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ब्रह्म खण्ड · अध्याय 13

अमृतवापिका तथा एकांतरामनाथ क्षेत्र का माहात्म्य

अध्याय 12अध्याय-सूचीअध्याय 14

श्लोक 1 (skanda.3.13.1)

श्रीसूत उवाच । मंगलाख्ये महातीर्थे नरः स्नात्वा विकल्मषः । एकांतरामनाथाख्यं क्षेत्रं गच्छेत्ततः परम्

śrīsūta uvāca maṁgalākhye mahātīrthe naraḥ snātvā vikalmaṣaḥ ekāṁtarāmanāthākhyaṁ kṣetraṁ gacchettataḥ param

श्री सूत जी ने कहा — मंगल नामक महातीर्थ में स्नान करके, निष्पाप हुआ मनुष्य फिर एकांतरामनाथ नामक क्षेत्र को जाए।

श्लोक 2 (skanda.3.13.2)

तत्र रामो जगन्नाथो जानक्या लक्ष्मणेन च । हनुमत्प्रमुखैश्चापि वानरैः परिवारितः

tatra rāmo jagannātho jānakyā lakṣmaṇena ca hanumatpramukhaiścāpi vānaraiḥ parivāritaḥ

वहाँ जगन्नाथ राम, जानकी और लक्ष्मण सहित, तथा हनुमान आदि वानरों से घिरे हुए,

श्लोक 3 (skanda.3.13.3)

सन्निधत्ते सदा विप्रा लोकानुग्रहकाम्यया । विद्यते पुण्यदा तत्र नाम्ना ह्यमृतवापिका

sannidhatte sadā viprā lokānugrahakāmyayā vidyate puṇyadā tatra nāmnā hyamṛtavāpikā

— हे विप्रो, लोक-कल्याण की कामना से सदा विद्यमान रहते हैं। वहाँ अमृतवापिका नामक एक पुण्यदायी पुष्करिणी है।

श्लोक 4 (skanda.3.13.4)

तस्यां निमज्जतां नृणां न जरांतकजं भयम् । अस्याममृतवाप्यां यः सश्रद्धं स्नाति मानवः

tasyāṁ nimajjatāṁ nṛṇāṁ na jarāṁtakajaṁ bhayam asyāmamṛtavāpyāṁ yaḥ saśraddhaṁ snāti mānavaḥ

उसमें डुबकी लगाने वाले मनुष्यों को बुढ़ापे और मृत्यु से उत्पन्न होने वाला भय नहीं रहता। इस अमृतवापी में जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक स्नान करता है,

श्लोक 5 (skanda.3.13.5)

अमृतत्वं भजत्येष शंकरस्य प्रसादतः । महापातकनाशिन्यामस्यां वाप्यां निमज्जताम्

amṛtatvaṁ bhajatyeṣa śaṁkarasya prasādataḥ mahāpātakanāśinyāmasyāṁ vāpyāṁ nimajjatām

— वह शंकर की कृपा से अमरत्व को प्राप्त करता है। इस महापातक-नाशिनी पुष्करिणी में डुबकी लगाने वालों को —

श्लोक 6 (skanda.3.13.6)

अमृतत्वं हरो दातुं सन्निधत्ते सदा तटे । ऋषय ऊचुः । इयं ह्यमृतवापीति कुतो हेतोर्निगद्यते

amṛtatvaṁ haro dātuṁ sannidhatte sadā taṭe ṛṣaya ūcuḥ iyaṁ hyamṛtavāpīti kuto hetornigadyate

— अमरत्व देने के लिए हर सदा उसके तट पर विद्यमान रहते हैं। ऋषियों ने कहा — यह अमृतवापी क्यों कही जाती है, किस कारण?

