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ब्रह्म खण्ड · अध्याय 70

मातंगी-कर्णाटक-उपाख्यान

अध्याय 69अध्याय-सूचीअध्याय 71

श्लोक 1 (skanda.3.70.1)

।। रुद्र उवाच ।। शृणु स्कन्द महाप्राज्ञ ह्यद्भुतं यत्कृतं मया । धर्मारण्ये महादुष्टो दैत्यः कर्णाटकाभिधः ।

rudra uvāca śṛṇu skanda mahāprājña hyadbhutaṁ yatkṛtaṁ mayā dharmāraṇye mahāduṣṭo daityaḥ karṇāṭakābhidhaḥ

रुद्र ने कहा — हे स्कंद, महाप्राज्ञ! मैंने जो अद्भुत कार्य किया, वह सुनो। धर्मारण्य में कर्णाटक नामक एक महादुष्ट दैत्य था।

श्लोक 2 (skanda.3.70.2)

निभृतं हि समागत्य दंपत्योर्विघ्नमाचरत् । तं दृष्ट्वा तद्भयाल्लोकः प्रदुद्राव निरन्तरम् ।

nibhṛtaṁ hi samāgatya daṁpatyorvighnamācarat taṁ dṛṣṭvā tadbhayāllokaḥ pradudrāva niraṁtaram

वह गुप्त रूप से आकर वर-वधुओं के लिए विघ्न उत्पन्न करता था। उसे देखकर लोग सदा उसके भय से भाग जाते थे।

श्लोक 3 (skanda.3.70.3)

त्यक्त्वा स्थानं गताः सर्वे वणिजो वाडवादयः । मातंगीरूपमास्थाय श्रीमात्रा त्वनया सुत ।

tyaktvā sthānaṁ gatāḥ sarve vaṇijo vāḍavādayaḥ mātaṁgīrūpamāsthāya śrīmātrā tvanayā suta

व्यापारी और ब्राह्मण आदि सब अपना स्थान छोड़कर चले गए। हे पुत्र! तब इसी श्रीमाता ने मातंगी का रूप धारण किया।

श्लोक 4 (skanda.3.70.4)

हतः कर्णाटको नाम राक्षसो द्विजघातकः । तदा सर्वेऽपि वै विप्रा हृष्टास्ते तेन कर्मणा ।

hataḥ karṇāṭako nāma rākṣaso dvijaghātakaḥ tadā sarve'pi vai viprā hṛṣṭāste tena karmaṇā

और उस ब्राह्मण-हंता राक्षस कर्णाटक का वध कर दिया। उस कार्य से समस्त ब्राह्मणगण अत्यंत प्रसन्न हुए।

श्लोक 5 (skanda.3.70.5)

स्तुवंति पूजयंति स्म वणिजो भक्तितत्पराः । वर्षेवर्षे प्रकुर्वंति श्रीमातापूजनं शुभम् ।

stuvaṁti pūjayaṁti sma vaṇijo bhaktitatparāḥ varṣevarṣe prakurvaṁti śrīmātāpūjanaṁ śubham

भक्तिपरायण व्यापारी उसकी स्तुति और पूजा करने लगे। हर वर्ष वे श्रीमाता की शुभ पूजा करते हैं।

श्लोक 6 (skanda.3.70.6)

शुभकार्येषु सर्वेषु प्रथमं पूजयेत्तु ताम् । न स विघ्नं प्रपश्येत तदाप्रभृति पुत्रक ।

śubhakāryeṣu sarveṣu prathamaṁ pūjayettu tām na sa vighnaṁ prapaśyeta tadāprabhṛti putraka

सब शुभ कार्यों में पहले उसकी पूजा करनी चाहिए; जो ऐसा करता है वह विघ्न नहीं देखता। हे पुत्र! तभी से यह परंपरा चली आ रही है।

श्लोक 7 (skanda.3.70.7)

।। युधिष्ठिर उवाच ।। कोऽसौ दुष्टो महादैत्यः कस्मिन्वंशे समुद्भवः । किं किं तेन कृतं तात सर्वंं कथय सुव्रत ।

yudhiṣṭhira uvāca ko'sau duṣṭo mahādaityaḥ kasminvaṁśe samudbhavaḥ kiṁ kiṁ tena kṛtaṁ tāta sarvaṁ kathaya suvrata

युधिष्ठिर ने कहा — वह दुष्ट महादैत्य कौन था, किस वंश में उत्पन्न हुआ? हे तात, हे सुव्रत! उसने क्या-क्या किया, यह सब मुझे बताइए।

श्लोक 8 (skanda.3.70.8)

।। व्यास उवाच ।। शृणु राजन्प्रवक्ष्यामि कर्णाटकविचेष्टितम् । देवानां दानवानां यो दुःसहो वीर्यदर्पितः ।

vyāsa uvāca śṛṇu rājanpravakṣyāmi karṇāṭakaviceṣṭitam devānāṁ dānavānāṁ yo duḥsaho vīryadarpitaḥ

व्यासजी ने कहा — हे राजन्! सुनो, मैं कर्णाटक के कृत्यों को बताता हूँ, जो देवताओं और दानवों दोनों के लिए अपने बल के गर्व से असह्य था।

श्लोक 9 (skanda.3.70.9)

दुष्टकर्मा दुराचारो महाराष्ट्रो महाभुजः । जित्वा च सकलाँल्लोकांस्त्रैलोक्ये च गतागतः ।

duṣṭakarmā durācāro mahārāṣṭro mahābhujaḥ jitvā ca sakalāṁllokāṁstrailokye ca gatāgataḥ

वह दुष्टकर्मा, दुराचारी, महाबली और विशाल भुजाओं वाला था, जिसने सम्पूर्ण लोकों को जीतकर तीनों लोकों में स्वच्छंद विचरण किया।

श्लोक 10 (skanda.3.70.10)

यत्र देवाश्च ऋषयस्तत्र गत्वा महासुरः । छद्मना वा बलेनैव विघ्नं प्रकुरुते नृप ।

yatra devāśca ṛṣayastatra gatvā mahāsuraḥ chadmanā vā balenaiva vighnaṁ prakurute nṛpa

जहाँ भी देवता और ऋषि होते, वहाँ जाकर वह महासुर छल से या बल से विघ्न उत्पन्न करता था, हे राजन्!

श्लोक 11 (skanda.3.70.11)

न वेदाध्ययनं लोके भवेत्तस्य भयेन च । कुर्वते वाडवा देवा न च संध्याद्युपासनम् ।

na vedādhyayanaṁ loke bhavettasya bhayena ca kurvate vāḍavā devā na ca saṁdhyādyupāsanam

उसके भय से लोक में वेदाध्ययन नहीं हो पाता था। ब्राह्मण न तो वेदपाठ करते थे और न संध्या-वंदन आदि उपासना।

श्लोक 12 (skanda.3.70.12)

न क्रतुर्वर्तते तत्र न चैव सुरपूजनम् । देशेदेशे च सर्वत्र ग्रामेग्रामे पुरेपुरे ।

na kraturvartate tatra na caiva surapūjanam deśedeśe ca sarvatra grāmegrāme purepure

वहाँ न कोई यज्ञ होता था, न देवपूजा। प्रत्येक देश में, हर गाँव में, हर नगर में सर्वत्र यही स्थिति थी।

श्लोक 13 (skanda.3.70.13)

तीर्थेतीर्थे च सर्वत्र विघ्नं प्रकुरुतेऽसुरः । परंतु शक्यते नैव धर्मारण्ये प्रवेशितुम् ।

tīrthetīrthe ca sarvatra vighnaṁ prakurute'suraḥ araṁtu śakyate naiva dharmāraṇye praveśitum

वह असुर हर तीर्थ में सर्वत्र विघ्न डालता था; परंतु धर्मारण्य में प्रवेश करना उसके लिए संभव नहीं था।

श्लोक 14 (skanda.3.70.14)

भयाच्छक्त्याश्च श्रीमातुर्दानवो विक्लवस्तदा । केनोपायेन तत्रैव गम्यते त्विति चिंतयन् ।

bhayācchaktyāśca śrīmāturdānavo viklavastadā kenopāyena tatraiva gamyate tviti ciṁtayan

श्रीमाता की शक्ति के भय से वह दानव व्याकुल हो गया, और यह सोचने लगा कि किस उपाय से वहाँ प्रवेश किया जाए।

श्लोक 15 (skanda.3.70.15)

विघ्नं करिष्ये हि कथं ब्राह्मणानां महात्मनाम् । वेदाध्ययनकर्तॄणां यज्ञे कर्माधितिष्ठताम् ।

vighnaṁ kariṣye hi kathaṁ brāhmaṇānāṁ mahātmanām vedādhyayanakartṝṇāṁ yajñe karmādhitiṣṭhatām

मैं उन महात्मा ब्राह्मणों के लिए विघ्न कैसे उत्पन्न करूँ, जो वेद का अध्ययन करते हैं और यज्ञ-कर्म में लगे रहते हैं?

श्लोक 16 (skanda.3.70.16)

वेदाध्ययनजं शब्दं श्रुत्वा दूरात्स दानवः । विव्यथे स यथा राजन्वज्राहत इव द्विपः ।

vedādhyayanajaṁ śabdaṁ śrutvā dūrātsa dānavaḥ vivyathe sa yathā rājanvajrāhata iva dvipaḥ

वेदाध्ययन की ध्वनि को दूर से ही सुनकर वह दानव व्याकुल हो जाता था, हे राजन्, ठीक वैसे जैसे वज्र से आहत हाथी।

श्लोक 17 (skanda.3.70.17)

निःश्वासान्मुमुचे रोषाद्दंतैर्दंतांश्च घर्षयन् । दशमानो निजावोष्ठौ पेषयंश्च करावुभौ ।

niḥśvāsānmumuce roṣāddaṁtairdaṁtāṁśca gharṣayan daśamāno nijāvoṣṭhau peṣayaṁśca karāvubhau

वह क्रोध से लंबी साँसें छोड़ता, दाँतों से दाँत पीसता, अपने ही होंठों को काटता और दोनों हाथों को मलता रहता था।

श्लोक 18 (skanda.3.70.18)

उन्मत्तवद्विचरत इतश्चेतश्च मारिष । सन्निपातस्य दोषेण यथा भवति मानवः ।

unmattavadvicarata itaścetaśca māriṣa sannipātasya doṣeṇa yathā bhavati mānavaḥ

हे मारिष! वह उन्मत्त की भाँति इधर-उधर घूमता था, जैसे कोई मनुष्य सन्निपात रोग के प्रकोप से हो जाता है।

श्लोक 19 (skanda.3.70.19)

तथैव दानवो घोरो धर्मारण्यसमीपगः । भ्रमते दहते चैव दूरादेव भयान्वितः ।

tathaiva dānavo ghoro dharmāraṇyasamīpagaḥ bhramate dahate caiva dūrādeva bhayānvitaḥ

उसी प्रकार वह भयंकर दानव धर्मारण्य के निकट पहुँचकर भटकता और भीतर ही भीतर जलता रहता था, दूर से ही भयभीत होकर।

श्लोक 20 (skanda.3.70.20)

विवाहकाले विप्राणां रूपं कृत्वा द्विजन्मनः । तत्रागत्य दुराधर्षो नीत्वा दांपत्यमुत्तमम् ।

vivāhakāle viprāṇāṁ rūpaṁ kṛtvā dvijanmanaḥ tatrāgatya durādharṣo nītvā dāṁpatyamuttamam

विवाह के समय ब्राह्मणों का रूप धारण कर, वह दुर्धर्ष वहाँ आकर उत्तम वर-वधू को हर ले जाता था।

श्लोक 21 (skanda.3.70.21)

उत्पपात महीपृष्ठाद्गगने सोऽसुराधमः । स्वयं च रमते पापो द्वेषाज्जातिस्वभावतः ।

utpapāta mahīpṛṣṭhādgagane so'surādhamaḥ svayaṁ ca ramate pāpo dveṣājjātisvabhāvataḥ

वह नीच असुर पृथ्वी की सतह से आकाश में उड़ जाता था, और अपने जन्मजात द्वेषपूर्ण स्वभाव के कारण पापपूर्ण क्रीड़ा करता था।

श्लोक 22 (skanda.3.70.22)

एवं च बहुशः सोऽथ धर्मारण्याच्च दंपती । गृहीत्वा कुरुते पापं देवानामपि दुःसहम् ।

evaṁ ca bahuśaḥ so'tha dharmāraṇyācca daṁpatī gṛhītvā kurute pāpaṁ devānāmapi duḥsaham

इस प्रकार अनेक बार वह धर्मारण्य से वर-वधू को हरण कर वह पाप करता था, जो देवताओं के लिए भी असह्य था।

श्लोक 23 (skanda.3.70.23)

विघ्नं करोति दुष्टोऽसौ दंपत्योः सततं भुवि । महाघोरतरं कर्म कुर्वंस्तस्मिन्पुरे वरे ।

vighnaṁ karoti duṣṭo'sau daṁpatyoḥ satataṁ bhuvi mahāghorataraṁ karma kurvaṁstasminpure vare

