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काशी खण्ड · अध्याय 5

अगस्त्यप्रस्थान

अध्याय 4अध्याय-सूचीअध्याय 6

श्लोक 1 (skanda.4.5.1)

पराशर उवाच । ततो ध्यानेन विश्वेशमालोक्य स मुनीश्वरः । सूत प्रोवाच तां पुण्यां लोपामुद्रामिदं वचः

parāśara uvāca tato dhyānena viśveśamālokya sa munīśvaraḥ sūta provāca tāṁ puṇyāṁ lopāmudrāmidaṁ vacaḥ

पराशर जी ने कहा -- हे सूत! तदनन्तर उन मुनीश्वर (अगस्त्य) ने ध्यान द्वारा विश्वेश (शिव) का दर्शन करके पवित्र लोपामुद्रा से यह वचन कहा।

श्लोक 2 (skanda.4.5.2)

अयि पश्य वरारोहे किमेतत्समुपस्थितम् । क्व तत्कार्यं क्व च वयं मुनिमार्गानुसारिणः

ayi paśya varārohe kimetatsamupasthitam kva tatkāryaṁ kva ca vayaṁ munimārgānusāriṇaḥ

हे वरारोहे! देखो, यह क्या आ उपस्थित हुआ है। कहाँ वह कार्य (देवताओं का प्रयोजन) और कहाँ हम, जो मुनियों के मार्ग के अनुगामी हैं!

श्लोक 3 (skanda.4.5.3)

येन गोत्रभिदा गोत्रा विपक्षा हेलया कृताः । भवेत्कुंठितसामर्थ्यः स कथं गिरिमात्रके

yena gotrabhidā gotrā vipakṣā helayā kṛtāḥ bhavetkuṁṭhitasāmarthyaḥ sa kathaṁ girimātrake

जिसने शत्रुभूत पर्वत-कुलों (गोत्रों) को खेल मात्र में शक्तिहीन कर दिया, उसका सामर्थ्य भला एक मात्र पर्वत के सम्मुख कुंठित कैसे हो सकता है?

श्लोक 4 (skanda.4.5.4)

कल्पवृक्षोंऽगणे यस्य कुलिशं यस्य चायुधम् । सिद्ध्यष्टकं हि यद्द्वारि स सिद्ध्यै प्रार्थयेद्द्विजम्

kalpavṛkṣoṁ'gaṇe yasya kuliśaṁ yasya cāyudham siddhyaṣṭakaṁ hi yaddvāri sa siddhyai prārthayeddvijam

जिसके आँगन में कल्पवृक्ष है, जिसका आयुध वज्र है, जिसके द्वार पर आठों सिद्धियाँ निवास करती हैं -- वह भी (इंद्र) अपनी सिद्धि के लिए एक ब्राह्मण से प्रार्थना करे, यह भी कैसी विडंबना है।

श्लोक 5 (skanda.4.5.5)

क्रियंते व्याकुलाः शैला अहो दावाग्निना प्रिये । तद्वृद्धिस्तंभने शक्तिः क्व गतासाऽऽशुशुक्षणेः

kriyaṁte vyākulāḥ śailā aho dāvāgninā priye tadvṛddhistaṁbhane śaktiḥ kva gatāsā''śuśukṣaṇeḥ

हे प्रिये! अहो, दावाग्नि से पर्वत व्याकुल हो रहे हैं; उसकी वृद्धि को रोकने की शक्ति कहाँ चली गई?

श्लोक 6 (skanda.4.5.6)

नियन्ता सर्वभूतानां योसौ दण्डधरः प्रभुः । स किं दंडयितुं नालमेकं तं ग्रावमात्रकम्

niyantā sarvabhūtānāṁ yosau daṇḍadharaḥ prabhuḥ sa kiṁ daṁḍayituṁ nālamekaṁ taṁ grāvamātrakam

जो सम्पूर्ण प्राणियों के नियन्ता, दण्डधर प्रभु हैं, क्या वे उस एक पत्थर-मात्र पर्वत को दंड देने में समर्थ नहीं हैं?

श्लोक 7 (skanda.4.5.7)

आदित्या वसवो रुद्रास्तुषिताः स मरुद्गणाः । विश्वेदेवास्तथा दस्रौ ये चान्येपि दिवौकसः

ādityā vasavo rudrāstuṣitāḥ sa marudgaṇāḥ viśvedevāstathā dasrau ye cānyepi divaukasaḥ

आदित्यगण, वसुगण, रुद्रगण, तुषितगण, मरुद्गण, विश्वेदेवगण, तथा दोनों अश्विनीकुमार और अन्य भी जो स्वर्गवासी देवता हैं --

श्लोक 8 (skanda.4.5.8)

येषां दृक्पातमात्रेण पतंति भुवनान्यपि। ते किं समर्था नो कांते नगवृद्धिनिषेधने

yeṣāṁ dṛkpātamātreṇa pataṁti bhuvanānyapi te kiṁ samarthā no kāṁte nagavṛddhiniṣedhane

जिनकी दृष्टिपात मात्र से लोक भी गिर सकते हैं, हे कांते! क्या वे एक पर्वत की वृद्धि रोकने में समर्थ नहीं हैं?