श्लोक 7 (skanda.3.13.7)

अस्माकमेतद्ब्रूहि त्वं कृपया व्यासशासित । तथैवामृतनामिन्या वापिकायाश्च वैभवम् । तृप्तिर्न जायतेऽस्माकं त्वद्वचोऽमृतपायिनाम्

asmākametadbrūhi tvaṁ kṛpayā vyāsaśāsita tathaivāmṛtanāminyā vāpikāyāśca vaibhavam tṛptirna jāyate'smākaṁ tvadvaco'mṛtapāyinām

हे व्यास द्वारा शिक्षित, कृपापूर्वक हमें यह बताइए; तथा उसी प्रकार अमृत-नामिनी उस पुष्करिणी का माहात्म्य भी। आपके वचनामृत को पीते हुए भी हमें तृप्ति नहीं होती।

श्लोक 8 (skanda.3.13.8)

श्रीसूत उवाच । अस्या अमृतनामत्वं वैभवं च मनोहरम्

śrīsūta uvāca asyā amṛtanāmatvaṁ vaibhavaṁ ca manoharam

श्री सूत जी ने कहा — इसके अमृत नाम होने का कारण, तथा इसका मनोहर माहात्म्य,

श्लोक 9 (skanda.3.13.9)

प्रवक्ष्यामि विशेषेण शृणुत द्विजसत्तमाः । पुरा हिमवतः पार्श्वे नानामुनिसमाकुले

pravakṣyāmi viśeṣeṇa śṛṇuta dvijasattamāḥ purā himavataḥ pārśve nānāmunisamākule

— मैं विशेष रूप से बताऊँगा; हे द्विजसत्तमो, सुनिए। प्राचीन काल में हिमालय के पार्श्व में, विविध मुनियों से भरे हुए,

श्लोक 10 (skanda.3.13.10)

सिद्धचारणगंधर्वदेवकिन्नरसेविते । सिंहव्याघ्रवराहेभमहिषादिसमाकुले

siddhacāraṇagaṁdharvadevakinnarasevite siṁhavyāghravarāhebhamahiṣādisamākule

— सिद्ध, चारण, गंधर्व, देव तथा किन्नरों से सेवित, सिंह, व्याघ्र, वराह, गज, महिष आदि से भरे हुए,

श्लोक 11 (skanda.3.13.11)

तमालतालहिंतालचंपकाशोकसंतते । हंसकोकिलदात्यूहचक्रवाकादिशोभिते

tamālatālahiṁtālacaṁpakāśokasaṁtate haṁsakokiladātyūhacakravākādiśobhite

— तमाल, ताल, हिंताल, चंपक तथा अशोक के वृक्षों से भरे हुए, हंस, कोकिल, दात्यूह, चक्रवाक आदि से सुशोभित,

श्लोक 12 (skanda.3.13.12)

पद्मेंदीवरकह्लारकुमुदाढ्यसरो वृते । सत्यवाञ्छीलवान्वाग्मी वशी कुंभजसोदरः

padmeṁdīvarakahlārakumudāḍhyasaro vṛte satyavāñchīlavānvāgmī vaśī kuṁbhajasodaraḥ

— कमल, नीलकमल, कह्लार तथा कुमुद से समृद्ध सरोवरों से घिरे हुए स्थान में — सत्यवादी, शीलवान, वाक्पटु, संयमी, अगस्त्य के सहोदर भाई —

श्लोक 13 (skanda.3.13.13)

आस्ते तपश्चरन्नित्यं मोक्षार्थी शंकरप्रियः । त्रिकालमर्चयञ्छंभु वन्यैर्मूलफलादिभिः

āste tapaścarannityaṁ mokṣārthī śaṁkarapriyaḥ trikālamarcayañchaṁbhu vanyairmūlaphalādibhiḥ

— निवास करते थे, नित्य तप करते हुए, मोक्ष के इच्छुक, शंकर के प्रिय, वन्य मूल-फल आदि से त्रिकाल शंभु का पूजन करते हुए,

श्लोक 14 (skanda.3.13.14)

आगतान्स्वाश्रमाभ्याशमतिथीन्वन्यभोजनैः । पूजयन्नर्चयन्नग्निं संध्योपासनतत्परः

āgatānsvāśramābhyāśamatithīnvanyabhojanaiḥ pūjayannarcayannagniṁ saṁdhyopāsanatatparaḥ

— अपने आश्रम के समीप आए हुए अतिथियों का वन्य भोजन से सत्कार करते हुए, अग्नि का पूजन करते हुए, संध्या-उपासना में तत्पर,