वह दुष्ट उस उत्तम नगर में वर-वधुओं के लिए पृथ्वी पर सदा विघ्न उत्पन्न करता रहता था, अत्यंत भयंकर कार्य करते हुए।

श्लोक 24 (skanda.3.70.24)

तत्रोद्विग्ना द्विजाः सर्वे पलायंते दिशो दश । गताः सर्वे भूमिदेवा स्त्यक्त्वा स्थानं मनोरमम् ।

tatrodvignā dvijāḥ sarve palāyaṁte diśo daśa gatāḥ sarve bhūmidevā styaktvā sthānaṁ manoramam

वहाँ सब ब्राह्मण उद्विग्न होकर दसों दिशाओं में भाग गए। समस्त भूदेव उस मनोहर स्थान को त्यागकर चले गए।

श्लोक 25 (skanda.3.70.25)

यत्रयत्र महत्तीर्थं तत्रतत्र गता द्विजाः । उद्वसं तत्पुरं जातं तस्मिन्काले नृपोत्तम ।

yatrayatra mahattīrthaṁ tatratatra gatā dvijāḥ udvasaṁ tatpuraṁ jātaṁ tasminkāle nṛpottama

वे ब्राह्मण जहाँ-जहाँ कोई अन्य महातीर्थ था, वहाँ-वहाँ चले गए। हे नृपोत्तम! उस समय वह नगर उजड़ गया।

श्लोक 26 (skanda.3.70.26)

न वेदाध्ययनं तत्र न च यज्ञः प्रवर्तते । मनुजास्तत्र तिष्ठंति न कर्णाटभयार्दिताः ।

na vedādhyayanaṁ tatra na ca yajñaḥ pravartate manujāstatra tiṣṭhaṁti na karṇāṭabhayārditāḥ

वहाँ न वेदाध्ययन होता, न यज्ञ चलता। कर्णाटक के भय से पीड़ित होकर मनुष्य वहाँ रहते ही नहीं थे।

श्लोक 27 (skanda.3.70.27)

द्विजाः सर्वे ततो राजन्वणिजश्च महायशाः । एकत्र मिलिताः सर्वे वक्तुं मंत्रं यथोचितम् ।

dvijāḥ sarve tato rājanvaṇijaśca mahāyaśāḥ ekatra militāḥ sarve vaktuṁ maṁtraṁ yathocitam

तब हे राजन्! सब ब्राह्मण और महायशस्वी व्यापारी एक साथ मिलकर उचित मंत्रणा करने के लिए एकत्रित हुए।

श्लोक 28 (skanda.3.70.28)

कर्णाटस्य वधोपायं मंत्रयंति द्विजर्षभाः । विचार्यमाणे तैर्दैवाद्वाग्जाता चाशरीरिणी ।

karṇāṭasya vadhopāyaṁ maṁtrayaṁti dvijarṣabhāḥ vicāryamāṇe tairdaivādvāgjātā cāśarīriṇī

श्रेष्ठ ब्राह्मण कर्णाटक के वध का उपाय सोचने लगे। जब वे विचार कर ही रहे थे, तभी दैवयोग से एक आकाशवाणी हुई।

श्लोक 29 (skanda.3.70.29)

आराधयत श्रीमातां सर्वदुःखापहारिणीम् । सर्वदैत्यक्षयकरीं सर्वोपद्रवनाशनीम् ।

ārādhayata śrīmātāṁ sarvaduḥkhāpahāriṇīm sarvadaityakṣayakarīṁ sarvopadravanāśinīm

'श्रीमाता की आराधना करो, जो सब दुःखों को हरने वाली, सब दैत्यों का नाश करने वाली और सब उपद्रवों को मिटाने वाली है।'

श्लोक 30 (skanda.3.70.30)

तच्छ्रुत्वा वाडवाः सर्वे हर्षव्याकुललोचनाः । श्रीमातां तु समागत्य गृहीत्वा बलिमुत्तमम् ।

tacchrutvā vāḍavāḥ sarve harṣavyākulalocanāḥ śrīmātāṁ tu samāgatya gṛhītvā balimuttamam

यह सुनकर सब ब्राह्मणों की आँखें हर्ष से भर आईं। वे श्रीमाता के पास एक उत्तम बलि लेकर आए।

श्लोक 31 (skanda.3.70.31)

मधु क्षीरं दधि घृतं शर्करा पञ्चधारया । धूपं दीपं तथा चैव चंदनं कुसुमानि च ।

madhu kṣīraṁ dadhi ghṛtaṁ śarkarā pañcadhārayā dhūpaṁ dīpaṁ tathā caiva caṁdanaṁ kusumāni ca

मधु, दूध, दही, घी और शक्कर — इन पाँच धाराओं वाला पंचामृत, तथा धूप, दीप, चंदन और पुष्प...

श्लोक 32 (skanda.3.70.32)

फलानि विविधान्येव गृहीत्वा वाडवा नृप । धान्यं तु विविधं राजन्भक्तापूपा घृताचिताः ।

phalāni vividhānyeva gṛhītvā vāḍavā nṛpa dhānyaṁ tu vividhaṁ rājanbhaktāpūpā ghṛtācitāḥ

...तथा विविध फल लेकर, हे राजन्! वे ब्राह्मण विविध धान्य, चावल और घी में डूबे हुए पुए भी ले आए।

श्लोक 33 (skanda.3.70.33)

कुल्माषा वटकाश्चैव पायसं घृतमिश्रितम् । सोहालिका दीपिकाश्च सार्द्राश्च वटकास्तथा ।

kulmāṣā vaṭakāścaiva pāyasaṁ ghṛtamiśritam sohālikā dīpikāśca sārdrāśca vaṭakāstathā

उबले चने, वड़े, घी मिश्रित खीर, सोहालिका (एक पकवान), दीपिका (दीपाकार पकवान) तथा नम वड़े...

श्लोक 34 (skanda.3.70.34)

राजिकाभिश्च संलिप्ता नवच्छिद्रसमन्विताः । चंद्रबिंबप्रतीकाशा मण्डकास्तत्र कल्पिताः ।

rājikābhiśca saṁliptā navacchidrasamanvitāḥ caṁdrabiṁbapratīkāśā maṇḍakāstatra kalpitāḥ

...सरसों से लेपित, नौ छिद्रों वाले, तथा चंद्रबिंब के समान मंडक (गोल रोटियाँ) वहाँ तैयार किए गए।

श्लोक 35 (skanda.3.70.35)

पञ्चामृतेन स्नपनं कृत्वा गन्धोदकेन च । धूपैर्दीपैश्च नैवेद्यैस्तोषयामासुरीश्वरीम् ।

pañcāmṛtena snapanaṁ kṛtvā gaṁdhodakena ca dhūpairdīpaiśca naivedyaistoṣayāmāsurīśvarīm

पंचामृत और सुगंधित जल से स्नान कराकर, धूप, दीप और नैवेद्य से उन्होंने उस ईश्वरी को संतुष्ट किया।

श्लोक 36 (skanda.3.70.36)

नीराजनैः सकपूरैः पुष्पैर्दीपैः सुचंदनैः । श्रीमाता तोषिता राजन्सर्वोपद्रवनाशनी ।

nīrājanaiḥ sakapūraiḥ puṣpairdīpaiḥ sucaṁdanaiḥ śrīmātā toṣitā rājansarvopadravanāśinī

कपूर सहित आरती से, फूलों, दीपों और उत्तम चंदन से — हे राजन्! समस्त उपद्रवों का नाश करने वाली श्रीमाता संतुष्ट हुई।

श्लोक 37 (skanda.3.70.37)

श्रीमाता च जगन्माता ब्राह्मी सौम्या वरप्रदा । रूपत्रयं समास्थाय पालयेत्सा जगत्त्रयम् ।

śrīmātā ca jaganmātā brāhmī saumyā varapradā rūpatrayaṁ samāsthāya pālayetsā jagattrayam

श्रीमाता ही जगन्माता है, ब्राह्मी है, सौम्य और वरप्रदा है; तीन रूप धारण कर वह तीनों लोकों का पालन करती है।

श्लोक 38 (skanda.3.70.38)

त्रयीरूपेण धर्मात्मन्रक्षते सत्यमंदिरम् । जितेद्रिया जितात्मानो मिलितास्ते द्विजोत्तमाः ।

trayīrūpeṇa dharmātmanrakṣate satyamaṁdiram jitedriyā jitātmāno militāste dvijottamāḥ

अपने त्रिविध रूप से वह धर्मात्मन् सत्यमंदिर की रक्षा करती है। इंद्रियविजयी, आत्मविजयी वे श्रेष्ठ ब्राह्मण वहाँ एकत्रित हुए।

श्लोक 39 (skanda.3.70.39)

तैः सर्वेरर्चिता माता चंदनाद्येन तोषिता । स्तुतिमारेभिरे तत्र वाङ्मनःकायकर्मभिः । एकचित्तेन भावेन ब्रह्मपुत्र्याः पुरः स्थिताः ।

taiḥ sarverarcitā mātā caṁdanādyena toṣitā stutimārebhire tatra vāṅmanaḥkāyakarmabhiḥ ekacittena bhāvena brahmaputryāḥ puraḥ sthitāḥ

उन सबके द्वारा पूजित होकर, चंदन आदि से संतुष्ट हुई माता की उन्होंने वहाँ वाणी, मन और शरीर के कर्मों से स्तुति आरंभ की, एकाग्रचित्त होकर ब्रह्मपुत्री के सामने खड़े होकर।

श्लोक 40 (skanda.3.70.40)

।। विप्रा ऊचुः ।। नमस्ते ब्रह्मपुत्र्यास्तु नमस्ते ब्रह्मचारिणि । नमस्ते जगतां मातर्नमस्ते सर्वगे सदा ।

viprā ūcuḥ namaste brahmaputryāstu namaste brahmacāriṇi namaste jagatāṁ mātarnamaste sarvage sadā

ब्राह्मणों ने कहा — हे ब्रह्मा की पुत्री, तुम्हें नमस्कार है। हे ब्रह्मचारिणी, तुम्हें नमस्कार है। हे जगत की माता, तुम्हें नमस्कार है। हे सर्वव्यापिनी, तुम्हें सदा नमस्कार है।

श्लोक 41 (skanda.3.70.41)

क्षुन्निद्रा त्वं तृषा त्वं च क्रोधतंद्रादयस्तथा । त्वं शांतिस्त्वं रतिश्चैव त्वं जया विजया तथा ।

kṣunnidrā tvaṁ tṛṣā tvaṁ ca krodhataṁdrādayastathā tvaṁ śāṁtistvaṁ ratiścaiva tvaṁ jayā vijayā tathā

तुम्हीं हुंगर, नींद, प्यास, क्रोध और आलस्य हो; तुम्हीं शांति, तुम्हीं रति, और तुम्हीं जया-विजया भी हो।

श्लोक 42 (skanda.3.70.42)

ब्रह्मविष्णुमहेशाद्यैस्त्वं प्रपन्ना सुरेश्वरि । सावित्री श्रीरुमा चैव त्वं च माता व्यवस्थिता ।

brahmaviṣṇumaheśādyaistvaṁ prapannā sureśvari sāvitrī śrīrumā caiva tvaṁ ca mātā vyavasthitā

हे सुरेश्वरि! ब्रह्मा, विष्णु, महेश आदि सब तुम्हारी शरण में हैं। तुम्हीं सावित्री, श्री (लक्ष्मी) और उमा हो, और तुम्हीं माता के रूप में स्थित हो।

श्लोक 43 (skanda.3.70.43)

ब्रह्मविष्णु सुरेशानास्त्वदाधारे व्यवस्थिताः । नमस्तुभ्यं जगन्मातर्धृतिपुष्टिस्वरूपिणि ।

brahmaviṣṇu sureśānāstvadādhāre vyavasthitāḥ namastubhyaṁ jaganmātardhṛtipuṣṭisvarūpiṇi

ब्रह्मा, विष्णु और सुरेश्वर सभी तुम्हारे ही आधार पर स्थित हैं। हे जगन्माता, धैर्य और पुष्टि की साकार मूर्ति, तुम्हें नमस्कार है।

श्लोक 44 (skanda.3.70.44)

रतिः क्रोधा महामाया छाया ज्योतिःस्वरूपिणि । सृष्टि स्थित्यंतकृद्देवि कार्यकारणदा सदा ।

ratiḥ krodhā mahāmāyā chāyā jyotiḥsvarūpiṇi sṛṣṭi sthityaṁtakṛddevi kāryakāraṇadā sadā

तुम रति, क्रोध, महामाया, छाया और ज्योतिस्वरूपा हो। हे देवि! तुम सृष्टि, स्थिति और संहार करने वाली हो, और सदा कार्य-कारण की दात्री हो।

श्लोक 45 (skanda.3.70.45)

धरा तेजस्तथा वायुः सलिलाकाशमेव च । नमस्तेऽस्तु महाविद्ये महाज्ञानमयेऽनघे ।

dharā tejastathā vāyuḥ salilākāśameva ca namaste'stu mahāvidye mahājñānamaye'naghe

तुम्हीं पृथ्वी, तेज, वायु, जल और आकाश हो। हे महाविद्ये, महाज्ञानमयी, निष्पाप! तुम्हें नमस्कार है।

