ब्रह्म खण्ड · अध्याय 11
सीतासर का माहात्म्य तथा इन्द्र की ब्रह्महत्या-मुक्ति
श्लोक 1 (skanda.3.11.1)
श्रीसूत उवाच । पापनाशे नरः स्नात्वा सर्वपापनिबर्हणे । ततः सीतासरो गच्छेत्स्नातुं नियमपूर्वकम्
śrīsūta uvāca pāpanāśe naraḥ snātvā sarvapāpanibarhaṇe tataḥ sītāsaro gacchetsnātuṁ niyamapūrvakam
श्री सूत जी ने कहा — मनुष्य समस्त पापों को नष्ट करने वाले पापनाश में स्नान करके फिर नियमपूर्वक स्नान करने के लिए सीतासर को जाए।
श्लोक 2 (skanda.3.11.2)
यानि कानि च पुण्यानि ब्रह्मांडांतर्गतानि वै । तानि गंगादितीर्थानि स्वपापपरिशुद्धये
yāni kāni ca puṇyāni brahmāṁḍāṁtargatāni vai tāni gaṁgāditīrthāni svapāpapariśuddhaye
ब्रह्मांड के भीतर जो भी पुण्य स्थान हैं, वे गंगा आदि तीर्थ, अपने पापों की शुद्धि के लिए,
श्लोक 3 (skanda.3.11.3)
सीतासरसि वर्तंते महापातकनाशने । क्षेत्राण्यपि महार्हाणि काश्यादीनि दिवानिशम्
sītāsarasi vartaṁte mahāpātakanāśane kṣetrāṇyapi mahārhāṇi kāśyādīni divāniśam
— पापविनाशक सीतासर में ही स्थित हैं; तथा काशी आदि महान् पूज्य क्षेत्र भी दिन-रात —
श्लोक 4 (skanda.3.11.4)
सीतासरोत्र सेवंते स्वस्वकल्मषशांतये । तस्याः सरसि संगीतगुणेनाकृष्य बालिशः
sītāsarotra sevaṁte svasvakalmaṣaśāṁtaye tasyāḥ sarasi saṁgītaguṇenākṛṣya bāliśaḥ
— इस सीतासर की सेवा करते हैं, अपने-अपने पापों की शांति के लिए। उसके सरोवर में संगीत के गुण से आकर्षित होकर वह भोला (शिव) —
श्लोक 5 (skanda.3.11.5)
पंचाननोऽपि वसते पंचपातकनाशनः । तदेतत्तीर्थमागत्य स्नात्वा वै श्रद्धया सह । पुरंदरः पुरा विप्रा मुमुचे ब्रह्महत्यया
paṁcānano'pi vasate paṁcapātakanāśanaḥ tadetattīrthamāgatya snātvā vai śraddhayā saha puraṁdaraḥ purā viprā mumuce brahmahatyayā
— पंचमुख (शिव) भी वहाँ निवास करते हैं, जो पंच महापातकों के नाशक हैं। इसी तीर्थ में आकर तथा श्रद्धापूर्वक स्नान करके, हे विप्रो, पुरंदर (इन्द्र) प्राचीन काल में ब्रह्महत्या से मुक्त हुए थे।
श्लोक 6 (skanda.3.11.6)
ऋषय ऊचुः । ब्रह्महत्या कथमभूद्वासवस्य पुरा मुने । सीतासरसि स्नानात्कथं मुक्तोऽभवत्तया
ṛṣaya ūcuḥ brahmahatyā kathamabhūdvāsavasya purā mune sītāsarasi snānātkathaṁ mukto'bhavattayā
ऋषियों ने कहा — हे मुने, प्राचीन काल में वासव (इन्द्र) को ब्रह्महत्या कैसे लगी? और सीतासर में स्नान से वह उससे कैसे मुक्त हुए?
श्लोक 7 (skanda.3.11.7)
श्रीसूत उवाच । कपालाभरणोनाम राक्षसोऽभूत्पुरा द्विजाः
śrīsūta uvāca kapālābharaṇonāma rākṣaso'bhūtpurā dvijāḥ
श्री सूत जी ने कहा — हे द्विजो, प्राचीन काल में कपालाभरण नामक एक राक्षस था।
श्लोक 8 (skanda.3.11.8)
अवध्यः सर्वदेवानां सोऽभवद्ब्रह्मणो वरात् । शवभक्षणनामा तु तस्यासीन्मंत्रिसत्तमः
avadhyaḥ sarvadevānāṁ so'bhavadbrahmaṇo varāt śavabhakṣaṇanāmā tu tasyāsīnmaṁtrisattamaḥ
ब्रह्मा के वरदान से वह समस्त देवताओं द्वारा अवध्य हो गया था। और शवभक्षण नामक उसका एक श्रेष्ठ मंत्री था।
श्लोक 9 (skanda.3.11.9)
अक्षौहिणीशतं तस्य हयेभरथसंकुलम् । अस्ति तस्य पुरं चापि वैजयंतमिति श्रुतम्
akṣauhiṇīśataṁ tasya hayebharathasaṁkulam asti tasya puraṁ cāpi vaijayaṁtamiti śrutam
उसकी सौ अक्षौहिणी सेना थी, जो हाथी-घोड़े-रथों से भरी हुई थी। और उसका एक नगर भी था, जो वैजयंत नाम से विख्यात था।
श्लोक 10 (skanda.3.11.10)
वसत्यस्मिन्पुरे सोऽयं कपालाभरणो बली । शवभक्षं समाहूय बभाषे मंत्रिणं द्विजाः
vasatyasminpure so'yaṁ kapālābharaṇo balī śavabhakṣaṁ samāhūya babhāṣe maṁtriṇaṁ dvijāḥ
हे द्विजो, इस नगर में निवास करते हुए इस बलवान कपालाभरण ने अपने मंत्री शवभक्ष को बुलाकर कहा —