श्लोक 15 (skanda.3.13.15)

गायत्र्यादीन्महामंत्रान्कालेकाले जपन्मुदा । निद्रां परित्यजन्ब्राह्मे मुहूर्ते विष्णुचिंतकः

gāyatryādīnmahāmaṁtrānkālekāle japanmudā nidrāṁ parityajanbrāhme muhūrte viṣṇuciṁtakaḥ

— गायत्री आदि महामंत्रों का समय-समय पर आनंदपूर्वक जप करते हुए, ब्राह्म-मुहूर्त में निद्रा त्यागकर, विष्णु का चिंतन करते हुए,

श्लोक 16 (skanda.3.13.16)

स्नानं कुर्वन्नुषःकाले नमन्संध्यां प्रसन्नधीः । गायत्रीं प्रजपन्विप्राः पूजयन्हरिशंकरौ

snānaṁ kurvannuṣaḥkāle namansaṁdhyāṁ prasannadhīḥ gāyatrīṁ prajapanviprāḥ pūjayanhariśaṁkarau

— उषःकाल में स्नान करते हुए, संध्या को नमन करते हुए, प्रसन्नचित्त, हे विप्रो, गायत्री का जप करते हुए, हरि-शंकर का पूजन करते हुए,

श्लोक 17 (skanda.3.13.17)

वेदाध्यायी शास्त्रपाठी मध्याह्नेऽतिथिपूजकः । श्रोतापुराणपाठानामग्निकार्येष्वतंद्रितः

vedādhyāyī śāstrapāṭhī madhyāhne'tithipūjakaḥ śrotāpurāṇapāṭhānāmagnikāryeṣvataṁdritaḥ

— वेद का अध्ययन करने वाले, शास्त्र पढ़ने वाले, मध्याह्न में अतिथि-पूजन करने वाले, पुराण-श्रवण-पाठन तथा अग्नि-कार्यों में अथक,

श्लोक 18 (skanda.3.13.18)

पंचयज्ञपरो नित्यं वैश्वदेवबलिप्रदः । प्रत्यब्दं श्राद्धकृत्पित्रोस्तथान्यश्राद्धकृद्द्विजाः

paṁcayajñaparo nityaṁ vaiśvadevabalipradaḥ pratyabdaṁ śrāddhakṛtpitrostathānyaśrāddhakṛddvijāḥ

— सदा पंचयज्ञों में तत्पर, वैश्वदेव-बलि देने वाले, प्रतिवर्ष माता-पिता का श्राद्ध करने वाले, तथा हे द्विजो, अन्य श्राद्ध भी करने वाले,

श्लोक 19 (skanda.3.13.19)

एवं निनाय कालं स नित्यानुष्ठानतत्परः । तस्यैवं वर्तमानस्य तपश्चरत उत्तमम्

evaṁ nināya kālaṁ sa nityānuṣṭhānatatparaḥ tasyaivaṁ vartamānasya tapaścarata uttamam

— इस प्रकार वे अपने नित्य-अनुष्ठान में तत्पर होकर समय बिताते थे। इस प्रकार व्यवहार करते हुए, उत्तम तप करते हुए उनके —

श्लोक 20 (skanda.3.13.20)

सहस्रवर्षाण्यगमञ्च्छंकरासक्तचेतसः । तथापि शंकरो नास्याययौ प्रत्यक्षतां तदा

sahasravarṣāṇyagamañcchaṁkarāsaktacetasaḥ tathāpi śaṁkaro nāsyāyayau pratyakṣatāṁ tadā

— एक सहस्र वर्ष व्यतीत हो गए, जिनका मन शंकर में आसक्त था। फिर भी शंकर तब उन्हें प्रत्यक्ष नहीं हुए।

श्लोक 21 (skanda.3.13.21)

ततस्त्वगस्त्यभ्रातासौ ग्रीष्मे पंचानिमध्यगः । भास्करं दत्तदृष्टिश्च मौनव्रतसमन्वितः

tatastvagastyabhrātāsau grīṣme paṁcānimadhyagaḥ bhāskaraṁ dattadṛṣṭiśca maunavratasamanvitaḥ

