ब्रह्म खण्ड · अध्याय 69
श्रीमाता-माहात्म्य
श्लोक 1 (skanda.3.69.1)
।। व्यास उवाच ।। दक्षिणे स्थापिता राजञ्छाँता देवी महाबला । सा विविधाम्बरधरा वनमालाविभूषिता ।
vyāsa uvāca dakṣiṇe sthāpitā rājañchāṁtā devī mahābalā sā vividhāmbaradharā vanamālāvibhūṣitā
व्यासजी ने कहा — हे राजन्! दक्षिण दिशा में महाबला शांता देवी स्थापित हुई, जो विविध वस्त्र धारण करने वाली और वनमाला से विभूषित है।
श्लोक 2 (skanda.3.69.2)
तामसी सा महाराज मधुकैटभनाशिनी । विष्णुना तत्र वै न्यस्ता शिवपत्नी नृपोत्तम ।
tāmasī sā mahārāja madhukaiṭabhanāśinī viṣṇunā tatra vai nyastā śivapatnī nṛpottama
हे महाराज! वह तामसी शक्ति मधु-कैटभ का नाश करने वाली है। हे नृपोत्तम! शिव की पत्नी को ही विष्णु द्वारा वहाँ स्थापित किया गया था।
श्लोक 3 (skanda.3.69.3)
सा चैवाष्टभुजा रम्या मेघश्यामा मनोरमा । कृष्णांबरधरा देवी व्याघ्रवाहनसंस्थिता ।
sā caivāṣṭabhujā ramyā meghaśyāmā manoramā kṛṣṇāṁbaradharā devī vyāghravāhanasaṁsthitā
वह मनोहारी देवी आठ भुजाओं वाली, मेघ के समान श्यामवर्णा, सुंदर, कृष्ण वस्त्र धारण करने वाली और बाघ पर आरूढ़ है।
श्लोक 4 (skanda.3.69.4)
द्वीपिचर्मपरीधाना दिव्याभरणभूषिता । घंटात्रिशूलाक्षमालाकमंडलुधरा शुभा ।
dvīpicarmaparīdhānā divyābharaṇabhūṣitā ghaṁtātriśūlākṣamālākamaṁḍaludharā śubhā
वह चीते की खाल पहने हुए, दिव्य आभूषणों से विभूषित है, और घंटा, त्रिशूल, रुद्राक्षमाला तथा कमंडल धारण करने वाली शुभ देवी है।
श्लोक 5 (skanda.3.69.5)
अलंकृतभुजा देवी सर्वदेवनमस्कृता । धनं धान्यं सुतान्भोगान्स्वभक्तेभ्यः प्रयच्छति ।
alaṁkṛtabhujā devī sarvadevanamaskṛtā dhanaṁ dhānyaṁ sutānbhogānsvabhaktebhyaḥ prayacchati
वह सुसज्जित भुजाओं वाली देवी समस्त देवताओं द्वारा नमस्कृत है, और अपने भक्तों को धन, धान्य, संतान और भोग प्रदान करती है।
श्लोक 6 (skanda.3.69.6)
पूजयेत्कमलैर्दिव्यैः कर्पूरागरुचंदनैः । तदुद्देशेन तत्रैव पूजयेद्द्विजसत्तमान् ।
pūjayetkamalairdivyaiḥ karpūrāgarucaṁdanaiḥ taduddeśena tatraiva pūjayeddvijasattamān
उसकी पूजा दिव्य कमलों, कपूर, अगर और चंदन से करनी चाहिए, तथा उसी उद्देश्य से वहीं श्रेष्ठ ब्राह्मणों की भी पूजा करनी चाहिए।
श्लोक 7 (skanda.3.69.7)
कुमारीर्भोजयेदन्नैर्विविधैर्भक्तिभावतः । धूपैर्दीपैः फलैरम्यैः पूजयेच्च सुरादिभिः ।
kumārīrbhojayedannairvividhairbhaktibhāvataḥ dhūpairdīpaiḥ phalairamyaiḥ pūjayecca surādibhiḥ
भक्तिभाव से युवतियों को विविध अन्नों से भोजन कराना चाहिए, तथा धूप, दीप, सुंदर फलों और देवताओं आदि से उसकी पूजा करनी चाहिए।
श्लोक 8 (skanda.3.69.8)
मांसैस्तु विविधैर्दिव्यैरथवा धान्यपिष्टजैः । अन्यैश्च विविधैर्धान्यैः पायसैर्वटकैस्तथा ।
māṁsaistu vividhairdivyairathavā dhānyapiṣṭajaiḥ anyaiśca vividhairdhānyaiḥ pāyasairvaṭakaistathā
नाना प्रकार के दिव्य मांस अथवा धान्य के आटे से बने पदार्थों से, तथा अन्य विविध धान्यों, खीर और वड़ों से...