श्लोक 11 (skanda.3.11.11)
शवभक्ष महावीर्य मंत्रशास्त्रेषु कोविद । वयं देवपुरीं गत्वा विनिर्जित्य सुरान्रणे
śavabhakṣa mahāvīrya maṁtraśāstreṣu kovida vayaṁ devapurīṁ gatvā vinirjitya surānraṇe
"हे शवभक्ष, हे महावीर्य, हे मंत्रशास्त्र में निपुण, हम देवपुरी जाकर, युद्ध में देवताओं को जीतकर,
श्लोक 12 (skanda.3.11.12)
शक्रस्य भवने रम्ये स्थास्यामस्सैनिकैः सह । रमावो नंदने तस्य रंभाद्यप्सरसां गणैः
śakrasya bhavane ramye sthāsyāmassainikaiḥ saha ramāvo naṁdane tasya raṁbhādyapsarasāṁ gaṇaiḥ
— इन्द्र के रमणीय भवन में अपने सैनिकों सहित रहेंगे; उनके नंदन वन में रंभा आदि अप्सराओं के समूहों के साथ रमण करेंगे।"
श्लोक 13 (skanda.3.11.13)
कपालाभरणस्येदं निशम्य वचनं तदा । शवभक्षोऽब्रवीद्विप्रा वचस्तत्र तथास्त्विति
kapālābharaṇasyedaṁ niśamya vacanaṁ tadā śavabhakṣo'bravīdviprā vacastatra tathāstviti
कपालाभरण के इस वचन को सुनकर, हे द्विजो, शवभक्ष ने तब वहाँ "ऐसा ही हो" यह वचन कहा।
श्लोक 14 (skanda.3.11.14)
ततः कपालाभरणः पुत्रं दुर्मेधसं बली । प्रतिष्ठाप्य पुरे शूरं सेनया परिवारितः
tataḥ kapālābharaṇaḥ putraṁ durmedhasaṁ balī pratiṣṭhāpya pure śūraṁ senayā parivāritaḥ
तब उस बलवान कपालाभरण ने अपने शूरवीर पुत्र दुर्मेधस को नगर में स्थापित करके, सेना से घिरा हुआ,
श्लोक 15 (skanda.3.11.15)
युयुत्सुरमरैः साकं प्रययावमरावतीम् । गजाश्वरथपादातैरुद्धतै रेणुसंचयैः
yuyutsuramaraiḥ sākaṁ prayayāvamarāvatīm gajāśvarathapādātairuddhatai reṇusaṁcayaiḥ
— देवताओं से युद्ध की इच्छा से अमरावती की ओर प्रस्थान किया, हाथी-घोड़े-रथ-पदातियों से उठी हुई धूल की राशियों के साथ,
श्लोक 16 (skanda.3.11.16)
शोषयञ्जलधीन्सिंधूंश्चूर्णयन्पर्वतानपि । निःसाणध्वनिना विप्रा नादयन्रोदसी तथा
śoṣayañjaladhīnsiṁdhūṁścūrṇayanparvatānapi niḥsāṇadhvaninā viprā nādayanrodasī tathā
— समुद्रों और नदियों को सुखाते हुए, पर्वतों को भी चूर-चूर करते हुए, हे विप्रो, नगाड़ों की ध्वनि से आकाश और पृथ्वी दोनों को गुंजायमान करते हुए,
श्लोक 17 (skanda.3.11.17)
अश्वानां हेषितरवैर्गजानामपि बृंहितैः । रथनेमिस्वनैरुग्रैः सिंहनादैः पदातिनाम्
aśvānāṁ heṣitaravairgajānāmapi bṛṁhitaiḥ rathanemisvanairugraiḥ siṁhanādaiḥ padātinām
— घोड़ों की हिनहिनाहट से, तथा हाथियों की चिंघाड़ से भी, रथ-चक्रों की भीषण ध्वनि से, पदातियों की सिंह-गर्जना से,
श्लोक 18 (skanda.3.11.18)
श्रोत्राणि दिग्गजानां च वितन्वन्बधिराणि सः । अगमद्देवनगरीं युयुत्सुरमरैः सह
śrotrāṇi diggajānāṁ ca vitanvanbadhirāṇi saḥ agamaddevanagarīṁ yuyutsuramaraiḥ saha
— दिग्गजों के कानों को भी बहरा करते हुए, वह युद्ध की इच्छा से, देवताओं के साथ युद्ध की कामना से, देवनगरी की ओर गया।
श्लोक 19 (skanda.3.11.19)
तत इन्द्रादयो देवाः सेनाकलकलध्वनिम् । श्रुत्वाभिनिर्य्ययुः पुर्या युद्धाभिमनसो द्विजाः
tata indrādayo devāḥ senākalakaladhvanim śrutvābhiniryyayuḥ puryā yuddhābhimanaso dvijāḥ
तब इन्द्र आदि देवता, हे द्विजो, उस सेना के कोलाहल को सुनकर, युद्ध के लिए उत्सुक मन से नगरी से बाहर निकले।
श्लोक 20 (skanda.3.11.20)
ततो युद्धं समभवद्देवानां राक्षसैः सह । अदृष्टपूर्वं जगति तथैवाश्रुतपूर्वकम्
tato yuddhaṁ samabhavaddevānāṁ rākṣasaiḥ saha adṛṣṭapūrvaṁ jagati tathaivāśrutapūrvakam
तब देवताओं और राक्षसों के बीच ऐसा युद्ध हुआ जो जगत में पहले न कभी देखा गया, न ही सुना गया था।
श्लोक 21 (skanda.3.11.21)
तत इन्द्रादयो देवा राक्षसाञ्जघ्नुराहवे । राक्षसाश्च सुराञ्जघ्नुः समरे विजिगीषवः
