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ब्रह्म खण्ड · अध्याय 67

हयग्रीव-आख्यान

अध्याय 66अध्याय-सूचीअध्याय 68

श्लोक 1 (skanda.3.67.1)

।। व्यास उवाच ।। न पश्यंति तदा शीर्षं ब्रह्माद्यास्तु सुरास्तदा । किं कुर्म इति हेत्युक्त्वा ज्ञानिनस्ते व्यचिन्तयन् ।

vyāsa uvāca na paśyaṁti tadā śīrṣaṁ brahmādyāstu surāstadā kiṁ kurma iti hetyuktvā jñāninaste vyaciṁtayan

व्यासजी ने कहा — तब ब्रह्मा आदि देवताओं को वह शीर्ष कहीं दिखाई नहीं दिया। 'अब हम क्या करें' यह कहकर वे ज्ञानीजन विचार करने लगे।

श्लोक 2 (skanda.3.67.2)

उवाच विश्वकर्माणं तदा ब्रह्मा सुरान्वितः ।

uvāca viśvakarmāṇaṁ tadā brahmā surānvitaḥ

तब ब्रह्मा ने देवताओं के साथ मिलकर विश्वकर्मा से कहा।

श्लोक 3 (skanda.3.67.3)

।। ब्रह्मोवाच ।। विश्वकर्मस्त्वमेवासि कार्यकर्ता सदा विभो । शीघ्रमेव कुरु त्वं वै वक्त्रं सांद्रं च धन्विनः ।

brahmovāca viśvakarmastvamevāsi kāryakartā sadā vibho śīghrameva kuru tvaṁ vai vaktraṁ sāṁdraṁ ca dhanvinaḥ

ब्रह्मा ने कहा — हे विश्वकर्मन्! तुम ही सदा हमारे कार्यों के कर्ता हो, हे विभो! तुम शीघ्र ही उस धनुर्धर का सघन मुख बना दो।

श्लोक 4 (skanda.3.67.4)

नमस्कृत्य तदा तस्मै स्तुतोऽसौ देववर्द्धकिः । उवाच परया भक्त्या ब्रह्माणं कमलोद्भवम् ।

namaskṛtya tadā tasmai stuto'sau devavarddhakiḥ uvāca parayā bhaktyā brahmāṇaṁ kamalodbhavam

तब उस देवशिल्पी ने ब्रह्मा को प्रणाम कर, उनकी स्तुति करते हुए, कमल से उत्पन्न ब्रह्मा से परम भक्तिपूर्वक कहा।

श्लोक 5 (skanda.3.67.5)

यज्ञकार्यं निवृत्याशु वदंति विविधाः सुराः ।

yajñakāryaṁ nivṛtyāśu vadaṁti vividhāḥ surāḥ

'यज्ञ-कार्य को शीघ्र सम्पन्न करने के विषय में विभिन्न देवगण कह रहे हैं।'

श्लोक 6 (skanda.3.67.6)

यज्ञभागविहीनं मां किं पुनर्वच्मि तेऽग्रतः । यज्ञभागमहं देव लभेयैवं सुरैः सह ।

yajñabhāgavihīnaṁ māṁ kiṁ punarvacmi te'grataḥ yajñabhāgamahaṁ deva labheyaivaṁ suraiḥ saha

'मैं यज्ञ-भाग से वंचित हूँ; मैं आपके सामने और क्या कहूँ? हे देव! मुझे भी देवताओं के साथ यज्ञ में भाग मिलना चाहिए।'

श्लोक 7 (skanda.3.67.7)

।। ब्रह्मोवाच ।। दास्यामि सर्वयज्ञेषु विभागं सुरवर्द्धके । सोमे त्वं प्रथमं वीर पूज्यसे श्रुतिकोविदैः ।

brahmovāca dāsyāmi sarvayajñeṣu vibhāgaṁ suravarddhake some tvaṁ prathamaṁ vīra pūjyase śrutikovidaiḥ

ब्रह्मा ने कहा — हे देवशिल्पी! मैं तुम्हें सब यज्ञों में भाग दूँगा। हे वीर! सोम-यज्ञ में तुम सर्वप्रथम वेदज्ञों द्वारा पूजित होगे।

श्लोक 8 (skanda.3.67.8)

तद्विष्णोश्च शिरस्तावत्संधत्स्वामरवर्द्धक । विश्वकर्माब्रवीद्देवानानयध्वं शिरस्त्विति ।

tadviṣṇośca śirastāvatsaṁdhatsvāmaravarddhaka viśvakarmābravīddevānānayadhvaṁ śirastviti

अतः हे देवशिल्पी, तुम विष्णु का शीश जोड़ दो। विश्वकर्मा ने देवताओं से कहा — 'तुम लोग वह शीश ले आओ।'

श्लोक 9 (skanda.3.67.9)

तन्नास्तीति सुराः सर्वे वदंति नृपसत्तम । मध्याह्ने तु समुद्भूते रथस्थो दिवि चांशुमान् ।

tannāstīti surāḥ sarve vadaṁti nṛpasattama madhyāhne tu samudbhūte rathastho divi cāṁśumān

हे नृपसत्तम! सब देवताओं ने कहा — वह तो कहीं मिलता ही नहीं। तब मध्याह्न के समय आकाश में रथारूढ़ सूर्यदेव उदित हुए।

श्लोक 10 (skanda.3.67.10)

दृष्टं तदा सुरैः सर्वै रथादश्वमथानयन् । छित्त्वा शीर्षं महीपाल कबंधाद्वाजिनो हरेः ।

dṛṣṭaṁ tadā suraiḥ sarvai rathādaśvamathānayan chittvā śīrṣaṁ mahīpāla kabaṁdhādvājino hareḥ

उसे देखते ही सब देवताओं ने रथ से उसका घोड़ा ले लिया, और हे महीपाल! उस घोड़े का सिर काटकर हरि के धड़ में जोड़ दिया।

श्लोक 11 (skanda.3.67.11)

कबंधे योजयामास विश्वकर्मातिचातुरः । दृष्ट्वा तं देवदेवेशं सुराः स्तुतिमकुर्वत ।

kabaṁdhe yojayāmāsa viśvakarmāticāturaḥ dṛṣṭvā taṁ devadeveśaṁ surāḥ stutimakurvata

