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ब्रह्म खण्ड · अध्याय 8

वेतालवरद तीर्थ की उत्पत्ति-कथा

अध्याय 7अध्याय-सूचीअध्याय 9

श्लोक 1 (skanda.3.8.1)

ऋषय ऊचुः । भगवन्सूतसर्वज्ञ कृष्णद्वैपायनप्रिय । त्वन्मुखाद्वै कथाः श्रुत्वा श्रोत्रकामृतवर्षिणीः

ṛṣaya ūcuḥ bhagavansūtasarvajña kṛṣṇadvaipāyanapriya tvanmukhādvai kathāḥ śrutvā śrotrakāmṛtavarṣiṇīḥ

ऋषियों ने कहा — हे भगवन् सूत, हे सर्वज्ञ, हे कृष्ण द्वैपायन के प्रिय, आपके मुख से कर्णों पर अमृत बरसाने वाली कथाओं को सुनकर —

श्लोक 2 (skanda.3.8.2)

तृप्तिर्न जायतेऽस्माकं त्वद्वचोमृतपायिनाम् । अतः शुश्रूषमाणानां भूयो ब्रूहि कथाः शुभाः

tṛptirna jāyate'smākaṁ tvadvacomṛtapāyinām ataḥ śuśrūṣamāṇānāṁ bhūyo brūhi kathāḥ śubhāḥ

— आपके वचनामृत को पीते हुए भी हमें तृप्ति नहीं होती। अतः सुनने के इच्छुक हम लोगों को और अधिक शुभ कथाएँ सुनाइए।

श्लोक 3 (skanda.3.8.3)

वेतालवरदंनाम चक्रतीर्थस्य दक्षिणे । तीर्थमस्ति महापुण्यमित्यवादीद्भवान्पुरा

vetālavaradaṁnāma cakratīrthasya dakṣiṇe tīrthamasti mahāpuṇyamityavādīdbhavānpurā

आपने पहले कहा था कि चक्रतीर्थ के दक्षिण में वेतालवरद नामक एक महापुण्य तीर्थ है।

श्लोक 4 (skanda.3.8.4)

वेतालवरदाभिख्या तीर्थस्यास्यागता कथम् । किंप्रभावं च तत्तीर्थमेतन्नो वक्तुमर्हसि

vetālavaradābhikhyā tīrthasyāsyāgatā katham kiṁprabhāvaṁ ca tattīrthametanno vaktumarhasi

इस तीर्थ को वेतालवरद यह नाम कैसे प्राप्त हुआ, और उस तीर्थ का क्या प्रभाव है? यह हमें बताने योग्य हैं।

श्लोक 5 (skanda.3.8.5)

श्रीसूत उवाच । साधुपृष्टं हि युष्माभिरतिगुह्यं मुनीश्वराः । शृणुध्वं मनसा सार्द्धं ब्रवीम्यत्यद्भुतां कथाम्

śrīsūta uvāca sādhupṛṣṭaṁ hi yuṣmābhiratiguhyaṁ munīśvarāḥ śṛṇudhvaṁ manasā sārddhaṁ bravīmyatyadbhutāṁ kathām

श्री सूत जी ने कहा — हे मुनीश्वरो, आपने यह अत्यंत गुह्य प्रश्न भली-भाँति पूछा है; मन लगाकर सुनिए, मैं एक अत्यंत अद्भुत कथा सुनाता हूँ।

श्लोक 6 (skanda.3.8.6)

पामरा अपि मोदन्ते यां वै श्रुत्वा कथां शुभाम् । कथा चेयं महापुण्या पुरा कैलासपर्वते

pāmarā api modante yāṁ vai śrutvā kathāṁ śubhām kathā ceyaṁ mahāpuṇyā purā kailāsaparvate

इस शुभ कथा को सुनकर सामान्यजन भी आनंदित होते हैं। और यह महापुण्य कथा प्राचीन काल में कैलास पर्वत पर —

श्लोक 7 (skanda.3.8.7)

केलिकालेषु पावत्यै शंभुना कथिता द्विजाः । तां ब्रवीमि कथामेनामत्यद्भुततरां हि वः

kelikāleṣu pāvatyai śaṁbhunā kathitā dvijāḥ tāṁ bravīmi kathāmenāmatyadbhutatarāṁ hi vaḥ

— विनोद के क्षणों में शंभु द्वारा पार्वती को सुनाई गई थी, हे द्विजो। वही अत्यंत अद्भुत कथा मैं आपको सुनाता हूँ।

श्लोक 8 (skanda.3.8.8)

पुरा हि गालवोनाम महर्षिः सत्यवाक्छुचिः । चिंतयानः परं ब्रह्म तपस्तेपे निजाश्रमे

purā hi gālavonāma maharṣiḥ satyavākchuciḥ ciṁtayānaḥ paraṁ brahma tapastepe nijāśrame

प्राचीन काल में गालव नामक महर्षि, सत्यवादी, पवित्र, परब्रह्म का चिंतन करते हुए अपने आश्रम में तप करते थे।

श्लोक 9 (skanda.3.8.9)

तस्य कन्या महाभागा रूपयौवनशालिनी । नाम्ना कांतिमती बाला व्यचरत्पितुरंतिके

tasya kanyā mahābhāgā rūpayauvanaśālinī nāmnā kāṁtimatī bālā vyacaratpituraṁtike

उनकी कन्या, महाभाग्यशाली, रूप-यौवन से संपन्न, कांतिमती नामक बाला, अपने पिता के समीप विचरण करती थी।

श्लोक 10 (skanda.3.8.10)

आहरंती च पुष्पाणि बल्यर्थं तस्य वै मुनेः । वेदिसंमार्जनादीनि समिदाहरणानि च

āharaṁtī ca puṣpāṇi balyarthaṁ tasya vai muneḥ vedisaṁmārjanādīni samidāharaṇāni ca

उन मुनि के बलि-अर्पण के लिए पुष्प लाते हुए, वेदी की सफाई आदि करते हुए, तथा समिधा लाते हुए —

श्लोक 11 (skanda.3.8.11)

कुर्वती पितरं बाला सम्यक्परिचचार ह । कदाचित्सा तु वल्यर्थं पुष्पाण्याहर्तुमुद्यता

kurvatī pitaraṁ bālā samyakparicacāra ha kadācitsā tu valyarthaṁ puṣpāṇyāhartumudyatā

— इन कार्यों को करती हुई वह बाला अपने पिता की भली-भाँति सेवा करती थी। एक बार बलि के लिए पुष्प लाने को उद्यत होकर —

श्लोक 12 (skanda.3.8.12)