तब अगस्त्य के उस भाई ने, ग्रीष्म ऋतु में पंचाग्नि के मध्य खड़े होकर, सूर्य पर दृष्टि लगाए हुए, मौन-व्रत से युक्त होकर,

श्लोक 22 (skanda.3.13.22)

तिष्ठन्कनिष्ठिकांगुल्यां वामपादस्य निश्चलः । ऊर्ध्वबाहुर्निरालंबस्तपस्तेपेऽतिदारुणम्

tiṣṭhankaniṣṭhikāṁgulyāṁ vāmapādasya niścalaḥ ūrdhvabāhurnirālaṁbastapastepe'tidāruṇam

— अपने बाएँ पैर की छोटी अँगुली पर निश्चल खड़े होकर, भुजाएँ ऊपर उठाए, बिना किसी सहारे के, अत्यंत भीषण तप किया।

श्लोक 23 (skanda.3.13.23)

अथ तस्य प्रसन्नात्मा महादेवो घृणानिधिः । प्रादुरासीत्स्वया दीप्त्या दिशो दश विभासयन्

atha tasya prasannātmā mahādevo ghṛṇānidhiḥ prādurāsītsvayā dīptyā diśo daśa vibhāsayan

तब उनसे प्रसन्न होकर, घृणानिधि (करुणा-निधि) महादेव, अपने तेज से दसों दिशाओं को प्रकाशित करते हुए प्रकट हुए।

श्लोक 24 (skanda.3.13.24)

ततोऽद्राक्षीन्मुनिः शंभुं सांबं वृषभसंस्थि तम् । दृष्ट्वा प्रणम्य तुष्टाव भवानीपतिमीश्वरम्

tato'drākṣīnmuniḥ śaṁbhuṁ sāṁbaṁ vṛṣabhasaṁsthi tam dṛṣṭvā praṇamya tuṣṭāva bhavānīpatimīśvaram

तब उस मुनि ने अंबा (पार्वती) सहित वृषभारूढ़ शंभु को देखा; देखकर, प्रणाम कर, उन्होंने भवानीपति ईश्वर की स्तुति की।

श्लोक 25 (skanda.3.13.25)

मुनिरुवाच । नमस्ते पार्वतीनाथ नीलकंठ महेश्वर । शिव रुद्र महादेव नम स्ते शंभवे विभो

muniruvāca namaste pārvatīnātha nīlakaṁṭha maheśvara śiva rudra mahādeva nama ste śaṁbhave vibho

मुनि ने कहा — "हे पार्वतीनाथ, हे नीलकंठ महेश्वर, आपको नमस्कार है। हे शिव, हे रुद्र, हे महादेव, हे विभो शंभु, आपको नमस्कार है।

श्लोक 26 (skanda.3.13.26)

श्रीकंठोमापते शूलिन्भगनेत्रहराव्यय । गंगाधर विरूपाक्ष नमस्ते रुद्र मन्यवे

śrīkaṁṭhomāpate śūlinbhaganetraharāvyaya gaṁgādhara virūpākṣa namaste rudra manyave

हे श्रीकंठ, हे उमापति, हे शूलधारी, हे भग के नेत्र को हरने वाले, हे अव्यय! हे गंगाधर, हे विरूपाक्ष, हे क्रोधमय रुद्र, आपको नमस्कार है।

श्लोक 27 (skanda.3.13.27)

अंतकारे कामशत्रो देवदेव जगत्पते । स्वामिन्पशुपते शर्व नमस्ते शतधन्वने । दक्षयक्षविनाशाय स्नायूनां पतये नमः । निचेरवे नमस्तुभ्यं पुष्टानां पतये नमः

aṁtakāre kāmaśatro devadeva jagatpate svāminpaśupate śarva namaste śatadhanvane dakṣayakṣavināśāya snāyūnāṁ pataye namaḥ nicerave namastubhyaṁ puṣṭānāṁ pataye namaḥ

हे अंतक (यम) के संहारक, हे काम के शत्रु, हे देवदेव, हे जगत्पते, हे स्वामी, हे पशुपते, हे शर्व, हे शतधन्वा, आपको नमस्कार है! दक्ष के यज्ञ के नाशक, स्नायुओं के स्वामी को नमस्कार! हे निचेर, पुष्टियों के स्वामी, आपको नमस्कार है!