अत्यंत निपुण विश्वकर्मा ने उस अश्व-शीश को उस धड़ में जोड़ दिया। उस देवदेवेश को इस रूप में देखकर सब देवताओं ने उनकी स्तुति की।

श्लोक 12 (skanda.3.67.12)

।। देवा ऊचुः ।। नमस्तेऽस्तु जगद्बीज नमस्ते कमलापते । नमस्तेऽस्तु सुरेशान नमस्ते कमलेक्षण ।

devā ūcuḥ namaste'stu jagadbīja namaste kamalāpate namaste'stu sureśāna namaste kamalekṣaṇa

देवताओं ने कहा — हे जगत के बीज, तुम्हें नमस्कार है। हे कमलापति, तुम्हें नमस्कार है। हे सुरेशान, तुम्हें नमस्कार है। हे कमलनयन, तुम्हें नमस्कार है।

श्लोक 13 (skanda.3.67.13)

त्वं स्थितिः सर्वभूतानां त्वमेव शरणं सताम् । त्वं हंता सर्वदुष्टानां हयग्रीव नमोऽस्तु ते ।

tvaṁ sthitiḥ sarvabhūtānāṁ tvameva śaraṇaṁ satām tvaṁ haṁtā sarvaduṣṭānāṁ hayagrīva namo'stu te

तुम ही सब प्राणियों की स्थिति हो, तुम ही साधुओं की शरण हो। तुम सब दुष्टों के संहारक हो; हे हयग्रीव, तुम्हें नमस्कार है।

श्लोक 14 (skanda.3.67.14)

त्वमोंकारो वषट्कारः स्वाहा स्वधा चतुर्विधा । आद्यस्त्वं च सुरेशान त्वमेव शरणं सदा ।

tvamoṁkāro vaṣaṭkāraḥ svāhā svadhā caturvidhā ādyastvaṁ ca sureśāna tvameva śaraṇaṁ sadā

तुम्हीं ओंकार हो, वषट्कार हो, स्वाहा और स्वधा — यह चतुर्विध रूप तुम्हीं हो। हे सुरेशान! तुम्हीं आदि हो, तुम्हीं सदा शरण हो।

श्लोक 15 (skanda.3.67.15)

यज्ञो यज्ञपतिर्यज्वा द्रव्यं होता हुतस्तथा । त्वदर्थं हूयते देव त्वमेव शरणं सखा ।

yajño yajñapatiryajvā dravyaṁ hotā hutastathā tvadarthaṁ hūyate deva tvameva śaraṇaṁ sakhā

तुम्हीं यज्ञ हो, यज्ञपति हो, यजमान हो, हवि-द्रव्य हो, होता हो और आहुति हो। हे देव! तुम्हारे ही निमित्त हवन किया जाता है; तुम्हीं शरण हो, तुम्हीं सखा हो।

श्लोक 16 (skanda.3.67.16)

कालः करालरूपस्त्वं त्वं वार्क्कः शीतदीधितिः । त्वमग्निर्वरुणश्चैव त्वं च कालक्षयंकरः ।

kālaḥ karālarūpastvaṁ tvaṁ vārkkaḥ śītadīdhitiḥ tvamagnirvaruṇaścaiva tvaṁ ca kālakṣayaṁkaraḥ

तुम्हीं भयंकर रूप वाला काल हो, तुम्हीं सूर्य और शीतल-किरण चंद्रमा हो। तुम्हीं अग्नि और वरुण हो, और तुम्हीं काल को भी क्षय करने वाले हो।

श्लोक 17 (skanda.3.67.17)

गुणत्रयं त्वमेवेह गुणहीनस्त्वमेव हि । गुणानामालयस्त्वं च गोप्ता सर्वेषु जंतुषु ।

guṇatrayaṁ tvameveha guṇahīnastvameva hi guṇānāmālayastvaṁ ca goptā sarveṣu jaṁtuṣu

तुम्हीं यहाँ त्रिगुण हो और तुम्हीं गुणों से रहित भी हो। तुम्हीं गुणों के आश्रय हो, और तुम्हीं सब जीवों के रक्षक हो।

श्लोक 18 (skanda.3.67.18)

स्त्रीपुंसोश्च द्विधा त्वं च पशुपक्ष्यादिमानवैः । चतुर्विधं कुलं त्वं हि चतुराशीतिलक्षणः ।

strīpuṁsośca dvidhā tvaṁ ca paśupakṣyādimānavaiḥ caturvidhaṁ kulaṁ tvaṁ hi caturāśītilakṣaṇaḥ

स्त्री और पुरुष दोनों रूपों में तुम्हीं हो; पशु, पक्षी और मनुष्य आदि से युक्त चतुर्विध सृष्टि तुम्हीं हो, और चौरासी लाख योनियों के लक्षण भी तुम्हीं हो।

श्लोक 19 (skanda.3.67.19)

दिनांतश्चैव पक्षांतो मासांतो हायनं युगम् । कल्पांतश्च महांतश्च कालांतस्त्वं च वै हरे ।

dināṁtaścaiva pakṣāṁto māsāṁto hāyanaṁ yugam kalpāṁtaśca mahāṁtaśca kālāṁtastvaṁ ca vai hare

तुम्हीं दिन का अंत, पक्ष का अंत, मास का अंत, वर्ष और युग हो; हे हरे! तुम्हीं कल्प का अंत, महान अंत और काल का अंत भी हो।

श्लोक 20 (skanda.3.67.20)

एवंविधैर्महादिव्यैः स्तूयमानः सुरैर्नृप । संतुष्टः प्राह सर्वेषां देवानां पुरतः प्रभुः ।

evaṁvidhairmahādivyaiḥ stūyamānaḥ surairnṛpa saṁtuṣṭaḥ prāha sarveṣāṁ devānāṁ purataḥ prabhuḥ

हे राजन्! इस प्रकार महादिव्य स्तुतियों से देवताओं द्वारा स्तुति किए जाने पर प्रसन्न होकर उस प्रभु ने समस्त देवताओं के समक्ष कहा।

श्लोक 21 (skanda.3.67.21)

।। श्रीभगवानुवाच ।। किमर्थमिह संप्राप्ताः सर्वे देवगणा भुवि । किमेतत्कारणं देवाः कि नु दैत्यप्रपीडिताः ।

śrībhagavānuvāca kimarthamiha saṁprāptāḥ sarve devagaṇā bhuvi kimetatkāraṇaṁ devāḥ ki nu daityaprapīḍitāḥ

श्री भगवान ने कहा — तुम सब देवगण यहाँ पृथ्वी पर किसलिए आए हो? इसका क्या कारण है, हे देवो? क्या तुम दैत्यों से पीड़ित हो?

