ब्रह्म खण्ड · अध्याय 12
मंगलतीर्थ का माहात्म्य तथा राजा मनोजव की कथा
श्लोक 1 (skanda.3.12.1)
श्रीसूत उवाच । सीताकुण्डे महापुण्ये नरः स्नात्वा द्विजोत्तमाः । ततस्तु मंगलं तीर्थमभिगच्छेत्समाहितः
śrīsūta uvāca sītākuṇḍe mahāpuṇye naraḥ snātvā dvijottamāḥ tatastu maṁgalaṁ tīrthamabhigacchetsamāhitaḥ
श्री सूत जी ने कहा — हे द्विजोत्तमो, मनुष्य महापुण्य सीताकुण्ड में स्नान करके फिर एकाग्रचित्त होकर मंगल तीर्थ की ओर जाए।
श्लोक 2 (skanda.3.12.2)
सन्निधत्ते सदा यत्र कमला विष्णुवल्लभा । अलक्ष्मीपरिहाराय यस्मिन्सरसि वै सुराः
sannidhatte sadā yatra kamalā viṣṇuvallabhā alakṣmīparihārāya yasminsarasi vai surāḥ
जहाँ विष्णु-प्रिया कमला सदा निवास करती हैं; और जिस सरोवर में, अलक्ष्मी (दरिद्रता) के निवारण के लिए, देवता —
श्लोक 3 (skanda.3.12.3)
शतक्रतुमुखाः सर्वे समागच्छंति नित्यशः । तदेतत्तीर्थमुद्दिश्य ऋषयो लोकपावनम्
śatakratumukhāḥ sarve samāgacchaṁti nityaśaḥ tadetattīrthamuddiśya ṛṣayo lokapāvanam
— इन्द्र आदि सभी नित्य एकत्र होते हैं। उसी लोकपावन तीर्थ के विषय में ऋषियों ने —
श्लोक 4 (skanda.3.12.4)
इतिहासं प्रवक्ष्यामि पुण्यं पापविनाशनम् । पुरा मनोजवो नाम राजा सोमकुलोद्भवः
itihāsaṁ pravakṣyāmi puṇyaṁ pāpavināśanam purā manojavo nāma rājā somakulodbhavaḥ
— पूछा, और मैं वह पुण्यमय, पापनाशक इतिहास बताऊँगा। प्राचीन काल में मनोजव नामक चंद्रवंशोत्पन्न एक राजा था,
श्लोक 5 (skanda.3.12.5)
पालयामास धर्मेण धरां सागरमेखलाम् । अयष्ट स सुरान्यज्ञै र्ब्राह्मणानन्नसंचयैः
pālayāmāsa dharmeṇa dharāṁ sāgaramekhalām ayaṣṭa sa surānyajñai rbrāhmaṇānannasaṁcayaiḥ
— जिसने समुद्र-मेखला वाली पृथ्वी का धर्मपूर्वक पालन किया। उसने यज्ञों से देवताओं का पूजन किया, तथा अन्न-संचय से ब्राह्मणों का सत्कार किया।
श्लोक 6 (skanda.3.12.6)
तर्पयामास कव्येन प्रत्यब्दं पितृदेवताः । त्रयीमध्यैष्ट सततमपाठीच्छास्त्रमर्थवत्
tarpayāmāsa kavyena pratyabdaṁ pitṛdevatāḥ trayīmadhyaiṣṭa satatamapāṭhīcchāstramarthavat
उसने प्रतिवर्ष कव्य से पितृ-देवताओं को तृप्त किया। उसने निरंतर वेदत्रयी का अध्ययन किया, तथा अर्थ सहित शास्त्रों को पढ़ा।
श्लोक 7 (skanda.3.12.7)
व्यजेष्ट शत्रून्वीर्येण प्राणं सीदीशकेशवौ । अरंस्त नीतिशास्त्रेषु तथापाठीन्महामनून्
vyajeṣṭa śatrūnvīryeṇa prāṇaṁ sīdīśakeśavau araṁsta nītiśāstreṣu tathāpāṭhīnmahāmanūn
उसने अपने पराक्रम से शत्रुओं को जीता; वह हृदय से ईश और केशव में तत्पर था; उसे नीति-शास्त्रों में आनंद आता था, तथा उसने महान मनु आदि स्मृतियों का भी अध्ययन किया।
श्लोक 8 (skanda.3.12.8)
एवं स धर्मतो राजा पालयामास मेदिनीम् । रक्षतस्तस्य राज्ञोऽभूद्राज्यं निहत कंटकम्
evaṁ sa dharmato rājā pālayāmāsa medinīm rakṣatastasya rājño'bhūdrājyaṁ nihata kaṁṭakam
इस प्रकार वह राजा धर्मपूर्वक पृथ्वी का पालन करता रहा। इस राजा के रक्षण में उसका राज्य कंटक-रहित हो गया।
श्लोक 9 (skanda.3.12.9)
अहंकारोऽभवत्तस्य पुत्रसंपद्विनाशनः । अहंकारो भवेद्यत्र तत्र लोभो मदस्तथा
ahaṁkāro'bhavattasya putrasaṁpadvināśanaḥ ahaṁkāro bhavedyatra tatra lobho madastathā
किंतु उसमें अहंकार उत्पन्न हो गया, जो पुत्र और संपत्ति का नाशक है। जहाँ अहंकार होता है, वहाँ लोभ और मद भी होते हैं,
श्लोक 10 (skanda.3.12.10)
कामः क्रोधश्च हिंसा च तथाऽसूया विमोहिनी । भवंत्येतानि विप्रेंद्राः संपदां नाशहेतवः
kāmaḥ krodhaśca hiṁsā ca tathā'sūyā vimohinī bhavaṁtyetāni vipreṁdrāḥ saṁpadāṁ nāśahetavaḥ
— काम, क्रोध, हिंसा, तथा विमोहकारी असूया भी। हे विप्रेन्द्रो, ये सभी संपत्ति के नाश के कारण बनते हैं।
श्लोक 11 (skanda.3.12.11)
एतानि यत्र विद्यंते पुरुषे स विनश्यति । क्षणेन पुत्रपौत्रैश्च सार्द्धं चाखिलसंपदा
etāni yatra vidyaṁte puruṣe sa vinaśyati kṣaṇena putrapautraiśca sārddhaṁ cākhilasaṁpadā
जिस पुरुष में ये विद्यमान होते हैं, वह क्षणभर में अपने पुत्र-पौत्रों तथा समस्त संपत्ति सहित नष्ट हो जाता है।
श्लोक 12 (skanda.3.12.12)
बभूव तस्यासूया च जनविद्वेषिणी सदा । असूयाकुलचित्तस्य वृथाहंकारिणस्तथा
babhūva tasyāsūyā ca janavidveṣiṇī sadā asūyākulacittasya vṛthāhaṁkāriṇastathā
उसमें ईर्ष्या उत्पन्न हो गई, जो सदा लोगों से द्वेष करने वाली थी। ईर्ष्या से व्याकुल-चित्त तथा व्यर्थ अहंकारी उस —
श्लोक 13 (skanda.3.12.13)
लुब्धस्य कामदुष्टस्य मतिरेवं बभूव ह । विप्रग्रामे करादानं करिष्यामीति निश्चितः
lubdhasya kāmaduṣṭasya matirevaṁ babhūva ha vipragrāme karādānaṁ kariṣyāmīti niścitaḥ
— लोभी, काम से दूषित राजा की बुद्धि इस प्रकार हो गई। उसने निश्चय किया — "मैं ब्राह्मण-ग्रामों से कर वसूल करूँगा।"
श्लोक 14 (skanda.3.12.14)
अकरोच्च तथा राजा निश्चित्य मनसा तदा । धनं धान्यं च विप्राणां जहार किल लोभतः
akarocca tathā rājā niścitya manasā tadā dhanaṁ dhānyaṁ ca viprāṇāṁ jahāra kila lobhataḥ
