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ब्रह्म खण्ड · अध्याय 10

पापविनाशन तीर्थ का माहात्म्य

अध्याय 9अध्याय-सूचीअध्याय 11

श्लोक 1 (skanda.3.10.1)

श्रीसूत उवाच । वेतालवरदे तीर्थे नरः स्नात्वा द्विजोत्तमाः । ततः शनैःशनैर्गच्छेद्गन्धमादनपर्वतम्

śrīsūta uvāca vetālavarade tīrthe naraḥ snātvā dvijottamāḥ tataḥ śanaiḥśanairgacchedgandhamādanaparvatam

श्री सूत जी ने कहा — हे द्विजोत्तमो, वेतालवरद तीर्थ में स्नान करके मनुष्य तब धीरे-धीरे गंधमादन पर्वत की ओर जाए।

श्लोक 2 (skanda.3.10.2)

योंऽबुधौ सेतुरूपेण वर्तते गन्धमादनः । स मार्गो ब्रह्मलोकस्य विश्वकर्त्रा विनिर्मितः

yoṁ'budhau seturūpeṇa vartate gandhamādanaḥ sa mārgo brahmalokasya viśvakartrā vinirmitaḥ

समुद्र में सेतु-रूप में स्थित जो गंधमादन है — वही ब्रह्मलोक का मार्ग है, जिसे विश्वकर्ता ने निर्मित किया है।

श्लोक 3 (skanda.3.10.3)

लक्षकोटिसहस्राणि सरांसि सरितस्तथा । समुद्राश्च महापुण्या वनान्यप्याश्रमाणि च

lakṣakoṭisahasrāṇi sarāṁsi saritastathā samudrāśca mahāpuṇyā vanānyapyāśramāṇi ca

लाखों-करोड़ों सरोवर तथा नदियाँ, तथा महापुण्य समुद्र, वन तथा आश्रम भी,

श्लोक 4 (skanda.3.10.4)

पुण्यानि क्षेत्रजातानि वेदारण्या दिकानि च । मुनयश्च वसिष्ठाद्या सिद्धचारणकिन्नराः

puṇyāni kṣetrajātāni vedāraṇyā dikāni ca munayaśca vasiṣṭhādyā siddhacāraṇakinnarāḥ

— वहाँ उत्पन्न पुण्य क्षेत्र, तथा वेदारण्य आदि, वसिष्ठ आदि मुनि, तथा सिद्ध, चारण और किन्नर,

श्लोक 5 (skanda.3.10.5)

लक्ष्म्या सह धरण्या च भगवान्मधुसूदनः । सावित्र्या च सरस्वत्या सहैव चतुराननः

lakṣmyā saha dharaṇyā ca bhagavānmadhusūdanaḥ sāvitryā ca sarasvatyā sahaiva caturānanaḥ

— लक्ष्मी और धरणी सहित भगवान् मधुसूदन, तथा सावित्री और सरस्वती सहित ही चतुरानन,

श्लोक 6 (skanda.3.10.6)

हेरंबः षण्मुखश्चैव देवाश्चेंद्रपुरोगमाः । आदित्यादिग्रहाश्चैव तथाष्टौ वसवो द्विजाः

heraṁbaḥ ṣaṇmukhaścaiva devāśceṁdrapurogamāḥ ādityādigrahāścaiva tathāṣṭau vasavo dvijāḥ

— हेरंब (गणेश) तथा षण्मुख (कार्तिकेय), और इन्द्र आदि देवता, तथा सूर्य आदि ग्रह, और हे द्विजो, आठों वसु भी,

श्लोक 7 (skanda.3.10.7)

पितरो लोकपालाश्च तथान्ये देवता गणाः । महापातकसंघानां नाशने लोकपावने

pitaro lokapālāśca tathānye devatā gaṇāḥ mahāpātakasaṁghānāṁ nāśane lokapāvane

— पितर और लोकपाल, तथा अन्य देवता-गण भी, महापातकों के समूह को नष्ट करने वाले, लोक को पवित्र करने वाले —

श्लोक 8 (skanda.3.10.8)

दिवानिशं वसंत्यत्र पर्वते गंधमादने । अत्र गौरी सदा तुष्टा हरेण सह वर्तते । अत्र किन्नरकांतानां क्रीडा जागर्ति नित्यशः । तस्य दर्शनमात्रेण बुद्धिसौख्यं नृणां भवेत्

divāniśaṁ vasaṁtyatra parvate gaṁdhamādane atra gaurī sadā tuṣṭā hareṇa saha vartate atra kinnarakāṁtānāṁ krīḍā jāgarti nityaśaḥ tasya darśanamātreṇa buddhisaukhyaṁ nṛṇāṁ bhavet

— इस गंधमादन पर्वत पर दिन-रात निवास करते हैं। यहाँ गौरी सदा प्रसन्न होकर हर के साथ निवास करती हैं। यहाँ किन्नर-स्त्रियों की क्रीड़ा सदा जागृत रहती है। इसके दर्शन मात्र से मनुष्यों को बुद्धि और सुख प्राप्त होता है।

श्लोक 9 (skanda.3.10.9)

तन्मूर्धनि कृतावासाः सिद्धचारणयोषितः । पूजयंति सदा कालं शंकरं गिरिजापतिम्

tanmūrdhani kṛtāvāsāḥ siddhacāraṇayoṣitaḥ pūjayaṁti sadā kālaṁ śaṁkaraṁ girijāpatim

उसके शिखर पर निवास करने वाली सिद्ध-चारण स्त्रियाँ सदा गिरिजापति शंकर की पूजा करती हैं।

श्लोक 10 (skanda.3.10.10)

कोटयो ब्रह्महत्यानामगम्यागमकोटयः । अंगलग्नैर्विनश्यंति गन्धमादनमारुतैः

koṭayo brahmahatyānāmagamyāgamakoṭayaḥ aṁgalagnairvinaśyaṁti gandhamādanamārutaiḥ

करोड़ों ब्रह्महत्याएँ, तथा करोड़ों अगम्य-गमन के पाप, गंधमादन की वायु के अंगों से स्पर्श होते ही नष्ट हो जाते हैं।

श्लोक 11 (skanda.3.10.11)

असावुल्लोलकल्लोले तिष्ठन्मध्ये महांबुधौ । आसीन्मुनिगणैः सेव्यः पुरा वै गन्धमादनः

asāvullolakallole tiṣṭhanmadhye mahāṁbudhau āsīnmunigaṇaiḥ sevyaḥ purā vai gandhamādanaḥ

यह गंधमादन, विशाल उत्ताल तरंगों वाले महासागर के मध्य स्थित, प्राचीन काल में मुनि-गणों द्वारा सेवित था।

श्लोक 12 (skanda.3.10.12)

ततो नलेन सेतौ तु बद्धे तन्मध्यगोचरः । रामाज्ञयाखिलैः सेव्यो बभूव मनुजैरपि

tato nalena setau tu baddhe tanmadhyagocaraḥ rāmājñayākhilaiḥ sevyo babhūva manujairapi

फिर नल द्वारा सेतु बाँधे जाने पर, उसके मध्य में आ जाने से, राम की आज्ञा से यह समस्त मनुष्यों द्वारा भी सेव्य हो गया।

श्लोक 13 (skanda.3.10.13)