tata indrādayo devā rākṣasāñjaghnurāhave rākṣasāśca surāñjaghnuḥ samare vijigīṣavaḥ
तब इन्द्र आदि देवताओं ने युद्ध में राक्षसों को मारा, और विजय की इच्छा रखने वाले राक्षसों ने भी समर में देवताओं को मारा।
श्लोक 22 (skanda.3.11.22)
द्वन्द्वयुद्धं च समभूदन्योन्यं सुररक्षसाम् । कपालाभरणेनाजौ युयुधे बलवृत्रहा
dvandvayuddhaṁ ca samabhūdanyonyaṁ surarakṣasām kapālābharaṇenājau yuyudhe balavṛtrahā
और देवताओं तथा राक्षसों के बीच परस्पर द्वंद्व-युद्ध होने लगे। बल-वृत्रहन्ता इन्द्र ने युद्ध में कपालाभरण से युद्ध किया।
श्लोक 23 (skanda.3.11.23)
यमेन शवभक्षश्च वरुणेन च कौशिकः । कुबेरो रुधिराक्षेण युयुधे ब्राह्मणोत्तमाः
yamena śavabhakṣaśca varuṇena ca kauśikaḥ kubero rudhirākṣeṇa yuyudhe brāhmaṇottamāḥ
हे ब्राह्मणोत्तमो, शवभक्ष ने यम के साथ, कौशिक ने वरुण के साथ, तथा कुबेर ने रुधिराक्ष के साथ युद्ध किया।
श्लोक 24 (skanda.3.11.24)
मांसप्रियो मद्यसेवी क्रूरदृष्टिर्भयावहः । चत्वार एते विक्रांताः कपालाभरणानुजाः
māṁsapriyo madyasevī krūradṛṣṭirbhayāvahaḥ catvāra ete vikrāṁtāḥ kapālābharaṇānujāḥ
मांसप्रिय, मद्यसेवी, क्रूरदृष्टि तथा भयावह — ये चार पराक्रमी कपालाभरण के छोटे भाई थे।
श्लोक 25 (skanda.3.11.25)
अश्विभ्यामग्निवायुभ्यां युद्धे युयुधिरे मिथः । ततो यमो महावीर्यः कालदण्डेन वेगवान्
aśvibhyāmagnivāyubhyāṁ yuddhe yuyudhire mithaḥ tato yamo mahāvīryaḥ kāladaṇḍena vegavān
उन्होंने अश्विनी-कुमारों, अग्नि तथा वायु के साथ परस्पर युद्ध किया। तब महापराक्रमी, वेगवान यम ने अपने काल-दण्ड से —
श्लोक 26 (skanda.3.11.26)
शवभक्षं निहत्याजावनयद्यमसादनम् । तस्य चाक्षौहिणीस्त्रिंशन्निजघ्ने समरे यमः
śavabhakṣaṁ nihatyājāvanayadyamasādanam tasya cākṣauhiṇīstriṁśannijaghne samare yamaḥ
— युद्ध में शवभक्ष को मारकर, उसे यमलोक भेज दिया। और यम ने युद्ध में उसकी तीस अक्षौहिणी सेना का वध किया।
श्लोक 27 (skanda.3.11.27)
वरुणः कौशिकस्याजौ प्रासेन प्राहरच्छिरः । कुबेरो रुधिराक्षस्य कुन्तेनाभ्यहरच्छिरः
varuṇaḥ kauśikasyājau prāsena prāharacchiraḥ kubero rudhirākṣasya kuntenābhyaharacchiraḥ
वरुण ने युद्ध में कौशिक का सिर भाले से काट दिया। कुबेर ने रुधिराक्ष का सिर बरछे से काट दिया।
श्लोक 28 (skanda.3.11.28)
अश्विभ्यामग्निवायुभ्यां कपालाभरणानुजाः । निहताः समरे विप्राः प्रययुर्यमसादनम्
aśvibhyāmagnivāyubhyāṁ kapālābharaṇānujāḥ nihatāḥ samare viprāḥ prayayuryamasādanam
हे विप्रो, कपालाभरण के छोटे भाई, अश्विनी-कुमारों, अग्नि तथा वायु द्वारा युद्ध में मारे जाकर यमलोक चले गए।
श्लोक 29 (skanda.3.11.29)
अक्षौहिणीशतं चापि देवेन्द्रेण मृधे द्विजाः । यामार्द्धेन हतं युद्धे प्रययौ यमसादनम्
akṣauhiṇīśataṁ cāpi devendreṇa mṛdhe dvijāḥ yāmārddhena hataṁ yuddhe prayayau yamasādanam
हे द्विजो, सौ अक्षौहिणी सेना भी देवेन्द्र द्वारा युद्ध में आधे याम में ही मारी जाकर यमलोक चली गई।
श्लोक 30 (skanda.3.11.30)
ततः कपालाभरणः प्रेक्ष्य सेनां निजां हताम् । चापमादाय निशिताञ्छरांश्चापि महाजवान्
tataḥ kapālābharaṇaḥ prekṣya senāṁ nijāṁ hatām cāpamādāya niśitāñcharāṁścāpi mahājavān
तब कपालाभरण अपनी सेना को मारी गई देखकर, अपना धनुष तथा तीक्ष्ण, अत्यंत वेगवान बाण भी लेकर,
श्लोक 31 (skanda.3.11.31)
अभ्ययात्समरे शक्रं तिष्ठतिष्ठेति चाब्रवीत् । ततः शक्रस्य शिरसि व्यधमच्छरपंचकैः
abhyayātsamare śakraṁ tiṣṭhatiṣṭheti cābravīt tataḥ śakrasya śirasi vyadhamaccharapaṁcakaiḥ
— रणभूमि में इन्द्र की ओर बढ़ा और "ठहर, ठहर" ऐसा कहने लगा। फिर उसने पाँच बाणों से इन्द्र के सिर पर प्रहार किया।