और मन में यह निश्चय करके राजा ने वैसा ही किया; उसने लोभवश ब्राह्मणों के धन और धान्य को हर लिया।
श्लोक 15 (skanda.3.12.15)
शिवविष्ण्वादिदेवानां वित्तान्यादत्त रागतः । शिवविष्ण्वादिदेवानां विप्राणां च महात्मनाम्
śivaviṣṇvādidevānāṁ vittānyādatta rāgataḥ śivaviṣṇvādidevānāṁ viprāṇāṁ ca mahātmanām
उसने आसक्तिवश शिव-विष्णु आदि देवताओं की संपत्ति भी हर ली; तथा शिव-विष्णु आदि देवताओं की, और महात्मा ब्राह्मणों की —
श्लोक 16 (skanda.3.12.16)
क्षेत्राण्यपजहारायमहंकार विमूढधीः । एवमन्याययुक्तस्य देवद्विजविरोधिनः
kṣetrāṇyapajahārāyamahaṁkāra vimūḍhadhīḥ evamanyāyayuktasya devadvijavirodhinaḥ
— इस अहंकार से मूढ़बुद्धि राजा ने उनके क्षेत्रों को भी छीन लिया। इस प्रकार अन्याय में लीन, देव-द्विज का विरोधी बने हुए इस राजा के —
श्लोक 17 (skanda.3.12.17)
दुष्कर्मपरिपाकेन क्रूरेण द्विजपुंगवाः । पुरं रुरोध बलवान्परदेशाधिपो रिपुः
duṣkarmaparipākena krūreṇa dvijapuṁgavāḥ puraṁ rurodha balavānparadeśādhipo ripuḥ
— हे द्विजश्रेष्ठो, उस क्रूर दुष्कर्म के परिपाक से, एक विदेशी बलवान राजा शत्रु ने उसकी नगरी को घेर लिया।
श्लोक 18 (skanda.3.12.18)
गोलभोनाम विप्रेंद्राश्चतुरंगबलैर्युतः । षण्मासं युद्धमभवद्गोलभेन दुरात्मनः
golabhonāma vipreṁdrāścaturaṁgabalairyutaḥ ṣaṇmāsaṁ yuddhamabhavadgolabhena durātmanaḥ
हे विप्रेन्द्रो, गोलभ नामक, चतुरंग सेना से युक्त उस दुरात्मा गोलभ के साथ छह मास तक युद्ध चलता रहा —
श्लोक 19 (skanda.3.12.19)
मनोजवस्य नृपतेरहंकाररतात्मनः । ततः स गोलभेनाजौ जितो राज्यात्परिच्युतः
manojavasya nṛpaterahaṁkāraratātmanaḥ tataḥ sa golabhenājau jito rājyātparicyutaḥ
— अहंकार में लीन राजा मनोजव के साथ। फिर वह युद्ध में गोलभ द्वारा पराजित होकर राज्य से च्युत हो गया।
श्लोक 20 (skanda.3.12.20)
वनं सपुत्रदारः सन्प्रपेदे स मनोजवः । गोलभः पालयन्नास्ते मनोजवपुरे चिरम्
vanaṁ saputradāraḥ sanprapede sa manojavaḥ golabhaḥ pālayannāste manojavapure ciram
वह मनोजव अपने पुत्र और पत्नी सहित वन में शरण लेने लगा। गोलभ दीर्घकाल तक मनोजव की नगरी में शासन करता रहा।
श्लोक 21 (skanda.3.12.21)
चतुरंगबलोपेतस्तमुद्वास्य रणे बली । मनोजवोपि विप्रेंद्राः शोचन्स्त्रीपुत्रसंयुतः
caturaṁgabalopetastamudvāsya raṇe balī manojavopi vipreṁdrāḥ śocanstrīputrasaṁyutaḥ
हे विप्रेन्द्रो, चतुरंग सेना से युक्त उस बलवान ने उसे युद्ध में निकाल दिया — मनोजव भी, अपनी पत्नी-पुत्र सहित शोक करते हुए,
श्लोक 22 (skanda.3.12.22)
क्षुत्क्षामः प्रस्खलञ्छश्वत्प्रविवेश महावनम् । झिल्लिकागणसंघुष्टं व्याघ्रश्वापद भीषणम्
kṣutkṣāmaḥ praskhalañchaśvatpraviveśa mahāvanam jhillikāgaṇasaṁghuṣṭaṁ vyāghraśvāpada bhīṣaṇam
— भूख से क्षीण, बार-बार लड़खड़ाते हुए, एक महावन में प्रविष्ट हुआ, जो झींगुरों के समूहों से गुंजायमान था, बाघ और हिंसक पशुओं से भयंकर था,
श्लोक 23 (skanda.3.12.23)
व्याप्तद्विरदचीत्कारं वराहमहिषाकुलम् । तस्मिन्वने महाघोरे क्षुधया परिपीडितः
vyāptadviradacītkāraṁ varāhamahiṣākulam tasminvane mahāghore kṣudhayā paripīḍitaḥ
— हाथियों की चिंघाड़ से व्याप्त, सूअरों और भैंसों से भरा हुआ। उस अत्यंत भयंकर वन में, भूख से पीड़ित होकर,
श्लोक 24 (skanda.3.12.24)
अयाचतान्नं पितरं मनोजवसुतः शिशुः । अंब मेन्नं प्रयच्छ त्वं क्षुधा मां बाधते भृशम्
ayācatānnaṁ pitaraṁ manojavasutaḥ śiśuḥ aṁba mennaṁ prayaccha tvaṁ kṣudhā māṁ bādhate bhṛśam
मनोजव के पुत्र, उस बालक ने अपने पिता से अन्न माँगा — "हे माता (पिता), मुझे अन्न दो; भूख मुझे अत्यंत सता रही है।"
श्लोक 25 (skanda.3.12.25)
एवं स्वजननीं चापि प्रार्थयामास बालकः । तन्मातापितरौ तत्र श्रुत्वा पुत्रस्य भाषितम्
evaṁ svajananīṁ cāpi prārthayāmāsa bālakaḥ tanmātāpitarau tatra śrutvā putrasya bhāṣitam
इस प्रकार उस बालक ने अपनी माता से भी प्रार्थना की। वहाँ उसके माता-पिता, पुत्र के इस वचन को सुनकर,
श्लोक 26 (skanda.3.12.26)
शोकाभिभूतौ सहसा मोहं समुपजग्मतुः । भार्यामथाब्रवीद्राजा सुमित्रानाम नामतः
śokābhibhūtau sahasā mohaṁ samupajagmatuḥ bhāryāmathābravīdrājā sumitrānāma nāmataḥ
— शोक से अभिभूत होकर सहसा मूर्च्छित हो गए। तब राजा ने सुमित्रा नामक अपनी पत्नी से कहा —
श्लोक 27 (skanda.3.12.27)
मुह्यमानश्च स मुहुः शुष्ककंठौष्ठतालुकः । सुमित्रे किं करिष्यामि कुत्र यास्यामि का गतिः
muhyamānaśca sa muhuḥ śuṣkakaṁṭhauṣṭhatālukaḥ sumitre kiṁ kariṣyāmi kutra yāsyāmi kā gatiḥ
— बार-बार मोहग्रस्त होते हुए, सूखे कंठ-ओष्ठ-तालु वाले होकर — "हे सुमित्रे, मैं क्या करूँ? कहाँ जाऊँ? मेरी क्या गति है?
श्लोक 28 (skanda.3.12.28)
मरिष्यत्यचिरादेष सुतो मे क्षुधयार्दितः । किमर्थं ससृजे वेधा दुर्भाग्यं मां वृथा प्रिये
mariṣyatyacirādeṣa suto me kṣudhayārditaḥ kimarthaṁ sasṛje vedhā durbhāgyaṁ māṁ vṛthā priye
भूख से पीड़ित यह मेरा पुत्र शीघ्र ही मर जाएगा। हे प्रिये, विधाता ने मुझ दुर्भाग्य को व्यर्थ ही क्यों उत्पन्न किया?
