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ब्रह्म खण्ड · अध्याय 66

विष्णु-शिरोनाश

अध्याय 65अध्याय-सूचीअध्याय 67

श्लोक 1 (skanda.3.66.1)

।। युधिष्ठिर उवाच ।। कृपासिंधो महाभाग सर्वव्यापिन्सुरेश्वर । कदा ह्यत्र तपस्तप्तं विष्णुनामिततेजसा ।

yudhiṣṭhira uvāca kṛpāsiṁdho mahābhāga sarvavyāpinsureśvara kadā hyatra tapastaptaṁ viṣṇunāmitatejasā

युधिष्ठिर ने कहा — हे कृपासिंधु, महाभाग, सर्वव्यापी सुरेश्वर! अनंत तेजस्वी विष्णु ने यहाँ कब तपस्या की थी?

श्लोक 2 (skanda.3.66.2)

स्कंदाय कथितं चैव शर्वेण च महात्मना । आनुपूर्व्येण सर्वं हि कथयस्व त्वमेव हि ।

skaṁdāya kathitaṁ caiva śarveṇa ca mahātmanā ānupūrvyeṇa sarvaṁ hi kathayasva tvameva hi

जो कथा महात्मा शर्व (शिव) ने स्कंद को सुनाई थी, वह सब आप ही मुझे क्रमपूर्वक सुनाइए।

श्लोक 3 (skanda.3.66.3)

।। व्यास उवाच ।। शृणु वत्स प्रवक्ष्यामि धर्म्मारण्ये नृपोत्तम । एकदात्र तपस्तप्तं विष्णुनाऽमिततेजसा ।

vyāsa uvāca śṛṇu vatsa pravakṣyāmi dharmāraṇye nṛpottama ekadātra tapastaptaṁ viṣṇunāmitatejasā

व्यासजी ने कहा — हे वत्स, हे नृपोत्तम! सुनो, मैं बताता हूँ। एक बार अनंत तेजस्वी विष्णु ने इस धर्मारण्य में तपस्या की थी।

श्लोक 4 (skanda.3.66.4)

।। स्कंद उवाच ।। कथं देवसरोनाम पंपा चंपा गया तथा । वाराणस्यधिका चैव कथमश्वमुखो हरिः ।

skaṁda uvāca kathaṁ devasaronāma paṁpā caṁpā gayā tathā vārāṇasyadhikā caiva kathamaśvamukho hariḥ

स्कंद ने कहा — देवसर नामक तीर्थ पंपा, चंपा, गया और वाराणसी से भी अधिक कैसे है, तथा हरि अश्वमुख कैसे हुए?

श्लोक 5 (skanda.3.66.5)

।। ईश्वर उवाच ।। अत्र नारायणो देवस्तपस्तेपे सुदुष्करम् । दिव्यवर्षशतं त्रीणि जातः सुष्ठ्वाननश्च सः ।

īśvara uvāca atra nārāyaṇo devastapastepe suduṣkaram divyavarṣaśataṁ trīṇi jātaḥ suṣṭhvānanaśca saḥ

ईश्वर ने कहा — यहाँ भगवान नारायण ने तीन सौ दिव्य वर्षों तक अत्यंत कठोर तपस्या की, और उनका मुख अत्यंत सुंदर हो गया।

श्लोक 6 (skanda.3.66.6)

तपस्तेपे महाविष्णुः सुरूपार्थं च पुत्रक । वाजिमुखो हरिस्तत्र सिद्धस्थाने महाद्युते ।

tapastepe mahāviṣṇuḥ surūpārthaṁ ca putraka vājimukho haristatra siddhasthāne mahādyute

हे पुत्र! महाविष्णु ने उत्तम रूप की प्राप्ति के लिए वहाँ तपस्या की, और वहीं, उस महातेजस्वी सिद्ध-स्थान में, हरि अश्वमुख हुए।

श्लोक 7 (skanda.3.66.7)

।। स्कंद उवाच ।। कारणं ब्रूहि नोद्य त्वमश्वाननः कथं हरिः । महारिपोश्च हंता च देवदेवो जगत्पतिः ।

skaṁda uvāca kāraṇaṁ brūhi nodya tvamaśvānanaḥ kathaṁ hariḥ mahāripośca haṁtā ca devadevo jagatpatiḥ

स्कंद ने कहा — अब आप मुझे कारण बताइए कि देवों के देव, जगत्पति, महाशत्रुओं के संहारक हरि अश्वमुख कैसे हुए।

श्लोक 8 (skanda.3.66.8)

यस्य नाम्ना महाभाग पातकानि बहून्यपि । विलीयंते तु वेगेन तमः सूर्योदये यथा ।

yasya nāmnā mahābhāga pātakāni bahūnyapi vilīyaṁte tu vegena tamaḥ sūryodaye yathā

