ब्रह्म खण्ड · अध्याय 72
धराक्षेत्र-वर्णन
श्लोक 1 (skanda.3.72.1)
।। व्यास उवाच ।। अतः परं प्रवक्ष्यामि शिवतीर्थमनुत्तमम् । यत्रासौ शंकरो देवः पुनर्जन्मधरोऽभवत् ।
vyāsa uvāca ataḥ paraṁ pravakṣyāmi śivatīrthamanuttamam yatrāsau śaṁkaro devaḥ punarjanmadharo'bhavat
व्यासजी ने कहा — अब इसके आगे मैं उस अनुपम शिव-तीर्थ का वर्णन करता हूँ, जहाँ देव शंकर मानो पुनर्जन्म धारण करने वाले हो गए थे।
श्लोक 2 (skanda.3.72.2)
कीलितो देवदेवेशः शंकरश्च त्रिलोचनः । गिरिजया महाभाग पातितो भूमिमंडले ।
kīlito devadeveśaḥ śaṁkaraśca trilocanaḥ girijayā mahābhāga pātito bhūmimaṁḍale
त्रिनेत्र शंकर, देवाधिदेव, गिरिजा द्वारा कीलित होकर, हे महाभाग! पृथ्वीमंडल पर गिरा दिए गए।
श्लोक 3 (skanda.3.72.3)
छलितो मुह्यमानस्तु दिवारात्रिं न वेत्ति च । पुंस्त्रीनपुंसकाश्चैव जडीभूतस्त्रिलोचनः ।
chalito muhyamānastu divārātriṁ na vetti ca puṁstrīnapuṁsakāścaiva jaḍībhūtastrilocanaḥ
छलित और मोहग्रस्त होकर, वह त्रिनेत्र दिन-रात का ज्ञान भी खो बैठे, तथा पुरुष, स्त्री और नपुंसक का भेद भी न जान सके, जड़वत् हो गए।
श्लोक 4 (skanda.3.72.4)
कल्पांतमिव संजातं तदा तस्मिंश्च कीलिते । पार्वत्या सहसा तस्य कृत कीलनकं तदा ।
kalpāṁtamiva saṁjātaṁ tadā tasmiṁśca kīlite pārvatyā sahasā tasya kṛta kīlanakaṁ tadā
जब वे इस प्रकार कीलित हुए, तो मानो कल्प का अंत ही आ गया हो। पार्वती ने ही अचानक उन्हें इस प्रकार कीलित कर दिया था।
श्लोक 5 (skanda.3.72.5)
।। युधिष्ठिर उवाच ।। एतदाश्चर्यमतुलं वचनं यत्त्वयोदितम् । यो गुरुः सर्वदेवानां योगिनां चैव सर्वदा ।
yudhiṣṭhira uvāca etadāścaryamatulaṁ vacanaṁ yattvayoditam yo guruḥ sarvadevānāṁ yogināṁ caiva sarvadā
युधिष्ठिर ने कहा — आपने जो यह वचन कहा है, यह अतुलनीय आश्चर्य है — कि जो सदा सब देवताओं और योगियों के गुरु हैं...