श्लोक 29 (skanda.3.12.29)
को वा मोचयिता दुःखमेतद्दुष्कर्मजं मम । न पूजितो मया शंभुर्हरिर्वा पूर्वजन्मसु
ko vā mocayitā duḥkhametadduṣkarmajaṁ mama na pūjito mayā śaṁbhurharirvā pūrvajanmasu
मेरे इस दुष्कर्मजन्य दुःख से मुझे कौन मुक्त करेगा? मैंने पूर्वजन्मों में न शंभु का पूजन किया, न हरि का,
श्लोक 30 (skanda.3.12.30)
तथान्या देवताः सूर्यविभावसुमुखाः प्रिये । तेन पापेन चाद्याहमस्मिञ्जन्मनि शोभने
tathānyā devatāḥ sūryavibhāvasumukhāḥ priye tena pāpena cādyāhamasmiñjanmani śobhane
— तथा हे प्रिये, न सूर्य-अग्नि आदि अन्य देवताओं का। हे शोभने, उसी पाप के कारण मैं आज इस जन्म में —
श्लोक 31 (skanda.3.12.31)
अहंकाराभिभूतोऽस्मि विप्रक्षेत्राण्यपाहरम् । शिवविष्ण्वादिदेवानां वित्तं चापहृतं मया
ahaṁkārābhibhūto'smi viprakṣetrāṇyapāharam śivaviṣṇvādidevānāṁ vittaṁ cāpahṛtaṁ mayā
— अहंकार से अभिभूत होकर मैंने ब्राह्मणों के क्षेत्रों को हर लिया। मैंने शिव-विष्णु आदि देवताओं का धन भी छीन लिया।
श्लोक 32 (skanda.3.12.32)
एवं दुष्कर्मबाहुल्याद्गोलभेन पराजितः । वनं यातोस्मि विजनं त्वया सह सुतेन च
evaṁ duṣkarmabāhulyādgolabhena parājitaḥ vanaṁ yātosmi vijanaṁ tvayā saha sutena ca
इस प्रकार अनेक दुष्कर्मों के कारण गोलभ द्वारा पराजित होकर, मैं तुम्हारे और पुत्र के साथ इस निर्जन वन में आ गया हूँ।
श्लोक 33 (skanda.3.12.33)
निरन्नो निर्धनो दुःखी क्षुधितो ऽहं पिपासितः । कथमन्नं प्रदास्यामि क्षुधिताय सुताय मे
niranno nirdhano duḥkhī kṣudhito 'haṁ pipāsitaḥ kathamannaṁ pradāsyāmi kṣudhitāya sutāya me
अन्नहीन, धनहीन, दुःखी, भूखा और प्यासा हूँ मैं — अपने भूखे पुत्र को अन्न कैसे दूँ?
श्लोक 34 (skanda.3.12.34)
न मयान्नानि दत्तानि ब्राह्मणेभ्यः शुचिस्मिते । न मया पूजितः शंभुर्विष्णुर्वा देवतांतरम्
na mayānnāni dattāni brāhmaṇebhyaḥ śucismite na mayā pūjitaḥ śaṁbhurviṣṇurvā devatāṁtaram
हे शुचिस्मिते, मैंने ब्राह्मणों को कभी अन्न नहीं दिया; मैंने शंभु, विष्णु अथवा किसी अन्य देवता का पूजन नहीं किया।
श्लोक 35 (skanda.3.12.35)
तेन पापेन मे त्वद्य दुःखमेतत्समागतम् । न मयाग्नौ हुतं पूर्वं न तीर्थमपि सेवितम्
tena pāpena me tvadya duḥkhametatsamāgatam na mayāgnau hutaṁ pūrvaṁ na tīrthamapi sevitam
उसी पाप के कारण आज मुझ पर यह दुःख आया है। मैंने पहले कभी अग्नि में हवन नहीं किया, न ही किसी तीर्थ का सेवन किया।
श्लोक 36 (skanda.3.12.36)
मातृश्राद्धं पितृश्राद्धं मृताह दिवसे तयोः । नैकोद्दिष्टविधानेन पार्वणेनापि वै प्रिये
mātṛśrāddhaṁ pitṛśrāddhaṁ mṛtāha divase tayoḥ naikoddiṣṭavidhānena pārvaṇenāpi vai priye
हे प्रिये, माता-पिता की मृत्यु के दिन उनके श्राद्ध को मैंने न एकोद्दिष्ट विधि से किया, न पार्वण विधि से।
श्लोक 37 (skanda.3.12.37)
कृतं न हि मया भद्रे भूरिभोजनमेव वा । तेन पापेन मे त्वद्य दुःखमेतत्समागतम्
kṛtaṁ na hi mayā bhadre bhūribhojanameva vā tena pāpena me tvadya duḥkhametatsamāgatam
हे भद्रे, मैंने विपुल भोज भी कभी नहीं करवाया। उसी पाप के कारण आज मुझ पर यह दुःख आया है।
श्लोक 38 (skanda.3.12.38)
चैत्रमासे प्रिये चित्रानक्षत्रे पानकं मया । पनसानां फलं स्वादु कदलीफलमेव वा
caitramāse priye citrānakṣatre pānakaṁ mayā panasānāṁ phalaṁ svādu kadalīphalameva vā
हे प्रिये, मैंने चैत्र मास में चित्रा नक्षत्र में शीतल पेय, कटहल का स्वादिष्ट फल, अथवा केले का फल भी नहीं चढ़ाया,
श्लोक 39 (skanda.3.12.39)
तथा छत्रं सदंडं च रम्यं पादुकयोर्द्वयम् । तांबूलानि च पुष्पाणि चंदनं चानुलेपनम्
tathā chatraṁ sadaṁḍaṁ ca ramyaṁ pādukayordvayam tāṁbūlāni ca puṣpāṇi caṁdanaṁ cānulepanam
— न दण्ड सहित छत्र, न सुंदर खड़ाऊँ की जोड़ी, न ताम्बूल, न पुष्प, न चंदन-अनुलेपन —
श्लोक 40 (skanda.3.12.40)
न दत्तं वेदविद्भ्यस्तु चित्रगुप्तस्य तुष्टये । तेन पापेन मे त्वद्य दुःखमेतत्समागतम्
na dattaṁ vedavidbhyastu citraguptasya tuṣṭaye tena pāpena me tvadya duḥkhametatsamāgatam
— वेद के ज्ञाताओं को चित्रगुप्त की तुष्टि के लिए दिया। उसी पाप के कारण आज मुझ पर यह दुःख आया है।
श्लोक 41 (skanda.3.12.41)
नाश्वत्थश्चूतवृक्षो वा न्यग्रोधस्तिंतिणी तथा । पिचुमंदः कपित्थो वा तथैवामलकीतरुः
nāśvatthaścūtavṛkṣo vā nyagrodhastiṁtiṇī tathā picumaṁdaḥ kapittho vā tathaivāmalakītaruḥ
न अश्वत्थ, न आम का वृक्ष, न वटवृक्ष, न इमली, न नीम, न कैथ, तथा न आँवले का वृक्ष —
श्लोक 42 (skanda.3.12.42)
नारिकेलतरुर्वापि स्थापितोऽध्वगशांतये । तेन पापेन मे त्वद्य दुःखमेतत्समागतम्
nārikelatarurvāpi sthāpito'dhvagaśāṁtaye tena pāpena me tvadya duḥkhametatsamāgatam
— न नारियल का वृक्ष भी मैंने राहगीरों की शांति के लिए लगाया। उसी पाप के कारण आज मुझ पर यह दुःख आया है।
श्लोक 43 (skanda.3.12.43)
सम्मार्जनं च न कृतं शिवविष्ण्वालये मया । न खानितं तटाकं च न कूपोपि ह्रदोऽपिवा
sammārjanaṁ ca na kṛtaṁ śivaviṣṇvālaye mayā na khānitaṁ taṭākaṁ ca na kūpopi hrado'pivā
न मैंने शिव-विष्णु के मंदिर की सफाई कराई; न तालाब खुदवाया, न कुआँ, न ह्रद भी।
श्लोक 44 (skanda.3.12.44)
न रोपितं पुष्पवनं तथैव तुलसीवनम् । शिवविष्ण्वालयौ वापि निर्मितो न मया प्रिये
na ropitaṁ puṣpavanaṁ tathaiva tulasīvanam śivaviṣṇvālayau vāpi nirmito na mayā priye
मैंने न पुष्प-वाटिका लगाई, न तुलसी-वन। हे प्रिये, मैंने शिव अथवा विष्णु का मंदिर भी नहीं बनवाया।
श्लोक 45 (skanda.3.12.45)
तेन पापेन मे त्वद्य दुःखमेतत्समागतम् । न मया पैतृके मासि पितॄनुद्दिश्य शोभने । महालयं कृतं श्राद्धमष्टकाश्राद्धमेव वा
tena pāpena me tvadya duḥkhametatsamāgatam na mayā paitṛke māsi pitṝnuddiśya śobhane mahālayaṁ kṛtaṁ śrāddhamaṣṭakāśrāddhameva vā
उसी पाप के कारण आज मुझ पर यह दुःख आया है। हे शोभने, मैंने पितृ-मास में पितरों के उद्देश्य से न महालय श्राद्ध किया, न अष्टका-श्राद्ध,
श्लोक 46 (skanda.3.12.46)
नित्यश्राद्धं तथा काम्यं श्राद्धं नैमित्तिकं प्रिये । न कृताः क्रतवश्चापि विधिवद्भूरिदक्षिणाः
nityaśrāddhaṁ tathā kāmyaṁ śrāddhaṁ naimittikaṁ priye na kṛtāḥ kratavaścāpi vidhivadbhūridakṣiṇāḥ