सेतुरूपं गिरिं तं तु प्रार्थयेद्गंधमादनम् । क्षमाधर महापुण्य सर्वदेवनमस्कृत

seturūpaṁ giriṁ taṁ tu prārthayedgaṁdhamādanam kṣamādhara mahāpuṇya sarvadevanamaskṛta

सेतु-रूप उस गंधमादन पर्वत से प्रार्थना करे — "हे क्षमाधर (पर्वत), हे महापुण्य, हे समस्त देवताओं द्वारा नमस्कृत,

श्लोक 14 (skanda.3.10.14)

विष्ण्वा दयोऽपि ये देवास्सेवंते श्रद्धया सह । तं भवंतमहं पद्भ्यामाक्रमामि नगोत्तम

viṣṇvā dayo'pi ye devāssevaṁte śraddhayā saha taṁ bhavaṁtamahaṁ padbhyāmākramāmi nagottama

— जिनकी विष्णु आदि देवता भी श्रद्धापूर्वक सेवा करते हैं, हे नगोत्तम, आपको मैं अपने पैरों से रौंद रहा हूँ।

श्लोक 15 (skanda.3.10.15)

क्षमस्व पादघातं मे दयया पापचेतसः । त्वन्मूर्द्धनि कृतावासं शंकरं दर्शयस्व मे

kṣamasva pādaghātaṁ me dayayā pāpacetasaḥ tvanmūrddhani kṛtāvāsaṁ śaṁkaraṁ darśayasva me

पापचित्त मेरे इस पद-प्रहार को दयापूर्वक क्षमा कीजिए। आपके शिखर पर निवास करने वाले शंकर का मुझे दर्शन कराइए।"

श्लोक 16 (skanda.3.10.16)

प्रार्थयित्वा नरस्त्वेवं सेतुरूपं नगोत्तमम् । ततो मृदुपदं गच्छेत्पावनं गन्धमादनम्

prārthayitvā narastvevaṁ seturūpaṁ nagottamam tato mṛdupadaṁ gacchetpāvanaṁ gandhamādanam

इस प्रकार सेतु-रूप उस श्रेष्ठ पर्वत से प्रार्थना करके मनुष्य फिर मृदु कदमों से पवित्र गंधमादन की ओर जाए।

श्लोक 17 (skanda.3.10.17)

अब्धौ तत्र नरः स्नात्वा पर्वते गन्धमादने । पिंडदानं ततः कुर्यादपि सर्षपमात्रकम्

abdhau tatra naraḥ snātvā parvate gandhamādane piṁḍadānaṁ tataḥ kuryādapi sarṣapamātrakam

वहाँ गंधमादन पर्वत पर समुद्र में स्नान करके मनुष्य फिर पिंडदान करे, चाहे वह सरसों के दाने के बराबर ही क्यों न हो।

श्लोक 18 (skanda.3.10.18)

तृप्तिं प्रयांति पितरस्तस्य यावद्युगक्षयः । शमीदलसमानान्वा दद्यात्पिंडान्पितॄन्प्रति

tṛptiṁ prayāṁti pitarastasya yāvadyugakṣayaḥ śamīdalasamānānvā dadyātpiṁḍānpitṝnprati

उसके पितर युग के अंत तक तृप्त रहते हैं। अथवा शमी के पत्ते के बराबर भी पिंड पितरों को अर्पित करे।

श्लोक 19 (skanda.3.10.19)

स्वर्गस्था मोक्षमायांति स्वर्गं नरकवासिनः । ततस्तस्योपरि महातीर्थं लोकेषु विश्रुतम्

svargasthā mokṣamāyāṁti svargaṁ narakavāsinaḥ tatastasyopari mahātīrthaṁ lokeṣu viśrutam

स्वर्गस्थ पितर मोक्ष को प्राप्त होते हैं, और नरकवासी स्वर्ग को प्राप्त होते हैं। फिर उसके ऊपर एक महातीर्थ है, जो लोक में विख्यात है —

श्लोक 20 (skanda.3.10.20)

सर्वतीर्थोत्तमं पुण्यं नाम्ना पापविनाशनम् । अस्ति पुण्यतमं विप्राः पवित्रे गन्धमादने

sarvatīrthottamaṁ puṇyaṁ nāmnā pāpavināśanam asti puṇyatamaṁ viprāḥ pavitre gandhamādane

— समस्त तीर्थों में उत्तम, पुण्यमय, पापविनाशन नामक। हे विप्रो, वह पवित्र गंधमादन में सबसे अधिक पुण्यदायी है।

श्लोक 21 (skanda.3.10.21)

यस्य संस्मरणादेव गर्भवासो न विद्यते । तत्प्राप्य तु नरः स्नायात्स्वदे हमलनाशनम् । तत्र स्नानान्नरो याति वैकुण्ठं नात्र संशयः

yasya saṁsmaraṇādeva garbhavāso na vidyate tatprāpya tu naraḥ snāyātsvade hamalanāśanam tatra snānānnaro yāti vaikuṇṭhaṁ nātra saṁśayaḥ

जिसके स्मरण मात्र से गर्भवास नहीं होता। उसे प्राप्त कर मनुष्य अपने शरीर के मल का नाश करने के लिए स्नान करे; वहाँ स्नान करने से मनुष्य वैकुण्ठ को जाता है, इसमें संदेह नहीं।

श्लोक 22 (skanda.3.10.22)

ऋषय ऊचुः । सूत पापविनाशाख्य तीर्थस्य ब्रूहि वैभवम् । व्यासेन बोधितस्त्वं हि वेत्सि सर्वं महामुने

ṛṣaya ūcuḥ sūta pāpavināśākhya tīrthasya brūhi vaibhavam vyāsena bodhitastvaṁ hi vetsi sarvaṁ mahāmune

ऋषियों ने कहा — हे सूत, पापविनाश नामक तीर्थ का माहात्म्य बताइए। हे महामुने, व्यास जी द्वारा शिक्षित होकर आप सब कुछ जानते हैं।

श्लोक 23 (skanda.3.10.23)

श्रीसूत उवाच । ब्रह्माश्रमपदे वृत्तां पार्श्वे हिमवतः शुभे । वक्ष्यामि ब्राह्मणश्रेष्ठा युष्माकं तु कथां शुभाम्

śrīsūta uvāca brahmāśramapade vṛttāṁ pārśve himavataḥ śubhe vakṣyāmi brāhmaṇaśreṣṭhā yuṣmākaṁ tu kathāṁ śubhām

श्री सूत जी ने कहा — हे ब्राह्मणश्रेष्ठो, हिमालय के शुभ पार्श्व में स्थित ब्रह्माश्रम में घटित एक शुभ कथा मैं आपको बताता हूँ।

श्लोक 24 (skanda.3.10.24)

अस्याश्रमपदं पुण्यं ब्रह्माश्रमपदे शुभे । नानावृक्षगणाकीर्णं पार्श्वे हिमवतः शुभे

asyāśramapadaṁ puṇyaṁ brahmāśramapade śubhe nānāvṛkṣagaṇākīrṇaṁ pārśve himavataḥ śubhe

यह पुण्य आश्रम-स्थल, शुभ ब्रह्माश्रम में, विविध वृक्ष-समूहों से भरा हुआ, हिमालय के शुभ पार्श्व में —

श्लोक 25 (skanda.3.10.25)

