍena nijaghānaikānsurāghātaistathāparān niśvāsavāyubhiścānyānpātayāmāsa roṣitaḥ

अपनी थूथन से उसने कुछ को मार डाला, कुछ को खुरों के प्रहार से, और क्रोधित होकर अपनी श्वास की वायु से अन्यों को गिरा दिया।

श्लोक 17 (skanda.3.7.17)

देव्या भूतगणं त्वेवं निहत्य महिषासुरः । सिंहं मारयितुं देव्याश्चुक्रोध च ननाद च

devyā bhūtagaṇaṁ tvevaṁ nihatya mahiṣāsuraḥ siṁhaṁ mārayituṁ devyāścukrodha ca nanāda ca

इस प्रकार देवी के भूतगण को मारकर, देवी के सिंह को मारने के लिए क्रोधित होकर महिषासुर गरजने लगा।

श्लोक 18 (skanda.3.7.18)

ततः सिंहोऽभवत्क्रुद्धो महावीर्यो महाबलः । सुराभि घातनिर्भिन्नमहीतलमहीधरः

tataḥ siṁho'bhavatkruddho mahāvīryo mahābalaḥ surābhi ghātanirbhinnamahītalamahīdharaḥ

तब वह महापराक्रमी, महाबली सिंह क्रोधित हो उठा, जिसके आघातों से पर्वत और पृथ्वीतल तक विदीर्ण हो जाते थे।

श्लोक 19 (skanda.3.7.19)

महिषासुरमायांतं नखैरेनं व्यदारयत् । चंडिकापि ततः क्रुद्धा वधे तस्याकरोन्मतिम्

mahiṣāsuramāyāṁtaṁ nakhairenaṁ vyadārayat caṁḍikāpi tataḥ kruddhā vadhe tasyākaronmatim

उसने अपने नखों से आते हुए महिषासुर को विदीर्ण करना आरंभ किया। चंडिका भी तब क्रोधित होकर उसके वध का निश्चय करने लगीं।

श्लोक 20 (skanda.3.7.20)

बबन्ध पाशैर्महिषं चंडिका कोपमूर्च्छिता । मोचयित्वा ततः पाशांस्त्यक्तमाहिषवेषवान्

babandha pāśairmahiṣaṁ caṁḍikā kopamūrcchitā mocayitvā tataḥ pāśāṁstyaktamāhiṣaveṣavān

क्रोध से उन्मत्त चंडिका ने महिष को पाशों से बाँध दिया। तब उन पाशों से मुक्त होकर, अपना भैंसे का रूप त्यागकर,

श्लोक 21 (skanda.3.7.21)

सिंहवेषोऽभवद्दैत्यो महाबलपराक्रमः । देवी तस्य शिरोयावच्छेत्तुं बुद्धिमधारयत्

siṁhaveṣo'bhavaddaityo mahābalaparākramaḥ devī tasya śiroyāvacchettuṁ buddhimadhārayat

— उस महाबली-पराक्रमी दैत्य ने सिंह का रूप धारण कर लिया। ज्यों ही देवी ने उसका सिर काटने का निश्चय किया,

श्लोक 22 (skanda.3.7.22)

तावत्स पुरुषो भूत्वा खड्गपाणिरदृश्यत । अथ तं पुरुषं देवी खड्गहस्तं शरोत्करैः

tāvatsa puruṣo bhūtvā khaḍgapāṇiradṛśyata atha taṁ puruṣaṁ devī khaḍgahastaṁ śarotkaraiḥ

— तभी वह पुरुष बनकर, हाथ में खड्ग लिए हुए प्रकट हो गया। तब देवी ने खड्गधारी उस पुरुष को बाणों के समूह से —

श्लोक 23 (skanda.3.7.23)

जघान तीक्ष्णधाराग्रैः परमर्मविदारणैः । ततः स पुरुषो विप्रा गजोऽभूद्धस्तदन्तवान्

jaghāna tīkṣṇadhārāgraiḥ paramarmavidāraṇaiḥ tataḥ sa puruṣo viprā gajo'bhūddhastadantavān