— न नित्य-श्राद्ध, न काम्य, तथा हे प्रिये, न नैमित्तिक श्राद्ध। न ही मैंने विधिपूर्वक प्रचुर दक्षिणा वाले यज्ञ किए।
श्लोक 47 (skanda.3.12.47)
मासोपवासो न कृतः एकादश्यामुपोषणम् । धनुर्मासेप्युषःकाले शंभुविष्ण्वादिदेवताः
māsopavāso na kṛtaḥ ekādaśyāmupoṣaṇam dhanurmāsepyuṣaḥkāle śaṁbhuviṣṇvādidevatāḥ
मैंने न एक-मास का उपवास किया, न एकादशी का उपवास। धनुर्मास में उषःकाल में भी शंभु-विष्णु आदि देवताओं का —
श्लोक 48 (skanda.3.12.48)
संपूज्य विधिवद्भद्रे नैवेद्यं न कृतं मया । तेन पापेन मे त्वद्य दुःखमेतत्समा गतम्
saṁpūjya vidhivadbhadre naivedyaṁ na kṛtaṁ mayā tena pāpena me tvadya duḥkhametatsamā gatam
— विधिपूर्वक पूजन कर नैवेद्य नहीं चढ़ाया। उसी पाप के कारण आज मुझ पर यह दुःख आया है।
श्लोक 49 (skanda.3.12.49)
हरिशंकरयोर्नाम्नां कीर्तनं न मया कृतम् । उद्धूलनं त्रिपुण्ड्रं च जाबालोक्तैश्च सप्तभिः
hariśaṁkarayornāmnāṁ kīrtanaṁ na mayā kṛtam uddhūlanaṁ tripuṇḍraṁ ca jābāloktaiśca saptabhiḥ
मैंने हरि-शंकर के नामों का कीर्तन नहीं किया; न जाबाल-श्रुति में कहे गए सात द्रव्यों से उद्धूलन तथा त्रिपुण्ड्र —
श्लोक 50 (skanda.3.12.50)
न धृतं भस्मना भद्रे रुद्राक्षं न धृतं मया । जपश्च रुद्रसूक्तानां पंचाक्षरजपस्तथा
na dhṛtaṁ bhasmanā bhadre rudrākṣaṁ na dhṛtaṁ mayā japaśca rudrasūktānāṁ paṁcākṣarajapastathā
— हे भद्रे, न भस्म धारण किया, न रुद्राक्ष धारण किया। न रुद्र-सूक्तों का जप किया, न पंचाक्षर-मंत्र का जप,
श्लोक 51 (skanda.3.12.51)
तथा पुरुषसूक्तस्य जपोऽप्यष्टाक्षरस्य च । नैवकारि मया भद्रे नैवान्यो धर्मसंचयः
tathā puruṣasūktasya japo'pyaṣṭākṣarasya ca naivakāri mayā bhadre naivānyo dharmasaṁcayaḥ
— न पुरुष-सूक्त का जप, न अष्टाक्षर-मंत्र का। हे भद्रे, मैंने ये कुछ भी नहीं किए, न ही कोई अन्य धर्म-संचय किया।
श्लोक 52 (skanda.3.12.52)
तेन पापेन मे त्वद्य दुःखमेतत्समागतम् । एवं स विलपन्राजा भार्यामाभाष्य खिन्नधीः
tena pāpena me tvadya duḥkhametatsamāgatam evaṁ sa vilapanrājā bhāryāmābhāṣya khinnadhīḥ
उसी पाप के कारण आज मुझ पर यह दुःख आया है।" इस प्रकार विलाप करते हुए, अपनी पत्नी से यह कहकर, खिन्न-चित्त वह राजा —
श्लोक 53 (skanda.3.12.53)
मूर्च्छामुपाययौ विप्राः पपात च धरातले । सुमित्रा पतितं दृष्ट्वा भार्या सा पतिमंगना
mūrcchāmupāyayau viprāḥ papāta ca dharātale sumitrā patitaṁ dṛṣṭvā bhāryā sā patimaṁganā
— हे विप्रो, मूर्छित हो गया, और भूमि पर गिर पड़ा। अपने पति को गिरा हुआ देखकर वह पत्नी सुमित्रा —
श्लोक 54 (skanda.3.12.54)
आलिंग्य विललापाथ सपुत्रा भृशदुःखिता । मम नाथ महाराज सोमान्वयधुरंधर
āliṁgya vilalāpātha saputrā bhṛśaduḥkhitā mama nātha mahārāja somānvayadhuraṁdhara
— उसे आलिंगन कर, अपने पुत्र सहित अत्यंत दुःखी होकर विलाप करने लगी — "हे मेरे नाथ, हे महाराज, हे सोम-वंश के धुरंधर,
श्लोक 55 (skanda.3.12.55)
मां विहाय क्व यातोऽसि सपुत्रां विजने वने । अनाथां त्वामनुगतां सिंहत्रस्तां मृगीमिव
māṁ vihāya kva yāto'si saputrāṁ vijane vane anāthāṁ tvāmanugatāṁ siṁhatrastāṁ mṛgīmiva
— मुझे और पुत्र को इस निर्जन वन में छोड़कर आप कहाँ चले गए? मुझ अनाथ, जो सिंह से भयभीत मृगी के समान आपका अनुसरण करती रही थी?
श्लोक 56 (skanda.3.12.56)
मृतोऽसि यदि राजेंद्र तर्हि त्वामहमप्यरम् । अनुव्रजामि विधवा न स्थास्ये क्षणमप्युत
mṛto'si yadi rājeṁdra tarhi tvāmahamapyaram anuvrajāmi vidhavā na sthāsye kṣaṇamapyuta
हे राजेन्द्र, यदि आप मृत हो गए हैं, तो मैं भी तुरंत ही आपका अनुसरण करूँगी; मैं विधवा होकर क्षणभर भी नहीं रहूँगी।
श्लोक 57 (skanda.3.12.57)
पितरं पश्य पतितं चन्द्रकांत सुत क्षितौ । इत्युक्तश्चंद्रकांतोऽपि सुतो राज्ञः क्षुधार्दितः
pitaraṁ paśya patitaṁ candrakāṁta suta kṣitau ityuktaścaṁdrakāṁto'pi suto rājñaḥ kṣudhārditaḥ
हे चंद्रकांत पुत्र, अपने पिता को भूमि पर गिरा हुआ देखो।" इस प्रकार कहे जाने पर भूख से पीड़ित राजा का वह पुत्र चंद्रकांत भी,
श्लोक 58 (skanda.3.12.58)
पितरं परिरभ्याथ निःशब्दं प्ररुरोद सः । एतस्मिन्नंतरे विप्रा जटावल्कलसंवृतः
pitaraṁ parirabhyātha niḥśabdaṁ praruroda saḥ etasminnaṁtare viprā jaṭāvalkalasaṁvṛtaḥ
— अपने पिता को आलिंगन कर मौन होकर रोने लगा। इसी बीच, हे विप्रो, जटा और वल्कल से आच्छादित,
श्लोक 59 (skanda.3.12.59)
भस्मोद्धूलितसर्वांगस्त्रिपुण्ड्रांकितमस्तकः । रुद्राक्षमालाभरणः सितयज्ञोपवीतवान्
bhasmoddhūlitasarvāṁgastripuṇḍrāṁkitamastakaḥ rudrākṣamālābharaṇaḥ sitayajñopavītavān
— समस्त अंगों में भस्म लगाए, ललाट पर त्रिपुण्ड्र धारण किए, रुद्राक्ष-माला से अलंकृत, श्वेत यज्ञोपवीत धारण किए हुए —
श्लोक 60 (skanda.3.12.60)
पराशरोनाम मुनिराजगाम यदृच्छया । तं शब्दमभिलक्ष्यासौ साधुसज्जनसंमतः
parāśaronāma munirājagāma yadṛcchayā taṁ śabdamabhilakṣyāsau sādhusajjanasaṁmataḥ
— पराशर नामक एक मुनि संयोगवश वहाँ आ गए। साधु-सज्जनों द्वारा सम्मानित वे मुनि, उस विलाप-ध्वनि को सुनकर,
श्लोक 61 (skanda.3.12.61)
ततः सुमित्रा तं दृष्ट्वा पराशरमुपागतम् । ववंदे चरणौ तस्य सपुत्रा सा पतिव्रता
tataḥ sumitrā taṁ dṛṣṭvā parāśaramupāgatam vavaṁde caraṇau tasya saputrā sā pativratā
— वहाँ आए। तब सुमित्रा ने आए हुए पराशर को देखकर, अपने पुत्र सहित, उस पतिव्रता ने उनके चरणों में प्रणाम किया।
श्लोक 62 (skanda.3.12.62)
ततः पराशरेणेयं सुमित्रा परिसांत्विता । आश्वासिता च मुनिना मा शोचस्वेति भामिनि । ततः सुमित्रां पप्रच्छ शक्तिपुत्रो महामुनिः
tataḥ parāśareṇeyaṁ sumitrā parisāṁtvitā āśvāsitā ca muninā mā śocasveti bhāmini tataḥ sumitrāṁ papraccha śaktiputro mahāmuniḥ
तब पराशर ने इस सुमित्रा को सांत्वना दी, और मुनि ने उसे आश्वस्त करते हुए कहा — "हे भामिनि, शोक मत करो।" फिर शक्ति-पुत्र महामुनि ने सुमित्रा से पूछा —
श्लोक 63 (skanda.3.12.63)
पराशर उवाच । का त्वं सुश्रोणि कश्चासौ यश्चायं पतितोऽग्रतः
parāśara uvāca kā tvaṁ suśroṇi kaścāsau yaścāyaṁ patito'grataḥ
पराशर ने कहा — "हे सुश्रोणि, तुम कौन हो? और यह जो आगे गिरा हुआ है, वह कौन है?
