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ब्रह्म खण्ड · अध्याय 71

इंद्रेश्वर-जयंतेश्वर-महिमा

अध्याय 70अध्याय-सूचीअध्याय 72

श्लोक 1 (skanda.3.71.1)

।। व्यास उवाच ।। इन्द्रसरे नरः स्नात्वा दृष्ट्वा चेंद्रेश्वरं शिवम् । सप्तजन्मकृतात्पापान्मुच्यते नात्र संशयः ।

vyāsa uvāca indrasare naraḥ snātvā dṛṣṭvā ceṁdreśvaraṁ śivam saptajanmakṛtātpāpānmucyate nātra saṁśayaḥ

व्यासजी ने कहा — इंद्रसर में स्नान कर और शिव के इंद्रेश्वर रूप का दर्शन कर मनुष्य सात जन्मों के पापों से मुक्त हो जाता है, इसमें कोई संदेह नहीं।

श्लोक 2 (skanda.3.71.2)

।। युधिष्ठिर उवाच ।। केन चादौ निर्मितं तत्तीर्थं सर्वोत्तमोत्तमम् । यथावद्वर्णय त्वं मे भगवन्द्विजसत्तम ।

yudhiṣṭhira uvāca kena cādau nirmitaṁ tattīrthaṁ sarvottamottamam yathāvadvarṇaya tvaṁ me bhagavandvijasattama

युधिष्ठिर ने कहा — उस सर्वोत्तम तीर्थ का निर्माण सबसे पहले किसने किया? हे भगवन्, हे द्विजसत्तम! मुझे यथावत वर्णन कीजिए।

श्लोक 3 (skanda.3.71.3)

।। व्यास उवाच ।। इन्द्रेणैव महाराज तपस्तप्तं सुदुष्करम् । ग्रामादुत्तरदिग्भागे शतवर्षाणि तत्र वै ।

vyāsa uvāca indreṇaiva mahārāja tapastaptaṁ suduṣkaram grāmāduttaradigbhāge śatavarṣāṇi tatra vai

व्यासजी ने कहा — हे महाराज! इंद्र ने ही, गाँव के उत्तर दिशा में, वहाँ सौ वर्षों तक अत्यंत कठोर तपस्या की थी।

श्लोक 4 (skanda.3.71.4)

शिवोद्देशं महाघोरमेकांगुष्ठेन भारत । उर्द्ध्वबाहुर्महातेजाः सूर्यस्याभिमुखोऽभवत् ।

śivoddeśaṁ mahāghoramekāṁguṣṭhena bhārata urddhvabāhurmahātejāḥ sūryasyābhimukho'bhavat

हे भारत! शिव के निमित्त उस अत्यंत घोर तपस्या में वह एक ही अंगूठे पर खड़ा होकर, बाहें ऊपर उठाए, महातेजस्वी होकर सूर्य के सम्मुख हो गया।

श्लोक 5 (skanda.3.71.5)

वृत्रस्य वधतो ज्ञातं यत्पापं तस्य नुत्तये । एकाग्रः प्रयतो भूत्वा शिवस्याराधने रतः ।

vṛtrasya vadhato jñātaṁ yatpāpaṁ tasya nuttaye ekāgraḥ prayato bhūtvā śivasyārādhane rataḥ

वृत्रासुर के वध से जो पाप उसे लगा था, उसकी निवृत्ति के लिए, एकाग्रचित्त और नियमपूर्वक शुद्ध होकर वह शिव की आराधना में लगा रहा।

श्लोक 6 (skanda.3.71.6)

तपसा च तदा शंभुस्तोषितः शशिशेखरः । तत्राजगाम जटिलो भस्मांगो वृषभध्वजः ।

tapasā ca tadā śaṁbhustoṣitaḥ śaśiśekharaḥ tatrājagāma jaṭilo bhasmāṁgo vṛṣabhadhvajaḥ