श्लोक 22 (skanda.3.67.22)

।। देवा ऊचुः ।। न दैत्यस्य भयं जातं यज्ञ कर्मोत्सुका वयम् । त्वद्दर्शनपराः सर्वे पश्यामो वै दिशो दश ।

devā ūcuḥ na daityasya bhayaṁ jātaṁ yajña karmotsukā vayam tvaddarśanaparāḥ sarve paśyāmo vai diśo daśa

देवताओं ने कहा — हमें दैत्यों का कोई भय उत्पन्न नहीं हुआ है; हम तो यज्ञ-कार्य के उत्सुक हैं। तुम्हारे दर्शन के लिए हम सब दसों दिशाओं में देखते फिर रहे थे।

श्लोक 23 (skanda.3.67.23)

त्वन्मायामोहिताः सर्वे व्यग्रचित्ता भयातुराः । योगारूढस्वरूपं च दृष्टं तेऽस्माभिरुत्तमम् ।

tvanmāyāmohitāḥ sarve vyagracittā bhayāturāḥ yogārūḍhasvarūpaṁ ca dṛṣṭaṁ te'smābhiruttamam

तुम्हारी माया से मोहित होकर हम सब व्यग्रचित्त और भयभीत हो गए। हमने तुम्हारे उत्तम योगारूढ़ स्वरूप को देखा।

श्लोक 24 (skanda.3.67.24)

वम्री च नोदितास्माभिर्जागराय तवेश्वर । ततश्चापूर्वमभवच्छिरश्छिन्नं बभूव ते ।

vamrī ca noditāsmābhirjāgarāya taveśvara tataścāpūrvamabhavacchiraśchinnaṁ babhūva te

हे ईश्वर! हमने ही तुम्हें जगाने के लिए दीमकों को प्रेरित किया, और तब यह अभूतपूर्व घटना घटी — तुम्हारा शीश कट गया।

श्लोक 25 (skanda.3.67.25)

सूर्याश्वशीर्षमानीय विश्व कर्मातिचातुरः । समधत्त शिरो विष्णो हयग्रीवोऽस्यतः प्रभो ।

sūryāśvaśīrṣamānīya viśvakarmāticāturaḥ samadhatta śiro viṣṇo hayagrīvo'syataḥ prabho

हे विष्णु! अत्यंत निपुण विश्वकर्मा सूर्य के अश्व का शीश ले आए और उसे तुम पर जोड़ दिया। हे प्रभो! इसीलिए तुम अब हयग्रीव हो गए हो।

श्लोक 26 (skanda.3.67.26)

।। विष्णुरुवाच ।। तुष्टोऽहं नाकिनः सर्वे ददाम्रि वरमीप्सितम् । हयग्रीवोऽस्म्यहं जातो देवदेवो जगत्पतिः ।

viṣṇuruvāca tuṣṭo'haṁ nākinaḥ sarve dadāmi varamīpsitam hayagrīvo'smyahaṁ jāto devadevo jagatpatiḥ

विष्णु ने कहा — हे स्वर्गवासियो! मैं संतुष्ट हूँ; मैं तुम्हें इच्छित वर देता हूँ। मैं अब हयग्रीव हो गया हूँ, देवदेव, जगत्पति।

श्लोक 27 (skanda.3.67.27)

न रौद्रं न विरूपं च सुरैरपि च सेवितम् । जातोऽहं वरदो देवा हयाननेति तोषितः ।

na raudraṁ na virūpaṁ ca surairapi ca sevitam jāto'haṁ varado devā hayāneneti toṣitaḥ

यह न रौद्र है, न विरूप, बल्कि देवताओं द्वारा भी सेवित है। हे देवगण! मैं वरदाता होकर 'हयानन' नाम से प्रसन्न हुआ हूँ।

श्लोक 28 (skanda.3.67.28)

।। व्यास उवाच ।। कृते सत्रे ततो वेधा धीमान्सन्तुष्टचेतसा । यज्ञभागं ततो दत्त्वा वम्रीभ्यो विश्वकर्मणे ।

vyāsa uvāca kṛte satre tato vedhā dhīmānsaṁtuṣṭacetasā yajñabhāgaṁ tato dattvā vamrībhyo viśvakarmaṇe

व्यासजी ने कहा — यज्ञ सम्पन्न होने पर बुद्धिमान ब्रह्मा ने प्रसन्नचित्त होकर दीमकों को और विश्वकर्मा को यज्ञ-भाग प्रदान किया।

श्लोक 29 (skanda.3.67.29)

यज्ञांते च सुरश्रेष्ठं नमस्कृत्य दिवं ययौ । एतच्च कारणं विद्धि हयाननो यतो हरिः ।

yajñāṁte ca suraśreṣṭhaṁ namaskṛtya divaṁ yayau etacca kāraṇaṁ viddhi hayānano yato hariḥ

यज्ञ के अंत में उन देवश्रेष्ठ को प्रणाम कर वे स्वर्ग को चले गए। हे राजन्! यही वह कारण जानो जिससे हरि हयानन हुए।

श्लोक 30 (skanda.3.67.30)

।। युधिष्ठिर उवाच ।। येनाक्रांता मही सर्वा क्रमेणैकेन तत्त्वतः । विवरे विवरे रोम्णां वर्तंते च पृथक्पृथक् ।

yudhiṣṭhira uvāca yenākrāṁtā mahī sarvā krameṇaikena tattvataḥ vivare vivare romṇāṁ vartaṁte ca pṛthakpṛthak

युधिष्ठिर ने कहा — जिसने सम्पूर्ण पृथ्वी को एक ही पग से आक्रांत कर लिया, और जिसके रोमकूपों में सैकड़ों-हजारों ब्रह्मांड अलग-अलग विद्यमान हैं...

श्लोक 31 (skanda.3.67.31)

ब्रह्मांडानि सहस्राणि दृश्यंते च महाद्युते । न वेत्ति वेदो यत्पारं शीर्षघातो हि वै कथम् ।

brahmāṁḍāni sahasrāṇi dṛśyaṁte ca mahādyute na vetti vedo yatpāraṁ śīrṣaghāto hi vai katham

हे महाद्युते! जिसकी सीमा को वेद भी नहीं जान पाते, उसके शीश का इस प्रकार आघात होकर छूट जाना कैसे संभव हुआ?