हे महाभाग! जिसके नाम से बहुत से पाप भी उसी वेग से विलीन हो जाते हैं जैसे सूर्योदय होते ही अंधकार मिट जाता है।

श्लोक 9 (skanda.3.66.9)

श्रूयंते यस्य कर्माणि अद्भुतान्यद्भुतानि वै । सर्वेषामेव जीवानां कारणं परमेश्वरः ।

śrūyaṁte yasya karmāṇi adbhutānyadbhutāni vai sarveṣāmeva jīvānāṁ kāraṇaṁ parameśvaraḥ

जिसके कर्म सुने जाने पर अत्यंत अद्भुत लगते हैं, और जो समस्त जीवों का परम कारण, परमेश्वर है...

श्लोक 10 (skanda.3.66.10)

प्राणरूपेण यो देवो हयरूपः कधं भवेत् । सर्वेषामपि तंत्राणामेकरूपः प्रकीर्तितः ।

prāṇarūpeṇa yo devo hayarūpaḥ kathaṁ bhavet sarveṣāmapi taṁtrāṇāmekarūpaḥ prakīrtitaḥ

वह देव जो प्राणरूप में समस्त तंत्रों का एक ही रूप कहा गया है, वह घोड़े का मुख कैसे धारण कर सकता है?

श्लोक 11 (skanda.3.66.11)

भक्तिगम्यो धर्मभाजां सुखरूपः सदा शुचिः । गुणातीतोऽपि नित्योऽसौ सर्वगो निर्गुणस्तथा ।

bhaktigamyo dharmabhājāṁ sukharūpaḥ sadā śuciḥ guṇātīto'pi nityo'sau sarvago nirguṇastathā

जो भक्ति के द्वारा ही धर्मात्माओं को सुलभ है, सुखस्वरूप, सदा शुद्ध, गुणातीत होते हुए भी नित्य, सर्वव्यापी और निर्गुण है...

श्लोक 12 (skanda.3.66.12)

स्रष्टासौ पालको हंता अव्यक्तः सर्वदेहिनाम् । अनुकूलो महातेजाः कस्मादश्वमुखोऽभवत् ।

sraṣṭāsau pālako haṁtā avyaktaḥ sarvadehinām anukūlo mahātejāḥ kasmādaśvamukho'bhavat

जो सृष्टिकर्ता, पालक, संहारक और समस्त प्राणियों के लिए अव्यक्त है, जो अनुकूल और महातेजस्वी है — वह किस कारण अश्वमुख हुआ?

श्लोक 13 (skanda.3.66.13)

यस्य रोमोद्भवा देवा वृक्षाद्याः पन्नगा नगाः । कल्पेकल्पे जगत्सर्वं जायते यस्य देहतः ।

yasya romodbhavā devā vṛkṣādyāḥ pannagā nagāḥ kalpekalpe jagatsarvaṁ jāyate yasya dehataḥ

जिसके रोमकूपों से देवता, वृक्ष, सर्प और पर्वत उत्पन्न होते हैं, तथा जिसके शरीर से प्रत्येक कल्प में यह सारा जगत उत्पन्न होता है...

श्लोक 14 (skanda.3.66.14)

स एव विश्वप्रभवः स एवात्यंतकारणम् । येनानीताः पुनर्विद्या यज्ञाश्च प्रलयं गताः ।

sa eva viśvaprabhavaḥ sa evātyaṁtakāraṇam yenānītāḥ punarvidyā yajñāśca pralayaṁ gatāḥ

वही विश्व का उद्गम है, वही परम कारण है, जिसके द्वारा विद्याएँ पुनः लाई गईं जब यज्ञ प्रलय को प्राप्त हो गए थे।

श्लोक 15 (skanda.3.66.15)

घातितो दुष्टदैत्योऽसौ वेदार्थं कृत उद्यमः । एवमासीन्महाविष्णुः कथमश्वमुखोऽभवत् ।

ghātito duṣṭadaityo'sau vedārthaṁ kṛta udyamaḥ evamāsīnmahāviṣṇuḥ kathamaśvamukho'bhavat

उस दुष्ट दैत्य को उसने मार डाला और वेद की रक्षा के लिए प्रयास किया। ऐसे महाविष्णु अश्वमुख कैसे हुए?

श्लोक 16 (skanda.3.66.16)

रत्नगर्भा धृता येन पृष्ठदेशे च लीलया । कृत्या व्यवस्थितं सर्वं जगत्स्थावरजंगमम् ।

ratnagarbhā dhṛtā yena pṛṣṭhadeśe ca līlayā kṛtyā vyavasthitaṁ sarvaṁ jagatsthāvarajaṁgamam

जिसने रत्नगर्भा पृथ्वी को अपनी पीठ पर लीलापूर्वक धारण किया, और जिसने चराचर सम्पूर्ण जगत को सुव्यवस्थित किया...