वहुगुल्मलताकीर्णं मृगद्विपनिषेवितम् । सिद्धचारणसंघुष्टं रम्यं पुष्पितकाननम्

vahugulmalatākīrṇaṁ mṛgadvipaniṣevitam siddhacāraṇasaṁghuṣṭaṁ ramyaṁ puṣpitakānanam

— अनेक झाड़ियों और लताओं से भरा हुआ, मृगों-गजों से सेवित, सिद्धों-चारणों से गुंजायमान, पुष्पित रमणीय वन।

श्लोक 26 (skanda.3.10.26)

वृतिभिर्बहुभिः कीर्णं तापसैरुशोभितम् । ब्राह्मणैश्च महाभागैः सूर्यज्वलनसंनिभैः

vṛtibhirbahubhiḥ kīrṇaṁ tāpasairuśobhitam brāhmaṇaiśca mahābhāgaiḥ sūryajvalanasaṁnibhaiḥ

अनेक बाड़ों से भरा हुआ, तपस्वियों से सुशोभित, तथा सूर्य और अग्नि के समान तेजस्वी, महाभाग्यशाली ब्राह्मणों से —

श्लोक 27 (skanda.3.10.27)

नियमव्रतसं पन्नैः समाकीर्णं तपस्विभिः । दीक्षितैर्यागहेतोश्च यताहारैः कृतात्मभिः

niyamavratasaṁ pannaiḥ samākīrṇaṁ tapasvibhiḥ dīkṣitairyāgahetośca yatāhāraiḥ kṛtātmabhiḥ

— नियम-व्रतों से संपन्न तपस्वियों से भरा हुआ, यज्ञ के लिए दीक्षित, संयमित आहार वाले, जितात्मा,

श्लोक 28 (skanda.3.10.28)

वेदाध्ययनसंपन्नैर्वैदिकैः परिवेष्टितम् । वर्णिभिश्च गृहस्थैश्च वानप्रस्थैश्च भिक्षुभिः

vedādhyayanasaṁpannairvaidikaiḥ pariveṣṭitam varṇibhiśca gṛhasthaiśca vānaprasthaiśca bhikṣubhiḥ

— वेदाध्ययन-संपन्न वैदिकों से घिरा हुआ, तथा ब्रह्मचारियों, गृहस्थों, वानप्रस्थों और भिक्षुओं से,

श्लोक 29 (skanda.3.10.29)

स्वाश्रमाचारनिरतैः स्ववर्णोक्तविधायिभिः । वालखिल्यैश्च मुनिभिः संप्राप्तैश्च मरीचिभिः

svāśramācāranirataiḥ svavarṇoktavidhāyibhiḥ vālakhilyaiśca munibhiḥ saṁprāptaiśca marīcibhiḥ

— अपने-अपने आश्रम के आचार में तत्पर, अपने-अपने वर्ण के विहित कर्मों को करने वाले, तथा वालखिल्य मुनियों से, और मरीचि के साथ आए हुए ऋषियों से युक्त।

श्लोक 30 (skanda.3.10.30)

तत्राश्रमे पुरा कश्चिच्छूद्रो दृढमतिर्द्विजाः । साहसी ब्राह्मणाभ्याशमाजगाम मुदान्वितः

tatrāśrame purā kaścicchūdro dṛḍhamatirdvijāḥ sāhasī brāhmaṇābhyāśamājagāma mudānvitaḥ

हे द्विजो, प्राचीन काल में उस आश्रम में दृढ़मति नामक कोई साहसी शूद्र आनंदपूर्वक ब्राह्मणों के समीप आया।

श्लोक 31 (skanda.3.10.31)

आगतो ह्याश्रमपदं पूजितश्च तपस्विभिः । नाम्ना दृढमतिः शूद्रः साष्टांगं प्रणनाम वै

āgato hyāśramapadaṁ pūjitaśca tapasvibhiḥ nāmnā dṛḍhamatiḥ śūdraḥ sāṣṭāṁgaṁ praṇanāma vai

आश्रम-स्थल में आकर, तपस्वियों द्वारा सम्मानित होकर, दृढ़मति नामक उस शूद्र ने साष्टांग प्रणाम किया।

श्लोक 32 (skanda.3.10.32)

तान्स दृष्ट्वा मुनिगणान्देवकल्पान्महौजसः । कुर्वतो विविधान्यज्ञान्संप्रहृष्य स शूद्रकः

tānsa dṛṣṭvā munigaṇāndevakalpānmahaujasaḥ kurvato vividhānyajñānsaṁprahṛṣya sa śūdrakaḥ

उन देवतुल्य, महातेजस्वी, विविध यज्ञ करते हुए मुनि-गणों को देखकर, वह शूद्र अत्यंत प्रसन्न होकर —

श्लोक 33 (skanda.3.10.33)

अथास्य बुद्धिरभवत्तपःकर्तुमनुत्तमम् । ततोऽब्रवीत्कुलपतिं मुनिमागत्य तापसम्

athāsya buddhirabhavattapaḥkartumanuttamam tato'bravītkulapatiṁ munimāgatya tāpasam

— फिर उसकी बुद्धि अनुपम तप करने की हुई; तब उसने उस आश्रम के कुलपति तपस्वी मुनि के पास जाकर कहा —

श्लोक 34 (skanda.3.10.34)

दृढमतिरुवाच । तपोधन नमस्तेऽस्तु रक्ष मां करुणानिधे । तव प्रसादादिच्छामि धर्मं चर्तुं द्विजर्षभ

dṛḍhamatiruvāca tapodhana namaste'stu rakṣa māṁ karuṇānidhe tava prasādādicchāmi dharmaṁ cartuṁ dvijarṣabha

दृढ़मति ने कहा — "हे तपोधन, आपको नमस्कार है; हे करुणानिधे, मेरी रक्षा कीजिए। हे द्विजर्षभ, आपकी कृपा से मैं धर्माचरण करना चाहता हूँ।

श्लोक 35 (skanda.3.10.35)

तस्मादभिगतं मां त्वं यागे दीक्षय सुव्रत । ब्रह्मन्नवरवर्णोऽहं शूद्रो जात्यास्मि सत्तम

tasmādabhigataṁ māṁ tvaṁ yāge dīkṣaya suvrata brahmannavaravarṇo'haṁ śūdro jātyāsmi sattama

अतः हे सुव्रत, आपके पास आए हुए मुझे यज्ञ में दीक्षित कीजिए। हे ब्रह्मन्, हे सत्तम, मैं निम्नतम वर्ण का, जाति से शूद्र हूँ।

श्लोक 36 (skanda.3.10.36)

शुश्रूषां कर्तुमिच्छामि प्रपन्नाय प्रसीद मे । एवमुक्ते तु शूद्रेण तमाह ब्राह्मणस्तदा

śuśrūṣāṁ kartumicchāmi prapannāya prasīda me evamukte tu śūdreṇa tamāha brāhmaṇastadā

मैं सेवा करना चाहता हूँ; शरणागत मुझ पर प्रसन्न होइए।" शूद्र द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर ब्राह्मण ने तब उससे कहा —

श्लोक 37 (skanda.3.10.37)

कुलपतिरुवाच । यागे दीक्षयितुं शक्यो न शूद्रो हीनजन्मभाक् । श्रूयतां यदि ते बुद्धिः शुश्रूषानिरतो भव

kulapatiruvāca yāge dīkṣayituṁ śakyo na śūdro hīnajanmabhāk śrūyatāṁ yadi te buddhiḥ śuśrūṣānirato bhava

