ब्रह्म खण्ड · अध्याय 65
बकुलार्क माहात्म्य
श्लोक 1 (skanda.3.65.1)
।। व्यास उवाच ।। शंभोश्च पश्चिमे भागे स्थापितः कश्यपात्मजः । तत्रास्ति तन्महाभाग रविक्षेत्रं तदुच्यते ।
vyāsa uvāca śambhośca paścime bhāge sthāpitaḥ kaśyapātmajaḥ tatrāsti tanmahābhāga ravikṣetraṁ taducyate
व्यासजी ने कहा — शम्भु के पश्चिम भाग में कश्यपपुत्र सूर्य स्थापित हैं। हे महाभाग! वहाँ जो स्थान है, वह रविक्षेत्र कहलाता है।
श्लोक 2 (skanda.3.65.2)
तत्रोत्पन्नौ महादिव्यौ रूपयौवनसंयुतौ । नासत्यावश्विनौ देवौ विख्यातौ गदनाशनौ ।
tatrotpannau mahādivyau rūpayauvanasaṁyutau nāsatyāvaśvinau devau vikhyātau gadanāśanau
वहाँ रूप और यौवन से युक्त दो महादिव्य देव उत्पन्न हुए — नासत्य और अश्विनीकुमार, जो रोगनाशक देवताओं के रूप में विख्यात हैं।
श्लोक 3 (skanda.3.65.3)
।। युधिष्ठिर उवाच ।। पितामह महाभाग कथयस्व प्रसादतः । उत्पत्तिरश्विनोश्चैव मृत्युलोके च तत्कथम् ।
yudhiṣṭhira uvāca pitāmaha mahābhāga kathayasva prasādataḥ utpattiraśvinoścaiva mṛtyuloke ca tatkatham
युधिष्ठिर ने कहा — हे महाभाग पितामह! कृपापूर्वक बताइए, अश्विनीकुमारों की उत्पत्ति कैसे हुई और वे मृत्युलोक में कैसे आए।
श्लोक 4 (skanda.3.65.4)
रविलोकात्कथं सूर्यो धरायामवतारितः । एतत्सर्वं प्रयत्नेन कथयस्व प्रसादतः ।
ravilokātkathaṁ sūryo dharāyāmavatāritaḥ etatsarvaṁ prayatnena kathayasva prasādataḥ
सूर्यलोक से सूर्य पृथ्वी पर कैसे अवतरित हुए? यह सब कृपापूर्वक विस्तार से कहिए।
श्लोक 5 (skanda.3.65.5)
यच्छ्रुत्वा हि महाभाग सर्वपापैः प्रमुच्यते ।
yacchrutvā hi mahābhāga sarvapāpaiḥ pramucyate
हे महाभाग! जिसे सुनकर मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 6 (skanda.3.65.6)
।। व्यास उवाच ।। साधु पृष्टं त्वया भूप ऊर्ध्वलोककथानकम् । यच्छ्रुत्वा नरशार्दूल सर्वरोगात्प्रमुच्यते । विश्वकर्म्मसुता संज्ञा अंशुमद्रविणा वृता ।
vyāsa uvāca sādhu pṛṣṭaṁ tvayā bhūpa ūrdhvalokakathānakam yacchrutvā naraśārdūla sarvarogātpramucyate viśvakarmasutā saṁjñā aṁśumadraviṇā vṛtā
व्यासजी ने कहा — हे राजन्, तुमने ऊर्ध्वलोक की यह कथा उत्तम प्रश्न किया है, जिसे सुनकर हे नरश्रेष्ठ, मनुष्य सब रोगों से मुक्त हो जाता है। विश्वकर्मा की पुत्री संज्ञा, तेजोमय सूर्य द्वारा वरण की गई थी।
श्लोक 7 (skanda.3.65.7)
सूर्यं दृष्ट्वा सदा संज्ञा स्वाक्षिसंयमनं व्यधात् । यतस्ततः सरोषोऽर्कः संज्ञां वचनमब्रवीत् ।
sūryaṁ dṛṣṭvā sadā saṁjñā svākṣisaṁyamanaṁ vyadhāt yatastataḥ saroṣo'rkaḥ saṁjñāṁ vacanamabravīt
सूर्य को देखकर संज्ञा सदा अपनी आँखें बंद कर लेती थी। इससे क्रुद्ध होकर सूर्य ने संज्ञा से यह वचन कहा।
श्लोक 8 (skanda.3.65.8)
।। सूर्य उवाच ।। मयि दृष्टे सदा यस्मात्कुरुषे स्वाक्षिसंयमम् । तस्माज्जनिष्यते मूढे प्रजासंयमनो यमः ।
sūrya uvāca mayi dṛṣṭe sadā yasmātkuruṣe svākṣisaṁyamam tasmājjaniṣyate mūḍhe prajāsaṁyamano yamaḥ
सूर्य ने कहा — हे मूढ़े! चूँकि तू मुझे देखते ही सदा अपनी आँखें बंद कर लेती है, इसलिए तेरे गर्भ से प्रजा को संयमित करने वाला यम उत्पन्न होगा।
श्लोक 9 (skanda.3.65.9)
ततः सा चपलं देवी ददर्श च भयाकुलम् । विलोलितदृशं दृष्ट्वा पुनराह च तां रविः ।
tataḥ sā capalaṁ devī dadarśa ca bhayākulam vilolitadṛśaṁ dṛṣṭvā punarāha ca tāṁ raviḥ
तब भयाकुल हुई वह देवी चंचल दृष्टि से देखने लगी। उसकी विचलित दृष्टि देखकर सूर्य ने पुनः उससे कहा।
श्लोक 10 (skanda.3.65.10)
यस्माद्विलोलिता दृष्टिर्मयि दृष्टे त्वया धुना । तस्माद्विलोलितां संज्ञे तनयां प्रसविष्यसि ।
yasmādvilolitā dṛṣṭirmayi dṛṣṭe tvayā dhunā tasmādvilolitāṁ saṁjñe tanayāṁ prasaviṣyasi
चूँकि अभी मुझे देखते समय तेरी दृष्टि चंचल हो गई, इसलिए हे संज्ञे, तू विलोलिता नाम की एक कन्या को जन्म देगी।
श्लोक 11 (skanda.3.65.11)
।। व्यास उवाच ।। ततस्तस्यास्तु संजज्ञे भर्तृशापेन तेन वै । यमश्च यमुना येयं विख्याता सुमहानदी ।
vyāsa uvāca tatastasyāstu saṁjajñe bhartṛśāpena tena vai yamaśca yamunā yeyaṁ vikhyātā sumahānadī
व्यासजी ने कहा — तब पति के उस शाप से उसे यम और यमुना उत्पन्न हुए, जो अत्यंत विख्यात महानदी है।
श्लोक 12 (skanda.3.65.12)
सा च संज्ञा रवेस्तेजो महद्दुःखेन भामिनी । असहंतीव सा चित्ते चिंतयामास वै तदा ।
sā ca saṁjñā ravestejo mahadduḥkhena bhāminī asahaṁtīva sā citte ciṁtayāmāsa vai tadā
वह संज्ञा सूर्य के तेज को बड़े दुःख के साथ, मानो असहनीय समझते हुए, तब मन में विचार करने लगी।
श्लोक 13 (skanda.3.65.13)
किं करोमि क्व गच्छामि क्व गतायाश्च निर्वृतिः । भवेन्मम कथं भर्तुः कोपमर्कस्य नश्यति ।
kiṁ karomi kva gacchāmi kva gatāyāśca nirvṛtiḥ bhavenmama kathaṁ bhartuḥ kopamarkasya naśyati
मैं क्या करूँ, कहाँ जाऊँ, कहाँ जाकर मुझे सुख मिलेगा, और मेरे पति सूर्य का कोप कैसे शांत होगा?