श्लोक 17 (skanda.3.66.17)

स देवो विश्वरूपो वै कथं वाजिमुखोऽभवत् । हिरण्याक्षस्य हंता यो रूपं कृत्वा वराहजम् ।

sa devo viśvarūpo vai kathaṁ vājimukho'bhavat hiraṇyākṣasya haṁtā yo rūpaṁ kṛtvā varāhajam

वह विश्वरूप देव अश्वमुख कैसे हुआ, जिसने वराह-रूप धारण कर हिरण्याक्ष का वध किया था?

श्लोक 18 (skanda.3.66.18)

सुपवित्रं महातेजाः प्रविश्य जलसा गरे । उद्धृता च मही सर्वा ससागरमहीधरा ।

supavitraṁ mahātejāḥ praviśya jalasāgare uddhṛtā ca mahī sarvā sasāgaramahīdharā

वह अत्यंत पवित्र, महातेजस्वी देव जलसागर में प्रवेश कर, समुद्र और पर्वतों सहित सारी पृथ्वी को उठा लाया।

श्लोक 19 (skanda.3.66.19)

उद्धृता च मही नूनं दंष्ट्राग्रे येन लीलया । कृत्वा रूपं वराहं च कपिलं शोकनाशनम् ।

uddhṛtā ca mahī nūnaṁ daṁṣṭrāgre yena līlayā kṛtvā rūpaṁ varāhaṁ ca kapilaṁ śokanāśanam

जिसने वस्तुतः वराह का, शोकनाशक कपिल-वर्ण का रूप धारण कर, लीलापूर्वक अपनी दाढ़ के अग्रभाग पर पृथ्वी को उठा लिया...

श्लोक 20 (skanda.3.66.20)

स देवः कथमीशानो हयग्रीवत्वमागतः । प्रह्लादार्थे स चेशानो रूपं कृत्वा भयावहम् ।

sa devaḥ kathamīśāno hayagrīvatvamāgataḥ prahlādārthe sa ceśāno rūpaṁ kṛtvā bhayāvaham

वह ईश्वर देव हयग्रीव-रूप को कैसे प्राप्त हुआ? वही ईश्वर प्रह्लाद के लिए भयंकर रूप धारण कर...

श्लोक 21 (skanda.3.66.21)

नारसिंहं महादेवं सर्वदुष्टनिवारणम् । पर्वताग्निसमुद्रस्थं ररक्ष भक्तसत्तमम् ।

nārasiṁhaṁ mahādevaṁ sarvaduṣṭanivāraṇam parvatāgnisamudrasthaṁ raraksha bhaktasattamam

— नरसिंह का, सब दुष्टों का निवारण करने वाला महादेव, और पर्वत, अग्नि तथा समुद्र में स्थित होकर उस उत्तम भक्त की रक्षा की।

श्लोक 22 (skanda.3.66.22)

हिरण्यकशिपुं दुष्टं जघान रजनीमुखे । इंद्रासने च संस्थाप्य प्रह्लादस्य सुखप्रदम् ।

hiraṇyakaśipuṁ duṣṭaṁ jaghāna rajanīmukhe iṁdrāsane ca saṁsthāpya prahlādasya sukhapradam

उसने दुष्ट हिरण्यकशिपु को संध्याकाल में मार डाला, और प्रह्लाद को सुख देने के लिए उसे इंद्र के आसन पर बिठाया।

श्लोक 23 (skanda.3.66.23)

प्रह्लादार्थे च वै नूनं नृसिंहत्वमुपागतः । विरोचनसुतस्याग्रे याचकोऽसौ भवेत्तदा ।

prahlādārthe ca vai nūnaṁ nṛsiṁhatvamupāgataḥ virocanasutasyāgre yācako'sau bhavettadā

निश्चय ही प्रह्लाद के लिए वह नृसिंह-रूप को प्राप्त हुआ था। फिर उसी विरोचन-पुत्र (बलि) के समक्ष वह याचक बनकर आया।

श्लोक 24 (skanda.3.66.24)

यज्ञे चैवाश्वमेधे वै बलिना यः समर्चितः । हृता वसुमती तस्य त्रिपदीकृतरोदसी ।

yajñe caivāśvamedhe vai balinā yaḥ samarcitaḥ hṛtā vasumatī tasya tripadīkṛtarodasī

अश्वमेध यज्ञ में बलि द्वारा जिसकी अर्चना की गई थी, उसी ने तीन पगों में समस्त लोकों को नापकर उसका राज्य हर लिया।

श्लोक 25 (skanda.3.66.25)

विश्वरूपेण वै येन पाताले क्षपितो बलिः । त्रिःसप्तवारं येनैव क्षत्रियानवनीतले ।

viśvarūpeṇa vai yena pātāle kṣapito baliḥ triḥsaptavāraṁ yenaiva kṣatriyānavanītale

जिसने विश्वरूप धारण कर बलि को पाताल भेजा, और जिसने ही पृथ्वी से इक्कीस बार क्षत्रियों का...