कुलपति ने कहा — "हीन जन्म वाले शूद्र को यज्ञ में दीक्षित नहीं किया जा सकता। सुनो, यदि तुम्हारी ऐसी इच्छा है, तो सेवा में तत्पर रहो।

श्लोक 38 (skanda.3.10.38)

उपदेशो न कर्तव्यो जातिहीनस्य कर्हिचित् । उपदेशे महान्दोष उपाध्यायस्य विद्यते

upadeśo na kartavyo jātihīnasya karhicit upadeśe mahāndoṣa upādhyāyasya vidyate

जातिहीन को कभी उपदेश नहीं देना चाहिए। ऐसा उपदेश देने में गुरु के लिए महान् दोष होता है।

श्लोक 39 (skanda.3.10.39)

नाध्यापयेद्बुधः शूद्रं तथा नैव च याजयेत् । न पाठयेत्तथा शूद्रं शास्त्रं व्याकरणादिकम्

nādhyāpayedbudhaḥ śūdraṁ tathā naiva ca yājayet na pāṭhayettathā śūdraṁ śāstraṁ vyākaraṇādikam

बुद्धिमान को शूद्र को न पढ़ाना चाहिए, न उसका याजन करना चाहिए। उसी प्रकार शूद्र को शास्त्र, व्याकरण आदि भी नहीं पढ़ाना चाहिए।

श्लोक 40 (skanda.3.10.40)

काव्यं वा नाटकं वापि तथालंकारमेव च । पुराणमितिहासं च शूद्रं नैव तु पाठयेत्

kāvyaṁ vā nāṭakaṁ vāpi tathālaṁkārameva ca purāṇamitihāsaṁ ca śūdraṁ naiva tu pāṭhayet

काव्य, नाटक, अलंकार-शास्त्र, पुराण अथवा इतिहास भी शूद्र को कभी नहीं पढ़ाना चाहिए।

श्लोक 41 (skanda.3.10.41)

यदि चोपदिशेद्विप्रः शूद्रं चैतानि कर्हिचित् । त्यजेयुर्ब्राह्मणा विप्रं तं ग्रामाद्ब्रह्मसंकुलात्

yadi copadiśedvipraḥ śūdraṁ caitāni karhicit tyajeyurbrāhmaṇā vipraṁ taṁ grāmādbrahmasaṁkulāt

यदि कोई ब्राह्मण कभी शूद्र को ये सब सिखा दे, तो ब्राह्मणों को उस ब्राह्मण को ब्राह्मणों से भरे गाँव से निकाल देना चाहिए।

श्लोक 42 (skanda.3.10.42)

शूद्राय चोपदेष्टारं द्विजं चंडालवत्त्यजेत् । शूद्रं चाक्षरसंयुक्तं दूरतः परिवर्जयेत्

śūdrāya copadeṣṭāraṁ dvijaṁ caṁḍālavattyajet śūdraṁ cākṣarasaṁyuktaṁ dūrataḥ parivarjayet

शूद्र को सिखाने वाले ब्राह्मण को चंडाल के समान त्याग देना चाहिए। और अक्षर-ज्ञान वाले शूद्र को दूर से ही त्याग देना चाहिए।

श्लोक 43 (skanda.3.10.43)

अतः शुश्रूष भद्रं ते ब्राह्मणाञ्छ्रद्धया सह । शूद्रस्य द्विजशुश्रूषा मन्वादिभिरुदीरिता

ataḥ śuśrūṣa bhadraṁ te brāhmaṇāñchraddhayā saha śūdrasya dvijaśuśrūṣā manvādibhirudīritā

अतः श्रद्धापूर्वक ब्राह्मणों की सेवा करो; तुम्हारा कल्याण हो। शूद्र के लिए ब्राह्मणों की सेवा ही मनु आदि द्वारा बताई गई है।

श्लोक 44 (skanda.3.10.44)

नहि नैसर्गिकं कर्म परित्यक्तुं त्वमर्हसि । एवमुक्तस्तु मुनिना स शूद्रोऽचिंतयत्तदा

nahi naisargikaṁ karma parityaktuṁ tvamarhasi evamuktastu muninā sa śūdro'ciṁtayattadā

तुम्हें अपने स्वाभाविक कर्म को त्यागना उचित नहीं है।" मुनि द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर वह शूद्र तब सोचने लगा —

श्लोक 45 (skanda.3.10.45)

किं कर्तव्यं मया त्वद्य व्रते श्रद्धा हि मे पुरा । यथा स्यान्मम विज्ञानं यतिष्येऽहं तथाद्य वै

kiṁ kartavyaṁ mayā tvadya vrate śraddhā hi me purā yathā syānmama vijñānaṁ yatiṣye'haṁ tathādya vai

"मुझे अब क्या करना चाहिए? पहले से ही मेरी इस व्रत में श्रद्धा है। मुझे जिस प्रकार ज्ञान प्राप्त हो, उसके लिए मैं आज ही प्रयत्न करूँगा।"

श्लोक 46 (skanda.3.10.46)

इति निश्चित्य मनसा शूद्रो दृढमतिस्तदा । गत्वाश्रमपदाद्दूरं कृतवानुटजं शुभम्

iti niścitya manasā śūdro dṛḍhamatistadā gatvāśramapadāddūraṁ kṛtavānuṭajaṁ śubham

इस प्रकार मन में निश्चय करके शूद्र दृढ़मति ने तब आश्रम-स्थल से दूर जाकर एक शुभ कुटिया बनाई।

श्लोक 47 (skanda.3.10.47)

तत्र वै देवतागारं पुण्यान्यायतनानिच । पुष्पारामादिकं चापि तटाकखननादिकम्

tatra vai devatāgāraṁ puṇyānyāyatanānica puṣpārāmādikaṁ cāpi taṭākakhananādikam

वहाँ उसने श्रद्धापूर्वक देव-मंदिर, पुण्य आयतन, तथा पुष्प-उद्यान आदि, तथा तालाब खोदना आदि —

श्लोक 48 (skanda.3.10.48)

श्रद्धया कारयामास तपःसिद्ध्यर्थमात्मनः । अभिषेकांश्च नियमानुपवासादिकानपि

śraddhayā kārayāmāsa tapaḥsiddhyarthamātmanaḥ abhiṣekāṁśca niyamānupavāsādikānapi

— अपने तप की सिद्धि के लिए करवाया। तथा अभिषेक, नियम और उपवास आदि भी।

श्लोक 49 (skanda.3.10.49)

बलिं च कृत्वा हुत्वा च दैवतान्यभ्यपूजयत् । संकल्पनियमोपेतः फलाहारो जितेंद्रियः

baliṁ ca kṛtvā hutvā ca daivatānyabhyapūjayat saṁkalpaniyamopetaḥ phalāhāro jiteṁdriyaḥ

बलि और होम करके उसने देवताओं का पूजन किया। संकल्प और नियम से युक्त, फलाहारी, जितेन्द्रिय होकर,

श्लोक 50 (skanda.3.10.50)

नित्यं कंदैश्च मूलैश्च पुष्पैरपि तथा फलैः । अतिथीन्पूजयामास यथावत्समुपागतान्

nityaṁ kaṁdaiśca mūlaiśca puṣpairapi tathā phalaiḥ atithīnpūjayāmāsa yathāvatsamupāgatān

