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ब्रह्म खण्ड · अध्याय 9

अशोकदत्त-चरित तथा वेताल-मुक्ति का वर्णन

अध्याय 8अध्याय-सूचीअध्याय 10

श्लोक 1 (skanda.3.9.1)

ततः स विप्रः प्रत्यूषे पुत्रशोकेन पीडितः । अशोक दत्तसंयुक्तो भार्यया विललाप ह

tataḥ sa vipraḥ pratyūṣe putraśokena pīḍitaḥ aśoka dattasaṁyukto bhāryayā vilalāpa ha

तब वह ब्राह्मण, प्रातःकाल पुत्र-शोक से पीड़ित होकर, अशोकदत्त तथा अपनी पत्नी सहित विलाप करने लगा।

श्लोक 2 (skanda.3.9.2)

विलपंतं समालोक्य गोविंदस्वामिनं द्विजाः । वणिक्समुद्रदत्ताख्यः समानिन्ये निजं गृहम्

vilapaṁtaṁ samālokya goviṁdasvāminaṁ dvijāḥ vaṇiksamudradattākhyaḥ samāninye nijaṁ gṛham

हे द्विजो, विलाप करते गोविंदस्वामी को देखकर समुद्रदत्त नामक एक व्यापारी उसे अपने घर ले गया।

श्लोक 3 (skanda.3.9.3)

समानीय समाश्वास्य दयायुक्तो वणिग्वरः । स्वधनानां हि सर्वेषां रक्षितारमकल्पयत्

samānīya samāśvāsya dayāyukto vaṇigvaraḥ svadhanānāṁ hi sarveṣāṁ rakṣitāramakalpayat

उसे लाकर, सांत्वना देकर, दयालु उस श्रेष्ठ व्यापारी ने उसे अपने समस्त धन का रक्षक नियुक्त कर दिया।

श्लोक 4 (skanda.3.9.4)

स्मरन्महायतिवचः पुत्रदर्शनलालसः । स तस्थौ वणिजो गेहे पुत्रभार्यासमन्वितः

smaranmahāyativacaḥ putradarśanalālasaḥ sa tasthau vaṇijo gehe putrabhāryāsamanvitaḥ

उस महायति के वचन का स्मरण करते हुए, पुत्र-दर्शन की लालसा से युक्त होकर, वह अपने पुत्र और पत्नी सहित व्यापारी के घर में रहने लगा।

श्लोक 5 (skanda.3.9.5)

अशोकदत्तनामा तु द्वितीयो विप्रनंदनः । शस्त्रे चैव तथा शास्त्रे बभूवातिविचक्षणः

aśokadattanāmā tu dvitīyo vipranaṁdanaḥ śastre caiva tathā śāstre babhūvātivicakṣaṇaḥ

दूसरा ब्राह्मण-पुत्र, अशोकदत्त नाम से, शस्त्र-विद्या में तथा शास्त्र-विद्या में भी अत्यंत निपुण हो गया।

श्लोक 6 (skanda.3.9.6)

तथान्यास्वपि विद्यासु नास्ति तत्सदृशो भुवि । कृतविद्यो द्विजसुतः प्रख्यातो नगरेऽभवत्

tathānyāsvapi vidyāsu nāsti tatsadṛśo bhuvi kṛtavidyo dvijasutaḥ prakhyāto nagare'bhavat

उसी प्रकार अन्य विद्याओं में भी पृथ्वी पर उसके समान कोई नहीं था। विद्या-संपन्न वह ब्राह्मण-पुत्र नगर में विख्यात हो गया।

श्लोक 7 (skanda.3.9.7)

अत्रांतरे नरपतिं प्रतापमुकुटाभिधम् । काशीदेशाधिपो मल्लः कश्चिदभ्याययौ बली

atrāṁtare narapatiṁ pratāpamukuṭābhidham kāśīdeśādhipo mallaḥ kaścidabhyāyayau balī

इसी बीच काशी देश के अधिपति, कोई बलवान मल्ल, प्रतापमुकुट नामक राजा के पास आया।

श्लोक 8 (skanda.3.9.8)

प्रतापमुकुटो राजा मल्लस्यास्य जयाय सः । बलिनं द्विजपुत्रं तमाह्वयामास भृत्यकैः

pratāpamukuṭo rājā mallasyāsya jayāya saḥ balinaṁ dvijaputraṁ tamāhvayāmāsa bhṛtyakaiḥ

राजा प्रतापमुकुट ने इस मल्ल को जीतने के लिए, उस बलवान ब्राह्मण-पुत्र को अपने सेवकों द्वारा बुलवाया।

श्लोक 9 (skanda.3.9.9)

तमागतं समालोक्य प्रतापमुकुटोऽब्रवीत् । अशोकदत्त सहसा मल्लमेनं बलोत्कटम्

tamāgataṁ samālokya pratāpamukuṭo'bravīt aśokadatta sahasā mallamenaṁ balotkaṭam

उसे आया देखकर प्रतापमुकुट ने कहा — "हे अशोकदत्त, तुरंत ही इस बलोत्कट मल्ल को —

श्लोक 10 (skanda.3.9.10)

दुर्जयं जहि संग्रामे त्वं वै वलवतां वरः । दाक्षिणात्यमहामल्लपतावस्मिञ्जिते त्वया

durjayaṁ jahi saṁgrāme tvaṁ vai valavatāṁ varaḥ dākṣiṇātyamahāmallapatāvasmiñjite tvayā

— दुर्जय संग्राम में तुम पराजित करो; तुम बलवानों में श्रेष्ठ हो। इस दाक्षिणात्य महामल्लपति के तुम्हारे द्वारा पराजित हो जाने पर,

श्लोक 11 (skanda.3.9.11)

यदिष्टं तव तत्सर्वं दास्याम्यहं न संशयः । इति तस्य वचः श्रुत्वा वलवान्द्विजनंदनः

yadiṣṭaṁ tava tatsarvaṁ dāsyāmyahaṁ na saṁśayaḥ iti tasya vacaḥ śrutvā valavāndvijanaṁdanaḥ

— जो कुछ तुम चाहोगे, वह सब मैं तुम्हें दूँगा, इसमें संदेह नहीं।" उसका यह वचन सुनकर वह बलवान ब्राह्मण-पुत्र —

श्लोक 12 (skanda.3.9.12)

