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ब्रह्म खण्ड · अध्याय 73

कुलदेवता, गोत्र एवं प्रवर वर्णन

अध्याय 72अध्याय-सूचीअध्याय 74

श्लोक 1 (skanda.3.73.1)

व्यास उवाच । तया चोत्पादिता राजञ्छरीरात्कुलदेवताः

vyāsa uvāca tayā cotpāditā rājañcharīrāt kuladevatāḥ

व्यास जी ने कहा — हे राजन्, उन्हीं (आदिशक्ति) के द्वारा अपने ही शरीर से ये कुलदेवताएँ उत्पन्न की गयीं।

श्लोक 2 (skanda.3.73.2)

भट्टारिकी तथा छत्रा ओविका ज्ञानजा तथा

bhaṭṭārikī tathā chattrā ovikā jñānajā tathā

भट्टारिकी, छत्रा, ओविका तथा ज्ञानजा —

श्लोक 3 (skanda.3.73.3)

भद्रकाली च माहेशी सिंहोरी धनमर्द्दनी गात्रा शांता शेषदेवी वाराही भद्रयोगिनी

bhadrakālī ca māheśī siṁhorī dhanamarddanī gātrā śāntā śeṣadevī vārāhī bhadrayoginī

भद्रकाली, माहेशी, सिंहोरी, धनमर्दनी, गात्रा, शांता, शेषदेवी, वाराही और भद्रयोगिनी —

श्लोक 4 (skanda.3.73.4)

योगेश्वरी मोहलज्जा कुलेशी शकुलाचिता तारणी वनकानंदा चामुंडा च सुरेश्वरी

yogeśvarī mohalajjā kuleśī śakulācitā tāraṇī vanakānandā cāmuṁḍā ca sureśvarī

योगेश्वरी, मोहलज्जा, कुलेशी, शकुलाचिता, तारणी, वनकानंदा, चामुंडा और सुरेश्वरी —

श्लोक 5 (skanda.3.73.5)

दारभट्टारिकेत्याद्याः प्रत्येका शतधा पुनः उत्पन्नाः शक्तयस्तस्मिन्नानारूपान्विताः शुभाः अतः परं प्रवक्ष्यामि प्रवराण्यथ देवताः

dārabhaṭṭārikety ādyāḥ pratyekā śatadhā punaḥ utpannāḥ śaktayas tasmin nānārūpānvitāḥ śubhāḥ ataḥ paraṁ pravakṣyāmi pravarāṇy atha devatāḥ

दारभट्टारिका आदि — इस प्रकार ये बाईस देवियाँ, प्रत्येक सौ-सौ रूपों में पुनः विभक्त होकर अनेक शुभ रूपों वाली शक्तियों के रूप में प्रकट हुईं। अब इसके पश्चात् मैं प्रवरों (ऋषि-परम्पराओं) और उनकी अधिष्ठात्री देवियों का वर्णन करूँगा।

श्लोक 6 (skanda.3.73.6)