श्लोक 9 (skanda.4.5.9)

आज्ञातं कारणं तच्च स्मृतं वाक्यं सुभाषितम्। काशीमुद्दिश्य यद्गीतं मुनिभिस्तत्त्वदर्शिभिः

ājñātaṁ kāraṇaṁ tacca smṛtaṁ vākyaṁ subhāṣitam kāśīmuddiśya yadgītaṁ munibhistattvadarśibhiḥ

किंतु अब मुझे उसका कारण ज्ञात हो गया है, और वह सुभाषित वाक्य स्मरण हो आया है, जो तत्त्वदर्शी मुनियों ने काशी के विषय में कहा है --

श्लोक 10 (skanda.4.5.10)

अविमुक्तं न मोक्तव्यं सर्वथैव मुमुक्षुभिः । किंतु विघ्ना भविष्यंति काश्यां निवसतां सताम्

avimuktaṁ na moktavyaṁ sarvathaiva mumukṣubhiḥ kiṁtu vighnā bhaviṣyaṁti kāśyāṁ nivasatāṁ satām

"अविमुक्त (काशी) को मुमुक्षुओं को सर्वथा नहीं त्यागना चाहिए; किंतु काशी में निवास करने वाले सत्पुरुषों के लिए विघ्न अवश्य उपस्थित होंगे।"

श्लोक 11 (skanda.4.5.11)

उपस्थितोयं कल्याणि सोंऽतरायो महानिह । न शक्यतेऽन्यथाकर्तुं विश्वेशो विमुखो यतः

upasthitoyaṁ kalyāṇi soṁ'tarāyo mahāniha na śakyate'nyathākartuṁ viśveśo vimukho yataḥ

हे कल्याणि! वही महान विघ्न अब यहाँ आ उपस्थित हुआ है; इसे अन्यथा नहीं किया जा सकता, क्योंकि स्वयं विश्वेश भी इससे विमुख प्रतीत होते हैं।

श्लोक 12 (skanda.4.5.12)

काशीद्विजाशीर्भिरहो यदाप्ता कस्तां मुमुक्षुर्यदिवामुमुक्षुः । ग्रासं करस्थं स विसृज्य हृद्यं स्वकूर्परं लेढि विमूढचेताः

kāśīdvijāśīrbhiraho yadāptā kastāṁ mumukṣuryadivāmumukṣuḥ grāsaṁ karasthaṁ sa visṛjya hṛdyaṁ svakūrparaṁ leḍhi vimūḍhacetāḥ

अहो! जिसने द्विजों के आशीर्वाद से यह काशी पाई हो, फिर चाहे वह मुमुक्षु हो या न हो, यदि वह उसे त्याग दे, तो वह मूढ़चित्त पुरुष हाथ में रखे स्वादिष्ट ग्रास को छोड़कर अपनी कोहनी चाटने की चेष्टा करने वाले के समान है।

श्लोक 13 (skanda.4.5.13)

अहो जना बालिशवत्किमेतां काशीं त्यजेयुः सुकृतैकराशिम् । शालूककंदः प्रतिमज्जनं किं लभेत तद्वत्सुलभा किमेषा

aho janā bāliśavatkimetāṁ kāśīṁ tyajeyuḥ sukṛtaikarāśim śālūkakaṁdaḥ pratimajjanaṁ kiṁ labheta tadvatsulabhā kimeṣā

अहो! लोग बालकों की भाँति इस काशी को, जो पुण्य की एकमात्र राशि है, क्यों त्याग देते हैं? क्या हर गोता लगाने वाले को कमलकंद प्राप्त हो जाता है? उसी प्रकार क्या यह काशी सर्वत्र सुलभ है?