श्लोक 9 (skanda.3.69.9)
ओदनैः कृशरापूपैः पूजयेत्सुसमाहितः । स्तुतिपाठेन तत्रैव शक्तिस्तोत्रैर्मनोहरैः ।
odanaiḥ kṛśarāpūpaiḥ pūjayetsusamāhitaḥ stutipāṭhena tatraiva śaktistotrairmanoharaiḥ
...चावल, खिचड़ी और मालपुए से एकाग्रचित्त होकर पूजा करनी चाहिए, तथा वहीं मनोहर शक्ति-स्तोत्रों के पाठ द्वारा स्तुति करनी चाहिए।
श्लोक 10 (skanda.3.69.10)
रिपवस्तस्य नश्यंति सर्वत्र विजयी भवेत् । रणे राजकुले द्यूते लभते जयमंगलम् ।
ripavastasya naśyaṁti sarvatra vijayī bhavet raṇe rājakule dyūte labhate jayamaṁgalam
उसके शत्रु नष्ट हो जाते हैं और वह सर्वत्र विजयी होता है। युद्ध में, राजदरबार में और द्यूत में उसे शुभ विजय प्राप्त होती है।
श्लोक 11 (skanda.3.69.11)
सौम्या शांता महाराज स्थापिता कुलमातृका । श्रीमाता सा प्रसिद्धा च माहात्म्यं शृणु भूपते ।
saumyā śāṁtā mahārāja sthāpitā kulamātṛkā śrīmātā sā prasiddhā ca māhātmyaṁ śṛṇu bhūpate
हे महाराज! वह सौम्य शांता कुलमातृका के रूप में स्थापित हुई है, तथा वह श्रीमाता नाम से प्रसिद्ध है। हे भूपते! उसकी महिमा सुनो।
श्लोक 12 (skanda.3.69.12)
कुलमाता महाशक्तिस्तत्रास्ते नृपसत्तम । कुमारी ब्रह्मपुत्री सा रक्षार्थं विधिना कृता ।
kulamātā mahāśaktistatrāste nṛpasattama kumārī brahmaputrī sā rakṣārthaṁ vidhinā kṛtā
हे नृपसत्तम! वह महाशक्ति कुलमाता वहाँ निवास करती है; वह ब्रह्मा की कुमारी पुत्री है, जिसे विधाता ने रक्षा के लिए बनाया।
श्लोक 13 (skanda.3.69.13)
स्थानमाता च सा देवी श्रीमाता साभिधानतः । त्रिरूपा सा द्विजातीनां निर्मिता रक्षणाय च ।
sthānamātā ca sā devī śrīmātā sābhidhānataḥ trirūpā sā dvijātīnāṁ nirmitā rakṣaṇāya ca
वह उस स्थान की माता देवी है और नाम से श्रीमाता कहलाती है। वह त्रिरूपा है, और द्विजातियों की रक्षा के लिए ही बनाई गई है।
श्लोक 14 (skanda.3.69.14)
कमण्डलुधरा देवी घण्टाभरणभूषिता । अक्षमालायुता राजञ्छुभा सा शुभरूपिणी ।
kamaṇḍaludharā devī ghaṇṭābharaṇabhūṣitā akṣamālāyutā rājañchubhā sā śubharūpiṇī
वह कमंडल धारण करने वाली देवी है, घंटा-आभूषण से विभूषित है। हे राजन्! अक्षमाला से युक्त वह शुभ, शुभरूपिणी देवी है।
श्लोक 15 (skanda.3.69.15)
कुमारी चादिमाता च स्थानत्राणकरापि च । दैत्यघ्नी कामदा चैव महामोहविनाशिनी ।
kumārī cādimātā ca sthānatrāṇakarāpi ca daityaghnī kāmadā caiva mahāmohavināśinī
वह कुमारी है, आदिमाता है, और स्थान की रक्षा करने वाली भी है। वह दैत्यों की संहारिका, इच्छाओं को पूर्ण करने वाली और महामोह का नाश करने वाली है।
श्लोक 16 (skanda.3.69.16)
भक्तिगम्या च सा देवी कुमारी ब्रह्मणः सुता । रक्तांबरधरा साधुरक्तचंदनचर्चिता ।
bhaktigamyā ca sā devī kumārī brahmaṇaḥ sutā raktāṁbaradharā sādhuraktacaṁdanacarcitā
वह देवी केवल भक्ति से सुलभ है, ब्रह्मा की कुमारी पुत्री है, रक्त वस्त्र धारण करने वाली है और लाल चंदन से सुसज्जित है।
श्लोक 17 (skanda.3.69.17)