औपमन्यवसगोत्रप्रवर ३ गोत्रदेव्या गात्रा, वसिष्ठ १ भरद्वाज २ इंद्रप्रमदक ३। व्यासगोत्रस्य गोत्रदेव्या ज्ञानजा, प्रवर ३ काश्यपः १ अवत्सारः २ रैभ्यः ३। मांडव्यसगोत्र, गोत्रजा दारभट्टारिका, प्रवर ५ भार्गवच्यवनाप्नवानौर्वजमदग्निः ५। कुशिकसगोत्रजा तारणी, महाबला, प्रवर ३ विश्वामित्रदेवराजउद्दालक। शौनकसगोत्र, गोत्रदेवी शांता, प्रवर ३ भार्गव-वैणहोत्र-गार्त्समद। कृष्णात्रेयसगोत्र, गोत्रदेव्या भद्रयोगिनी, प्रवर ३ आत्रेय-अर्चनानस-श्यावाश्व। गार्ग्यायणसगोत्र, गोत्रजा शांता, प्रवर ५ भार्गवच्यवनाप्नवानौर्वजमदग्निः। गार्गायणगोत्र, गोत्रजा ज्ञानजा, प्रवर ५ काश्यप-अवत्सार-शांडिल-असित-देवल; गोत्रदेवा शांता द्वारवासिनी, प्रवर ३ गार्ग्य-गार्गि-शंख-लिखित। पैंग्यसगोत्रजा ज्ञानजा शेषला, प्रवर आंगिरस-आंबरीष-यौवनाश्व। वत्ससगोत्रं, गोत्रजा ज्ञानजा, प्रवर ५ भार्गवच्यावनाप्नवानौर्वपुरोधसः। वात्ससगोत्र, गोत्रजा ज्ञानजा, प्रवर ५ भार्गवच्यावनाप्नवानौर्वपुरोधसः। वात्स्यसगोत्रस्य गोत्रजा शीहरी, प्रवर ५ भार्गवच्यावनाप्नुवानौर्वपुरोधसः। श्यामायनसगोत्रस्य गोत्रजा शीहरी, प्रवर भार्गवच्यावनाप्नुवान् अवि जमदग्निः। धारणसगोत्रस्य गोत्रजा छत्रजा, प्रवर ३ अगस्त्य-दार्ढ्यच्युत-दध्यवाहन। काश्यपगोत्रस्य गोत्रजा चामुण्डा, प्रवर ३ काश्यप-अवत्सार-नैध्रुव। भरद्वाजगोत्रस्य गोत्रजा पक्षिणी, प्रवर ३ आंगिरस-बार्हस्पत्य-भारद्वाज। मांडव्यसगोत्रस्य वत्स-वात्स्य-वात्स्यायनसंज्ञाः ४। सामान्यलौगाक्षसगोत्रस्य गोत्रजा भद्रयोगिनी, प्रवर ३ काश्यप-वसिष्ठ-अवत्सार। कौशिकसगोत्रस्य गोत्रजा पक्षिणी, प्रवर ३ विश्वामित्र-अथर्व-भारद्वाज। सामान्यप्रवर १ पैंग्य-भारद्वाजयोः, समानप्रवरा २ लौगाक्ष-गार्ग्यायन-काश्यप-कश्यपानां ४, समानप्रवर ३ कौशिक-कुशिकयोः २, समानप्रवराः ४ औपमन्यु-लौगाक्षयोः २, समानप्रवराः ५ ।।

aupamanyavasagotrapravarāḥ 3 gotradevyā gātrā, vasiṣṭha 1 bharadvāja 2 indrapramadaka 3. vyāsagotrasya gotradevyā jñānajā, pravara 3 kāśyapaḥ 1 avatsāraḥ 2 raibhyaḥ 3. māṇḍavyasagotra, gotrajā dārabhaṭṭārikā, pravara 5 bhārgavacyavanāpnavānaurvajamadagniḥ 5. kuśikasagotrajā tāraṇī, mahābalā, pravara 3 viśvāmitradevarājoddālaka. śaunakasagotra, gotradevī śāntā, pravara 3 bhārgava-vaiṇahotra-gārtsamada. kṛṣṇātreyasagotra, gotradevyā bhadrayoginī, pravara 3 ātreya-arcanānasa-śyāvāśva. gārgyāyaṇasagotra, gotrajā śāntā, pravara 5 bhārgavacyavanāpnavānaurvajamadagniḥ. gārgāyaṇagotra, gotrajā jñānajā, pravara 5 kāśyapa-avatsāra-śāṇḍila-asita-devala; gotradevā śāntā dvāravāsinī, pravara 3 gārgya-gārgi-śaṅkha-likhita. paiṅgyasagotrajā jñānajā śeṣalā, pravara āṅgirasa-āmbarīṣa-yauvanāśva. vatsasagotraṁ, gotrajā jñānajā, pravara 5 bhārgavacyāvanāpnavānaurvapurodhasaḥ. vātsasagotra, gotrajā jñānajā, pravara 5 bhārgavacyāvanāpnavānaurvapurodhasaḥ. vātsyasagotrasya gotrajā śīharī, pravara 5 bhārgavacyāvanāpnuvānaurvapurodhasaḥ. śyāmāyanasagotrasya gotrajā śīharī, pravara bhārgavacyāvanāpnuvān avi jamadagniḥ. dhāraṇasagotrasya gotrajā chattrajā, pravara 3 agastya-dārḍhyacyuta-dadhyavāhana. kāśyapagotrasya gotrajā cāmuṇḍā, pravara 3 kāśyapa-avatsāra-naidhruva. bharadvājagotrasya gotrajā pakṣiṇī, pravara 3 āṅgirasa-bārhaspatya-bhāradvāja. māṇḍavyasagotrasya vatsa-vātsya-vātsyāyanasaṁjñāḥ 4. sāmānyalaugākṣasagotrasya gotrajā bhadrayoginī, pravara 3 kāśyapa-vasiṣṭha-avatsāra. kauśikasagotrasya gotrajā pakṣiṇī, pravara 3 viśvāmitra-atharva-bhāradvāja. sāmānyapravara 1 paiṅgya-bhāradvājayoḥ, samānapravarā 2 laugākṣa-gārgyāyana-kāśyapa-kaśyapānāṁ 4, samānapravara 3 kauśika-kuśikayoḥ 2, samānapravarāḥ 4 aupamanyu-laugākṣayoḥ 2, samānapravarāḥ 5.

