ब्रह्म खण्ड · अध्याय 64
गणेश-प्रस्थापना-वर्णन
श्लोक 1 (skanda.3.64.1)
व्यास उवाच । ततो देवैर्नृपश्रेष्ठ रक्षार्थं सत्यमंदिरम् । स्थापितं तत्तदाद्यैव सत्याभिख्या हि सा पुरी
vyāsa uvāca tato devairnṛpaśreṣṭha rakṣārthaṁ satyamaṁdiram sthāpitaṁ tattadādyaiva satyābhikhyā hi sā purī
व्यासजी बोले — हे नृपश्रेष्ठ! तत्पश्चात् देवताओं द्वारा रक्षा के लिए सत्यमंदिर की स्थापना की गई, और तभी से वह नगरी सत्य नाम से प्रसिद्ध हुई।
श्लोक 2 (skanda.3.64.2)
पूर्वं धर्मेश्वरो देवो दक्षिणेन गणाधिपः । पश्चिमे स्थापितो भानुरुत्तरे च स्वयंभुवः
pūrvaṁ dharmeśvaro devo dakṣiṇena gaṇādhipaḥ paścime sthāpito bhānuruttare ca svayaṁbhuvaḥ
पूर्व दिशा में धर्मेश्वर देव, दक्षिण में गणाधिप; पश्चिम में भानु स्थापित थे तथा उत्तर में स्वयंभू (ब्रह्मा)।
श्लोक 3 (skanda.3.64.3)
युधिष्ठिर उवाच । गणेशः स्थापितः केन कस्मात्स्थापितवानसौ । किं नामासौ महाभाग तन्मे कथय मा चिरम्
yudhiṣṭhira uvāca gaṇeśaḥ sthāpitaḥ kena kasmātsthāpitavānasau kiṁ nāmāsau mahābhāga tanme kathaya mā ciram
युधिष्ठिर बोले — गणेश को किसने स्थापित किया तथा किस कारण स्थापित किया? हे महाभाग! वह मुझे बिना विलंब बताइए।
श्लोक 4 (skanda.3.64.4)
व्यास उवाच । अधुनाहं प्रवक्ष्यामि गणेशोत्पत्तिकारणम्
vyāsa uvāca adhunāhaṁ pravakṣyāmi gaṇeśotpattikāraṇam
व्यासजी बोले — अब मैं गणेश की उत्पत्ति का कारण बताता हूँ।
श्लोक 5 (skanda.3.64.5)
समये मिलिताः सर्वे देवता मातरस्तथा । धर्मारण्ये महाराज स्थापितश्चंडिकासुतः
samaye militāḥ sarve devatā mātarastathā dharmāraṇye mahārāja sthāpitaścaṁḍikāsutaḥ
उचित समय पर समस्त देवता तथा मातृगण एकत्र हुए; हे महाराज! धर्मारण्य में चंडिका-पुत्र (गणेश) स्थापित किये गये।
श्लोक 6 (skanda.3.64.6)
आदौ देवैर्नृपश्रेष्ठ भूमौ वै सत्ययोषिताम् । प्राकारश्चाभवत्तत्र पताकाध्वजशोभितः
ādau devairnṛpaśreṣṭha bhūmau vai satyayoṣitām prākāraścābhavattatra patākādhvajaśobhitaḥ
सर्वप्रथम, हे नृपश्रेष्ठ! सत्यनगरी की उस भूमि पर देवताओं द्वारा पताका-ध्वज से सुशोभित एक प्राकार (परकोटा) बनाया गया।
श्लोक 7 (skanda.3.64.7)
ब्राह्मणायतने तत्र प्राकारमण्डलान्तरे । तन्मध्ये रचितं पीठमिष्टकाभिः सुशोभितम्
brāhmaṇāyatane tatra prākāramaṇḍalāntare tanmadhye racitaṁ pīṭhamiṣṭakābhiḥ suśobhitam
वहाँ ब्राह्मणायतन में, प्राकार के घेरे के भीतर, उसके मध्य में ईंटों से सुशोभित एक पीठ का निर्माण किया गया।
श्लोक 8 (skanda.3.64.8)
प्रतोल्यश्च चतस्रो वै शुद्धा एव सतोरणाः । पूर्वे धर्मेश्वरो देवो दक्षिणे गणनायकः