श्लोक 32 (skanda.3.11.32)
तानप्राप्तान्प्रचिच्छेद शरैर्युद्धे स वृत्रहा । ततः शूलं समादाय कपालाभरणो मृधे
tānaprāptānpraciccheda śarairyuddhe sa vṛtrahā tataḥ śūlaṁ samādāya kapālābharaṇo mṛdhe
उस वृत्रहन्ता (इन्द्र) ने उन बाणों को अपने बाणों से पहुँचने से पहले ही काट डाला। तब कपालाभरण ने युद्ध में शूल लेकर —
श्लोक 33 (skanda.3.11.33)
देवेंद्राय प्रचिक्षेप तं शक्त्या निजघान सः । ततः कपालाभरणः शतहस्तायतां गदाम्
deveṁdrāya pracikṣepa taṁ śaktyā nijaghāna saḥ tataḥ kapālābharaṇaḥ śatahastāyatāṁ gadām
— इन्द्र पर प्रहार किया; किंतु इन्द्र ने उसे अपनी शक्ति से मार गिराया। तब कपालाभरण ने सौ हाथ लंबी गदा,
श्लोक 34 (skanda.3.11.34)
आयसीं पंचसाहस्रतुलाभारेणनिर्मिताम् । आददे समरे शक्रं वक्षोदेशे जघान च
āyasīṁ paṁcasāhasratulābhāreṇanirmitām ādade samare śakraṁ vakṣodeśe jaghāna ca
— जो लोहे की तथा पाँच हजार तुला भार वाली थी, उठाई और उस युद्ध में इन्द्र की छाती पर प्रहार किया।
श्लोक 35 (skanda.3.11.35)
ततः स मूर्च्छितः शक्रो रथोपस्थ उपाविशत् । मृतसंजीविनीं विद्यां जपित्वाथ बृहस्पतिः
tataḥ sa mūrcchitaḥ śakro rathopastha upāviśat mṛtasaṁjīvinīṁ vidyāṁ japitvātha bṛhaspatiḥ
तब मूर्छित होकर इन्द्र अपने रथ के आसन पर बैठ गए। तब बृहस्पति ने मृतसंजीवनी विद्या का जप करके —
श्लोक 36 (skanda.3.11.36)
पुलोमजापतिं युद्धे समजीवयदद्भुतम् । ऐरावतं तदारुह्य कपालाभरणांतिकम्
pulomajāpatiṁ yuddhe samajīvayadadbhutam airāvataṁ tadāruhya kapālābharaṇāṁtikam
— पुलोमजा के पति (इन्द्र) को उस युद्ध में अद्भुत रीति से पुनर्जीवित किया। तब ऐरावत पर आरूढ़ होकर, कपालाभरण के समीप,
श्लोक 37 (skanda.3.11.37)
आजगाम शचीभर्ता प्रहर्तुं कुलिशेन तम् । एकप्रहारेण तदा महेंद्रः पाकशासनः
ājagāma śacībhartā prahartuṁ kuliśena tam ekaprahāreṇa tadā maheṁdraḥ pākaśāsanaḥ
— शची के पति आए, उस पर वज्र से प्रहार करने के लिए। तब एक ही प्रहार से महेन्द्र, पाकशासन ने —
श्लोक 38 (skanda.3.11.38)
कपालाभरणं युद्धे वज्रेण सरथाश्वकम् । सचापं सध्वजं चैव सतूणीरं सवर्मकम्
kapālābharaṇaṁ yuddhe vajreṇa sarathāśvakam sacāpaṁ sadhvajaṁ caiva satūṇīraṁ savarmakam
— युद्ध में कपालाभरण को, उसके रथ-अश्वों सहित, धनुष, ध्वज, तूणीर तथा कवच सहित, वज्र से —
श्लोक 39 (skanda.3.11.39)
चूर्णयामास कुपितस्तिलशः कणशस्तथा । हते तस्मिन्महावीरे कपालाभरणे रणे
cūrṇayāmāsa kupitastilaśaḥ kaṇaśastathā hate tasminmahāvīre kapālābharaṇe raṇe
— क्रोधित होकर तिल-तिल तथा कण-कण के समान चूर-चूर कर दिया। युद्ध में उस महावीर कपालाभरण के मारे जाने पर,
श्लोक 40 (skanda.3.11.40)
सुखं सर्वस्य लोकस्य बभूव चिरदुःखिनः । राक्षसस्य वधोत्पन्ना ब्रह्महत्या पुरंदरम् । अन्वधावत्तदा भीमा नादयंती दिशो दश
sukhaṁ sarvasya lokasya babhūva ciraduḥkhinaḥ rākṣasasya vadhotpannā brahmahatyā puraṁdaram anvadhāvattadā bhīmā nādayaṁtī diśo daśa
— दीर्घकाल से दुःखी समस्त लोक को सुख प्राप्त हुआ। किंतु उस राक्षस के वध से उत्पन्न ब्रह्महत्या तब भयंकर रूप में दसों दिशाओं को गुंजाती हुई पुरंदर का पीछा करने लगी।
श्लोक 41 (skanda.3.11.41)
ऋषय ऊचुः । न विप्रो राक्षसः सूत कपालाभरणो मुने । तत्कथं ब्रह्महत्येंद्रं तद्वधात्समुपाद्रवत्
ṛṣaya ūcuḥ na vipro rākṣasaḥ sūta kapālābharaṇo mune tatkathaṁ brahmahatyeṁdraṁ tadvadhātsamupādravat
ऋषियों ने कहा — हे सूत, हे मुने, राक्षस कपालाभरण तो ब्राह्मण नहीं था; तो उसके वध से ब्रह्महत्या इन्द्र का पीछा कैसे करने लगी?