श्लोक 28 (skanda.3.13.28)

भूयोभूयो नमस्तुभ्यं महादेव कृपालय । दुस्तराद्भवसिंधोर्मां तारयस्व त्रिलोचन

bhūyobhūyo namastubhyaṁ mahādeva kṛpālaya dustarādbhavasiṁdhormāṁ tārayasva trilocana

हे महादेव, हे कृपालय, आपको बारंबार नमस्कार है! हे त्रिलोचन, मुझे इस दुस्तर भवसागर से पार कीजिए।"

श्लोक 29 (skanda.3.13.29)

अगस्त्यसोदरेणैवं स्तुतः शंभुरभाषत । प्रीणयन्वचसा स्वेन कुंभजस्यानुजं मुनिम्

agastyasodareṇaivaṁ stutaḥ śaṁbhurabhāṣata prīṇayanvacasā svena kuṁbhajasyānujaṁ munim

अगस्त्य के भाई द्वारा इस प्रकार स्तुति किए जाने पर शंभु ने कहा, अपने वचनों से कुंभज (अगस्त्य) के उस अनुज मुनि को प्रसन्न करते हुए —

श्लोक 30 (skanda.3.13.30)

ईश्वर उवाच । कुंभजानुज वक्ष्यामि मुक्त्युपायं तवानघ । सेतुमध्ये महातीर्थं गंधमादनपर्वते

īśvara uvāca kuṁbhajānuja vakṣyāmi muktyupāyaṁ tavānagha setumadhye mahātīrthaṁ gaṁdhamādanaparvate

ईश्वर ने कहा — "हे कुंभज के अनुज, हे निष्पाप, मैं तुम्हें मुक्ति का उपाय बताता हूँ। सेतु के मध्य, गंधमादन पर्वत पर, एक महातीर्थ है,

श्लोक 31 (skanda.3.13.31)

मंगलाख्यस्य तीर्थस्य नातिदूरेण वर्तते । तत्र गत्वा कुरु स्नानं ततो मुक्तिमवाप्स्यसि

maṁgalākhyasya tīrthasya nātidūreṇa vartate tatra gatvā kuru snānaṁ tato muktimavāpsyasi

— जो मंगल नामक तीर्थ से अधिक दूर नहीं है। वहाँ जाकर स्नान करो; उसके बाद तुम मुक्ति प्राप्त करोगे।

श्लोक 32 (skanda.3.13.32)

तत्तीर्थसेवनान्नान्योमोक्षो पायो लघुस्तव । न हि तत्तीर्थवैशिष्ट्यं वक्तुं शक्यं मयापि च

tattīrthasevanānnānyomokṣo pāyo laghustava na hi tattīrthavaiśiṣṭyaṁ vaktuṁ śakyaṁ mayāpi ca

उस तीर्थ की सेवा से बढ़कर तुम्हारे लिए मोक्ष का कोई अन्य सरल उपाय नहीं है। उस तीर्थ की विशेषता को तो मैं भी नहीं कह सकता।

श्लोक 33 (skanda.3.13.33)

संदेहो नात्र कर्तव्यस्त्वयाद्य मुनिसत्तम । तस्मात्तत्रैव गच्छ त्वं यदीच्छसि भवक्षयम्

saṁdeho nātra kartavyastvayādya munisattama tasmāttatraiva gaccha tvaṁ yadīcchasi bhavakṣayam

हे मुनिसत्तम, इस विषय में आज तुम्हें कोई संदेह नहीं करना चाहिए। अतः यदि तुम भव-क्षय चाहते हो, तो वहीं जाओ।"

श्लोक 34 (skanda.3.13.34)

इत्युक्त्वा भगवानीशस्तत्रैवांतरधीयत । ततो देवस्य वचनादगस्त्यस्य सहोदरः

ityuktvā bhagavānīśastatraivāṁtaradhīyata tato devasya vacanādagastyasya sahodaraḥ