श्लोक 14 (skanda.4.5.14)

भवांतरा वर्जित पुण्यराशिं कृच्छैर्महद्भिर्ह्यवगम् यकाशीम् । प्राप्यापि किं मूढधियोन्यतो वै यियासवो दुर्गतिमुद्यियासवः

bhavāṁtarā varjita puṇyarāśiṁ kṛcchairmahadbhirhyavagam yakāśīm prāpyāpi kiṁ mūḍhadhiyonyato vai yiyāsavo durgatimudyiyāsavaḥ

अनेक जन्मों के महान कष्टों से यह पुण्यराशि काशी कठिनाई से प्राप्त होती है; फिर भी मूढ़बुद्धि लोग उसे पाकर भी अन्यत्र जाने की इच्छा क्यों करते हैं, मानो दुर्गति की ओर ही जाने को उद्यत हों?

श्लोक 15 (skanda.4.5.15)

क्व काशिका विश्वपदप्रकाशिका क्व कार्यमन्यत्परितोतिदुःखम् । तत्पंडितोन्यत्र कुतः प्रयाति किं याति कूष्मांडफलं ह्यजास्ये

kva kāśikā viśvapadaprakāśikā kva kāryamanyatparitotiduḥkham tatpaṁḍitonyatra kutaḥ prayāti kiṁ yāti kūṣmāṁḍaphalaṁ hyajāsye

कहाँ यह काशिका, जो विश्व के परम पद को प्रकाशित करने वाली है, और कहाँ अन्य कोई कार्य, जो चारों ओर से दुःखमय है! फिर कोई विद्वान भला अन्यत्र क्यों जाएगा? क्या कूष्मांड (कुम्हड़े) का फल कभी अपने-आप बकरे के मुख में जाता है?

श्लोक 16 (skanda.4.5.16)

काशीं प्रकाशीं कृतपुण्यराशिं हा शीघ्रनाशी विसृजेन्नरः किम् । नूनं स्वनूनं सुकृतं तदीयं मदीयमेवं विवृणोति चेतः

kāśīṁ prakāśīṁ kṛtapuṇyarāśiṁ hā śīghranāśī visṛjennaraḥ kim nūnaṁ svanūnaṁ sukṛtaṁ tadīyaṁ madīyamevaṁ vivṛṇoti cetaḥ

क्या कोई मनुष्य, जो शीघ्र नाश को प्राप्त होने वाला हो, इस प्रकाशमान, पुण्यराशि-संपन्न काशी को त्याग देगा? निश्चय ही उसका अपना पुण्य अत्यंत न्यून रहा होगा -- ऐसा मेरा मन ही कह रहा है।

श्लोक 17 (skanda.4.5.17)

नरो न रोगी यदिहाविहाय सहायभूतां सकलस्य जंतोः। काशीमनाशी सुकृतैकराशिमन्यत्र यातुं यततां न चान्यः

naro na rogī yadihāvihāya sahāyabhūtāṁ sakalasya jaṁtoḥ kāśīmanāśī sukṛtaikarāśimanyatra yātuṁ yatatāṁ na cānyaḥ

जो यहाँ की, समस्त प्राणियों की सहायक, अविनाशी, पुण्य की एकमात्र राशि, इस काशी को छोड़कर अन्यत्र जाने का प्रयत्न करे, वह रोगग्रस्त (बुद्धिभ्रष्ट) मनुष्य ही हो सकता है, और कोई नहीं।

श्लोक 18 (skanda.4.5.18)

वित्रस्तपापां त्रिदशैर्दुरापां गंगां सदापां भवपाशशापाम् । शिवाविमुक्ताममृतैकशुक्तिं भुक्ताविमुक्तानपरित्यजन्ति

vitrastapāpāṁ tridaśairdurāpāṁ gaṁgāṁ sadāpāṁ bhavapāśaśāpām śivāvimuktāmamṛtaikaśuktiṁ bhuktāvimuktānaparityajanti

जिन्होंने अविमुक्त (काशी) का वास्तव में अनुभव किया है, वे उसे कभी नहीं त्यागते -- वह काशी, जो पाप को भयभीत करने वाली, देवताओं के लिए भी दुर्लभ, सदा गंगाजल से युक्त, संसार-बंधन के शाप को हरने वाली, कल्याणकारी, अविमुक्त तथा अमृत की एकमात्र सीप है।

श्लोक 19 (skanda.4.5.19)

हंहो किमंहो निचिताः प्रलब्धा बंहीयसायास भरेण काशीम् । प्रभूतपुण्यद्रविणैकपण्यां प्राप्यापि हित्वा क्व च गंतुमुद्यताः

haṁho kimaṁho nicitāḥ pralabdhā baṁhīyasāyāsa bhareṇa kāśīm prabhūtapuṇyadraviṇaikapaṇyāṁ prāpyāpi hitvā kva ca gaṁtumudyatāḥ

हाय! कैसा पाप उन्होंने संचित किया है, जो अत्यंत परिश्रम के भार से ठगे जाकर, प्रभूत पुण्य-रूपी धन से ही मूल्य चुकाई जा सकने वाली इस काशी को पाकर भी उसे त्यागकर अन्यत्र जाने को उद्यत होते हैं?