श्लोक 42 (skanda.3.11.42)
श्रीसूत उवाच । वक्ष्यामि परमं गुह्यं मुनींद्राः परमाद्भुतम्
śrīsūta uvāca vakṣyāmi paramaṁ guhyaṁ munīṁdrāḥ paramādbhutam
श्री सूत जी ने कहा — हे मुनीन्द्रो, मैं यह परम गुह्य, परम अद्भुत बात बताता हूँ।
श्लोक 43 (skanda.3.11.43)
शृणुत श्रद्धया यूयं समाधाय स्वमानसम् । पुरा विंध्यप्रदेशेषु त्रिवक्रो नाम राक्षसः
śṛṇuta śraddhayā yūyaṁ samādhāya svamānasam purā viṁdhyapradeśeṣu trivakro nāma rākṣasaḥ
श्रद्धापूर्वक अपने मन को एकाग्र करके सुनो। प्राचीन काल में विंध्य प्रदेशों में त्रिवक्र नामक एक राक्षस था।
श्लोक 44 (skanda.3.11.44)
तस्य भार्या गुणोपेता सौंदर्यगुणशालिनी । सुशीला नाम सुश्रोणी सर्वलक्षणलक्षिता
tasya bhāryā guṇopetā sauṁdaryaguṇaśālinī suśīlā nāma suśroṇī sarvalakṣaṇalakṣitā
उसकी पत्नी, गुणसंपन्न, सौंदर्य-गुण से शोभित, सुशीला नामक, सर्वलक्षण-लक्षित,
श्लोक 45 (skanda.3.11.45)
सा कदाचिन्मनोज्ञांगी सुवेषा चारुहासिनी । विंध्यपादवनोद्देशे विचचार विलासिनी
sā kadācinmanojñāṁgī suveṣā cāruhāsinī viṁdhyapādavanoddeśe vicacāra vilāsinī
— वह एक बार, मनोहर अंगों वाली, सुवेशी, मधुर हास वाली विलासिनी विंध्य की तलहटी के वन-प्रदेश में विचरण करने लगी।
श्लोक 46 (skanda.3.11.46)
तस्मिन्वने शुचिर्नाम वर्ततेस्म महामुनिः । तपसमाधिसंयुक्तो वेदाध्ययनतत्परः
tasminvane śucirnāma vartatesma mahāmuniḥ tapasamādhisaṁyukto vedādhyayanatatparaḥ
उस वन में शुचि नामक एक महामुनि निवास करते थे, जो तप और समाधि से युक्त, वेदाध्ययन में तत्पर थे।
श्लोक 47 (skanda.3.11.47)
तस्याश्रमसमीपं तु सा ययौ वरवर्णिनी । तां दृष्ट्वा स मुनिर्धैर्यं मुमोचानंगपीडितः । तामासाद्य वरारोहां बभाषे मुनिसत्तमः
tasyāśramasamīpaṁ tu sā yayau varavarṇinī tāṁ dṛṣṭvā sa munirdhairyaṁ mumocānaṁgapīḍitaḥ tāmāsādya varārohāṁ babhāṣe munisattamaḥ
वह सुंदरी उनके आश्रम के समीप आ गई। उसे देखकर वह मुनि, काम से पीड़ित होकर, अपना धैर्य खो बैठे; उस सुंदरी के पास जाकर मुनिश्रेष्ठ ने कहा —
श्लोक 48 (skanda.3.11.48)
शुचिरुवाच । ललने स्वागतं तेऽस्तु कस्य भार्या शुचिस्मिते
śuciruvāca lalane svāgataṁ te'stu kasya bhāryā śucismite
शुचि ने कहा — "हे ललने, तुम्हारा स्वागत है; हे शुचिस्मिते, तुम किसकी पत्नी हो?