तस्मिन्वने कांतिमती सुदूरमगमत्तदा । तत्र पुष्पाणि रम्याणि समाहृत्य च पेटके

tasminvane kāṁtimatī sudūramagamattadā tatra puṣpāṇi ramyāṇi samāhṛtya ca peṭake

— कांतिमती उस वन में तब बहुत दूर तक चली गई। वहाँ सुंदर पुष्पों को टोकरी में एकत्र करके —

श्लोक 13 (skanda.3.8.13)

तूर्णं निववृते बाला पितृशुश्रूषणे रता । निवर्तमानां तां कन्यां विद्याधरकुमारकौ

tūrṇaṁ nivavṛte bālā pitṛśuśrūṣaṇe ratā nivartamānāṁ tāṁ kanyāṁ vidyādharakumārakau

— पितृ-सेवा में तत्पर वह बाला शीघ्र लौट पड़ी। लौटती हुई उस कन्या को दो विद्याधर कुमारों ने —

श्लोक 14 (skanda.3.8.14)

सुदर्शनसुकर्णाख्यौ विमानस्थौ ददर्शतुः । तां दृष्ट्वा गालवसुतां रूपयौवनशालिनीम्

sudarśanasukarṇākhyau vimānasthau dadarśatuḥ tāṁ dṛṣṭvā gālavasutāṁ rūpayauvanaśālinīm

— जो सुदर्शन और सुकर्ण नामक थे तथा विमान में बैठे थे, देख लिया। गालव की उस रूप-यौवन से संपन्न पुत्री को देखकर,

श्लोक 15 (skanda.3.8.15)

कामस्य पत्नीं ललितां रतिं मूर्तिमतीमिव । सुदर्शनाभिधो ज्येष्ठो विद्याधरकुमारकः

kāmasya patnīṁ lalitāṁ ratiṁ mūrtimatīmiva sudarśanābhidho jyeṣṭho vidyādharakumārakaḥ

— मानो काम की पत्नी ललिता रति की साक्षात् मूर्ति हो — सुदर्शन नामक ज्येष्ठ विद्याधर-कुमार —

श्लोक 16 (skanda.3.8.16)

हर्षसंफुल्लनयनश्चकमे काममोहितः । पूर्णचन्द्राननां तां वै वीक्षमाणो मुहुर्मुहुः

harṣasaṁphullanayanaścakame kāmamohitaḥ pūrṇacandrānanāṁ tāṁ vai vīkṣamāṇo muhurmuhuḥ

— हर्ष से खिले नेत्रों वाला, काम-विमोहित होकर, उसकी पूर्णचंद्र के समान मुख वाली उस कन्या को बार-बार देखते हुए, उसके प्रति आसक्त हो गया।

श्लोक 17 (skanda.3.8.17)

तया रिरंसुकामोऽसौ विमानाग्रादवातरत् । तामुपेत्य मुनेः कन्यामित्युवाच सुदर्शनः

tayā riraṁsukāmo'sau vimānāgrādavātarat tāmupetya muneḥ kanyāmityuvāca sudarśanaḥ

उसके साथ रमण करने की इच्छा से वह विमान के अग्रभाग से उतरा। उस मुनि-कन्या के पास जाकर सुदर्शन ने यह कहा —

श्लोक 18 (skanda.3.8.18)

सुदर्शन उवाच । कासि भद्रे सुता कस्य रूपयौवनशालिनी । रूपमप्रतिमं ह्येतदाह्लादयति मे मनः

sudarśana uvāca kāsi bhadre sutā kasya rūpayauvanaśālinī rūpamapratimaṁ hyetadāhlādayati me manaḥ

सुदर्शन ने कहा — "हे भद्रे, तुम कौन हो, किसकी पुत्री हो, रूप-यौवन से संपन्न? यह तुम्हारा अनुपम रूप मेरे मन को आह्लादित कर रहा है।

श्लोक 19 (skanda.3.8.19)

त्वां दृष्ट्वा रतिसंकाशां बाधते मां मनोभवः । सुकण्ठनामधेयस्य विद्याधरपतेरहम्

tvāṁ dṛṣṭvā ratisaṁkāśāṁ bādhate māṁ manobhavaḥ sukaṇṭhanāmadheyasya vidyādharapateraham

तुम्हें रति के समान देखकर काम मुझे व्याकुल कर रहा है। मैं सुकंठ नामक विद्याधरपति का —

श्लोक 20 (skanda.3.8.20)

आत्मजो रूपसंपन्नो नाम्ना चैव सुदर्शनः । प्रतिगृह्णीष्व मां भद्रे रक्ष मां करुणादृशा

ātmajo rūpasaṁpanno nāmnā caiva sudarśanaḥ pratigṛhṇīṣva māṁ bhadre rakṣa māṁ karuṇādṛśā

— रूपसंपन्न पुत्र हूँ, सुदर्शन नाम से। हे भद्रे, मुझे स्वीकार करो; अपनी करुणा-दृष्टि से मेरी रक्षा करो।

श्लोक 21 (skanda.3.8.21)

भर्तारं मां समासाद्य सर्वान्भोगानवाप्स्यसि । इत्याकर्ण्य वचस्तस्य विद्याधरसुतस्य सा

bhartāraṁ māṁ samāsādya sarvānbhogānavāpsyasi ityākarṇya vacastasya vidyādharasutasya sā

मुझे पति के रूप में पाकर तुम समस्त भोगों को प्राप्त करोगी।" उस विद्याधर-पुत्र के इस वचन को सुनकर वह —

श्लोक 22 (skanda.3.8.22)

तदा कांतिमती वाक्यं धर्मयुक्तमभाषत । सुदर्शन महाभाग विद्याधरपतेः सुत

tadā kāṁtimatī vākyaṁ dharmayuktamabhāṣata sudarśana mahābhāga vidyādharapateḥ suta

— कांतिमती ने तब धर्मयुक्त वचन कहा — "हे महाभाग सुदर्शन, हे विद्याधरपति के पुत्र,

श्लोक 23 (skanda.3.8.23)

आत्मजां मां विजानीहि गालवस्य महात्मनः । कन्या चाहमनूढास्मि पितृशु श्रूषणे रता

ātmajāṁ māṁ vijānīhi gālavasya mahātmanaḥ kanyā cāhamanūḍhāsmi pitṛśu śrūṣaṇe ratā

मुझे महात्मा गालव की पुत्री जानो। मैं अविवाहित कन्या हूँ, पिता की सेवा में तत्पर।

श्लोक 24 (skanda.3.8.24)

बल्यर्थं हि पितुश्चाहं पुष्पाण्याहर्तुमागता । आहरंत्याश्च पुष्पाणि याम एको न्यवर्तत

balyarthaṁ hi pituścāhaṁ puṣpāṇyāhartumāgatā āharaṁtyāśca puṣpāṇi yāma eko nyavartata