श्लोक 20 (skanda.4.5.20)

अहो जनानां जडता विहाय काशीं यदन्यत्र न यंति चेतः । परिस्फुरद्गांगजलाभिरामां कामारिशूलाग्रधृतां लयेपि

aho janānāṁ jaḍatā vihāya kāśīṁ yadanyatra na yaṁti cetaḥ parisphuradgāṁgajalābhirāmāṁ kāmāriśūlāgradhṛtāṁ layepi

अहो! लोगों की यह कैसी सुदृढ़ एकनिष्ठा है कि गंगाजल की तरंगों से रमणीय, प्रलयकाल में भी कामारि (शिव) के शूल के अग्रभाग पर धारण की गई इस काशी के अतिरिक्त उनका चित्त अन्यत्र कहीं नहीं जाता।

श्लोक 21 (skanda.4.5.21)

रेरे भवे शोकजलैकपूर्णे पापेस्मलोकाः पतिताब्धिमध्ये। विद्राणनिद्राणविरोधिपापां काशीं परित्यज्यतरिं किमर्थम्

rere bhave śokajalaikapūrṇe pāpesmalokāḥ patitābdhimadhye vidrāṇanidrāṇavirodhipāpāṁ kāśīṁ parityajyatariṁ kimartham

अरे! शोक के जल से परिपूर्ण, पापपूर्ण संसार-सागर के मध्य पतित हे प्राणियो! शत्रुभूत पाप को नष्ट कर सुला देने वाली इस काशी-रूपी नौका को क्यों त्याग रहे हो?

श्लोक 22 (skanda.4.5.22)

न सत्पथेनापि न योगयुक्त्या दानैर्नवा नैव तपोभिरुग्रैः । काशी द्विजाशीर्भिरहो सुलभ्या किंवा प्रसादेन च विश्वभर्तुः

na satpathenāpi na yogayuktyā dānairnavā naiva tapobhirugraiḥ kāśī dvijāśīrbhiraho sulabhyā kiṁvā prasādena ca viśvabhartuḥ

न सत्पथ से, न योगसाधना से, न दान से, न ही उग्र तप से -- अहो, काशी तो द्विजों के आशीर्वाद से अथवा विश्वभर्ता (शिव) की कृपा से ही सुलभ होती है।

श्लोक 23 (skanda.4.5.23)

धर्मस्तु संपत्तिभरैः किलोह्यतेप्यर्थो हि कामैर्बहुदानभोगकैः। अन्यत्रसर्वं स च मोक्ष एकः काश्यां न चान्यत्र तथायथात्र

dharmastu saṁpattibharaiḥ kilohyatepyartho hi kāmairbahudānabhogakaiḥ anyatrasarvaṁ sa ca mokṣa ekaḥ kāśyāṁ na cānyatra tathāyathātra

धर्म तो संपत्ति के भार से प्राप्त होता प्रतीत होता है, अर्थ भी बहुविध दान-भोग सहित कामनाओं से प्राप्त होता है -- ये सब अन्यत्र भी मिल सकते हैं, किंतु मोक्ष केवल काशी में ही है, जैसा यहाँ है वैसा अन्यत्र कहीं नहीं।

श्लोक 24 (skanda.4.5.24)

क्षेत्रं पवित्रं हि यथाऽविमुक्तं नान्यत्तथायच्छ्रुतिभिः प्रयुक्तम्। न धर्मशास्त्रैर्न च तैःपुराणैस्तस्माच्छरण्यं हि सदाऽविमुक्तम्

kṣetraṁ pavitraṁ hi yathā'vimuktaṁ nānyattathāyacchrutibhiḥ prayuktam na dharmaśāstrairna ca taiḥpurāṇaistasmāccharaṇyaṁ hi sadā'vimuktam

जैसा पवित्र क्षेत्र अविमुक्त (काशी) है, वैसा अन्य कोई नहीं, यह श्रुतियों द्वारा कहा गया है, न धर्मशास्त्रों में और न पुराणों में इससे भिन्न कुछ कहा गया है; अतः अविमुक्त ही सदा शरण देने योग्य है।

श्लोक 25 (skanda.4.5.25)

सहोवाचेति जाबालिरारुणेसिरिडामता। वरणापिंगला नाडी तदंतस्त्वविमुक्तकम्

sahovāceti jābālirāruṇesiriḍāmatā varaṇāpiṁgalā nāḍī tadaṁtastvavimuktakam

जाबालि ऋषि ने अरुणि से इस प्रकार कहा -- वरणा नदी को इडा नाड़ी और असि नदी को पिंगला नाड़ी माना गया है; इन दोनों के मध्य में ही अविमुक्तक (काशी) स्थित है।