दाक्षिणात्यमहामल्लनृपतिं समताडयत् । ताडितो द्विजपुत्रेण मल्लः स बलिना बली

dākṣiṇātyamahāmallanṛpatiṁ samatāḍayat tāḍito dvijaputreṇa mallaḥ sa balinā balī

— उस दाक्षिणात्य महामल्ल राजा पर प्रहार किया। उस बलशाली ब्राह्मण-पुत्र द्वारा आहत हुआ वह बलवान मल्ल —

श्लोक 13 (skanda.3.9.13)

सद्यो विवृत्तनयनः परासुर्न्यपतद्भुवि । द्विज पुत्रस्य तत्कर्म देवैरपि सुदुष्करम्

sadyo vivṛttanayanaḥ parāsurnyapatadbhuvi dvija putrasya tatkarma devairapi suduṣkaram

— तुरंत आँखें उलटकर, प्राणहीन होकर, भूमि पर गिर पड़ा। ब्राह्मण-पुत्र का वह कार्य देवताओं के लिए भी अत्यंत दुष्कर था।

श्लोक 14 (skanda.3.9.14)

प्रतापमुकुटो दृष्ट्वा प्रसन्नहृदयोऽभवत् । दत्त्वा वहुधनान्ग्रामान्समीपेऽस्थापयत्तदा

pratāpamukuṭo dṛṣṭvā prasannahṛdayo'bhavat dattvā vahudhanāngrāmānsamīpe'sthāpayattadā

प्रतापमुकुट यह देखकर हृदय से प्रसन्न हो गया; उसे बहुत धन तथा गाँव देकर उसे तब अपने समीप बसा लिया।

श्लोक 15 (skanda.3.9.15)

स कदाचिन्महाराज सहितो द्विजसूनुना । संध्यायां विजने देशे चचार तुरगेण वै

sa kadācinmahārāja sahito dvijasūnunā saṁdhyāyāṁ vijane deśe cacāra turageṇa vai

एक बार, हे महाराज, ब्राह्मण-पुत्र के साथ वह संध्या के समय एकांत स्थान में घोड़े पर सवार होकर घूमने लगा।

श्लोक 16 (skanda.3.9.16)

द्विजसूनुसखस्तत्र दीनां वाणीमथाशृणोत् । राजन्नल्पापराधोऽहं शत्रुप्रेरणयासकृत्

dvijasūnusakhastatra dīnāṁ vāṇīmathāśṛṇot rājannalpāparādho'haṁ śatrupreraṇayāsakṛt

वहाँ ब्राह्मण-पुत्र, राजा के मित्र ने, एक दीन वाणी सुनी — "हे राजन्, मैं अल्प अपराधी हूँ; शत्रु की बार-बार की प्रेरणा से —

श्लोक 17 (skanda.3.9.17)

दण्डपालेन निहितः शूले निर्घृणचेतसा । दिनमद्य चतुर्थं मे शूलस्थस्यैव जीवतः

daṇḍapālena nihitaḥ śūle nirghṛṇacetasā dinamadya caturthaṁ me śūlasthasyaiva jīvataḥ

— निर्दयी दंडपाल ने मुझे शूल पर चढ़ा दिया है। आज मुझे शूल पर चढ़े हुए जीवित रहते चौथा दिन है।

श्लोक 18 (skanda.3.9.18)

प्राणाः सुखेन निर्यांति न हि दुष्कृतकर्मणाम् । भृशं मां बाधते तृष्णा तां निवारय भूपते

prāṇāḥ sukhena niryāṁti na hi duṣkṛtakarmaṇām bhṛśaṁ māṁ bādhate tṛṣṇā tāṁ nivāraya bhūpate

दुष्कर्मियों के प्राण आसानी से नहीं निकलते। मुझे प्यास अत्यंत सता रही है; हे भूपते, उसे शांत कीजिए।"

श्लोक 19 (skanda.3.9.19)

इति दीनां समाकर्ण्य वाचं राजा द्विजा त्मजम् । अशोकदत्तनामानं धैर्यवंतमभाषत

iti dīnāṁ samākarṇya vācaṁ rājā dvijā tmajam aśokadattanāmānaṁ dhairyavaṁtamabhāṣata

इस दीन वाणी को सुनकर राजा ने धैर्यवान ब्राह्मण-पुत्र अशोकदत्त से कहा —

श्लोक 20 (skanda.3.9.20)

अस्मै निरपराधाय शूलप्रोताय जंतवे । तृष्णार्दिताय दातव्यं द्विजसूनो त्वया जलम्

asmai niraparādhāya śūlaprotāya jaṁtave tṛṣṇārditāya dātavyaṁ dvijasūno tvayā jalam

"हे ब्राह्मण-पुत्र, इस निर्दोष, शूल पर चढ़े, प्यास से पीड़ित प्राणी को तुम्हें जल देना चाहिए।"

श्लोक 21 (skanda.3.9.21)

इत्यादिष्टो नरेन्द्रेण सहसा द्विजनन्दनः । जलपूर्णं समादाय कलशं वेगवान्ययौ

ityādiṣṭo narendreṇa sahasā dvijanandanaḥ jalapūrṇaṁ samādāya kalaśaṁ vegavānyayau

राजा द्वारा इस प्रकार आदेश दिए जाने पर, ब्राह्मण-पुत्र जल से भरा कलश लेकर तुरंत ही वेगपूर्वक चल पड़ा।

श्लोक 22 (skanda.3.9.22)

तच्छ्मशानं समासाद्य भूतवेतालसंकुलम् । शूलप्रोताय वै तस्मै जलं दातुं समुत्सुकः

tacchmaśānaṁ samāsādya bhūtavetālasaṁkulam śūlaprotāya vai tasmai jalaṁ dātuṁ samutsukaḥ

भूत-वेतालों से भरे उस श्मशान में पहुँचकर, उस शूल पर चढ़े व्यक्ति को जल देने के लिए उत्सुक होकर,

श्लोक 23 (skanda.3.9.23)

ददर्शाथ स्थितां नारीं नवयौवनशालिनीम् । उदैक्षत महाकांतिं मूर्तामिव रतिं द्विजः

dadarśātha sthitāṁ nārīṁ navayauvanaśālinīm udaikṣata mahākāṁtiṁ mūrtāmiva ratiṁ dvijaḥ

— उसने वहाँ खड़ी नवयौवना स्त्री को देखा। उस ब्राह्मण ने उसे मानो साक्षात् रति की मूर्ति के समान महाकांतिमयी देखा।

श्लोक 24 (skanda.3.9.24)

तामालोक्य ततः प्राह धैर्यवान्द्विजनंदनः । कासि भद्रे वरारोहे श्मशाने विजने स्थिता

tāmālokya tataḥ prāha dhairyavāndvijanaṁdanaḥ kāsi bhadre varārohe śmaśāne vijane sthitā

उसे देखकर धैर्यवान ब्राह्मण-पुत्र ने तब कहा — "हे भद्रे, हे वरारोहे, तुम इस एकांत श्मशान में खड़ी होकर कौन हो?