श्लोक 14 (skanda.3.65.14)
इति संचिंत्य बहुधा प्रजापतिसुता तदा । साधु मेने महाभागा पितृसंश्रयमापसा ।
iti saṁciṁtya bahudhā prajāpatisutā tadā sādhu mene mahābhāgā pitṛsaṁśrayamāpasā
इस प्रकार बहुत सोच-विचार कर प्रजापति की उस महाभागा पुत्री ने पिता की शरण लेना ही उत्तम समझा।
श्लोक 15 (skanda.3.65.15)
ततः पितृगृहं गंतुं कृतबुद्धिर्यशस्विनी । छायामाहूयात्मनस्तु सा देवी दयिता रवेः ।
tataḥ pitṛgṛhaṁ gaṁtuṁ kṛtabuddhiryaśasvinī chāyāmāhūyātmanastu sā devī dayitā raveḥ
तब पिता के घर जाने का निश्चय कर, सूर्य की उस प्रिय, यशस्विनी देवी ने अपनी छाया को बुलाया।
श्लोक 16 (skanda.3.65.16)
तां चोवाच त्वया स्थेयमत्र भानोर्यथा मया । तथा सम्यगपत्येषु वर्तितव्यं तथा रवौ ।
tāṁ covāca tvayā stheyamatra bhānoryathā mayā tathā samyagapatyeṣu vartitavyaṁ tathā ravau
उसने कहा — तुम्हें यहाँ सूर्य के साथ उसी प्रकार रहना है जैसे मैं रहती थी, और संतानों तथा सूर्य के साथ भी उसी भांति उचित व्यवहार करना है।
श्लोक 17 (skanda.3.65.17)
दुष्टमपि न वाच्यं ते यथा बहुमतं मम । सैवास्मि संज्ञाहमिति वाच्यमेवं त्वयानघे ।
duṣṭamapi na vācyaṁ te yathā bahumataṁ mama saivāsmi saṁjñāhamiti vācyamevaṁ tvayānaghe
चाहे कुछ भी बुरा हो, तुम्हें वह प्रकट नहीं करना है — जैसा मुझे अभीष्ट है वैसा ही करना। हे निष्पाप! तुम्हें यही कहना है कि 'मैं ही संज्ञा हूँ'।
श्लोक 18 (skanda.3.65.18)
।। छायासंज्ञोवाच ।। आकेशग्रहणाच्चाहमाशापाच्च वचस्तथा । करिष्ये कथयिष्यामि यावत्केशापकर्षणात् ।
chāyāsaṁjñovāca ākeśagrahaṇāccāhamāśāpācca vacastathā kariṣye kathayiṣyāmi yāvatkeśāpakarṣaṇāt
छायासंज्ञा ने कहा — जब तक मेरे केश पकड़कर मुझे शाप न दिया जाए अथवा खींचा न जाए, तब तक मैं तुम्हारी कही हुई बात का ही पालन करूँगी और वही कहूँगी।
श्लोक 19 (skanda.3.65.19)
इत्युक्ता सा तदा देवी जगाम भवनं पितुः । ददर्श तत्र त्वष्टारं तपसा धूतकिल्बिषम् ।
ityuktā sā tadā devī jagāma bhavanaṁ pituḥ dadarśa tatra tvaṣṭāraṁ tapasā dhūtakilbiṣam
यह कहकर वह देवी अपने पिता के भवन को चली गई। वहाँ उसने त्वष्टा (विश्वकर्मा) को देखा, जो तप से अपने पापों को धो चुके थे।
श्लोक 20 (skanda.3.65.20)
बहुमानाच्च तेनापि पूजिता विश्व कर्म्मणा । तत्स्थौ पितृगृहे सा तु किंचित्कालमनिंदिता ।
bahumānācca tenāpi pūjitā viśvakarmaṇā tatsthau pitṛgṛhe sā tu kiṁcitkālamaniṁditā
विश्वकर्मा ने भी उसे अत्यंत आदर से सम्मानित किया। वह निष्कलंक देवी कुछ समय तक अपने पिता के घर में ठहरी रही।
श्लोक 21 (skanda.3.65.21)
ततः प्राह स धर्मज्ञः पिता नातिचिरोषिताम् । विश्वकर्मा सुतां प्रेम्णा बहुमानपुरस्सरम् ।
tataḥ prāha sa dharmajñaḥ pitā nāticiroṣitām viśvakarmā sutāṁ premṇā bahumānapurassaram
तब धर्मज्ञ पिता विश्वकर्मा ने कुछ ही समय बाद अपनी पुत्री से प्रेमपूर्वक और आदरसहित यह कहा।
श्लोक 22 (skanda.3.65.22)
त्वां तु मे पश्यतो वत्से दिनानि सुबहून्यपि । मुहूर्तेन समानि स्युः किंतु धर्मो विलुप्यते ।
tvāṁ tu me paśyato vatse dināni subahūnyapi muhūrtena samāni syuḥ kiṁtu dharmo vilupyate
हे पुत्री! तुम्हें देखते हुए मेरे लिए बहुत से दिन भी एक मुहूर्त के समान लगते हैं, परंतु इससे धर्म का लोप होता है।
श्लोक 23 (skanda.3.65.23)
बांधवेषु चिरं वासो न नारीणां यशस्करः । मनोरथो बांधवानां भार्या पितृगृहे स्थिता ।