pratolyaśca catasro vai śuddhā eva satoraṇāḥ pūrve dharmeśvaro devo dakṣiṇe gaṇanāyakaḥ
तथा चार शुद्ध तोरणयुक्त द्वार बनाये गये; पूर्व में धर्मेश्वर देव, दक्षिण में गणनायक —
श्लोक 9 (skanda.3.64.9)
पश्चिमे स्थापितो भानुरुत्तरे च स्वयंभुवः । धर्मेश्वरोत्पत्तिवृत्तमाख्यातं तत्तवाग्रतः
paścime sthāpito bhānuruttare ca svayaṁbhuvaḥ dharmeśvarotpattivṛttamākhyātaṁ tattavāgrataḥ
— पश्चिम में भानु स्थापित थे तथा उत्तर में स्वयंभू। धर्मेश्वर की उत्पत्ति का वृत्तांत तुम्हें पहले ही बताया जा चुका है।
श्लोक 10 (skanda.3.64.10)
अधुनाहं प्रवक्ष्यामि गणेशोत्पत्तिहेतुकम् । कदाचित्पार्वती गात्रोद्वर्त्तनं कृतवत्यभूत्
adhunāhaṁ pravakṣyāmi gaṇeśotpattihetukam kadācitpārvatī gātrodvarttanaṁ kṛtavatyabhūt
अब मैं गणेश की उत्पत्ति का कारण बताता हूँ। एक बार पार्वती अपने शरीर पर उबटन लगा रही थीं।
श्लोक 11 (skanda.3.64.11)
मलं तज्जनितं दृष्ट्वा हस्ते धृत्वा स्वगात्रजम् । प्रतिमां च ततः कृत्वा सुरूपं च ददर्श ह
malaṁ tajjanitaṁ dṛṣṭvā haste dhṛtvā svagātrajam pratimāṁ ca tataḥ kṛtvā surūpaṁ ca dadarśa ha
उससे उत्पन्न मैल को देखकर, उसने अपने शरीर से उत्पन्न उस मैल को हाथ में लिया; और फिर उससे एक प्रतिमा बनाकर उसे सुंदर रूप में देखा।
श्लोक 12 (skanda.3.64.12)
जीवं तस्यां च संचार्य उदतिष्ठत्तदग्रतः । मातरं स तदोवाच कि करोमि तवाज्ञया
jīvaṁ tasyāṁ ca saṁcārya udatiṣṭhattadagrataḥ mātaraṁ sa tadovāca ki karomi tavājñayā
उसमें जीव का संचार करने पर वह उसके आगे उठकर खड़ा हो गया; उसने तब माता से कहा — "आपकी आज्ञा से मैं क्या करूँ?"
श्लोक 13 (skanda.3.64.13)
पार्वत्युवाच । यावत्स्नानं करिष्यामि तावत्त्वं द्वारि तिष्ठ मे । आयुधानि च सर्वाणि परश्वादीनि यानि तु
pārvatyuvāca yāvatsnānaṁ kariṣyāmi tāvattvaṁ dvāri tiṣṭha me āyudhāni ca sarvāṇi paraśvādīni yāni tu
पार्वती बोलीं — जब तक मैं स्नान करूँ, तब तक तुम मेरे द्वार पर खड़े रहो; तथा परशु आदि जो भी आयुध हैं, उन्हें धारण करो —
श्लोक 14 (skanda.3.64.14)
त्वयि तिष्ठति मद्द्वारे कोऽपि विघ्नं करोतु न । एवमुक्तो महादेव्या द्वारेऽतिष्ठत्स सायुधः
tvayi tiṣṭhati maddvāre ko'pi vighnaṁ karotu na evamukto mahādevyā dvāre'tiṣṭhatsa sāyudhaḥ
"— तुम्हारे मेरे द्वार पर खड़े रहते हुए कोई भी विघ्न न कर सके।" महादेवी द्वारा ऐसा कहे जाने पर वह आयुधों सहित द्वार पर खड़ा हो गया।
श्लोक 15 (skanda.3.64.15)
एतस्मिन्नंतरे देवो महादेवो जगाम ह । आभ्यंतरे प्रवेष्टुं च मतिं दध्रे महेश्वरः
etasminnaṁtare devo mahādevo jagāma ha ābhyaṁtare praveṣṭuṁ ca matiṁ dadhre maheśvaraḥ