— नित्य कंद, मूल, पुष्प तथा फलों से, जो भी अतिथि आते थे, उनका यथोचित सत्कार करता था।

श्लोक 51 (skanda.3.10.51)

एवं हि सुमहान्कालो व्यतिचक्राम तस्य वै । अथाश्रममगात्तस्य सुमतिर्नाम नामतः

evaṁ hi sumahānkālo vyaticakrāma tasya vai athāśramamagāttasya sumatirnāma nāmataḥ

इस प्रकार उसका बहुत लंबा समय व्यतीत हो गया। फिर उसके आश्रम में सुमति नामक —

श्लोक 52 (skanda.3.10.52)

द्विजो गर्गकुलोद्भूतः सत्यवादी जितेंद्रियः । स्वागतेन मुनिं पूज्य तोषयित्वा फलादिकैः

dvijo gargakulodbhūtaḥ satyavādī jiteṁdriyaḥ svāgatena muniṁ pūjya toṣayitvā phalādikaiḥ

— गर्ग-कुल में उत्पन्न, सत्यवादी, जितेन्द्रिय ब्राह्मण आया। स्वागत से उस मुनि का सम्मान कर, फल आदि से उसे प्रसन्न करके,

श्लोक 53 (skanda.3.10.53)

कथयन्वै कथाः पुण्याः कुशलं पर्यपृच्छत । इत्थं सप्रणिपाताद्यैरुपचारैस्तु पूजितः

kathayanvai kathāḥ puṇyāḥ kuśalaṁ paryapṛcchata itthaṁ sapraṇipātādyairupacāraistu pūjitaḥ

— पुण्य कथाएँ कहते हुए उसने उसका कुशल-क्षेम पूछा। इस प्रकार प्रणाम आदि उपचारों से सम्मानित होकर,

श्लोक 54 (skanda.3.10.54)

आशीर्भिरभिनंद्यैनं प्रतिगृह्य च सत्क्रियाम् । तमापृछ्य प्रहृष्टाप्मा स्वाश्रमं पुनराययौ

āśīrbhirabhinaṁdyainaṁ pratigṛhya ca satkriyām tamāpṛchya prahṛṣṭāpmā svāśramaṁ punarāyayau

— आशीर्वाद देकर उसका अभिनंदन करके, उसकी सत्कार-भावना को स्वीकार कर, उससे विदा लेकर, अत्यंत प्रसन्न होकर वह पुनः अपने आश्रम को लौट गया।

श्लोक 55 (skanda.3.10.55)

एवं दिनेदिने विप्रः शूद्रेस्मिन्पक्षपातवान् । आगच्छदाश्रमं तस्य द्रष्टुं तं शूद्रयोनिजम्

evaṁ dinedine vipraḥ śūdresminpakṣapātavān āgacchadāśramaṁ tasya draṣṭuṁ taṁ śūdrayonijam

इस प्रकार, दिन-प्रतिदिन वह ब्राह्मण, इस शूद्र के प्रति पक्षपाती होकर, उस शूद्र-योनि में उत्पन्न व्यक्ति को देखने के लिए उसके आश्रम आने लगा।

श्लोक 56 (skanda.3.10.56)

बहुकालं द्विजस्याभूत्संसर्गः शूद्रयोनिना । स्नेहस्य वशमापन्नः शूद्रोक्तं नातिचक्रमे

bahukālaṁ dvijasyābhūtsaṁsargaḥ śūdrayoninā snehasya vaśamāpannaḥ śūdroktaṁ nāticakrame

बहुत काल तक उस ब्राह्मण का उस शूद्र-योनि वाले के साथ संसर्ग रहा। स्नेह के वशीभूत होकर उसने शूद्र की बात का उल्लंघन नहीं किया।

श्लोक 57 (skanda.3.10.57)

अथागतं द्विजं शूद्रः प्राह स्नेहवशीकृतम् । हव्यकव्यविधानं मे कृत्स्नं ब्रूहि मुनीश्वर

athāgataṁ dvijaṁ śūdraḥ prāha snehavaśīkṛtam havyakavyavidhānaṁ me kṛtsnaṁ brūhi munīśvara

फिर स्नेह-वशीभूत, आए हुए उस ब्राह्मण से शूद्र ने कहा — "हे मुनीश्वर, मुझे हव्य-कव्य की संपूर्ण विधि बताइए।

श्लोक 58 (skanda.3.10.58)

पितृकार्यविधानार्थं देवकार्यार्थमेव च । मंत्रानुपदिश त्वं मे महालयविधिं तथा

pitṛkāryavidhānārthaṁ devakāryārthameva ca maṁtrānupadiśa tvaṁ me mahālayavidhiṁ tathā

पितृ-कार्य की विधि के लिए, तथा देव-कार्य के लिए भी, मुझे मंत्र सिखाइए, तथा महालय की विधि भी।

श्लोक 59 (skanda.3.10.59)

अष्टकाश्राद्धकृत्यं च वैदिकं यच्च किंचन । सर्वमेतद्रहस्यं मे ब्रूहि त्वं वै गुरुर्मतः

aṣṭakāśrāddhakṛtyaṁ ca vaidikaṁ yacca kiṁcana sarvametadrahasyaṁ me brūhi tvaṁ vai gururmataḥ

तथा अष्टका-श्राद्ध का कर्म, और जो भी वैदिक हो — यह सब गुह्य ज्ञान मुझे बताइए; आप ही मेरे गुरु माने जाते हैं।"

श्लोक 60 (skanda.3.10.60)

एवमुक्तः स शूद्रेण सर्वमेतदुपादिशत् । कारयामास तस्यायं पितृकार्यादिकं तथा

evamuktaḥ sa śūdreṇa sarvametadupādiśat kārayāmāsa tasyāyaṁ pitṛkāryādikaṁ tathā

शूद्र द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर उसने उसे यह सब सिखा दिया। उस (शूद्र) ने भी उससे पितृ-कार्य आदि करवाया।

श्लोक 61 (skanda.3.10.61)

पितृकार्ये कृते तेन विसृष्टः स द्विजो गतः । अथ दीर्घेण कालेन पोषितः शूद्रयोनिना

pitṛkārye kṛte tena visṛṣṭaḥ sa dvijo gataḥ atha dīrgheṇa kālena poṣitaḥ śūdrayoninā

पितृ-कार्य संपन्न होने पर विदा होकर वह ब्राह्मण चला गया। फिर दीर्घकाल तक शूद्र-योनि वाले द्वारा पालित-पोषित होकर —

श्लोक 62 (skanda.3.10.62)

त्यक्तो विप्रगणैः सोऽयं पंचत्वमगमद्द्विजः । वैवस्वतभटैर्नीत्वा पातितो नरकेष्वपि

tyakto vipragaṇaiḥ so'yaṁ paṁcatvamagamaddvijaḥ vaivasvatabhaṭairnītvā pātito narakeṣvapi

— ब्राह्मण-समुदाय द्वारा त्याग दिया गया वह ब्राह्मण मृत्यु को प्राप्त हुआ; वैवस्वत (यम) के दूतों द्वारा ले जाकर उसे नरकों में भी गिरा दिया गया।

श्लोक 63 (skanda.3.10.63)