श्लोक 26 (skanda.4.5.26)

सा सुषुम्णा परानाडी त्रयं वाराणसीत्वसौ। तदत्रोत्क्रमणे सर्वजंतूनां हि श्रुतौ हरः

sā suṣumṇā parānāḍī trayaṁ vārāṇasītvasau tadatrotkramaṇe sarvajaṁtūnāṁ hi śrutau haraḥ

वही सुषुम्णा नामक परम नाड़ी है, और ये तीनों मिलकर ही वाराणसी हैं। यहाँ, इसी में, सम्पूर्ण प्राणियों के उत्क्रमण (शरीर-त्याग) के समय, श्रुति के अनुसार, स्वयं भगवान हर उपस्थित रहते हैं।

श्लोक 27 (skanda.4.5.27)

तारकं ब्रह्मव्याचष्टे तेन ब्रह्म भवंति हि। एवं श्लोको भवत्येष आहुर्वै वेदवादिनः

tārakaṁ brahmavyācaṣṭe tena brahma bhavaṁti hi evaṁ śloko bhavatyeṣa āhurvai vedavādinaḥ

वे तारक ब्रह्म का उपदेश देते हैं, जिससे प्राणी ब्रह्मस्वरूप हो जाते हैं। यही श्लोक प्रसिद्ध है, ऐसा वेदवादी कहते हैं।

श्लोक 28 (skanda.4.5.28)

भगवानंतकालेऽत्र तारकस्योपदेशतः। अविमुक्तेस्थिताञ्जन्तून्मोचयेन्नात्र संशयः

bhagavānaṁtakāle'tra tārakasyopadeśataḥ avimuktesthitāñjantūnmocayennātra saṁśayaḥ

भगवान शिव अंतकाल में, यहाँ, तारक मंत्र के उपदेश द्वारा, अविमुक्त (काशी) में स्थित समस्त प्राणियों को मुक्त कर देते हैं -- इसमें कोई संशय नहीं है।

श्लोक 29 (skanda.4.5.29)

नाविमुक्तसमंक्षेत्रं नाविमुक्तसमा गतिः । नाविमुक्तसमं लिंगं सत्यं सत्यं पुनःपुनः

nāvimuktasamaṁkṣetraṁ nāvimuktasamā gatiḥ nāvimuktasamaṁ liṁgaṁ satyaṁ satyaṁ punaḥpunaḥ

अविमुक्त के समान कोई क्षेत्र नहीं है, अविमुक्त के समान कोई गति (लक्ष्य) नहीं है, अविमुक्त के समान कोई लिंग नहीं है -- यह सत्य है, सत्य है, बार-बार सत्य है।

श्लोक 30 (skanda.4.5.30)

अविमुक्तं परित्यज्य योन्यत्र कुरुते रतिम् । मुक्तिं करतलान्मुक्त्वा सोन्यां सिद्धिं गवेषयेत्

avimuktaṁ parityajya yonyatra kurute ratim muktiṁ karatalānmuktvā sonyāṁ siddhiṁ gaveṣayet

जो अविमुक्त को त्यागकर अन्यत्र आसक्ति करता है, वह अपनी हथेली में रखी मुक्ति को छोड़कर किसी अन्य सिद्धि की खोज में भटकता है।

श्लोक 31 (skanda.4.5.31)

इत्थं सुनिश्चित्य मुनिर्महात्मा क्षेत्रप्रभावं श्रुतितः पुराणात्। श्रीविश्वनाथेन समं न लिंगं पुरी न काशी सदृशी त्रिकोट्याम्

itthaṁ suniścitya munirmahātmā kṣetraprabhāvaṁ śrutitaḥ purāṇāt śrīviśvanāthena samaṁ na liṁgaṁ purī na kāśī sadṛśī trikoṭyām

इस प्रकार श्रुति और पुराण से क्षेत्र के प्रभाव को भली-भाँति निश्चित करके उस महात्मा मुनि ने जाना कि श्रीविश्वनाथ के समान कोई लिंग नहीं है, और तीन करोड़ नगरियों में काशी के समान कोई नगरी नहीं है।

श्लोक 32 (skanda.4.5.32)

श्रीकालराजं च ततः प्रणम्य विज्ञापयामास मुनीशवर्यः । आपृच्छनायाहमिहागतोस्मि श्रीकाशिपुर्यास्तु यतः प्रभुस्त्वम्