श्लोक 6 (skanda.3.72.6)
पार्वत्या कीलितः कस्मान्नष्टवृत्तिः शिवः कथम् । कारणं कथ्यतां तत्र परं कौतूहलं हि मे ।
pārvatyā kīlitaḥ kasmānnaṣṭavṛttiḥ śivaḥ katham kāraṇaṁ kathyatāṁ tatra paraṁ kautūhalaṁ hi me
...वह पार्वती द्वारा कैसे कीलित हुए, और शिव अपनी सारी वृत्ति कैसे खो बैठे? इसका कारण बताइए, इसमें मुझे अत्यंत कौतूहल है।
श्लोक 7 (skanda.3.72.7)
।। व्यास उवाच ।। मन्त्रौघा विविधा राजञ्छंकरेण प्रकाशिताः । पार्वत्यग्रे महाराज अथर्वणोपवेदजाः ।
vyāsa uvāca mantraughā vividhā rājañchaṁkareṇa prakāśitāḥ pārvatyagre mahārāja atharvaṇopavedajāḥ
व्यासजी ने कहा — हे राजन्! शंकर ने पार्वती के समक्ष अथर्ववेद के उपवेद से उत्पन्न अनेक प्रकार के मंत्र-समूहों को प्रकट किया।
श्लोक 8 (skanda.3.72.8)
शाकिनी डाकिनी चैव काकिनी हाकिनी तथा । एकिनी लाकिनी ह्येताः षट्भेदास्तत्र कीर्तिताः ।
śākinī ḍākinī caiva kākinī hākinī tathā ekinī lākinī hyetāḥ ṣaḍbhedāstatra kīrtitāḥ
शाकिनी, डाकिनी, काकिनी, हाकिनी, एकिनी और लाकिनी — ये छः भेद वहाँ बताए गए।
श्लोक 9 (skanda.3.72.9)
बीजान्युद्धृत्य वै ताभ्यो माला चैकवृता कृता । शंभुना कथिता चैव पार्वत्यग्रे नृपोत्तम ।
bījānyuddhṛtya vai tābhyo mālā caikavṛtā kṛtā śaṁbhunā kathitā caiva pārvatyagre nṛpottama
उनसे बीजाक्षर निकालकर एक ही माला बनाई गई। हे नृपोत्तम! शंभु ने इसे पार्वती के समक्ष बताया।
श्लोक 10 (skanda.3.72.10)
तैश्चैव अष्टा भवति मंत्रोद्धारः कृतस्तु सा । साधयेत्सा महादुष्टा शाकिनी प्रमदानघे ।
taiścaiva aṣṭā bhavati mantroddhāraḥ kṛtastu sā sādhayetsā mahāduṣṭā śākinī pramadānaghe
उनसे ही आठ अक्षरों वाला मंत्र-उद्धार तैयार किया गया। हे निष्पाप प्रमदा! उस मंत्र से वह महादुष्ट शाकिनी सिद्ध होती है।
श्लोक 11 (skanda.3.72.11)
।। श्रीपार्वत्युवाच ।। प्रकाशितास्त्वया नाथ भेदा ह्येते षडेव हि । षड्विधाः शक्तयो नाथ अगम्यायोगमालिनीः । षड्विधोक्तं त्वयैकेन कूटात्कृतं वदस्व माम् ।
śrīpārvatyuvāca prakāśitāstvayā nātha bhedā hyete ṣaḍeva hi ṣaḍvidhāḥ śaktayo nātha agamyāyogamālinīḥ ṣaḍvidhoktaṁ tvayaikena kūṭātkṛtaṁ vadasva mām
श्री पार्वती ने कहा — हे नाथ! आपने ये छः भेद ही प्रकाशित किए हैं — छः प्रकार की शक्तियाँ, जो अगम्य योगमालिनी हैं। हे नाथ! आपने ही जो इस छह-विध को एक ही कूट से बनाया, वह मुझे बताइए।
श्लोक 12 (skanda.3.72.12)
।। श्रीमहादेव उवाच ।। अप्रकाशो महादेवि देवासुरैस्तु मानवैः ।
śrīmahādeva uvāca aprakāśo mahādevi devāsuraistu mānavaiḥ
श्री महादेव ने कहा — हे महादेवि! यह देवताओं, असुरों और मनुष्यों के लिए अप्रकाश्य (गोपनीय) है।
श्लोक 13 (skanda.3.72.13)
।। पार्वत्युवाच ।। नमस्ते सर्वरूपाय नमस्ते वृषभध्वज । जटिलेश नमस्तुभ्यं नीलकण्ठ नमोस्तुते ।
pārvatyuvāca namaste sarvarūpāya namaste vṛṣabhadhvaja jaṭileśa namastubhyaṁ nīlakaṇṭha namostute
पार्वती ने कहा — हे सर्वरूप, तुम्हें नमस्कार है। हे वृषभध्वज, तुम्हें नमस्कार है। हे जटिलेश, तुम्हें नमस्कार है। हे नीलकंठ, तुम्हें नमस्कार है।
श्लोक 14 (skanda.3.72.14)
कृपासिंधो नमस्तुभ्यं नमस्ते कालरूपिणे । एतैश्च बहुभिर्वाक्यैः कोमलैः करुणानिधिम् ।
kṛpāsiṁdho namastubhyaṁ namaste kālarūpiṇe etaiśca bahubhirvākyaiḥ komalaiḥ karuṇānidhim
हे कृपासिंधु, तुम्हें नमस्कार है। हे कालस्वरूप, तुम्हें नमस्कार है। इन और ऐसे अनेक कोमल वचनों से उस करुणानिधि को...