मैं अपने पिता के बलि-अर्पण के लिए पुष्प लाने आई हूँ। पुष्प एकत्र करते हुए एक याम (तीन घंटे) व्यतीत हो गया।

श्लोक 25 (skanda.3.8.25)

मद्विलंबेन स मुनिर्देव तार्चनतत्परः । कोपं विधास्यते नूनं तपस्वी मुनिपुंगवः

madvilaṁbena sa munirdeva tārcanatatparaḥ kopaṁ vidhāsyate nūnaṁ tapasvī munipuṁgavaḥ

मेरे विलंब से देव-पूजन में तत्पर वे तपस्वी मुनिश्रेष्ठ निश्चय ही क्रोधित होंगे।

श्लोक 26 (skanda.3.8.26)

तच्छीघ्रमद्य गच्छामि पुष्पाण्यप्याहृतानि मे । कन्याश्च पितुराधीना न स्वतन्त्राः कदाचन

tacchīghramadya gacchāmi puṣpāṇyapyāhṛtāni me kanyāśca piturādhīnā na svatantrāḥ kadācana

अतः मैं अभी शीघ्र जाती हूँ; मेरे पुष्प भी एकत्र हो चुके हैं। और कन्याएँ सदा पिता के अधीन होती हैं, कभी स्वतंत्र नहीं होतीं।

श्लोक 27 (skanda.3.8.27)

यदि मामिच्छति भवान्पितरं मम याचय । इति विद्याधरसुतमुक्त्वा कांतिमती तदा

yadi māmicchati bhavānpitaraṁ mama yācaya iti vidyādharasutamuktvā kāṁtimatī tadā

यदि आप मुझे चाहते हैं, तो मेरे पिता से याचना कीजिए।" यह कहकर विद्याधर-पुत्र से कांतिमती तब —

श्लोक 28 (skanda.3.8.28)

पितुराशंकिता तूर्णमा श्रमं गन्तुमुद्यता । गच्छन्तीं तां समालोक्य विद्याधरकुमारकः

piturāśaṁkitā tūrṇamā śramaṁ gantumudyatā gacchantīṁ tāṁ samālokya vidyādharakumārakaḥ

— अपने पिता की आशंका से शीघ्र आश्रम को जाने के लिए उद्यत हुई। उसे जाते हुए देखकर वह विद्याधर-कुमार —

श्लोक 29 (skanda.3.8.29)

तूर्णं जग्राह केशेषु धावित्वा मदनार्दितः । अभ्येत्य निजकेशेषु गृह्णन्ते तं विलोक्य सा

tūrṇaṁ jagrāha keśeṣu dhāvitvā madanārditaḥ abhyetya nijakeśeṣu gṛhṇante taṁ vilokya sā

— काम से पीड़ित होकर, दौड़कर उसने तुरंत उसे केशों से पकड़ लिया। अपने केशों में उसे इस प्रकार पकड़ते देखकर वह —

श्लोक 30 (skanda.3.8.30)

उच्चैश्चक्रंद सहसा कुररीव मुनेः सुता । अस्माद्विद्याधरसुताज्जनक त्राहि मां विभो

uccaiścakraṁda sahasā kurarīva muneḥ sutā asmādvidyādharasutājjanaka trāhi māṁ vibho

— उस मुनि-कन्या ने सहसा कुररी पक्षी के समान ऊँची पुकार लगाई — "हे पिता, हे विभो, मुझे इस विद्याधर-पुत्र से बचाइए!

श्लोक 31 (skanda.3.8.31)

बलाद्गृह्णाति दुष्टात्मा विद्याधरसुतोऽद्य माम् । इत्थमुच्चैः प्रचुक्रोश स्वाश्रमान्नातिदूरतः

balādgṛhṇāti duṣṭātmā vidyādharasuto'dya mām itthamuccaiḥ pracukrośa svāśramānnātidūrataḥ

यह दुरात्मा विद्याधर-पुत्र आज मुझे बलपूर्वक पकड़ रहा है!" इस प्रकार वह अपने आश्रम से बहुत दूर नहीं, ऊँचे स्वर में पुकारने लगी।

श्लोक 32 (skanda.3.8.32)

तदाक्रंदितमाकर्ण्य गन्धमादनवासिनः । मुनयस्तु पुरस्कृत्य गालवं मुनिपुंगवम्

tadākraṁditamākarṇya gandhamādanavāsinaḥ munayastu puraskṛtya gālavaṁ munipuṁgavam

उस पुकार को सुनकर गंधमादन-निवासी मुनि, मुनिश्रेष्ठ गालव को आगे करके —

श्लोक 33 (skanda.3.8.33)

किमेतदिति विज्ञातुं तं देशं तूर्णमाययुः । तं देशं तु समागत्य सर्वे ते ऋषिपुंगवाः

kimetaditi vijñātuṁ taṁ deśaṁ tūrṇamāyayuḥ taṁ deśaṁ tu samāgatya sarve te ṛṣipuṁgavāḥ

— यह क्या हुआ, यह जानने के लिए शीघ्र उस स्थान पर आए। उस स्थान पर पहुँचकर वे सभी ऋषिश्रेष्ठ —

श्लोक 34 (skanda.3.8.34)

विद्याधरगृहीतां तां ददृशुर्मु निकन्यकाम् । विद्याधरसुतं चान्यमंतिके समुपस्थितम्

vidyādharagṛhītāṁ tāṁ dadṛśurmu nikanyakām vidyādharasutaṁ cānyamaṁtike samupasthitam

— उस मुनि-कन्या को विद्याधर द्वारा पकड़ा हुआ देखा, तथा समीप खड़े दूसरे विद्याधर-पुत्र को भी देखा।

श्लोक 35 (skanda.3.8.35)

एतद्दृष्ट्वा महायोगी गालवो मुनिपुंगवः । गतः कोपवशं किंचिद्दुराप्मानं शशाप तम्

etaddṛṣṭvā mahāyogī gālavo munipuṁgavaḥ gataḥ kopavaśaṁ kiṁciddurāpmānaṁ śaśāpa tam

यह देखकर महायोगी मुनिश्रेष्ठ गालव, कुछ क्षण के लिए क्रोधवश होकर, उस दुष्ट को शाप देने लगे —

श्लोक 36 (skanda.3.8.36)

कृतवानीदृशं कार्यं यत्त्वं विद्याधराधम । तद्याहि मानुषीं योनिं स्वस्य दुष्कर्मणः फलम्

kṛtavānīdṛśaṁ kāryaṁ yattvaṁ vidyādharādhama tadyāhi mānuṣīṁ yoniṁ svasya duṣkarmaṇaḥ phalam