रक्तमाल्या दशभुजा पंचवक्त्रा सुरेश्वरी । चंद्रावतंसिका माता सुरा सुरनमस्कृता ।
raktamālyā daśabhujā paṁcavaktrā sureśvarī caṁdrāvataṁsikā mātā surā suranamaskṛtā
वह लाल पुष्पों की माला धारण किए, दस भुजाओं और पाँच मुखों वाली सुरेश्वरी है; चंद्रमा को शिरोभूषण बनाए हुए, वह देवी माता है और देवताओं द्वारा नमस्कृत है।
श्लोक 18 (skanda.3.69.18)
साक्षात्सरस्वतीरूपा रक्षार्थं विधिना कृता । ॐकारा सा महापुण्या काजेशेन विनिर्मिता ।
sākṣātsarasvatīrūpā rakṣārthaṁ vidhinā kṛtā oṁkārā sā mahāpuṇyā kājeśena vinirmitā
वह साक्षात सरस्वती का रूप है, जिसे विधाता ने रक्षा के लिए बनाया। वह ओंकार-स्वरूपा, महापुण्यमयी है, जिसे कज-ईश द्वारा निर्मित किया गया।
श्लोक 19 (skanda.3.69.19)
ऋषिभिः सिद्धयक्षादिसुरपन्नगमानवैः । प्रणम्यांघ्रियुगा तेभ्यो ददाति मनसेप्सितम् ।
ṛṣibhiḥ siddhayakṣādisurapannagamānavaiḥ praṇamyāṁghriyugā tebhyo dadāti manasepsitam
ऋषियों, सिद्धों, यक्षों, देवताओं, नागों और मनुष्यों द्वारा जिसके दोनों चरणों को प्रणाम किया जाता है, वह उन्हें उनकी मनोवांछित वस्तु प्रदान करती है।
श्लोक 20 (skanda.3.69.20)
पालयन्ती च संस्थानं द्विजातीनां हिताय वै । यथौरसान्सुतान्माता पालयन्तीह सद्गुणैः ।
pālayaṁtī ca saṁsthānaṁ dvijātīnāṁ hitāya vai yathaurasānsutānmātā pālayaṁtīha sadguṇaiḥ
वह उस स्थान का पालन द्विजातियों के हित के लिए करती है, जैसे माता अपने सद्गुणों से अपनी सगी संतानों का पालन करती है।
श्लोक 21 (skanda.3.69.21)
अथ पालयती देवी श्रीमाता कुलदेवता । उपद्रवाणि सर्वाणि नाशयेत्सततं स्तुता ।
atha pālayatī devī śrīmātā kuladevatā upadravāṇi sarvāṇi nāśayetsatataṁ stutā
इस प्रकार पालन करती हुई श्रीमाता कुलदेवी है; सदा स्तुत होकर वह सब उपद्रवों का नाश कर देती है।
श्लोक 22 (skanda.3.69.22)
सर्वविघ्नोपशमनी श्रीमाता स्मरणेन हि । विवाहे चोपवीते च सीमंते शुभकर्मणि ।
sarvavighnopaśamanī śrīmātā smaraṇena hi vivāhe copavīte ca sīmaṁte śubhakarmaṇi
श्रीमाता का स्मरण करने मात्र से सब विघ्न शांत हो जाते हैं। विवाह में, उपनयन में, सीमंतोन्नयन में तथा अन्य शुभ कर्मों में...
श्लोक 23 (skanda.3.69.23)
सर्वेषु भक्तकार्येषु श्रीमाता पूज्यते सदा । यथा लंबोदरं देवं पूजयित्वा समारभेत् ।
sarveṣu bhaktakāryeṣu śrīmātā pūjyate sadā yathā laṁbodaraṁ devaṁ pūjayitvā samārabhet
...सभी भक्तों के कार्यों में श्रीमाता की सदा पूजा की जाती है, जैसे लम्बोदर गणेश की पूजा करके ही कार्य आरंभ किया जाता है।
श्लोक 24 (skanda.3.69.24)
कार्यं शुभं सर्वमपि श्रीमातरं तथा नृप । यत्किंचिद्भोजनं त्वत्र ब्राह्मणेभ्यः प्रयच्छति ।
kāryaṁ śubhaṁ sarvamapi śrīmātaraṁ tathā nṛpa yatkiṁcidbhojanaṁ tvatra brāhmaṇebhyaḥ prayacchati
हे राजन्! उसी प्रकार समस्त शुभ कार्य श्रीमाता को अर्पित करके ही आरंभ होने चाहिए। जो भी भोजन वहाँ ब्राह्मणों को दिया जाता है...