श्लोक 32 (skanda.3.67.32)

।। व्यास उवाच ।। शृणु त्वं पांडवश्रेष्ठ कथां पौराणिकीं शुभाम् । ईश्वरस्य चरित्रं हि नैव वेत्ति चराचरे ।

vyāsa uvāca śṛṇu tvaṁ pāṁḍavaśreṣṭha kathāṁ paurāṇikīṁ śubhām īśvarasya caritraṁ hi naiva vetti carācare

व्यासजी ने कहा — हे पांडवश्रेष्ठ! यह शुभ पौराणिक कथा सुनो। सम्पूर्ण चराचर जगत में कोई भी ईश्वर के चरित्र को पूर्णतः नहीं जान सकता।

श्लोक 33 (skanda.3.67.33)

एकदा ब्रह्मसभायां गता देवाः सवासवाः । भूर्लोकाद्याश्च सर्वे हि स्थावराणि चराणि च ।

ekadā brahmasabhāyāṁ gatā devāḥ savāsavāḥ bhūrlokādyāśca sarve hi sthāvarāṇi carāṇi ca

एक बार इंद्र सहित सभी देवता ब्रह्मा की सभा में गए, तथा भूर्लोक आदि के सब स्थावर और चर प्राणी भी वहाँ उपस्थित हुए।

श्लोक 34 (skanda.3.67.34)

देवा ब्रह्मर्षयः सर्वे नमस्कर्तुं पितामहम् । विष्णुरप्यागतस्तत्र सभायां मंत्रकारणात् ।

devā brahmarṣayaḥ sarve namaskartuṁ pitāmaham viṣṇurapyāgatastatra sabhāyāṁ maṁtrakāraṇāt

सभी देवगण और ब्रह्मर्षि पितामह ब्रह्मा को प्रणाम करने आए। विष्णु भी किसी मंत्रणा के कारण उस सभा में आए हुए थे।

श्लोक 35 (skanda.3.67.35)

ब्रह्मा चापि विगर्विष्ठ उवाचेदं वचस्तदा । भोभो देवाः शृणुध्वं कस्त्रयाणां कारणं महत् ।

brahmā cāpi vigarviṣṭha uvācedaṁ vacastadā bhobho devāḥ śṛṇudhvaṁ kastrayāṇāṁ kāraṇaṁ mahat

अत्यंत गर्वयुक्त हुए ब्रह्मा ने तब यह वचन कहा — हे देवो! सुनो, हम तीनों में महान कारण कौन है?

श्लोक 36 (skanda.3.67.36)

सत्यं ब्रुवंतु वै देवा ब्रह्मेशविष्णुमध्यतः । तां वाचं च समाकर्ण्य देवा विस्मयमागताः ।

satyaṁ bruvaṁtu vai devā brahmeśaviṣṇumadhyataḥ tāṁ vācaṁ ca samākarṇya devā vismayamāgatāḥ

देवगण सत्य बताएँ — ब्रह्मा, ईश और विष्णु, इन तीनों में महान कौन है? यह वचन सुनकर देवगण आश्चर्यचकित हो गए।

श्लोक 37 (skanda.3.67.37)

ऊचुश्चैव ततो देवा न जानीमो वयं सुराः । ब्रह्मपत्नी तदोवाच विष्णुं प्रति सुरेश्वरम् । त्रयाणामपि देवानां महांतं च वदस्व मे ।

ūcuścaiva tato devā na jānīmo vayaṁ surāḥ brahmapatnī tadovāca viṣṇuṁ prati sureśvaram trayāṇāmapi devānāṁ mahāṁtaṁ ca vadasva me

तब देवताओं ने कहा — हे सुरगण, हम नहीं जानते। तब ब्रह्मा की पत्नी (सावित्री) ने सुरेश्वर विष्णु से कहा — मुझे बताइए, तीनों देवों में महान कौन है?

श्लोक 38 (skanda.3.67.38)

।। विष्णुरुवाच ।। विष्णुमायाबलेनैव मोहितं भुवनत्रयम् । ततो ब्रह्मोवाच चेदं न त्वं जानासि भो विभोः ।

viṣṇuruvāca viṣṇumāyābalenaiva mohitaṁ bhuvanatrayam tato brahmovāca cedaṁ na tvaṁ jānāsi bho vibhoḥ

विष्णु ने कहा — विष्णु की माया के बल से ही तीनों भुवन मोहित हैं। तब ब्रह्मा ने कहा — हे विभो! तुम नहीं जानते।

श्लोक 39 (skanda.3.67.39)

नैव मुह्यति ते मायाबलेन नैवमेव च । गर्वहिंसापरो देवो जगद्भर्ता जगत्प्रभुः ।

naiva muhyati te māyābalena naivameva ca garvahiṁsāparo devo jagadbhartā jagatprabhuḥ

तुम्हारी माया के बल से वह मोहित नहीं होता, ऐसी बात नहीं है। जो देव गर्व और हिंसा से परे है, वही जगत का भर्ता और जगत का प्रभु है।

श्लोक 40 (skanda.3.67.40)

ज्येष्ठं त्वां न विदुः सर्वे विष्णुमायावृताः खिलाः । ततो ब्रह्मा स रोषेण क्रुद्धः प्रस्फुरिताननः ।

jyeṣṭhaṁ tvāṁ na viduḥ sarve viṣṇumāyāvṛtāḥ khilāḥ tato brahmā sa roṣeṇa kruddhaḥ prasphuritānanaḥ

तुम्हें सबसे बड़ा नहीं जानते, क्योंकि सब लोग विष्णु की माया से आवृत हैं। इस पर ब्रह्मा क्रोध से भर उठे, उनका मुख क्रोध से कांपने लगा।

श्लोक 41 (skanda.3.67.41)

उवाच वचनं कोपाद्धे विष्णो शृणु मे वचः । येन वक्त्रेण सभायां वचनं समुदीरितम् ।

uvāca vacanaṁ kopāddhe viṣṇo śṛṇu me vacaḥ yena vaktreṇa sabhāyāṁ vacanaṁ samudīritam

क्रोधवश उसने कहा — हे विष्णो! मेरी बात सुनो। जिस मुख से तुमने इस सभा में यह वचन कहा है...