— तीक्ष्ण धारों वाले, मर्म को भेदने वाले बाणों से मारा। तब, हे विप्रो, वह पुरुष सूँड़ और दाँतों वाला हाथी बन गया।

श्लोक 24 (skanda.3.7.24)

दुर्गाया वाहनं सिंहं करेण विचकर्ष च । ततः सिंहः करं तस्य विचकर्त नखांकुरैः

durgāyā vāhanaṁ siṁhaṁ kareṇa vicakarṣa ca tataḥ siṁhaḥ karaṁ tasya vicakarta nakhāṁkuraiḥ

उसने अपनी सूँड़ से दुर्गा के सिंह-वाहन को पकड़ लिया। तब सिंह ने अपने नखों की नोक से उसकी सूँड़ को काट डाला।

श्लोक 25 (skanda.3.7.25)

भूयो महासुरो जातो माहिषं वेषमाश्रितः । ततः क्रुद्धा भद्रकाली महत्पानमसेवत

bhūyo mahāsuro jāto māhiṣaṁ veṣamāśritaḥ tataḥ kruddhā bhadrakālī mahatpānamasevata

वह महासुर पुनः अपने भैंसे के रूप को धारण कर लिया। तब क्रोधित भद्रकाली ने मदिरा का एक बड़ा पान किया।

श्लोक 26 (skanda.3.7.26)

ततः पानवशा न्मत्ता जहासारुणलोचना । महिषः सोऽपि गर्वेण शृंगाभ्यां पर्वतोत्करान्

tataḥ pānavaśā nmattā jahāsāruṇalocanā mahiṣaḥ so'pi garveṇa śṛṁgābhyāṁ parvatotkarān

तब उस पान के प्रभाव से मत्त होकर, लाल नेत्रों वाली देवी हँसने लगीं। वह महिष भी अभिमानवश अपने दोनों सींगों से पर्वतों के समूहों को —

श्लोक 27 (skanda.3.7.27)

चंडिकां प्रतिं चिक्षेप सा च तानच्छिनच्छरैः । ततो देवी जग न्माता महिषासुरमब्रवीत्

caṁḍikāṁ pratiṁ cikṣepa sā ca tānacchinaccharaiḥ tato devī jaga nmātā mahiṣāsuramabravīt

— चंडिका की ओर फेंकने लगा, और उसने उन्हें अपने बाणों से काट डाला। तब जगन्माता देवी ने महिषासुर से कहा —

श्लोक 28 (skanda.3.7.28)

देव्युवाच । कुरु गर्वं क्षणं मूढ मधु यावत्पिबाम्यहम् । निवृत्तमधुपानाहं त्वां नयिष्ये यमक्षयम्

devyuvāca kuru garvaṁ kṣaṇaṁ mūḍha madhu yāvatpibāmyaham nivṛttamadhupānāhaṁ tvāṁ nayiṣye yamakṣayam

देवी ने कहा — "हे मूढ़, जब तक मैं मधु पीती हूँ, तब तक क्षणभर अपना अहंकार दिखा ले। मधु-पान समाप्त होते ही मैं तुझे यमलोक भेज दूँगी।

श्लोक 29 (skanda.3.7.29)

हते त्वयि दुराधर्षे मया दैवतकंटके । स्वंस्वं स्थानं प्रपद्यंतां सिद्धा साध्या मरुद्गणाः

hate tvayi durādharṣe mayā daivatakaṁṭake svaṁsvaṁ sthānaṁ prapadyaṁtāṁ siddhā sādhyā marudgaṇāḥ

हे देवताओं के कंटक, दुर्धर्ष, तेरे मेरे द्वारा मारे जाने पर, सिद्ध, साध्य तथा मरुद्गण अपने-अपने स्थान को प्राप्त करें।"

श्लोक 30 (skanda.3.7.30)

उक्त्वैवं ताडयामास मुष्टिना महिषासुरम् । ताडितोऽयं ततो देव्या महिषो भृशविह्वलः

uktvaivaṁ tāḍayāmāsa muṣṭinā mahiṣāsuram tāḍito'yaṁ tato devyā mahiṣo bhṛśavihvalaḥ