यह कहकर भगवान् ईश वहीं अंतर्धान हो गए। तब उस देव के वचन से अगस्त्य के उस भाई ने —

श्लोक 35 (skanda.3.13.35)

गत्वा सेतुं समुद्रे तु गंधमादनपर्वते । ईश्वरणैव गदितं तीर्थं तच्छीघ्रमासदत्

gatvā setuṁ samudre tu gaṁdhamādanaparvate īśvaraṇaiva gaditaṁ tīrthaṁ tacchīghramāsadat

— गंधमादन पर्वत पर, समुद्र में सेतु की ओर जाकर, ईश्वर द्वारा बताए गए उस तीर्थ को शीघ्र प्राप्त किया।

श्लोक 36 (skanda.3.13.36)

तत्र तीर्थे महापुण्ये स्नातानां मुक्तिदायिनि । एकांतरामनाथाख्ये क्षेत्रालंकरणे शुभे

tatra tīrthe mahāpuṇye snātānāṁ muktidāyini ekāṁtarāmanāthākhye kṣetrālaṁkaraṇe śubhe

वहाँ उस महापुण्य, स्नान करने वालों को मुक्ति देने वाले, एकांतरामनाथ नामक, क्षेत्र के शुभ अलंकारस्वरूप तीर्थ में,

श्लोक 37 (skanda.3.13.37)

सस्नौ नियमपूर्वं स त्रीणि वर्षाणि वै द्विजः । ततश्चतुर्थवर्षे तु समाधिस्थो महामुनिः

sasnau niyamapūrvaṁ sa trīṇi varṣāṇi vai dvijaḥ tataścaturthavarṣe tu samādhistho mahāmuniḥ

— उस ब्राह्मण ने नियमपूर्वक तीन वर्षों तक स्नान किया। फिर चौथे वर्ष में वह महामुनि समाधिस्थ होकर,

श्लोक 38 (skanda.3.13.38)

ब्रह्मनाड्या प्राणवायुं मूर्द्धन्यारोप्ययोगतः । प्राणान्निर्गमयामास ब्रह्मरंध्रेण तत्र सः

brahmanāḍyā prāṇavāyuṁ mūrddhanyāropyayogataḥ prāṇānnirgamayāmāsa brahmaraṁdhreṇa tatra saḥ

— ब्रह्मनाड़ी द्वारा योगपूर्वक प्राणवायु को मस्तक में स्थापित करके, वहाँ ब्रह्मरंध्र से अपने प्राणों को निकाल दिया।

श्लोक 39 (skanda.3.13.39)

ततोऽगस्त्यानुजः सोयं परित्यज्य कलेवरम् । अवाप मुक्तिं परमां तस्य तीर्थस्य वैभवात्

tato'gastyānujaḥ soyaṁ parityajya kalevaram avāpa muktiṁ paramāṁ tasya tīrthasya vaibhavāt

तब अगस्त्य के उस अनुज ने अपना शरीर त्यागकर, उस तीर्थ के प्रभाव से परम मुक्ति प्राप्त की।

श्लोक 40 (skanda.3.13.40)

विनष्टाशेषदुःखस्य तत्तीर्थस्नानवैभवात् । मृतत्वमभूद्यस्मादगस्त्यानुजजन्मनः

vinaṣṭāśeṣaduḥkhasya tattīrthasnānavaibhavāt mṛtatvamabhūdyasmādagastyānujajanmanaḥ

चूँकि उस तीर्थ में स्नान के प्रभाव से उसका समस्त दुःख नष्ट हो गया, और अगस्त्य के अनुज के रूप में जन्मे उसका मरणत्व (मृत्युबंधन) ही समाप्त हो गया —

श्लोक 41 (skanda.3.13.41)

ततो ह्यमृतवापीतिप्रथाऽस्यासीन्मुनीश्वराः । अत्र तीर्थे नरा ये तु वर्षत्रयमतंद्रिताः

tato hyamṛtavāpītiprathā'syāsīnmunīśvarāḥ atra tīrthe narā ye tu varṣatrayamataṁdritāḥ