श्लोक 42 (skanda.3.67.42)

तच्छीर्षं पततादाशु चाल्पकालेन वै पुनः । ततो हाहाकृतं सर्वं सेंद्राः सर्षिपुरोगमाः ।

tacchīrṣaṁ patatādāśu cālpakālena vai punaḥ tato hāhākṛtaṁ sarvaṁ seṁdrāḥ sarṣipurogamāḥ

...उस शीश को शीघ्र ही, थोड़े ही समय में, गिर जाना चाहिए। यह सुनकर इंद्र और ऋषियों सहित सब देवता हाहाकार करने लगे।

श्लोक 43 (skanda.3.67.43)

ब्रह्माणं क्षमयामासुर्विष्णुं प्रति सुरोत्तमाः । विष्णुश्च तद्वचः श्रुत्वा सत्यंसत्यं भविष्यति ।

brahmāṇaṁ kṣamayāmāsurviṣṇuṁ prati surottamāḥ viṣṇuśca tadvacaḥ śrutvā satyaṁsatyaṁ bhaviṣyati

श्रेष्ठ देवताओं ने ब्रह्मा को विष्णु के प्रति क्षमा कराने का प्रयत्न किया। विष्णु ने भी वह वचन सुनकर कहा — 'सत्य ही, यह सत्य होकर रहेगा।'

श्लोक 44 (skanda.3.67.44)

ततो विष्णुर्महातेजास्तीर्थस्योत्पादनेन च । तपस्तेपे तु वै तत्र धर्मारण्ये सुरेश्वरः । अश्वशीर्ष मुखं दृष्ट्वा हयग्रीवो जनार्द्दनः ।

tato viṣṇurmahātejāstīrthasyotpādanena ca tapastepe tu vai tatra dharmāraṇye sureśvaraḥ aśvaśīrṣa mukhaṁ dṛṣṭvā hayagrīvo janārddanaḥ

तब महातेजस्वी विष्णु ने, वहाँ एक तीर्थ की उत्पत्ति करते हुए, धर्मारण्य में तपस्या की; और अश्व-शीश मुख को देखते हुए वे सुरेश्वर जनार्दन हयग्रीव हुए।

श्लोक 45 (skanda.3.67.45)

तपस्तेपे महाभाग विधिना सह भारत । न शक्यं केनचित्कर्त्तुमात्मनात्मैव तुष्टवान् ।

tapastepe mahābhāga vidhinā saha bhārata na śakyaṁ kenacitkarttumātmanātmaiva tuṣṭavān

हे भारत! वे महाभाग विधाता के साथ तपस्या करते रहे। यह कार्य किसी अन्य के द्वारा संभव नहीं था; उन्होंने स्वयं अपनी ही आत्मा से अपनी स्तुति की।

श्लोक 46 (skanda.3.67.46)

ब्रह्मापि तपसा युक्तस्तेपे वर्षशतत्रयम् । तिष्ठन्नेव पुरो विष्णोर्विष्णुमायाविमोहितः ।

brahmāpi tapasā yuktastepe varṣaśatatrayam tiṣṭhanneva puro viṣṇorviṣṇumāyāvimohitaḥ

ब्रह्मा भी तपस्या में लगकर तीन सौ वर्षों तक, विष्णु की माया से मोहित होकर, विष्णु के सामने ही खड़े रहे।

श्लोक 47 (skanda.3.67.47)

यज्ञार्थमवदत्तुष्टो देवदेवो जगत्पतिः । ब्रह्मंस्ते मुक्तताद्यास्ति मम मायाप्यदुःसहा ।

yajñārthamavadattuṣṭo devadevo jagatpatiḥ brahmaṁste muktatādyāsti mama māyāpyaduḥsahā

संतुष्ट होकर देवदेव जगत्पति विष्णु ने यज्ञ के निमित्त कहा — हे ब्रह्मन्! आज से तुम मुक्त हो; मेरी माया भी असह्य होती है।

श्लोक 48 (skanda.3.67.48)

ततो लब्धवरो ब्रह्मा हृष्टचित्तो जनार्द्दनः । उवाच मधुरां वाचं सर्वेषां हितकारणात् ।

tato labdhavaro brahmā hṛṣṭacitto janārddanaḥ uvāca madhurāṁ vācaṁ sarveṣāṁ hitakāraṇāt

तब वर पाकर प्रसन्नचित्त ब्रह्मा और जनार्दन दोनों ने सबके हित के लिए मधुर वाणी कही।

श्लोक 49 (skanda.3.67.49)

अत्राभवन्महाक्षेत्रं पुण्यं पापप्रणाशनम् । विधिविष्णुमयं चैतद्भवत्वेतन्न संशयः ।

atrābhavanmahākṣetraṁ puṇyaṁ pāpapraṇāśanam vidhiviṣṇumayaṁ caitadbhavatvetanna saṁśayaḥ

यहाँ यह पवित्र, पापनाशक महाक्षेत्र प्रकट हुआ। यह ब्रह्मा और विष्णु दोनों की उपस्थिति से युक्त हो, इसमें कोई संदेह नहीं।

श्लोक 50 (skanda.3.67.50)

तीर्थस्य महिमा राजन्हयशीर्षस्तदा हरिः । शुभाननो हि संजातः पूर्वेणैवाननेन तु ।

tīrthasya mahimā rājanhayaśīrṣastadā hariḥ śubhānano hi saṁjātaḥ pūrveṇaivānanena tu

हे राजन्! उस तीर्थ की महिमा से हरि, जो अश्व-शीश वाले हुए थे, फिर से अपने पूर्व शुभ मुख वाले हो गए।

श्लोक 51 (skanda.3.67.51)

कंदर्पकोटिलावण्यो जातः कृष्णस्तदा नृप । ब्रह्मापि तपसा युक्तो दिव्यं वर्षशतत्रयम् ।

kaṁdarpakoṭilāvaṇyo jātaḥ kṛṣṇastadā nṛpa brahmāpi tapasā yukto divyaṁ varṣaśatatrayam

हे राजन्! तब कृष्ण करोड़ों कामदेवों के समान सुंदर हो गए। ब्रह्मा भी तीन सौ दिव्य वर्षों तक तपस्या में लगे रहे।

श्लोक 52 (skanda.3.67.52)