तब उस तपस्या से प्रसन्न होकर शशिशेखर शंभु, जटाधारी, भस्म से आच्छादित अंगों वाले, वृषभ-ध्वज वहाँ आए।

श्लोक 7 (skanda.3.71.7)

खट्वांगी पंचवक्त्रश्च दशबाहुस्त्रिलोचनः । गंगाधरो वृषारूढो भूतप्रेतादिवेष्टितः ।

khaṭvāṁgī paṁcavaktraśca daśabāhustrilocanaḥ gaṁgādharo vṛṣārūḍho bhūtapretādiveṣṭitaḥ

खट्वांग धारण किए हुए, पाँच मुखों वाले, दस भुजाओं वाले, त्रिनेत्र, गंगाधर, बैल पर आरूढ़ और भूत-प्रेत आदि से घिरे हुए।

श्लोक 8 (skanda.3.71.8)

सुप्रसन्नः सुरश्रेष्ठः कृपालुर्वरदायकः । तदा हृष्टमना देवो देवेन्द्रमिदमूचिवान् ।

suprasannaḥ sureśreṣṭhaḥ kṛpāluvaradāyakaḥ tadā hṛṣṭamanā devo devendramidamūcivān

अत्यंत प्रसन्न, देवश्रेष्ठ, कृपालु और वरदाता वह देव तब प्रसन्नचित्त होकर देवेंद्र से यह बोले।

श्लोक 9 (skanda.3.71.9)

।। हर उवाच ।। यत्त्वं याचयसे देव तदहं प्रददामि ते ।

hara uvāca yattvaṁ yācayase deva tadahaṁ pradadāmi te

हर ने कहा — हे देव! तुम जो भी माँगोगे, वह मैं तुम्हें प्रदान करूँगा।

श्लोक 10 (skanda.3.71.10)

।। इन्द्र उवाच ।। यदि तुष्टोसि देवेश कृपासिंधो महेश्वर । ब्रह्महत्या हि मां देव उद्वेजयति नित्यशः ।

indra uvāca yadi tuṣṭosi deveśa kṛpāsiṁdho maheśvara brahmahatyā hi māṁ deva udvejayati nityaśaḥ

इंद्र ने कहा — हे देवेश, हे कृपासागर महेश्वर! यदि तुम प्रसन्न हो, तो जान लो कि ब्रह्महत्या का पाप मुझे सदा व्याकुल किए रहता है।

श्लोक 11 (skanda.3.71.11)

वृत्रासुरस्य हनने जातं पापं सुरोत्तम । तत्पापं नाशय विभो मम दुःखप्रदं सदा ।

vṛtrāsurasya hanane jātaṁ pāpaṁ surottama tatpāpaṁ nāśaya vibho mama duḥkhapradaṁ sadā

हे सुरश्रेष्ठ! वृत्रासुर के वध से उत्पन्न वह पाप, जो मुझे सदा दुःख देता रहता है, हे विभो! उसे नष्ट कर दो।

श्लोक 12 (skanda.3.71.12)

।। हर उवाच ।। धर्मारण्ये सुरपते ब्रह्महत्या न पीडयेत् । हत्या गवां द्विजातीनां बालस्य योषितामपि ।

hara uvāca dharmāraṇye surapate brahmahatyā na pīḍayet hatyā gavāṁ dvijātīnāṁ bālasya yoṣitāmapi

हर ने कहा — हे सुरपते! धर्मारण्य में ब्रह्महत्या का पाप कभी पीड़ित नहीं करता, न ही गोवध, द्विजवध, बालवध अथवा स्त्रीवध का पाप।

श्लोक 13 (skanda.3.71.13)

वचनान्मम देवेंद्र ब्रह्मणः केशवस्य च । यमस्य वचनाज्जिष्णो हत्या नैवात्र तिष्ठति । प्रविश्य त्वं महाराज अतोत्र स्नानमाचर ।

vacanānmama devendra brahmaṇaḥ keśavasya ca yamasya vacanājjiṣṇo hatyā naivātra tiṣṭhati praviśya tvaṁ mahārāja atotra snānamācara