श्लोक 25 (skanda.3.9.25)

अस्याधस्तात्किमर्थं त्वं शूलप्रोतस्य तिष्ठसि । इति तस्य वचः श्रुत्वा सा प्राह रुचिरानना

asyādhastātkimarthaṁ tvaṁ śūlaprotasya tiṣṭhasi iti tasya vacaḥ śrutvā sā prāha rucirānanā

तुम इस शूल पर चढ़े हुए के नीचे किस कारण खड़ी हो?" उसका यह वचन सुनकर सुंदर मुख वाली वह बोली —

श्लोक 26 (skanda.3.9.26)

पुरुषो वल्लभोऽयं मे शूले राज्ञा समर्पितः । धनं यथा च कृपणः पश्य प्राणान्न मुंचति

puruṣo vallabho'yaṁ me śūle rājñā samarpitaḥ dhanaṁ yathā ca kṛpaṇaḥ paśya prāṇānna muṁcati

"यह मेरा प्रियतम पुरुष है, जिसे राजा ने शूल पर चढ़ाया है। देखो, कंजूस अपने धन की तरह, यह अपने प्राणों को नहीं छोड़ रहा।

श्लोक 27 (skanda.3.9.27)

आसन्नमरणं चैनमनुयातुमिह स्थिता । तृषितो याचते वारि मामयं व्यथते मुहुः

āsannamaraṇaṁ cainamanuyātumiha sthitā tṛṣito yācate vāri māmayaṁ vyathate muhuḥ

उसकी मृत्यु समीप जानकर उसके साथ जाने के लिए मैं यहाँ खड़ी हूँ। प्यासा होकर यह मुझसे जल माँगता है; यह बार-बार मुझे व्याकुल कर रहा है।

श्लोक 28 (skanda.3.9.28)

शूलप्रोतो द्धतग्रीवं मुमूर्षुं प्राणनायकम् । नास्मि पाययितुं शक्ता जलमेनमधःस्थिता

śūlaproto ddhatagrīvaṁ mumūrṣuṁ prāṇanāyakam nāsmi pāyayituṁ śaktā jalamenamadhaḥsthitā

शूल पर चढ़े, गर्दन झुकाए, मरणासन्न मेरे प्राणनाथ को — मैं नीचे खड़ी होकर जल पिलाने में समर्थ नहीं हूँ।"

श्लोक 29 (skanda.3.9.29)

अशोकदत्तस्तच्छ्रुत्वा करुणावरुणालयः । तत्कालसदृशं वाक्यं तां वधूमब्रवीत्तदा

aśokadattastacchrutvā karuṇāvaruṇālayaḥ tatkālasadṛśaṁ vākyaṁ tāṁ vadhūmabravīttadā

यह सुनकर करुणा के सागर अशोकदत्त ने उस स्त्री से तब उस अवसर के अनुरूप यह वचन कहा —

श्लोक 30 (skanda.3.9.30)

अशोकदत्त उवाच । मातर्मत्स्कंधमारुह्य देह्यस्मै शीतलं जलम् । सा तथेति तमाभाष्य तरुणी त्वरयान्विता

aśokadatta uvāca mātarmatskaṁdhamāruhya dehyasmai śītalaṁ jalam sā tatheti tamābhāṣya taruṇī tvarayānvitā

अशोकदत्त ने कहा — "हे माता, मेरे कंधे पर चढ़कर इसे शीतल जल दो।" "ऐसा ही हो" कहकर वह युवती शीघ्रतापूर्वक —

श्लोक 31 (skanda.3.9.31)

आनम्रवपुषस्तस्य स्कंधं पद्भ्यां रुरोह वै । द्विजसूनुर्ददर्शाथ शोणितं नूतनं पतत्

ānamravapuṣastasya skaṁdhaṁ padbhyāṁ ruroha vai dvijasūnurdadarśātha śoṇitaṁ nūtanaṁ patat

— अपने पैरों से उसके झुके हुए शरीर के कंधे पर चढ़ गई। ब्राह्मण-पुत्र ने तब ताजा रक्त टपकते देखा।

श्लोक 32 (skanda.3.9.32)

किमेतदिति सोपश्यदुन्नम्य सहसा मुखम् । भक्ष्यमाणं तया तत्स विज्ञाय द्विजनंदनः

kimetaditi sopaśyadunnamya sahasā mukham bhakṣyamāṇaṁ tayā tatsa vijñāya dvijanaṁdanaḥ

"यह क्या है?" — यह सोचकर उसने सहसा मुख ऊपर उठाकर देखा। यह जानकर कि वह उस (आदमी) को खा रही है, ब्राह्मण-पुत्र ने —

श्लोक 33 (skanda.3.9.33)

अशोकदत्तो जग्राह तस्याः पादं सनूपुरम् । ततोऽगान्नूपुरं त्यक्त्वा बद्धरत्नं विहाय तत्

aśokadatto jagrāha tasyāḥ pādaṁ sanūpuram tato'gānnūpuraṁ tyaktvā baddharatnaṁ vihāya tat

— अशोकदत्त ने उसके पैर को, जिसमें नूपुर पहना था, पकड़ लिया। तब वह उस मणि-जड़ित नूपुर को छोड़कर, त्यागकर चली गई।

श्लोक 34 (skanda.3.9.34)

प्रत्युप्तानेकरत्नाढ्यं तदादायच नूपुरम् । अशोकदत्तः प्रययौ तच्छ्मशानान्नृपांतिकम्

pratyuptānekaratnāḍhyaṁ tadādāyaca nūpuram aśokadattaḥ prayayau tacchmaśānānnṛpāṁtikam

अनेक रत्नों से जड़ित उस नूपुर को लेकर अशोकदत्त उस श्मशान से राजा के समीप गया।

श्लोक 35 (skanda.3.9.35)