यह कहकर उन्होंने महिषासुर को अपनी मुट्ठी से मारा। देवी द्वारा इस प्रकार आहत होकर, अत्यंत विह्वल हुआ वह महिष —

श्लोक 31 (skanda.3.7.31)

दक्षिणस्योदधेस्तीरेप्रदुद्राव त्वरान्वितः । अनुदुद्राव तं देवी सिंहमारुह्य वाहनम्

dakṣiṇasyodadhestīrepradudrāva tvarānvitaḥ anududrāva taṁ devī siṁhamāruhya vāhanam

— शीघ्रतापूर्वक दक्षिणी समुद्र के तट की ओर भाग गया। देवी ने अपने सिंह-वाहन पर आरूढ़ होकर उसका पीछा किया।

श्लोक 32 (skanda.3.7.32)

अनुद्रुतस्ततो देव्या महिषो दानवेश्वरः । धर्मपुष्कीरणीतोये दशयोजनमायते

anudrutastato devyā mahiṣo dānaveśvaraḥ dharmapuṣkīraṇītoye daśayojanamāyate

देवी द्वारा पीछा किए जाने पर दानवेश्वर महिष, दस योजन विस्तार वाली धर्मपुष्करिणी के जल में,

श्लोक 33 (skanda.3.7.33)

प्रविश्यांतर्हितस्तस्थौ दुर्गाताडनविह्वलः । ततो दुर्गा समासाद्य धर्मपुष्करिणीतटम्

praviśyāṁtarhitastasthau durgātāḍanavihvalaḥ tato durgā samāsādya dharmapuṣkariṇītaṭam

— प्रविष्ट होकर छिप गया, दुर्गा के प्रहारों से विह्वल होकर। तब दुर्गा ने धर्मपुष्करिणी के तट पर पहुँचकर,

श्लोक 34 (skanda.3.7.34)

नददर्शासुरं तत्र महिषं चंडिका तदा । अशरीरा ततो वाणी दुर्गा देवीमभाषत

nadadarśāsuraṁ tatra mahiṣaṁ caṁḍikā tadā aśarīrā tato vāṇī durgā devīmabhāṣata

— वहाँ उस महिष असुर को नहीं देखा। तब एक अशरीरी वाणी ने देवी दुर्गा से कहा —

श्लोक 35 (skanda.3.7.35)

भद्रकालि महादेवि महिषो दानवस्त्वया । ताडितो मुष्टिना भद्रे धर्मपुष्करिणीजले

bhadrakāli mahādevi mahiṣo dānavastvayā tāḍito muṣṭinā bhadre dharmapuṣkariṇījale

"हे भद्रकाली, हे महादेवी, तुम्हारे मुष्टि-प्रहार से आहत हुआ दानव महिष, हे भद्रे, धर्मपुष्करिणी के जल में —

श्लोक 36 (skanda.3.7.36)

अस्मिन्नंतर्हितः शेते भयार्तो मारयस्व तम् । येनकेनाप्युपायेन चैनं प्राणैर्वियोजय

asminnaṁtarhitaḥ śete bhayārto mārayasva tam yenakenāpyupāyena cainaṁ prāṇairviyojaya

— भयभीत होकर छिपा हुआ पड़ा है। उसे मार डालो; जिस किसी भी उपाय से उसके प्राण हर लो।"

श्लोक 37 (skanda.3.7.37)

एवं वाचाऽशरी रिण्या कथिता चंडिका तदा । प्राह स्ववाहनं सिंहमसुरेंद्रवधोद्यता

evaṁ vācā'śarī riṇyā kathitā caṁḍikā tadā prāha svavāhanaṁ siṁhamasureṁdravadhodyatā

इस प्रकार अशरीरी वाणी द्वारा बताए जाने पर, चंडिका ने, उस असुरेन्द्र के वध हेतु उद्यत होकर, अपने सिंह-वाहन से कहा —

श्लोक 38 (skanda.3.7.38)

मृगेंद्र सिंहविक्रांत महावलपराक्रम । धर्मपुष्कीरणीतोयं निःशेषं पीय तां त्वया

mṛgeṁdra siṁhavikrāṁta mahāvalaparākrama dharmapuṣkīraṇītoyaṁ niḥśeṣaṁ pīya tāṁ tvayā