— इसीलिए, हे मुनीश्वरो, इस पुष्करिणी की 'अमृतवापी' यह ख्याति हुई। इस तीर्थ में जो मनुष्य तीन वर्षों तक अथक होकर —

श्लोक 42 (skanda.3.13.42)

स्नानं कुर्वंति ते सत्यममृतत्वं प्रयांति हि । एवं त्वमृतवापीति प्रथा तद्वैभवं तथा । युष्माकं कथितं विप्राः किंभूयः श्रोतुमिच्छथ

snānaṁ kurvaṁti te satyamamṛtatvaṁ prayāṁti hi evaṁ tvamṛtavāpīti prathā tadvaibhavaṁ tathā yuṣmākaṁ kathitaṁ viprāḥ kiṁbhūyaḥ śrotumicchatha

— स्नान करते हैं, वे सचमुच अमरत्व को प्राप्त होते हैं। हे विप्रो, इस प्रकार अमृतवापी की यह ख्याति तथा उसका माहात्म्य आपको बताया गया; अब और क्या सुनना चाहते हैं?

श्लोक 43 (skanda.3.13.43)

ऋषय ऊचुः । एकांतरामनाथाख्या तस्य क्षेत्रस्य वै मुने

ṛṣaya ūcuḥ ekāṁtarāmanāthākhyā tasya kṣetrasya vai mune

ऋषियों ने कहा — हे मुने, उस क्षेत्र का एकांतरामनाथ यह नाम —

श्लोक 44 (skanda.3.13.44)

कथं समागता सूत वक्तुमेतत्त्वमर्हसि । अस्माकं मुनिशार्दूल तच्छुश्रूषातिभूयसी

kathaṁ samāgatā sūta vaktumetattvamarhasi asmākaṁ muniśārdūla tacchuśrūṣātibhūyasī

— कैसे प्राप्त हुआ, हे सूत? आप यह बताने योग्य हैं। हे मुनिशार्दूल, इसे सुनने की हमारी इच्छा अत्यंत प्रबल है।

श्लोक 45 (skanda.3.13.45)

श्रीसूत उवाच । पुरा दाशरथी रामः ससुग्रीवभिभीषणः । लक्ष्मणेन युतो भ्रात्रा मंत्रज्ञेन हनूमता

śrīsūta uvāca purā dāśarathī rāmaḥ sasugrīvabhibhīṣaṇaḥ lakṣmaṇena yuto bhrātrā maṁtrajñena hanūmatā

श्री सूत जी ने कहा — प्राचीन काल में दशरथ-पुत्र राम, सुग्रीव और विभीषण सहित, अपने भाई लक्ष्मण से युक्त, तथा मंत्रज्ञ हनुमान सहित,

श्लोक 46 (skanda.3.13.46)

वानरैर्बध्यमाने तु सेतावंबुधिमध्यतः । चिंतयन्मनसा सीतामेकांते सममंत्रयत्

vānarairbadhyamāne tu setāvaṁbudhimadhyataḥ ciṁtayanmanasā sītāmekāṁte samamaṁtrayat

— जब वानरों द्वारा समुद्र के मध्य सेतु बनाया जा रहा था, तब मन में सीता का चिंतन करते हुए, एकांत में उनके साथ मंत्रणा करने लगे।

श्लोक 47 (skanda.3.13.47)

तेषु मंत्र यमाणेषु रावणादिवधं प्रति । उल्लोलतरकल्लोलो जुघोष जलधिर्भृशम्

teṣu maṁtra yamāṇeṣu rāvaṇādivadhaṁ prati ullolatarakallolo jughoṣa jaladhirbhṛśam

उनके रावण आदि के वध के विषय में मंत्रणा करते समय, अत्यंत उत्ताल तरंगों वाला समुद्र अत्यंत गरजने लगा।

श्लोक 48 (skanda.3.13.48)

अर्णवस्य महाभीमे जृंभमाणे महाध्वनौ । अन्योन्यकथितां वार्तां नाशृण्वंस्ते परस्परम्

arṇavasya mahābhīme jṛṁbhamāṇe mahādhvanau anyonyakathitāṁ vārtāṁ nāśṛṇvaṁste parasparam