अब गोत्र-दर-गोत्र प्रवर-ऋषियों और अधिष्ठात्री गोत्र-देवियों की सूची दी जाती है — औपमन्यव गोत्र (तीन प्रवर: वसिष्ठ, भरद्वाज, इंद्रप्रमदक; देवी गात्रा); व्यास गोत्र (देवी ज्ञानजा; तीन प्रवर: काश्यप, अवत्सार, रैभ्य); माण्डव्य गोत्र (देवी दारभट्टारिका; पाँच प्रवर: भृगु, च्यवन, आप्नवान, और्व, जमदग्नि); कुशिक गोत्र (देवी तारणी/महाबला; तीन प्रवर: विश्वामित्र, देवराज, उद्दालक); शौनक गोत्र (देवी शांता; तीन प्रवर: भार्गव, वैणहोत्र, गार्त्समद); कृष्णात्रेय गोत्र (देवी भद्रयोगिनी; तीन प्रवर: आत्रेय, अर्चनानस, श्यावाश्व); गार्ग्यायण गोत्र (देवी शांता; पाँचों भार्गव-प्रवर); एक अन्य गार्गायण गोत्र (देवी ज्ञानजा, जिसे द्वारवासिनी शांता भी कहते हैं; प्रवर काश्यप, अवत्सार, शांडिल, असित, देवल — तथा गार्ग्य-गार्गि, शंख-लिखित की परम्परा); पैंग्य गोत्र (देवी ज्ञानजा/शेषला; प्रवर आंगिरस, आंबरीष, यौवनाश्व); वत्स, वात्स और वात्स्य गोत्र (देवी ज्ञानजा या शीहरी; पाँचों भार्गव-प्रवर); श्यामायन गोत्र (देवी शीहरी; भार्गव-च्यवन-आप्नुवान-अवि-जमदग्नि); धारण गोत्र (देवी छत्रजा; तीन प्रवर: अगस्त्य, दार्ढ्यच्युत, दध्यवाहन); काश्यप गोत्र (देवी चामुण्डा; तीन प्रवर: काश्यप, अवत्सार, नैध्रुव); भरद्वाज गोत्र (देवी पक्षिणी; तीन प्रवर: आंगिरस, बार्हस्पत्य, भारद्वाज); माण्डव्य गोत्र की वत्स, वात्स्य, वात्स्यायन नामक चार शाखाएँ; सामान्य लौगाक्ष गोत्र (देवी भद्रयोगिनी; तीन प्रवर: काश्यप, वसिष्ठ, अवत्सार); तथा कौशिक गोत्र (देवी पक्षिणी; तीन प्रवर: विश्वामित्र, अथर्व, भारद्वाज)। अंत में यह बताया गया है कि इनमें से किन-किन गोत्रों के प्रवर परस्पर मिलते हैं — पैंग्य और भारद्वाज का एक प्रवर समान है; लौगाक्ष, गार्ग्यायन, काश्यप और कश्यप के दो प्रवर समान हैं; कौशिक और कुशिक के तीन समान हैं; और औपमन्यु तथा लौगाक्ष के चार प्रवर समान हैं — यह ज्ञान आगे बताये जाने वाले विवाह-नियम के लिए आवश्यक है।