हे देवेंद्र, हे जिष्णु! मेरे, ब्रह्मा के, केशव के और यम के वचन से, यहाँ किसी हत्या का पाप टिकता ही नहीं है। इसलिए हे महाराज! यहाँ प्रवेश कर स्नान करो।

श्लोक 14 (skanda.3.71.14)

।। इन्द्र उवाच ।। यदि त्वं मम तुष्टोऽसि कृपासिंधो महेश्वर । मन्नाम्ना च महादेव स्थापितो भव शंकर ।

indra uvāca yadi tvaṁ mama tuṣṭo'si kṛpāsiṁdho maheśvara mannāmnā ca mahādeva sthāpito bhava śaṁkara

इंद्र ने कहा — हे कृपासागर महेश्वर! यदि तुम मुझसे प्रसन्न हो, तो हे महादेव, हे शंकर! मेरे ही नाम से यहाँ स्थापित हो जाओ।

श्लोक 15 (skanda.3.71.15)

तथेत्युक्त्वा महादेवः सुप्रसन्नो हरस्तदा । दर्शयामास तत्रैव लिंगं पापप्रणाशनम् ।

tathetyuktvā mahādevaḥ suprasanno harastadā darśayāmāsa tatraiva liṁgaṁ pāpapraṇāśanam

'तथास्तु' कहकर, अत्यंत प्रसन्न हुए महादेव हर ने वहीं वह पाप-नाशक लिंग प्रकट किया।

श्लोक 16 (skanda.3.71.16)

कूर्मपृष्ठात्समुत्पाद्य आत्मयोगेन शंभुना । स्थितस्तत्रैव श्रीकण्ठः कालत्रयविदो विदुः ।

kūrmapṛṣṭhātsamutpādya ātmayogena śaṁbhunā sthitastatraiva śrīkaṇṭhaḥ kālatrayavido viduḥ

शंभु ने अपने ही योगबल से कूर्म की पीठ से उसे प्रकट किया, और वहीं श्रीकंठ स्थापित हो गए, ऐसा त्रिकालज्ञ जानते हैं।

श्लोक 17 (skanda.3.71.17)

वृत्रहत्यासमुत्त्रस्तदेवराजस्य सन्निधौ । इन्द्रेश्वरस्तदा तत्र धर्मारण्ये स्थितो नृप ।

vṛtrahatyāsamuttrastadevarājasya sannidhau indreśvarastadā tatra dharmāraṇye sthito nṛpa

वृत्र-हत्या से त्रस्त हुए उस देवराज के समीप, इंद्रेश्वर के रूप में वह तब धर्मारण्य में स्थापित हुए, हे राजन्!

श्लोक 18 (skanda.3.71.18)

सर्वपापविशुद्ध्यर्थं लोकानां हितकाम्यया । इन्द्रेश्वरं तु राजेंद्र पुष्पधूपादिकैः सदा ।

sarvapāpaviśuddhyarthaṁ lokānāṁ hitakāmyayā indreśvaraṁ tu rājeṁdra puṣpadhūpādikaiḥ sadā

समस्त लोकों के पापों की शुद्धि और उनके हित की कामना से इंद्रेश्वर को हे राजेंद्र! पुष्प, धूप आदि से सदा...