"हे विद्याधरों में नीच, चूँकि तूने ऐसा कार्य किया है, अतः अपने दुष्कर्म के फलस्वरूप मनुष्य-योनि को प्राप्त हो।

श्लोक 37 (skanda.3.8.37)

संप्राप्य मानुषं जन्म बहुदुःखसमाकुलम् । अचिरेण तु कालेन तस्मिन्नेव तु जन्मनि

saṁprāpya mānuṣaṁ janma bahuduḥkhasamākulam acireṇa tu kālena tasminneva tu janmani

बहुत दुःखों से भरे मनुष्य-जन्म को प्राप्त होकर, तथा अल्प समय में ही, उसी जन्म में —

श्लोक 38 (skanda.3.8.38)

मनुष्यैरपि निंद्यं तद्वेतालत्वं प्रयास्यसि । मांसानि शोणितं चैव सर्वदा भक्षयिष्यसि

manuṣyairapi niṁdyaṁ tadvetālatvaṁ prayāsyasi māṁsāni śoṇitaṁ caiva sarvadā bhakṣayiṣyasi

— तू मनुष्यों द्वारा भी निंदनीय उस वेताल-अवस्था को प्राप्त होगा। तू सदा मांस और रक्त का भक्षण करेगा।

श्लोक 39 (skanda.3.8.39)

वेताला राक्षसप्राया बलाद्गृह्णन्ति योषितः । तस्मात्त्वं मानुषो भूत्वा वेतालत्वमवाप्स्यसि

vetālā rākṣasaprāyā balādgṛhṇanti yoṣitaḥ tasmāttvaṁ mānuṣo bhūtvā vetālatvamavāpsyasi

वेताल, राक्षसों के समान, बलपूर्वक स्त्रियों को पकड़ते हैं; अतः तू मनुष्य होकर वेताल-अवस्था को प्राप्त करेगा।

श्लोक 40 (skanda.3.8.40)

तव दुष्कर्मणो योऽसावनुमंता कनिष्ठकः । सुकर्ण इति विख्यातो भविता सोपि मानुषः

tava duṣkarmaṇo yo'sāvanumaṁtā kaniṣṭhakaḥ sukarṇa iti vikhyāto bhavitā sopi mānuṣaḥ

तेरे इस दुष्कर्म का जो अनुमोदक तेरा छोटा भाई है, सुकर्ण नाम से विख्यात, वह भी मनुष्य बनेगा।

श्लोक 41 (skanda.3.8.41)

किंतु साक्षान्न कृतवान्यतोऽसावीदृशीं क्रियाम् । तन्मानुषत्व मेवास्य वेतालत्वं तु नो भवेत्

kiṁtu sākṣānna kṛtavānyato'sāvīdṛśīṁ kriyām tanmānuṣatva mevāsya vetālatvaṁ tu no bhavet

किंतु चूँकि उसने स्वयं प्रत्यक्ष रूप से ऐसा कृत्य नहीं किया, इसलिए उसे केवल मनुष्यत्व ही प्राप्त होगा, वेतालत्व नहीं।

श्लोक 42 (skanda.3.8.42)

विज्ञप्तिकौतुकाभिख्यं यदा विद्याधराधिपम् । द्रक्ष्यतेऽसौ कनिष्ठस्ते तदा शापाद्विमोक्ष्यते

vijñaptikautukābhikhyaṁ yadā vidyādharādhipam drakṣyate'sau kaniṣṭhaste tadā śāpādvimokṣyate

जब तेरा वह छोटा भाई विज्ञप्तिकौतुक नामक विद्याधराधिप को देखेगा, तब वह शाप से मुक्त हो जाएगा।

श्लोक 43 (skanda.3.8.43)

ईदृशस्यतु यः कर्ता महापापस्य कर्मणः । स त्वं संप्राप्य मानुष्यं तस्मिन्नेव तु जन्मनि

īdṛśasyatu yaḥ kartā mahāpāpasya karmaṇaḥ sa tvaṁ saṁprāpya mānuṣyaṁ tasminneva tu janmani

किंतु ऐसे महापाप के कर्ता तू, मनुष्यत्व प्राप्त कर, उसी जन्म में —

श्लोक 44 (skanda.3.8.44)

वेतालजन्म संप्राप्य चिरं लोके चरिष्यसि । इत्युक्त्वा गालवः कन्यां गृहीत्वा मुनिभिः सह

vetālajanma saṁprāpya ciraṁ loke cariṣyasi ityuktvā gālavaḥ kanyāṁ gṛhītvā munibhiḥ saha

— वेताल-जन्म प्राप्त कर दीर्घकाल तक लोक में विचरण करेगा।" यह कहकर गालव अपनी पुत्री को लेकर मुनियों सहित —

श्लोक 45 (skanda.3.8.45)

विद्याधरसुतौ शप्त्वा स्वाश्रमं प्रति निर्ययौ । ततस्तस्मिन्महाभागे निर्याते मुनिपुंगवे

vidyādharasutau śaptvā svāśramaṁ prati niryayau tatastasminmahābhāge niryāte munipuṁgave

— दोनों विद्याधर-पुत्रों को शाप देकर अपने आश्रम की ओर चले गए। फिर उस महाभाग मुनिश्रेष्ठ के चले जाने पर,

श्लोक 46 (skanda.3.8.46)

सुदर्शनसुकर्णाख्यौ विद्याधरपतेः सुतौ । मुनिशापेन दुःखार्तौ चिंतयामासतुर्भृशम्

sudarśanasukarṇākhyau vidyādharapateḥ sutau muniśāpena duḥkhārtau ciṁtayāmāsaturbhṛśam

— सुदर्शन और सुकर्ण नामक विद्याधरपति के दोनों पुत्र, मुनि के शाप से दुःखी होकर, गहन चिंतन करने लगे।

श्लोक 47 (skanda.3.8.47)

कर्तव्यं तौ विनिश्चित्य सुदर्शनसुकर्णकौ । गोविंदस्वामिनामानं यमुनातटवासिनम्

kartavyaṁ tau viniścitya sudarśanasukarṇakau goviṁdasvāmināmānaṁ yamunātaṭavāsinam

सुदर्शन और सुकर्ण ने अपना कर्तव्य निश्चित करके, यमुना-तट के निवासी गोविंदस्वामी नामक —

श्लोक 48 (skanda.3.8.48)

ब्राह्मणं शीलसंपन्नं पितृत्वे परिकल्प्य तौ । परित्यज्य स्वकं रूपमजायेतां तदा त्मजौ

brāhmaṇaṁ śīlasaṁpannaṁ pitṛtve parikalpya tau parityajya svakaṁ rūpamajāyetāṁ tadā tmajau