श्लोक 15 (skanda.3.72.15)
तोषयित्वाद्रितनया दण्डवत्प्रणिपत्य च । जग्राह पादयुगलं तां प्रोवाच दयापरः ।
toṣayitvādritanayā daṇḍavatpraṇipatya ca jagrāha pādayugalaṁ tāṁ provāca dayāparaḥ
...संतुष्ट कर, पर्वतराज-पुत्री ने साष्टांग प्रणाम कर उनके दोनों चरण पकड़ लिए। तब उस दयालु ने उससे कहा।
श्लोक 16 (skanda.3.72.16)
किमर्थं स्तूयसे भद्रे याच्यतां मनसीप्सितम् ।
kimarthaṁ stūyase bhadre yācyatāṁ manasīpsitam
'हे भद्रे! तुम मेरी इतनी स्तुति क्यों कर रही हो? जो तुम्हारे मन में अभीष्ट हो, वह माँगो।'
श्लोक 17 (skanda.3.72.17)
।। पार्वत्युवाच ।। समाहारं च सध्यानं कथयस्व सविस्तरम् । असंदेहमशेषं च यद्यहं वल्लभा तव ।
pārvatyuvāca samāhāraṁ ca sadhyānaṁ kathayasva savistaram asaṁdehamaśeṣaṁ ca yadyahaṁ vallabhā tava
पार्वती ने कहा — मुझे यह समाहार और ध्यान विस्तार से बताइए, संदेहरहित और पूर्णतः, यदि मैं वस्तुतः आपकी प्रियतमा हूँ।
श्लोक 18 (skanda.3.72.18)
।। श्रीरुद्र उवाच ।। न प्रकाश्यं त्वया देवि समाहारोद्भवं फलम् । सर्वं तत्त्वमहं वक्ष्ये मंत्रकूटाद्यमेव हि ।
śrīrudra uvāca na prakāśyaṁ tvayā devi samāhārodbhavaṁ phalam sarvaṁ tattvamahaṁ vakṣye maṁtrakūṭādyameva hi
श्री रुद्र ने कहा — हे देवि! इस समाहार से उत्पन्न होने वाला फल तुम्हें कभी प्रकट नहीं करना चाहिए। मैं तुम्हें मंत्र-कूट का सम्पूर्ण तत्त्व बताता हूँ।
श्लोक 19 (skanda.3.72.19)
मायाबीजं तु सर्वेषां कूटानां हि वरानने । सर्वेषां मध्यमो वर्णो बिंदुना दादिशोभितः ।
māyābījaṁ tu sarveṣāṁ kūṭānāṁ hi varānane sarveṣāṁ madhyamo varṇo biṁdunā dādiśobhitaḥ
हे वरानने! माया-बीज ही सब कूटों का मूल है। सबके मध्य वर्ण को बिंदु आदि से सुशोभित किया गया है।
श्लोक 20 (skanda.3.72.20)
वह्निबीजं सवातं च कूर्मबीजसमन्वितम् । आदित्यप्रभवं बीजं शक्तिबीजोद्भवं सदा ।
vahnibījaṁ savātaṁ ca kūrmabījasamanvitam ādityaprabhavaṁ bījaṁ śaktibījodbhavaṁ sadā