श्लोक 7 (skanda.3.73.7)

यावतां प्रवरेष्वेको विश्वामित्रोऽनुवर्तते न तावतां सगोत्रत्वाद्विवाहः स्यात्परस्परम्

yāvatāṁ pravareṣv eko viśvāmitro 'nuvartate na tāvatāṁ sagotratvād vivāhaḥ syāt parasparam

जिन-जिनके प्रवरों में विश्वामित्र एक भी बार आता है, वे सब आपस में सगोत्र माने जाते हैं; अतः उनमें परस्पर विवाह नहीं होना चाहिए।

श्लोक 8 (skanda.3.73.8)

त्यजेत्समानप्रवरां सगोत्रां मातुः सपिंडामचिकित्स्यरोगाम् अजातलोम्नीं च तथान्यपूर्वां सुतेन हीनस्य सुतां सुकृष्णाम्

tyajet samānapravarāṁ sagotrāṁ mātuḥ sapiṇḍām acikitsyarogām ajātalomnīṁ ca tathānyapūrvāṁ sutena hīnasya sutāṁ sukṛṣṇām

समान प्रवर वाली, सगोत्रा, माता की सपिण्ड, असाध्य रोग वाली, रोमरहित शरीर वाली, पहले किसी और की हो चुकी, तथा निपुत्र पिता की अत्यंत श्यामवर्णा कन्या — इन सबका विवाह में त्याग करना चाहिए।

श्लोक 9 (skanda.3.73.9)

एक एव ऋषिर्यत्र प्रवरेष्वनुवर्तते तावत्समानगोत्रत्वमृते भृग्वंगिरोगणात्

eka eva ṛṣir yatra pravareṣv anuvartate tāvat samānagotratvam ṛte bhṛgvaṅgirogaṇāt

जहाँ प्रवरों में एक भी ऋषि समान हो, वहाँ — भृगु और अंगिरा गणों को छोड़कर — शेष सब में समान-गोत्रता मानी जाती है।

श्लोक 10 (skanda.3.73.10)

पंचसु त्रिषु सामान्यादविवाहस्त्रिषु द्वयोः भृग्वगिरोगणेष्वेवं शेषेष्वेकोपि वारयेत्

pañcasu triṣu sāmānyād avivāhas triṣu dvayoḥ bhṛgvagirogaṇeṣv evaṁ śeṣeṣv eko 'pi vārayet

भृगु और अंगिरा गणों में पाँच में से तीन प्रवर समान होने पर, अथवा तीन में से दो समान होने पर विवाह वर्जित है; शेष सब गणों में तो एक भी प्रवर समान होना विवाह में बाधक बन जाता है।

श्लोक 11 (skanda.3.73.11)

समानगोत्रप्रवरां कन्यामूढ्वोपगम्य च तस्यामुत्पाद्य चांडालं ब्राह्मण्यादेव हीयते

samānagotrapravarāṁ kanyām ūḍhvopagamya ca tasyām utpādya cāṇḍālaṁ brāhmaṇyād eva hīyate

समान गोत्र-प्रवर वाली कन्या से विवाह करके यदि कोई उससे संतान उत्पन्न करे, तो वह संतान चाण्डाल-तुल्य होती है, और उत्पन्न करने वाला स्वयं ब्राह्मणत्व से च्युत हो जाता है।

श्लोक 12 (skanda.3.73.12)

कात्यायनः । परिणीय सगोत्रा तु समानप्रवरां तथा त्यागं कृत्वा द्विजस्तस्यास्ततश्चांद्रायणं चरेत्

kātyāyanaḥ pariṇīya sagotrāṁ tu samānapravarāṁ tathā tyāgaṁ kṛtvā dvijas tasyās tataś cāndrāyaṇaṁ caret