श्लोक 19 (skanda.3.71.19)

पूजयेच्च नरो भक्त्या सर्वपापैः प्रमुच्यते । अष्टम्यां च चतुर्दश्यां माघमासे विशेषतः ।

pūjayecca naro bhaktyā sarvapāpaiḥ pramucyate aṣṭamyāṁ ca caturdaśyāṁ māghamāse viśeṣataḥ

...पूजा जानी चाहिए। ऐसा करने वाला मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है, विशेषतः माघ मास की अष्टमी और चतुर्दशी को।

श्लोक 20 (skanda.3.71.20)

सर्वपापविशुद्ध्यर्थं शिवलोके महीयते । नीलोत्सर्गं तु यो मर्त्यः करोति च तदग्रतः ।

sarvapāpaviśuddhyarthaṁ śivaloke mahīyate nīlotsargaṁ tu yo martyaḥ karoti ca tadagrataḥ

वह समस्त पापों की शुद्धि पाकर शिवलोक में प्रतिष्ठा पाता है। जो मनुष्य उसके सम्मुख नीलोत्सर्ग करता है...

श्लोक 21 (skanda.3.71.21)

उद्धरेत्सप्त गोत्राणि कुलमेकोत्तरं शतम् । सांगरुद्रजपं यस्तु चतुर्द्दश्यां करोति वै ।

uddharetsapta gotrāṇi kulamekottaraṁ śatam sāṁgarudrajapaṁ yastu caturddaśyāṁ karoti vai

...वह सात गोत्रों तथा एक सौ एक कुलों का उद्धार कर देता है। जो चतुर्दशी को रुद्र-जप अंगसहित करता है...

श्लोक 22 (skanda.3.71.22)

सर्वपाविशुद्धात्मा लभते परमं पदम् ।

sarvapāviśuddhātmā labhate paramaṁ padam

...वह समस्त पापों से शुद्ध आत्मा होकर परम पद को प्राप्त करता है।

श्लोक 23 (skanda.3.71.23)

सौवर्णनयनं कृत्वा मध्ये रत्नसमन्वितम् । यो ददाति द्विजातिभ्य इन्द्रतीर्थे तथोत्तमे ।

sauvarṇanayanaṁ kṛtvā madhye ratnasamanvitam yo dadāti dvijātibhya indratīrthe tathottame

जो व्यक्ति मध्य में रत्न-जड़ित स्वर्ण-नेत्र बनवाकर उस उत्तम इंद्रतीर्थ में द्विजातियों को दान करता है...

श्लोक 24 (skanda.3.71.24)

अन्धता न भवेत्तस्य जन्मानि षष्टिसंख्यया । निर्मलत्वं सदा तेषां नयनेषु प्रजायते । महारोगास्तथा चान्ये स्नात्वा यांति तदग्रतः ।

andhatā na bhavettasya janmāni ṣaṣṭisaṁkhyayā nirmalatvaṁ sadā teṣāṁ nayaneṣu prajāyate mahārogāstathā cānye snātvā yāṁti tadagrataḥ

...उसे साठ जन्मों तक अंधता प्राप्त नहीं होती; उसकी आँखों में सदा निर्मलता उत्पन्न होती है। इसी प्रकार अन्य महारोग भी वहाँ स्नान कर सामने ही मिट जाते हैं।

श्लोक 25 (skanda.3.71.25)

पूजिते चैकचित्ते न सर्वरोगात्प्रमुच्यते । स्नात्वा कुण्डे नरो यस्तु संतर्पयति यः पितॄन् ।

pūjite caikacitte na sarvarogātpramucyate snātvā kuṇḍe naro yastu saṁtarpayati yaḥ pitṝn

जब एकाग्रचित्त होकर पूजा की जाती है, तो मनुष्य समस्त रोगों से मुक्त हो जाता है। जो मनुष्य कुंड में स्नान कर पितरों का तर्पण करता है...

श्लोक 26 (skanda.3.71.26)

तस्य तृप्ताः सदा भूप पितरश्च पितामहाः । ये वै ग्रस्ता महारोगैः कुष्ठाद्यैश्चैव देहिनः ।

tasya tṛptāḥ sadā bhūpa pitaraśca pitāmahāḥ ye vai grastā mahārogaiḥ kuṣṭhādyaiścaiva dehinaḥ

...उसके पितर और पितामह सदा तृप्त रहते हैं, हे राजन्! जो प्राणी कुष्ठ आदि महारोगों से ग्रस्त हैं...