"हे मृगेंद्र, हे सिंहविक्रांत, हे महाबल-पराक्रमी, इस धर्मपुष्करिणी के जल को तुम पूर्णतः पी जाओ।"

श्लोक 39 (skanda.3.7.39)

देव्यैवमुक्तः पंचास्यो धर्मपुष्करिणीजलम् । निःशेषं च पपौ विप्रा यथा पांसुर्भवेत्तथा

devyaivamuktaḥ paṁcāsyo dharmapuṣkariṇījalam niḥśeṣaṁ ca papau viprā yathā pāṁsurbhavettathā

देवी द्वारा इस प्रकार आदेश दिए जाने पर उस पंचमुख सिंह ने, हे विप्रो, धर्मपुष्करिणी के जल को उस सीमा तक पी लिया कि वह धूल के समान हो गया।

श्लोक 40 (skanda.3.7.40)

निरगान्महिषो दीनस्ततस्तस्मा ज्जलाशयात् । आयांतमसुरं देवी पादेनाक्रम्य मूर्द्धनि

niragānmahiṣo dīnastatastasmā jjalāśayāt āyāṁtamasuraṁ devī pādenākramya mūrddhani

तब उस जलाशय से महिष दीन होकर बाहर निकला। बाहर आते हुए उस असुर के मस्तक पर अपना पैर रखकर देवी ने —

श्लोक 41 (skanda.3.7.41)

कंठं शूलेन तीक्ष्णेन पीडयामास कोपिता । ततो देव्यसिमादाय चकर्तास्य शिरो महत्

kaṁṭhaṁ śūlena tīkṣṇena pīḍayāmāsa kopitā tato devyasimādāya cakartāsya śiro mahat

— क्रोधित होकर अपने तीक्ष्ण शूल से उसके कंठ को दबाया। तब देवी ने खड्ग लेकर उसके विशाल सिर को काट डाला।

श्लोक 42 (skanda.3.7.42)

एवं स महिषो विप्राः सभृत्यबलवाहनः । दुर्गया निहतो भूमौ पपात च ममार च

evaṁ sa mahiṣo viprāḥ sabhṛtyabalavāhanaḥ durgayā nihato bhūmau papāta ca mamāra ca

इस प्रकार, हे विप्रो, वह महिष, अपने सेवकों, सेना तथा वाहनों सहित, दुर्गा द्वारा मारा जाकर भूमि पर गिरकर मर गया।

श्लोक 43 (skanda.3.7.43)

ततो देवाः सगंधर्वाः सिद्धाश्च परमर्षयः । स्तुत्वा देवीं ततः स्तोत्रैस्तुष्टा जहृषिरे तदा

tato devāḥ sagaṁdharvāḥ siddhāśca paramarṣayaḥ stutvā devīṁ tataḥ stotraistuṣṭā jahṛṣire tadā

तब गंधर्वों, सिद्धों तथा महर्षियों सहित देवताओं ने स्तोत्रों से देवी की स्तुति करके, संतुष्ट होकर आनंद मनाया।

श्लोक 44 (skanda.3.7.44)

अनुज्ञातास्ततो देव्या देवा जग्मुर्यथागतम् । ततो देवी जगन्माता स्व नाम्ना पुरमुत्तमम्

anujñātāstato devyā devā jagmuryathāgatam tato devī jaganmātā sva nāmnā puramuttamam

तब देवी की अनुमति पाकर देवता जिस मार्ग से आए थे, उसी मार्ग से लौट गए। तब जगन्माता देवी ने अपने ही नाम पर एक उत्तम नगरी को —

श्लोक 45 (skanda.3.7.45)

दक्षिणस्य समुद्रस्य तीरे चक्रे तदोत्तरे । ततो देव्यनुशिष्टास्ते देवाः शक्रपुरोगमाः

dakṣiṇasya samudrasya tīre cakre tadottare tato devyanuśiṣṭāste devāḥ śakrapurogamāḥ