समुद्र के उस अत्यंत भीषण महाध्वनि के फैलने पर, वे आपस में एक-दूसरे की कही हुई बात को सुन नहीं पा रहे थे।

श्लोक 49 (skanda.3.13.49)

ततः किंचिदिव क्रुद्धो भृकुटीकुटिलेक्षणः । भ्रूभंगलीलया रामो नियम्य जलधिं तदा

tataḥ kiṁcidiva kruddho bhṛkuṭīkuṭilekṣaṇaḥ bhrūbhaṁgalīlayā rāmo niyamya jaladhiṁ tadā

तब कुछ क्रोधित होकर, भौंहें टेढ़ी किए हुए नेत्रों वाले राम ने, भृकुटी-भंग की लीला मात्र से समुद्र को शांत करके,

श्लोक 50 (skanda.3.13.50)

न्यमंत्रयत विप्रेंद्रा राक्षसानां वधं प्रति । एकांतेऽमंत्रयत्तत्र तैः सार्धं राघवो यतः

nyamaṁtrayata vipreṁdrā rākṣasānāṁ vadhaṁ prati ekāṁte'maṁtrayattatra taiḥ sārdhaṁ rāghavo yataḥ

— हे विप्रेन्द्रो, राक्षसों के वध के विषय में मंत्रणा की। चूँकि राघव ने वहाँ उनके साथ एकांत में मंत्रणा की थी,

श्लोक 51 (skanda.3.13.51)

एकांतरामनाथाख्यं तत्क्षेत्रमभवद्विजाः । सोयं नियमितो वार्धी रामभ्रूभंगलीलया

ekāṁtarāmanāthākhyaṁ tatkṣetramabhavadvijāḥ soyaṁ niyamito vārdhī rāmabhrūbhaṁgalīlayā

— इसलिए, हे द्विजो, वह क्षेत्र एकांतरामनाथ नाम से प्रसिद्ध हुआ। राम की भृकुटी-भंग की लीला से शांत किया गया वही समुद्र,

श्लोक 52 (skanda.3.13.52)

अद्यापि निश्चलजलस्तत्प्रदेशेषु दृश्यते । एकांतरामनाथाख्यं तदेतत्क्षेत्रमुत्तमम्

adyāpi niścalajalastatpradeśeṣu dṛśyate ekāṁtarāmanāthākhyaṁ tadetatkṣetramuttamam

— आज भी उस प्रदेश में निश्चल जल वाला दिखाई देता है। यही वह उत्तम क्षेत्र है, जो एकांतरामनाथ नाम से जाना जाता है।

श्लोक 53 (skanda.3.13.53)

आगत्यामृतवाप्यां च स्नात्वा नियमपूर्वकम् । रामादीनपि सेवंते ते सर्वे मुक्तिमाप्नुयुः

āgatyāmṛtavāpyāṁ ca snātvā niyamapūrvakam rāmādīnapi sevaṁte te sarve muktimāpnuyuḥ

यहाँ आकर तथा अमृतवापी में नियमपूर्वक स्नान करके, जो भी राम आदि की सेवा भी करते हैं, वे सभी मुक्ति प्राप्त करते हैं।

श्लोक 54 (skanda.3.13.54)

अद्वैतविज्ञानविवेकशून्या विरक्तिहीनाश्च समाधि हीनाः । यागाद्यनुष्ठानविवर्जिताश्च स्नात्वात्र यास्यंत्यमृतं द्विजेंद्राः

advaitavijñānavivekaśūnyā viraktihīnāśca samādhi hīnāḥ yāgādyanuṣṭhānavivarjitāśca snātvātra yāsyaṁtyamṛtaṁ dvijeṁdrāḥ

हे द्विजेंद्रो, अद्वैत-विज्ञान के विवेक से रहित, विरक्ति-रहित, समाधि-रहित, तथा यज्ञ आदि अनुष्ठानों से वर्जित लोग भी, यहाँ स्नान करके अमृतत्व को प्राप्त होते हैं।

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