श्लोक 64 (skanda.3.12.64)
अयं शिशुश्च कस्ते स्याद्वद तत्त्वेन मे शुभे । पृष्टैवं मुनिना साध्वी तमुवाच महामुनिम्
ayaṁ śiśuśca kaste syādvada tattvena me śubhe pṛṣṭaivaṁ muninā sādhvī tamuvāca mahāmunim
और यह बालक भी तुम्हारा कौन है? हे शुभे, मुझे सत्य बताओ।" इस प्रकार मुनि द्वारा पूछे जाने पर उस साध्वी ने उस महामुनि से कहा —
श्लोक 65 (skanda.3.12.65)
सुमित्रोवाच । पतिर्ममायमस्याहं भार्या वै मुनिसत्तम । आवाभ्यां जनितश्चायं चंद्रकांताभिधः सुतः
sumitrovāca patirmamāyamasyāhaṁ bhāryā vai munisattama āvābhyāṁ janitaścāyaṁ caṁdrakāṁtābhidhaḥ sutaḥ
सुमित्रा ने कहा — "हे मुनिसत्तम, यह मेरा पति है, और मैं इनकी पत्नी हूँ। यह हम दोनों से उत्पन्न पुत्र है, चंद्रकांत नामक।
श्लोक 66 (skanda.3.12.66)
अयं मनोजवो नाम राजा सोमकुलोद्भवः । विक्रमाढ्यस्य तनयः शौर्ये विष्णुसमो बली
ayaṁ manojavo nāma rājā somakulodbhavaḥ vikramāḍhyasya tanayaḥ śaurye viṣṇusamo balī
यह मनोजव नामक राजा हैं, चंद्रवंशोत्पन्न, विक्रमाढ्य के पुत्र, शौर्य में विष्णु के समान बलवान।
श्लोक 67 (skanda.3.12.67)
सुमित्रा नाम तस्याहं भार्या पतिमनुव्रता । युद्धे विनिर्जितो राजा गोलभेन मनोजवः
sumitrā nāma tasyāhaṁ bhāryā patimanuvratā yuddhe vinirjito rājā golabhena manojavaḥ
मैं इनकी सुमित्रा नामक पत्नी हूँ, पति-अनुव्रता। राजा मनोजव युद्ध में गोलभ द्वारा पराजित हो गए,
श्लोक 68 (skanda.3.12.68)
राज्याद्भ्रष्टो निरालंबो मया पुत्रेण चान्वितः । वनं विवेश ब्रह्मर्षे क्रूरसत्त्वभयानकम्
rājyādbhraṣṭo nirālaṁbo mayā putreṇa cānvitaḥ vanaṁ viveśa brahmarṣe krūrasattvabhayānakam
— और राज्य से भ्रष्ट, निराश्रय होकर, हे ब्रह्मर्षे, मुझे और पुत्र को साथ लेकर, क्रूर जीवों वाले इस भयानक वन में प्रविष्ट हुए।
श्लोक 69 (skanda.3.12.69)
क्षुधया पीडितः पुत्रो ह्यावामन्नमयाचत । निरन्नो विधुरो राजा दृष्ट्वा पुत्रं क्षुधार्दितम्
kṣudhayā pīḍitaḥ putro hyāvāmannamayācata niranno vidhuro rājā dṛṣṭvā putraṁ kṣudhārditam
भूख से पीड़ित पुत्र ने हम दोनों से अन्न माँगा। अन्नरहित, व्याकुल राजा ने अपने भूख से पीड़ित पुत्र को देखकर,
श्लोक 70 (skanda.3.12.70)
शोकाकुलमना ब्रह्मन्मूर्च्छितः पतितो भुवि । इति तद्वचनं श्रुत्वा शोकपर्याकुलाक्षरम्
śokākulamanā brahmanmūrcchitaḥ patito bhuvi iti tadvacanaṁ śrutvā śokaparyākulākṣaram
— हे ब्रह्मन्, शोकाकुल मन होकर मूर्च्छित हो भूमि पर गिर पड़े।" उसका यह शोक-व्याकुल वचन सुनकर,
श्लोक 71 (skanda.3.12.71)
शक्तिपुत्रो मुनिः प्राह सुमित्रां तां पतिव्रताम् । मनोजवस्य नृपतेर्भार्यामग्निशिखोपमाम्
śaktiputro muniḥ prāha sumitrāṁ tāṁ pativratām manojavasya nṛpaterbhāryāmagniśikhopamām
— शक्ति-पुत्र मुनि ने अग्नि-शिखा के समान तेजस्विनी, राजा मनोजव की पतिव्रता पत्नी उस सुमित्रा से कहा —
श्लोक 72 (skanda.3.12.72)
पराशर उवाच । मनोजवस्य भार्ये ते मा भीर्भूयात्कथंचन । युष्माकमशुभं सत्यमचिरान्नाशमेष्यति
parāśara uvāca manojavasya bhārye te mā bhīrbhūyātkathaṁcana yuṣmākamaśubhaṁ satyamacirānnāśameṣyati
पराशर ने कहा — "हे मनोजव की पत्नी, तुम्हें किसी भी प्रकार भय न हो। सच में, तुम लोगों का यह अशुभ शीघ्र ही नष्ट हो जाएगा।
श्लोक 73 (skanda.3.12.73)
मूर्च्छां विहाय ते भद्रे क्षणादुत्थास्यते पतिः । ततः पराशरो विप्रः पाणिना तं नराधिपम्
mūrcchāṁ vihāya te bhadre kṣaṇādutthāsyate patiḥ tataḥ parāśaro vipraḥ pāṇinā taṁ narādhipam
हे भद्रे, तुम्हारा पति क्षणभर में ही मूर्च्छा त्यागकर उठ जाएगा।" तब ब्राह्मण पराशर ने अपने हाथ से उस राजा को —
श्लोक 74 (skanda.3.12.74)
पस्पर्श मंत्रं प्रजपन्ध्यात्वा देवं त्रियंबकम् । ततो मनोजवो राजा करस्पृष्टो महामुनेः
pasparśa maṁtraṁ prajapandhyātvā devaṁ triyaṁbakam tato manojavo rājā karaspṛṣṭo mahāmuneḥ
— मंत्र जपते हुए, त्रिनेत्र देव (शिव) का ध्यान करते हुए स्पर्श किया। तब महामुनि के हाथ से स्पर्श किए गए राजा मनोजव —
श्लोक 75 (skanda.3.12.75)
उत्थितः सहसा तत्र त्यक्त्वा मूर्च्छां तमोमयीम् । ततः पराशरमुनिं प्रणम्य जगतीपतिः । उवाच परमप्रीतः प्रांजलिर्विप्रसत्तमम्
utthitaḥ sahasā tatra tyaktvā mūrcchāṁ tamomayīm tataḥ parāśaramuniṁ praṇamya jagatīpatiḥ uvāca paramaprītaḥ prāṁjalirviprasattamam
— वहाँ सहसा अपना अंधकारमय मूर्च्छा त्यागकर उठ खड़े हुए। तब उस पृथ्वीपति ने मुनि पराशर को प्रणाम कर, हाथ जोड़कर, परम प्रसन्न होकर उस ब्राह्मणश्रेष्ठ से कहा —
श्लोक 76 (skanda.3.12.76)
मनोजव उवाच । पराशरमुने त्वद्य त्वत्पादाब्जनिषेवणात्
manojava uvāca parāśaramune tvadya tvatpādābjaniṣevaṇāt
मनोजव ने कहा — "हे पराशर मुने, आज आपके चरण-कमलों की सेवा से —
श्लोक 77 (skanda.3.12.77)
मूर्च्छा मे विगता सद्यः पातकं चैव नाशितम् । त्वद्दर्शनमपुण्यानां नैव सिध्येत्कदाचन
mūrcchā me vigatā sadyaḥ pātakaṁ caiva nāśitam tvaddarśanamapuṇyānāṁ naiva sidhyetkadācana