स्मशानवृत्तं तत्सर्वं स नृपाय निवेद्य वै । महार्घ्यरत्नप्रत्युप्तं नूपुरं च ददौ तदा

smaśānavṛttaṁ tatsarvaṁ sa nṛpāya nivedya vai mahārghyaratnapratyuptaṁ nūpuraṁ ca dadau tadā

श्मशान का सारा वृत्तांत राजा को बताकर, उसने तब उस बहुमूल्य रत्न-जड़ित नूपुर को भी उन्हें दे दिया।

श्लोक 36 (skanda.3.9.36)

ज्ञात्वा तद्वीरचरितं वीरैरन्यैः सुदुष्करम् । ददौ मदनलेखाख्यां सुतां तस्मै महीपतिः

jñātvā tadvīracaritaṁ vīrairanyaiḥ suduṣkaram dadau madanalekhākhyāṁ sutāṁ tasmai mahīpatiḥ

उस वीर-चरित्र को, जो अन्य वीरों के लिए भी अत्यंत दुष्कर था, जानकर राजा ने उसे अपनी पुत्री मदनलेखा प्रदान कर दी।

श्लोक 37 (skanda.3.9.37)

कदाचिदथ ताद्दिव्यं नूपुरं वीक्ष्य भूपतिः । अस्य नूपुरवर्यस्य तुल्यं वै नूपुरांतरम्

kadācidatha tāddivyaṁ nūpuraṁ vīkṣya bhūpatiḥ asya nūpuravaryasya tulyaṁ vai nūpurāṁtaram

एक बार उस दिव्य नूपुर को देखकर राजा ने आदरपूर्वक सोचा — "इस उत्तम नूपुर के समान दूसरा नूपुर —

श्लोक 38 (skanda.3.9.38)

कुतो वा लभ्यत इति सादरं समचिंतयत् । अशोकदत्तस्तु तदा विज्ञाय नृपकांक्षितम्

kuto vā labhyata iti sādaraṁ samaciṁtayat aśokadattastu tadā vijñāya nṛpakāṁkṣitam

— कहाँ से प्राप्त हो सकता है?" तब अशोकदत्त ने राजा की उस इच्छा को जानकर —

श्लोक 39 (skanda.3.9.39)

नृपुरांतरसि द्ध्यर्थं चिंतयामास चेतसा । श्मशाने नूपुरमिदं यतः प्राप्तं मया पुरा

nṛpurāṁtarasi ddhyarthaṁ ciṁtayāmāsa cetasā śmaśāne nūpuramidaṁ yataḥ prāptaṁ mayā purā

— मन में एक मिलते-जुलते नूपुर की प्राप्ति के विषय में विचार करने लगा — "यह नूपुर मुझे पहले श्मशान में जहाँ प्राप्त हुआ था —

श्लोक 40 (skanda.3.9.40)

तां नूपुरांतरप्राप्त्यै कुत्र द्रक्ष्यामि सांप्रतम् । इत्थं वितर्क्य बहुधा नि श्चिकाय महामतिः

tāṁ nūpurāṁtaraprāptyai kutra drakṣyāmi sāṁpratam itthaṁ vitarkya bahudhā ni ścikāya mahāmatiḥ

— उसी को अब कहाँ दूसरे नूपुर की प्राप्ति के लिए देखूँ?" इस प्रकार बहुत विचार करके उस महामति ने निश्चय किया —

श्लोक 41 (skanda.3.9.41)

विक्रेष्यामि महामांसं समेत्य पितृकाननम् । तत्र राक्षसवेतालपिशाचादिषु सर्वशः

vikreṣyāmi mahāmāṁsaṁ sametya pitṛkānanam tatra rākṣasavetālapiśācādiṣu sarvaśaḥ

"मैं श्मशान में जाकर महामांस बेचूँगा। वहाँ समस्त राक्षसों, वेतालों, पिशाचों आदि को —

श्लोक 42 (skanda.3.9.42)

मंत्रैराहूयमानेषु साप्यायास्य ति राक्षसी । तामागतां बलाद्गृह्य तद्ग्रहीष्यामि नूपुरम्

maṁtrairāhūyamāneṣu sāpyāyāsya ti rākṣasī tāmāgatāṁ balādgṛhya tadgrahīṣyāmi nūpuram

— मंत्रों द्वारा आह्वान करने पर वह राक्षसी भी आएगी। उसके आने पर बलपूर्वक पकड़कर मैं वह नूपुर ले लूँगा।"

श्लोक 43 (skanda.3.9.43)

राक्षसानां सहस्रं वा पिशाचानां तथायुतम् । वेतालानां तथा कोटिर्न लक्ष्यं बलिनो मम

rākṣasānāṁ sahasraṁ vā piśācānāṁ tathāyutam vetālānāṁ tathā koṭirna lakṣyaṁ balino mama

"राक्षसों का सहस्र हो, पिशाचों का दस सहस्र हो, अथवा वेतालों का करोड़ भी हो — मुझ बलवान के लिए वे कुछ नहीं हैं।"

श्लोक 44 (skanda.3.9.44)

इति निश्चित्य मनसा श्मशानं सहसा ययौ । विक्रीणानो महामांसं मंत्रैराहूय राक्षसान्

iti niścitya manasā śmaśānaṁ sahasā yayau vikrīṇāno mahāmāṁsaṁ maṁtrairāhūya rākṣasān

इस प्रकार मन में निश्चय करके वह तुरंत श्मशान गया; मंत्रों से राक्षसों को बुलाकर महामांस बेचते हुए,

श्लोक 45 (skanda.3.9.45)

गृहाणेत्युच्चया वाचा चचार श्रावयन्दि शः । विक्रीयते महामांसं गृह्यतांगृह्यतामिति

gṛhāṇetyuccayā vācā cacāra śrāvayandi śaḥ vikrīyate mahāmāṁsaṁ gṛhyatāṁgṛhyatāmiti

— "इसे ग्रहण करो!" ऊँचे स्वर में कहते हुए वह दिशाओं को सुनाते हुए विचरण करने लगा — "महामांस बिक रहा है, ग्रहण करो, ग्रहण करो!"