श्लोक 46 (skanda.3.70.46)

ह्रींकारी देवरूपा त्वं क्लींकारी त्वं महाद्युते । आदिमध्यावसाना त्वं त्राहि चास्मान्महाभयात् ।

hrīṁkārī devarūpā tvaṁ klīṁkārī tvaṁ mahādyute ādimadhyāvasānā tvaṁ trāhi cāsmānmahābhayāt

तुम ह्रींकार-स्वरूपा देवी हो, हे महाद्युते! तुम क्लींकार-स्वरूपा हो। तुम्हीं आदि, मध्य और अंत हो — हमें इस महाभय से बचाओ।

श्लोक 47 (skanda.3.70.47)

महापापो हि दुष्टात्मा दैत्योऽयं बाधतेऽधुना । त्राणरूपा त्वमेका च अस्माकं कुलदेवता ।

mahāpāpo hi duṣṭātmā daityo'yaṁ bādhate'dhunā trāṇarūpā tvamekā ca asmākaṁ kuladevatā

यह अत्यंत पापी, दुष्टात्मा दैत्य अभी हमें सता रहा है। तुम ही एकमात्र त्राणरूपा हमारी कुलदेवी हो।

श्लोक 48 (skanda.3.70.48)

त्राहित्राहि महादेवि रक्षरक्ष महेश्वरि । हनहन दानवं दुष्टं द्विजातीनां विघ्नकारकम् ।

trāhitrāhi mahādevi rakṣarakṣa maheśvari hanahana dānavaṁ duṣṭaṁ dvijātīnāṁ vighnakārakam

रक्षा करो, रक्षा करो, हे महादेवी! रक्षा करो, रक्षा करो, हे महेश्वरी! मार डालो, मार डालो उस दुष्ट दानव को, जो ब्राह्मणों के लिए विघ्नकारी है।

श्लोक 49 (skanda.3.70.49)

एवं स्तुता तदा देवी महामाया द्विजन्मभिः । कर्णाटस्य वधार्थाय द्विजातीनां हिताय च । प्रत्यक्षा साऽभवत्तत्र वरं ब्रूहीत्युवाच ह ।

evaṁ stutā tadā devī mahāmāyā dvijanmabhiḥ karṇāṭasya vadhārthāya dvijātīnāṁ hitāya ca pratyakṣā sā'bhavattatra varaṁ brūhītyuvāca ha

इस प्रकार ब्राह्मणों द्वारा स्तुत होकर, कर्णाटक के वध के लिए और ब्राह्मणों के हित के लिए, वह महामाया देवी वहाँ प्रत्यक्ष प्रकट हो गई, और बोली — 'वर माँगो'।

श्लोक 50 (skanda.3.70.50)

।। श्रीमातोवाच ।। केन वै त्रासिता विप्राः केन वोद्वेजिताः पुनः । तस्याहं कुपिता विप्रा नयिष्ये यमसादनम् ।

śrīmātovāca kena vai trāsitā viprāḥ kena vodvejitāḥ punaḥ tasyāhaṁ kupitā viprā nayiṣye yamasādanam

श्रीमाता ने कहा — किसने ब्राह्मणों को भयभीत किया, किसने उन्हें उद्विग्न किया है? हे विप्रो! मैं उससे क्रुद्ध होकर उसे यम के धाम भेज दूँगी।

श्लोक 51 (skanda.3.70.51)

क्षीणायुषं नरं वित्त येन यूयं निपीडिताः । ददामि वो द्विजातिभ्यो यथेष्टं वक्तुमर्हथ ।

kṣīṇāyuṣaṁ naraṁ vitta yena yūyaṁ nipīḍitāḥ dadāmi vo dvijātibhyo yatheṣṭaṁ vaktumarhatha

जान लो कि जिसने तुम्हें पीड़ित किया है, उसकी आयु क्षीण हो गई है। हे द्विजो! मैं तुम्हें वर देती हूँ; तुम इच्छानुसार माँगने योग्य हो।

श्लोक 52 (skanda.3.70.52)

भक्त्या हि भवतां विप्राः करिष्ये नात्र संशयः ।

bhaktyā hi bhavatāṁ viprāḥ kariṣye nātra saṁśayaḥ

हे विप्रो! तुम्हारी भक्ति के कारण मैं निश्चय ही यह कार्य करूँगी, इसमें कोई संदेह नहीं है।

श्लोक 53 (skanda.3.70.53)

।। द्विजा ऊचुः ।। कर्णाटाख्यो महारौद्रो दानवो मदगर्वितः । विघ्नं प्रकुरुते नित्यं सत्यमंदिरवासिनाम् ।

dvijā ūcuḥ karṇāṭākhyo mahāraudro dānavo madagarvitaḥ vighnaṁ prakurute nityaṁ satyamaṁdiravāsinām

ब्राह्मणों ने कहा — कर्णाटक नामक अत्यंत भयंकर, मद से गर्वित दानव सत्यमंदिर के निवासियों के लिए सदा विघ्न उत्पन्न करता है।

श्लोक 54 (skanda.3.70.54)

ब्राह्मणान्सत्यशीलांश्च वेदाध्ययनतत्परान् । द्वेषाद्द्वेष्टि द्वेषणस्तान्नित्यमेव महामते । वेदविद्वेषणो दुष्टो घातयैनं महाद्युते ।

brāhmaṇānsatyaśīlāṁśca vedādhyayanatatparān dveṣāddveṣṭi dveṣaṇastānnityameva mahāmate vedavidveṣaṇo duṣṭo ghātayainaṁ mahādyute

हे महामते! वह अत्यंत द्वेषी होकर सत्यशील, वेदाध्ययनरत ब्राह्मणों से सदा द्वेष करता है। हे महाद्युते! वह वेद से द्वेष करने वाला दुष्ट है — उसका वध कर दो।

श्लोक 55 (skanda.3.70.55)

।। व्यास उवाच ।। तथेत्युक्त्वा तु सा देवी प्रहस्य कुलदेवता । वधोपायं विचिंत्यास्य भक्तानां रक्षणाय वै ।

vyāsa uvāca tathetyuktvā tu sā devī prahasya kuladevatā vadhopāyaṁ viciṁtyāsya bhaktānāṁ rakṣaṇāya vai

व्यासजी ने कहा — 'तथास्तु' कहकर, मुसकुराते हुए, वह कुलदेवी अपने भक्तों की रक्षा के लिए उसके वध का उपाय सोचने लगी।

श्लोक 56 (skanda.3.70.56)

ततः कोपपरा जाता श्रीमाता नृपसत्तम । कोपेन भृकुटीं कृत्वा रक्तनेत्रांतलोचनाम् ।

tataḥ kopaparā jātā śrīmātā nṛpasattama kopena bhṛkuṭīṁ kṛtvā raktanetrāṁtalocanām

हे नृपसत्तम! तब श्रीमाता क्रोधपरायण हो गई, उसने क्रोध से भौंहें टेढ़ी कर लीं और उसके नेत्रों के कोने रक्तवर्ण हो गए।

श्लोक 57 (skanda.3.70.57)

कोपेन महताऽऽविष्टा वसंती पावकं यथा । महाज्वाला मुखान्नेत्रान्नासाकर्णाच्च भारत ।

kopena mahatā'āviṣṭā vasaṁtī pāvakaṁ yathā mahājvālā mukhānnetrānnāsākarṇācca bhārata

हे भारत! महान क्रोध से आविष्ट होकर, मानो अग्नि से भरी हुई, उसके मुख, नेत्र, नासिका और कानों से महाज्वालाएँ निकलने लगीं।

श्लोक 58 (skanda.3.70.58)

तत्तेजसा समुद्भूता मातंगी कामरूपिणी । काली करालवदना दुर्दर्शवदनोज्ज्वला ।

tattejasā samudbhūtā mātaṁgī kāmarūpiṇī kālī karālavadanā durdarśavadanojjvalā

उस तेज से मातंगी उत्पन्न हुई, जो इच्छानुसार रूप धारण करने वाली थी — काली, विकराल मुख वाली, दुर्दर्श और तेजोमय मुख वाली।

श्लोक 59 (skanda.3.70.59)

रक्तमाल्यांबरधरा मदाघूर्णितलोचना । न्यग्रोधस्य समीपे सा श्रीमाता संश्रिता तदा ।

raktamālyāṁbaradharā madāghūrṇitalocanā nyagrodhasya samīpe sā śrīmātā saṁśritā tadā

वह रक्तपुष्पों की माला और लाल वस्त्र धारण किए हुए, मद से घूमती हुई आँखों वाली थी। तब श्रीमाता एक वटवृक्ष के निकट स्थित हुई।

श्लोक 60 (skanda.3.70.60)

अष्टादशभुजा सा तु शुभा माता सुशोभना । धनुर्बाणधरा देवी खड्गखेटकधारिणी ।

aṣṭādaśabhujā sā tu śubhā mātā suśobhanā dhanurbāṇadharā devī khaḍgakheṭakadhāriṇī

वह शुभ, सुंदर माता अठारह भुजाओं वाली थी, धनुष-बाण धारण किए हुए, और तलवार-ढाल भी धारण करने वाली देवी थी।

श्लोक 61 (skanda.3.70.61)

कुठारं क्षुरिकां बिभ्रत्त्रिशूलं पानपात्रकम् । गदां सर्पं च परिघं पिनाकं चैव पाशकम् ।

kuṭhāraṁ kṣurikāṁ bibhrattriśūlaṁ pānapātrakam gadāṁ sarpaṁ ca parighaṁ pinākaṁ caiva pāśakam

वह कुल्हाड़ी, छुरी, त्रिशूल और मद्य-पात्र धारण किए हुए थी; गदा, सर्प, परिघ, पिनाक (धनुष) और पाश भी धारण किए हुए थी।

श्लोक 62 (skanda.3.70.62)

अक्षमालाधरा राजन्मद्यकुंभानुधारिणी । शक्तिं च मुशलं चोग्रं कर्तरीं खर्परं तथा ।

akṣamālādharā rājanmadyakuṁbhānudhāriṇī śaktiṁ ca muśalaṁ cograṁ kartarīṁ kharparaṁ tathā

हे राजन्! वह रुद्राक्षमाला और मद्य-कुंभ धारण करने वाली थी; शक्ति, भयंकर मूसल, कैंची और खप्पर भी धारण किए हुए थी।

श्लोक 63 (skanda.3.70.63)

कंटकाढ्यां च बदरीं बिभ्रती तु महानना । तत्राभवन्महायुद्धं तुमुलं लोमहर्षणम् ।

kaṁṭakāḍhyāṁ ca badarīṁ bibhratī tu mahānanā tatrābhavanmahāyuddhaṁ tumulaṁ lomaharṣaṇam

वह विशाल मुख वाली देवी काँटों से भरी बेर की डाली भी धारण किए हुए थी। तब वहाँ एक भीषण, रोमांचकारी महायुद्ध हुआ।

श्लोक 64 (skanda.3.70.64)

मातंग्याः सह कर्णाटदानवेन नृपोत्तम ।

mātaṁgyāḥ saha karṇāṭadānavena nṛpottama

हे नृपोत्तम! यह युद्ध मातंगी और कर्णाटक दानव के बीच हुआ।

श्लोक 65 (skanda.3.70.65)

।। युधिष्ठिर उवाच ।। कथं युद्धं समभवत्कथं चैवापवर्तत । जितं केनैव धर्मज्ञ तन्ममाचक्ष्व मारिष ।

yudhiṣṭhira uvāca kathaṁ yuddhaṁ samabhavatkathaṁ caivāpavartata jitaṁ kenaiva dharmajña tanmamācakṣva māriṣa

युधिष्ठिर ने कहा — वह युद्ध कैसे हुआ, कैसे समाप्त हुआ, और किसने विजय पाई? हे धर्मज्ञ, हे मारिष! यह मुझे बताइए।

श्लोक 66 (skanda.3.70.66)

।। व्यास उवाच ।। एकदा शृणु राजेंद्र यज्जातं दैत्यसंगरे । तत्सर्वं कथयाम्याशु यथावृत्तं हि तत्पुरा ।

vyāsa uvāca ekadā śṛṇu rājeṁdra yajjātaṁ daityasaṁgare tatsarvaṁ kathayāmyāśu yathāvṛttaṁ hi tatpurā

व्यासजी ने कहा — हे राजेंद्र! सुनो, एक बार दैत्य के साथ जो युद्ध हुआ, वह सब मैं शीघ्र बताता हूँ, जैसा वह पहले घटित हुआ था।

श्लोक 67 (skanda.3.70.67)

प्रणष्टयोषा ये विप्रा वणिजश्चैव भारत । चैत्रमासे तु संप्राप्ते धर्मारण्ये नृपोत्तम ।

praṇaṣṭayoṣā ye viprā vaṇijaścaiva bhārata caitramāse tu saṁprāpte dharmāraṇye nṛpottama

हे भारत! जिन ब्राह्मणों और व्यापारियों की पत्नियाँ खो गई थीं, हे नृपोत्तम, चैत्र मास आने पर धर्मारण्य में...