bāṁdhaveṣu ciraṁ vāso na nārīṇāṁ yaśaskaraḥ manoratho bāṁdhavānāṁ bhāryā pitṛgṛhe sthitā
स्त्रियों का अपने बांधवों के यहाँ लंबे समय तक रहना यशकारक नहीं है। पिता के घर में रहने वाली पत्नी बांधवों के मन की एक इच्छा मात्र रह जाती है।
श्लोक 24 (skanda.3.65.24)
स त्वं त्रैलोक्यनाथेन भर्त्रा सूर्येण संगता । पितुर्गृहे चिरं कालं वस्तुं नार्हसि पुत्रिके ।
sa tvaṁ trailokyanāthena bhartrā sūryeṇa saṁgatā piturgṛhe ciraṁ kālaṁ vastuṁ nārhasi putrike
तुम तीनों लोकों के स्वामी सूर्य की पत्नी हो; हे पुत्री! तुम्हें अपने पिता के घर में लंबे समय तक रहना उचित नहीं है।
श्लोक 25 (skanda.3.65.25)
अतो भर्तृगृहं गच्छ दृष्टोऽहं पूजिता च मे । पुनरागमनं कार्यं दर्शनाय शुभेक्षणे ।
ato bhartṛgṛhaṁ gaccha dṛṣṭo'haṁ pūjitā ca me punarāgamanaṁ kāryaṁ darśanāya śubhekṣaṇe
इसलिए अपने पति के घर जाओ। तुमने मुझे देख लिया और मेरा सम्मान भी किया। हे शुभनयने! मेरे दर्शन के लिए तुम्हें फिर आना होगा।
श्लोक 26 (skanda.3.65.26)
।। व्यास उवाच ।। इत्युक्ता सा तदा क्षिप्रं तथेत्युक्ता च वै मुने । पूजयित्वा तु पितरं सा जगामोत्तरान्कुरून् ।
vyāsa uvāca ityuktā sā tadā kṣipraṁ tathetyuktā ca vai mune pūjayitvā tu pitaraṁ sā jagāmottarānkurūn
व्यासजी ने कहा — हे मुने! इस प्रकार कहे जाने पर उसने तुरंत 'तथास्तु' कहा और अपने पिता को प्रणाम कर वह उत्तर कुरु देश की ओर चली गई।
श्लोक 27 (skanda.3.65.27)
सूर्यतापमनिच्छती तेजसस्तस्य बिभ्यती । तपश्चचार तत्रापि वडवारूपधारिणी ।
sūryatāpamanicchatī tejasastasya bibhyatī tapaścacāra tatrāpi vaḍavārūpadhāriṇī
सूर्य के ताप को न चाहती हुई और उसके तेज से भयभीत होकर, वह वहाँ भी घोड़ी का रूप धारण कर तपस्या करने लगी।
श्लोक 28 (skanda.3.65.28)
संज्ञामित्येव मन्वानो द्वितीयायां दिवस्पतिः । जनयामास तनयौ कन्यां चैकां मनोरमाम् ।
saṁjñāmityeva manvāno dvitīyāyāṁ divaspatiḥ janayāmāsa tanayau kanyāṁ caikāṁ manoramām
उसे संज्ञा ही समझते हुए, सूर्य ने उस दूसरी (छाया) से दो पुत्र और एक सुंदर कन्या उत्पन्न की।
श्लोक 29 (skanda.3.65.29)
छाया स्वतनयेष्वेव यथा प्रेष्णाध्यवर्तत । तथा न संज्ञाकन्यायां पुत्रयोश्चाप्यवर्तत । लालनासु च भोज्येषु विशेषमनुवासरम् ।
chāyā svatanayeṣveva yathā preṣṇādhyavartata tathā na saṁjñākanyāyāṁ putrayoścāpyavartata lālanāsu ca bhojyeṣu viśeṣamanuvāsaram
छाया अपने ही पुत्रों के प्रति जितने प्रेम से बर्तती थी, उतना संज्ञा के पुत्रों और कन्या के प्रति नहीं बरतती थी। लाड़-प्यार और भोजन में वह प्रतिदिन भेदभाव करती थी।
श्लोक 30 (skanda.3.65.30)
मनुस्तत्क्षांतवानस्या यमस्तस्या न चाक्षमत् । ताडनाय ततः कोपात्पादस्तेन समुद्यतः । तस्याः पुनः क्षांतमना न तु देहे न्यपातयत् ।
manustatkṣāṁtavānasyā yamastasyā na cākṣamat tāḍanāya tataḥ kopātpādastena samudyataḥ tasyāḥ punaḥ kṣāṁtamanā na tu dehe nyapātayat
मनु ने तो यह सह लिया, परंतु यम ने उसे सहन नहीं किया। क्रोध में आकर उसने उसे मारने के लिए पैर उठाया, किंतु फिर मन में क्षमाभाव आने से उसने वह पैर उसके शरीर पर नहीं गिराया।
श्लोक 31 (skanda.3.65.31)
ततः शशाप तं कोपाच्छायासंज्ञा यमं नृप । किंचित्प्रस्फुरमाणोष्ठी विचलत्पाणिपल्लवा ।
tataḥ śaśāpa taṁ kopācchāyāsaṁjñā yamaṁ nṛpa kiṁcitprasphuramāṇoṣṭhī vicalatpāṇipallavā