श्लोक 49 (skanda.3.11.49)
किमागमनकृत्यं ते वनेऽस्मिन्नतिभीषणे । श्रांतासि त्वं वरारोहे वसास्मिन्नुटजे मम
kimāgamanakṛtyaṁ te vane'sminnatibhīṣaṇe śrāṁtāsi tvaṁ varārohe vasāsminnuṭaje mama
इस अत्यंत भयंकर वन में तुम्हारे आने का क्या प्रयोजन है? तुम थकी हुई हो, हे वरारोहे, मेरी इस कुटिया में विश्राम करो।"
श्लोक 50 (skanda.3.11.50)
तथोक्ता सा तु सुश्रोणी तं मुनिं प्रत्यभाषत । त्रिवक्ररक्षोभार्याहं सुशीला नामतो मुने
tathoktā sā tu suśroṇī taṁ muniṁ pratyabhāṣata trivakrarakṣobhāryāhaṁ suśīlā nāmato mune
इस प्रकार कहे जाने पर उस सुश्रोणी ने उस मुनि को उत्तर दिया — "हे मुने, मैं राक्षस त्रिवक्र की पत्नी सुशीला नाम से हूँ।
श्लोक 51 (skanda.3.11.51)
पुष्पावचयकामेन वनमेतत्समागता । अपुत्राहं मुने भर्त्रा प्रेरिता पुत्रमिच्छता
puṣpāvacayakāmena vanametatsamāgatā aputrāhaṁ mune bhartrā preritā putramicchatā
पुष्प चुनने की इच्छा से मैं इस वन में आई हूँ। हे मुने, मैं पुत्रहीन हूँ, तथा पुत्र चाहने वाले अपने पति द्वारा भेजी गई हूँ।
श्लोक 52 (skanda.3.11.52)
शुचिं मुनिं समाराध्य तस्मात्पुत्रमवाप्नुहि । इति प्रतिसमादिष्टा पतिना त्वां समागता
śuciṁ muniṁ samārādhya tasmātputramavāpnuhi iti pratisamādiṣṭā patinā tvāṁ samāgatā
'शुचि मुनि की आराधना करके उनसे पुत्र प्राप्त करो' — इस प्रकार पति द्वारा आदेशित होकर मैं तुम्हारे पास आई हूँ।
श्लोक 53 (skanda.3.11.53)
पुत्रमुत्पादय त्वं मे कृपां कुरु मुने मयि । एवमुक्तः स तु शुचिः सुशीलां तामभाषत
putramutpādaya tvaṁ me kṛpāṁ kuru mune mayi evamuktaḥ sa tu śuciḥ suśīlāṁ tāmabhāṣata
मुझमें पुत्र उत्पन्न करो; हे मुने, मुझ पर कृपा कीजिए।" इस प्रकार कहे जाने पर उस शुचि ने उस सुशीला से कहा —
श्लोक 54 (skanda.3.11.54)
शुचिरुवाच । त्वां दृष्ट्वा मम च प्रीतिः सुशीले विद्यतेऽधुना । मनोरथमहांभोधिं त्वमापूरय मामकम्
śuciruvāca tvāṁ dṛṣṭvā mama ca prītiḥ suśīle vidyate'dhunā manorathamahāṁbhodhiṁ tvamāpūraya māmakam
शुचि ने कहा — "हे सुशीले, तुम्हें देखकर मुझमें भी अभी प्रीति उत्पन्न हो गई है। मेरे इस मनोरथ के महासागर को तुम पूर्ण करो।"
श्लोक 55 (skanda.3.11.55)
इत्युक्त्वा स मुनिस्तत्र तया रेमे दिनत्रयम् । तामुवाच मुनिः प्रीतः सुशालां सुन्दराकृतिम्
ityuktvā sa munistatra tayā reme dinatrayam tāmuvāca muniḥ prītaḥ suśālāṁ sundarākṛtim
यह कहकर उस मुनि ने वहाँ उसके साथ तीन दिनों तक रमण किया। उस मुनि ने प्रसन्न होकर उस सुंदर आकृति वाली सुशीला से कहा —
श्लोक 56 (skanda.3.11.56)
तवोदरे महावीर्यः कपालाभरणाभिधः । भविष्यति चिरं राज्यं पालयिष्यति मेदिनीम्
tavodare mahāvīryaḥ kapālābharaṇābhidhaḥ bhaviṣyati ciraṁ rājyaṁ pālayiṣyati medinīm
"तुम्हारे गर्भ में एक महापराक्रमी, कपालाभरण नामक पुत्र होगा; वह दीर्घकाल तक राज्य की रक्षा करेगा और पृथ्वी का पालन करेगा।
श्लोक 57 (skanda.3.11.57)
सहस्रं वत्सरान्वत्सस्तपसा प्रीणयन्विधिम् । पुरंदरं विनान्येभ्यो देवेभ्यो नास्य वध्यता
sahasraṁ vatsarānvatsastapasā prīṇayanvidhim puraṁdaraṁ vinānyebhyo devebhyo nāsya vadhyatā
सहस्र वर्षों तक तप से ब्रह्मा को प्रसन्न करता हुआ वह बालक, पुरंदर के अतिरिक्त अन्य किसी भी देवता द्वारा वध्य नहीं होगा।
श्लोक 58 (skanda.3.11.58)
ईदृशस्ते सुतो भूयादिंद्रतुल्यपराक्रमः । इत्युक्त्वा स मुनिर्नारीं काशीं शिवपुरीं ययौ
īdṛśaste suto bhūyādiṁdratulyaparākramaḥ ityuktvā sa munirnārīṁ kāśīṁ śivapurīṁ yayau