श्लोक 26 (skanda.3.66.26)

हत्वाऽददाच्च विप्रेभ्यो महीमतिमहौजसा । घातितो हैहयो राजा येनैव जननी हता ।

hatvā'dadācca viprebhyo mahīmatimahaujasā ghātito haihayo rājā yenaiva jananī hatā

...उनका वध कर उसने अपने अत्यंत बल से पृथ्वी ब्राह्मणों को दान कर दी; उसी ने हैहय राजा को मार डाला जिसने (उसकी) माता को मार डाला था।

श्लोक 27 (skanda.3.66.27)

येन वै शिशुनोर्व्यां हि घातिता दुष्टचारिणी । राक्षसी ताडका नाम्नी कौशिकस्य प्रसादतः ।

yena vai śiśunorvyāṁ hi ghātitā duṣṭacāriṇī rākṣasī tāḍakā nāmnī kauśikasya prasādataḥ

जिसने बालक-रूप में ही, कौशिक (विश्वामित्र) की कृपा से, दुष्टाचारिणी ताड़का नामक राक्षसी को पृथ्वी पर मार डाला...

श्लोक 28 (skanda.3.66.28)

विश्वामित्रस्य यज्ञे तु येन लीलानृदेहिना । चतुर्दशसहस्राणि घातिता राक्षसा वलात् ।

viśvāmitrasya yajñe tu yena līlānṛdehinā caturdaśasahasrāṇi ghātitā rākṣasā valāt

...और विश्वामित्र के यज्ञ में मनुष्य-देह धारण कर लीलामात्र में जिसने बलपूर्वक चौदह हजार राक्षसों का वध किया।

श्लोक 29 (skanda.3.66.29)

हता शूर्पणखा येन त्रिशिराश्च निपातितः । सुग्रीवं वालिनं हत्वा सुग्रीवेण सहायवान् ।

hatā śūrpaṇakhā yena triśirāśca nipātitaḥ sugrīvaṁ vālinaṁ hatvā sugrīveṇa sahāyavān

जिसने शूर्पणखा को घायल किया और त्रिशिरा को गिराया; सुग्रीव को सहायक बनाकर वालि को मार डाला।

श्लोक 30 (skanda.3.66.30)

कृत्वा सेतुं समुद्रस्य रणे हत्वा दशाननम् । धर्म्मारण्यं समासाद्य ब्राह्मणानन्वपूजयत् ।

kṛtvā setuṁ samudrasya raṇe hatvā daśānanam dharmāraṇyaṁ samāsādya brāhmaṇānanvapūjayat

जिसने समुद्र पर सेतु बनाकर युद्ध में रावण का वध किया, और धर्मारण्य में आकर ब्राह्मणों की पूजा की।

श्लोक 31 (skanda.3.66.31)

शासनं द्विजवर्येभ्यो दत्त्वा ग्रामान्बहूंस्तथा । स्नात्वा चैव धर्म्मवाप्यां सुदानान्यददाद्गवाम् ।

śāsanaṁ dvijavaryebhyo dattvā grāmānbahūṁstathā snātvā caiva dharmavāpyāṁ sudānānyadadādgavām

श्रेष्ठ ब्राह्मणों को अनेक ग्राम दान कर, धर्मवापी में स्नान कर उसने गायों के उत्तम दान किए।

श्लोक 32 (skanda.3.66.32)

साधूनां पालनं कृत्वा निग्रहाय दुरात्मनाम् । एवमन्यानि कर्म्माणि श्रुतानि च धरातले ।

sādhūnāṁ pālanaṁ kṛtvā nigrahāya durātmanām evamanyāni karmāṇi śrutāni ca dharātale

साधुओं का पालन और दुरात्माओं का निग्रह करते हुए — इस प्रकार उसके अन्य भी अनेक कर्म पृथ्वी पर सुने गए हैं।

श्लोक 33 (skanda.3.66.33)

स देवो लीलया कृत्वा कथं चाश्वमुखोऽभवत् । यो जातो यादवे वंशे पूतनाशकटादिकम् ।

sa devo līlayā kṛtvā kathaṁ cāśvamukho'bhavat yo jāto yādave vaṁśe pūtanāśakaṭādikam

वह देव लीलापूर्वक इतना सब करके अश्वमुख कैसे हुआ — जो यादव वंश में जन्मा और पूतना, शकट आदि को...