श्लोक 27 (skanda.3.71.27)

स्नानमात्रेण संशुद्धा दिव्यदेहा भवंति ते । ज्वरादिकष्टमापन्ना नराः स्वात्महिताय वै ।

snānamātreṇa saṁśuddhā divyadehā bhavaṁti te jvarādikaṣṭamāpannā narāḥ svātmahitāya vai

...केवल स्नान मात्र से शुद्ध होकर दिव्य देह प्राप्त कर लेते हैं। ज्वर आदि कष्ट से पीड़ित मनुष्य भी अपने ही हित के लिए...

श्लोक 28 (skanda.3.71.28)

स्नान मात्रेण संशुद्धा दिव्यदेहा भवंति ते । स्नात्वा च पूजयेद्देवं मुच्यते ज्वरबन्धनात् ।

snāna mātreṇa saṁśuddhā divyadehā bhavaṁti te snātvā ca pūjayeddevaṁ mucyate jvarabandhanāt

...स्नान मात्र से शुद्ध होकर दिव्य देह प्राप्त करते हैं। स्नान कर देव की पूजा करने से मनुष्य ज्वर के बंधन से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 29 (skanda.3.71.29)

एकाहिकं द्व्याहिकं च चातुर्थं वा तृतीयकम् । विषमज्वरपीडा च मासपक्षादिकं ज्वरम् ।

ekāhikaṁ dvyāhikaṁ ca cāturthaṁ vā tṛtīyakam viṣamajvarapīḍā ca māsapakṣādikaṁ jvaram

एक-दिवसीय, दो-दिवसीय, चौथिया, तिजारी बुखार, विषम ज्वर की पीड़ा, तथा महीनों-पखवाड़ों तक चलने वाला ज्वर...

श्लोक 30 (skanda.3.71.30)

इन्द्रेश्वरप्रसादाच्च नश्यते नात्र संशयः । विज्वरो जायते नूनं सत्यंसत्यं च भूपते ।

indreśvaraprasādācca naśyate nātra saṁśayaḥ vijvaro jāyate nūnaṁ satyaṁsatyaṁ ca bhūpate

...इंद्रेश्वर की कृपा से सब नष्ट हो जाते हैं, इसमें कोई संदेह नहीं। हे राजन्! मनुष्य निश्चय ही ज्वररहित हो जाता है, यह सत्य है, सत्य है।

श्लोक 31 (skanda.3.71.31)

वन्ध्या च दुर्भगा नारी काकवन्ध्या मृतप्रजा । मृतवत्सा महादुष्टा स्नात्वा कुण्डे शिवाग्रतः । पूजयेदेकचित्तेन स्नानमात्रेण शुद्ध्यति ।

vaṁdhyā ca durbhagā nārī kākavaṁdhyā mṛtaprajā mṛtavatsā mahāduṣṭā snātvā kuṇḍe śivāgrataḥ pūjayedekacittena snānamātreṇa śuddhyati

बांझ, दुर्भाग्यशाली, काकवंध्या, जिसकी संतान मर जाती है, महादुष्ट, जिसका बच्चा मृत हो — ऐसी स्त्री भी उस कुंड में शिव के समक्ष स्नान कर, एकाग्रचित्त से पूजा करके, केवल स्नान मात्र से ही शुद्ध हो जाती है।

श्लोक 32 (skanda.3.71.32)

एवंविधाश्च बहुशो वरान्दत्त्वा पिनाकधृक् । गतोऽसौ स्वपुरं पार्थ सेव्यमानः सुरासुरैः ।

evaṁvidhāśca bahuśo varāndattvā pinākadhṛk gato'sau svapuraṁ pārtha sevyamānaḥ surāsuraiḥ