— सुशील ब्राह्मण को अपना पिता स्थिर करके, अपना स्वरूप त्यागकर, तब उनके पुत्रों के रूप में जन्म ले लिया।

श्लोक 49 (skanda.3.8.49)

विजयाशोकदत्ताख्यौ तस्य पुत्रौबभूवतुः । सुतो विजयदत्ताख्यो ज्येष्ठो जज्ञे सुदर्शनः

vijayāśokadattākhyau tasya putraubabhūvatuḥ suto vijayadattākhyo jyeṣṭho jajñe sudarśanaḥ

विजयदत्त और अशोकदत्त नाम से वे उनके पुत्र बने; सुदर्शन ज्येष्ठ पुत्र विजयदत्त नाम से उत्पन्न हुआ।

श्लोक 50 (skanda.3.8.50)

अशोकदत्तनामा तु सुकर्णश्च कनिष्ठकः । विजयाशोकदत्तौ तु क्रमाद्यौवनमापतुः

aśokadattanāmā tu sukarṇaśca kaniṣṭhakaḥ vijayāśokadattau tu kramādyauvanamāpatuḥ

और सुकर्ण छोटा पुत्र अशोकदत्त नाम से बना। विजयदत्त और अशोकदत्त क्रमशः यौवन को प्राप्त हुए।

श्लोक 51 (skanda.3.8.51)

एतस्मिन्नेव कालेतु यमुनायास्तटे शुभे । अनावृष्ट्या तु दुर्भिक्षमभूद्द्वादशवार्षि कम्

etasminneva kāletu yamunāyāstaṭe śubhe anāvṛṣṭyā tu durbhikṣamabhūddvādaśavārṣi kam

इसी समय, यमुना के शुभ तट पर, अनावृष्टि के कारण बारह वर्षों का दुर्भिक्ष (अकाल) पड़ा।

श्लोक 52 (skanda.3.8.52)

गोविंदस्वामिनामा तु ब्राह्मणो वेदपारगः । दुर्भिक्षोपहतां दृष्ट्वा तदानीं स निजां पुरीम्

goviṁdasvāmināmā tu brāhmaṇo vedapāragaḥ durbhikṣopahatāṁ dṛṣṭvā tadānīṁ sa nijāṁ purīm

वेदपारंगत गोविंदस्वामी नामक ब्राह्मण ने अपनी नगरी को उस समय दुर्भिक्ष से पीड़ित देखकर,

श्लोक 53 (skanda.3.8.53)

प्रययौ काशनिगरं सपुत्रः सह भार्यया । स प्रयागं समासाद्य द्वं दृष्ट्वा महावटम्

prayayau kāśanigaraṁ saputraḥ saha bhāryayā sa prayāgaṁ samāsādya dvaṁ dṛṣṭvā mahāvaṭam

— अपने पुत्रों तथा पत्नी सहित काशी नगर की ओर प्रस्थान किया। प्रयाग पहुँचकर, वहाँ महान वटवृक्ष को देखकर,

श्लोक 54 (skanda.3.8.54)

कपालमालाभरणं सोऽपश्यद्यतिनं पुरः । गोविंदस्वामिनामा तु नमश्चक्रे स तं मुनिम्

kapālamālābharaṇaṁ so'paśyadyatinaṁ puraḥ goviṁdasvāmināmā tu namaścakre sa taṁ munim

— उसने अपने समक्ष कपाल-माला से विभूषित एक यति को देखा। गोविंदस्वामी ने उस मुनि को नमस्कार किया।

श्लोक 55 (skanda.3.8.55)

सपुत्रस्य सभार्यस्य सोऽवादीदाशिषो मुनिः । इदं च वचनं प्राह गोविंदस्वामिनं प्रति

saputrasya sabhāryasya so'vādīdāśiṣo muniḥ idaṁ ca vacanaṁ prāha goviṁdasvāminaṁ prati

उस मुनि ने पुत्रों तथा पत्नी सहित उसे आशीर्वाद दिया; और गोविंदस्वामी से यह वचन कहा —

श्लोक 56 (skanda.3.8.56)

ज्येष्ठेनानेन पुत्रेण सांप्रतं ब्राह्मणोत्तम । क्षिप्रं विजयदत्तेन वियोगस्ते भविष्यति

jyeṣṭhenānena putreṇa sāṁprataṁ brāhmaṇottama kṣipraṁ vijayadattena viyogaste bhaviṣyati

"हे ब्राह्मणोत्तम, अभी शीघ्र ही तुम्हें इस अपने ज्येष्ठ पुत्र विजयदत्त से वियोग होगा।"

श्लोक 57 (skanda.3.8.57)

इति तस्य वचः श्रुत्वा गोविंदस्वामिनामकः । सूर्ये चास्तं गते तत्र सांध्यं कर्म समाप्य च

iti tasya vacaḥ śrutvā goviṁdasvāmināmakaḥ sūrye cāstaṁ gate tatra sāṁdhyaṁ karma samāpya ca

उसका यह वचन सुनकर गोविंदस्वामी नामक वह ब्राह्मण, वहाँ सूर्यास्त होने पर, संध्या-कर्म पूर्ण करके,

श्लोक 58 (skanda.3.8.58)

सभार्यः ससुतो विप्रः सुदूराध्वसमाकुलः । उवास तस्यां शर्वर्य्यां शून्ये वै देवतालये

sabhāryaḥ sasuto vipraḥ sudūrādhvasamākulaḥ uvāsa tasyāṁ śarvaryyāṁ śūnye vai devatālaye

— अपनी पत्नी तथा पुत्रों सहित, लंबी यात्रा से थका हुआ वह ब्राह्मण, उस रात्रि में एक सूने देव-मंदिर में ठहरा।

श्लोक 59 (skanda.3.8.59)

तदा त्वशोकदत्तश्च ब्राह्मणी च समाकुलौ । वस्त्रेणास्तीर्य पृथिवीं रात्रौ निद्रां समापतुः

tadā tvaśokadattaśca brāhmaṇī ca samākulau vastreṇāstīrya pṛthivīṁ rātrau nidrāṁ samāpatuḥ

तब अशोकदत्त तथा ब्राह्मणी, थके हुए, भूमि पर वस्त्र बिछाकर रात्रि में निद्रा में सो गए।

श्लोक 60 (skanda.3.8.60)

ततो विजयदत्तस्तु दूरमार्गविलंघनात् । बभूवात्यंतमलसो भृशं शीतज्वरार्दितः

tato vijayadattastu dūramārgavilaṁghanāt babhūvātyaṁtamalaso bhṛśaṁ śītajvarārditaḥ