śrīkālarājaṁ ca tataḥ praṇamya vijñāpayāmāsa munīśavaryaḥ āpṛcchanāyāhamihāgatosmi śrīkāśipuryāstu yataḥ prabhustvam

तत्पश्चात श्रीकालराज (कालभैरव) को प्रणाम करके उन मुनिश्रेष्ठ ने निवेदन किया -- "मैं आज्ञा लेने के लिए यहाँ आया हूँ, क्योंकि आप ही श्रीकाशीपुरी के स्वामी हैं।"

श्लोक 33 (skanda.4.5.33)

हा कालराजप्रति भूतमत्र प्रत्यष्टमिप्रत्यवनीसुतार्कम् । नाराधये मूलफलप्रसूनैः किं मय्यनागस्यपराधदृक्स्याः

hā kālarājaprati bhūtamatra pratyaṣṭamipratyavanīsutārkam nārādhaye mūlaphalaprasūnaiḥ kiṁ mayyanāgasyaparādhadṛksyāḥ

हा कालराज! यहाँ प्रत्येक अष्टमी को, तथा मंगलवार को भी मैंने मूल, फल और पुष्पों से आपकी पूजा नहीं की -- क्या इसी कारण आप मुझ निरपराध पर भी अपराध की दृष्टि रखेंगे?

श्लोक 34 (skanda.4.5.34)

हा कालभैरव भवानभितो भयार्तान्माभैष्ट चे तिभणनैः स्वकरं प्रसार्य । मूर्तिं विधाय विकटां कटुपापभोक्त्रीं वाराणसीस्थितजनान्परिपाति किं न

hā kālabhairava bhavānabhito bhayārtānmābhaiṣṭa ce tibhaṇanaiḥ svakaraṁ prasārya mūrtiṁ vidhāya vikaṭāṁ kaṭupāpabhoktrīṁ vārāṇasīsthitajanānparipāti kiṁ na

हे कालभैरव! क्या आप चारों ओर भय से पीड़ित लोगों को अपना हाथ फैलाकर "मत डरो" कहकर आश्वस्त करते हुए, कटु पाप को भक्षण करने वाला विकराल रूप धारण कर, वाराणसी में रहने वाले जनों की रक्षा नहीं करते?

श्लोक 35 (skanda.4.5.35)

हे यक्षराज रजनीकर चारुमूर्ते श्रीपूर्णभद्रसुतनायक दंडपाणे । त्वं वै तपोजनितदुःखमवैपि सर्वं किं मां बहिर्नयसि काशिनिवासिरक्षिन्

he yakṣarāja rajanīkara cārumūrte śrīpūrṇabhadrasutanāyaka daṁḍapāṇe tvaṁ vai tapojanitaduḥkhamavaipi sarvaṁ kiṁ māṁ bahirnayasi kāśinivāsirakṣin

हे यक्षराज, चंद्रमा के समान सुंदर मूर्तिवाले, श्रीपूर्णभद्र के पुत्र, दंडपाणे! आप तो मेरे तप से उत्पन्न सारे दुःख को भलीभाँति जानते हैं; फिर हे काशीनिवासियों के रक्षक! मुझे नगर से बाहर क्यों ले जा रहे हैं?

श्लोक 36 (skanda.4.5.36)

त्वमन्नदस्त्वं किल जीवदाता त्वं ज्ञानदस्त्वं किल मोक्षदोपि । त्वमंत्यभूषां कुरुषे जनानां जटाकलापैरुरगेंद्रहारैः

tvamannadastvaṁ kila jīvadātā tvaṁ jñānadastvaṁ kila mokṣadopi tvamaṁtyabhūṣāṁ kuruṣe janānāṁ jaṭākalāpairurageṁdrahāraiḥ

आप ही अन्नदाता हैं, आप ही जीवनदाता हैं, आप ही ज्ञानदाता हैं और आप ही मोक्षदाता हैं। अपनी जटाओं और नागराज की मालाओं से आप मनुष्यों का अंतिम शृंगार करते हैं।

श्लोक 37 (skanda.4.5.37)

गणौ त्वदीयौ किल संभ्रमोद्भ्रमावत्रस्थवृत्तांत विचारकोविदौ । संभ्रांतिमुत्पाद्यपरामसाधून्क्षेत्रात्क्षणं दूरयतस्त्वमुष्मात्

gaṇau tvadīyau kila saṁbhramodbhramāvatrasthavṛttāṁta vicārakovidau saṁbhrāṁtimutpādyaparāmasādhūnkṣetrātkṣaṇaṁ dūrayatastvamuṣmāt