श्लोक 46 (skanda.3.9.46)

तत्र राक्षसवेतालाः कंकालाश्च पिशाचकाः । अन्ये च भूतनिवहाः समाजग्मुः प्रहर्षिताः

tatra rākṣasavetālāḥ kaṁkālāśca piśācakāḥ anye ca bhūtanivahāḥ samājagmuḥ praharṣitāḥ

वहाँ राक्षस, वेताल, कंकाल तथा पिशाच, और अन्य भूत-समूह अत्यंत प्रसन्न होकर एकत्र हो गए।

श्लोक 47 (skanda.3.9.47)

भक्षयिष्यामहे सर्वे मांसमिष्टतमं त्विति । तत्रागच्छत्सु सर्वेषु रक्षःकन्यासमावृता

bhakṣayiṣyāmahe sarve māṁsamiṣṭatamaṁ tviti tatrāgacchatsu sarveṣu rakṣaḥkanyāsamāvṛtā

"हम सब यह सर्वाधिक स्वादिष्ट मांस खाएँगे," ऐसा कहते हुए। जब वहाँ वे सब आ गए, तो राक्षस-कन्याओं से घिरी हुई —

श्लोक 48 (skanda.3.9.48)

आययौ राक्षसी सापि मांसभक्षणलालसा । गवेषयंस्तदा विप्रस्तां समुद्वीक्ष्य राक्षसीम्

āyayau rākṣasī sāpi māṁsabhakṣaṇalālasā gaveṣayaṁstadā viprastāṁ samudvīkṣya rākṣasīm

— वह राक्षसी भी मांस-भक्षण की लालसा से आई। तब उसे खोजते हुए ब्राह्मण ने उस राक्षसी को देखकर —

श्लोक 49 (skanda.3.9.49)

सेयं दृष्टा पुरेत्येष प्रत्यभिज्ञानमाप्तवान् । तामाह द्विजपुत्रोऽन्यद्देहि मे नूपुरं त्विति

seyaṁ dṛṣṭā puretyeṣa pratyabhijñānamāptavān tāmāha dvijaputro'nyaddehi me nūpuraṁ tviti

— उसे पहचान लिया, यह सोचकर कि "यह वही है जिसे मैंने पहले देखा था।" ब्राह्मण-पुत्र ने उससे कहा — "मुझे दूसरा नूपुर दो।"

श्लोक 50 (skanda.3.9.50)

सा तस्य वचनं श्रुत्वा प्रीता वाक्यमथाऽब्रवीत् । ममैव च त्वया नीतं पुरा वीरेंद्र नूपुरम्

sā tasya vacanaṁ śrutvā prītā vākyamathā'bravīt mamaiva ca tvayā nītaṁ purā vīreṁdra nūpuram

उसका यह वचन सुनकर, प्रसन्न होकर उसने तब कहा — "हे वीरेन्द्र, मेरा ही नूपुर आपने पहले ले लिया था।

श्लोक 51 (skanda.3.9.51)

गृहाण रत्नरुचिरं द्वितीयमपि नूपुरम् । इत्युक्त्वा नूपुरं तस्मै स्वसुतां च ददौ प्रियाम्

gṛhāṇa ratnaruciraṁ dvitīyamapi nūpuram ityuktvā nūpuraṁ tasmai svasutāṁ ca dadau priyām

यह दूसरा रत्न-सुंदर नूपुर भी ग्रहण कीजिए।" यह कहकर उसने उसे नूपुर, और अपनी प्रिय पुत्री भी दे दी।

श्लोक 52 (skanda.3.9.52)

विद्युत्केश्या तदा दत्तां प्रियां विद्युत्प्रभाभिधाम् । विप्रः संप्राप्य मुमुदे रूपयौवनशालि नीम्

vidyutkeśyā tadā dattāṁ priyāṁ vidyutprabhābhidhām vipraḥ saṁprāpya mumude rūpayauvanaśāli nīm

विद्युत्केशी (राक्षसी) द्वारा दी गई प्रिया विद्युत्प्रभा नामक, रूप-यौवन से संपन्न उसे पाकर ब्राह्मण आनंदित हुआ।

श्लोक 53 (skanda.3.9.53)

विद्युत्केशी तु जामात्रे हेमाब्जमपि सा ददौ । विद्युत्प्रभां नूपुरं च हेमाब्जमपिलभ्य सः

vidyutkeśī tu jāmātre hemābjamapi sā dadau vidyutprabhāṁ nūpuraṁ ca hemābjamapilabhya saḥ

और विद्युत्केशी ने अपने जामाता को एक स्वर्ण-कमल भी दिया। विद्युत्प्रभा, नूपुर तथा स्वर्ण-कमल को प्राप्त कर,

श्लोक 54 (skanda.3.9.54)

श्वश्रूमाभाष्य सहसा पुनः प्रायान्नृपांतिकम् । ततः प्रतापमुकुटो नूपुरप्राप्तिनंदितः

śvaśrūmābhāṣya sahasā punaḥ prāyānnṛpāṁtikam tataḥ pratāpamukuṭo nūpuraprāptinaṁditaḥ

— अपनी सास से विदा लेकर वह तुरंत पुनः राजा के समीप लौट आया। तब नूपुर की प्राप्ति से आनंदित प्रतापमुकुट ने —

श्लोक 55 (skanda.3.9.55)

शौर्यधैर्यसमायुक्तं प्रशशंस द्विजात्मजम् । अथ विद्युत्प्रभां विप्रः सोऽब्रवीद्रहसि प्रियाम्

śauryadhairyasamāyuktaṁ praśaśaṁsa dvijātmajam atha vidyutprabhāṁ vipraḥ so'bravīdrahasi priyām

— शौर्य और धैर्य से युक्त उस ब्राह्मण-पुत्र की प्रशंसा की। तब उस ब्राह्मण ने एकांत में अपनी प्रिया विद्युत्प्रभा से कहा —

श्लोक 56 (skanda.3.9.56)

मात्रा तव कुतो लब्धमेतद्धेमांबुज प्रिये । एतत्तुल्यानि चान्यानि यतः प्राप्स्ये वरानने

mātrā tava kuto labdhametaddhemāṁbuja priye etattulyāni cānyāni yataḥ prāpsye varānane

"हे प्रिये, यह स्वर्ण-कमल तुम्हारी माता को कहाँ से प्राप्त हुआ? हे वरानने, बताओ कि इसके समान अन्य कमल मुझे कहाँ प्राप्त होंगे।"

श्लोक 57 (skanda.3.9.57)

द्विजात्मजं ततः प्राह पतिं विद्युत्प्रभा रहः । प्रभो कपालविस्फोटनाम्नो वेतालभूपतेः

dvijātmajaṁ tataḥ prāha patiṁ vidyutprabhā rahaḥ prabho kapālavisphoṭanāmno vetālabhūpateḥ