इसी बीच महादेव वहाँ आ पहुँचे; और महेश्वर ने भीतर प्रवेश करने का विचार किया।
श्लोक 16 (skanda.3.64.16)
द्वारस्थेन गणेशेन प्रवेशोदायि तस्य न । ततः क्रुद्धो महादेवः परस्परमयुध्यत
dvārasthena gaṇeśena praveśodāyi tasya na tataḥ kruddho mahādevaḥ parasparamayudhyata
द्वार पर खड़े गणेश ने उन्हें प्रवेश नहीं करने दिया। तब क्रोधित महादेव उनसे परस्पर युद्ध करने लगे।
श्लोक 17 (skanda.3.64.17)
युद्धं कृत्वा ततश्चोभौ परस्परवधैषिणौ । परशुं जघ्निवान्देव ललाटे परमे शुभम्
yuddhaṁ kṛtvā tataścobhau parasparavadhaiṣiṇau paraśuṁ jaghnivāndeva lalāṭe parame śubham
युद्ध करते हुए वे दोनों परस्पर वध की इच्छा करने लगे; उस देव (गणेश) ने परशु से उनके अत्यंत शुभ ललाट पर प्रहार किया।
श्लोक 18 (skanda.3.64.18)
ततो देवो महादेवः शूलमुद्यम्य चाहनत् । शिरश्चिच्छेद शूलेन तद्भूमौ निपपात ह
tato devo mahādevaḥ śūlamudyamya cāhanat śiraściccheda śūlena tadbhūmau nipapāta ha
तब देव महादेव ने शूल उठाकर प्रहार किया; शूल से उन्होंने सिर काट दिया, जो भूमि पर गिर पड़ा।
श्लोक 19 (skanda.3.64.19)
तं दृष्ट्वा पतितं पुत्रं पार्वती प्ररुरोद ह । हाहाकारो महानासीत्तदा तत्र निपातिते
taṁ dṛṣṭvā patitaṁ putraṁ pārvatī praruroda ha hāhākāro mahānāsīttadā tatra nipātite
अपने गिरे हुए पुत्र को देखकर पार्वती फूट-फूटकर रोने लगीं; उसके गिरने पर वहाँ महान हाहाकार मच गया।
श्लोक 20 (skanda.3.64.20)
पार्वतीं विकलां दृष्ट्वा देवदेवो महेश्वरः । चिंतयामास देवोऽपि किं कृतं वा मुधा मया
pārvatīṁ vikalāṁ dṛṣṭvā devadevo maheśvaraḥ ciṁtayāmāsa devo'pi kiṁ kṛtaṁ vā mudhā mayā
पार्वती को विह्वल देखकर देवदेव महेश्वर ने भी सोचा — "यह मैंने व्यर्थ ही क्या कर दिया?"
श्लोक 21 (skanda.3.64.21)
एतस्मिन्नंतरे तत्र गजासुरमपश्यत । तं दृष्ट्वा च महादैत्यं सर्वलोकैकपूजितः
etasminnaṁtare tatra gajāsuramapaśyata taṁ dṛṣṭvā ca mahādaityaṁ sarvalokaikapūjitaḥ
इसी बीच उन्होंने वहाँ गजासुर को देखा; उस महादैत्य को देखकर, समस्त लोकों द्वारा एकमात्र पूजित वे शिव —
श्लोक 22 (skanda.3.64.22)
जघ्निवांस्तच्छिरो गृह्य पार्वत्या कृतमर्भकम् । उत्तस्थौ सगणस्तत्र महादेवस्य सन्निधौ
jaghnivāṁstacchiro gṛhya pārvatyā kṛtamarbhakam uttasthau sagaṇastatra mahādevasya sannidhau
— ने उसका वध कर, उसका सिर लेकर पार्वती द्वारा बनाये गये उस बालक पर लगा दिया; और वह गणों सहित महादेव के समक्ष उठकर खड़ा हो गया।
श्लोक 23 (skanda.3.64.23)
ततो नाम चकारास्य गजानन इति स्फुटम् । सुराः सर्वे च संपृक्ता हर्षिता मुनयस्तथा
tato nāma cakārāsya gajānana iti sphuṭam surāḥ sarve ca saṁpṛktā harṣitā munayastathā