कात्यायन कहते हैं — यदि किसी द्विज ने भूलवश सगोत्रा या समान-प्रवरा कन्या से विवाह कर लिया हो, तो उसे उस स्त्री का त्याग करके चान्द्रायण व्रत करना चाहिए।

श्लोक 13 (skanda.3.73.13)

उत्सृज्य तां ततो भार्यां मातृवत्परिपालयेत्

utsṛjya tāṁ tato bhāryāṁ mātṛvat paripālayet

उस पत्नी को त्यागने के बाद भी उसका भरण-पोषण माता के समान करते रहना चाहिए।

श्लोक 14 (skanda.3.73.14)

याज्ञवल्क्यः । अरोगिणीं भ्रातृमतीमसमानार्षगोत्रजाम् पंचमात्सप्तमार्दूर्ध्वं मातृतः पितृत स्तथा

yājñavalkyaḥ arogiṇīṁ bhrātṛmatīm asamānārṣagotrajām pañcamāt saptamād ūrdhvaṁ mātṛtaḥ pitṛtas tathā

याज्ञवल्क्य कहते हैं — कन्या नीरोग हो, उसका भाई विद्यमान हो, वह पिता के ऋषि-गोत्र से भिन्न गोत्र में उत्पन्न हो, तथा माता की ओर से पाँचवीं और पिता की ओर से सातवीं पीढ़ी के आगे की हो — ऐसी कन्या से विवाह करना चाहिए।

श्लोक 15 (skanda.3.73.15)

असमानप्रवरैर्विवाह इति गौतमः । यद्येकं प्रवरं भिन्नं मातृगोत्रवरस्य च तत्रोद्वाहो न कर्तव्यः सा कन्या भगिनी भवेत्

asamānapravarair vivāha iti gautamaḥ yady ekaṁ pravaraṁ bhinnaṁ mātṛgotravarasya ca tatrodvāho na kartavyaḥ sā kanyā bhaginī bhavet

गौतम कहते हैं — विवाह असमान-प्रवर वालों में ही होना चाहिए। यदि माता के गोत्र-प्रवर से केवल एक ही प्रवर भिन्न हो (शेष समान हों), तो वहाँ विवाह नहीं करना चाहिए; ऐसी कन्या बहन के समान मानी जाती है।

श्लोक 16 (skanda.3.73.16)

दाराग्निहोत्रसंयोगं कुरुते योऽग्रजे स्थिते परिवेत्ता स विज्ञेयः परिवित्तिस्तु पूर्वजः

dārāgnihotrasaṁyogaṁ kurute yo 'graje sthite parivettā sa vijñeyaḥ parivittis tu pūrvajaḥ

जो बड़े भाई के अविवाहित रहते हुए भी पहले विवाह और अग्निहोत्र कर लेता है, वह 'परिवेत्ता' कहलाता है; और जो बड़ा भाई इस प्रकार पीछे रह जाता है, वह 'परिवित्ति' कहलाता है।

श्लोक 17 (skanda.3.73.17)

सदा पौनर्भवा कन्या वर्जनीया कुलाधमा वाचा दत्ता मनोदत्ता कृतकौतुकमंगला

sadā paunarbhavā kanyā varjanīyā kulādhamā vācā dattā manodattā kṛtakautukamaṅgalā

पुनर्विवाहिता स्त्री की कन्या सदा त्याज्य है, वह कुल में निकृष्ट मानी जाती है; इसी प्रकार वाणी से वाग्दत्ता, मन से संकल्पित, अथवा जिसका कौतुक-मंगल विधान पहले ही सम्पन्न हो चुका हो, ऐसी कन्या भी त्याज्य है।

श्लोक 18 (skanda.3.73.18)

उदकस्पर्शिता याच याच पाणिगृहीतका अग्निं परिगता या च पुनर्भूः प्रसवा च या

udakasparśitā yā ca yā ca pāṇigṛhītakā agniṁ parigatā yā ca punarbhūḥ prasavā ca yā