तब विद्युत्प्रभा ने अपने पति ब्राह्मण-पुत्र से एकांत में कहा — "हे प्रभो, कपालविस्फोट नामक वेताल-राजा के —

श्लोक 58 (skanda.3.9.58)

अस्ति दिव्यं सरः किंचिद्धेमांबुजपरिष्कृतम् । तव श्वश्र्वा जलक्रीडां वितन्वं त्येदमाहृतम्

asti divyaṁ saraḥ kiṁciddhemāṁbujapariṣkṛtam tava śvaśrvā jalakrīḍāṁ vitanvaṁ tyedamāhṛtam

— पास एक दिव्य सरोवर है, जो स्वर्ण-कमलों से सुशोभित है। तुम्हारी सास ने उसमें जल-क्रीड़ा करते हुए यह कमल लाया था।"

श्लोक 59 (skanda.3.9.59)

इति श्रुत्वा वचस्तत्र मां नयेति जगाद सः । ततः सा सहसा विप्रं निन्ये तत्कांचनं सरः

iti śrutvā vacastatra māṁ nayeti jagāda saḥ tataḥ sā sahasā vipraṁ ninye tatkāṁcanaṁ saraḥ

यह वचन सुनकर उसने कहा — "मुझे वहाँ ले चलो।" तब वह तुरंत उस ब्राह्मण को उस स्वर्ण-सरोवर पर ले गई।

श्लोक 60 (skanda.3.9.60)

ततः स हेमपद्मानामाजिहीर्षुर्द्विजात्मजः । तद्विप्रकारिणः सर्वान्वेतालादींस्ततोऽवधीत्

tataḥ sa hemapadmānāmājihīrṣurdvijātmajaḥ tadviprakāriṇaḥ sarvānvetālādīṁstato'vadhīt

तब उन स्वर्ण-कमलों को लेने के इच्छुक उस ब्राह्मण-पुत्र ने उसमें बाधा डालने वाले समस्त वेतालों आदि का वध कर दिया।

श्लोक 61 (skanda.3.9.61)

स्वयं कपालविस्फोटं निहताशेषसैनिकम् । ददर्श वेतालपतिं तं च हंतुं प्रचक्रमे

svayaṁ kapālavisphoṭaṁ nihatāśeṣasainikam dadarśa vetālapatiṁ taṁ ca haṁtuṁ pracakrame

उसने स्वयं वेतालपति कपालविस्फोट को, जिसकी संपूर्ण सेना नष्ट हो चुकी थी, देखा और उसे भी मारने का प्रयत्न करने लगा।

श्लोक 62 (skanda.3.9.62)

अत्रांतरे महातेजा नाम्ना विज्ञप्तिकौतुकः । विद्याधरपतिः प्राप्य विमानेनैनमब्रवीत्

atrāṁtare mahātejā nāmnā vijñaptikautukaḥ vidyādharapatiḥ prāpya vimānenainamabravīt

इसी बीच महातेजस्वी विज्ञप्तिकौतुक नामक विद्याधरपति अपने विमान से पहुँचकर उससे कहने लगा —

श्लोक 63 (skanda.3.9.63)

अशोकदत्तं विप्रेंद्र साहसं मा कृथा इति । तदाकर्ण्य द्विजसुतो विमानवरसंस्थितम्

aśokadattaṁ vipreṁdra sāhasaṁ mā kṛthā iti tadākarṇya dvijasuto vimānavarasaṁsthitam

"हे विप्रेन्द्र अशोकदत्त, यह दुःसाहस मत करो।" यह सुनकर ब्राह्मण-पुत्र ने, उत्तम विमान में स्थित,

श्लोक 64 (skanda.3.9.64)

ददर्श प्रभया युक्तं विद्याधरपतिं दिवि । तस्य दर्शनमात्रेण शापामुक्तो द्विजा त्मजः

dadarśa prabhayā yuktaṁ vidyādharapatiṁ divi tasya darśanamātreṇa śāpāmukto dvijā tmajaḥ

— तेजस्वी विद्याधरपति को आकाश में देखा। और उसके दर्शन मात्र से ही वह ब्राह्मण-पुत्र (अशोकदत्त) शाप से मुक्त हो गया —

श्लोक 65 (skanda.3.9.65)

संत्यज्य मानुषं रूपं दिव्यं रूपमवाप्तवान् । विमानवरमारूढं दिव्याभरणभूषितम्

saṁtyajya mānuṣaṁ rūpaṁ divyaṁ rūpamavāptavān vimānavaramārūḍhaṁ divyābharaṇabhūṣitam

— अपना मानव-रूप त्यागकर उसने दिव्य रूप प्राप्त किया; उत्तम विमान पर आरूढ़, दिव्य आभूषणों से विभूषित,

श्लोक 66 (skanda.3.9.66)

शापान्मुक्तं सुकर्णं तं प्राह विज्ञप्ति कौतुकः । अयं सुकर्ण ते भ्राता गालवस्य महामुनेः

śāpānmuktaṁ sukarṇaṁ taṁ prāha vijñapti kautukaḥ ayaṁ sukarṇa te bhrātā gālavasya mahāmuneḥ

शाप से मुक्त उस सुकर्ण से विज्ञप्तिकौतुक ने कहा — "हे सुकर्ण, यह तुम्हारा भाई है, महर्षि गालव द्वारा शापित —

श्लोक 67 (skanda.3.9.67)

शापाद्वेतालतां प्राप तत्कन्यास्पर्शपातकी । त्वं च शप्तः पुरा तेन तत्पापस्यानु मोदकः

śāpādvetālatāṁ prāpa tatkanyāsparśapātakī tvaṁ ca śaptaḥ purā tena tatpāpasyānu modakaḥ

— जो उस कन्या के स्पर्श के पाप से शाप द्वारा वेताल-अवस्था को प्राप्त हुआ। और तुम भी उस पाप के अनुमोदक होने के कारण उसके द्वारा तब शापित हुए थे।

श्लोक 68 (skanda.3.9.68)

तवायमल्पपापस्य शापो मद्दर्शनावधिः । कल्पिस्ततेन मुनिना शापांतो नास्य कल्पितः

tavāyamalpapāpasya śāpo maddarśanāvadhiḥ kalpistatena muninā śāpāṁto nāsya kalpitaḥ

तुम्हारा, जिसका पाप अल्प था, उस मुनि ने शाप की सीमा मेरे दर्शन तक ही निर्धारित की थी। किंतु इसके शाप का कोई अंत उस मुनि द्वारा निर्धारित नहीं किया गया।