तब हे राजन्! क्रोध में, कुछ काँपते होंठों और थरथराते हाथों से, छायासंज्ञा ने यम को शाप दिया।
श्लोक 32 (skanda.3.65.32)
पत्न्यां पितुर्मयि यदि पादमुद्यच्छसे बलात् । भुवि तस्मादयं पादस्तवाद्यैव भविष्यति ।
patnyāṁ piturmayi yadi pādamudyacchase balāt bhuvi tasmādayaṁ pādastavādyaiva bhaviṣyati
चूँकि तूने अपने पिता की पत्नी अर्थात मुझ पर बलपूर्वक पैर उठाया, इसलिए आज ही से तेरा यह पैर पृथ्वी पर (क्षत होने योग्य) हो जाएगा।
श्लोक 33 (skanda.3.65.33)
इत्याकर्ण्य यमः शापं मातर्यतिविशंकितः । अभ्येत्य पितरं प्राह प्रणिपातपुरस्सरम् ।
ityākarṇya yamaḥ śāpaṁ mātaryativiśaṁkitaḥ abhyetya pitaraṁ prāha praṇipātapurassaram
यह शाप सुनकर यम को माता के प्रति बड़ी शंका हुई। वह अपने पिता के पास जाकर, प्रणाम करते हुए, उनसे बोला।
श्लोक 34 (skanda.3.65.34)
तातैतन्महदाश्चर्यमदृष्टमिति च क्वचित् । माता वात्सल्यरूपेण शापं पुत्रे प्रयच्छति ।
tātaitanmahadāścaryamadṛṣṭamiti ca kvacit mātā vātsalyarūpeṇa śāpaṁ putre prayacchati
हे तात! यह बड़ा ही आश्चर्य है, ऐसा कहीं देखा नहीं गया कि माता स्नेह के स्वरूप होते हुए भी अपने पुत्र को शाप दे दे।
श्लोक 35 (skanda.3.65.35)
यथा माता ममाचष्ट नेयं माता तथा मम । निर्गुणेष्वपि पुत्रेषु न माता निर्गुणा भवेत् ।
yathā mātā mamācaṣṭa neyaṁ mātā tathā mama nirguṇeṣvapi putreṣu na mātā nirguṇā bhavet
जैसा आचरण मेरी माता का बताया गया है, यह वैसी नहीं है — मेरी माता ऐसी नहीं है। गुणहीन पुत्रों के प्रति भी माता कभी निर्गुण (कठोर) नहीं होती।
श्लोक 36 (skanda.3.65.36)
यमस्यैतद्वचः श्रुत्वा भगवांस्तिमिरापहः । छायासंज्ञामथाहूय पप्रच्छ क्वगतेति च ।
yamasyaitadvacaḥ śrutvā bhagavāṁstimirāpahaḥ chāyāsaṁjñāmathāhūya papraccha kvagateti ca
यम की यह बात सुनकर, अंधकार के नाशक भगवान सूर्य ने छायासंज्ञा को बुलाकर पूछा कि 'वह (संज्ञा) कहाँ गई है?'
श्लोक 37 (skanda.3.65.37)
सा चाह तनया त्वष्टुरहं संज्ञा विभावसो । पत्नी तव त्वयापत्यान्येतानि जनितानि मे ।
sā cāha tanayā tvaṣṭurahaṁ saṁjñā vibhāvaso patnī tava tvayāpatyānyetāni janitāni me
उसने कहा — हे विभावसो! मैं त्वष्टा की पुत्री संज्ञा ही हूँ, तुम्हारी पत्नी हूँ; तुमसे ही मेरे ये संतानें उत्पन्न हुई हैं।
श्लोक 38 (skanda.3.65.38)
इत्थं विवस्वतस्तां तु बहुशः पृच्छतो यदा । नाचचक्षे तदा क्रुद्धो भास्वांस्तां शप्तुमुद्यतः ।
itthaṁ vivasvatastāṁ tu bahuśaḥ pṛcchato yadā nācacakṣe tadā kruddho bhāsvāṁstāṁ śaptumudyataḥ
सूर्य ने इस प्रकार उससे बार-बार पूछा, परंतु जब वह सच नहीं बताती रही, तब क्रुद्ध होकर वह प्रकाशमान सूर्य उसे शाप देने को उद्यत हुआ।
श्लोक 39 (skanda.3.65.39)
ततः सा कथयामास यथावृत्तं विवस्वते । विदितार्थश्च भगवाञ्जगाम त्वष्टुरालयम् ।
tataḥ sā kathayāmāsa yathāvṛttaṁ vivasvate viditārthaśca bhagavāñjagāma tvaṣṭurālayam
तब उसने विवस्वान को सारा सच्चा वृत्तांत बता दिया। सत्य जान लेने पर भगवान सूर्य त्वष्टा के घर गए।
श्लोक 40 (skanda.3.65.40)
ततः संपूजयामास त्वष्टा त्रैलोक्यपूजितम् । भास्वन्किं रहिता शक्त्या निजगेहमुपागतः ।
tataḥ saṁpūjayāmāsa tvaṣṭā trailokyapūjitam bhāsvankiṁ rahitā śaktyā nijagehamupāgataḥ
तब त्वष्टा ने त्रैलोक्य द्वारा पूजित सूर्य का सत्कार किया और पूछा — 'हे भास्वान! क्या अपनी पत्नी की शक्ति के बिना ही तुम अपने घर आए हो?'