श्लोक 25 (skanda.3.69.25)
अथवा विनिवेद्यं च क्रियते यत्परस्परम् । अनिवेद्य च तां राजन्कुर्वाणो विघ्नमेष्यति ।
athavā vinivedyaṁ ca kriyate yatparasparam anivedya ca tāṁ rājankurvāṇo vighnameṣyati
...अथवा जो कुछ भी आपस में व्यवहार किया जाता है, उसे भी पहले उसे अर्पित करना चाहिए। हे राजन्! उसे अर्पित किए बिना कार्य करने वाला विघ्न को प्राप्त होता है।
श्लोक 26 (skanda.3.69.26)
तस्मात्तस्यै निवेद्याथ ततः कर्म समारभेत् । तद्वरेणाखिलं कर्म अविघ्नेन हि सिद्धति । हेमंते शिशिरे प्राप्ते पूजयेद्धर्मपुत्रिकाम् ।
tasmāttasyai nivedyātha tataḥ karma samārabhet tadvareṇākhilaṁ karma avighnena hi siddhati hemaṁte śiśire prāpte pūjayeddharmaputrikām
इसलिए उसे अर्पित करके ही कार्य आरंभ करना चाहिए; उसके वरदान से सम्पूर्ण कार्य निर्विघ्न सिद्ध होता है। हेमंत और शिशिर ऋतु आने पर धर्मपुत्री की पूजा करनी चाहिए।
श्लोक 27 (skanda.3.69.27)
हेमपत्रे समालिख्य राजते वाथ कारयेत् । पादुकां चोत्तमां राजञ्छ्रीमातायै निवेदयेत् ।
hemapatre samālikhya rājate vātha kārayet pādukāṁ cottamāṁ rājañchrīmātāyai nivedayet
उसका चित्र स्वर्ण अथवा चाँदी के पत्र पर बनवाना चाहिए, और हे राजन्! श्रीमाता को एक उत्तम पादुका अर्पित करनी चाहिए।
श्लोक 28 (skanda.3.69.28)
स्नात्वा चैव शुचिर्भूत्वा तिलामलकमिश्रितैः । वासोभिः सुमनोभिश्च दुकूलैः सुमनोहरैः ।
snātvā caiva śucirbhūtvā tilāmalakamiśritaiḥ vāsobhiḥ sumanobhiśca dukūlaiḥ sumanoharaiḥ
स्नान कर पवित्र होकर, तिल और आँवले से मिश्रित उबटन से, तथा सुगंधित पुष्पों और मनोहर उत्तम वस्त्रों से...
श्लोक 29 (skanda.3.69.29)
लेपयेच्चंदनैः शुभ्रैः कुकुमैः सिंदुरासकैः । कर्पूरागुरुकस्तूरीमिश्रितैः कर्द्दमैस्तथा ।
lepayeccaṁdanaiḥ śubhraiḥ kukumaiḥ siṁdurāsakaiḥ karpūrāguruakastūrīmiśritaiḥ karddamaistathā
...उसे श्वेत चंदन, कुंकुम, सिंदूर, तथा कपूर, अगर और कस्तूरी से मिश्रित लेप से चर्चित करना चाहिए।
श्लोक 30 (skanda.3.69.30)
कर्णिकारैश्च कह्लारैः करवीरैः सितारुणैः । चंपकैः केतकीभिश्च जपा कुसुमकैस्तथा ।
karṇikāraiśca kahlāraiḥ karavīraiḥ sitāruṇaiḥ caṁpakaiḥ ketakībhiśca japā kusumakaistathā
कर्णिकार, कह्लार, श्वेत तथा लाल करवीर, चंपा, केतकी और जपाकुसुम (गुड़हल) के फूलों से...