श्लोक 34 (skanda.3.66.34)

अरिष्टदैत्यः केशी च वृकासुरबकासुरौ । शकटासुरो महासुर स्तृणावर्तश्च धेनुकः ।

ariṣṭadaityaḥ keśī ca vṛkāsurabakāsurau śakaṭāsuro mahāsuras tṛṇāvartaśca dhenukaḥ

अरिष्ट दैत्य, केशी, वृकासुर, बकासुर, शकटासुर वह महासुर, तृणावर्त और धेनुक — इन सबका (वध किया)...

श्लोक 35 (skanda.3.66.35)

मल्लश्चैव तथा कंसो जरासंधस्तथैव च । कालयवनस्य हंता च कथं वै स हयाननः । तारकासुरं रणे जित्वा अयुतषट्पुरं तथा ।

mallaścaiva tathā kaṁso jarāsaṁdhastathaiva ca kālayavanasya haṁtā ca kathaṁ vai sa hayānanaḥ tārakāsuraṁ raṇe jitvā ayutaṣaṭpuraṁ tathā

मल्ल, कंस, जरासंध, तथा कालयवन का हंता — वह हयानन कैसे हुआ? जिसने युद्ध में तारकासुर तथा साठ हजार नगरों को जीता...

श्लोक 36 (skanda.3.66.36)

कन्याश्चोद्वाहिता येन सहस्राणि च षड् दश । अमानुषाणि कृत्वेत्थं कथं सोऽश्वमुखोऽभवत् ।

kanyāścodvāhitā yena sahasrāṇi ca ṣaḍ daśa amānuṣāṇi kṛtvettthaṁ kathaṁ so'śvamukho'bhavat

जिसने सोलह हजार कन्याओं का विवाह किया, इस प्रकार अमानुष कार्य करते हुए भी वह अश्वमुख कैसे हुआ?

श्लोक 37 (skanda.3.66.37)

त्राता यः सर्वभक्तानां हंता सर्वदुरात्मनाम् । धर्मस्थापनकृत्सोऽपि कल्किर्विष्णुपदे स्थितः ।

trātā yaḥ sarvabhaktānāṁ haṁtā sarvadurātmanām dharmasthāpanakṛtso'pi kalkirviṣṇupade sthitaḥ

जो सब भक्तों का रक्षक और सब दुरात्माओं का संहारक है, तथा जो कल्कि के रूप में धर्म-स्थापना कर विष्णु-पद में स्थित है...

श्लोक 38 (skanda.3.66.38)

एतद्वै महदाश्चर्य्यं भवता यत्प्रकाशितम् । एतदाचक्ष्व मे सर्वं कारणं त्रिपुरांतक ।

etadvai mahadāścaryaṁ bhavatā yatprakāśitam etadācakṣva me sarvaṁ kāraṇaṁ tripurāṁtaka

आपने जो यह बताया है, वह वस्तुतः महान आश्चर्य है। हे त्रिपुरांतक! अब आप मुझे इसका सारा कारण बताइए।

श्लोक 39 (skanda.3.66.39)

।। श्रीरुद्र उवाच ।। साधुपृष्टं महाबाहो कारणं तस्य वच्म्यहम् । हयग्रीवस्य कृष्णस्य शृणुष्वेकाग्रमानसः ।

śrīrudra uvāca sādhupṛṣṭaṁ mahābāho kāraṇaṁ tasya vacmyaham hayagrīvasya kṛṣṇasya śṛṇuṣvaikāgramānasaḥ

श्रीरुद्र ने कहा — हे महाबाहो! तुमने उत्तम प्रश्न किया है। मैं उसका कारण बताता हूँ; कृष्ण के हयग्रीव-रूप की कथा एकाग्रचित्त होकर सुनो।

श्लोक 40 (skanda.3.66.40)

।। व्यास उवाच ।। पुरा देवैः समारब्धो यज्ञो नूनं धरातले । वेदमंत्रैराह्वयितुं सर्वे रुद्रपुरोगमाः ।

vyāsa uvāca purā devaiḥ samārabdho yajño nūnaṁ dharātale vedamaṁtrairāhvayituṁ sarve rudrapurogamāḥ

व्यासजी ने कहा — प्राचीन काल में देवताओं ने, रुद्र को अग्रणी मानकर, पृथ्वी पर एक यज्ञ आरंभ किया और वेदमंत्रों से (विष्णु को) आमंत्रित करने का उद्यम किया।