श्लोक 41 (skanda.3.65.41)
संज्ञां पप्रच्छ तं तस्मै कथयामास तत्त्ववित् । आगता सेह मे वेश्म भवतः प्रेषिता रवे ।
saṁjñāṁ papraccha taṁ tasmai kathayāmāsa tattvavit āgatā seha me veśma bhavataḥ preṣitā rave
सूर्य ने उससे संज्ञा के विषय में पूछा। तत्त्वज्ञ त्वष्टा ने उन्हें बताया — 'हे रवे! वह तुम्हारे द्वारा भेजी गई मेरे घर आई थी।'
श्लोक 42 (skanda.3.65.42)
दिवाकरः समाधिस्थो वडवारूपधारिणीम् । तपश्चरंतीं ददृशे उत्तरेषु कुरुष्वथ ।
divākaraḥ samādhistho vaḍavārūpadhāriṇīm tapaścaraṁtīṁ dadṛśe uttareṣu kuruṣvatha
तब समाधिस्थ हुए सूर्य ने ध्यान द्वारा उत्तर कुरु देश में घोड़ी के रूप में तपस्या करती हुई संज्ञा को देख लिया।
श्लोक 43 (skanda.3.65.43)
असह्यमाना सूर्यस्य तेजस्तेनातिपीडिता । वह्न्याभनिजरूपं तु च्छायारूपं विमुच्य च ।
asahyamānā sūryasya tejastenātipīḍitā vahnyābhanijarūpaṁ tu chāyārūpaṁ vimucya ca
सूर्य के तेज को असहनीय समझकर, उससे अत्यंत पीड़ित हुई वह अपने अग्नि के समान तेजस्वी वास्तविक रूप को त्यागकर छाया-रूप धारण किए हुए थी।
श्लोक 44 (skanda.3.65.44)
धर्मारण्ये समागत्य तपस्तेपे सुदुष्करम् । छायापुत्रं शनिं दृष्ट्वा यमं चान्यं च भूपते ।
dharmāraṇye samāgatya tapastepe suduṣkaram chāyāputraṁ śaniṁ dṛṣṭvā yamaṁ cānyaṁ ca bhūpate
हे भूपते! छाया के पुत्र शनि, यम और अन्य संतानों को देखकर, वह धर्मारण्य में आकर अत्यंत कठोर तपस्या करने लगी।
श्लोक 45 (skanda.3.65.45)
तदैव विस्मितः सूर्यो दुष्टपुत्रौ समीक्ष्य च । ज्ञातुं दध्यौ क्षणं ध्यात्वा विदित्वा तच्च कारणम् ।
tadaiva vismitaḥ sūryo duṣṭaputrau samīkṣya ca jñātuṁ dadhyau kṣaṇaṁ dhyātvā viditvā tacca kāraṇam
उन दोनों दुष्ट स्वभाव वाले पुत्रों को देखकर सूर्य को भी आश्चर्य हुआ। क्षणभर ध्यान करके उन्होंने उसका कारण जान लिया।
श्लोक 46 (skanda.3.65.46)
घृण्यौष्ण्याद्दग्धदेहा सा तपस्तेपे पतिव्रता । येन मां तेजसा सह्यं द्रष्टुं नैव शशाक ह ।
ghṛṇyauṣṇyāddagdhadehā sā tapastepe pativratā yena māṁ tejasā sahyaṁ draṣṭuṁ naiva śaśāka ha
यह जानकर कि उसका शरीर मेरे तेज की उष्णता से जल उठता था, इसीलिए वह पतिव्रता तप कर रही थी क्योंकि वह मेरे तेज को सहन कर देख नहीं पाती थी।
श्लोक 47 (skanda.3.65.47)
पञ्चाशद्धायनेतीते गत्वा कौ तप आचरत् । प्रद्योतनो विचार्यैवं गत्वा शीघ्रं मनोजवः ।
pañcāśaddhāyanetīte gatvā kau tapa ācarat pradyotano vicāryaivaṁ gatvā śīghraṁ manojavaḥ
पचास वर्ष बीत जाने पर, यह सोचकर कि वह पृथ्वी पर कहाँ तप कर रही है, प्रकाशमान सूर्य मन के समान वेग से शीघ्र वहाँ गए।
श्लोक 48 (skanda.3.65.48)
धर्मारण्ये वरे पुण्ये यत्र संज्ञास्थिता तपः । आगतं तं रविं दृष्ट्वा वडवा समजायत ।
dharmāraṇye vare puṇye yatra saṁjñāsthitā tapaḥ āgataṁ taṁ raviṁ dṛṣṭvā vaḍavā samajāyata
उस उत्तम, पवित्र धर्मारण्य में, जहाँ संज्ञा तपस्या में स्थित थी, सूर्य को आया देखकर वह घोड़ी बन गई।
श्लोक 49 (skanda.3.65.49)
सूर्यपत्नी सदा संज्ञा सूर्यश्चाश्वस्ततोऽभवत् । ताभ्यां सहाभूत्संयोगो घ्राणे लिंगं निवेश्य च ।
sūryapatnī sadā saṁjñā sūryaścāśvastato'bhavat tābhyāṁ sahābhūtsaṁyogo ghrāṇe liṁgaṁ niveśya ca
सूर्य की सदा की पत्नी संज्ञा उसी रूप में थी; तब सूर्य ने भी अश्व का रूप धारण किया। दोनों का मिलन हुआ, जिसमें अश्वरूप में नासिका द्वारा ही मैथुन संपन्न हुआ।
श्लोक 50 (skanda.3.65.50)
तदा तौ च समुत्पन्नौ युगलावश्विनौ भुवि । प्रादुर्भूतं जलं तत्र दक्षिणेन खुरेण च ।
tadā tau ca samutpannau yugalāvaśvinau bhuvi prādurbhūtaṁ jalaṁ tatra dakṣiṇena khureṇa ca
तब उस स्थान पर अश्विनीकुमार नामक जुड़वाँ देव उत्पन्न हुए। वहाँ सूर्य के अश्वरूप के दाहिने खुर से जल प्रकट हुआ।
श्लोक 51 (skanda.3.65.51)
विदलिते भूमिभागे तत्र कुंडं समुद्बभौ । द्वितीयं तु पुनः कुंडं पश्चार्धचरणोद्भवम् ।
vidalite bhūmibhāge tatra kuṁḍaṁ samudbabhau dvitīyaṁ tu punaḥ kuṁḍaṁ paścārdhacaraṇodbhavam