श्लोक 69 (skanda.3.9.69)

तदेहि मुक्तशापोसि सुकर्ण स्वर्गमारुह । ततः सुकर्णस्तं प्राह विद्याधरकुलाधिपम्

tadehi muktaśāposi sukarṇa svargamāruha tataḥ sukarṇastaṁ prāha vidyādharakulādhipam

अतः आओ, हे सुकर्ण, शाप-मुक्त होकर स्वर्ग को चलो।" तब सुकर्ण ने उस विद्याधर-कुल के अधिपति से कहा —

श्लोक 70 (skanda.3.9.70)

विद्याधरपते भ्रात्रा विना ज्येष्ठेन सांप्रतम् । सर्वभोगयुतं स्वर्गं नैव गंतुं समुत्सहे

vidyādharapate bhrātrā vinā jyeṣṭhena sāṁpratam sarvabhogayutaṁ svargaṁ naiva gaṁtuṁ samutsahe

"हे विद्याधरपते, अभी अपने ज्येष्ठ भाई के बिना, समस्त भोगों से युक्त स्वर्ग को जाने का मेरा साहस नहीं होता।

श्लोक 71 (skanda.3.9.71)

शापस्यांतो यथा भूयान्मम भ्रातुस्तथा वद । तमुवाच महातेजास्तथा विज्ञप्तिकौतुकः

śāpasyāṁto yathā bhūyānmama bhrātustathā vada tamuvāca mahātejāstathā vijñaptikautukaḥ

बताइए कि मेरे भाई के शाप का भी अंत किस प्रकार हो।" उस महातेजस्वी विज्ञप्तिकौतुक ने उससे कहा —

श्लोक 72 (skanda.3.9.72)

दुर्निवारमिमं शापमन्यः को वा निवारयेत् । किं तु गुह्यतमं किंचित्तव वक्ष्यामि सांप्रतम्

durnivāramimaṁ śāpamanyaḥ ko vā nivārayet kiṁ tu guhyatamaṁ kiṁcittava vakṣyāmi sāṁpratam

"इस दुर्निवार शाप को अन्य कौन निवारण कर सकता है? किंतु अभी मैं तुम्हें एक अत्यंत गुह्य बात बताता हूँ।

श्लोक 73 (skanda.3.9.73)

ब्रह्मणा सनकादिभ्यो मुनिभ्यः कथितं पुरा । सर्वतीर्थाश्रये पुण्ये दक्षिणस्यो दधेस्तटे

brahmaṇā sanakādibhyo munibhyaḥ kathitaṁ purā sarvatīrthāśraye puṇye dakṣiṇasyo dadhestaṭe

प्राचीन काल में ब्रह्मा ने सनक आदि मुनियों को जो बताया था — कि दक्षिणी समुद्र के तट पर, समस्त तीर्थों के आश्रयस्वरूप पुण्य स्थान में,

श्लोक 74 (skanda.3.9.74)

चक्रतीर्थसमीपे तु तीर्थमस्तिमहत्तरम् । महापातकसंघाश्च यस्य दर्शनमात्रतः

cakratīrthasamīpe tu tīrthamastimahattaram mahāpātakasaṁghāśca yasya darśanamātrataḥ

— चक्रतीर्थ के समीप एक और भी महान तीर्थ है, जिसके दर्शन मात्र से महापातकों के समूह —

श्लोक 75 (skanda.3.9.75)

नश्यंति तत्क्षणादेव न जाने स्नानजं फलम् । तत्र गत्वा तव ज्येष्ठो यदि स्नायान्महत्तरे

naśyaṁti tatkṣaṇādeva na jāne snānajaṁ phalam tatra gatvā tava jyeṣṭho yadi snāyānmahattare

— उसी क्षण नष्ट हो जाते हैं — वहाँ स्नान का फल तो मैं जानता भी नहीं। यदि तुम्हारा ज्येष्ठ भाई वहाँ जाकर उस महान तीर्थ में स्नान करे,

श्लोक 76 (skanda.3.9.76)

वेतालत्वं त्यजेन्नूनं तदा गालवशापजम् । सुकर्णस्तद्वचः श्रुत्वा भ्रात्रा वेतालरूपिणा

vetālatvaṁ tyajennūnaṁ tadā gālavaśāpajam sukarṇastadvacaḥ śrutvā bhrātrā vetālarūpiṇā

— तो वह निश्चय ही गालव के शाप से उत्पन्न वेताल-अवस्था को त्याग देगा।" यह वचन सुनकर सुकर्ण, वेताल-रूपी अपने भाई सहित —

श्लोक 77 (skanda.3.9.77)

सहितः सहसा प्रायाद्दक्षिणस्योदधेस्तटम् । दक्षिणं चक्रतीर्थाख्यादुत्तरं गंधमादनात्

sahitaḥ sahasā prāyāddakṣiṇasyodadhestaṭam dakṣiṇaṁ cakratīrthākhyāduttaraṁ gaṁdhamādanāt

— तुरंत ही दक्षिणी समुद्र के तट की ओर, चक्रतीर्थ के दक्षिण तथा गंधमादन के उत्तर की ओर प्रस्थान कर गया,

श्लोक 78 (skanda.3.9.78)

ब्रह्मणा सनकादिभ्यः कथितं तीर्थमभ्यगात् । तत्तीर्थकूलमासाद्य भ्रातरं चेदमब्रवीत्

brahmaṇā sanakādibhyaḥ kathitaṁ tīrthamabhyagāt tattīrthakūlamāsādya bhrātaraṁ cedamabravīt

— ब्रह्मा द्वारा सनक आदि को बताए गए उस तीर्थ की ओर। उस तीर्थ के तट पर पहुँचकर उसने अपने भाई से यह कहा —

श्लोक 79 (skanda.3.9.79)

भ्रातर्गालवशापस्य घोरस्यास्य निवृत्तये । तीर्थेऽस्मिन्नचिरात्स्नाहि सर्वतीर्थोत्तमोत्तमे

bhrātargālavaśāpasya ghorasyāsya nivṛttaye tīrthe'sminnacirātsnāhi sarvatīrthottamottame

"हे भ्राता, गालव के इस घोर शाप की निवृत्ति के लिए, समस्त तीर्थों में सर्वोत्तम इस तीर्थ में शीघ्र स्नान करो।"

श्लोक 80 (skanda.3.9.80)

