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ब्रह्म खण्ड · अध्याय 63

लोलजिह्वासुर-वध और सत्यमंदिर-संस्थापन

अध्याय 62अध्याय-सूचीअध्याय 64

श्लोक 1 (skanda.3.63.1)

युधिष्ठिर उवाच । अतः परं किमभवद्ब्रवीतु द्विजसत्तम । त्वद्वचनामृतं पीत्वा तृप्तिर्नास्ति मम प्रभो

yudhiṣṭhira uvāca ataḥ paraṁ kimabhavadbravītu dvijasattama tvadvacanāmṛtaṁ pītvā tṛptirnāsti mama prabho

युधिष्ठिर बोले — हे द्विजसत्तम! इसके आगे क्या हुआ, कहिए। हे प्रभो! आपके वचनामृत को पीकर भी मुझे तृप्ति नहीं है।

श्लोक 2 (skanda.3.63.2)

व्यास उवाच । अथ किंचिद्गते काले युगांतसमये सति । त्रेतादौ लोलजिह्वाक्ष अभवद्राक्षसेश्वरः

vyāsa uvāca atha kiṁcidgate kāle yugāṁtasamaye sati tretādau lolajihvākṣa abhavadrākṣaseśvaraḥ

व्यासजी बोले — तत्पश्चात् कुछ समय बीतने पर, युगांत के समय, त्रेता के आरंभ में, लोलजिह्वाक्ष नामक एक राक्षसराज उत्पन्न हुआ।

श्लोक 3 (skanda.3.63.3)

तेन विद्रावितं सर्वं त्रैलोक्यं सचराचरम् । जित्वा स सकलाँल्लोकान्धर्मारण्ये समागतः

tena vidrāvitaṁ sarvaṁ trailokyaṁ sacarācaram jitvā sa sakalā̐llokāndharmāraṇye samāgataḥ

उसके द्वारा चराचर त्रिलोक भयभीत होकर तितर-बितर हो गया; समस्त लोकों को जीतकर वह धर्मारण्य में आ पहुँचा।

श्लोक 4 (skanda.3.63.4)

तद्दृष्ट्वा सकलं पुण्यं रम्यं द्विजनिषे वितम् । ब्रह्मद्वेषाच्च तेनैव दाहितं च पुरं शुभम्

taddṛṣṭvā sakalaṁ puṇyaṁ ramyaṁ dvijaniṣe vitam brahmadveṣācca tenaiva dāhitaṁ ca puraṁ śubham

उस समस्त पुण्यमय, रमणीय तथा द्विजसेवित स्थान को देखकर, ब्रह्म-द्वेष के कारण उसने उस शुभ नगर को जला दिया।

श्लोक 5 (skanda.3.63.5)

दह्यमानं पुरं दृष्ट्वा प्रणष्टा द्विजसत्तमाः । यथागतं प्रजग्मुस्ते धर्मारण्यनिवासिनः

dahyamānaṁ puraṁ dṛṣṭvā praṇaṣṭā dvijasattamāḥ yathāgataṁ prajagmuste dharmāraṇyanivāsinaḥ

नगर को जलता देखकर श्रेष्ठ द्विज भाग गये; धर्मारण्य के वे निवासी जहाँ से आये थे, वहीं लौट गये।

श्लोक 6 (skanda.3.63.6)

श्रीमाताद्यास्तदा देव्यः कोपिता राक्षसेन वै । घातयंत्येव शब्देन तर्जयित्वा च राक्षसम्

śrīmātādyāstadā devyaḥ kopitā rākṣasena vai ghātayaṁtyeva śabdena tarjayitvā ca rākṣasam

तब श्रीमाता आदि देवियाँ राक्षस से क्रोधित होकर, उसे धमकाते हुए अपनी गर्जना से ही उसका वध करने लगीं।

श्लोक 7 (skanda.3.63.7)

समुच्छ्रितास्तदा देव्यः शतशोऽथ सह स्रशः । त्रिशूलवरधारिण्यः शंखचक्रगदाधराः

samucchritāstadā devyaḥ śataśo'tha saha sraśaḥ triśūlavaradhāriṇyaḥ śaṁkhacakragadādharāḥ

तब सैकड़ों-हजारों देवियाँ उठ खड़ी हुईं, उत्तम त्रिशूल धारण किये हुए, शंख-चक्र-गदा धारण करने वाली।

श्लोक 8 (skanda.3.63.8)