उस भूमि के फटने पर वहाँ एक कुंड प्रकट हो गया। और पिछले पैर के आधे भाग से एक दूसरा कुंड भी उत्पन्न हुआ।
श्लोक 52 (skanda.3.65.52)
उत्तरवाहिन्याः काश्या कुरुक्षेत्रादि वै तथा । गंगापुरीसमफलं कुण्डेऽत्र मुनिनोदितम् ।
uttaravāhinyāḥ kāśyāḥ kurukṣetrādi vai tathā gaṁgāpurīsamaphalaṁ kuṇḍe'tra muninoditam
सज्जनों ने कहा है कि उत्तरवाहिनी गंगा, काशी, कुरुक्षेत्र आदि तीर्थों तथा गंगापुरी के समान ही फल इस कुंड में स्नान करने से प्राप्त होता है।
श्लोक 53 (skanda.3.65.53)
तत्फलं समवाप्नोति तप्तकुण्डे न संशयः । स्नानं विधाय तत्रैव सर्वपापैः प्रमुच्यते ।
tatphalaṁ samavāpnoti taptakuṇḍe na saṁśayaḥ snānaṁ vidhāya tatraiva sarvapāpaiḥ pramucyate
निःसंदेह उस तप्तकुंड में स्नान करने से वही फल प्राप्त होता है। वहाँ विधिपूर्वक स्नान करके मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 54 (skanda.3.65.54)
न पुनर्जायते देहः कुष्ठादिव्याधिपीडितः । एतत्ते कथितं भूप दस्रांशोत्पत्तिकारणम् ।
na punarjāyate dehaḥ kuṣṭhādivyādhipīḍitaḥ etatte kathitaṁ bhūpa dasrāṁśotpattikāraṇam
उसका शरीर फिर कभी कुष्ठ आदि रोगों से पीड़ित नहीं होता। हे राजन्! तुम्हें दस्र (अश्विनीकुमारों) की उत्पत्ति का यह कारण बता दिया गया है।
श्लोक 55 (skanda.3.65.55)
तदा ब्रह्मादयो देवा आगतास्तत्र भूपते । दत्त्वा संज्ञावरं शुभ्रं चिंतितादधिकं हि तैः ।
tadā brahmādayo devā āgatāstatra bhūpate dattvā saṁjñāvaraṁ śubhraṁ ciṁtitādadhikaṁ hi taiḥ
हे राजन्! तब ब्रह्मा आदि देवगण वहाँ आए और उन्होंने संज्ञा को उसकी अपेक्षा से भी अधिक उत्तम वर प्रदान किया।
श्लोक 56 (skanda.3.65.56)
स्थापयित्वा रविं तत्र बकुलाख्यवनाधिपम् । आनर्चुस्ते तदा संज्ञां पूर्वरूपाऽभवत्तदा ।
sthāpayitvā raviṁ tatra bakulākhyavanādhipam ānarcuste tadā saṁjñāṁ pūrvarūpābhavattadā
उन्होंने वहाँ सूर्य को बकुल नामक वन के अधिपति के रूप में स्थापित किया और संज्ञा की पूजा की; तब वह अपने पूर्व रूप को प्राप्त हो गई।
श्लोक 57 (skanda.3.65.57)
स्थापिता तत्र राज्ञी च कुमारौ युगलौ तदा । एतत्तीर्थफलं वक्ष्ये शृणु राजन्महामते ।
sthāpitā tatra rājñī ca kumārau yugalau tadā etattīrthaphalaṁ vakṣye śṛṇu rājanmahāmate
उस समय वहाँ रानी संज्ञा और दोनों जुड़वाँ कुमार भी प्रतिष्ठित किए गए। हे महामते राजन्! अब मैं इस तीर्थ का फल बताता हूँ, सुनो।
श्लोक 58 (skanda.3.65.58)
आदिस्थानं कुरुश्रेष्ठ देवैरपि सुदुर्लभम् । रविकुण्डे नरः स्नात्वा श्रद्धायुक्तो जितेंद्रियः ।
ādisthānaṁ kuruśreṣṭha devairapi sudurlabham ravikuṇḍe naraḥ snātvā śraddhāyukto jitendriyaḥ
हे कुरुश्रेष्ठ! यह आदि-स्थान देवताओं के लिए भी अत्यंत दुर्लभ है। रविकुंड में श्रद्धायुक्त और जितेंद्रिय होकर स्नान करने वाला मनुष्य...
श्लोक 59 (skanda.3.65.59)
तारयेत्स पितॄन्सर्वान्महानरकगानपि । श्रद्धया यः पिबेत्तोयं संतर्प्य पितृदेवताः ।
tārayetsa pitṝnsarvānmahānarakagānapi śraddhayā yaḥ pibettoyaṁ saṁtarpya pitṛdevatāḥ
वह अपने सभी पितरों को, चाहे वे महानरक में पड़े हों, तार देता है। जो श्रद्धापूर्वक पितरों और देवताओं का तर्पण करके उस जल को पीता है...
श्लोक 60 (skanda.3.65.60)
स्वल्पं वापि बहुवापि सर्वं कोटिगुणं भवेत् । सप्तम्यां रविवारेण ग्रहणं चंद्रसूर्ययोः ।
svalpaṁ vāpi bahuvāpi sarvaṁ koṭiguṇaṁ bhavet saptamyāṁ ravivāreṇa grahaṇaṁ caṁdrasūryayoḥ
चाहे वह अल्प हो या अधिक, वह सब करोड़गुना फलदायी हो जाता है। यदि सप्तमी रविवार को पड़े और उसमें सूर्य या चंद्र ग्रहण भी हो...
श्लोक 61 (skanda.3.65.61)
रविकुण्डे च ये स्नाताः न ते वै गर्भगामिनः । सक्रांतौ च व्यतीपाते वैधृतेषु च पर्वसु ।
ravikuṇḍe ca ye snātāḥ na te vai garbhagāminaḥ sakrāṁtau ca vyatīpāte vaidhṛteṣu ca parvasu
तो जो लोग रविकुंड में स्नान करते हैं, वे फिर गर्भ में नहीं आते। संक्रांति, व्यतीपात, वैधृति तथा पर्व के दिनों में भी...