तुम्हारा पुत्र इन्द्र के समान पराक्रमी हो, ऐसा ही हो।" यह कहकर वह मुनि उस स्त्री को छोड़कर काशी, शिव की नगरी को चले गए।
श्लोक 59 (skanda.3.11.59)
सुशीला सापि सुषुवे कपालाभरणं सुतम् । तं जघान मृधे शक्रो वज्रेण मुनिपुंगवाः
suśīlā sāpi suṣuve kapālābharaṇaṁ sutam taṁ jaghāna mṛdhe śakro vajreṇa munipuṁgavāḥ
उस सुशीला ने भी अपने पुत्र कपालाभरण को जन्म दिया। हे मुनिश्रेष्ठो, उसी को इन्द्र ने युद्ध में वज्र से मार डाला —
श्लोक 60 (skanda.3.11.60)
शुचेर्बीजसमुद्भूतं तमिंद्रो न्यवधीद्यतः । ततः पुरंदरः शक्रो जगृहे ब्रह्महत्यया
śucerbījasamudbhūtaṁ tamiṁdro nyavadhīdyataḥ tataḥ puraṁdaraḥ śakro jagṛhe brahmahatyayā
— चूँकि इन्द्र ने उसे मारा था जो शुचि (एक ब्राह्मण मुनि) के बीज से उत्पन्न था। इसलिए पुरंदर इन्द्र को ब्रह्महत्या का पाप लग गया।
श्लोक 61 (skanda.3.11.61)
धावति स्म तदा शक्रः सर्वांल्लोकान्भयाकुलः । धावंतमनुधावंती ब्रह्महत्या तमन्वगात्
dhāvati sma tadā śakraḥ sarvāṁllokānbhayākulaḥ dhāvaṁtamanudhāvaṁtī brahmahatyā tamanvagāt
तब भयाकुल इन्द्र समस्त लोकों में भागने लगे। और भागते हुए उनका पीछा करती हुई ब्रह्महत्या उनके पीछे चलती रही।
श्लोक 62 (skanda.3.11.62)
अनुद्रुतो हि विप्रेंद्राः शक्रोऽयं ब्रह्महत्यया । पितामहसदः प्राप संतप्तहृदयो भृशम्
anudruto hi vipreṁdrāḥ śakro'yaṁ brahmahatyayā pitāmahasadaḥ prāpa saṁtaptahṛdayo bhṛśam
हे विप्रेन्द्रो, इस प्रकार ब्रह्महत्या द्वारा पीछा किए जाने पर, यह इन्द्र, अत्यंत संतप्त हृदय होकर, पितामह (ब्रह्मा) के सदन में पहुँचा।
श्लोक 63 (skanda.3.11.63)
न्यवेदयद्ब्रह्महत्यां ब्रह्मणे स पुरंदरः । भगवँल्लोकनाथेयं ब्रह्महत्याति भीषणा
nyavedayadbrahmahatyāṁ brahmaṇe sa puraṁdaraḥ bhagava~llokanātheyaṁ brahmahatyāti bhīṣaṇā
उस पुरंदर ने ब्रह्मा को ब्रह्महत्या के विषय में बताया — "हे भगवन्, हे लोकनाथ, यह ब्रह्महत्या अत्यंत भीषण है;
श्लोक 64 (skanda.3.11.64)
बाधते मां प्रजानाथ तस्या नाशं ब्रवीहि मे । पुरंदरेणैवमुक्तो ब्रह्मा प्राह दिवस्पतिम्
bādhate māṁ prajānātha tasyā nāśaṁ bravīhi me puraṁdareṇaivamukto brahmā prāha divaspatim
— यह मुझे पीड़ित कर रही है, हे प्रजानाथ; इसके नाश का उपाय मुझे बताइए।" पुरंदर द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर ब्रह्मा ने द्युलोक के स्वामी (इन्द्र) से कहा —
श्लोक 65 (skanda.3.11.65)
ब्रह्मोवाच । सीताकुण्डं प्रयाहींद्र गंधमादनपर्वते । सीताकुण्डस्य तीरे त्वं इष्ट्वा यागैः सदाशिवम्
brahmovāca sītākuṇḍaṁ prayāhīṁdra gaṁdhamādanaparvate sītākuṇḍasya tīre tvaṁ iṣṭvā yāgaiḥ sadāśivam
ब्रह्मा ने कहा — "हे इन्द्र, गंधमादन पर्वत पर सीताकुण्ड जाओ। सीताकुण्ड के तट पर यज्ञों द्वारा सदाशिव की पूजा करके,
श्लोक 66 (skanda.3.11.66)
तस्मिन्सरसि च स्नायाः सर्वपापहरे शुभे । ततः पूतो भवेश्शक्र बह्महत्याविमोचितः
tasminsarasi ca snāyāḥ sarvapāpahare śubhe tataḥ pūto bhaveśśakra bahmahatyāvimocitaḥ
— उस सरोवर में, जो समस्त पापों को हरने वाला, शुभ है, स्नान करो। तब, हे इन्द्र, तुम पवित्र होकर ब्रह्महत्या से मुक्त हो जाओगे,
श्लोक 67 (skanda.3.11.67)
देवलोकं पुनर्यायाः सर्वदुःखविवर्जितः । सर्वपापहरं पुण्यं सीताकुण्डं विमुक्तिदम्
devalokaṁ punaryāyāḥ sarvaduḥkhavivarjitaḥ sarvapāpaharaṁ puṇyaṁ sītākuṇḍaṁ vimuktidam
— तथा समस्त दुःखों से मुक्त होकर पुनः देवलोक को जा सकोगे। सीताकुण्ड, समस्त पापों को हरने वाला, पुण्यमय, मुक्तिदायक,