— दक्षिणी समुद्र के उत्तरी तट पर बसाया। तब देवी द्वारा निर्देशित इन्द्र आदि देवताओं ने —

श्लोक 46 (skanda.3.7.46)

पूरयामासुरमृतैर्धर्मपुष्क रिणीं तदा । ततो ह्यमृततीर्थाख्यां लेभे तत्तीर्थमुत्तमम्

pūrayāmāsuramṛtairdharmapuṣka riṇīṁ tadā tato hyamṛtatīrthākhyāṁ lebhe tattīrthamuttamam

— तब धर्मपुष्करिणी को अमृत से भर दिया। तभी से वह उत्तम तीर्थ अमृततीर्थ नाम से प्रसिद्ध हुआ।

श्लोक 47 (skanda.3.7.47)

ततो देवी वरमदात्स्वपुरस्य मुदान्विता । पशव्यं चापरोगं च पुरमेतद्भवत्विति

tato devī varamadātsvapurasya mudānvitā paśavyaṁ cāparogaṁ ca purametadbhavatviti

तब देवी ने आनंदपूर्वक अपनी नगरी को वर दिया — "यह नगरी पशुधन से समृद्ध तथा रोगरहित हो।"

श्लोक 48 (skanda.3.7.48)

ददौ तीर्थाय च वरं स्नातानामत्र वै नृणाम् । यथाभिलाषं सिद्धिः स्यादित्युक्त्वा सा दिवं ययौ

dadau tīrthāya ca varaṁ snātānāmatra vai nṛṇām yathābhilāṣaṁ siddhiḥ syādityuktvā sā divaṁ yayau

और तीर्थ को भी वर दिया — "यहाँ स्नान करने वाले मनुष्यों को उनकी इच्छानुसार सिद्धि प्राप्त हो।" यह कहकर वह स्वर्ग को चली गईं।

श्लोक 49 (skanda.3.7.49)

श्रीसूत उवाच । यत्स्वनाम्ना चकारेदं देवी पुरमनुत्तमम् । देवीपत्तनमित्युक्तं तेन देव्याः पुरोत्तमम्

śrīsūta uvāca yatsvanāmnā cakāredaṁ devī puramanuttamam devīpattanamityuktaṁ tena devyāḥ purottamam

श्री सूत जी ने कहा — चूँकि देवी ने अपने ही नाम पर इस अनुपम नगरी को बसाया, इसलिए देवी की वह उत्तम नगरी देवीपत्तन कहलाई।

श्लोक 50 (skanda.3.7.50)

देवीपत्तनमारभ्य सुमुहूर्ते दिने द्विजाः । विघ्नेश्वरं प्रणम्यादौ सलिलस्वामिनं तथा

devīpattanamārabhya sumuhūrte dine dvijāḥ vighneśvaraṁ praṇamyādau salilasvāminaṁ tathā

हे द्विजो, देवीपत्तन से आरंभ करते हुए, शुभ मुहूर्त में, पहले विघ्नेश्वर (गणेश) को तथा जल के स्वामी (वरुण) को भी प्रणाम करके —

श्लोक 51 (skanda.3.7.51)

महादेवाभ्यनुज्ञातो रामचंद्रोऽतिधार्मिकः । स्थापयित्वा स्वहस्तेन पाषाणनवकं मुदा

mahādevābhyanujñāto rāmacaṁdro'tidhārmikaḥ sthāpayitvā svahastena pāṣāṇanavakaṁ mudā

— महादेव की अनुमति प्राप्त, अत्यंत धर्मात्मा रामचंद्र ने अपने ही हाथ से आनंदपूर्वक नौ पत्थर स्थापित करके —

श्लोक 52 (skanda.3.7.52)

सेतुमारब्धवान्विप्रा यावल्लंकामतंद्रितः । सिंहासनं समारुह्य रामो नलकृतं शुभम्

setumārabdhavānviprā yāvallaṁkāmataṁdritaḥ siṁhāsanaṁ samāruhya rāmo nalakṛtaṁ śubham

— तंद्रारहित होकर, हे विप्रो, लंका तक सेतु का निर्माण आरंभ किया। नल द्वारा बनाए गए शुभ सिंहासन पर आरूढ़ होकर राम ने —