श्लोक 41 (skanda.3.66.41)

वैकुण्ठे च गताः सर्वे क्षीराब्धौ च निजालये । पातालेऽपि पुनर्गत्वा न विदुः कृष्णदर्शनम् ।

vaikuṇṭhe ca gatāḥ sarve kṣīrābdhau ca nijālaye pātāle'pi punargatvā na viduḥ kṛṣṇadarśanam

वे सब वैकुंठ गए, क्षीरसागर के अपने निवास-स्थान गए, और पुनः पाताल जाकर भी उन्हें कृष्ण के दर्शन नहीं हुए।

श्लोक 42 (skanda.3.66.42)

मोहाविष्टास्ततः सर्वे इतश्चेतश्च धाविताः । नैव दृष्टस्तदा तैस्तु ब्रह्मरूपो जनार्दनः ।

mohāviṣṭāstataḥ sarve itaścetaśca dhāvitāḥ naiva dṛṣṭastadā taistu brahmarūpo janārdanaḥ

तब मोहग्रस्त होकर वे सब इधर-उधर दौड़ने लगे, परंतु उन्हें ब्रह्मस्वरूप जनार्दन कहीं दिखाई नहीं दिए।

श्लोक 43 (skanda.3.66.43)

विचारयंति ते सर्वे देवा इन्द्रपुरोगमाः । क्व गतोऽसौ महाविष्णुः केनोपायेन दृश्यते ।

vicārayaṁti te sarve devā indrapurogamāḥ kva gato'sau mahāviṣṇuḥ kenopāyena dṛśyate

इंद्र को अग्रणी बनाकर वे सब देवता विचार करने लगे — 'वह महाविष्णु कहाँ गए? किस उपाय से उनके दर्शन हो सकते हैं?'

श्लोक 44 (skanda.3.66.44)

प्रणम्य शिरसा देवं वागीशं प्रोचुरादरात् । देवदेव महाविष्णुं कथयस्व प्रसादतः ।

praṇamya śirasā devaṁ vāgīśaṁ procurādarāt devadeva mahāviṣṇuṁ kathayasva prasādataḥ

वे सिर झुकाकर वाणी के स्वामी बृहस्पति को प्रणाम कर आदरपूर्वक बोले — 'हे देवदेव! कृपया हमें बताइए, महाविष्णु कहाँ हैं?'

श्लोक 45 (skanda.3.66.45)

।। बृहस्पतिरुवाच ।। न जाने केन कार्येण योगारूढो महात्मवान् । योगरूपोऽभवद्विष्णुर्योगीशो हरिरच्युतः ।

bṛhaspatiruvāca na jāne kena kāryeṇa yogārūḍho mahātmavān yogarūpo'bhavadviṣṇuryogīśo harirachyutaḥ

बृहस्पति ने कहा — मैं नहीं जानता कि किस कारण से वह महात्मा विष्णु योगारूढ़ होकर योगस्वरूप हो गए हैं, वे योगेश्वर, अच्युत हरि।

श्लोक 46 (skanda.3.66.46)

क्षणं ध्यात्वा स्वमात्मानं धिषणेन ख्यापितो हरिः । तत्र सर्वे गता देवा यत्र देवो जगत्पतिः ।

kṣaṇaṁ dhyātvā svamātmānaṁ dhiṣaṇena khyāpito hariḥ tatra sarve gatā devā yatra devo jagatpatiḥ

क्षणभर अपनी बुद्धि से ध्यान करके, बृहस्पति ने हरि के स्थान का पता बताया। तब सब देवता वहाँ गए जहाँ जगत्पति देव थे।

श्लोक 47 (skanda.3.66.47)

तदा दृष्टो महाविष्णुर्ध्यानस्थोऽसौ जनार्दनः । ध्यात्वा कृत्यसमाकारं सशरं दैत्यसूदनम् ।

tadā dṛṣṭo mahāviṣṇurdhyānastho'sau janārdanaḥ dhyātvā kṛtyasamākāraṁ saśaraṁ daityasūdanam

तब उन्होंने देखा कि महाविष्णु जनार्दन ध्यानमग्न बैठे हैं, अपने कार्य के अनुरूप रूप का ध्यान करते हुए, धनुष-बाण सहित, दैत्यसूदन।

श्लोक 48 (skanda.3.66.48)

समास्थानं ततो दृष्ट्वा बोधोपायं प्रचक्रमे । आह तांश्च तदा वम्र्यो धनुर्गुणं प्रयत्नतः । छेत्स्यंति चेत्तच्छब्देन प्रबुध्येत हरिः स्वयम् ।

samāsthānaṁ tato dṛṣṭvā bodhopāyaṁ pracakrame āha tāṁśca tadā vamryo dhanurguṇaṁ prayatnataḥ chetsyaṁti cettacchabdena prabudhyeta hariḥ svayam