श्लोक 68 (skanda.3.11.68)
महापातकसंघानां नाशकं परमामृतम् । सर्वदुःखप्रशमनं सर्वदारिद्र्यनाशनम्
mahāpātakasaṁghānāṁ nāśakaṁ paramāmṛtam sarvaduḥkhapraśamanaṁ sarvadāridryanāśanam
— महापातकों के समूहों का नाशक, परम अमृत, समस्त दुःखों को शांत करने वाला, समस्त दरिद्रता का नाशक है,
श्लोक 69 (skanda.3.11.69)
धनधान्यप्रदं शुद्धं वैकुण्ठादिपदप्रदम् । तस्मात्तत्र कुरुष्वेष्टिं सीतासरसि वृत्रहन्
dhanadhānyapradaṁ śuddhaṁ vaikuṇṭhādipadapradam tasmāttatra kuruṣveṣṭiṁ sītāsarasi vṛtrahan
— धन-धान्य देने वाला, शुद्ध, वैकुण्ठ आदि पद को देने वाला है। अतः हे वृत्रहन्, वहाँ सीतासर में यज्ञ करो।"
श्लोक 70 (skanda.3.11.70)
इत्युक्तः सुरराजोऽसौ प्रययौ गंधमादनम् । प्राप्य सीतासरो विप्राः स्नात्वेष्ट्वा च तदंतिके
ityuktaḥ surarājo'sau prayayau gaṁdhamādanam prāpya sītāsaro viprāḥ snātveṣṭvā ca tadaṁtike
इस प्रकार कहे जाने पर वह देवराज गंधमादन को प्रस्थान कर गए। हे विप्रो, सीतासर पहुँचकर, वहाँ स्नान करके तथा यज्ञ करके,
श्लोक 71 (skanda.3.11.71)
प्रययौ स्वपुरीं भूयो ब्रह्महत्याविमोचितः । एवं प्रभावं तत्तीर्थं सीतायाः कुण्डमुत्तमम्
prayayau svapurīṁ bhūyo brahmahatyāvimocitaḥ evaṁ prabhāvaṁ tattīrthaṁ sītāyāḥ kuṇḍamuttamam
— वे ब्रह्महत्या से मुक्त होकर पुनः अपनी नगरी को लौट गए। इस प्रकार का प्रभाव उस तीर्थ का है, सीता के उस उत्तम कुण्ड का।
श्लोक 72 (skanda.3.11.72)
राघवप्रत्ययार्थं हि प्रविश्य हुतवाहनम् । संनिधौ सर्वदेवानां मैथिली जनकात्मजा
rāghavapratyayārthaṁ hi praviśya hutavāhanam saṁnidhau sarvadevānāṁ maithilī janakātmajā
राघव को विश्वास दिलाने के लिए अग्नि में प्रविष्ट होकर, समस्त देवताओं की उपस्थिति में, जनक-पुत्री मैथिली,
श्लोक 73 (skanda.3.11.73)
विनिर्गता पुनर्वह्नेः स्थिता सर्वांगशोभना । निर्ममे लोकरक्षार्थं स्वनाम्ना तीर्थमुत्तमम्
vinirgatā punarvahneḥ sthitā sarvāṁgaśobhanā nirmame lokarakṣārthaṁ svanāmnā tīrthamuttamam
— पुनः अग्नि से बाहर निकलीं, अपने समस्त अंगों में शोभायमान होकर, और लोक-रक्षा के लिए अपने ही नाम से एक उत्तम तीर्थ की रचना की।
श्लोक 74 (skanda.3.11.74)
तत्र सस्नौ स्वयं सीता तेन सीतासरः स्मृतम् । तत्र यो मानवः स्नाति सर्वान्कामाँल्लभेत सः
tatra sasnau svayaṁ sītā tena sītāsaraḥ smṛtam tatra yo mānavaḥ snāti sarvānkāmā~llabheta saḥ
वहाँ स्वयं सीता ने स्नान किया, इसीलिए वह सीतासर नाम से स्मरण किया जाता है। जो मनुष्य वहाँ स्नान करता है, वह समस्त कामनाओं को प्राप्त करता है।
श्लोक 75 (skanda.3.11.75)
तस्मिन्नुपस्पृश्य नरो द्विजेंद्रा दत्त्वा च दानानि पृथग्विधानि । कृत्वा च यज्ञान्बहुदक्षिणाभिर्लोकं प्रयायात्परमेश्वरस्य
tasminnupaspṛśya naro dvijeṁdrā dattvā ca dānāni pṛthagvidhāni kṛtvā ca yajñānbahudakṣiṇābhirlokaṁ prayāyātparameśvarasya
हे द्विजेंद्रो, वहाँ स्नान करके तथा विविध प्रकार के दान देकर, और प्रचुर दक्षिणा सहित यज्ञ करके मनुष्य परमेश्वर के लोक को जाता है।
श्लोक 76 (skanda.3.11.76)
युष्माकमेवं प्रथितं मुनींद्राः सीतासरो वैभवमेतदुक्तम् । शृण्वन्पठन्वै तदिहैव भोगान्भुक्त्वा परत्रापि सुखं लभेत
yuṣmākamevaṁ prathitaṁ munīṁdrāḥ sītāsaro vaibhavametaduktam śṛṇvanpaṭhanvai tadihaiva bhogānbhuktvā paratrāpi sukhaṁ labheta
हे मुनीन्द्रो, इस प्रकार यह सीतासर का प्रसिद्ध माहात्म्य आपको बताया गया। जो इसे सुनता अथवा पढ़ता है, वह यहीं भोगों को भोगकर परलोक में भी सुख प्राप्त करता है।