किंतु विजयदत्त लंबे मार्ग को पार करने से अत्यंत क्लांत हो गया, तथा शीत-ज्वर से अत्यंत पीड़ित हुआ।

श्लोक 61 (skanda.3.8.61)

गोविंदस्वामिना पित्रा शीतवबाधानिवृत्तये । गाढमालिंग्यमानोऽपि शीतबाधां न सोऽत्यजत्

goviṁdasvāminā pitrā śītavabādhānivṛttaye gāḍhamāliṁgyamāno'pi śītabādhāṁ na so'tyajat

पिता गोविंदस्वामी द्वारा शीत की पीड़ा दूर करने के लिए दृढ़ता से आलिंगन किए जाने पर भी, उसकी शीत-पीड़ा दूर नहीं हुई।

श्लोक 62 (skanda.3.8.62)

बाधतेऽत्यर्थमधुना तात मां शीतलो ज्वरः । एतद्बाधानिवृत्त्यर्थं वह्निमानय मा चिरम्

bādhate'tyarthamadhunā tāta māṁ śītalo jvaraḥ etadbādhānivṛttyarthaṁ vahnimānaya mā ciram

"यह शीत-ज्वर अभी मुझे अत्यंत पीड़ित कर रहा है, हे तात। इस पीड़ा को दूर करने के लिए बिना विलंब के अग्नि लाइए।"

श्लोक 63 (skanda.3.8.63)

इति पुत्रवचः श्रुत्वा सर्वत्राग्निं गवेषयन् । अलब्धवह्निः प्रोवाच पुन रभ्येत्य पुत्रकम्

iti putravacaḥ śrutvā sarvatrāgniṁ gaveṣayan alabdhavahniḥ provāca puna rabhyetya putrakam

पुत्र का यह वचन सुनकर, सर्वत्र अग्नि को खोजते हुए, अग्नि न मिलने पर वह पुनः लौटकर पुत्र से कहने लगा —

श्लोक 64 (skanda.3.8.64)

न वह्निं पुत्र विंदामि मार्गमाणोऽपि सर्वशः । रात्रिमध्ये तु संप्राप्ते द्वारेषु पिहितेषु च

na vahniṁ putra viṁdāmi mārgamāṇo'pi sarvaśaḥ rātrimadhye tu saṁprāpte dvāreṣu pihiteṣu ca

"हे पुत्र, सब कहीं खोजने पर भी मुझे अग्नि नहीं मिली। आधी रात होने पर तथा द्वार बंद होने के कारण,

श्लोक 65 (skanda.3.8.65)

निद्रापरवशाः पौरा नैव दास्यंति पावकम् । इत्थं विजयदत्तोऽसावुक्तः पित्रा ज्वरातुरः

nidrāparavaśāḥ paurā naiva dāsyaṁti pāvakam itthaṁ vijayadatto'sāvuktaḥ pitrā jvarāturaḥ

— नींद में डूबे नगरवासी अग्नि नहीं देंगे।" इस प्रकार अपने पिता द्वारा कहे जाने पर, ज्वर से पीड़ित वह विजयदत्त —

श्लोक 66 (skanda.3.8.66)

ययाचे वह्निमेवासौ पितरं दीनया गिरा । शीतज्वरसमुद्भूतशीतबाधाप्रपीडितम्

yayāce vahnimevāsau pitaraṁ dīnayā girā śītajvarasamudbhūtaśītabādhāprapīḍitam

— शीत-ज्वर से उत्पन्न शीत-पीड़ा से अत्यंत पीड़ित होकर, दीन वाणी में अपने पिता से अग्नि की याचना करने लगा —

श्लोक 67 (skanda.3.8.67)

हिमशीकरवान्वायुर्द्विगुणं बाधतेऽद्य माम् । वह्निर्न लब्ध इति वै मिथ्यैवोक्तं पितस्त्वया

himaśīkaravānvāyurdviguṇaṁ bādhate'dya mām vahnirna labdha iti vai mithyaivoktaṁ pitastvayā

"हिमकणों से युक्त वायु आज मुझे दोगुना पीड़ित कर रही है। हे पिता, आपने अग्नि न मिलने की जो बात कही, वह मिथ्या ही है।

श्लोक 68 (skanda.3.8.68)

दूरादेष पुरोभागे ज्वालामालासमाकुलः । शिखाभिर्लेलिहानोभ्रं दृश्यते पश्य पावकः

dūrādeṣa purobhāge jvālāmālāsamākulaḥ śikhābhirlelihānobhraṁ dṛśyate paśya pāvakaḥ

दूर, आगे की ओर, ज्वाला-मालाओं से युक्त, अपनी शिखाओं से आकाश को चाटती हुई अग्नि दिखाई दे रही है, देखिए।

श्लोक 69 (skanda.3.8.69)

तं वह्निमानय क्षिप्रं तात शीतनिवृत्तये । इत्युक्तवन्तं तं पुत्रं स पिता प्रत्यभाषत

taṁ vahnimānaya kṣipraṁ tāta śītanivṛttaye ityuktavantaṁ taṁ putraṁ sa pitā pratyabhāṣata

हे तात, शीत-निवृत्ति के लिए वह अग्नि शीघ्र ले आइए।" इस प्रकार कहने वाले उस पुत्र को उसके पिता ने उत्तर दिया —

श्लोक 70 (skanda.3.8.70)

नानृतं वच्मि पुत्राद्य सत्यमेव ब्रवीम्यहम् । वह्निमान्योऽयमुद्देशो दूरादेव विलोक्यते

nānṛtaṁ vacmi putrādya satyameva bravīmyaham vahnimānyo'yamuddeśo dūrādeva vilokyate

"हे पुत्र, मैं आज असत्य नहीं कह रहा, मैं सत्य ही कह रहा हूँ। वह अग्नि-चिह्नित स्थान, जो दूर से ही दिखाई दे रहा है,

श्लोक 71 (skanda.3.8.71)

पितृकाननदेशं तं पुत्र जानीहि सांप्रतम् । यद्येषोभ्रंलिहज्वालः पुरस्ताज्ज्वलतेऽनलः

pitṛkānanadeśaṁ taṁ putra jānīhi sāṁpratam yadyeṣobhraṁlihajvālaḥ purastājjvalate'nalaḥ

— हे पुत्र, अभी उसे पितृ-कानन (श्मशान) का स्थान जानो। यदि यह आकाश को चाटती हुई ज्वाला आगे जल रही है —

श्लोक 72 (skanda.3.8.72)