श्लोक 53 (skanda.3.7.53)

वानरैः कारयामास सेतुमब्धौ नलादिभिः । पर्वताञ्छाखिनोवृक्षान्दृषदः काष्ठसंचयान्

vānaraiḥ kārayāmāsa setumabdhau nalādibhiḥ parvatāñchākhinovṛkṣāndṛṣadaḥ kāṣṭhasaṁcayān

— नल आदि वानरों द्वारा समुद्र पर सेतु का निर्माण करवाया। पर्वतों, शाखाओं वाले वृक्षों, पत्थरों तथा काष्ठ-समूहों को —

श्लोक 54 (skanda.3.7.54)

तृणानि च समाजह्रुर्वानरा वनमध्यतः

tṛṇāni ca samājahrurvānarā vanamadhyataḥ

— तथा तृणों को भी वानरों ने वन के मध्य से एकत्र किया।

श्लोक 55 (skanda.3.7.55)

नलस्तानि समादाय चक्रे सेतुं महोदधौ । पंचभिर्दिवसैः सेतुर्यावल्लंकासमीपतः

nalastāni samādāya cakre setuṁ mahodadhau paṁcabhirdivasaiḥ seturyāvallaṁkāsamīpataḥ

नल ने उन्हें लेकर महासागर पर सेतु का निर्माण किया; पाँच दिनों में ही सेतु लंका के समीप तक पहुँच गया।

श्लोक 56 (skanda.3.7.56)

दशयोजनविस्तीर्णश्शतयोजनमायतः । कृतः सेतुर्नलेनाब्धौ पुण्यः पापविनाशनः

daśayojanavistīrṇaśśatayojanamāyataḥ kṛtaḥ seturnalenābdhau puṇyaḥ pāpavināśanaḥ

दस योजन चौड़ा, सौ योजन लंबा, वह पुण्यमय, पापनाशक सेतु नल द्वारा समुद्र पर बनाया गया।

श्लोक 57 (skanda.3.7.57)

देवीपुरस्य निकटे नवपाषाणरूपके । सेतुमूले नरः स्नायात्स्वपापपरिशुद्धये

devīpurasya nikaṭe navapāṣāṇarūpake setumūle naraḥ snāyātsvapāpapariśuddhaye

देवीपुर के निकट, नौ पाषाणों वाले स्थान पर, सेतु के मूल में मनुष्य अपने पापों की शुद्धि के लिए स्नान करे।

श्लोक 58 (skanda.3.7.58)

चक्रतीर्थे तथा स्नायाद्भजेत्सेत्वधिपं हरिम् । देवीपत्तनमारभ्य यत्कृतं सेतुबंधनम्

cakratīrthe tathā snāyādbhajetsetvadhipaṁ harim devīpattanamārabhya yatkṛtaṁ setubaṁdhanam

उसी प्रकार चक्रतीर्थ में भी स्नान करे, और सेतु के स्वामी हरि की उपासना करे। देवीपत्तन से जो सेतु-बंधन आरंभ हुआ —

श्लोक 59 (skanda.3.7.59)

तत्सेतुमूलं विप्रेंद्रा यथार्थं परिकल्पितम् । सेतोस्तु पश्चिमा कोटिर्दर्भशय्या प्रकीर्तिता

tatsetumūlaṁ vipreṁdrā yathārthaṁ parikalpitam setostu paścimā koṭirdarbhaśayyā prakīrtitā

— हे विप्रेन्द्रो, वही सेतु का मूल यथार्थतः माना गया है। सेतु का पश्चिमी छोर दर्भशय्या कहा गया है।

श्लोक 60 (skanda.3.7.60)

देवीपुरी च प्राक्कोटिरुभयं सेतुमूलकम् । उभयं पुण्यमाख्यातं पवित्रं पापनाशनम्

devīpurī ca prākkoṭirubhayaṁ setumūlakam ubhayaṁ puṇyamākhyātaṁ pavitraṁ pāpanāśanam

और देवीपुरी उसका पूर्वी छोर है; दोनों ही सेतु के मूल हैं। दोनों को पुण्यमय, पवित्र तथा पापनाशक कहा गया है।