आपके ही दोनों गण, जो यहाँ रहने वालों के आचरण की जाँच-पड़ताल में निपुण हैं, नई भ्रांति उत्पन्न करके असाधु (अयोग्य) पुरुषों को क्षणभर में इस क्षेत्र से दूर कर देते हैं।

श्लोक 38 (skanda.4.5.38)

शृणु प्रभो ढुंढिविनायक त्वं वाचं मदीयां तुरटाम्यनाथवत् । त्वत्स्थाः समस्ताः किल विघ्नपूगाः किमत्र दुर्वृत्तवदास्थितोहम्

śṛṇu prabho ḍhuṁḍhivināyaka tvaṁ vācaṁ madīyāṁ turaṭāmyanāthavat tvatsthāḥ samastāḥ kila vighnapūgāḥ kimatra durvṛttavadāsthitoham

हे प्रभु ढुंढिविनायक! मेरी यह वाणी सुनिए, मैं अनाथ के समान त्वरा से आपके पास आया हूँ। सभी विघ्नसमूह तो आपके अधीन ही हैं; क्या मैं यहाँ किसी दुराचारी के समान रहा हूँ?

श्लोक 39 (skanda.4.5.39)

शृण्वंत्वमी पंच विनायकाश्च चिंतामणिश्चापि कपर्दिनामा । आशागजाख्यौ च विनायकौ तौ शृणोत्वसौ सिद्धिविनायकश्च

śṛṇvaṁtvamī paṁca vināyakāśca ciṁtāmaṇiścāpi kapardināmā āśāgajākhyau ca vināyakau tau śṛṇotvasau siddhivināyakaśca

ये पाँचों विनायक -- चिंतामणि, कपर्दी नामक विनायक, आशागज नामक दोनों विनायक, तथा सिद्धिविनायक -- मेरी यह वाणी सुनें।

श्लोक 40 (skanda.4.5.40)

परापवादो न मया किलोक्तः परापकारोपि मया कृतो न । परस्वबुद्धिः परदारबुद्धिः कृता मया नात्र क एष पाकः

parāpavādo na mayā kiloktaḥ parāpakāropi mayā kṛto na parasvabuddhiḥ paradārabuddhiḥ kṛtā mayā nātra ka eṣa pākaḥ

मैंने न तो कभी किसी की निंदा की है, न किसी का अपकार किया है; न मैंने कभी पराए धन की इच्छा की है, न पराई स्त्री पर कुदृष्टि डाली है -- फिर यह कैसा फल है?

श्लोक 41 (skanda.4.5.41)

गंगा त्रिकालं परिसेविता मया श्रीविश्वनाथोपि सदा विलोकितः । यात्राः कृतास्ताः प्रतिपर्वसर्वतः कोयंविपाको मम विघ्नहेतुः

gaṁgā trikālaṁ parisevitā mayā śrīviśvanāthopi sadā vilokitaḥ yātrāḥ kṛtāstāḥ pratiparvasarvataḥ koyaṁvipāko mama vighnahetuḥ

मैंने त्रिकाल गंगा की सेवा की है, श्रीविश्वनाथ का सदा दर्शन किया है, प्रत्येक पर्व पर सर्वत्र यात्राएँ की हैं -- फिर यह कैसा विपाक है जो मेरे विघ्न का कारण बना है?

श्लोक 42 (skanda.4.5.42)

मातर्विशालाक्षि भवानिमंगले ज्येष्ठेशिसौभाग्यविधानसुंदरि। विश्वेविधे विश्वभुजे नमोस्तु ते श्रीचित्रघंटे विकटे च दुर्गिके

mātarviśālākṣi bhavānimaṁgale jyeṣṭheśisaubhāgyavidhānasuṁdari viśvevidhe viśvabhuje namostu te śrīcitraghaṁṭe vikaṭe ca durgike

हे माता विशालाक्षि! हे मंगलमयी भवानी! हे ज्येष्ठेशि, सौभाग्य प्रदान करने वाली सुंदरि! हे विश्व की विधात्री, विश्व की पालनकर्त्री! आपको नमस्कार है, हे श्रीचित्रघंटे, हे विकटे दुर्गिके!

श्लोक 43 (skanda.4.5.43)

साक्षिण्य एता किलकाशिदेवताः शृण्वंतु न स्वार्थमहं व्रजाम्यतः । अभ्यर्थितो देवगणैः करो मि किं परोपकाराय न किं विधीयते

sākṣiṇya etā kilakāśidevatāḥ śṛṇvaṁtu na svārthamahaṁ vrajāmyataḥ abhyarthito devagaṇaiḥ karo mi kiṁ paropakārāya na kiṁ vidhīyate

ये काशी की देवियाँ साक्षी होकर सुनें -- मैं स्वार्थ के लिए नहीं जा रहा हूँ; देवगणों द्वारा प्रार्थित होकर मैं क्या करूँ -- क्या यह परोपकार के लिए नहीं किया जा रहा?