— मेरी मूर्छा तुरंत दूर हो गई, तथा मेरा पाप भी नष्ट हो गया। आपका दर्शन पुण्यहीनों को कभी सिद्ध नहीं होता।
श्लोक 78 (skanda.3.12.78)
रक्ष मां करुणादृष्ट्या च्यावितं शत्रुभिः पुरात् । इत्युक्तः स मुनिः प्राह राजानं तं मनोजवम्
rakṣa māṁ karuṇādṛṣṭyā cyāvitaṁ śatrubhiḥ purāt ityuktaḥ sa muniḥ prāha rājānaṁ taṁ manojavam
अपनी करुणा-दृष्टि से मेरी रक्षा कीजिए — मुझे, जो शत्रुओं द्वारा नगरी से निकाला गया हूँ।" इस प्रकार कहे जाने पर उस मुनि ने राजा मनोजव से कहा —
श्लोक 79 (skanda.3.12.79)
पराशर उवाच । उपायं ते प्रवक्ष्यामि राजञ्च्छत्रुजयाय वै । रामसेतौ महापुण्ये गंधमादनपर्वते
parāśara uvāca upāyaṁ te pravakṣyāmi rājañcchatrujayāya vai rāmasetau mahāpuṇye gaṁdhamādanaparvate
पराशर ने कहा — "हे राजन्, मैं तुम्हें शत्रु-विजय का उपाय बताता हूँ। महापुण्य रामसेतु में, गंधमादन पर्वत पर,
श्लोक 80 (skanda.3.12.80)
विद्यते मंगलं तीर्थं सर्वैश्वर्यप्रदायकम् । सर्वलोकोपकाराय तस्मिन्सरसि राघवः
vidyate maṁgalaṁ tīrthaṁ sarvaiśvaryapradāyakam sarvalokopakārāya tasminsarasi rāghavaḥ
मंगल नामक तीर्थ है, जो समस्त ऐश्वर्य प्रदान करने वाला है। समस्त लोक के उपकार के लिए, उस सरोवर में राघव —
श्लोक 81 (skanda.3.12.81)
सन्निधत्ते सदा लक्ष्म्या सीतया राजसत्तम । सपुत्रभार्यस्त्वं तत्र गत्वा स्नात्वा सभक्तिकम्
sannidhatte sadā lakṣmyā sītayā rājasattama saputrabhāryastvaṁ tatra gatvā snātvā sabhaktikam
— हे राजसत्तम, लक्ष्मी-स्वरूपा सीता सहित सदा वहाँ विद्यमान रहते हैं। तुम अपनी पत्नी-पुत्र सहित वहाँ जाकर, भक्तिपूर्वक स्नान करके,
श्लोक 82 (skanda.3.12.82)
क्षेत्रश्राद्धादिकं चापि तत्तीरे कुरु भूपते । एवं कृते त्वया राजन्नलक्ष्मीः क्लेशकारिणी
kṣetraśrāddhādikaṁ cāpi tattīre kuru bhūpate evaṁ kṛte tvayā rājannalakṣmīḥ kleśakāriṇī
— हे भूपते, उस तट पर क्षेत्र-श्राद्ध आदि भी करो। हे राजन्, तुम्हारे ऐसा करने पर, वह क्लेशकारी अलक्ष्मी —
श्लोक 83 (skanda.3.12.83)
वैभवात्तस्य तीर्थस्य नाशं यास्यत्यसंशयम् । मंगलानि च सर्वाणि प्राप्स्यसे न चिरान्नृप
vaibhavāttasya tīrthasya nāśaṁ yāsyatyasaṁśayam maṁgalāni ca sarvāṇi prāpsyase na cirānnṛpa
— उस तीर्थ के प्रभाव से निश्चय ही नष्ट हो जाएगी। और हे राजन्, तुम शीघ्र ही समस्त मंगल-कार्यों को प्राप्त करोगे।
श्लोक 84 (skanda.3.12.84)
विजित्य शत्रूंश्च रणे पुनर्भूमिं प्रपत्स्यसे । अतस्त्वं भार्यया सार्द्धं पुत्रेण च मनोजव
vijitya śatrūṁśca raṇe punarbhūmiṁ prapatsyase atastvaṁ bhāryayā sārddhaṁ putreṇa ca manojava
शत्रुओं को युद्ध में जीतकर तुम पुनः अपनी भूमि (राज्य) को प्राप्त करोगे। अतः हे मनोजव, अपनी पत्नी और पुत्र सहित —
श्लोक 85 (skanda.3.12.85)
गच्छ मंगलतीर्थं तद्गन्धमादनपर्वते । अहमप्यागमिष्यामि तवानुग्रहकाम्यया
gaccha maṁgalatīrthaṁ tadgandhamādanaparvate ahamapyāgamiṣyāmi tavānugrahakāmyayā
— गंधमादन पर्वत पर उस मंगलतीर्थ को जाओ। मैं भी तुम्हारे कल्याण की कामना से साथ आऊँगा।"
श्लोक 86 (skanda.3.12.86)
पराशरस्त्वेवमुक्त्वा राजमुख्यैस्त्रिभिः सह । प्रायात्सेतुं समुद्दिश्य स्नातुं मंगलतीर्थके
parāśarastvevamuktvā rājamukhyaistribhiḥ saha prāyātsetuṁ samuddiśya snātuṁ maṁgalatīrthake
यह कहकर पराशर, राजा सहित उन तीनों के साथ, स्नान के लिए मंगलतीर्थ में सेतु की ओर, प्रस्थान कर गए।
श्लोक 87 (skanda.3.12.87)
राजादिभिः सह मुनिर्विलंघ्य विविधं वनम् । वनप्रदेशदेशांश्च दस्युग्रामाननेकशः
rājādibhiḥ saha munirvilaṁghya vividhaṁ vanam vanapradeśadeśāṁśca dasyugrāmānanekaśaḥ
वे मुनि, राजा आदि सहित, विविध वनों, वन-प्रदेशों तथा देशों, और अनेक डाकुओं के गाँवों को पार करते हुए,
श्लोक 88 (skanda.3.12.88)
प्रययौ मंगलं तीर्थं गन्धमादनपर्वते । तत्र संकल्प्य विधिवत्सस्नौ स मुनिपुंगवः
prayayau maṁgalaṁ tīrthaṁ gandhamādanaparvate tatra saṁkalpya vidhivatsasnau sa munipuṁgavaḥ
— गंधमादन पर्वत पर मंगल तीर्थ को गए। वहाँ विधिपूर्वक संकल्प करके उस मुनिश्रेष्ठ ने स्नान किया।
श्लोक 89 (skanda.3.12.89)
तानपि स्नापयामास राजादीन्विधिपूर्वकम् । तत्र श्राद्धं च भूपालश्चकार पितृतृप्तये
tānapi snāpayāmāsa rājādīnvidhipūrvakam tatra śrāddhaṁ ca bhūpālaścakāra pitṛtṛptaye
उन्होंने राजा आदि को भी विधिपूर्वक स्नान कराया। वहाँ राजा ने पितरों की तृप्ति के लिए श्राद्ध भी किया।
श्लोक 90 (skanda.3.12.90)
तत्र मासत्रयं सस्नौ राजा पत्नीसुतस्तथा । ततः पराशरमुनिः सस्नौ नियमपूर्वकम्
tatra māsatrayaṁ sasnau rājā patnīsutastathā tataḥ parāśaramuniḥ sasnau niyamapūrvakam
वहाँ राजा ने अपनी पत्नी और पुत्र सहित तीन मास तक स्नान किया। फिर मुनि पराशर ने भी नियमपूर्वक स्नान किया।
श्लोक 91 (skanda.3.12.91)
एवं मासत्रयं सस्नौ तैः साकं मुनिपुंगवः । मंगलाख्ये महापुण्ये सर्वामंगलनाशने
evaṁ māsatrayaṁ sasnau taiḥ sākaṁ munipuṁgavaḥ maṁgalākhye mahāpuṇye sarvāmaṁgalanāśane