कमंडलुधराः काश्चित्कशाखङ्गधराः पराः । पाशांकुशधरा काचित्खड्गखेटकधारिणी

kamaṁḍaludharāḥ kāścitkaśākhaṅgadharāḥ parāḥ pāśāṁkuśadharā kācitkhaḍgakheṭakadhāriṇī

कोई कमंडलु धारण किये हुए, कोई कोड़ा और खड्ग धारण किये हुए; कोई पाश-अंकुश धारण किये हुए, कोई खड्ग-ढाल धारण किये हुए।

श्लोक 9 (skanda.3.63.9)

काचित्परशुहस्ता च दिव्यायुधधरा परा । नानाभरणभूषाढ्या नानारत्नाभिशोभिता

kācitparaśuhastā ca divyāyudhadharā parā nānābharaṇabhūṣāḍhyā nānāratnābhiśobhitā

कोई हाथ में परशु लिये हुए, कोई दिव्य आयुध धारण किये हुए; विविध आभूषणों से समृद्ध तथा विविध रत्नों से सुशोभित।

श्लोक 10 (skanda.3.63.10)

राक्षसानां विनाशाय ब्राह्मणानां हिताय च । आजग्मुस्तत्र यत्रास्ते लोलजिह्वो हि राक्षसः

rākṣasānāṁ vināśāya brāhmaṇānāṁ hitāya ca ājagmustatra yatrāste lolajihvo hi rākṣasaḥ

राक्षसों के विनाश तथा ब्राह्मणों के हित के लिए, वे वहाँ पहुँचीं जहाँ लोलजिह्व नामक राक्षस था।

श्लोक 11 (skanda.3.63.11)

महादंष्ट्रो महाकायो विद्युज्जिह्वो भयंकरः । दृष्ट्वा ता राक्षसो घोरं सिंहनादमथाकरोत्

mahādaṁṣṭro mahākāyo vidyujjihvo bhayaṁkaraḥ dṛṣṭvā tā rākṣaso ghoraṁ siṁhanādamathākarot

विशाल दाढ़ों वाला, विशालकाय, विद्युत् जैसी जिह्वा वाला, भयंकर वह राक्षस उन्हें देखकर घोर सिंहनाद करने लगा।

श्लोक 12 (skanda.3.63.12)

तेन नादेन महता त्रासितं भुवनत्रयम् । आपूरिता दिशः सर्वाः क्षुभितानेकसागराः

tena nādena mahatā trāsitaṁ bhuvanatrayam āpūritā diśaḥ sarvāḥ kṣubhitānekasāgarāḥ

उस महानाद से त्रिभुवन भयभीत हो उठा; सभी दिशाएँ उससे भर गईं और अनेक सागर क्षुब्ध हो उठे।

श्लोक 13 (skanda.3.63.13)

कोलाहलो महानासीद्धर्मारण्ये तदा नृप । तच्छ्रुत्वा वासवेनाथ प्रेषितो नलकूबरः

kolāhalo mahānāsīddharmāraṇye tadā nṛpa tacchrutvā vāsavenātha preṣito nalakūbaraḥ

हे राजन्! तब धर्मारण्य में महान कोलाहल मच गया; उसे सुनकर वासव (इन्द्र) ने नलकूबर को भेजा।

श्लोक 14 (skanda.3.63.14)

किमिदं पश्य गत्वा त्वं दृष्ट्वा मह्यं निवेदय । तत्तस्य वचनं श्रुत्वा गतो वै नलकूबरः

kimidaṁ paśya gatvā tvaṁ dṛṣṭvā mahyaṁ nivedaya tattasya vacanaṁ śrutvā gato vai nalakūbaraḥ

"जाकर देखो यह क्या है, तथा देखकर मुझे बताओ।" उसका यह वचन सुनकर नलकूबर वहाँ गया।

श्लोक 15 (skanda.3.63.15)

दृष्ट्वा तत्र महायुद्धं श्रीमातालोलजिह्वयोः । यथादृष्टं यथाजातं शक्राग्रे स न्यवेदयत्

dṛṣṭvā tatra mahāyuddhaṁ śrīmātālolajihvayoḥ yathādṛṣṭaṁ yathājātaṁ śakrāgre sa nyavedayat

वहाँ श्रीमाता और लोलजिह्व के बीच होते महायुद्ध को देखकर, उसने जैसा देखा और जैसा घटित हुआ, वैसा ही इन्द्र के समक्ष निवेदन किया।

श्लोक 16 (skanda.3.63.16)