पुत्र वित्रासजनकं तं जानीहि चितानलम् । अमंगलो न सेव्योऽयं चिताग्निः स्पर्शदूषितः

putra vitrāsajanakaṁ taṁ jānīhi citānalam amaṁgalo na sevyo'yaṁ citāgniḥ sparśadūṣitaḥ

— तो हे पुत्र, उसे भयजनक चिता-अग्नि जानो। यह अशुभ है, इसे स्पर्श नहीं करना चाहिए; यह चिता-अग्नि स्पर्श से दूषित है।

श्लोक 73 (skanda.3.8.73)

तस्य चायुःक्षयं याति सेवते यश्चितानलम् । तस्मात्तवायुर्हानिर्मा भूयादिति मया सुत

tasya cāyuḥkṣayaṁ yāti sevate yaścitānalam tasmāttavāyurhānirmā bhūyāditi mayā suta

जो चिता-अग्नि का सेवन करता है, उसकी आयु क्षीण हो जाती है। अतः हे पुत्र, तुम्हारी आयु की हानि न हो, इसीलिए —

श्लोक 74 (skanda.3.8.74)

अमंगलस्तथा स्पृश्यो नानीतोऽयं चितानलः । इत्युक्तवंतं पितरं स दीनः प्रत्यभाषत

amaṁgalastathā spṛśyo nānīto'yaṁ citānalaḥ ityuktavaṁtaṁ pitaraṁ sa dīnaḥ pratyabhāṣata

— यह अशुभ, अस्पृश्य चिता-अग्नि मैंने नहीं लाई।" इस प्रकार कहने वाले पिता को वह दीन पुत्र उत्तर देने लगा —

श्लोक 75 (skanda.3.8.75)

अयं शवानलो वा स्यादध्वरानल एव वा । सर्वथानीयतामेष नोचेन्मे मरणं भवेत्

ayaṁ śavānalo vā syādadhvarānala eva vā sarvathānīyatāmeṣa nocenme maraṇaṁ bhavet

"चाहे यह शव की अग्नि हो अथवा यज्ञ की अग्नि, किसी भी प्रकार इसे लाइए — अन्यथा मेरी मृत्यु हो जाएगी।"

श्लोक 76 (skanda.3.8.76)

पुत्रस्नेहाभिभूतोऽथ समाहर्तुं चितानलम् । गोविंदस्वामिनामा तु श्मशानं शीघ्रमभ्यगात्

putrasnehābhibhūto'tha samāhartuṁ citānalam goviṁdasvāmināmā tu śmaśānaṁ śīghramabhyagāt

पुत्र-स्नेह से अभिभूत होकर, चिता-अग्नि लाने के लिए गोविंदस्वामी शीघ्र श्मशान की ओर गया।

श्लोक 77 (skanda.3.8.77)

गोविंदस्वामिनि गते समाहर्तुं चितानलम् । तूर्णं विजयदत्तोऽपि तदा गच्छंतमन्वयात्

goviṁdasvāmini gate samāhartuṁ citānalam tūrṇaṁ vijayadatto'pi tadā gacchaṁtamanvayāt

चिता-अग्नि लाने के लिए गोविंदस्वामी के जाने पर, विजयदत्त भी तब शीघ्र जाते हुए उसके पीछे चल पड़ा।

श्लोक 78 (skanda.3.8.78)

संप्राप्य तापनिकटं विकीर्णास्थि चितानलम् । आलिंगन्निव सोद्वेगं शनैर्निर्वृतिमाप्तवान्

saṁprāpya tāpanikaṭaṁ vikīrṇāsthi citānalam āliṁganniva sodvegaṁ śanairnirvṛtimāptavān

उस ताप के निकट पहुँचकर, हड्डियों से बिखरी चिता-अग्नि को मानो आलिंगन करते हुए, व्याकुल वह धीरे-धीरे शांति को प्राप्त होने लगा।

श्लोक 79 (skanda.3.8.79)

अथावादीत्स पितरं तदिदं परिवर्तुलम् । अतिदीप्तं विभात्यग्नौ किं रक्तांबुजसन्निभम्

athāvādītsa pitaraṁ tadidaṁ parivartulam atidīptaṁ vibhātyagnau kiṁ raktāṁbujasannibham

तब उसने अपने पिता से कहा — "यह गोल वस्तु, अत्यंत चमकीली, अग्नि में क्या रक्त-कमल के समान चमक रही है?"

श्लोक 80 (skanda.3.8.80)

इति तस्य वचः श्रुत्वा पुत्रस्य ब्राह्मणोत्तमः । निपुणं तं निरूप्यैतद्वचनं पुनरब्रवीत्

iti tasya vacaḥ śrutvā putrasya brāhmaṇottamaḥ nipuṇaṁ taṁ nirūpyaitadvacanaṁ punarabravīt

पुत्र के इस वचन को सुनकर उस ब्राह्मणश्रेष्ठ ने ध्यानपूर्वक उसे देखकर पुनः यह वचन कहा —

श्लोक 81 (skanda.3.8.81)

गोविंदस्वाम्युवाच । एतत्कपालमनलज्वालावलयवर्तुलम् । वसाकीकसमांसाढ्यमेतद्रक्तांबुजोपमम्

goviṁdasvāmyuvāca etatkapālamanalajvālāvalayavartulam vasākīkasamāṁsāḍhyametadraktāṁbujopamam

गोविंदस्वामी ने कहा — "यह अग्नि-ज्वाला के मंडल से गोल, वसा-हड्डी-मांस से भरा हुआ, रक्त-कमल के समान दिखने वाला — यह एक कपाल (खोपड़ी) है।

श्लोक 82 (skanda.3.8.82)

द्विजस्य सूनुः श्रुत्वेति काष्ठाग्रेण जघान तत् । येन तत्स्फुटनोद्गीर्णवसासिक्तमुखोऽभवत्

dvijasya sūnuḥ śrutveti kāṣṭhāgreṇa jaghāna tat yena tatsphuṭanodgīrṇavasāsiktamukho'bhavat

यह सुनकर उस ब्राह्मण-पुत्र ने लकड़ी के सिरे से उस पर प्रहार किया, जिससे उसके फूटने पर निकली वसा से उसका मुख भीग गया।

श्लोक 83 (skanda.3.8.83)

कपालघट्टनाद्रक्तं यत्संसक्तं मुखे तदा । जिह्वया लेलिहानोऽसौ मुहुस्तद्रक्तमा स्वदत्

kapālaghaṭṭanādraktaṁ yatsaṁsaktaṁ mukhe tadā jihvayā lelihāno'sau muhustadraktamā svadat

कपाल के प्रहार से जो रक्त उसके मुख पर लग गया, उसे वह अपनी जीभ से बार-बार चाटकर स्वाद लेने लगा।

श्लोक 84 (skanda.3.8.84)