श्लोक 62 (skanda.3.65.62)
पूर्णमास्याममावास्यां चतुर्द्दश्यां सितासिते । रविकुंडे च यः स्नातः क्रतुकोटिफलं लभेत् ।
pūrṇamāsyāmamāvāsyāṁ caturddaśyāṁ sitāsite ravikuṁḍe ca yaḥ snātaḥ kratukoṭiphalaṁ labhet
पूर्णिमा, अमावस्या, तथा शुक्ल-कृष्ण दोनों पक्षों की चतुर्दशी को जो रविकुंड में स्नान करता है, वह करोड़ों यज्ञों के समान फल पाता है।
श्लोक 63 (skanda.3.65.63)
पूजयेद्बकुलार्कं च एकचित्तेन मानवः । स याति परमं धाम स यावत्तपते रविः ।
pūjayedbakulārkaṁ ca ekacittena mānavaḥ sa yāti paramaṁ dhāma sa yāvattapate raviḥ
जो मनुष्य एकाग्रचित्त होकर बकुलार्क की पूजा करता है, वह परम धाम को प्राप्त होता है और सूर्य के तपने तक वहाँ निवास करता है।
श्लोक 64 (skanda.3.65.64)
तस्य लक्ष्मीः स्थिरा नूनं लभते संततिं सुखम् । अरिवर्गः क्षयं याति प्रसादाच्च दिवस्पतेः ।
tasya lakṣmīḥ sthirā nūnaṁ labhate saṁtatiṁ sukham arivargaḥ kṣayaṁ yāti prasādācca divaspateḥ
उसकी लक्ष्मी सदा स्थिर रहती है; उसे संतान और सुख प्राप्त होते हैं। सूर्य की कृपा से उसके शत्रुओं का समूह नष्ट हो जाता है।
श्लोक 65 (skanda.3.65.65)
नाग्नेर्भयं हि तस्य स्यान्न व्याघ्रान्न च दंतिनः । न च सर्प्पभयं क्वापि भूतप्रेतादिभीर्नहि ।
nāgnerbhayaṁ hi tasya syānna vyāghrānna ca daṁtinaḥ na ca sarpabhayaṁ kvāpi bhūtapretādibhirnahi
उसे न अग्नि से भय होता है, न बाघ से, न हाथी से। उसे सर्प का भय भी कहीं नहीं होता, न भूत-प्रेत आदि का।
श्लोक 66 (skanda.3.65.66)
बालग्रहाश्च सर्वेऽपि रेवती वृद्धरेवती । ते सर्वे नाशमायांति बकुलार्क नमोस्तु ते ।
bālagrahāśca sarve'pi revatī vṛddharevatī te sarve nāśamāyāṁti bakulārka namoste
सभी बालग्रह, रेवती और वृद्धरेवती — ये सब नष्ट हो जाते हैं (बाधा नहीं पहुँचाते)। हे बकुलार्क! तुम्हें नमस्कार है।
श्लोक 67 (skanda.3.65.67)
गावस्तस्य विवर्द्धंते धनं धान्यं तथैव च । अविच्छेदो भवेद्वंशो बकुलार्के नमस्कृते ।
gāvastasya vivarddhaṁte dhanaṁ dhānyaṁ tathaiva ca avicchedo bhavedvaṁśo bakulārke namaskṛte
उसकी गायें, धन और धान्य बढ़ते जाते हैं। बकुलार्क को नमस्कार करने से उसका वंश कभी नष्ट नहीं होता।
श्लोक 68 (skanda.3.65.68)
काकवन्ध्या च या नारी अनपत्या मृतप्रजा । वन्ध्या विरूपिता चैव विषकन्याश्च याः स्त्रियः ।
kākavaṁdhyā ca yā nārī anapatyā mṛtaprajā vaṁdhyā virūpitā caiva viṣakanyāśca yāḥ striyaḥ
जो स्त्री काकवंध्या (एक ही संतान के बाद बांझ) हो, संतानहीन हो, जिसकी संतान मर जाती हो, जो बांझ या विरूप हो, और जो विषकन्याएँ हों...
श्लोक 69 (skanda.3.65.69)
एवं दोषैः प्रमुच्यंते स्नात्वा कुण्डे च भूपते । सौभाग्यस्त्रीसुतांश्चैव रूपं चाप्नोति सर्वशः ।
evaṁ doṣaiḥ pramucyaṁte snātvā kuṇḍe ca bhūpate saubhāgyastrīsutāṁścaiva rūpaṁ cāpnoti sarvaśaḥ
हे राजन्! ये सभी उस कुंड में स्नान करके अपने इन दोषों से मुक्त हो जाती हैं और सौभाग्य, संतान तथा सर्वथा सुंदर रूप प्राप्त करती हैं।
श्लोक 70 (skanda.3.65.70)
व्याधिग्रस्तोपि यो मर्त्यः षण्मासाच्चैव मानवः । रविकुण्डे च सुस्नातः सर्वरोगात्प्रमुच्यते ।
vyādhigrastopi yo martyaḥ ṣaṇmāsāccaiva mānavaḥ ravikuṁḍe ca susnātaḥ sarvarogātpramucyate
कोई भी मनुष्य, चाहे वह रोगग्रस्त ही क्यों न हो, छह महीने तक रविकुंड में भलीभांति स्नान करके सब रोगों से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 71 (skanda.3.65.71)
नीलोत्सर्गविधिं यस्तु रविक्षेत्रे करोति वै । पितरस्तृप्तिमायांति यावदाभूतसंप्लवम् ।
nīlotsargavidhiṁ yastu ravikṣetre karoti vai pitarastṛptimāyāṁti yāvadābhūtasaṁplavam
जो व्यक्ति रविक्षेत्र में नीलोत्सर्ग (नीले बैल के दान) का विधिवत विधान करता है, उसके पितर प्रलयकाल तक तृप्त रहते हैं।
श्लोक 72 (skanda.3.65.72)
कन्यादानं च यः कुर्यादस्मिन्क्षेत्रे च पुत्रक । उद्वाहपरिपूतात्मा ब्रह्मलोके महीयते ।
kanyādānaṁ ca yaḥ kuryādasminkṣetre ca putraka udvāhaparipūtātmā brahmaloke mahīyate
हे पुत्र! जो इस क्षेत्र में कन्यादान करता है, वह विवाह के पुण्य से पवित्र आत्मा वाला होकर ब्रह्मलोक में प्रतिष्ठित होता है।
श्लोक 73 (skanda.3.65.73)
धेनुदानं च शय्यां च विद्रुमं च हयं तथा । दासीमहिषीघण्टाश्च तिलं कांचनसंयुतम् ।
dhenudānaṁ ca śayyāṁ ca vidrumaṁ ca hayaṁ tathā dāsīmahiṣīghaṇṭāśca tilaṁ kāṁcanasaṁyutam
गाय, शय्या, मूँगा, घोड़ा, दासी, भैंस, घंटा, तथा स्वर्ण-मिश्रित तिल — इनका दान...