उद्वेजयति लोकांस्त्रीन्धर्मारण्यमितो गतः । तच्छ्रुत्वा वासवो विष्णुं निवेद्य क्षितिमागमत्

udvejayati lokāṁstrīndharmāraṇyamito gataḥ tacchrutvā vāsavo viṣṇuṁ nivedya kṣitimāgamat

"वह तीनों लोकों को त्रस्त कर रहा है, और यहाँ धर्मारण्य में जा पहुँचा है।" यह सुनकर वासव ने विष्णु को सूचित करके पृथ्वी पर आगमन किया।

श्लोक 17 (skanda.3.63.17)

दाहितं तत्पुरं रम्यं देवानामपि दुर्लभम् । न दृष्टा वाडवास्तत्र गताः सर्वे दिशो दश

dāhitaṁ tatpuraṁ ramyaṁ devānāmapi durlabham na dṛṣṭā vāḍavāstatra gatāḥ sarve diśo daśa

वह रमणीय नगर, जो देवताओं के लिए भी दुर्लभ था, जला दिया गया था; वहाँ कोई ब्राह्मण दिखाई नहीं दिये, सभी दसों दिशाओं में चले गये थे।

श्लोक 18 (skanda.3.63.18)

श्रीमाता योगिनी तत्र कुरुते युद्धमुत्तमम् । हाहाभूता प्रजा सर्वा इतश्चेतश्च धावति

śrīmātā yoginī tatra kurute yuddhamuttamam hāhābhūtā prajā sarvā itaścetaśca dhāvati

वहाँ योगिनी श्रीमाता उत्तम युद्ध कर रही थीं; और समस्त प्रजा हाहाकार करती हुई इधर-उधर भाग रही थी।

श्लोक 19 (skanda.3.63.19)

तच्छ्रुत्वा वासुदेवो हि गृहीत्वा च सुदर्शनम् । सत्यलोकात्तदा राजन्समागच्छन्महीतले

tacchrutvā vāsudevo hi gṛhītvā ca sudarśanam satyalokāttadā rājansamāgacchanmahītale

यह सुनकर वासुदेव ने सुदर्शन चक्र धारण कर, हे राजन्! सत्यलोक से पृथ्वीतल पर आगमन किया।

श्लोक 20 (skanda.3.63.20)

धर्मारण्यं ततो गत्वा तच्चक्रं प्रमुमोच ह । लोलजिह्वस्तदा रक्षो मूर्च्छितो निपपात ह

dharmāraṇyaṁ tato gatvā taccakraṁ pramumoca ha lolajihvastadā rakṣo mūrcchito nipapāta ha

तत्पश्चात् धर्मारण्य में जाकर उन्होंने वह चक्र छोड़ा। तब लोलजिह्व राक्षस मूर्च्छित होकर गिर पड़ा।

श्लोक 21 (skanda.3.63.21)

त्रिशूलेन ततो भिन्नः शक्तिभिः क्रोधमूर्च्छितः । हन्यमानस्तदा रक्षः प्राणांस्त्यक्त्वा दिवं गतः

triśūlena tato bhinnaḥ śaktibhiḥ krodhamūrcchitaḥ hanyamānastadā rakṣaḥ prāṇāṁstyaktvā divaṁ gataḥ

तब त्रिशूल और शक्तियों से बिंधकर, क्रोध से मूर्च्छित होकर, आहत होते हुए वह राक्षस प्राण त्यागकर स्वर्ग को चला गया।

श्लोक 22 (skanda.3.63.22)

ततो देवाः सगंधर्वा हर्षनिर्भरमानसाः । तुष्टुवुस्तं जगन्नाथं सत्यलोकात्समागताः

tato devāḥ sagaṁdharvā harṣanirbharamānasāḥ tuṣṭuvustaṁ jagannāthaṁ satyalokātsamāgatāḥ

तब देवगण गंधर्वों सहित, हर्ष से भरे हुए मन से, सत्यलोक से आये हुए, उस जगन्नाथ की स्तुति करने लगे।

श्लोक 23 (skanda.3.63.23)

उद्वसं तत्समालोक्य विष्णुर्वचनमब्रवीत् । क्व च ते ब्राह्मणाः सर्वे ऋषीणामाश्रमे पुनः

udvasaṁ tatsamālokya viṣṇurvacanamabravīt kva ca te brāhmaṇāḥ sarve ṛṣīṇāmāśrame punaḥ

उस स्थान को उजड़ा देखकर विष्णु ने यह वचन कहा — "वे सभी ब्राह्मण कहाँ हैं? उन्हें पुनः ऋषियों के आश्रमों में लाओ।"

श्लोक 24 (skanda.3.63.24)