आस्वाद्यैवं समादाय तत्कपालं समाकुलः । पीत्वा वसां महाकायो बभूवातिभयंकरः

āsvādyaivaṁ samādāya tatkapālaṁ samākulaḥ pītvā vasāṁ mahākāyo babhūvātibhayaṁkaraḥ

इस प्रकार स्वाद लेकर, उस कपाल को उठाकर, व्याकुल होकर, उसकी वसा को पीकर, वह विशालकाय, अत्यंत भयंकर हो गया।

श्लोक 85 (skanda.3.8.85)

सद्यो वेता लतां प्राप तीक्ष्णदंष्ट्रस्तदा निशि । तस्याट्टहासघोषेण दिशश्च प्रदिशस्तदा

sadyo vetā latāṁ prāpa tīkṣṇadaṁṣṭrastadā niśi tasyāṭṭahāsaghoṣeṇa diśaśca pradiśastadā

वह तत्काल ही, उस रात्रि में, तीक्ष्ण दाढ़ों वाला वेताल बन गया। उसके अट्टहास की ध्वनि से दिशाएँ और उपदिशाएँ तब —

श्लोक 86 (skanda.3.8.86)

द्यौरतरिक्षं भूमिश्च स्फुटिता इव सर्वशः । तस्मिन्वेगात्समाकृष्य पितरं हन्तुमुद्यते

dyauratarikṣaṁ bhūmiśca sphuṭitā iva sarvaśaḥ tasminvegātsamākṛṣya pitaraṁ hantumudyate

— मानो सर्वत्र स्वर्ग, अंतरिक्ष और पृथ्वी फट पड़ीं। उस स्थिति में उसने वेगपूर्वक अपने पिता को पकड़कर मारने का उद्यम किया,

श्लोक 87 (skanda.3.8.87)

मा कृथाः साहसमिति प्रादुरासीद्वचो दिवि । स दिव्यां गिरमाकर्ण्य वेतालोऽतिभयंकरः

mā kṛthāḥ sāhasamiti prādurāsīdvaco divi sa divyāṁ giramākarṇya vetālo'tibhayaṁkaraḥ

— तभी आकाश से यह वाणी हुई — "यह दुःसाहस मत कर!" उस दिव्य वाणी को सुनकर वह अत्यंत भयंकर वेताल —

श्लोक 88 (skanda.3.8.88)

पितरं तं परित्यज्य महावेगसमन्वितः । तूर्णमाकाशमाविश्य प्रययावस्खलद्गतिः

pitaraṁ taṁ parityajya mahāvegasamanvitaḥ tūrṇamākāśamāviśya prayayāvaskhaladgatiḥ

— उस पिता को छोड़कर, अत्यंत वेगपूर्वक तुरंत आकाश में प्रविष्ट होकर अस्खलित गति से चला गया।

श्लोक 89 (skanda.3.8.89)

स गत्वा दूरमध्वानं वेतालैः सह संगतः । तमागतं समालोक्य वेतोलास्सर्व एव ते

sa gatvā dūramadhvānaṁ vetālaiḥ saha saṁgataḥ tamāgataṁ samālokya vetolāssarva eva te

वह दूर तक मार्ग तय करके अन्य वेतालों के साथ मिला। उसे आते हुए देखकर वे सभी वेताल —

श्लोक 90 (skanda.3.8.90)

कपालस्फोटनादेष वेतालत्वं यदाप्तवान् । कपालस्फोटनामानमाह्वयांचक्रिरे ततः

kapālasphoṭanādeṣa vetālatvaṁ yadāptavān kapālasphoṭanāmānamāhvayāṁcakrire tataḥ

— चूँकि उसने कपाल फोड़ने से वेतालत्व प्राप्त किया था, इसलिए उन्होंने उसे कपालस्फोटन नाम से पुकारा।

श्लोक 91 (skanda.3.8.91)

ततः कपालस्फोटो ऽसौ वेतालैः सर्वतो वृतः । नरास्थिभूषणाख्यस्य सद्यो वेतालभूपतेः

tataḥ kapālasphoṭo 'sau vetālaiḥ sarvato vṛtaḥ narāsthibhūṣaṇākhyasya sadyo vetālabhūpateḥ

तब वह कपालस्फोट, समस्त वेतालों से घिरा हुआ, नरास्थिभूषण नामक वेताल-राजा के —

श्लोक 92 (skanda.3.8.92)

अन्तिकं सहसा प्राप महाबलसमन्वितः । नरास्थिभूषणश्चैनं सेनाप तिमकल्पयत्

antikaṁ sahasā prāpa mahābalasamanvitaḥ narāsthibhūṣaṇaścainaṁ senāpa timakalpayat

— समीप शीघ्र पहुँच गया, महाबल से युक्त होकर। और नरास्थिभूषण ने उसे अपना सेनापति नियुक्त किया।

श्लोक 93 (skanda.3.8.93)

तं कदाचित्तु गन्धर्वश्चित्रसेनाभिधो बली । नरास्थिभूषणं संख्ये न्यवधीत्सोऽपि संस्थितः

taṁ kadācittu gandharvaścitrasenābhidho balī narāsthibhūṣaṇaṁ saṁkhye nyavadhītso'pi saṁsthitaḥ

एक बार चित्रसेन नामक बलवान गंधर्व ने युद्ध में उस नरास्थिभूषण का, जो डटा हुआ था, वध कर दिया।

श्लोक 94 (skanda.3.8.94)

नरास्थिभूषणे तस्मि न्गन्धर्वेण हते युधि । तदा कपालस्फोटोऽसौ तत्पदं समवाप्तवान्

narāsthibhūṣaṇe tasmi ngandharveṇa hate yudhi tadā kapālasphoṭo'sau tatpadaṁ samavāptavān

उस नरास्थिभूषण के गंधर्व द्वारा युद्ध में मारे जाने पर, तब वह कपालस्फोट उसके पद को प्राप्त हुआ।

श्लोक 95 (skanda.3.8.95)

विद्याधरेन्द्रस्य सुतः सुदर्शनो मनुष्यतां वै प्रथमं स गत्वा । वेतालतां प्राप्य महर्षिशापात्क्रमाच्च वेतालपतिर्बभूव

vidyādharendrasya sutaḥ sudarśano manuṣyatāṁ vai prathamaṁ sa gatvā vetālatāṁ prāpya maharṣiśāpātkramācca vetālapatirbabhūva

विद्याधरेन्द्र का पुत्र सुदर्शन, पहले मनुष्यत्व को प्राप्त होकर, तथा महर्षि के शाप से वेतालत्व को प्राप्त होकर, क्रमशः वेतालों का स्वामी बन गया।

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