अग्नि-बीज वायु सहित, कूर्म-बीज से युक्त; सूर्य से उत्पन्न बीज सदा शक्ति-बीज से उत्पन्न होता है।
श्लोक 21 (skanda.3.72.21)
एतत्कूटं चाद्यबीजं द्वितीयं च विभोर्मतम् । तृतीयं चाग्निबीजं तु संयुक्तं बिंदुनेंदुना ।
etatkūṭaṁ cādyabījaṁ dvitīyaṁ ca vibhormatam tṛtīyaṁ cāgnibījaṁ tu saṁyuktaṁ biṁdunendunā
यह प्रथम कूट पहला बीज है, दूसरा विभु (शिव) का मत माना जाता है; तीसरा अग्नि-बीज है, जो बिंदु और चंद्र से संयुक्त है।
श्लोक 22 (skanda.3.72.22)
चतुर्थं युक्तं शेषेण ब्रह्मबीजमृषिस्तथा । पंचमं कालबीजं च षष्ठं पार्थिव बीजकम् ।
caturthaṁ yuktaṁ śeṣeṇa brahmabījamṛṣistathā paṁcamaṁ kālabījaṁ ca ṣaṣṭhaṁ pārthiva bījakam
चौथा शेष (सर्प) से युक्त है, यह ब्रह्म-बीज है, और ऋषि भी उसी में समाहित है; पाँचवाँ काल-बीज है, छठा पार्थिव बीज है।
श्लोक 23 (skanda.3.72.23)
सप्तमे चाष्टमे बाह्यं नृसिंहेन समन्वितम् । नवमे द्वितीयमेकं च दशमे चाष्टकूटकम् ।
saptame cāṣṭame bāhyaṁ nṛsiṁhena samanvitam navame dvitīyamekaṁ ca daśame cāṣṭakūṭakam
सातवें और आठवें में बाह्य अंश नृसिंह से युक्त है; नौवें में दूसरा अकेला है, और दसवें में आठवाँ कूट है।
श्लोक 24 (skanda.3.72.24)
विपरीतं तयोर्बीजं रुद्राक्षे वर चारिणि । चतुर्दशे चतुर्थ्यर्थं पृथ्वीबीजेन संयुतम् ।
viparītaṁ tayorbījaṁ rudrākṣe vara cāriṇi caturdaśe caturthyarthaṁ pṛthvībījena saṁyutam
हे वरचारिणी! रुद्राक्ष में उन दोनों का बीज उलटा है। चौदहवें में चतुर्थी के अर्थ हेतु पृथ्वी-बीज से संयुक्त है।
श्लोक 25 (skanda.3.72.25)
कूटाः शेषाक्षराः केचिद्रक्षिता मेनकात्मजे । सा पपात यदोर्व्यां हि शिवपत्नी तदा नृप ।
kūṭāḥ śeṣākṣarāḥ kecidrakṣitā menakātmaje sā papāta yadorvyāṁ hi śivapatnī tadā nṛpa
हे मेनका-पुत्री! शेष अक्षरों के कुछ कूट रहस्य में रखे गए हैं। हे राजन्! जब वह शिवपत्नी पृथ्वी पर गिर पड़ी...