श्लोक 61 (skanda.3.7.61)

यत्सेतुमूलं गच्छंति येन मार्गेण वै नराः । तत्तन्मार्गगतास्ते ते तस्मिंस्तस्मिन्विमुक्तिदे

yatsetumūlaṁ gacchaṁti yena mārgeṇa vai narāḥ tattanmārgagatāste te tasmiṁstasminvimuktide

जिस-जिस मार्ग से मनुष्य सेतु के मूल में जाते हैं, उस-उस मार्ग से गए हुए वे उस-उस मुक्तिदायी स्थान में —

श्लोक 62 (skanda.3.7.62)

स्नात्वादौ सेतुमूले तु चक्रतीर्थे तथैव च । संकल्पपूर्वकं पश्चाद्गच्छेयुः सेतुबंधनम्

snātvādau setumūle tu cakratīrthe tathaiva ca saṁkalpapūrvakaṁ paścādgaccheyuḥ setubaṁdhanam

— पहले सेतु के मूल में तथा उसी प्रकार चक्रतीर्थ में स्नान करके, तत्पश्चात् संकल्पपूर्वक सेतु-बंधन की ओर जाएँ।

श्लोक 63 (skanda.3.7.63)

देवीपुरे तथा दर्भशय्यायामपि भूसुराः । चक्रतीर्थे शिवे स्नानं पुण्यपापविनाशनम्

devīpure tathā darbhaśayyāyāmapi bhūsurāḥ cakratīrthe śive snānaṁ puṇyapāpavināśanam

हे ब्राह्मणो, देवीपुर में, उसी प्रकार दर्भशय्या में, तथा शुभ चक्रतीर्थ में भी, स्नान पुण्यदायक और पापनाशक है।

श्लोक 64 (skanda.3.7.64)

स्मरणादुभयत्रापि चक्रतीर्थस्य वै द्विजाः । भस्मीभवंति पापानि लक्षजन्मकृतान्यपि

smaraṇādubhayatrāpi cakratīrthasya vai dvijāḥ bhasmībhavaṁti pāpāni lakṣajanmakṛtānyapi

हे द्विजो, दोनों स्थानों में भी चक्रतीर्थ के स्मरण मात्र से, लाख जन्मों में किए गए पाप भी भस्म हो जाते हैं।

श्लोक 65 (skanda.3.7.65)

जन्मापि विलयं यायान्मुक्तिश्चापि करे स्थिता । चक्रतीर्थसमं तीर्थं न भूतं न भविष्यति

janmāpi vilayaṁ yāyānmuktiścāpi kare sthitā cakratīrthasamaṁ tīrthaṁ na bhūtaṁ na bhaviṣyati

जन्म भी विलय को प्राप्त हो जाता है, और मुक्ति हाथ में स्थित-सी हो जाती है। चक्रतीर्थ के समान तीर्थ न कभी हुआ है, न कभी होगा।

श्लोक 66 (skanda.3.7.66)

भूलोके यानि तीर्थानि गंगादीनि द्विजोत्तमाः । चक्रतीर्थस्य तान्यद्धा कलां नार्हंति षोडशीम्

bhūloke yāni tīrthāni gaṁgādīni dvijottamāḥ cakratīrthasya tānyaddhā kalāṁ nārhaṁti ṣoḍaśīm

हे द्विजोत्तमो, भूलोक में जो भी तीर्थ हैं, गंगा आदि, वे निश्चय ही चक्रतीर्थ के सोलहवें अंश के भी योग्य नहीं हैं।

श्लोक 67 (skanda.3.7.67)

आदौ तु नवपाषाणमध्येऽब्धौ स्नानमाचरेत् । क्षेत्रपिंडे ततः कुर्याच्चक्रतीर्थे तथैव च

ādau tu navapāṣāṇamadhye'bdhau snānamācaret kṣetrapiṁḍe tataḥ kuryāccakratīrthe tathaiva ca

पहले नौ पाषाणों के मध्य समुद्र में स्नान करे; फिर क्षेत्र-पिंडदान करे, तथा उसी प्रकार चक्रतीर्थ में भी।