सावित्र्या च कृतं यत्र विष्णुमाया न बाधते । मायया तु कृतं शीर्षं पंचमं शार्दुलस्य वा ।

sāvitryā ca kṛtaṁ yatra viṣṇumāyā na bādhate māyayā tu kṛtaṁ śīrṣaṁ pañcamaṁ śārdulasya vā

जहाँ सावित्री द्वारा किए गए कार्य को विष्णु की माया भी बाधित नहीं करती; उस माया से ब्रह्मा का पाँचवाँ मुख, जो शार्दूल-सदृश था, प्रकट हुआ।

श्लोक 53 (skanda.3.67.53)

धर्मारण्ये कृतं रम्यं हरेण च्छेदितं पुरा । तस्मै दत्त्वा वरं विष्णुर्जगामादर्शनं ततः ।

dharmāraṇye kṛtaṁ ramyaṁ hareṇa cchedidataṁ purā tasmai dattvā varaṁ viṣṇurjagāmādarśanaṁ tataḥ

यह रम्य कार्य धर्मारण्य में हुआ था, जिसे प्राचीन काल में हर (शिव) ने छेद दिया था। विष्णु ने ब्रह्मा को वर देकर तब अंतर्ध्यान हो गए।

श्लोक 54 (skanda.3.67.54)

स्थापयित्वा विधिस्तत्र तीर्थं चैव त्रिलोचनम् । मुक्तेशं नाम देवस्य मोक्षतीर्थमरिंदम ।

sthāpayitvā vidhistatra tīrthaṁ caiva trilocanam mukteśaṁ nāma devasya mokṣatīrthamariṁdama

हे शत्रुदमन! विधाता ने वहाँ त्रिलोचन (शिव) के तीर्थ की स्थापना की, जो मुक्तेश नाम से जाने जाने वाला देवता का मोक्ष-तीर्थ है।

श्लोक 55 (skanda.3.67.55)

गतः सोऽपि सुरश्रेष्ठः स्वस्थानं सुरसेवितम् । तत्र प्रेता दिवं यांति तर्पणेन प्रतर्पिताः ।

gataḥ so'pi suraśreṣṭhaḥ svasthānaṁ surasevitam tatra pretā divaṁ yāṁti tarpaṇena pratarpitāḥ

वे श्रेष्ठ देव भी देवसेवित अपने स्थान को चले गए। वहाँ तर्पण से संतृप्त हुए प्रेत स्वर्ग को प्राप्त होते हैं।

श्लोक 56 (skanda.3.67.56)

अश्वमेधफलं स्नाने पाने गोदानजं फलम् । पुष्कराद्यानि तीर्थानि गंगाद्याः सरितस्तथा ।

aśvamedhaphalaṁ snāne pāne godānajaṁ phalam puṣkarādyāni tīrthāni gaṁgādyāḥ saritastathā

स्नान करने से अश्वमेध यज्ञ का फल तथा जल पीने से गोदान का फल प्राप्त होता है। पुष्कर आदि तीर्थ तथा गंगा आदि नदियाँ...

श्लोक 57 (skanda.3.67.57)

स्नानार्थमत्रागच्छंति देवताः पितरस्तथा । कार्त्तिक्यां कृत्तिकायोगे मुक्तेशं पूजयेत्तु यः ।

snānārthamatrāgacchaṁti devatāḥ pitarastathā kārttikyāṁ kṛttikāyoge mukteśaṁ pūjayettu yaḥ

...तथा देवता और पितर स्वयं यहाँ स्नान के लिए आते हैं। जो कार्तिक-पूर्णिमा को कृत्तिका-नक्षत्र योग में मुक्तेश की पूजा करता है...

श्लोक 58 (skanda.3.67.58)

स्नात्वा देवसरे रम्ये नत्वा देवं जनार्द्दनम् । यः करोति नरो भक्त्या सर्वपापैः प्रमुच्यते ।

snātvā devasare ramye natvā devaṁ janārddanam yaḥ karoti naro bhaktyā sarvapāpaiḥ pramucyate

— और उस मनोहर देवसर में स्नान कर, भगवान जनार्दन को प्रणाम करके, जो भक्तिपूर्वक ऐसा करता है, वह मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 59 (skanda.3.67.59)

भुक्त्वा भोगा न्यथाकामं विष्णुलोकं स गच्छति । अपुत्रा काकवंध्या च मृतवत्सा मृतप्रजा ।

bhuktvā bhogānyathākāmaṁ viṣṇulokaṁ sa gacchati aputrā kākavaṁdhyā ca mṛtavatsā mṛtaprajā

वह इच्छानुसार भोगों को भोगकर अंततः विष्णुलोक को जाता है। पुत्रहीना, काकवंध्या, जिसकी संतान मर जाती है, वह मृत-प्रजा स्त्री...

श्लोक 60 (skanda.3.67.60)

एकांबरेण सुस्नातौ पतिपत्न्यौ यथाविधि । तद्दोषं नाशयेन्नूनं प्रजाप्तिप्रतिबन्धकम् ।

ekāṁbareṇa susnātau patipatnyau yathāvidhi taddoṣaṁ nāśayennūnaṁ prajāptipratibandhakam

पति-पत्नी दोनों एक ही वस्त्र में विधिपूर्वक स्नान करें, तो यह निश्चय ही संतान-प्राप्ति में बाधक उस दोष का नाश कर देता है।

श्लोक 61 (skanda.3.67.61)

मोक्षेश्वरप्रसादेन पुत्रपौत्रादि वर्द्धयेत् । दद्याद्वैकेन चित्तेन फलानि सत्यसंयुता ।

mokṣeśvaraprasādena putrapautrādi varddhayet dadyādvaikena cittena phalāni satyasaṁyutā

मोक्षेश्वर की कृपा से मनुष्य पुत्र-पौत्र आदि से समृद्ध होता है। एकाग्रचित्त से दिए हुए फल सत्य के साथ युक्त होकर प्राप्त होते हैं।

श्लोक 62 (skanda.3.67.62)

निधाय वंशपात्रेऽपि नारी दोषात्प्रमुच्यते । प्राप्नुवंति च देवाश्च अग्निष्टोमफलं नृप ।

nidhāya vaṁśapātre'pi nārī doṣātpramucyate prāpnuvaṁti ca devāśca agniṣṭomaphalaṁ nṛpa