इस प्रकार वह मुनिश्रेष्ठ उनके साथ तीन मास तक, समस्त अमंगल को नष्ट करने वाले महापुण्य मंगल तीर्थ में, स्नान करते रहे।
श्लोक 92 (skanda.3.12.92)
ततः पराशरमुनिः सर्वानर्थविनाशनम् । रामस्यैकाक्षरं मंत्रं तदंते समुपादिशत्
tataḥ parāśaramuniḥ sarvānarthavināśanam rāmasyaikākṣaraṁ maṁtraṁ tadaṁte samupādiśat
फिर उसके अंत में मुनि पराशर ने राम का एकाक्षर मंत्र सिखाया, जो समस्त अनर्थों का नाशक है।
श्लोक 93 (skanda.3.12.93)
चत्वारिंशद्दिनं तत्र मंत्रमेकाक्षरं नृपः । तत्र तीर्थे जजापासौ मुन्युक्तेनैव वर्त्मना
catvāriṁśaddinaṁ tatra maṁtramekākṣaraṁ nṛpaḥ tatra tīrthe jajāpāsau munyuktenaiva vartmanā
वहाँ चालीस दिनों तक उस राजा ने उस तीर्थ में उस एकाक्षर मंत्र का जप, मुनि द्वारा बताई गई विधि से ही किया।
श्लोक 94 (skanda.3.12.94)
एवमभ्यसतस्तस्य मंत्रमेकाक्षरं द्विजाः । मुनिप्रसादात्पुरतो धनुः प्रादुरभूद्दृढम्
evamabhyasatastasya maṁtramekākṣaraṁ dvijāḥ muniprasādātpurato dhanuḥ prādurabhūddṛḍham
हे द्विजो, इस प्रकार उस एकाक्षर मंत्र का अभ्यास करते हुए उसके सामने मुनि की कृपा से एक दृढ़ धनुष प्रकट हुआ।
श्लोक 95 (skanda.3.12.95)
अक्षयाविषुधी चापि खड्गौ च कनकत्सरू । एकं चर्म गदा चैका तथैको मुसलोत्तमः
akṣayāviṣudhī cāpi khaḍgau ca kanakatsarū ekaṁ carma gadā caikā tathaiko musalottamaḥ
तथा दो अक्षय तूणीर, तथा स्वर्ण-मूठ वाली दो तलवारें; एक ढाल, एक गदा, तथा एक उत्तम मूसल,
श्लोक 96 (skanda.3.12.96)
एकः शंखो महानादो वाजियुक्तो रथस्तथा । ससारथिः पताका च तीर्थादुत्तस्थुरग्रतः
ekaḥ śaṁkho mahānādo vājiyukto rathastathā sasārathiḥ patākā ca tīrthāduttasthuragrataḥ
— एक महानाद वाला शंख, तथा घोड़ों से युक्त रथ, सारथि सहित, तथा पताका — ये सब तीर्थ से उसके सामने प्रकट हुए।
श्लोक 97 (skanda.3.12.97)
कवचं कांचनमयं वैश्वानरसमप्रभम् । प्रादुर्बभूव तत्तीर्थात्प्रसादेन मुनेस्तथा
kavacaṁ kāṁcanamayaṁ vaiśvānarasamaprabham prādurbabhūva tattīrthātprasādena munestathā
उसी प्रकार मुनि की कृपा से एक स्वर्णमय कवच, अग्नि के समान तेजस्वी, उस तीर्थ से प्रकट हुआ।
श्लोक 98 (skanda.3.12.98)
हारकेयूरमुकुटकटकादिविभूषणम् । तीर्थानां प्रवरात्तस्मादुत्थितं नृपतेः पुरः
hārakeyūramukuṭakaṭakādivibhūṣaṇam tīrthānāṁ pravarāttasmādutthitaṁ nṛpateḥ puraḥ
हार, केयूर, मुकुट, कटक आदि आभूषण उस तीर्थों में श्रेष्ठ उस तीर्थ से राजा के सामने प्रकट हुए।
श्लोक 99 (skanda.3.12.99)
दिव्यांबरसहस्रं च तीर्थात्प्रादुरभूत्तदा । माला च वैजयंत्याख्या स्वर्णपंकजशोभिता
divyāṁbarasahasraṁ ca tīrthātprādurabhūttadā mālā ca vaijayaṁtyākhyā svarṇapaṁkajaśobhitā
तब तीर्थ से एक सहस्र दिव्य वस्त्र भी प्रकट हुए, तथा स्वर्ण-कमलों से सुशोभित वैजयंती नामक माला।
श्लोक 100 (skanda.3.12.100)
एतत्सर्वं समालोक्य मुनयेऽसौ न्यवेदयत् । ततः पराशरमुनिर्जलमादाय तीर्थतः
etatsarvaṁ samālokya munaye'sau nyavedayat tataḥ parāśaramunirjalamādāya tīrthataḥ
यह सब देखकर उसने मुनि को बताया। तब मुनि पराशर ने तीर्थ से जल लेकर,
श्लोक 101 (skanda.3.12.101)
अभ्यषिंचन्नरपतिं मंत्रपूतेनवारिणा । ततोऽभिषिक्तो नृपतिर्मुनिना परिशोभितः
abhyaṣiṁcannarapatiṁ maṁtrapūtenavāriṇā tato'bhiṣikto nṛpatirmuninā pariśobhitaḥ
— मंत्र से पवित्र किए गए उस जल से राजा का अभिषेक किया। तब मुनि द्वारा अभिषिक्त होकर, सुशोभित हुआ राजा,
श्लोक 102 (skanda.3.12.102)
सन्नद्धः कवची खड्गी चापबाणधरो युवा । हारकेयूरमुकुटकटकादिविभूषितः
sannaddhaḥ kavacī khaḍgī cāpabāṇadharo yuvā hārakeyūramukuṭakaṭakādivibhūṣitaḥ
— कवच धारण किए, तलवार लिए, धनुष-बाण धारण किए, युवा, हार-केयूर-मुकुट-कटक आदि से विभूषित होकर,
श्लोक 103 (skanda.3.12.103)
दिव्यांबरधरश्चापि वाजियुक्त रथस्थितः । शुशुभेऽतीव नृपतिर्मध्याह्न इव भास्करः
divyāṁbaradharaścāpi vājiyukta rathasthitaḥ śuśubhe'tīva nṛpatirmadhyāhna iva bhāskaraḥ
— दिव्य वस्त्र धारण किए, अश्व-युक्त रथ पर बैठा हुआ, वह राजा मध्याह्न के सूर्य के समान अत्यंत सुशोभित हुआ।
श्लोक 104 (skanda.3.12.104)
तस्मै नृपतये तत्र ब्रह्माद्यस्त्रं महामुनिः । सांगं च सरहस्यं च सोत्सर्गं सोप संहृति
tasmai nṛpataye tatra brahmādyastraṁ mahāmuniḥ sāṁgaṁ ca sarahasyaṁ ca sotsargaṁ sopa saṁhṛti
उस राजा को वहाँ महामुनि ने ब्रह्मास्त्र आदि अस्त्र, उनके अंगों, गुह्य-विद्या, उत्सर्ग (छोड़ने की विधि) तथा संहरण (वापस लेने की विधि) सहित —
श्लोक 105 (skanda.3.12.105)
उपादिशच्छक्तिपुत्रः सुमित्राजानये तदा । मनोजवोऽथ मुनिना ह्याशीर्वादपुरःसरम्
upādiśacchaktiputraḥ sumitrājānaye tadā manojavo'tha muninā hyāśīrvādapuraḥsaram
— शक्ति-पुत्र ने सुमित्रा के पति को तब सिखाया। फिर मुनि द्वारा आशीर्वादपूर्वक —
श्लोक 106 (skanda.3.12.106)
प्रेरितो रथमास्थाय प्रणम्य मुनिपुंगवम् । प्रदक्षिणीकृत्य तदाभ्यनुज्ञातो महर्षिणा