श्लोक 26 (skanda.3.72.26)
रामेणाश्वासिता तत्र प्रहसंस्त्रिपुरांतकः । भद्रे यस्मात्त्वया पन्नं जंवशक्तिर्भविष्यति ।
rāmeṇāśvāsitā tatra prahasaṁstripurāṁtakaḥ bhadre yasmāttvayā pannaṁ jaṁvaśaktirbhaviṣyati
...रुद्र ने ही उसे वहाँ सांत्वना दी, त्रिपुरांतक हँसते हुए बोले — 'हे भद्रे! चूँकि तूने यह ज्ञान प्राप्त किया, अतः तुझमें यह जंव-शक्ति उत्पन्न होगी।'
श्लोक 27 (skanda.3.72.27)
मारणे मोहने वश्ये आकर्षणे च क्षोभणे । यंयं कामयते नूनं ततत्सिद्धिर्भविष्यति ।
māraṇe mohane vaśye ākarṣaṇe ca kṣobhaṇe yaṁyaṁ kāmayate nūnaṁ tatattatsiddhirbhaviṣyati
'मारण, मोहन, वश्य, आकर्षण और क्षोभण — इन सब में तुम जिस-जिस की भी कामना करोगी, उस-उस में निश्चय ही सिद्धि प्राप्त होगी।'
श्लोक 28 (skanda.3.72.28)
इति श्रुत्वा तदा देवी दुष्टचित्ता शुचिस्मिता । कूटशेषास्ततो वीराः प्रोक्तास्तस्यै तु शंभुना ।
iti śrutvā tadā devī duṣṭacittā śucismitā kūṭaśeṣāstato vīrāḥ proktāstasyai tu śaṁbhunā
यह सुनकर, चंचल मन वाली, शुद्ध मुस्कान वाली उस देवी को शंभु ने तब शेष वीर-कूट भी बता दिए।
श्लोक 29 (skanda.3.72.29)
उवाच च कृपासिंधुः साधयस्व यथाविधि । कैलासात्तु हरस्तत्र धर्मारण्यं गतो भृशम् ।
uvāca ca kṛpāsiṁdhuḥ sādhayasva yathāvidhi kailāsāttu harastatra dharmāraṇyaṁ gato bhṛśam
उस कृपासिंधु ने कहा — 'विधिपूर्वक इसकी साधना करो।' तब हर कैलास से धर्मारण्य की ओर तेजी से चले गए।
श्लोक 30 (skanda.3.72.30)
ज्ञात्वा देवी ययौ तत्र यत्रासौ वृषभध्वजः । तत्क्षणात्पतितो भूमौ धर्मारण्ये नृपोत्तम ।
jñātvā devī yayau tatra yatrāsau vṛṣabhadhvajaḥ tatkṣaṇātpatito bhūmau dharmāraṇye nṛpottama
यह जानकर देवी भी वहाँ गई, जहाँ वृषभध्वज गए थे। हे नृपोत्तम! उसी क्षण वे धर्मारण्य में भूमि पर गिर पड़े।
श्लोक 31 (skanda.3.72.31)
जटा चंद्रोरगाः शूलं वृषभाद्यायुधानि । मुंडमाला च कौपीनं कपालं ब्रह्मणस्तु वै ।
jaṭā caṁdrorogāḥ śūlaṁ vṛṣabhādyāyudhāni muṁḍamālā ca kaupīnaṁ kapālaṁ brahmaṇastu vai
उनकी जटाएँ, चंद्रमा, सर्प, त्रिशूल, बैल आदि आयुध, मुंडमाला, कौपीन तथा ब्रह्मा का वह कपाल...
श्लोक 32 (skanda.3.72.32)
गता गणाश्च सर्वत्र भूतप्रेता दिशो दश । विसंज्ञं च स्वमात्मानं ज्ञात्वा देवो महेश्वरः ।
gatā gaṇāśca sarvatra bhūtapretā diśo daśa visaṁjñaṁ ca svamātmānaṁ jñātvā devo maheśvaraḥ
...और उनके गण, भूत-प्रेत सब दसों दिशाओं में बिखर गए। स्वयं को अचेत जानकर देव महेश्वर...
श्लोक 33 (skanda.3.72.33)
स्वेदजास्तु समुत्पन्ना गणाः कूटादयस्तथा । पंचकूटान्समुत्पाद्य तस्मात्तदाधमूलिने ।
svedajāstu samutpannā gaṇāḥ kūṭādayastathā paṁcakūṭānsamutpādya tasmāttadādhamūline
...तब उनके पसीने से उत्पन्न गण और कूट आदि प्रकट हुए। उससे पाँच कूटों को उत्पन्न कर, उस मूल आधार से...