उसकी वह स्थिति देखकर देवता उसे जगाने का उपाय सोचने लगे। उन्होंने दीमकों (वम्री) से कहा — यदि तुम प्रयत्नपूर्वक धनुष की डोरी को काट दो, तो उसकी ध्वनि से हरि स्वयं जाग जाएँगे।

श्लोक 49 (skanda.3.66.49)

।। देवा ऊचुः ।। गुणभक्षं कुरुध्वं वै येनासौ बुध्यते हरिः । क्रत्वर्थिनो वयं वम्र्यः प्रभुं विज्ञापयामहे ।

devā ūcuḥ guṇabhakṣaṁ kurudhvaṁ vai yenāsau budhyate hariḥ kratvarthino vayaṁ vamryaḥ prabhuṁ vijñāpayāmahe

देवताओं ने कहा — डोरी को कुतर डालो, जिससे हरि जाग जाएँ। हे दीमकों! हम यज्ञ के अभिलाषी हैं; हम अपने स्वामी को यह निवेदन करते हैं।

श्लोक 50 (skanda.3.66.50)

।। वम्र्यः ऊचुः ।। निद्राभंगं कथाच्छेदं दम्पत्योर्मैत्रभेदनम् । शिशुमातृविभेदं वा कुर्वाणो नरकं व्रजेत् ।

vamryaḥ ūcuḥ nidrābhaṁgaṁ kathācchedaṁ dampatyormaitrabhedanam śiśumātṛvibhedaṁ vā kurvāṇo narakaṁ vrajet

दीमकों ने कहा — जो कोई किसी की नींद तोड़ता है, किसी की बात बीच में काटता है, पति-पत्नी की मित्रता में फूट डालता है, अथवा शिशु और माता में भेद उत्पन्न करता है, वह नरक को प्राप्त होता है।

श्लोक 51 (skanda.3.66.51)

योगारूढो जगन्नाथः समाधिस्थो महाबलः । तस्य श्रीजगदीशस्य विघ्नं नैव तु कुर्महे ।

yogārūḍho jagannāthaḥ samādhistho mahābalaḥ tasya śrījagadīśasya vighnaṁ naiva tu kurmahe

जगन्नाथ योगारूढ़ और समाधिस्थ हैं, वे महाबलशाली हैं; हम उन श्री जगदीश के ध्यान में कोई विघ्न नहीं डालेंगे।

श्लोक 52 (skanda.3.66.52)

।। ब्रह्मोवाच ।। भवतां सर्वभक्षत्वं देवकार्यं क्रियेत चेत् । कर्त्तव्यं च ततो वम्र्यो यज्ञसिद्धिर्यथा भवेत् । वम्रीशा सा तदा वत्स पुनरेवमुवाच ह ।

brahmovāca bhavatāṁ sarvabhakṣatvaṁ devakāryaṁ kriyeta cet karttavyaṁ ca tato vamryo yajñasiddhiryathā bhavet vamrīśā sā tadā vatsa punarevamuvāca ha

ब्रह्मा ने कहा — यदि तुम्हारा यह सर्वभक्षण-स्वभाव देव-कार्य के लिए ही प्रयुक्त हो, तो हे दीमकों! तुम्हें यह करना ही चाहिए ताकि यज्ञ सिद्ध हो सके। हे वत्स! तब दीमक-रानी ने पुनः यह कहा।

श्लोक 53 (skanda.3.66.53)

।। वम्र्युवाच ।। दुःखसाध्यो जगन्नाथो मलयानिलसंनिभः । कथं वा बोध्यतां बह्मन्नस्माभिः सुरपूजितः ।

vamryuvāca duḥkhasādhyo jagannātho malayānilasaṁnibhaḥ kathaṁ vā bodhyatāṁ brahmannasmābhiḥ surapūjitaḥ

दीमक-रानी ने कहा — जगन्नाथ, जो मलय पर्वत की वायु के समान शीतल हैं, दुःखसाध्य हैं; हे ब्रह्मन्! हम उन देवपूजित प्रभु को कैसे जगा सकते हैं?