श्लोक 68 (skanda.3.70.68)

गौरीमुद्वाहयामासुर्विप्रास्ते संशितव्रताः । स्वस्थानं सुशुभं ज्ञात्वा तीर्थराजं तथोत्तमम् ।

gaurīmudvāhayāmāsurviprāste saṁśitavratāḥ svasthānaṁ suśubhaṁ jñātvā tīrtharājaṁ tathottamam

वे कठोर व्रतधारी ब्राह्मण गौरी का विवाह-उत्सव मना रहे थे, अपने उस अत्यंत शुभ स्थान और उत्तम तीर्थराज को जानकर।

श्लोक 69 (skanda.3.70.69)

विवाहं तत्र कुर्वंतो मिलितास्ते द्विजोत्तमाः । कोटिकन्याकुलं तत्र एकत्रासीन्महोत्सवे । धर्मारण्ये महाप्राज्ञ सत्यं सत्यं वदाम्यहम् ।

vivāhaṁ tatra kurvaṁto militāste dvijottamāḥ koṭikanyākulaṁ tatra ekatrāsīnmahotsave dharmāraṇye mahāprājña satyaṁ satyaṁ vadāmyaham

वहाँ विवाह करते हुए वे श्रेष्ठ ब्राह्मण एकत्र हुए; करोड़ों कन्याओं का समूह उस महोत्सव में एक साथ था। हे महाप्राज्ञ! मैं धर्मारण्य में सत्य ही, सत्य ही कह रहा हूँ।

श्लोक 70 (skanda.3.70.70)

चतुर्थ्यामपररात्रेऽभ्यंतरतोऽग्निमादधुः । आसनं ब्रह्मणे दत्त्वा अग्निं कृत्वा प्रदक्षिणम् ।

caturthyāmapararātre'bhyaṁtarato'gnimādadhuḥ āsanaṁ brahmaṇe dattvā agniṁ kṛtvā pradakṣiṇam

चतुर्थी की रात्रि के उत्तरार्ध में उन्होंने भीतर अग्नि प्रज्वलित की, ब्रह्मा को आसन देकर, अग्नि की प्रदक्षिणा करते हुए।

श्लोक 71 (skanda.3.70.71)

स्थालीपाकं च कृत्वाथ कृत्वा वेदीः शुभास्तदा । चतुर्हस्ताः सकलशा नागपाश समन्विताः ।

sthālīpākaṁ ca kṛtvātha kṛtvā vedīḥ śubhāstadā caturhastāḥ sakalaśā nāgapāśa samanvitāḥ

पात्र-पाक (स्थालीपाक) करके, शुभ वेदियाँ बनाकर, तब चार हाथ चौड़ी, कलश और नागपाश से युक्त वेदियाँ तैयार की गईं।

श्लोक 72 (skanda.3.70.72)

वेदमंत्रेण शुभ्रेण मंत्रयंते ततो द्विजाः । चरतां दंपतीनां हि परिवेश्य यथोचितम् ।

vedamaṁtreṇa śubhreṇa maṁtrayaṁte tato dvijāḥ caratāṁ daṁpatīnāṁ hi pariveśya yathocitam

तब ब्राह्मणों ने शुद्ध वेदमंत्रों से उन नवविवाहित जोड़ों को यथोचित रीति से घेरकर मंत्रोच्चार किया।

श्लोक 73 (skanda.3.70.73)

ब्रह्मणा सहितास्तत्र वाडवा स्ते सुहर्षिताः । कुर्वते वेदनिर्घोषं तारस्वरनिनादितम् ।

brahmaṇā sahitāstatra vāḍavā ste suharṣitāḥ kurvate vedanirghoṣaṁ tārasvaraninaditam

ब्रह्मा के साथ वे अत्यंत हर्षित ब्राह्मण वहाँ ऊँचे स्वर में गूँजता हुआ वेदमंत्रों का घोष करने लगे।

श्लोक 74 (skanda.3.70.74)

तेन शब्देन महता कृत्स्नमापूरितं नभः । तं श्रुत्वा दानवो घोरो वेदध्वनिं द्विजेरितम् ।

tena śabdena mahatā kṛtsnamāpūritaṁ nabhaḥ taṁ śrutvā dānavo ghoro vedadhvaniṁ dvijeritam

उस महान ध्वनि से सारा आकाश गूँज उठा। द्विजों द्वारा किए गए उस वेदध्वनि को सुनकर वह भयंकर दानव...

श्लोक 75 (skanda.3.70.75)

उत्पपातासनात्तूर्णं ससैन्यो गतचेतनः । धावतः सर्वभृत्यास्तं ये चान्ये तानुवाच सः ।

utpapātāsanāttūrṇaṁ sasainyo gatacetanaḥ dhāvataḥ sarvabhṛtyāstaṁ ye cānye tānuvāca saḥ

...अपने सेना सहित अचेत होकर तुरंत आसन से उठ खड़ा हुआ। जब सब सेवक और अन्य लोग उसकी ओर दौड़े, तो उसने उनसे कहा।

श्लोक 76 (skanda.3.70.76)

श्रूयतां कुत्र शब्दोऽयं वाडवानां समुत्थितः । तस्य तद्वचनं श्रुत्वा दैतेयाः सत्वरं ययुः ।

śrūyatāṁ kutra śabdo'yaṁ vāḍavānāṁ samutthitaḥ tasya tadvacanaṁ śrutvā daiteyāḥ satvaraṁ yayuḥ

'सुनो, कहाँ से यह ब्राह्मणों का शब्द उठ रहा है?' उसका यह वचन सुनकर दैत्य तुरंत वहाँ गए।

श्लोक 77 (skanda.3.70.77)

विभ्रांतचेतसः सर्वे इतश्चेतश्च धाविताः । धर्मारण्ये गताः केचित्तत्र दृष्टा द्विजातयः ।

vibhrāṁtacetasaḥ sarve itaścetaśca dhāvitāḥ dharmāraṇye gatāḥ kecittatra dṛṣṭā dvijātayaḥ

सब भ्रमित होकर इधर-उधर दौड़े। कुछ धर्मारण्य तक पहुँचे और वहाँ द्विजों को देखा।

श्लोक 78 (skanda.3.70.78)

उद्गिरंतो हि निगमान्विवाहसमये नृप । सर्वं निवेदयामासुः कर्णाटाय दुरात्मने ।

udgiraṁto hi nigamānvivāhasamaye nṛpa sarvaṁ nivedayāmāsuḥ karṇāṭāya durātmane

हे राजन्! विवाह के समय वेदमंत्रों का उच्चारण करते हुए उन्हें देखकर, उन्होंने सारा वृत्तांत उस दुरात्मा कर्णाटक को बता दिया।

श्लोक 79 (skanda.3.70.79)

तच्छ्रुत्वा रक्तताम्राक्षो द्विजद्विट् कोपपूरितः । अभ्यधावन्महाभाग यत्र ते दंपती नृप ।

tacchrutvā raktatāmrākṣo dvijadviṭ kopapūritaḥ abhyadhāvanmahābhāga yatra te daṁpatī nṛpa

यह सुनकर, ब्राह्मणों से द्वेष रखने वाला वह रक्त-ताम्र नेत्रों वाला दानव क्रोध से भर उठा, और हे महाभाग नृप! वहाँ दौड़ पड़ा जहाँ वे नवविवाहित दंपती थे।

श्लोक 80 (skanda.3.70.80)

खमाश्रित्य तदा दैत्यमायां कुर्वन्स राक्षसः । अहरद्दंपती राजन्सर्वालंकारसंयुतान् ।

khamāśritya tadā daityamāyāṁ kurvansa rākṣasaḥ aharaddaṁpatī rājansarvālaṁkārasaṁyutān

आकाश में उठकर, राक्षसी माया करते हुए, उस राक्षस ने, हे राजन्! सर्वालंकार-भूषित उन वर-वधुओं का हरण कर लिया।

श्लोक 81 (skanda.3.70.81)

ततस्ते वाडवाः सर्वे संगता भुवनेश्वरीम् । बुंबारवं प्रकुर्वाणास्त्राहित्राहीति चोचिरे ।

tataste vāḍavāḥ sarve saṁgatā bhuvaneśvarīm buṁbāravaṁ prakurvāṇāstrāhitrāhīti cocire

तब वे सब ब्राह्मण भुवनेश्वरी की शरण में गए, ऊँची चीत्कार करते हुए 'रक्षा करो, रक्षा करो' पुकार उठे।

श्लोक 82 (skanda.3.70.82)

तच्छ्रुत्वा विश्वजननी मातंगी भुवनेश्वरी । सिंहनादं प्रकुर्वाणा त्रिशूलवरधारिणी ।

tacchrutvā viśvajananī mātaṁgī bhuvaneśvarī siṁhanādaṁ prakurvāṇā triśūlavaradhāriṇī

यह सुनकर विश्व की जननी मातंगी भुवनेश्वरी, उत्तम त्रिशूल धारण किए हुए, सिंहनाद करने लगी।

श्लोक 83 (skanda.3.70.83)

ततः प्रववृते युद्धं देवीकर्णाटयोस्तथा । ऋषीणां पश्यतां तत्र वणिजां च द्विजन्मनाम् ।

tataḥ pravavṛte yuddhaṁ devīkarṇāṭayostathā ṛṣīṇāṁ paśyatāṁ tatra vaṇijāṁ ca dvijanmanām

तब देवी और कर्णाटक के बीच युद्ध शुरू हो गया, वहाँ खड़े ऋषियों, व्यापारियों और ब्राह्मणों के देखते-देखते।

श्लोक 84 (skanda.3.70.84)

पश्यतामभवयुद्धं तुमुलं लोमहर्षणम् । अस्त्रैश्चिच्छेद मातगी मदविह्वलितं रिपुम् ।

paśyatāmabhavayuddhaṁ tumulaṁ lomaharṣaṇam astraiścicceda mātaṁgī madavihvalitaṁ ripum

उनके देखते ही देखते वह भयंकर, रोमांचकारी युद्ध हो गया। मातंगी ने अपने अस्त्रों से मद से विह्वल हुए शत्रु को घायल कर दिया।

श्लोक 85 (skanda.3.70.85)

सोऽपि दैत्यस्ततस्तस्या बाणेनैकेन वक्षसि । असावपि त्रिशूलेन घातितः कश्मलं गतः ।

so'pi daityastatastasyā bāṇenaikena vakṣasi asāvapi triśūlena ghātitaḥ kaśmalaṁ gataḥ

वह दैत्य भी एक बाण से उसकी छाती पर प्रहार करता है। वह भी त्रिशूल के आघात से मूर्च्छित हो जाता है।

श्लोक 86 (skanda.3.70.86)

मुष्टिभिश्चैव तां देवीं सोऽपि ताडयतेऽसुरः । सोऽपि देव्या ततः शीघ्रं नागपाशेन यंत्रितः ।

muṣṭibhiścaiva tāṁ devīṁ so'pi tāḍayate'suraḥ so'pi devyā tataḥ śīghraṁ nāgapāśena yaṁtritaḥ

वह असुर भी अपनी मुट्ठियों से देवी पर प्रहार करता रहा। परंतु देवी ने शीघ्र ही उसे नागपाश में बाँध लिया।

श्लोक 87 (skanda.3.70.87)

ततस्तेनैव दैत्येन गरुडास्त्रं समादधे । तया नारायणास्त्रं तु संदधे शरपातनम् ।

tatastenaiva daityena garuḍāstraṁ samādadhe tayā nārāyaṇāstraṁ tu saṁdadhe śarapātanam

तब उस दैत्य ने गरुड़ास्त्र चलाया। इसके प्रत्युत्तर में उसने नारायणास्त्र का संधान कर बाणों की वर्षा की।

श्लोक 88 (skanda.3.70.88)

एवमन्योन्यमाकृष्य युध्यमानौ जयेच्छया । ततः परिघमादाय आयसं दैत्यपुंगवः ।

evamanyonyamākṛṣya yudhyamānau jayecchayā tataḥ parighamādāya āyasaṁ daityapuṁgavaḥ

इस प्रकार दोनों परस्पर एक-दूसरे को आकर्षित करते हुए विजय की इच्छा से युद्ध करते रहे। तब उस श्रेष्ठ दैत्य ने एक लौह-परिघ (गदा) उठाई।

श्लोक 89 (skanda.3.70.89)

मातंगीं प्रति संकुद्धो जघान परवीरहा । देवी क्रुद्धा मुष्टिपातैश्चूर्णयामास दानवम् ।

mātaṁgīṁ prati saṁkuddho jaghāna paravīrahā devī kruddhā muṣṭipātaiścūrṇayāmāsa dānavam

अत्यंत क्रुद्ध होकर, शत्रु-वीरों का संहार करने वाले उस दैत्य ने मातंगी पर प्रहार किया। क्रुद्ध देवी ने अपनी मुष्टियों के प्रहार से उस दानव को चूर-चूर कर दिया।

श्लोक 90 (skanda.3.70.90)

तेन मुष्टिप्रहारेण मूर्च्छितो निपपात ह । ततस्तु सहसोत्थाय शक्तिं धृत्वा करे मुदा ।

tena muṣṭiprahāreṇa mūrcchito nipapāta ha tatastu sahasotthāya śaktiṁ dhṛtvā kare mudā