श्लोक 34 (skanda.3.72.34)
साधकास्ते महाराज जपहोमपरायणाः । प्रेतासनास्तु ते सर्वे कालकूटोपरि स्थिताः ।
sādhakāste mahārāja japahomaparāyaṇāḥ pretāsanāstu te sarve kālakūṭopari sthitāḥ
हे महाराज! वे साधक जप और होम में तत्पर रहते हैं। वे सब प्रेत-आसन पर, कालकूट के ऊपर स्थित हैं।
श्लोक 35 (skanda.3.72.35)
कथयंति स्वमात्मानं येन मोक्षः पिनाकिनः । ततः कष्टसमाविष्टा गौरी वह्निभयातुरा ।
kathayaṁti svamātmānaṁ yena mokṣaḥ pinākinaḥ tataḥ kaṣṭasamāviṣṭā gaurī vahnibhayāturā
वे इस रहस्य को स्वयं ही जानते हैं, जिससे पिनाकी (शिव) की मुक्ति संभव हो। तब कष्ट से आविष्ट, अग्नि-भय से पीड़ित गौरी...
श्लोक 36 (skanda.3.72.36)
सभाजितः शिवस्तैश्च गौरी ह्रीणा त्वधोमुखी । तपस्तेपे च तत्रस्था शंकरादेशकारिणी ।
sabhājitaḥ śivastaiśca gaurī hrīṇā tvadhomukhī tapastepe ca tatrasthā śaṁkarādeśakāriṇī
...शिव उनके द्वारा सम्मानित होते हुए, लज्जित गौरी नीचे मुख किए हुए, शंकर के आदेश का पालन करती हुई वहीं तपस्या करने लगी।
श्लोक 37 (skanda.3.72.37)
पंचाग्निसेवनं कृत्वा धूम्रपानमधोमुखी । कूटाक्षरैः स्तुतस्तैस्तु तोषितो वृषभध्वजः ।
paṁcāgniṣevanaṁ kṛtvā dhūmrapānamadhomukhī kūṭākṣaraiḥ stutastaistu toṣito vṛṣabhadhvajaḥ
पंचाग्नि की सेवा करते हुए, मुख नीचे किए धूम्रपान करते हुए, उन कूट-अक्षरों से स्तुति किए जाने पर वृषभध्वज संतुष्ट हुए।
श्लोक 38 (skanda.3.72.38)
धराक्षेत्रमिदं राजन्पापघ्नं सर्वकामदम् । देवमज्जनकं शुभ्रं स्थानकेऽस्मिन्विराजते ।
dharākṣetramidaṁ rājanpāpaghnaṁ sarvakāmadam devamajjanakaṁ śubhraṁ sthānake'sminvirājate
हे राजन्! यह धराक्षेत्र पापनाशक और सब कामनाओं को देने वाला है। इस स्थान में शुभ्र देवमज्जनक (देव-स्नान-तीर्थ) विराजमान है।
श्लोक 39 (skanda.3.72.39)
आश्विने कृष्णपक्षे च चतुर्दश्या दिने नृप । तत्र स्नात्वा च पीत्वा च सर्वपापैः प्रमुच्यते ।
āśvine kṛṣṇapakṣe ca caturdaśyā dine nṛpa tatra snātvā ca pītvā ca sarvapāpaiḥ pramucyate
हे राजन्! आश्विन मास की कृष्ण चतुर्दशी के दिन वहाँ स्नान कर और उसका जल पीकर मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 40 (skanda.3.72.40)
पूजयित्वा च देवेशमुपोष्य च विधानतः । शाकिनी डाकिनी चैव वेतालाः पितरो ग्रहाः ।
pūjayitvā ca deveśamupoṣya ca vidhānataḥ śākinī ḍākinī caiva vetālāḥ pitaro grahāḥ
देवेश की पूजा कर और विधिपूर्वक उपवास कर, शाकिनी, डाकिनी, वेताल, पितर और ग्रह...