ततो देवाः सगं धर्वा इतस्ततः पलायितान् । संशोध्य तरसा राजन्ब्राह्मणानिदमब्रुवन्

tato devāḥ sagaṁ dharvā itastataḥ palāyitān saṁśodhya tarasā rājanbrāhmaṇānidamabruvan

तब देवगण गंधर्वों सहित, हे राजन्! इधर-उधर भागे हुए ब्राह्मणों को शीघ्रता से खोजकर उनसे यह कहा।

श्लोक 25 (skanda.3.63.25)

श्रूयतां नो वचो विप्रा निहतो राक्षसाधमः । वासुदेवेन देवेन चक्रेण निरकृंतत

śrūyatāṁ no vaco viprā nihato rākṣasādhamaḥ vāsudevena devena cakreṇa nirakṛṁtata

"हे विप्रो! हमारा वचन सुनो, वह अधम राक्षस मारा जा चुका है; भगवान वासुदेव द्वारा चक्र से उसे काट दिया गया।"

श्लोक 26 (skanda.3.63.26)

तच्छ्रुत्वा वाडवाः सर्वे प्रहर्षोत्फुल्ललोचनाः । समाजग्मुस्तदा राजन्स्वस्वस्थाने समाविशन्

tacchrutvā vāḍavāḥ sarve praharṣotphullalocanāḥ samājagmustadā rājansvasvasthāne samāviśan

यह सुनकर सभी ब्राह्मण अत्यंत हर्ष से खिले हुए नेत्रों वाले होकर, हे राजन्! एकत्र होकर अपने-अपने स्थान में प्रविष्ट हुए।

श्लोक 27 (skanda.3.63.27)

श्रीकांताय तदा राजन्वाक्यमुक्तं मनोरमम् । यस्मात्त्वं सत्यलोकाच्च आगतोऽसि जगत्प्रभुः । स्थापितं च पुरं चेदं हिताय च द्विजात्मनाम्

śrīkāṁtāya tadā rājanvākyamuktaṁ manoramam yasmāttvaṁ satyalokācca āgato'si jagatprabhuḥ sthāpitaṁ ca puraṁ cedaṁ hitāya ca dvijātmanām

तब हे राजन्! श्रीकांत (विष्णु) से मनोहर वचन कहा गया — "चूँकि आप सत्यलोक से आये हैं, हे जगत्प्रभो! और द्विजों के हित के लिए यह नगर पुनः स्थापित किया है —"

श्लोक 28 (skanda.3.63.28)

सत्यमंदिरमिति ख्यातं तदा लोके भविष्यति । कृते युगे धर्मारण्यं त्रेतायां सत्यमंदिरम्

satyamaṁdiramiti khyātaṁ tadā loke bhaviṣyati kṛte yuge dharmāraṇyaṁ tretāyāṁ satyamaṁdiram

"— यह अब से लोक में सत्यमंदिर नाम से विख्यात होगा। कृतयुग में धर्मारण्य और त्रेतायुग में सत्यमंदिर के नाम से।"

श्लोक 29 (skanda.3.63.29)

तच्छ्रुत्वा वासुदेवेन तथेति प्रतिपद्य च । ततस्ते वाडवाः सर्वे पुत्रपौत्रसमन्विताः

tacchrutvā vāsudevena tatheti pratipadya ca tataste vāḍavāḥ sarve putrapautrasamanvitāḥ

यह सुनकर वासुदेव ने "ऐसा ही हो" कहकर स्वीकार किया। तत्पश्चात् वे सभी द्विज पुत्र-पौत्रों सहित —

श्लोक 30 (skanda.3.63.30)

सपत्नीकाः सानुचरा यथापूर्वं न्यवात्सिषुः । तपोयज्ञक्रियाद्येषु वर्तंतेऽध्ययनादिषु

sapatnīkāḥ sānucarā yathāpūrvaṁ nyavātsiṣuḥ tapoyajñakriyādyeṣu vartaṁte'dhyayanādiṣu

— पत्नियों तथा अनुचरों सहित पूर्ववत् वहाँ निवास करने लगे, तप-यज्ञ-क्रिया आदि तथा अध्ययन आदि में लगे रहे।

श्लोक 31 (skanda.3.63.31)

एवं ते सर्वमाख्यातं धर्म वै सत्यमंदिरे

evaṁ te sarvamākhyātaṁ dharma vai satyamaṁdire

इस प्रकार, हे धर्मराज! सत्यमंदिर का यह सम्पूर्ण वृत्तांत तुम्हें कहा गया।

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