उस मुष्टि-प्रहार से वह मूर्च्छित होकर गिर पड़ा। तब वह अचानक उठकर, प्रसन्नतापूर्वक अपने हाथ में एक शक्ति (भाला) पकड़ ली।

श्लोक 91 (skanda.3.70.91)

शतघ्नीं पातयामास तस्या उपरि दानवः । शक्तिं चिच्छेद सा देवी मातंगी च शुभानना ।

śataghnīṁ pātayāmāsa tasyā upari dānavaḥ śaktiṁ ciccheda sā devī mātaṁgī ca śubhānanā

उस दानव ने उस पर एक शतघ्नी (विनाशकारी अस्त्र) चला दी। उस शुभमुखी देवी मातंगी ने उस शक्ति को काट डाला।

श्लोक 92 (skanda.3.70.92)

जहासोच्चैस्तु सा सुभ्रः शतघ्नीं वज्रसन्निभा । एवमन्योन्यशस्त्रौघैरर्दयंतौ परस्परम् ।

jahāsoccaistu sā subhraḥ śataghnīṁ vajrasannibhā evamanyonyaśastraughairardayaṁtau parasparam

वज्र के समान तेजस्वी उस सुंदर भौंहों वाली देवी ने उस शतघ्नी को देखकर ऊँचे स्वर में हँसी। इस प्रकार दोनों एक-दूसरे को अस्त्रों की झड़ी से पीड़ित करते रहे।

श्लोक 93 (skanda.3.70.93)

ततस्त्रिशूलेन हतो हृदये निपपात ह । मूर्छां विहाय दैत्योऽसौ मायां कृत्वा च राक्षसीम् ।

tatastriśūlena hato hṛdaye nipapāta ha mūrcchāṁ vihāya daityo'sau māyāṁ kṛtvā ca rākṣasīm

तब त्रिशूल से हृदय में आहत होकर वह गिर पड़ा। मूर्च्छा त्यागकर वह दैत्य राक्षसी माया रचने लगा।

श्लोक 94 (skanda.3.70.94)

पश्यतां तत्र तेषां तु अदृश्योऽभून्महासुरः । पपौ पानं ततो देवी जहासारुणलोचना ।

paśyatāṁ tatra teṣāṁ tu adṛśyo'bhūnmahāsuraḥ papau pānaṁ tato devī jahāsāruṇalocanā

उन सबके देखते-देखते वह महासुर अदृश्य हो गया। तब लाल नेत्रों वाली देवी ने मदिरापान किया और हँस पड़ी।

श्लोक 95 (skanda.3.70.95)

सर्वत्रगं तं सा देवी त्रैलोक्ये सचराचरे ।

sarvatragaṁ taṁ sā devī trailokye sacarācare

वह देवी जानती थी कि वह सर्वत्र-गामी है, तीनों चराचर लोकों में विचरण करने में समर्थ है।

श्लोक 96 (skanda.3.70.96)

क्व पास्यस्तीति ब्रूते सा ब्रूहि त्वं सांप्रतं हि मे । कर्णाटक महादुष्ट एहि शीघ्रं हि युध्यताम् ।

kva pāsyastīti brūte sā brūhi tvaṁ sāṁprataṁ hi me karṇāṭaka mahāduṣṭa ehi śīghraṁ hi yudhyatām

वह बोली — 'कहाँ छिपेगा तू? मुझे अभी बता। हे महादुष्ट कर्णाटक! शीघ्र आ, हमारा युद्ध हो।'

श्लोक 97 (skanda.3.70.97)

ततोऽभवन्महायुद्धं दारुणं च भयानकम् । पपौ देवी तु मैरेयं वधार्थं सुमहाबला ।

tato'bhavanmahāyuddhaṁ dāruṇaṁ ca bhayānakam papau devī tu maireyaṁ vadhārthaṁ sumahābalā

तब पुनः एक भीषण और भयंकर महायुद्ध हुआ। उस वध के लिए अत्यंत महाबली देवी ने मैरेय-मदिरा का पान किया।

श्लोक 98 (skanda.3.70.98)

मातंगी च ततः क्रुद्धा वक्त्रे चिक्षेप दानवम् । ततोऽपि दानवो रौद्रो नासारंध्रेण निर्गतः ।

mātaṁgī ca tataḥ kruddhā vaktre cikṣepa dānavam tato'pi dānavo raudro nāsāraṁdhreṇa nirgataḥ

तब क्रुद्ध हुई मातंगी ने उस दानव को अपने मुख में फेंक दिया। परंतु वह भयंकर दानव नासिका के छिद्र से बाहर निकल आया।

श्लोक 99 (skanda.3.70.99)

युध्यते स पुनर्दैत्यः कर्णाटो मदपूरितः । ततो देवी प्रकुपिता मातंगी मदपूरिता ।

yudhyate sa punardaityaḥ karṇāṭo madapūritaḥ tato devī prakupitā mātaṁgī madapūritā

वह दैत्य कर्णाटक, मद से भरा हुआ, पुनः युद्ध करने लगा। तब मद से पूरित, अत्यंत क्रुद्ध हुई देवी मातंगी...

श्लोक 100 (skanda.3.70.100)

दशनैर्मथयित्वा च चर्वयित्वा पुनःपुनः । शवास्थि मेदसा युक्तं मज्जामांसादिपूरितम् ।

daśanairmathayitvā ca carvayitvā punaḥpunaḥ śavāsthi medasā yuktaṁ majjāmāṁsādipūritam

...उसे दाँतों से मथकर और बार-बार चबाकर, हड्डी-चर्बी सहित मज्जा-मांस आदि से युक्त उस दानव-शरीर को...

श्लोक 101 (skanda.3.70.101)

नखरोमाभिसंयुक्तं प्रक्षिप्य चोदरेऽसुरम् । करेकेण मुखं रुद्धं करेणैकेन नासिकाम् ।

nakharomābhisaṁyuktaṁ prakṣipya codare'suram karekeṇa mukhaṁ ruddhaṁ kareṇaikena nāsikām

...नाखूनों और रोमों सहित उस असुर को अपने उदर में फेंककर, एक हाथ से अपना मुख और दूसरे हाथ से अपनी नासिका को बंद कर लिया।

श्लोक 102 (skanda.3.70.102)

ततो महाबलो दैत्यः कर्णरंध्रेण निर्गतः । ततस्तया महादेव्या नाम चक्रे तदा भुवि ।

tato mahābalo daityaḥ karṇaraṁdhreṇa nirgataḥ tatastayā mahādevyā nāma cakre tadā bhuvi

तब वह महाबली दैत्य कान के छिद्र से बाहर निकला। तब उस महादेवी ने पृथ्वी पर उसका नाम रखा।

श्लोक 103 (skanda.3.70.103)

कर्णरंध्रप्रसूतोऽयं कर्णाटेति विदुर्बुधाः । पुनर्युद्धार्थमायातो दैत्यो हि बलदर्पितः ।

karṇaraṁdhraprasūto'yaṁ karṇāṭeti vidurbudhāḥ punaryuddhārthamāyāto daityo hi baladarpitaḥ

'यह कान के छिद्र से जन्मा है, अतः कर्णाट कहलाएगा' — यह बुद्धिमान लोग जानते हैं। वह दैत्य अपने बल के गर्व से पुनः युद्ध के लिए आया।

श्लोक 104 (skanda.3.70.104)

गर्जमानोसुरस्तत्र सायुधो युधि संस्थितः । तं दृष्ट्वा दुःसहं दैत्यं विमृश्य च पुनः पुनः ।

garjamānosurastatra sāyudho yudhi saṁsthitaḥ taṁ dṛṣṭvā duḥsahaṁ daityaṁ vimṛśya ca punaḥ punaḥ

वह असुर गरजता हुआ, शस्त्रों सहित रणभूमि में डट गया। उस असह्य दैत्य को देखकर, बार-बार विचार करते हुए...

श्लोक 105 (skanda.3.70.105)

वधोपायं हि मातंगी चिंतयामास भारत । यदा चिंतयते देवी मातंगी मदपूरिता ।

vadhopāyaṁ hi mātaṁgī ciṁtayāmāsa bhārata yadā ciṁtayate devī mātaṁgī madapūritā

...हे भारत! मातंगी उसके वध का उपाय सोचने लगी। जब मद से भरी हुई देवी मातंगी इस प्रकार विचार कर रही थी...

श्लोक 106 (skanda.3.70.106)

मायारूपं समास्थाय कर्णाटः कुसुमायुधः । गौरश्चांबुजपत्राक्षं स्तथा षोडशवार्षिकम् ।

māyārūpaṁ samāsthāya karṇāṭaḥ kusumāyudhaḥ gauraścāṁbujapatrākṣaṁ stathā ṣoḍaśavārṣikam

...उधर कर्णाटक ने मायावी रूप धारण किया — कामदेव के समान, गौरवर्ण, कमलपत्र के समान नेत्रों वाला, सोलह वर्ष के युवक का रूप।

श्लोक 107 (skanda.3.70.107)

अभ्येत्य देवीं ब्रूते स्म मां त्वं वरय शोभने ।

abhyetya devīṁ brūte sma māṁ tvaṁ varaya śobhane

वह देवी के निकट जाकर बोला — 'हे शोभने! तुम मुझे वर के रूप में वरण करो।'

श्लोक 108 (skanda.3.70.108)

।। श्रीमातोवाच ।। साधु चेदं त्वया प्रोक्तं दैत्यराज सुनिश्चितम् । रूपेण सदृशो नान्यो विद्यते भुवनत्रये ।

śrīmātovāca sādhu cedaṁ tvayā proktaṁ daityarāja suniścitam rūpeṇa sadṛśo nānyo vidyate bhuvanatraye

श्रीमाता ने कहा — हे दैत्यराज! तुमने जो कहा वह उत्तम और निश्चित है; रूप में तुम्हारे समान कोई और तीनों लोकों में नहीं है।

श्लोक 109 (skanda.3.70.109)

प्रतिज्ञा मे कृता पूर्वं श्रुता किमसुरोत्तमं । ममानुजा शुभा श्यामा विवाहे विप्र कांक्षिणी ।

pratijñā me kṛtā pūrvaṁ śrutā kimasurottamaṁ mamānujā śubhā śyāmā vivāhe vipra kāṁkṣiṇī

किंतु हे असुरश्रेष्ठ! क्या तुमने पहले की गई मेरी एक प्रतिज्ञा सुनी है? मेरी छोटी बहन, शुभ श्यामला, विवाह के लिए एक ब्राह्मण की अभिलाषिणी है।

श्लोक 110 (skanda.3.70.110)

पित्रा मे स्थापिता दैत्य रक्षार्थं हि द्विजन्मनाम् । केवलं श्यामलांगी सा सर्वलोकहितावहा ।

pitrā me sthāpitā daitya rakṣārthaṁ hi dvijanmanām kevalaṁ śyāmalāṁgī sā sarvalokahitāvahā

हे दैत्य! मेरे पिता ने उसे केवल द्विजों की रक्षा के लिए स्थापित किया है; वह श्यामल अंगों वाली, सर्वलोक-हितकारिणी है।

श्लोक 111 (skanda.3.70.111)

न कश्चिद्वरयेत्कन्यामित्युक्त्वा स्थापिता तु सा । कथयाशु तव शुभं श्रुत्वोपायं कथं शुभम् ।

na kaścidvarayetkanyāmityuktvā sthāpitā tu sā kathayāśu tava śubhaṁ śrutvopāyaṁ kathaṁ śubham

'कोई भी इस कन्या का वरण न करे' — यह कहकर ही उसे स्थापित किया गया है। तुम्हें एक शुभ उपाय बताती हूँ, सुनकर बताओ यह शुभ है या नहीं।

श्लोक 112 (skanda.3.70.112)

भगिनी मेऽस्ति दैत्येंद्र श्यामलाह्यपरिग्रहा । तवार्थं रक्षिता शूर तां च पूर्वेण चोद्वह ।

bhaginī me'sti daityeṁdra śyāmalāhyaparigrahā tavārthaṁ rakṣitā śūra tāṁ ca pūrveṇa codvaha

हे दैत्येंद्र! मेरी वह अविवाहित बहन श्यामला है, और वह वस्तुतः पहले से ही तुम्हारे ही निमित्त सुरक्षित रखी गई है, हे शूर! उसी से पहले विवाह करो।

श्लोक 113 (skanda.3.70.113)

स पिता तां महावीर दास्यते वै शुभामिमाम् । गच्छ त्वं व्रियतां ह्येव श्यामला कोपसंयुता ।

sa pitā tāṁ mahāvīra dāsyate vai śubhāmimām gaccha tvaṁ vriyatāṁ hyeva śyāmalā kopasaṁyutā

हे महावीर! मेरे पिता उस शुभा को तुम्हें अवश्य ही सौंप देंगे। जाओ, श्यामला का वरण करो, भले ही वह क्रोधित हो।

श्लोक 114 (skanda.3.70.114)