तब उसका नाम स्पष्ट रूप से गजानन रखा गया; समस्त देवगण एकत्र हुए तथा मुनिगण भी हर्षित हुए।
श्लोक 24 (skanda.3.64.24)
स्तुवंति स्तुतिभिः शश्वत्कुटुम्बकुशलंकरम् । विक्रीणाति कुटुम्बं यो मोदकार्थं समर्चके
stuvaṁti stutibhiḥ śaśvatkuṭumbakuśalaṁkaram vikrīṇāti kuṭumbaṁ yo modakārthaṁ samarcake
वे उसकी सदा स्तुति करते हैं, जो कुटुंब का कल्याण करने वाला है — जो अपने पूजक के लिए मोदक हेतु मानो अपना कुटुंब भी बेच डाले, अर्थात् अपने भक्त पर अत्यंत प्रसन्न होता है।
श्लोक 25 (skanda.3.64.25)
दक्षिणस्यां प्रतोल्यां तमेकदंतं च पीवरम् । आर्चयच्च महादेवं स्वयंभूः सुरपूजितम्
dakṣiṇasyāṁ pratolyāṁ tamekadaṁtaṁ ca pīvaram ārcayacca mahādevaṁ svayaṁbhūḥ surapūjitam
दक्षिण द्वार पर उस एकदंत तथा स्थूल महादेव की, जो देवताओं द्वारा पूजित हैं, स्वयंभू ने पूजा की।
श्लोक 26 (skanda.3.64.26)
जटिलं वामनं चैव नागयज्ञोपवीतकम् । त्र्यक्षं चैव महाकायं करध्वजकुठारकम्
jaṭilaṁ vāmanaṁ caiva nāgayajñopavītakam tryakṣaṁ caiva mahākāyaṁ karadhvajakuṭhārakam
जटाधारी, वामन, नागयज्ञोपवीतधारी; त्रिनेत्र, महाकाय तथा हाथ में ध्वज सहित कुठार धारण किये हुए।
श्लोक 27 (skanda.3.64.27)
दधानं कमलं हस्ते सर्वविप्रविनाशनम् । रक्षणाय च लोकानां नगराद्दक्षिणाश्रितम्
dadhānaṁ kamalaṁ haste sarvavipravināśanam rakṣaṇāya ca lokānāṁ nagarāddakṣiṇāśritam
कमल हाथ में धारण किये हुए, समस्त विघ्नों का नाश करने वाले; नगर के दक्षिण भाग में लोकों की रक्षा के लिए स्थित।
श्लोक 28 (skanda.3.64.28)
सुप्रसन्नं गणाध्यक्षं सिद्धिबुद्धिनमस्कृतम् । सिंदूराभं सुरश्रेष्ठं तीव्रांकुशधरं शुभम्
suprasannaṁ gaṇādhyakṣaṁ siddhibuddhinamaskṛtam siṁdūrābhaṁ suraśreṣṭhaṁ tīvrāṁkuśadharaṁ śubham
सदा प्रसन्न, गणाध्यक्ष, सिद्धि और बुद्धि द्वारा नमस्कृत; सिंदूर के समान वर्ण वाले, देवश्रेष्ठ, तीक्ष्ण अंकुश धारण करने वाले, शुभ।
श्लोक 29 (skanda.3.64.29)
शतपुष्पैः शुभैः पुष्पैरर्चितं ह्यमराधिपः । प्रणम्य च महाभक्त्या तुष्टुवु स्तं सुरास्ततः
śatapuṣpaiḥ śubhaiḥ puṣpairarcitaṁ hyamarādhipaḥ praṇamya ca mahābhaktyā tuṣṭuvu staṁ surāstataḥ
अमराधिप (इन्द्र) द्वारा सौ शुभ पुष्पों से पूजित; तथा महाभक्ति से प्रणाम कर देवताओं ने तब उनकी स्तुति की।
श्लोक 30 (skanda.3.64.30)
देवा ऊचुः । नमस्तेस्तु सुरेशाय गणानां पतये नमः । गजानन नमस्तुभ्यं महादेवाधिदैवत
devā ūcuḥ namastestu sureśāya gaṇānāṁ pataye namaḥ gajānana namastubhyaṁ mahādevādhidaivata
देवगण बोले — हे सुरेश! आपको नमस्कार है; हे गणों के पति! आपको नमस्कार है। हे गजानन! आपको नमस्कार है, हे महादेव के भी अधिदैवत!