जिसने विवाह-जल का स्पर्श कर लिया हो, जिसका पाणिग्रहण हो चुका हो, जो अग्नि की परिक्रमा कर चुकी हो, अथवा जो पुनर्विवाहित होकर संतान उत्पन्न कर चुकी हो —

श्लोक 19 (skanda.3.73.19)

इत्येताः काश्यपेनोक्ता दहंति कुलमग्निवत्

ity etāḥ kāśyapenoktā dahanti kulam agnivat

काश्यप ऋषि ने कहा है कि ऐसी कन्याएँ — यदि विवाही जायें — अग्नि के समान (वर के) कुल को भस्म कर डालती हैं।

श्लोक 20 (skanda.3.73.20)

अथावटंकाः कथ्यंते — गोत्र, पात्र, दात्र, त्राशयत्र, लडकात्र, मंडकीयात्र, विडलात्र, रहिला, भादिल, वालूआ, पोकीया, वाकीया, मकाल्या, लाडआ, माणवेदा, कालीया, ताली, वेलीया, पांवलन्डीया, मूडा, पीतूला, धिगमघ, भूतपादवादी, होफोया, शेवार्दत, वपार, वथार, साधका, बहुधिया ।।

athāvaṭaṅkāḥ kathyante — gotra, pātra, dātra, trāśayatra, laḍakātra, maṇḍakīyātra, viḍalātra, rahilā, bhādila, vālūā, pokīyā, vākīyā, makālyā, lāḍāā, māṇavedā, kālīyā, tālī, velīyā, pāṁvalanḍīyā, mūḍā, pītūlā, dhigamagha, bhūtapādavādī, hophoyā, śevārdata, vapāra, vathāra, sādhakā, bahudhiyā.

अब अवटंक (कुल-उपनाम) बताये जाते हैं — गोत्र, पात्र, दात्र, त्राशयत्र, लडकात्र, मंडकीयात्र, विडलात्र, रहिला, भादिल, वालूआ, पोकीया, वाकीया, मकाल्या, लाडआ, माणवेदा, कालीया, ताली, वेलीया, पांवलन्डीया, मूडा, पीतूला, धिगमघ, भूतपादवादी, होफोया, शेवार्दत, वपार, वथार, साधका और बहुधिया — इस प्रकार चालीस अवटंक कहे गये हैं।

श्लोक 21 (skanda.3.73.21)

मातुलस्य सुतामूढ्वा मातृगोत्रां तथैव च समानप्रवरां चैव त्यक्त्वा चांद्रायणं चरेत् इति श्रीस्कांदे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां तृतीये ब्रह्मखण्डे पूर्वभागे धर्मारण्यमाहात्म्ये श्रीमाताकथितनामगोत्रप्रवरकृतदेव्यवटंककथननामैकविंशोऽध्यायः

mātulasya sutām ūḍhvā mātṛgotrāṁ tathaiva ca samānapravarāṁ caiva tyaktvā cāndrāyaṇaṁ caret iti śrīskānde mahāpurāṇa ekāśītisāhasryāṁ saṁhitāyāṁ tṛtīye brahmakhaṇḍe pūrvabhāge dharmāraṇyamāhātmye śrīmātākathitanāmagotrapravarakṛtadevyavaṭaṅkakathananāmaikaviṁśo 'dhyāyaḥ

मामा की पुत्री से, अथवा माता के ही गोत्र वाली या समान प्रवर वाली कन्या से विवाह कर लेने पर, उसे त्यागकर चान्द्रायण व्रत करना चाहिए। इस प्रकार श्रीस्कन्दमहापुराण की एक लाख इक्यासी हज़ार श्लोकों वाली संहिता के तृतीय ब्रह्मखण्ड के पूर्वभाग में, धर्मारण्य-माहात्म्य के अंतर्गत, श्रीमाता द्वारा कथित नाम-गोत्र-प्रवर-कृत देवी-अवटंक कथन नामक इक्कीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ।

अध्याय 72अध्याय-सूचीअध्याय 74