श्लोक 74 (skanda.3.65.74)
धेनुं तिलमयीं दद्यादस्मिन्क्षेत्रे च भारत । उपानहौ च छत्रं च शीतत्राणादिकं तथा ।
dhenuṁ tilamayīṁ dadyādasminkṣetre ca bhārata upānahau ca chatraṁ ca śītatrāṇādikaṁ tathā
हे भारत! इस क्षेत्र में तिल की बनी गाय, जूते, छाता, तथा शीत-निवारक वस्त्र आदि का दान करना चाहिए।
श्लोक 75 (skanda.3.65.75)
लक्षहोमं तथा रुद्रं रुद्रातिरुद्रमेव च । तस्मिन्स्थाने च यत्किंचिद्ददाति श्रद्धयान्वितः ।
lakṣahomaṁ tathā rudraṁ rudrātirudrameva ca tasminsthāne ca yatkiṁciddadāti śraddhayānvitaḥ
लक्ष-होम, रुद्र और अतिरुद्र (जप-अनुष्ठान) — इस स्थान में जो कुछ भी श्रद्धापूर्वक दिया जाता है...
श्लोक 76 (skanda.3.65.76)
एकैकस्य फलं तात वक्ष्यामि शृणु तत्त्वतः । दानेन लभते भोगानिह लोके परत्र च ।
ekaikasya phalaṁ tāta vakṣyāmi śṛṇu tattvataḥ dānena labhate bhogāniha loke paratra ca
हे तात! मैं तुम्हें प्रत्येक का फल तत्त्वतः बताता हूँ, सुनो। दान से मनुष्य इस लोक और परलोक दोनों में भोग प्राप्त करता है।
श्लोक 77 (skanda.3.65.77)
राज्यं च लभते मर्त्यः कृत्वोद्वाहं तु मानुषाः । जायातो धर्मकामार्थाः प्राप्यंते नात्र संशयः ।
rājyaṁ ca labhate martyaḥ kṛtvodvāhaṁ tu mānuṣāḥ jāyāto dharmakāmārthāḥ prāpyaṁte nātra saṁśayaḥ
मनुष्य यहाँ राज्य पाता है; जो विवाह करते हैं वे निश्चय ही पत्नी से धर्म, काम और अर्थ प्राप्त करते हैं, इसमें कोई संदेह नहीं है।
श्लोक 78 (skanda.3.65.78)
पूजाया लभते सौख्यं भवेज्जन्मनिजन्मनि । सप्तम्यां रवियुक्तायां बकुलार्कं स्मरेत्तु यः ।
pūjāyā labhate saukhyaṁ bhavejjanmanijanmani saptamyāṁ raviyuktāyāṁ bakulārkaṁ smarettu yaḥ
पूजा से जन्म-जन्म में सुख प्राप्त होता है। जो सूर्य-सप्तमी के दिन बकुलार्क का स्मरण करता है...
श्लोक 79 (skanda.3.65.79)
ज्वरादेः शत्रुतश्चैव व्याधेस्तस्य भयं नहि ।
jvarādeḥ śatrutaścaiva vyādhestasya bhayaṁ nahi
उसे ज्वर आदि, शत्रुओं तथा व्याधियों का कोई भय नहीं रहता।
श्लोक 80 (skanda.3.65.80)
।। युधिष्ठिर उवाच ।। बकुलार्केति वै नाम कथं जातं रवेर्मुने । एतन्मे वदतां श्रेष्ठ तत्त्वमाख्यातुमर्हसि ।
yudhiṣṭhira uvāca bakulārketi vai nāma kathaṁ jātaṁ ravermune etanme vadatāṁ śreṣṭha tattvamākhyātumarhasi
युधिष्ठिर ने कहा — हे मुने! सूर्य का यह 'बकुलार्क' नाम कैसे पड़ा? हे वक्ताओं में श्रेष्ठ! आप मुझे इसका सत्य वृत्तांत बताने योग्य हैं।
श्लोक 81 (skanda.3.65.81)
।। व्यास उवाच ।। यदा संज्ञा च राजेंद्र सूर्यार्थं चैकचेतसा । तेपे बकुलवृक्षाधः पत्युस्तेजः प्रशांतये ।
vyāsa uvāca yadā saṁjñā ca rājendra sūryārthaṁ caikacetasā tepe bakulavṛkṣādhaḥ patyustejaḥ praśāṁtaye
व्यासजी ने कहा — हे राजेंद्र! जब संज्ञा ने अपने पति के तेज को शांत करने के लिए एकाग्रचित्त होकर सूर्य के निमित्त बकुल वृक्ष के नीचे तपस्या की...
श्लोक 82 (skanda.3.65.82)
प्रादुर्भावं रवेर्दृष्ट्वा वडवा समजायत । अत्यंतं गोपतिः शांतो बकुलस्य समीपतः ।
prādurbhāvaṁ raverdṛṣṭvā vaḍavā samajāyata atyaṁtaṁ gopatiḥ śāṁto bakulasya samīpataḥ
सूर्य के आगमन को देखकर वह घोड़ी बन गई। बकुल वृक्ष के निकट सूर्य भी अत्यंत शांत हो गए।
श्लोक 83 (skanda.3.65.83)
सुषुवे च तदा राज्ञी सुतौ दिव्यौ मनोहरौ । तेनास्य प्रथितं नाम बकुलार्केति वै रवेः ।
suṣuve ca tadā rājñī sutau divyau manoharau tenāsya prathitaṁ nāma bakulārketi vai raveḥ
तब उस रानी ने दो दिव्य, मनोहर पुत्रों को जन्म दिया। इसी कारण सूर्य का नाम 'बकुलार्क' विख्यात हुआ।
श्लोक 84 (skanda.3.65.84)
यस्तत्र कुरुते स्नानं व्याधिस्तस्य न पीडयेत् । धर्ममर्थं च कामं च लभते नात्र संशयः ।
yastatra kurute snānaṁ vyādhistasya na pīḍayet dharmamarthaṁ ca kāmaṁ ca labhate nātra saṁśayaḥ
जो वहाँ स्नान करता है, उसे कोई रोग पीड़ित नहीं करता; वह निश्चय ही धर्म, अर्थ और काम प्राप्त करता है।
श्लोक 85 (skanda.3.65.85)
षण्मासात्सिद्धिमाप्नोति मोक्षं च लभते नरः । एतदुक्तं महाराज बकुलार्कस्य वैभवम् ।
ṣaṇmāsātsiddhimāpnoti mokṣaṁ ca labhate naraḥ etaduktaṁ mahārāja bakulārkasya vaibhavam
छह महीनों में मनुष्य सिद्धि प्राप्त करता है और मोक्ष भी पाता है। हे महाराज! बकुलार्क का यह माहात्म्य कहा गया।