श्लोक 41 (skanda.3.72.41)
ग्रहा धिष्ण्या न पीड्यंते सत्यंसत्यं वरानने । सांगं रुद्रजपं तत्र कृत्वा पापैः प्रमुच्यते ।
grahā dhiṣṇyā na pīḍyaṁte satyaṁsatyaṁ varānane sāṁgaṁ rudrajapaṁ tatra kṛtvā pāpaiḥ pramucyate
...और आवासीय ग्रह भी पीड़ा नहीं पहुँचाते, हे वरानने! यह सत्य है, सत्य है। वहाँ अंगसहित रुद्र-जप करने से मनुष्य पापों से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 42 (skanda.3.72.42)
नश्यंति त्रिविधा रोगाः सत्यंसत्यं च भूपते । एतत्सर्वं मया ख्यातं देवमज्जनकं शृणु ।
naśyaṁti trividhā rogāḥ satyaṁsatyaṁ ca bhūpate etatsarvaṁ mayā khyātaṁ devamajjanakaṁ śṛṇu
तीनों प्रकार के रोग नष्ट हो जाते हैं, हे राजन्! यह सत्य है, सत्य है। मैंने यह सब बता दिया है; अब देवमज्जनक के विषय में सुनो।
श्लोक 43 (skanda.3.72.43)
अश्वमेधसहस्रैस्तु कृतैस्तु भूरिदक्षिणैः । तत्फलं समवाप्नोति श्रोता श्रावयिता नरः ।
aśvamedhasahasraistu kṛtaistu bhūridakṣiṇaiḥ tatphalaṁ samavāpnoti śrotā śrāvayitā naraḥ
हजारों अश्वमेध यज्ञ, अत्यधिक दक्षिणा सहित संपन्न कर जो फल प्राप्त होता है, वही फल इसे सुनने और सुनाने वाला मनुष्य प्राप्त करता है।
श्लोक 44 (skanda.3.72.44)
अपुत्रो लभते पुत्रान्निर्धनो धनमाप्नुयात् । आयुरारोग्यमैश्वर्यं लभते नात्र संशयः ।
aputro labhate putrānnirdhano dhanamāpnuyāt āyurārogyamaiśvaryaṁ labhate nātra saṁśayaḥ
पुत्रहीन पुत्र प्राप्त करता है, निर्धन धन प्राप्त करता है; आयु, आरोग्य और ऐश्वर्य निःसंदेह प्राप्त होते हैं।
श्लोक 45 (skanda.3.72.45)
मनोवाक्कायजनितं पातकं त्रिविधं च यत् । तत्सर्वं नाशमायाति स्मरणात्कीर्तनान्नृप ।
manovākkāyajanitaṁ pātakaṁ trividhaṁ ca yat tatsarvaṁ nāśamāyāti smaraṇātkīrtanānnṛpa
मन, वाणी और शरीर से उत्पन्न जो त्रिविध पाप है, हे राजन्! वह सब इसके स्मरण और कीर्तन मात्र से नष्ट हो जाता है।
श्लोक 46 (skanda.3.72.46)
धन्यं यशस्यमायुष्यं सुखसंतानदायकम् । माहात्म्यं शृणुयाद्वत्स सर्वसौख्यान्वितो भवेत् ।
dhanyaṁ yaśasyamāyuṣyaṁ sukhasaṁtānadāyakam māhātmyaṁ śṛṇuyādvatsa sarvasaukhyānvito bhavet
धन्य, यशकारक, आयुष्यकारक, सुख और संतान देने वाली इस महिमा को जो सुनता है, हे वत्स! वह सर्व सुखों से युक्त हो जाता है।
श्लोक 47 (skanda.3.72.47)
सर्वतीर्थेषु यत्पुण्यं सर्वदानेषु यत्फलम् । सर्वयज्ञैश्च यत्पुण्यं जायते श्रवणान्नृप ।
sarvatīrtheṣu yatpuṇyaṁ sarvadāneṣu yatphalam sarvayajñaiśca yatpuṇyaṁ jāyate śravaṇānnṛpa
जो पुण्य सब तीर्थों में है, जो फल सब दानों में है, और जो पुण्य सब यज्ञों से प्राप्त होता है — हे राजन्! वह सब इसके श्रवण मात्र से प्राप्त हो जाता है।