ततः कर्णाटकः क्रुद्धो गृहीत्वा शक्तिमूर्जिताम् । अभ्यधावत दुष्टात्मा श्यामलानिधनेच्छया ।

tataḥ karṇāṭakaḥ kruddho gṛhītvā śaktimūrjitām abhyadhāvata duṣṭātmā śyāmalānidhanecchayā

तब कर्णाटक क्रुद्ध होकर एक शक्तिशाली भाला लेकर श्यामला को मार डालने की इच्छा से उस दुष्टात्मा ने उस पर धावा बोल दिया।

श्लोक 115 (skanda.3.70.115)

आगतं चासुरं दृष्ट्वा श्यामला सुमहामनाः । विवाहार्थं परं ज्ञात्वाऽभिप्रायं दुष्टचेतसः ।

āgataṁ cāsuraṁ dṛṣṭvā śyāmalā sumahāmanāḥ vivāhārthaṁ paraṁ jñātvā'bhiprāyaṁ duṣṭacetasaḥ

उस असुर को आते देखकर, अत्यंत उदार हृदय वाली श्यामला ने उस दुष्टचित्त की असली मंशा को जान लिया — कि वह विवाह के बहाने आया है।

श्लोक 116 (skanda.3.70.116)

महायुद्धमभूत्तत्र श्यामलाऽसुरवर्ययोः । मासत्रयं ततो राजंश्चाभवत्तुमुलं क्षितौ ।

mahāyuddhamabhūttatra śyāmalā'suravaryayoḥ māsatrayaṁ tato rājaṁścābhavattumulaṁ kṣitau

वहाँ श्यामला और उस श्रेष्ठ असुर के बीच एक महायुद्ध छिड़ गया। हे राजन्! फिर वह तीन महीनों तक पृथ्वी पर घमासान युद्ध चलता रहा।

श्लोक 117 (skanda.3.70.117)

माघे कृष्णतृतीयायां धर्मारण्ये महारणे । मध्याह्नसमये भूप कर्णाटाख्यो निपातितः ।

māghe kṛṣṇatṛtīyāyāṁ dharmāraṇye mahāraṇe madhyāhnasamaye bhūpa karṇāṭākhyo nipātitaḥ

माघ मास की कृष्ण तृतीया को, धर्मारण्य के उस महासंग्राम में, मध्याह्न के समय, हे राजन्! कर्णाटक नामक दैत्य को धराशायी कर दिया गया।

श्लोक 118 (skanda.3.70.118)

कार्णाटिः पतितस्तत्र यत्र देव्या निपातितः । तच्छैल शृंगप्रतिमं पपात शिर उत्तमम् ।

kārṇāṭiḥ patitastatra yatra devyā nipātitaḥ tacchaila śṛṁgapratimaṁ papāta śira uttamam

वह कार्णाटि जहाँ देवी द्वारा गिराया गया, वहीं पर्वत-शिखर के समान उसका विशाल सिर धराशायी हो गया।

श्लोक 119 (skanda.3.70.119)

चचाल सकला पृथ्वी साब्धिद्वीपा सपर्वता । ततो विप्राः प्रहृष्टास्ते जय मातरुदैरयन् ।

cacāla sakalā pṛthvī sābdhidvīpā saparvatā tato viprāḥ prahṛṣṭāste jaya mātarudairayan

सारी पृथ्वी, समुद्रों, द्वीपों और पर्वतों सहित काँप उठी। तब सब ब्राह्मण अत्यंत हर्षित होकर 'माता की जय' का उद्घोष करने लगे।

श्लोक 120 (skanda.3.70.120)

जगुर्गन्धर्वपतयो ननृतुश्चाप्सरोगणाः । ततोत्सवं प्रकुर्वन्तो गीतं नृत्यं शुभप्रदम् ।

jagurgandharvapatayo nanṛtuścāpsarogaṇāḥ tatotsavaṁ prakurvaṁto gītaṁ nṛtyaṁ śubhapradam

गंधर्वों के अधिपति गान करने लगे, अप्सराओं के समूह नृत्य करने लगे। तब सब लोगों ने उत्सव मनाते हुए शुभप्रद गान और नृत्य किया।

श्लोक 121 (skanda.3.70.121)

पायसैर्वटकैश्चैव नैवेद्यैर्मोदकैस्तथा । तुष्टवुः शुभवाण्या ते स्थाने मोटेरके वरे ।

pāyasairvaṭakaiścaiva naivedyairmodakaistathā tuṣṭavuḥ śubhavāṇyā te sthāne moṭerake vare

खीर, वड़े, नैवेद्य और मोदकों से, तथा शुभ वाणी में स्तुति करते हुए उन्होंने उस उत्तम स्थान मोटेरक में देवी को संतुष्ट किया।

श्लोक 122 (skanda.3.70.122)

श्रीमती पूजिता सा च सुतसौख्यधनप्रदा । महोत्सवे च संप्राप्ते मातंगीपूजनं हितम् ।

śrīmatī pūjitā sā ca sutasaukhyadhanapradā mahotsave ca saṁprāpte mātaṁgīpūjanaṁ hitam

वह श्रीमती देवी, संतान, सुख और धन देने वाली, पूजित हुई। किसी भी महोत्सव के आने पर मातंगी की पूजा करना कल्याणकारी है।

श्लोक 123 (skanda.3.70.123)

ये ऽर्चयंति स्थापयित्वा धनपुत्रार्थसिद्धये । सुखं कीर्तिं तथायुष्यं यशः पुण्यं समाप्नुयुः ।

ye'rcayaṁti sthāpayitvā dhanaputrārthasiddhaye sukhaṁ kīrtiṁ tathāyuṣyaṁ yaśaḥ puṇyaṁ samāpnuyuḥ

जो लोग उसकी मूर्ति स्थापित कर धन, पुत्र और अर्थ की सिद्धि के लिए उसकी पूजा करते हैं, वे सुख, कीर्ति, आयु, यश और पुण्य प्राप्त करते हैं।

श्लोक 124 (skanda.3.70.124)

व्याधयो नाशमायांति चादित्याद्या ग्रहाः शुभाः । भूतवेतालशाकिन्यो जंभाद्याः पीडयन्ति न ।

vyādhayo nāśamāyāṁti cādityādyā grahāḥ śubhāḥ bhūtavetālaśākinyo jaṁbhādyāḥ pīḍayaṁti na

उनके रोग नष्ट हो जाते हैं, और सूर्य आदि ग्रह उनके लिए शुभ हो जाते हैं। भूत, बेताल, शाकिनी और जंभ आदि उन्हें कभी पीड़ित नहीं करते।

श्लोक 125 (skanda.3.70.125)

न जायते तथा क्वापि प्रेतादीनां प्रपीडनम् । ततो विप्राः प्रहृष्टाश्च स्तुतिं कर्तुं समुद्यताः ।

na jāyate tathā kvāpi pretādīnāṁ prapīḍanam tato viprāḥ prahṛṣṭāśca stutiṁ kartuṁ samudyatāḥ

न ही उन्हें कभी प्रेतों आदि की पीड़ा प्राप्त होती है। तब वे प्रसन्न हुए ब्राह्मण फिर से स्तुति करने के लिए उद्यत हुए।

श्लोक 126 (skanda.3.70.126)

श्रीमाता चैव शक्तीश्च मातंगीमस्तुवंस्तदा । श्यामलां च महादेवीं हर्षेण महतायुता ।

śrīmātā caiva śaktīśca mātaṁgīmastuvaṁstadā śyāmalāṁ ca mahādevīṁ harṣeṇa mahatāyutā

वे श्रीमाता, समस्त शक्तियों और मातंगी की स्तुति करने लगे, और महान हर्ष से युक्त होकर महादेवी श्यामला की भी स्तुति की।

श्लोक 127 (skanda.3.70.127)

।। विप्रा ऊचुः ।। मातस्त्वमेवमस्माकं रक्षिका स्थानके भव । दंपतीनां हितार्थाय यथा नोद्विजते द्विजाः ।

viprā ūcuḥ mātastvamevamasmākaṁ rakṣikā sthānake bhava daṁpatīnāṁ hitārthāya yathā nodvijate dvijāḥ

ब्राह्मणों ने कहा — हे माता! तुम इसी प्रकार सदा हमारे इस स्थान की रक्षिका बनी रहो, वर-वधुओं के हित के लिए, ताकि ब्राह्मणों को कभी उद्विग्न न होना पड़े।

श्लोक 128 (skanda.3.70.128)

।। मातंग्युवाच ।। तुष्टाहं वो महाभागाः स्तवेनानेन वो द्विजाः । वरयध्वं वरं यद्वो मनसा समभीप्सितम् ।

mātaṁgyuvāca tuṣṭāhaṁ vo mahābhāgāḥ stavenānena vo dvijāḥ varayadhvaṁ varaṁ yadvo manasā samabhīpsitam

मातंगी ने कहा — हे महाभागो, हे द्विजो! तुम्हारी इस स्तुति से मैं संतुष्ट हूँ। जो तुम्हारे मन में अभीष्ट हो, वह वर माँगो।

श्लोक 129 (skanda.3.70.129)

।। ब्राह्मणा ऊचुः ।। दास्यामहे बलिं देवि यस्ते मनसि वर्तते । अस्माकं चैव दम्पत्यो रक्षार्थं त्वं स्थिरा भव ।

brāhmaṇā ūcuḥ dāsyāmahe baliṁ devi yaste manasi vartate asmākaṁ caiva dampatyo rakṣārthaṁ tvaṁ sthirā bhava

ब्राह्मणों ने कहा — हे देवि! जो तुम्हारे मन में हो, वही बलि हम तुम्हें अर्पित करेंगे। हमारे वर-वधुओं की रक्षा के लिए तुम सदा यहाँ स्थिर रहो।

श्लोक 130 (skanda.3.70.130)

।। देव्युवाच ।। स्वस्थाः संतु द्विजाः सर्वे न च पीडा भविष्यति । मयि स्थितायां दुर्धर्षा दैत्या येऽन्ये च राक्षसाः ।

devyuvāca svasthāḥ saṁtu dvijāḥ sarve na ca pīḍā bhaviṣyati mayi sthitāyāṁ durdharṣā daityā ye'nye ca rākṣasāḥ

देवी ने कहा — सब ब्राह्मण स्वस्थ रहें, उन्हें कोई पीड़ा नहीं होगी। मेरे यहाँ स्थित रहते हुए, दुर्जेय दैत्य तथा अन्य राक्षस भी...

श्लोक 131 (skanda.3.70.131)

शाकिनीभूतप्रेताश्च जंभाद्याश्च ग्रहास्तथा । शाकिन्यादिग्रहाश्चैव सर्पा व्याघ्रादयस्तथा ।

śākinībhūtapretāśca jaṁbhādyāśca grahāstathā śākinyādigrahāścaiva sarpā vyāghrādayastathā

...शाकिनियाँ, भूत, प्रेत, जंभ आदि ग्रह, शाकिनी आदि ग्रह, सर्प तथा बाघ आदि —

श्लोक 132 (skanda.3.70.132)

पीडयिष्यंति न क्वापि स्थितायां मयि शासने । महोत्सवं यः कुरुते विवाहे समुपस्थिते ।

pīḍayiṣyaṁti na kvāpi sthitāyāṁ mayi śāsane mahotsavaṁ yaḥ kurute vivāhe samupasthite

मेरे शासन में स्थित रहते हुए वे कहीं भी किसी को पीड़ित नहीं करेंगे। जो कोई विवाह उपस्थित होने पर महोत्सव मनाता है...

श्लोक 133 (skanda.3.70.133)

दंपत्योश्च हितार्थं हि पूजयेन्मां सदा नरः । तस्याहं सकला बाधां नाशयिष्याम्यसंशयम् ।

daṁpatyośca hitārthaṁ hi pūjayenmāṁ sadā naraḥ tasyāhaṁ sakalā bādhāṁ nāśayiṣyāmyasaṁśayam

...और वर-वधुओं के हित के लिए मेरी पूजा सदा करता है, उसकी समस्त बाधाओं को मैं निश्चय ही नष्ट कर दूँगी।

श्लोक 134 (skanda.3.70.134)

नाधयो व्याधयश्चैव न क्लेशो न च संभ्रमः । प्राप्यते परमं सौख्यं यशः पुण्यं धनं सदा । नाकाले मरणं तस्य वातपित्तादिकं नहि ।

nādhayo vyādhayaścaiva na kleśo na ca saṁbhramaḥ prāpyate paramaṁ saukhyaṁ yaśaḥ puṇyaṁ dhanaṁ sadā nākāle maraṇaṁ tasya vātapittādikaṁ nahi

उसे न मानसिक व्यथा होगी, न शारीरिक रोग, न क्लेश, न भ्रम। उसे सदा परम सुख, यश, पुण्य और धन प्राप्त होगा। उसकी असमय मृत्यु नहीं होगी, न वात-पित्त आदि रोग होंगे।

श्लोक 135 (skanda.3.70.135)

।। विप्रा ऊचुः ।। केन वा विधिना पूजा नैवेद्यं कीदृशं भवेत् । धूपं च कीदृशं मातः कथं पूजां प्रकल्पयेत् ।

viprā ūcuḥ kena vā vidhinā pūjā naivedyaṁ kīdṛśaṁ bhavet dhūpaṁ ca kīdṛśaṁ mātaḥ kathaṁ pūjāṁ prakalpayet

ब्राह्मणों ने कहा — तुम्हारी पूजा किस विधि से होनी चाहिए, नैवेद्य कैसा हो, धूप कैसा हो, हे माता! पूजा किस प्रकार करनी चाहिए?