तस्मिन्न वसरे विप्रास्तस्य तीर्थस्य शीकराः । न्यपतंस्तस्य गात्रेषु वायुना वै समाहृताः

tasminna vasare viprāstasya tīrthasya śīkarāḥ nyapataṁstasya gātreṣu vāyunā vai samāhṛtāḥ

हे विप्रो, उसी अवसर पर उस तीर्थ के जल-कण, वायु द्वारा लाए जाकर, उसके (ज्येष्ठ भ्राता के) अंगों पर गिर पड़े।

श्लोक 81 (skanda.3.9.81)

स तच्छीकरसंस्पर्शात्त्यक्त्वा वेतालतां तदा । तदेव मानुषं भावं द्विजपुत्रत्वमाप्तवान्

sa tacchīkarasaṁsparśāttyaktvā vetālatāṁ tadā tadeva mānuṣaṁ bhāvaṁ dvijaputratvamāptavān

उस जल-कण के स्पर्श मात्र से उसने वेताल-अवस्था को त्याग दिया, और उसी मानव-भाव को, ब्राह्मण-पुत्रत्व को प्राप्त कर लिया।

श्लोक 82 (skanda.3.9.82)

ततः संकल्प्य सहसा तस्मिंस्तीर्थोत्तमोत्तमे । मनुष्यत्वनिवृत्त्यर्थं निममज्ज द्विजात्मजः

tataḥ saṁkalpya sahasā tasmiṁstīrthottamottame manuṣyatvanivṛttyarthaṁ nimamajja dvijātmajaḥ

फिर तुरंत संकल्प करके, उस श्रेष्ठतम तीर्थ में उस ब्राह्मण-पुत्र ने अपने मानवत्व की निवृत्ति के लिए भी डुबकी लगाई।

श्लोक 83 (skanda.3.9.83)

उत्तिष्ठन्नेव सहसा दिव्यं रूपमवाप्तवान् । विमानवरमारूढो देवस्त्रीपरिवारितः

uttiṣṭhanneva sahasā divyaṁ rūpamavāptavān vimānavaramārūḍho devastrīparivāritaḥ

उठते ही तुरंत उसने दिव्य रूप प्राप्त कर लिया; उत्तम विमान पर आरूढ़ होकर, देवांगनाओं से घिरा हुआ,

श्लोक 84 (skanda.3.9.84)

सर्वाभरणसंयुक्तः सह भ्रात्रा सुदर्शनः । श्लाघमानश्च तत्तीर्थं नमस्कत्य पुनःपुनः

sarvābharaṇasaṁyuktaḥ saha bhrātrā sudarśanaḥ ślāghamānaśca tattīrthaṁ namaskatya punaḥpunaḥ

— समस्त आभूषणों से युक्त होकर सुदर्शन, अपने भाई सहित, उस तीर्थ की प्रशंसा करते हुए, बार-बार उसे नमस्कार करते हुए,

श्लोक 85 (skanda.3.9.85)

विज्ञप्तिकौतुकं चापि पुरस्कृत्य दिवं ययौ । तदाप्रभृति तत्तीर्थं वेतालवरदाभिधम्

vijñaptikautukaṁ cāpi puraskṛtya divaṁ yayau tadāprabhṛti tattīrthaṁ vetālavaradābhidham

— तथा विज्ञप्तिकौतुक को आगे करके स्वर्ग को चले गए। तभी से वह तीर्थ वेतालवरद नाम से —

श्लोक 86 (skanda.3.9.86)

वेतालत्वं विनष्टं यच्छीकरस्पर्शमात्रतः । य इदं तीर्थमासाद्य चक्रतीर्थस्य दक्षिणे

vetālatvaṁ vinaṣṭaṁ yacchīkarasparśamātrataḥ ya idaṁ tīrthamāsādya cakratīrthasya dakṣiṇe

— विख्यात हुआ, चूँकि इसके जल-कणों के स्पर्श मात्र से वेताल-अवस्था नष्ट हो गई थी। जो भी मनुष्य चक्रतीर्थ के दक्षिण में स्थित इस तीर्थ में —

श्लोक 87 (skanda.3.9.87)

स्नानं कदाचित्कुर्वंति जीवन्मुक्ता भवंति ते । एतत्तीर्थसमं पुण्यं न भूतं न भविष्यति

snānaṁ kadācitkurvaṁti jīvanmuktā bhavaṁti te etattīrthasamaṁ puṇyaṁ na bhūtaṁ na bhaviṣyati

— एक बार भी स्नान करते हैं, वे जीवन्मुक्त हो जाते हैं। इस तीर्थ के समान पुण्य न कभी हुआ है, न कभी होगा।

श्लोक 88 (skanda.3.9.88)

घोरां वेतालतां त्यक्त्वा दिव्यतां स यदाप्तवान्

ghorāṁ vetālatāṁ tyaktvā divyatāṁ sa yadāptavān

— क्योंकि उसने भयंकर वेताल-अवस्था त्यागकर वहीं दिव्यता प्राप्त की थी।

श्लोक 89 (skanda.3.9.89)

अत्र संकल्प्य च स्नात्वा वेतालवरदे शुभे । पितृभ्यः पिंडदानं च कुर्याद्वै नियमान्वितः

atra saṁkalpya ca snātvā vetālavarade śubhe pitṛbhyaḥ piṁḍadānaṁ ca kuryādvai niyamānvitaḥ

यहाँ संकल्प करके तथा शुभ वेतालवरद में स्नान करके, नियमपूर्वक पितरों को पिंडदान करना चाहिए।

श्लोक 90 (skanda.3.9.90)

एवं वः कथितं विप्रास्तस्य तीर्थस्य वैभवम् । वेतालवरदाभिख्या यथा चास्य समागता

evaṁ vaḥ kathitaṁ viprāstasya tīrthasya vaibhavam vetālavaradābhikhyā yathā cāsya samāgatā

हे विप्रो, इस प्रकार मैंने आपको उस तीर्थ का माहात्म्य बताया, तथा यह भी कि उसे वेतालवरद यह नाम कैसे प्राप्त हुआ।

श्लोक 91 (skanda.3.9.91)

यः पठेदिममध्यायं शृणुयाद्वा स मुच्यते

yaḥ paṭhedimamadhyāyaṁ śṛṇuyādvā sa mucyate

जो इस अध्याय को पढ़ता है अथवा सुनता है, वह मुक्त हो जाता है।

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