कल्पकोटिसहस्राणि कल्पकोटिशतानि च । भुक्त्वा क्रमेण नरकांस्तदंते स्था वरोऽभवत्

kalpakoṭisahasrāṇi kalpakoṭiśatāni ca bhuktvā krameṇa narakāṁstadaṁte sthā varo'bhavat

हजारों करोड़ कल्पों तथा सैकड़ों करोड़ कल्पों तक क्रमशः नरकों को भोगकर, उसके अंत में वह स्थावर (वृक्षादि) बना।

श्लोक 64 (skanda.3.10.64)

गर्दभस्तु ततो जज्ञे विड्वराहस्ततः परम् । जज्ञेऽथ सारमेयोऽसौ पश्चाद्वायसतां गतः

gardabhastu tato jajñe viḍvarāhastataḥ param jajñe'tha sārameyo'sau paścādvāyasatāṁ gataḥ

फिर वह गधा बना, उसके बाद मल-भक्षी सूअर बना; फिर वह कुत्ता बना, तथा तत्पश्चात् कौआ बना।

श्लोक 65 (skanda.3.10.65)

अथ चंडालतां प्राप शूद्रयोनिमगात्ततः । गतवान्वैश्यतां पश्चात्क्षत्रियस्तदनंतरम्

atha caṁḍālatāṁ prāpa śūdrayonimagāttataḥ gatavānvaiśyatāṁ paścātkṣatriyastadanaṁtaram

फिर वह चंडाल बना, उसके बाद शूद्र-योनि को प्राप्त हुआ; फिर वैश्य बना, और उसके बाद क्षत्रिय बना।

श्लोक 66 (skanda.3.10.66)

प्रबलैर्बाध्यमानोऽसौ ब्राह्मणो वै तदाऽभवत् । उपनीतः स पित्रा तु वर्षे गर्भाष्टमे द्विजः

prabalairbādhyamāno'sau brāhmaṇo vai tadā'bhavat upanītaḥ sa pitrā tu varṣe garbhāṣṭame dvijaḥ

बलवानों द्वारा पीड़ित होते हुए वह तब ब्राह्मण बना; और उस ब्राह्मण का उसके पिता द्वारा गर्भ के आठवें वर्ष में उपनयन-संस्कार किया गया।

श्लोक 67 (skanda.3.10.67)

वर्तमानः पितुर्गेहे स्वाचाराभ्यासतत्परः । गच्छन्कदाचिद्गहने गृहीतो ब्रह्मरक्षसा

vartamānaḥ piturgehe svācārābhyāsatatparaḥ gacchankadācidgahane gṛhīto brahmarakṣasā

पिता के घर में रहते हुए, अपने आचार के अभ्यास में तत्पर, एक बार सघन वन में जाते हुए वह ब्रह्मराक्षस द्वारा पकड़ लिया गया।

श्लोक 68 (skanda.3.10.68)

रुदन्भ्रमन्स्खल न्मूढः प्रहसन्विलपन्नसौ । शश्वद्धाहेति च वदन्वैदिकं कर्म सोऽत्यजत्

rudanbhramanskhala nmūḍhaḥ prahasanvilapannasau śaśvaddhāheti ca vadanvaidikaṁ karma so'tyajat

रोता हुआ, भटकता हुआ, लड़खड़ाता हुआ, मूढ़, हँसता हुआ, विलाप करता हुआ, निरंतर "हाय-हाय" कहता हुआ, उसने वैदिक कर्म को त्याग दिया।

श्लोक 69 (skanda.3.10.69)

दृष्ट्वा सुतं तथाभूतं पिता दुःखेन पीडितः । सुतमादाय च स्नेहा दगस्त्यं शरणं ययौ

dṛṣṭvā sutaṁ tathābhūtaṁ pitā duḥkhena pīḍitaḥ sutamādāya ca snehā dagastyaṁ śaraṇaṁ yayau

अपने पुत्र को इस अवस्था में देखकर, दुःख से पीड़ित पिता, स्नेहवश अपने पुत्र को लेकर अगस्त्य की शरण में गया।

श्लोक 70 (skanda.3.10.70)

भक्त्या मुनिं प्रणम्यासौ पिता तस्य सुतस्य वै । तस्मै निवेदयामास स्वपुत्रस्य विचेष्टितम्

bhaktyā muniṁ praṇamyāsau pitā tasya sutasya vai tasmai nivedayāmāsa svaputrasya viceṣṭitam

भक्तिपूर्वक उस मुनि को प्रणाम कर, उस पुत्र के पिता ने उन्हें अपने पुत्र की दशा बताई।

श्लोक 71 (skanda.3.10.71)

अब्रवीच्च तदा विप्रः कुम्भजं मुनिपुंगवम् । एष मे तनयो ब्रह्मन्गृहीतो ब्रह्मरक्षसा

abravīcca tadā vipraḥ kumbhajaṁ munipuṁgavam eṣa me tanayo brahmangṛhīto brahmarakṣasā

तब उस ब्राह्मण ने कुंभज मुनिश्रेष्ठ (अगस्त्य) से कहा — "हे ब्रह्मन्, यह मेरा पुत्र है, जो ब्रह्मराक्षस द्वारा पकड़ा गया है;

श्लोक 72 (skanda.3.10.72)

सुखं न भजते ब्रह्मन्रक्ष तं करुणादृशा । नास्ति मे तनयोऽ प्यन्यः पितॄणामृणमुक्तये

sukhaṁ na bhajate brahmanrakṣa taṁ karuṇādṛśā nāsti me tanayo' pyanyaḥ pitṝṇāmṛṇamuktaye

— इसे कोई सुख नहीं मिलता, हे ब्रह्मन्; अपनी करुणा-दृष्टि से इसकी रक्षा कीजिए। पितरों के ऋण से मुक्ति के लिए मेरा कोई अन्य पुत्र भी नहीं है।

श्लोक 73 (skanda.3.10.73)

अस्य पीडाविनाशार्थमुपायं ब्रूहि कुम्भज । त्वत्समस्त्रिषु लोकेषु तपःशीलो न विद्यते

asya pīḍāvināśārthamupāyaṁ brūhi kumbhaja tvatsamastriṣu lokeṣu tapaḥśīlo na vidyate

हे कुंभज, इसकी पीड़ा के नाश के लिए उपाय बताइए। तीनों लोकों में आपके समान तपःशील कोई नहीं है।

श्लोक 74 (skanda.3.10.74)

अग्रणीः शिवभक्तानामुक्तस्त्वं हि महर्षिभिः । त्वां विनास्य परित्राणं न मेपुत्रस्य विद्यते

agraṇīḥ śivabhaktānāmuktastvaṁ hi maharṣibhiḥ tvāṁ vināsya paritrāṇaṁ na meputrasya vidyate

महर्षियों द्वारा आप शिव-भक्तों में अग्रणी कहे गए हैं। आपके बिना मेरे पुत्र की कोई रक्षा नहीं है।

श्लोक 75 (skanda.3.10.75)

पित्रे कृपां कुरुष्व त्वं दयाशीला हि साधवः । श्रीसूत उवाच । एवमुक्तस्तदा तेन कुम्भजो ध्यानमास्थितः

pitre kṛpāṁ kuruṣva tvaṁ dayāśīlā hi sādhavaḥ śrīsūta uvāca evamuktastadā tena kumbhajo dhyānamāsthitaḥ