वंश-पात्र (लोटे) में जल भरकर रखने भर से भी स्त्री दोष से मुक्त हो जाती है। हे राजन्! और देवगण भी वहाँ अग्निष्टोम यज्ञ का फल पाते हैं।

श्लोक 63 (skanda.3.67.63)

वेधा हरिर्हरश्चैव तप्यंते परमं तपः । धर्मारण्ये त्रिसंध्यं च स्नात्वा देवसरस्यथ ।

vedhā harirharaścaiva tapyaṁte paramaṁ tapaḥ dharmāraṇye trisaṁdhyaṁ ca snātvā devasarasyatha

ब्रह्मा, विष्णु और शिव — तीनों ही धर्मारण्य में उस देवसर में तीनों संध्याओं में स्नान कर परम तपस्या करते हैं।

श्लोक 64 (skanda.3.67.64)

तत्र मोक्षेश्वरः शंभुः स्थापितो वै ततः सुरैः । तत्र सांगं जपं कृत्वा न भूयः स्तनपो भवेत् ।

tatra mokṣeśvaraḥ śaṁbhuḥ sthāpito vai tataḥ suraiḥ tatra sāṁgaṁ japaṁ kṛtvā na bhūyaḥ stanapo bhavet

वहाँ देवताओं द्वारा मोक्षेश्वर शंभु स्थापित किए गए। वहाँ अंगसहित जप करके मनुष्य फिर कभी शिशु (पुनर्जन्म से माता का स्तनपायी) नहीं होता।

श्लोक 65 (skanda.3.67.65)

एवं क्षेत्रं महाराज प्रसिद्धं भुवनत्रये । यस्तत्र कुरुते श्राद्धं पितॄणां श्रद्धयान्वितः ।

evaṁ kṣetraṁ mahārāja prasiddhaṁ bhuvanatraye yastatra kurute śrāddhaṁ pitṝṇāṁ śraddhayānvitaḥ

हे महाराज! इस प्रकार यह क्षेत्र तीनों लोकों में प्रसिद्ध है। जो वहाँ श्रद्धापूर्वक पितरों का श्राद्ध करता है...

श्लोक 66 (skanda.3.67.66)

उद्धरेत्सप्त गोत्राणि कुलमेकोत्तरं शतम् । देवसरो महारम्यं नानापुष्पैः समन्वितम् । श्यामं सकलकल्हारैर्विविधैर्जलजंतुभिः ।

uddharetsapta gotrāṇi kulamekottaraṁ śatam devasaro mahāramyaṁ nānāpuṣpaiḥ samanvitam śyāmaṁ sakalakalhāraiḥ vividhairjalajaṁtubhiḥ

— वह सात गोत्रों और एक सौ एक कुलों का उद्धार कर देता है। वह देवसर अत्यंत रमणीय है, विभिन्न प्रकार के पुष्पों से युक्त, नीलकमलों से श्यामल और विविध जलचरों से भरा हुआ है।

श्लोक 67 (skanda.3.67.67)

ब्रह्मविष्णुमहेशाद्यैः सेवितं सुरमानुषैः । सिद्धैर्यक्षैश्च मुनिभिः सेवितं सर्वतः शुभम् ।

brahmaviṣṇumaheśādyaiḥ sevitaṁ suramānuṣaiḥ siddhairyakṣaiśca munibhiḥ sevitaṁ sarvataḥ śubham

वह ब्रह्मा, विष्णु, महेश आदि, देवताओं और मनुष्यों द्वारा सेवित है, तथा सिद्धों, यक्षों और मुनियों द्वारा भी सब ओर से सेवित एवं शुभ है।

श्लोक 68 (skanda.3.67.68)

।। युधिष्ठिर उवाच ।। कीदृशं तत्सरः ख्यातं तस्मिन्स्थाने द्विजोत्तम । तस्य रूपं प्रकारं च कथयस्व यथातथम् ।

yudhiṣṭhira uvāca kīdṛśaṁ tatsaraḥ khyātaṁ tasminsthāne dvijottama tasya rūpaṁ prakāraṁ ca kathayasva yathātatham

युधिष्ठिर ने कहा — हे द्विजोत्तम! उस स्थान में प्रसिद्ध वह सरोवर कैसा है? उसका रूप और प्रकार यथार्थ रूप में बताइए।

श्लोक 69 (skanda.3.67.69)

।। व्यास उवाच ।। साधुसाधु महाप्राज्ञ धर्मपुत्र युधिष्ठिर । यस्य संकीर्तनान्नूनं सर्वपापैः प्रमुच्यते ।

vyāsa uvāca sādhusādhu mahāprājña dharmaputra yudhiṣṭhira yasya saṁkīrtanānnūnaṁ sarvapāpaiḥ pramucyate

व्यासजी ने कहा — साधु, साधु, हे महाप्राज्ञ धर्मपुत्र युधिष्ठिर! जिसका संकीर्तन करने मात्र से निश्चय ही मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 70 (skanda.3.67.70)

अतिस्वछतरं शीतं गंगोदकसमप्रभम् । पवित्रं मधुरं स्वादु जलं तस्य नृपोत्तम ।

atisvachataraṁ śītaṁ gaṁgodakasamaprabham pavitraṁ madhuraṁ svādu jalaṁ tasya nṛpottama

हे नृपोत्तम! उसका जल अत्यंत निर्मल, शीतल, गंगाजल के समान तेजस्वी, पवित्र, मीठा और स्वादिष्ट है।

श्लोक 71 (skanda.3.67.71)

महाविशालं गंभीरं देवखातं मनोरमम् । लहर्यादिभिर्गंभीरः फेनावर्तसमाकुलम् ।

mahāviśālaṁ gaṁbhīraṁ devakhātaṁ manoramam laharyādibhirgaṁbhīraḥ phenāvartasamākulam

वह देवखात (देव-खोदा हुआ सरोवर) अत्यंत विशाल, गहरा और मनोहर है, लहरों से गंभीर और फेन के भँवरों से भरा हुआ है।

श्लोक 72 (skanda.3.67.72)

झषमंडूककमठैर्मकरैश्च समाकुलम् । शंखशुक्त्यादि भिर्युक्तं राजहंसैः सुशोभितम् ।

jhaṣamaṁḍūkakamaṭhairmakaraiśca samākulam śaṁkhaśuktyādibhiryuktaṁ rājahaṁsaiḥ suśobhitam