श्लोक 54 (skanda.3.66.54)

नैव यज्ञेन मे कार्यं सुरैश्चैव तथैव च । सर्वेषु यज्ञकार्येषु भागं ददतु मे सुराः ।

naiva yajñena me kāryaṁ suraiścaiva tathaiva ca sarveṣu yajñakāryeṣu bhāgaṁ dadatu me surāḥ

मुझे यज्ञ से अथवा देवताओं से कोई प्रयोजन नहीं है। यदि करना ही है तो देवगण सब यज्ञ-कार्यों में मुझे भाग दें।

श्लोक 55 (skanda.3.66.55)

।। देवा ऊचुः ।। प्रदास्यामो वयं वम्र्यै भागं यज्ञेषु सर्वदा । यज्ञाय दत्तमस्माभिः कुरुष्वैवं वचो हि नः ।

devā ūcuḥ pradāsyāmo vayaṁ vamryai bhāgaṁ yajñeṣu sarvadā yajñāya dattamasmābhiḥ kuruṣvaivaṁ vaco hi naḥ

देवताओं ने कहा — हम दीमकों को सदा यज्ञों में भाग देंगे। यज्ञ की सिद्धि के लिए हमने यह वचन दिया है; अतः तुम इसे कर डालो।

श्लोक 56 (skanda.3.66.56)

तथेति विधिनाप्युक्तं वम्री चोद्यममाश्रिता । गुणभक्षादिकं कर्म तया सर्वं कृतं नृप ।

tatheti vidhināpyuktaṁ vamrī codyamamāśritā guṇabhakṣādikaṁ karma tayā sarvaṁ kṛtaṁ nṛpa

'तथास्तु' कहकर विधि से भी यह स्वीकार करके, दीमक-रानी उद्यम में लग गई और उसने बॉलस्ट्रिंग कुतरने आदि सारा कार्य कर डाला, हे राजन्!

श्लोक 57 (skanda.3.66.57)

।। युधिष्ठिर उवाच ।। अस्य वा बोधने देवा गुणभंगे समाधिषु । एतदाश्चर्यं विप्रर्षे सत्यं सत्यवतीसुत ।

yudhiṣṭhira uvāca asya vā bodhane devā guṇabhaṁge samādhiṣu etadāścaryaṁ viprarṣe satyaṁ satyavatīsuta

युधिष्ठिर ने कहा — हे विप्रर्षे, सत्यवतीपुत्र! उनके समाधि में स्थित होते हुए देवताओं का उन्हें जगाना और डोरी का टूटना — यह वास्तव में एक बड़ा आश्चर्य है।

श्लोक 58 (skanda.3.66.58)

।। व्यास उवाच ।। व्यग्रचित्ताः सुराः सर्वे आकृष्टं हरिकार्मु कम् । न जाने केन कार्येण विष्णुमायाविमोहिताः ।

vyāsa uvāca vyagracittāḥ surāḥ sarve ākṛṣṭaṁ harikārmukam na jāne kena kāryeṇa viṣṇumāyāvimohitāḥ

व्यासजी ने कहा — व्यग्रचित्त हुए सब देवताओं ने हरि के धनुष को खींचा हुआ पाया; मुझे नहीं मालूम किस कारण से वे विष्णु की माया से मोहित थे।

श्लोक 59 (skanda.3.66.59)

मुदितास्ताः प्रमुञ्चंति वल्मीकं चाग्रतो हरेः । कोटिपार्श्वे ततो नीतं वल्मीकं पर्वतोपमम् ।

muditāstāḥ pramuñcaṁti valmīkaṁ cāgrato hareḥ koṭipārśve tato nītaṁ valmīkaṁ parvatopamam

प्रसन्न होकर उन्होंने दीमकों को हरि के सामने छोड़ दिया। फिर पर्वत के समान वह दीमक-भित्ती (वल्मीक) उसके करोड़ों बगल में ले जाई गई।

श्लोक 60 (skanda.3.66.60)

गुणे च भक्षिते तस्मिंस्तक्षणादेव दूषिते । ज्याघातकोटिभिः सार्द्धं शीर्षं छित्त्वा दिवं गतम् ।

guṇe ca bhakṣite tasmiṁstakṣaṇādeva dūṣite jyāghātakoṭibhiḥ sārddhaṁ śīrṣaṁ chittvā divaṁ gatam

जब वह डोरी कुतर कर तत्काल ही क्षीण कर दी गई, तो प्रत्यंचा के करोड़ों प्रबल आघात के साथ ही उसका शीर्ष कटकर आकाश में उड़ गया।

श्लोक 61 (skanda.3.66.61)

गते शीर्षे च ते देवा भृशमुद्विग्नमानसाः । धावंति सर्वतः सर्वे शिरआलोकनाय ते ।

gate śīrṣe ca te devā bhṛśamudvignamānasāḥ dhāvaṁti sarvataḥ sarve śira ālokanāya te

शीर्ष के चले जाने पर वे देवता अत्यंत उद्विग्नचित्त हो गए, और वे सब उस शीश को खोजने के लिए चारों ओर दौड़ने लगे।

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