पिता पर कृपा कीजिए, क्योंकि साधुजन स्वभाव से दयाशील होते हैं।" श्री सूत जी ने कहा — इस प्रकार उसके द्वारा कहे जाने पर कुंभज (अगस्त्य) ध्यान में स्थित हुए।

श्लोक 76 (skanda.3.10.76)

ध्यात्वा तु सुचिरं कालमब्रवीद्ब्राह्मणं ततः । अगस्त्य उवाच । पूर्वजन्मनि ते पुत्रो ब्राह्मणोऽयं महामते

dhyātvā tu suciraṁ kālamabravīdbrāhmaṇaṁ tataḥ agastya uvāca pūrvajanmani te putro brāhmaṇo'yaṁ mahāmate

बहुत देर तक ध्यान करके उन्होंने तब उस ब्राह्मण से कहा। अगस्त्य ने कहा — "हे महामते, यह तुम्हारा पुत्र पूर्वजन्म में एक ब्राह्मण था —

श्लोक 77 (skanda.3.10.77)

सुमतिर्नाम विप्रोऽयं मतिं शूद्राय वै ददौ । कर्माणि वैदिकान्येष सर्वाण्युपदि देश वै

sumatirnāma vipro'yaṁ matiṁ śūdrāya vai dadau karmāṇi vaidikānyeṣa sarvāṇyupadi deśa vai

— सुमति नामक यह विप्र, जिसने शूद्र को उपदेश दिया था; इसने उसे समस्त वैदिक कर्म सिखा दिए थे।

श्लोक 78 (skanda.3.10.78)

अतोऽयं नरकान्भुक्त्वा कल्पकोटिसहस्रकम् । जातो भुवि तदंतेषु स्थावरादिषु योनिषु

ato'yaṁ narakānbhuktvā kalpakoṭisahasrakam jāto bhuvi tadaṁteṣu sthāvarādiṣu yoniṣu

अतः यह हजारों करोड़ कल्पों तक नरकों को भोगकर, उसके बाद पृथ्वी पर स्थावर आदि योनियों में उत्पन्न हुआ,

श्लोक 79 (skanda.3.10.79)

इदानीं ब्राह्मणो जातः कर्मशेषेण ते सुतः । यमेन प्रेषितेनात्र गृहीतो ब्रह्मरक्षसा

idānīṁ brāhmaṇo jātaḥ karmaśeṣeṇa te sutaḥ yamena preṣitenātra gṛhīto brahmarakṣasā

— और अब कर्मशेष से तुम्हारे पुत्र, ब्राह्मण के रूप में उत्पन्न हुआ है। यहाँ यम द्वारा भेजे गए ब्रह्मराक्षस द्वारा वह पकड़ा गया है,

श्लोक 80 (skanda.3.10.80)

क्रूरेण पातकेनाद्धा पूवजन्मकृतेन वै । उपायं ते प्रवक्ष्यामि ब्रह्मरक्षोविनाशने

krūreṇa pātakenāddhā pūvajanmakṛtena vai upāyaṁ te pravakṣyāmi brahmarakṣovināśane

— सचमुच पूर्वजन्म में किए गए उस क्रूर पाप के कारण। मैं तुम्हें ब्रह्मराक्षस के नाश का उपाय बताता हूँ।

श्लोक 81 (skanda.3.10.81)

शृणुष्व श्रद्धया युक्तः समाधाय च मानसम् । दक्षिणांभोनिधौ विप्र सेतुरूपो महागिरिः

śṛṇuṣva śraddhayā yuktaḥ samādhāya ca mānasam dakṣiṇāṁbhonidhau vipra seturūpo mahāgiriḥ

श्रद्धापूर्वक, मन को एकाग्र करके सुनो। हे विप्र, दक्षिणी समुद्र में सेतु-रूप एक महान पर्वत है,

श्लोक 82 (skanda.3.10.82)

वर्तते दैवतैः सेव्यः पावनो गन्धमादनः । तस्योपरि महातीर्थं नाम्ना पापविनाशनम्

vartate daivataiḥ sevyaḥ pāvano gandhamādanaḥ tasyopari mahātīrthaṁ nāmnā pāpavināśanam

— जो देवताओं द्वारा सेवित, पावन गंधमादन है। उसके ऊपर पापविनाशन नामक एक महातीर्थ है,

श्लोक 83 (skanda.3.10.83)

अस्ति पुण्यं प्रसिद्धं च महापातकनाशनम् । भूतप्रेतपिशाचानां वेतालब्रह्म रक्षसाम्

asti puṇyaṁ prasiddhaṁ ca mahāpātakanāśanam bhūtapretapiśācānāṁ vetālabrahma rakṣasām

— जो पुण्यमय, प्रसिद्ध, महापातकों का नाशक है। भूत, प्रेत, पिशाच, वेताल तथा ब्रह्मराक्षस —

श्लोक 84 (skanda.3.10.84)

महतां चैव रोगाणां तीर्थं तन्नाशकं स्मृतम् । सुतमादाय गच्छ त्वं तत्तीर्थं सेतुमध्यगम्

mahatāṁ caiva rogāṇāṁ tīrthaṁ tannāśakaṁ smṛtam sutamādāya gaccha tvaṁ tattīrthaṁ setumadhyagam

— तथा महारोगों का भी वह तीर्थ नाशक माना गया है। अपने पुत्र को लेकर तुम सेतु के मध्य स्थित उस तीर्थ में जाओ।

श्लोक 85 (skanda.3.10.85)

प्रयतः स्नापय सुतं तीर्थे पापविनाशने । स्नानेन त्रिदिनं तत्र ब्रह्मरक्षो विनश्यति

prayataḥ snāpaya sutaṁ tīrthe pāpavināśane snānena tridinaṁ tatra brahmarakṣo vinaśyati

पवित्र होकर पापविनाशन तीर्थ में अपने पुत्र को स्नान कराओ। वहाँ तीन दिन स्नान करने से ब्रह्मराक्षस नष्ट हो जाता है।

श्लोक 86 (skanda.3.10.86)

नैवोपायांतरं तस्य विनाशे विद्यते भुवि । तस्माच्छीघ्रं प्रयाहि त्वं रामसेतुं विमुक्तिदम्

naivopāyāṁtaraṁ tasya vināśe vidyate bhuvi tasmācchīghraṁ prayāhi tvaṁ rāmasetuṁ vimuktidam

उसके विनाश का पृथ्वी पर कोई अन्य उपाय नहीं है। अतः तुम शीघ्र मुक्तिदायी रामसेतु को जाओ।

श्लोक 87 (skanda.3.10.87)

तत्र पापविनाशाख्यतीर्थे स्नापय ते सुतम् । मा विलंबं कुरुष्वात्र त्वरया याहि वै द्विज

tatra pāpavināśākhyatīrthe snāpaya te sutam mā vilaṁbaṁ kuruṣvātra tvarayā yāhi vai dvija

वहाँ पापविनाश नामक तीर्थ में अपने पुत्र को स्नान कराओ। यहाँ विलंब मत करो; हे द्विज, शीघ्रता से जाओ।"

श्लोक 88 (skanda.3.10.88)

इत्युक्तः स द्विजोऽगस्त्यं प्रणम्य भुवि दण्डवत् । अनुज्ञातश्च तेनासौ प्रययौ गंधमादनम्

ityuktaḥ sa dvijo'gastyaṁ praṇamya bhuvi daṇḍavat anujñātaśca tenāsau prayayau gaṁdhamādanam