इस प्रकार अनेक वर देकर पिनाकधारी शिव अपने ही नगर को चले गए, हे पार्थ! देवताओं और असुरों द्वारा सेवित होते हुए।

श्लोक 33 (skanda.3.71.33)

ततः शक्रो महातेजा गतो वै स्वपुरं प्रति । जयंतेनापि तत्रैव स्थापितं लिंगमुत्तमम् ।

tataḥ śakro mahātejā gato vai svapuraṁ prati jayaṁtenāpi tatraiva sthāpitaṁ liṁgamuttamam

तब महातेजस्वी शक्र (इंद्र) भी अपने नगर की ओर चला गया। जयंत ने भी वहीं एक उत्तम लिंग स्थापित किया।

श्लोक 34 (skanda.3.71.34)

जयंतस्य हरस्तुष्टस्तस्मिल्लिंगे स्तुतः सदा । त्रिकालं पुत्रसंयुक्तः पूजनार्थं सुरेश्वरः ।

jayaṁtasya harastuṣṭastasmillliṁge stutaḥ sadā trikālaṁ putrasaṁyuktaḥ pūjanārthaṁ sureśvaraḥ

हर, जयंत के इस लिंग से प्रसन्न होकर, वहाँ सदा स्तुत होते हैं। तीनों समय (सुबह-दोपहर-शाम) अपने पुत्र सहित सुरेश्वर (इंद्र) पूजा के लिए...

श्लोक 35 (skanda.3.71.35)

आयाति च महाबाहो त्यक्त्वा स्थानं स्वकं हि वै । एतत्सर्वं समाख्यातं सर्वसौख्यप्रदायकम् ।

āyāti ca mahābāho tyaktvā sthānaṁ svakaṁ hi vai etatsarvaṁ samākhyātaṁ sarvasaukhyapradāyakam

...हे महाबाहो! अपना ही स्थान छोड़कर वहाँ आता है। यह सब सम्पूर्ण सौख्यदायक विवरण मैंने तुम्हें बता दिया।

श्लोक 36 (skanda.3.71.36)

इन्द्रेश्वरं तु यत्पुण्यं जयंतेशस्य पूजनात् । तदेवाप्नोति राजेन्द्र सत्यंसत्यं न संशयः ।

indreśvaraṁ tu yatpuṇyaṁ jayaṁteśasya pūjanāt tadevāpnoti rājendra satyaṁsatyaṁ na saṁśayaḥ

जो पुण्य इंद्रेश्वर की पूजा से प्राप्त होता है, वही पुण्य जयंतेश की पूजा से भी प्राप्त होता है, हे राजेंद्र! यह सत्य है, सत्य है, इसमें संदेह नहीं।

श्लोक 37 (skanda.3.71.37)

स्नात्वा कुण्डे महाराज संपूज्यैकाग्रमानसः । सर्वपापविशुद्धात्मा इन्द्रलोके महीयते ।

snātvā kuṇḍe mahārāja saṁpūjyaikāgramānasaḥ sarvapāpaviśuddhātmā indraloke mahīyate

हे महाराज! उस कुंड में स्नान कर, एकाग्रचित्त होकर पूजा करने वाला व्यक्ति समस्त पापों से शुद्ध आत्मा होकर इंद्रलोक में प्रतिष्ठा पाता है।

श्लोक 38 (skanda.3.71.38)

यः शृणोति नरो भक्त्या सर्वपापैः प्रमुच्यते । सर्वान्कामानवाप्नोति जयंतेशप्रमादतः ।

yaḥ śṛṇoti naro bhaktyā sarvapāpaiḥ pramucyate sarvānkāmānavāpnoti jayaṁteśapramādataḥ

जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इस कथा को सुनता है, वह समस्त पापों से मुक्त हो जाता है, और जयंतेश की कृपा से अपनी सब कामनाओं को प्राप्त कर लेता है।

अध्याय 70अध्याय-सूचीअध्याय 72