श्लोक 136 (skanda.3.70.136)

।। श्रीदेव्युवाच ।। श्रूयतां मे वचो विप्रा पत्रे चैव हिरण्मये । लिखित्वा पूजयेद्यस्तु चिरायुर्दंपती भवेत् ।

śrīdevyuvāca śrūyatāṁ me vaco viprā patre caiva hiraṇmaye likhitvā pūjayedyastu cirāyurdaṁpatī bhavet

श्री देवी ने कहा — हे विप्रो! मेरा वचन सुनो। जो स्वर्णपत्र पर मेरा चित्र बनाकर पूजा करता है, उस वर-वधू की आयु दीर्घ होती है।

श्लोक 137 (skanda.3.70.137)

अथवा राजते पत्रे कांसपत्रेऽथवा पुनः । अष्टादशभुजा देवी चंदनेन विचर्चिता ।

athavā rājate patre kāṁsapatre'thavā punaḥ aṣṭādaśabhujā devī caṁdanena vicarcitā

अथवा चाँदी के पत्र पर, अथवा काँसे के पत्र पर, अठारह भुजाओं वाली उस देवी को अंकित कर चंदन से चर्चित करना चाहिए।

श्लोक 138 (skanda.3.70.138)

शूर्पं शरैः करे श्वानं पद्मं तु परमं पुनः । कर्त्तरीं कारयेदेकां तूणीरं च धनूंषि च ।

śūrpaṁ śaraiḥ kare śvānaṁ padmaṁ tu paramaṁ punaḥ karttarīṁ kārayedekāṁ tūṇīraṁ ca dhanūṁṣi ca

उसके हाथों में सूप, बाणों सहित, कुत्ता, तथा एक उत्तम कमल भी अंकित करना चाहिए; इसके साथ ही एक कैंची, तरकश और धनुष भी।

श्लोक 139 (skanda.3.70.139)

चर्म पाशं मुद्गरं च कांसालं तोमरं तथा । शंखं चक्रं गदां शुभ्रां मुशलं परिघं शुभम् ।

carma pāśaṁ mudgaraṁ ca kāṁsālaṁ tomaraṁ tathā śaṁkhaṁ cakraṁ gadāṁ śubhrāṁ muśalaṁ parighaṁ śubham

ढाल, पाश, मुद्गर, काँसे का बर्तन, भाला, शंख, चक्र, श्वेत गदा, मूसल तथा शुभ परिघ भी।

श्लोक 140 (skanda.3.70.140)

खट्वांगं बदरीं चैव अंकुशं च मनोरमम् । अष्टादशायुधैरेभिः संयुता भुवनेश्वरी ।

khaṭvāṁgaṁ badarīṁ caiva aṁkuśaṁ ca manoramam aṣṭādaśāyudhairebhiḥ saṁyutā bhuvaneśvarī

खट्वांग (त्रिशूल-दंड), बेर की डाली, और एक सुंदर अंकुश — इन अठारह आयुधों से युक्त भुवनेश्वरी को दिखाना चाहिए।

श्लोक 141 (skanda.3.70.141)

लिखेत्सकुंडलां देवीं बाहुनूपुरभूषिताम् । केयूरमुक्तापद्मैश्च मुंडमालाभिरन्विताम् ।

likhetsakuṁḍalāṁ devīṁ bāhunūpurabhūṣitām keyūramuktāpadmaiśca muṁḍamālābhiranvitām

उस देवी को कुंडल सहित, भुजाओं में नूपुर से भूषित, केयूर, मोतियों और कमलों से युक्त, तथा मुंडमाला से सुसज्जित अंकित करना चाहिए।

श्लोक 142 (skanda.3.70.142)

मातृकाक्षरपरिवृतामंगुलीयकसंयुताम् । नानाभरणशोभाढ्यां लिखित्वा भुवनेश्वरीम् ।

mātṛkākṣaraparivṛtāmaṁgulīyakasaṁyutām nānābharaṇaśobhāḍhyāṁ likhitvā bhuvaneśvarīm

वर्णमाला के अक्षरों से घिरी हुई, अंगूठियों से युक्त, नाना आभूषणों की शोभा से समृद्ध — इस प्रकार भुवनेश्वरी को अंकित करना चाहिए।

श्लोक 143 (skanda.3.70.143)

मातंगीमिति विख्यातां प्रतिष्ठार्थं द्विजोत्तमाः । चन्दनेन च हृद्येन पुष्पैश्चैव प्रपूजयेत् ।

mātaṁgīmiti vikhyātāṁ pratiṣṭhārthaṁ dvijottamāḥ candanena ca hṛdyena puṣpaiścaiva prapūjayet

इस प्रकार मातंगी नाम से विख्यात उस देवी की प्रतिष्ठा के लिए, हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! उसकी पूजा मनोहर चंदन और पुष्पों से करनी चाहिए।

श्लोक 144 (skanda.3.70.144)

यक्षकर्दममानीय मातंगीं पूजयेत्सुधीः । घृतेन बोधयेद्दीपं सप्तवर्तियुतं शुभम् ।

yakṣakardamamānīya mātaṁgīṁ pūjayetsudhīḥ ghṛtena bodhayeddīpaṁ saptavartiyutaṁ śubham

यक्षकर्दम (सुगंधित लेप) लाकर बुद्धिमान व्यक्ति मातंगी की पूजा करे, और घृत से सात बत्तियों वाला शुभ दीप प्रज्वलित करे।

श्लोक 145 (skanda.3.70.145)

धूपयेद्गुग्गुलेनाथ साज्येनाति सुगंधिना । नालिकेरेण शुभ्रेण दद्यादर्घं च दंपती ।

dhūpayedguggulenātha sājyenāti sugaṁdhinā nālikereṇa śubhreṇa dadyādarghaṁ ca daṁpatī

घृत मिश्रित, अत्यंत सुगंधित गुग्गुल से धूप देनी चाहिए, और श्वेत नारियल से युक्त अर्घ्य वर-वधुओं को अर्पित करना चाहिए।

श्लोक 146 (skanda.3.70.146)

प्रदक्षिणाः प्रकुर्वीत चतुरः सुमनोरमम् । वस्त्रांशुकं गुंठयित्वा अग्रे कृत्वा च दंपती ।

pradakṣiṇāḥ prakurvīta caturaḥ sumanoramam vastrāṁśukaṁ guṁṭhayitvā agre kṛtvā ca daṁpatī

चार सुंदर प्रदक्षिणाएँ करनी चाहिए। वर-वधुओं को वस्त्र-अंचल में लपेटकर आगे रखना चाहिए।

श्लोक 147 (skanda.3.70.147)

प्रोक्षिणीकृत्य मातंग्याः प्राश्य माध्वीकमुत्तमम् । गीतवादित्रनिर्घोषैर्मातंगीं पूजयेत्सुधीः ।

prokṣiṇīkṛtya mātaṁgyāḥ prāśya mādhvīkamuttamam gītavāditranirghoṣairmātaṁgīṁ pūjayetsudhīḥ

मातंगी के लिए अभिमंत्रित जल छिड़ककर, उत्तम मधु-मद्य का प्राशन कराकर, गीत और वाद्य-घोष के साथ बुद्धिमान व्यक्ति मातंगी की पूजा करे।

श्लोक 148 (skanda.3.70.148)

सुवासिनीस्तु तद्रूपा मातंगीसंभवा इति । नृत्यंती दम्पती चाग्रे सर्वोपद्रवशांतये ।

suvāsinīstu tadrūpā mātaṁgīsaṁbhavā iti nṛtyaṁtī dampatī cāgre sarvopadravaśāṁtaye

सौभाग्यवती स्त्रियों को मातंगी के ही रूप में मानकर, वर-वधू के आगे नृत्य करते हुए, सब उपद्रवों की शांति के लिए यह करना चाहिए।

श्लोक 149 (skanda.3.70.149)

नैवेद्यं विविधान्नेन अष्टादशविधं शुभम् । वटकापूपिकाः शुभ्राः क्षीरं शर्करया युतम् ।

naivedyaṁ vividhānnena aṣṭādaśavidhaṁ śubham vaṭakāpūpikāḥ śubhrāḥ kṣīraṁ śarkarayā yutam

नैवेद्य विविध अन्न के साथ अठारह प्रकार का शुभ होना चाहिए — श्वेत वड़े, पुए, तथा शक्कर मिश्रित दूध।

श्लोक 150 (skanda.3.70.150)

बल्लाकरं वरं यूपा क्षिप्तकुल्माषकं तथा । सोहालिका भिन्नवटा लाप्सिका पद्मचूर्णकम् ।

ballākaraṁ varaṁ yūpā kṣiptakulmāṣakaṁ tathā sohālikā bhinnavaṭā lāpsikā padmacūrṇakam

वल्लाकर, यूप (एक पकवान), उबले चने, सोहालिका, फूटे हुए वड़े, लाप्सिका और कमल के आटे से बना पकवान।

श्लोक 151 (skanda.3.70.151)

शैवेया विमलास्तत्र पर्पटाः शालकादयः । पूरणं तस्य मासस्य कुर्याच्छुभ्रं मनोरमम् ।

śaiveyā vimalāstatra parpaṭāḥ śālakādayaḥ pūraṇaṁ tasya māsasya kuryācchubhraṁ manoramam

शैवेया (एक पकवान), निर्मल पापड़, शालक आदि — उस मास (उड़द) की श्वेत, मनोहर पूरण-रोटी भी बनानी चाहिए।

श्लोक 152 (skanda.3.70.152)

राजमाषाः सूपचिताः कल्पयेत्तत्र दंपती । फेणिका रोपिकास्तत्र कुर्याच्चैव मनोरमाः ।

rājamāṣāḥ sūpacitāḥ kalpayettatra daṁpatī phenikā ropikāstatra kuryāccaiva manoramāḥ

वर-वधुओं को वहाँ राजमा से बनी सूप और लोभनीय फेनी तथा रोपिका भी बनानी चाहिए।

श्लोक 153 (skanda.3.70.153)

एतान्यष्टादशान्यानि पक्वान्नानि प्रकल्पयेत् । आज्यशर्करायुक्तानि युक्तानि शाकसंचयैः ।

etānyaṣṭādaśānyāni pakvānnāni prakalpayet ājyaśarkarāyuktāni yuktāni śākasaṁcayaiḥ

इस प्रकार अठारह प्रकार के पकवान तैयार करने चाहिए, घी-शक्कर से युक्त और विविध शाकों के साथ।

श्लोक 154 (skanda.3.70.154)

रात्रौ जागरणं कार्यं सुवासिनीं च पूजयेत् । मुखावलोकनं चाज्ये कुर्वीयातां च दम्पती ।

rātrau jāgaraṇaṁ kāryaṁ suvāsinīṁ ca pūjayet mukhāvalokanaṁ cājye kurvīyātāṁ ca dampatī

रात्रि में जागरण करना चाहिए, और सौभाग्यवती स्त्रियों की पूजा करनी चाहिए। वर-वधू को घी में एक-दूसरे का मुख देखना चाहिए।

श्लोक 155 (skanda.3.70.155)

परस्परं हि कुर्वीत उत्पातपरिशांतये । एवं विधं मयाख्यातं मातंगीपूजनं शुभम् ।

parasparaṁ hi kurvīta utpātapariśāṁtaye evaṁ vidhaṁ mayākhyātaṁ mātaṁgīpūjanaṁ śubham

यह विधि परस्पर उत्पातों की शांति के लिए करनी चाहिए। इस प्रकार मैंने तुम्हें मातंगी की शुभ पूजा-विधि बता दी।

श्लोक 156 (skanda.3.70.156)

न पूजयति यो मूढस्तस्य विप्रं करोति सा । दंपत्योर्मरणं चाथ धननाशं महाभयम् ।

na pūjayati yo mūḍhastasya vipraṁ karoti sā daṁpatyormaraṇaṁ cātha dhananāśaṁ mahābhayam

जो मूर्ख इस पूजा को नहीं करता, उसके लिए वह वर-वधू का मरण, धन का नाश और महान भय उत्पन्न कर देती है।

श्लोक 157 (skanda.3.70.157)

क्लेशं रोगं तथा वह्नेः प्रादुर्भावं प्रपश्यति । एतस्मात्कारणाद्विप्रा मातंगीं पूजयेत्सुधीः ।

kleśaṁ rogaṁ tathā vahneḥ prādurbhāvaṁ prapaśyati etasmātkāraṇādviprā mātaṁgīṁ pūjayetsudhīḥ

वह क्लेश, रोग तथा अग्नि के प्रकोप को भी देखता है। इसी कारण से, हे विप्रो! बुद्धिमान व्यक्ति को मातंगी की पूजा करनी चाहिए।