इस प्रकार कहे जाने पर उस ब्राह्मण ने अगस्त्य को भूमि पर दंडवत् प्रणाम किया, और उनकी अनुमति पाकर गंधमादन को प्रस्थान किया।

श्लोक 89 (skanda.3.10.89)

सुतेन साकं विप्रेंद्रो गत्वा पापविनाशनम् । संकल्पपूर्वं संस्नाप्य दिनत्रयमसौसुतम्

sutena sākaṁ vipreṁdro gatvā pāpavināśanam saṁkalpapūrvaṁ saṁsnāpya dinatrayamasausutam

वह ब्राह्मणश्रेष्ठ, अपने पुत्र के साथ पापविनाशन जाकर, संकल्पपूर्वक अपने पुत्र को तीन दिनों तक स्नान कराकर,

श्लोक 90 (skanda.3.10.90)

सस्नौ स्वयं च विप्रेंद्राः पिता पापविनाशने । अथ तस्य सुतस्तत्र विमुक्तो ब्रह्मरक्षसा

sasnau svayaṁ ca vipreṁdrāḥ pitā pāpavināśane atha tasya sutastatra vimukto brahmarakṣasā

— हे ब्राह्मणश्रेष्ठो, पिता ने भी स्वयं पापविनाशन में स्नान किया। तब उसका पुत्र वहाँ ब्रह्मराक्षस से मुक्त हो गया,

श्लोक 91 (skanda.3.10.91)

समजायत नीरोगः स्वस्थः सुन्दररूपधृक् । सर्वसंपत्समृद्धोऽसौ भुक्त्वा भोगाननेकशः

samajāyata nīrogaḥ svasthaḥ sundararūpadhṛk sarvasaṁpatsamṛddho'sau bhuktvā bhogānanekaśaḥ

— तथा रोगरहित, स्वस्थ, सुंदर रूप वाला हो गया। समस्त संपत्ति से समृद्ध वह अनेक भोगों को भोगकर,

श्लोक 92 (skanda.3.10.92)

देहांते प्रययौ मुक्तिं स्नानात्पापविनाशने । पितापि तत्र स्नानेन देहांते मुक्तिमाप्तवान्

dehāṁte prayayau muktiṁ snānātpāpavināśane pitāpi tatra snānena dehāṁte muktimāptavān

— देहांत होने पर पापविनाशन में स्नान के कारण मुक्ति को प्राप्त हुआ। पिता ने भी वहाँ स्नान करने से देहांत होने पर मुक्ति प्राप्त की।

श्लोक 93 (skanda.3.10.93)

तेनोपदिष्टो यः शूद्रः स भुक्त्वा नरकान्क्रमात् । अनेकासु जनित्वा च कुत्सितास्वपियोनिषु

tenopadiṣṭo yaḥ śūdraḥ sa bhuktvā narakānkramāt anekāsu janitvā ca kutsitāsvapiyoniṣu

उसके द्वारा उपदेश दिया गया वह शूद्र भी, क्रमशः नरकों को भोगकर, तथा अनेक निंदित योनियों में उत्पन्न होकर,

श्लोक 94 (skanda.3.10.94)

गृध्रजन्मा भवत्पश्चाद्गंधमादनपर्वते । स कदाचिज्जलं पातुं तीर्थे पापविनाशने

gṛdhrajanmā bhavatpaścādgaṁdhamādanaparvate sa kadācijjalaṁ pātuṁ tīrthe pāpavināśane

— बाद में गंधमादन पर्वत पर गिद्ध-योनि में उत्पन्न हुआ। एक बार पापविनाशन तीर्थ में जल पीने के लिए —

श्लोक 95 (skanda.3.10.95)

समागतः पपौ तोयं सिषिचे चात्मनस्तनुम् । तदैव दिव्यदेहः सन्सर्वाभरणभूषितः

samāgataḥ papau toyaṁ siṣice cātmanastanum tadaiva divyadehaḥ sansarvābharaṇabhūṣitaḥ

— वह वहाँ आया, जल पिया, तथा अपने शरीर पर उसे छिड़का। उसी क्षण दिव्य देह वाला, समस्त आभूषणों से विभूषित होकर,

श्लोक 96 (skanda.3.10.96)

दिव्यमाल्यांबरधरो रक्तचंदनरूषितः । दिव्यं विमानमारुह्य शोभितश्छत्रचामरैः

divyamālyāṁbaradharo raktacaṁdanarūṣitaḥ divyaṁ vimānamāruhya śobhitaśchatracāmaraiḥ

— दिव्य माला-वस्त्र धारण किए हुए, रक्त-चंदन से अनुलिप्त, दिव्य विमान पर आरूढ़ होकर, छत्र-चामरों से सुशोभित,

श्लोक 97 (skanda.3.10.97)

उत्तमस्त्रीपरिवृतः प्रययावमरालयम्

uttamastrīparivṛtaḥ prayayāvamarālayam

— उत्तम स्त्रियों से घिरा हुआ, वह देवलोक को चला गया।

श्लोक 98 (skanda.3.10.98)

श्रीसूत उवाच । एवं प्रभावमेतद्वै तीर्थं पापविनाशनम् । स्वर्गदं मोक्षदं पुण्यं प्रायश्चित्तकरं तथा । ब्रह्मविष्णुमहे शानैः सेवितं सुरसेवितम्

śrīsūta uvāca evaṁ prabhāvametadvai tīrthaṁ pāpavināśanam svargadaṁ mokṣadaṁ puṇyaṁ prāyaścittakaraṁ tathā brahmaviṣṇumahe śānaiḥ sevitaṁ surasevitam

श्री सूत जी ने कहा — इस प्रकार यह पापविनाशन तीर्थ ऐसे ही प्रभाव वाला है — स्वर्गदायी, मोक्षदायी, पुण्यमय, तथा प्रायश्चित्त-स्वरूप भी; ब्रह्मा-विष्णु-महेश द्वारा सेवित, देवताओं द्वारा सेवित।

श्लोक 99 (skanda.3.10.99)

पापानां नाशनाद्विप्राः पापनाशाभिधं हि तत् । श्रेयोर्थी पुरुषस्तस्मात्स्नायात्पापविनाशने

pāpānāṁ nāśanādviprāḥ pāpanāśābhidhaṁ hi tat śreyorthī puruṣastasmātsnāyātpāpavināśane

हे विप्रो, पापों के नाश के कारण ही वह पापनाश नाम से प्रसिद्ध है। अतः कल्याण की इच्छा रखने वाले पुरुष को पापविनाशन में स्नान करना चाहिए।

श्लोक 100 (skanda.3.10.100)

इत्थं रहस्यं कथितं मुनींद्रास्तद्वैभवं पापविनाशनस्य । यत्राभिषेकात्सहसा विमुक्तौ द्विजश्च शूद्रश्च विनिंद्यकृत्यौ

itthaṁ rahasyaṁ kathitaṁ munīṁdrāstadvaibhavaṁ pāpavināśanasya yatrābhiṣekātsahasā vimuktau dvijaśca śūdraśca viniṁdyakṛtyau

हे मुनीन्द्रो, इस प्रकार यह रहस्य, पापविनाशन का यह माहात्म्य बताया गया, जहाँ अभिषेक मात्र से निंदित कर्म करने वाले ब्राह्मण और शूद्र दोनों तुरंत मुक्त हो गए।

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