श्लोक 31 (skanda.3.64.31)
भक्तिप्रियाय देवाय गणाध्यक्ष नमोस्तु ते । इत्येतैश्च शुभैः स्तोत्रैः स्तूयमानो गणाधिपः । सुप्रीतश्च गणाध्यक्षः तदाऽसौ वाक्यमब्रवीत्
bhaktipriyāya devāya gaṇādhyakṣa namostu te ityetaiśca śubhaiḥ stotraiḥ stūyamāno gaṇādhipaḥ suprītaśca gaṇādhyakṣaḥ tadā'sau vākyamabravīt
हे भक्तिप्रिय देव! हे गणाध्यक्ष! आपको नमस्कार है। इन शुभ स्तोत्रों से स्तुत होकर, अत्यंत प्रसन्न हुए गणाध्यक्ष ने तब यह वचन कहा।
श्लोक 32 (skanda.3.64.32)
गणाध्यक्ष उवाच । तुष्टोऽहं वो सुरा ब्रूत वांछितं च ददामि वः
gaṇādhyakṣa uvāca tuṣṭo'haṁ vo surā brūta vāṁchitaṁ ca dadāmi vaḥ
गणाध्यक्ष बोले — हे देवगण! मैं तुमसे प्रसन्न हूँ; कहो, मैं तुम्हारी अभीष्ट वस्तु दूँगा।
श्लोक 33 (skanda.3.64.33)
देवा ऊचुः । त्वमत्रस्थो महाभाग कुरु कार्यं च नः प्रभो । धर्मारण्ये च विप्राणां वणिग्जननिवासिनाम्
devā ūcuḥ tvamatrastho mahābhāga kuru kāryaṁ ca naḥ prabho dharmāraṇye ca viprāṇāṁ vaṇigjananivāsinām
देवगण बोले — हे महाभाग! हे प्रभो! आप यहीं स्थित रहकर हमारा यह कार्य कीजिए — धर्मारण्य में निवास करने वाले ब्राह्मणों तथा वणिकजनों के लिए —
श्लोक 34 (skanda.3.64.34)
ब्रह्मचर्यादियुक्तानां धार्मिकाणां गणेश्वर । वर्णाश्रमेतराणां च रक्षिता भव सर्वदा
brahmacaryādiyuktānāṁ dhārmikāṇāṁ gaṇeśvara varṇāśrametarāṇāṁ ca rakṣitā bhava sarvadā
"— हे गणेश्वर! ब्रह्मचर्य आदि से युक्त धार्मिक जनों की तथा वर्णाश्रम एवं अन्य सभी की सदा रक्षा करने वाले बनो।"
श्लोक 35 (skanda.3.64.35)
त्वत्प्रसादान्महाभाग धनसौख्ययुता द्विजाः । भवंतु सर्वे सततं वणिजश्च महाबलाः
tvatprasādānmahābhāga dhanasaukhyayutā dvijāḥ bhavaṁtu sarve satataṁ vaṇijaśca mahābalāḥ
"हे महाभाग! तुम्हारी कृपा से समस्त द्विज सदा धन-सौख्य से युक्त रहें तथा वणिक् सदा महाबली रहें।"
श्लोक 36 (skanda.3.64.36)
रक्षितव्यास्त्वया देव यावच्चंद्रार्कमेदिनी । एवमस्त्विति सोवादीद्गणनाथो महेश्वरः
rakṣitavyāstvayā deva yāvaccaṁdrārkamedinī evamastviti sovādīdgaṇanātho maheśvaraḥ
"हे देव! जब तक चंद्र, सूर्य और पृथ्वी रहें, तब तक तुम इनकी रक्षा करना।" "ऐसा ही हो" — यह गणनाथ महेश्वर ने कहा।
श्लोक 37 (skanda.3.64.37)
देवाश्च हर्षमापन्नाः पूजयंति गणाधिपम् । ततो देवा मुदा युक्ताः पुष्पधूपादितर्पणैः
devāśca harṣamāpannāḥ pūjayaṁti gaṇādhipam tato devā mudā yuktāḥ puṣpadhūpāditarpaṇaiḥ
तथा हर्षित होकर देवगण गणाधिप की पूजा करने लगे; तत्पश्चात् प्रसन्नतापूर्वक देवगण पुष्प-धूप आदि से तर्पण करते हुए —
श्लोक 38 (skanda.3.64.38)
ये चान्ये मनुजा लोके निर्विघ्नार्थं च पूजयन्
ye cānye manujā loke nirvighnārthaṁ ca pūjayan
— तथा संसार में जो अन्य मनुष्य हैं, वे भी विघ्नरहित होने के लिए उनकी पूजा करते हैं।
श्लोक 39 (skanda.3.64.39)
विवाहोत्सवयज्ञेषु पूर्वमाराधितो भवेत् । धर्मारण्योद्भवानां च प्रसन्नो भव सर्वदा
vivāhotsavayajñeṣu pūrvamārādhito bhavet dharmāraṇyodbhavānāṁ ca prasanno bhava sarvadā
विवाह, उत्सव तथा यज्ञों में सबसे पहले उनकी आराधना की जानी चाहिए; तथा वे धर्मारण्य में उत्पन्न जनों पर सदा प्रसन्न रहें।