श्लोक 158 (skanda.3.70.158)

दंपतीनां च सर्वेषां द्विजातीनां च शासने । वणिजां च महादेवी निर्विघ्नं कुरुते सदा ।

daṁpatīnāṁ ca sarveṣāṁ dvijātīnāṁ ca śāsane vaṇijāṁ ca mahādevī nirvighnaṁ kurute sadā

वह महादेवी अपने शासन में सभी वर-वधुओं, द्विजातियों तथा व्यापारियों के लिए सदा निर्विघ्नता प्रदान करती है।

श्लोक 159 (skanda.3.70.159)

तथेति चैव तैरुक्ते पुनर्वचनमब्रवीत् । श्रूयतां ब्राह्मणाः सर्वे विवाहादिमहोत्सवम् ।

tatheti caiva tairukte punarvacanamabravīt śrūyatāṁ brāhmaṇāḥ sarve vivāhādimahotsavam

'तथास्तु' कहे जाने पर उसने पुनः यह वचन कहा — हे समस्त ब्राह्मणो! सुनो, विवाह आदि महोत्सव के विषय में और भी बताती हूँ।

श्लोक 160 (skanda.3.70.160)

मदीयवचनं श्रुत्वा तथा कुरुत वै विधिम् । विवाहकाले संप्राप्ते दंपत्योः सौख्यहेतवे ।

madīyavacanaṁ śrutvā tathā kuruta vai vidhim vivāhakāle saṁprāpte daṁpatyoḥ saukhyahetave

मेरे इस वचन को सुनकर, विवाह का समय आने पर, वर-वधू के सुख के लिए विधिपूर्वक यह अनुष्ठान करो।

श्लोक 161 (skanda.3.70.161)

निर्विघ्नार्थं तु कर्तव्यं निजैश्च सह सेवकैः । अंजनं नयने कुर्यात्सं बंधिनां व सर्वशः ।

nirvighnārthaṁ tu kartavyaṁ nijaiśca saha sevakaiḥ aṁjanaṁ nayane kuryātsaṁ baṁdhināṁ va sarvaśaḥ

निर्विघ्नता के लिए यह अपने परिजनों और सेवकों सहित करना चाहिए। सभी संबंधियों की आँखों में अंजन लगाना चाहिए।

श्लोक 162 (skanda.3.70.162)

भ्रूमध्यात्तु प्रकर्त्तव्यमर्द्धचंद्रसमाकृति । बिंदुं तु कारयेद्विप्रास्तस्योपरि मनोहरम् ।

bhrūmadhyāttu prakarttavyamarddhacaṁdrasamākṛti biṁduṁ tu kārayedviprāstasyopari manoharam

भ्रूमध्य में अर्धचंद्र के समान आकृति बनानी चाहिए, और हे ब्राह्मणो! उसके ऊपर एक मनोहर बिंदु भी बनवाना चाहिए।

श्लोक 163 (skanda.3.70.163)

एवं कृते तदा विप्राः शांतिर्भवति नान्यथा । पुत्रवृद्धिकरं चैतत्तिलकं चार्द्धबिंबकम् । सर्वविघ्नहरं सर्वदौःस्थ्यव्याधिविनाशनम् ।

evaṁ kṛte tadā viprāḥ śāṁtirbhavati nānyathā putravṛddhikaraṁ caitattilakaṁ cārddhabiṁbakam sarvavighnaharaṁ sarvadauḥsthyavyādhivināśanam

ऐसा करने पर ही, हे ब्राह्मणो! शांति प्राप्त होती है, अन्यथा नहीं। यह अर्धबिंब वाला तिलक संतान की वृद्धि करने वाला, सब विघ्नों को हरने वाला और सब पीड़ाओं तथा रोगों का नाश करने वाला है।

श्लोक 164 (skanda.3.70.164)

।। व्यास उवाच ।। ततः शांताः प्रजाः सर्वा धर्मारण्ये नराधिप । प्रसादाच्चैव मातङ्ग्या देव्या वै सत्यमंदिरे ।

vyāsa uvāca tataḥ śāṁtāḥ prajāḥ sarvā dharmāraṇye narādhipa prasādāccaiva mātaṁgyā devyā vai satyamaṁdire

व्यासजी ने कहा — हे नराधिप! उस देवी मातंगी की कृपा से धर्मारण्य में सत्यमंदिर की समस्त प्रजा तब शांत हो गई।

श्लोक 165 (skanda.3.70.165)

ततो हृष्टहृदा विप्राः पुपूजुस्ते विधेः सुताम् । मातंग्याश्च प्रकर्त्तव्यं वर्षेवर्षे च पूजनम् ।

tato hṛṣṭahṛdā viprāḥ pupūjuste vidheḥ sutām mātaṁgyāśca prakarttavyaṁ varṣevarṣe ca pūjanam

तब प्रसन्नचित्त हुए ब्राह्मणों ने ब्रह्मा की उस पुत्री की पूजा की। मातंगी की पूजा प्रत्येक वर्ष करनी चाहिए।

श्लोक 166 (skanda.3.70.166)

माघासिते तृतीयायां भक्ष्यभोज्यादिभिस्तथा । कर्णाटस्य तथोत्पत्तिः पुनर्जाता तु भूतले ।

māghāsite tṛtīyāyāṁ bhakṣyabhojyādibhistathā karṇāṭasya tathotpattiḥ punarjātā tu bhūtale

माघ की कृष्ण तृतीया को खाद्य-भोज्य आदि से यह पूजा करनी चाहिए। कर्णाटक की उत्पत्ति (इस नाम से) पृथ्वी पर पुनः हुई।

श्लोक 167 (skanda.3.70.167)

भयाच्चैव हि तत्स्थानं त्यक्त्वा याम्यमगात्ततः । गच्छमानस्तदा दैत्यो यक्ष्मरूपो ह्यभाषत ।

bhayāccaiva hi tatsthānaṁ tyaktvā yāmyamagāttataḥ gacchamānastadā daityo yakṣmarūpo hyabhāṣata

भय के कारण वह उस स्थान को छोड़कर दक्षिण दिशा की ओर चला गया। जाते समय उस दैत्य ने यक्ष्मा (क्षय रोग) का रूप धारण कर यह कहा।

श्लोक 168 (skanda.3.70.168)

श्रूयतां भो द्विजाः सर्वे धर्मारण्यनिवासिनः । वणिजश्च महच्चेदं मद्वाक्यं परिपाल्यताम् ।

śrūyatāṁ bho dvijāḥ sarve dharmāraṇyanivāsinaḥ vaṇijaśca mahaccedaṁ madvākyaṁ paripālyatām

'सुनो, हे धर्मारण्य के सभी निवासी ब्राह्मणो और व्यापारियो! मेरे इस महत्वपूर्ण वचन का पालन करो।'

श्लोक 169 (skanda.3.70.169)

माघमासे हि मत्प्रीत्या निर्विघ्नार्थं सदा भुवि । त्रिदलेन च धान्येन मूलकेन विशेषतः ।

māghamāse hi matprītyā nirvighnārthaṁ sadā bhuvi tridalena ca dhānyena mūlakena viśeṣataḥ

'माघ मास में मेरी प्रसन्नता के लिए, पृथ्वी पर सदा निर्विघ्नता के लिए, त्रिदल (बेलपत्र) से, धान्य से, विशेषतः मूली से...'

श्लोक 170 (skanda.3.70.170)

तिल तैलेन वा कुर्यात्पुरुषो नियतव्रतः । एकाशनं हि कुरुते यक्ष्मप्रीत्यै निरंतरम् ।

tila tailena vā kuryātpuruṣo niyatavrataḥ ekāśanaṁ hi kurute yakṣmaprītyai niraṁtaram

'...अथवा तिल के तेल से, नियमपूर्वक व्रत रखने वाला पुरुष एक बार भोजन करे — यह यक्ष्म की प्रसन्नता के लिए निरंतर किया जाना चाहिए।'

श्लोक 171 (skanda.3.70.171)

आबालयौवनेनैव वृद्धेनापीह सर्वदा । वर्षेवर्षे प्रकर्त्तव्यं यक्ष्मणो व्रतमुत्तमम् ।

ābālayauvanenaiva vṛddhenāpīha sarvadā varṣevarṣe prakarttavyaṁ yakṣmaṇo vratamuttamam

'बालकों से लेकर युवाओं तक, तथा वृद्धों को भी, सदा प्रत्येक वर्ष यक्ष्म का यह उत्तम व्रत करना चाहिए।'

श्लोक 172 (skanda.3.70.172)

यस्मिन्गृहे हि यावच्च पुरुषाकाररूपिणः । तस्याह्वयं प्रकुर्युस्त एकभक्तरताः सदा ।

yasmingṛhe hi yāvacca puruṣākārarūpiṇaḥ tasyāhvayaṁ prakuryusta ekabhaktaratāḥ sadā

'जिस घर में जितने भी पुरुष हों, वे सब सदा एक ही समय भोजन करते हुए उसके नाम का आह्वान करें।'

श्लोक 173 (skanda.3.70.173)

बालस्यार्थे तु जननी कुरुते व्रतमुत्तमम् । पिता वाप्यथवा भ्राता यन्निमित्तं व्रतं चरेत् ।

bālasyārthe tu jananī kurute vratamuttamam pitā vāpyathavā bhrātā yannimittaṁ vrataṁ caret

'बालक के लिए माता यह उत्तम व्रत करती है; पिता अथवा भाई भी उसके निमित्त यह व्रत रख सकते हैं।'

श्लोक 174 (skanda.3.70.174)

न च तस्य भयं क्वापि न व्याधिर्न च बंधनम् । भर्तुर्निमित्ते स्त्री कुर्यादशक्ते त्वितरेण च ।

na ca tasya bhayaṁ kvāpi na vyādhirna ca baṁdhanam bharturnimitte strī kuryādaśakte tvitareṇa ca

'उसे कहीं भी भय नहीं होगा, न रोग, न बंधन। यदि पति असमर्थ हो, तो पत्नी उसके निमित्त यह व्रत करे, अथवा कोई अन्य कर सकता है।'

श्लोक 175 (skanda.3.70.175)

एवं समादिशन्दैत्यः सत्यमंदिरमुत्सृजन् । गतोऽसौ याम्यदिग्भाग उदधेस्तीर उत्तमे ।

evaṁ samādiśandaityaḥ satyamaṁdiramutsṛjan gato'sau yāmyadigbhāga udadhestīra uttame

इस प्रकार आदेश देकर वह दैत्य सत्यमंदिर को छोड़कर दक्षिण दिशा की ओर, उत्तम समुद्र-तट पर चला गया।

श्लोक 176 (skanda.3.70.176)

विपुलं देहमासाद्य कर्णाटः स नराधिप । स्वनाम्ना चैव तं देशं स्थापयामास चोत्तमम् ।

vipulaṁ dehamāsādya karṇāṭaḥ sa narādhipa svanāmnā caiva taṁ deśaṁ sthāpayāmāsa cottamam

हे नराधिप! वह कर्णाटक एक विशाल देह धारण कर वहाँ बस गया, और अपने ही नाम से उस उत्तम देश को स्थापित किया।

श्लोक 177 (skanda.3.70.177)

यस्मिंश्च सर्ववस्तूनि धनधान्यानि भूरिशः । कर्णाटदेशं तं राजन्परिवार्य चिरं स्थितः ।

yasmiṁśca sarvavastūni dhanadhānyāni bhūriśaḥ karṇāṭadeśaṁ taṁ rājanparivārya ciraṁ sthitaḥ

हे राजन्! जहाँ सम्पूर्ण वस्तुएँ, धन-धान्य प्रचुर मात्रा में हैं, उस कर्णाट देश को घेरकर वह चिरकाल तक वहाँ स्थित रहा।

श्लोक 178 (skanda.3.70.178)

धर्मारण्यकथां पुण्यां कथितां नरसत्तम । श्रीमातुश्चैव माहात्म्यं शृण्वंति श्रावयंति ये ।

dharmāraṇyakathāṁ puṇyāṁ kathitāṁ narasattama śrīmātuścaiva māhātmyaṁ śṛṇvaṁti śrāvayaṁti ye

हे नरश्रेष्ठ! जो लोग इस पुण्यमयी धर्मारण्य-कथा और श्रीमाता की महिमा को सुनते और दूसरों को सुनाते हैं...

श्लोक 179 (skanda.3.70.179)

तेषां कुले कदाचित्तु अरिष्टं नैव जायते । अपुत्रो लभते पुत्रान्धनहीनस्तु संपदः । आयुरारोग्यमैश्वर्यं श्रीमातुश्च प्रसादतः ।

teṣāṁ kule kadācittu ariṣṭaṁ naiva jāyate aputro labhate putrāndhanahīnastu saṁpadaḥ āyurārogyamaiśvaryaṁ śrīmātuśca prasādataḥ

...उनके कुल में कभी भी अरिष्ट नहीं होता। पुत्रहीन पुत्र प्राप्त करता है, धनहीन संपत्ति प्राप्त करता है, और श्रीमाता की कृपा से दीर्घायु, आरोग्य तथा ऐश्वर्य प्राप्त होता है।

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