वह मछलियों, मेढकों, कछुओं और मगरमच्छों से भरा हुआ है, शंख-सीपियों आदि से युक्त और राजहंसों से सुशोभित है।

श्लोक 73 (skanda.3.67.73)

वटप्लक्षैः समायुक्तमश्वत्थाम्रैश्च वेष्टितम् । चक्रवाकसमोपतं बकसारसटिट्टिभैः ।

vaṭaplakṣaiḥ samāyuktamaśvatthāmraiśca veṣṭitam cakravākasamopetaṁ bakasārasaṭiṭṭibhaiḥ

वह वटवृक्षों और प्लक्ष (पाकड़) वृक्षों से युक्त है, पीपल और आम के वृक्षों से घिरा हुआ है, चक्रवाक, बगुले, सारस और टिटिहरी पक्षियों से भरा है।

श्लोक 74 (skanda.3.67.74)

कमनीय प्रगन्धाच्छच्छत्रपत्रैः सुशोभितम् । सेव्यमानं द्विजैः सर्वैः सारसाद्यैः सुशोभितम् ।

kamanīya pragaṁdhāccachatrapatraiḥ suśobhitam sevyamānaṁ dvijaiḥ sarvaiḥ sārasādyaiḥ suśobhitam

वह मनोहर, मधुर सुगंध वाले छत्राकार पत्तों से सुशोभित है, और सब ब्राह्मणों तथा सारस आदि पक्षियों से सेवित होकर सुशोभित है।

श्लोक 75 (skanda.3.67.75)

सदेवैर्मुनिभिश्चैव विप्रैर्मत्यैश्च भूमिप । सेवितं दुःखहं चैव सर्वपापप्रणाशनम् ।

sadevairmunibhiścaiva viprairmatyaiśca bhūmipa sevitaṁ duḥkhahaṁ caiva sarvapāpapraṇāśanam

हे भूमिप! वह देवताओं, मुनियों, विप्रों और मनुष्यों द्वारा सेवित है, तथा दुःखों को हरने वाला और समस्त पापों का नाश करने वाला है।

श्लोक 76 (skanda.3.67.76)

अनादिनिधनोदंतं सेवितं सिद्धमंडलैः । स्नानादिभिः सर्वदैव तत्सरो नृपसत्तम ।

anādinidhanodaṁtaṁ sevitaṁ siddhamaṁḍalaiḥ snānādibhiḥ sarvadaiva tatsaro nṛpasattama

हे नृपसत्तम! वह लेकिन आदि-अंत रहित है, सिद्धमंडलों द्वारा सेवित है, और वह सरोवर सदा स्नान आदि के लिए ही बना रहता है।

श्लोक 77 (skanda.3.67.77)

विधिना कुरुते यस्तु नीलोत्सर्गं च तत्तटे । प्रेता नैव कुले तस्य यावदिंद्राश्चतुर्दश ।

vidhinā kurute yastu nīlotsargaṁ ca tattaṭe pretā naiva kule tasya yāvadiṁdrāścaturdaśa

जो उसके तट पर विधिपूर्वक नीलोत्सर्ग करता है, उसके कुल में चौदह इंद्रों के काल तक कोई भी प्रेत उत्पन्न नहीं होता।

श्लोक 78 (skanda.3.67.78)

कन्यादानं च ये कुर्युर्विधिना तत्र भूपते । ते तिष्ठन्ति ब्रह्मलोके यावदाभूतसंप्लवम् ।

kanyādānaṁ ca ye kuryurvidhinā tatra bhūpate te tiṣṭhaṁti brahmaloke yāvadābhūtasaṁplavam

हे भूपते! जो वहाँ विधिपूर्वक कन्यादान करते हैं, वे प्रलय-काल तक ब्रह्मलोक में निवास करते हैं।

श्लोक 79 (skanda.3.67.79)

महिषीं गृहदासीं च सुरभीं सुतसंयुताम् । हेम विद्यां तथा भूमिं रथांश्च गजवाससी ।

mahiṣīṁ gṛhadāsīṁ ca surabhīṁ sutasaṁyutām hema vidyāṁ tathā bhūmiṁ rathāṁśca gajavāsasī

भैंस, गृहदासी, बछड़े सहित गाय, स्वर्ण, विद्या, भूमि, रथ, हाथी तथा वस्त्र...

श्लोक 80 (skanda.3.67.80)

ददाति श्रद्धया तत्र सोऽक्षयं स्वर्गमश्नुते । देवखातस्य माहात्म्यं यः पठेच्छिवसन्निधौ । दीर्घमायुस्तथा सौख्यं लभते नात्र संशयः ।

dadāti śraddhayā tatra so'kṣayaṁ svargamaśnute devakhātasya māhātmyaṁ yaḥ paṭhecchivasannidhau dīrghamāyustathā saukhyaṁ labhate nātra saṁśayaḥ

जो वहाँ श्रद्धापूर्वक इन्हें दान करता है, वह अक्षय स्वर्ग को प्राप्त करता है। जो शिव के सान्निध्य में देवखात की इस महिमा को पढ़ता है, वह निःसंदेह दीर्घ आयु और सुख प्राप्त करता है।

श्लोक 81 (skanda.3.67.81)

यः शृणोति नरो भक्त्या नारी वा त्विदमद्भुतम् । कुले तस्य भवेच्छ्रेयः कल्पांतेऽपि युधिष्ठिर ।

yaḥ śṛṇoti naro bhaktyā nārī vā tvidamadbhutam kule tasya bhaveccchreyaḥ kalpāṁte'pi yudhiṣṭhira

हे युधिष्ठिर! जो मनुष्य अथवा स्त्री भक्तिपूर्वक इस अद्भुत कथा को सुनता है, उसके कुल में कल्प के अंत तक भी कल्याण बना रहता है।

श्लोक 82 (skanda.3.67.82)

एतत्सर्वं मयाख्यातं हयग्रीवस्य कारणम् । प्रभास्तस्य तीर्थस्य सर्वपापायनुत्तये ।

etatsarvaṁ mayākhyātaṁ hayagrīvasya kāraṇam prabhāstasya tīrthasya sarvapāpāyanuttaye

मैंने तुम्हें हयग्रीव का यह सारा कारण बता दिया, तथा इस तीर्थ की महिमा, जो समस्त पापों को दूर करने के लिए है।

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