श्लोक 31 (skanda.3.69.31)
यक्षकर्द्दमकैश्चैव विल्वपत्रैरखंडितैः । पालाशजातिपुष्पैश्च वटकैर्माषसंभवैः । पूपभक्तादिदालीभिस्तोषयेच्छाकसंचयैः ।
yakṣakarddamakaiścaiva bilvapatrairakhaṁḍitaiḥ pālāśajātipuṣpaiśca vaṭakairmāṣasaṁbhavaiḥ pūpabhaktādidālībhistoṣayecchākasaṁcayaiḥ
यक्षकर्दम (सुगंधित लेप), अखंडित बिल्वपत्रों, पलाश तथा जाति के फूलों, उड़द के वड़ों, मालपुए, चावल तथा दाल आदि से, और शाक-समूहों से उसे संतुष्ट करना चाहिए।
श्लोक 32 (skanda.3.69.32)
धूपदीपादिपूर्वं तु पूजयेज्जगदंबिकाम् । तद्धियैव कुमारीर्वै विप्रानपि च भोजयेत् । पायसैर्घृतयुक्तैश्च शर्करामिश्रितैर्नृप ।
dhūpadīpādipūrvaṁ tu pūjayejjagadaṁbikām taddhiyaiva kumārīrvai viprānapi ca bhojayet pāyasairghṛtayuktaiśca śarkarāmiśritairnṛpa
धूप-दीप आदि से पहले जगदंबा की पूजा करनी चाहिए। उसी भावना से युवतियों तथा ब्राह्मणों को भी घृत और चीनी मिश्रित खीर से भोजन कराना चाहिए, हे राजन्!
श्लोक 33 (skanda.3.69.33)
पक्वान्नैर्मोदकाद्यैश्च तर्पयेद्भक्तिभावतः । तर्प्यमाणे द्विजैकस्मिन्सहस्रफलमश्नुते ।
pakvānnairmodakādyaiśca tarpayedbhaktibhāvataḥ tarpyamāṇe dvijaikasminsahasraphalamaśnute
पके हुए भोजन और मोदक आदि से भक्तिभाव से तृप्त करना चाहिए। एक ही ब्राह्मण को तृप्त करने पर हजार गुना फल प्राप्त होता है।
श्लोक 34 (skanda.3.69.34)
दैत्यानां घातकं स्तोत्रं वाचयेच्च पुनः पुनः । एकाग्रमानसो भूत्वा श्रीमातरं स्तुवीय यः ।
daityānāṁ ghātakaṁ stotraṁ vācayecca punaḥ punaḥ ekāgramānaso bhūtvā śrīmātaraṁ stuvīya yaḥ
दैत्यों के संहारक स्तोत्र का बार-बार पाठ कराना चाहिए। जो एकाग्रचित्त होकर श्रीमाता की स्तुति करता है...
श्लोक 35 (skanda.3.69.35)
तस्य तुष्टा वरं दद्यात्स्नापिता पूजिता स्तुता । अनिष्टानि च सर्वाणि नाशयेद्धर्मपुत्रिका ।
tasya tuṣṭā varaṁ dadyātsnāpitā pūjitā stutā aniṣṭāni ca sarvāṇi nāśayeddharmaputrikā
— उस पर संतुष्ट होकर, स्नान कराई गई, पूजित और स्तुत की गई वह देवी उसे वरदान देती है। धर्मपुत्री उसके समस्त अनिष्टों का नाश कर देती है।
श्लोक 36 (skanda.3.69.36)
अपुत्रो लभते पुत्रान्निर्धनो धनवान्भवेत् । राज्यार्थी लभते राज्यं विद्यार्थी लभते च ताम् ।
aputro labhate putrānnirdhano dhanavānbhavet rājyārthī labhate rājyaṁ vidyārthī labhate ca tām
पुत्रहीन पुत्र प्राप्त करता है, निर्धन धनवान बनता है; राज्य की इच्छा करने वाला राज्य पाता है, विद्या की इच्छा करने वाला विद्या पाता है।
श्लोक 37 (skanda.3.69.37)
श्रियोर्थी लभते लक्ष्मीं भार्यार्थी लभते च ताम् । प्रसादाच्च सरस्वत्या लभते नात्र संशयः ।
śriyorthī labhate lakṣmīṁ bhāryārthī labhate ca tām prasādācca sarasvatyā labhate nātra saṁśayaḥ
श्री की इच्छा करने वाला लक्ष्मी पाता है, पत्नी की इच्छा करने वाला पत्नी पाता है; सरस्वती की कृपा से वह निःसंदेह सब कुछ प्राप्त करता है।
श्लोक 38 (skanda.3.69.38)
अन्ते च परमं स्थानं यत्सुरैरपि दुर्लभम् । प्राप्नोति पुरुषो नित्यं सरस्वत्याः प्रसादतः ।
aṁte ca paramaṁ sthānaṁ yatsurairapi durlabham prāpnoti puruṣo nityaṁ sarasvatyāḥ prasādataḥ
अंत में, वह उस परम स्थान को भी प्राप्त कर लेता है जो देवताओं को भी दुर्लभ है — यह मनुष्य सरस्वती की कृपा से सदा के लिए प्राप्त करता है।