prerito rathamāsthāya praṇamya munipuṁgavam pradakṣiṇīkṛtya tadābhyanujñāto maharṣiṇā
— प्रेरित होकर मनोजव ने रथ पर आरूढ़ होकर, मुनिश्रेष्ठ को प्रणाम कर, प्रदक्षिणा करके, तथा उस महर्षि की अनुमति पाकर,
श्लोक 107 (skanda.3.12.107)
सार्द्धं पत्न्या च पुत्रेण प्रययौ विजयाय सः । स गत्वा स्वपुरं राजा प्रदध्मौ जलजं तदा
sārddhaṁ patnyā ca putreṇa prayayau vijayāya saḥ sa gatvā svapuraṁ rājā pradadhmau jalajaṁ tadā
— अपनी पत्नी और पुत्र सहित विजय के लिए प्रस्थान किया। वह राजा अपनी नगरी में पहुँचकर तब अपना शंख बजाने लगा।
श्लोक 108 (skanda.3.12.108)
ततः शंखरवं श्रुत्वा गोलभस्तु ससैनिकः । युद्धाय निर्ययौ तूर्णं मनोजवनृपेण सः
tataḥ śaṁkharavaṁ śrutvā golabhastu sasainikaḥ yuddhāya niryayau tūrṇaṁ manojavanṛpeṇa saḥ
तब शंख की ध्वनि सुनकर गोलभ, सेना सहित, राजा मनोजव के विरुद्ध युद्ध के लिए शीघ्र निकल पड़ा।
श्लोक 109 (skanda.3.12.109)
दिनत्रयं रणं जज्ञे गोलभेन नृपस्य वै । ततश्चतुर्थे दिवसे गोलभं तु ससैनिकम्
dinatrayaṁ raṇaṁ jajñe golabhena nṛpasya vai tataścaturthe divase golabhaṁ tu sasainikam
तीन दिनों तक राजा और गोलभ के बीच युद्ध हुआ। फिर चौथे दिन गोलभ को, उसकी सेना सहित,
श्लोक 110 (skanda.3.12.110)
मनोजवो नृपो युद्धे ब्रह्मास्त्रेण व्यनाशयत् । ततः सपुत्र भार्योऽयं पुरं प्राप्य निजं नृपः
manojavo nṛpo yuddhe brahmāstreṇa vyanāśayat tataḥ saputra bhāryo'yaṁ puraṁ prāpya nijaṁ nṛpaḥ
— राजा मनोजव ने युद्ध में ब्रह्मास्त्र से नष्ट कर दिया। फिर यह राजा, अपनी पत्नी और पुत्र सहित, अपनी नगरी में पहुँचकर,
श्लोक 111 (skanda.3.12.111)
पालयन्पृथिवीं सर्वां बुभुजे भार्यया सह । तदाप्रभृति राजासौ नाहंकारं चकार वै
pālayanpṛthivīṁ sarvāṁ bubhuje bhāryayā saha tadāprabhṛti rājāsau nāhaṁkāraṁ cakāra vai
— समस्त पृथ्वी का पालन करते हुए अपनी पत्नी सहित भोग करने लगा। तभी से उस राजा ने कभी अहंकार नहीं किया।
श्लोक 112 (skanda.3.12.112)
असूयादींस्तथा दोषान्वर्जयामास भूपतिः । अहिंसानिरतो दांतः सदा धर्मपरोऽभवत्
asūyādīṁstathā doṣānvarjayāmāsa bhūpatiḥ ahiṁsānirato dāṁtaḥ sadā dharmaparo'bhavat
राजा ने ईर्ष्या आदि दोषों का भी त्याग कर दिया; अहिंसा में तत्पर, संयमी, वह सदा धर्मपरायण हो गया।
श्लोक 113 (skanda.3.12.113)
सहस्रं वत्सरानेवं ररक्ष स महीपतिः । ततो विरक्तो राजेन्द्रः पुत्रे राज्यं निधाय तु
sahasraṁ vatsarānevaṁ rarakṣa sa mahīpatiḥ tato virakto rājendraḥ putre rājyaṁ nidhāya tu
इस प्रकार वह राजा एक सहस्र वर्षों तक राज्य की रक्षा करता रहा। फिर विरक्त होकर उस राजेन्द्र ने राज्य को अपने पुत्र को सौंपकर,
श्लोक 114 (skanda.3.12.114)
जगाम मंगलं तीर्थं गन्धमादनपर्वते । तपश्चचार तत्रासौ ध्यायन्हृदि सदाशिवम्
jagāma maṁgalaṁ tīrthaṁ gandhamādanaparvate tapaścacāra tatrāsau dhyāyanhṛdi sadāśivam
— गंधमादन पर्वत पर मंगल तीर्थ को चला गया। वहाँ उसने हृदय में सदाशिव का ध्यान करते हुए तप किया।
श्लोक 115 (skanda.3.12.115)
ततोऽचिरेण कालेन त्यक्त्वा देहं मनोजवः । शिवलोकं ययौ राजा तस्य तीर्थस्य वैभवात्
tato'cireṇa kālena tyaktvā dehaṁ manojavaḥ śivalokaṁ yayau rājā tasya tīrthasya vaibhavāt
फिर अल्प समय में ही देह त्यागकर, वह राजा मनोजव उस तीर्थ के प्रभाव से शिवलोक को चला गया।
श्लोक 116 (skanda.3.12.116)
तस्य भार्या सुमित्रापि तस्यालिंग्य तनुं तदा । अन्वारूढा चितां विप्राः प्राप तल्लोकमेव सा
tasya bhāryā sumitrāpi tasyāliṁgya tanuṁ tadā anvārūḍhā citāṁ viprāḥ prāpa tallokameva sā
हे विप्रो, उनकी पत्नी सुमित्रा भी उनके शरीर का आलिंगन कर चिता पर उनके पीछे आरूढ़ हो गई, और वह भी उसी लोक को प्राप्त हुई।
श्लोक 117 (skanda.3.12.117)
श्रीसूत उवाच । एवं प्रभावं तत्तीर्थं श्रीमन्मंगलनामकम् । मनोजवो नृपो यत्र स्नात्वा तीर्थे महत्तरे
śrīsūta uvāca evaṁ prabhāvaṁ tattīrthaṁ śrīmanmaṁgalanāmakam manojavo nṛpo yatra snātvā tīrthe mahattare
श्री सूत जी ने कहा — इस प्रकार का प्रभाव है उस श्रीमान् मंगल नामक तीर्थ का, जहाँ राजा मनोजव ने उस महान तीर्थ में स्नान करके —
श्लोक 118 (skanda.3.12.118)
शत्रून्विजित्य देहांते शिवलोकं ययौ स्त्रिया । तस्मात्सर्वप्रयत्नेन सेव्यं मंगलतीर्थकम्
śatrūnvijitya dehāṁte śivalokaṁ yayau striyā tasmātsarvaprayatnena sevyaṁ maṁgalatīrthakam
— अपने शत्रुओं को जीता, तथा देहांत होने पर अपनी पत्नी सहित शिवलोक को गए। अतः समस्त प्रयत्न से मंगलतीर्थक की सेवा करनी चाहिए।
श्लोक 119 (skanda.3.12.119)
तीर्थमेतदतिशोभनं शिवं भुक्तिमुक्तिफलदं नृणां सदा । पापराशितृणतूलपावकं सेवत द्विजवरा विमुक्तये
tīrthametadatiśobhanaṁ śivaṁ bhuktimuktiphaladaṁ nṛṇāṁ sadā pāparāśitṛṇatūlapāvakaṁ sevata dvijavarā vimuktaye
यह तीर्थ अत्यंत सुंदर, कल्याणकारी, मनुष्यों को सदा भुक्ति-मुक्ति का फल देने वाला, तथा पाप-राशि रूपी तृण-रुई के लिए अग्नि के समान है। हे द्विजश्रेष्ठो, मुक्ति के लिए इसकी सेवा करो।