श्लोक 68 (skanda.3.7.68)

सेतुनाथं हरिं सेवेत्स्वपापपरिशुद्धये । एवं हि दर्भशय्यायां कुर्युस्तन्मार्गतो गताः

setunāthaṁ hariṁ sevetsvapāpapariśuddhaye evaṁ hi darbhaśayyāyāṁ kuryustanmārgato gatāḥ

अपने पापों की शुद्धि के लिए सेतु-नाथ हरि की उपासना करे। इस प्रकार ही उस मार्ग से गए हुए लोगों को दर्भशय्या में करना चाहिए।

श्लोक 69 (skanda.3.7.69)

आरूढं रामचंद्रेण यो नमस्कुरुते जनः । सिंहासनं नलकृतं न तस्य नरकाद्भयम्

ārūḍhaṁ rāmacaṁdreṇa yo namaskurute janaḥ siṁhāsanaṁ nalakṛtaṁ na tasya narakādbhayam

जो व्यक्ति रामचंद्र द्वारा आरूढ़ किए गए, नल द्वारा बनाए गए उस सिंहासन को नमस्कार करता है, उसे नरक का भय नहीं रहता।

श्लोक 70 (skanda.3.7.70)

सेतुमादौ नमस्कुर्याद्रामं ध्यायन्हृदा तदा । रघुवीरपदन्यास पवित्रीकृतपांसवे

setumādau namaskuryādrāmaṁ dhyāyanhṛdā tadā raghuvīrapadanyāsa pavitrīkṛtapāṁsave

पहले हृदय में राम का ध्यान करते हुए सेतु को नमस्कार करे — "रघुवीर के चरण-न्यास से पवित्र हुई धूल वाले,

श्लोक 71 (skanda.3.7.71)

दशकंठशिरश्छेदहेतवे सेतवे नमः । केतवे रामचंद्रस्य मोक्षमार्गैकहेतवे

daśakaṁṭhaśiraśchedahetave setave namaḥ ketave rāmacaṁdrasya mokṣamārgaikahetave

— दशकंठ (रावण) के सिर के छेदन के कारणस्वरूप सेतु को नमस्कार है! रामचंद्र की उस पताका को, मोक्ष-मार्ग के एकमात्र कारण को —

श्लोक 72 (skanda.3.7.72)

सीताया मानसांभोजभानवे सेतवे नमः । साष्टांगं प्रणिपत्यादौ मंत्रेणानेन वै द्विजाः

sītāyā mānasāṁbhojabhānave setave namaḥ sāṣṭāṁgaṁ praṇipatyādau maṁtreṇānena vai dvijāḥ

— सीता के मानस-कमल के लिए सूर्य-स्वरूप सेतु को नमस्कार है!" हे द्विजो, पहले इस मंत्र से साष्टांग प्रणाम करके —

श्लोक 73 (skanda.3.7.73)

ततो वेतालवरदं तीर्थं गच्छेन्महाबलम् । तत्र स्नानादवाप्नोति सिद्धिं पारामिकां नरः

tato vetālavaradaṁ tīrthaṁ gacchenmahābalam tatra snānādavāpnoti siddhiṁ pārāmikāṁ naraḥ

— फिर महाबली वेतालवरद तीर्थ को जाए; वहाँ स्नान करने से मनुष्य परम सिद्धि प्राप्त करता है।

श्लोक 74 (skanda.3.7.74)

योऽध्यायमेनं पठते मनुष्यः शृणोति वा भक्तियुतो द्विजेंद्राः । स्वर्गादयस्तस्य न दुर्लभाः स्युः कैवल्यमप्यस्य करस्थमेव

yo'dhyāyamenaṁ paṭhate manuṣyaḥ śṛṇoti vā bhaktiyuto dvijeṁdrāḥ svargādayastasya na durlabhāḥ syuḥ kaivalyamapyasya karasthameva

हे द्विजेंद्रो, जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इस अध्याय को पढ़ता है अथवा सुनता है, उसके लिए स्वर्ग आदि दुर्लभ नहीं रहते; मोक्ष भी उसके हाथ में ही स्थित रहता है।

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