श्लोक 44 (skanda.4.5.44)

दधीचिरस्थीनि न किं पुरा ददौ जगत्त्रयं किं न ददेऽर्थिने बलिः । दत्तः स्म किं नो मधुकैटभौ शिरो बभूव तार्क्ष्योपि च विष्णुवाहनम्

dadhīcirasthīni na kiṁ purā dadau jagattrayaṁ kiṁ na dade'rthine baliḥ dattaḥ sma kiṁ no madhukaiṭabhau śiro babhūva tārkṣyopi ca viṣṇuvāhanam

क्या दधीचि ने पूर्वकाल में अपनी अस्थियाँ नहीं दी थीं? क्या बलि ने याचक को तीनों लोक नहीं दे दिए थे? क्या मधु-कैटभ का शिर नहीं दिया गया? क्या तार्क्ष्य (गरुड़) भी विष्णु के वाहन नहीं बने?

श्लोक 45 (skanda.4.5.45)

आपृच्छ्य सर्वान्समुनीन्मुनीश्वरः सबालवृद्धानपि तत्रवासिनः । तृणानि वृक्षांश्चलताः समस्ताः पुरीं परिक्रम्य च निर्ययौ च

āpṛcchya sarvānsamunīnmunīśvaraḥ sabālavṛddhānapi tatravāsinaḥ tṛṇāni vṛkṣāṁścalatāḥ samastāḥ purīṁ parikramya ca niryayau ca

वहाँ के समस्त मुनियों से, बालकों और वृद्धों से, तथा घास-तिनकों, वृक्षों और सभी चराचर प्राणियों से विदा लेकर, उन मुनीश्वर (अगस्त्य) ने नगरी की परिक्रमा करके प्रस्थान किया।

श्लोक 46 (skanda.4.5.46)

प्रोषितस्य परितोपि लक्षणैर्नीचवर्त्मपरिवर्तिनोपि वा । चंद्रमौलिमवलोक्य यास्यतः कस्य सिद्धिरिह नो परिस्फुरेत्

proṣitasya paritopi lakṣaṇairnīcavartmaparivartinopi vā caṁdramaulimavalokya yāsyataḥ kasya siddhiriha no parisphuret

जो प्रवास में रहते हुए भी सब ओर उसके लक्षणों को धारण किए हो, अथवा नीच मार्ग पर चलता हुआ भी चंद्रमौलि (शिव) का ध्यान करते हुए जाता हो -- ऐसे किस पुरुष की सिद्धि यहाँ प्रकट न होगी?

श्लोक 47 (skanda.4.5.47)

वरं हि काश्यां तृणवृक्षगुल्मकाश्चरंति पापं न चरंति नान्यतः । वयं चराणां प्रथमा धिगस्तु नो वाराणसींहाद्य विहाय गच्छतः

varaṁ hi kāśyāṁ tṛṇavṛkṣagulmakāścaraṁti pāpaṁ na caraṁti nānyataḥ vayaṁ carāṇāṁ prathamā dhigastu no vārāṇasīṁhādya vihāya gacchataḥ

काशी में स्थित तृण, वृक्ष और झाड़ियाँ ही श्रेष्ठ हैं, जो वहीं रहती हैं और कोई पाप नहीं करतीं -- हम, जो घूमने वालों में अग्रगण्य हैं, उनसे भी गए बीते हैं। धिक्कार है हमें, जो आज वाराणसी को छोड़कर जा रहे हैं!

श्लोक 48 (skanda.4.5.48)

असिं ह्युपस्पृश्य पुनःपुनर्मुनिः प्रासादमालाः परितो विलोकयन् । उवाच नेत्रे सरले प्रपश्यतं काशीं युवां क्वक्व पुरी त्वियं बत

asiṁ hyupaspṛśya punaḥpunarmuniḥ prāsādamālāḥ parito vilokayan uvāca netre sarale prapaśyataṁ kāśīṁ yuvāṁ kvakva purī tviyaṁ bata

असि नदी का बार-बार स्पर्श करते हुए, चारों ओर प्रासादों की पंक्तियों को निहारते हुए, मुनि ने अपने नेत्रों से कहा -- "हे सरल नेत्रो! भलीभाँति देख लो, कहाँ है यह पुरी, और अब हम कहाँ जा रहे हैं!"

श्लोक 49 (skanda.4.5.49)

स्वैरं हसंत्वद्य विधाय तालिकां मिथःकरेणापि करं प्रगृह्य । सीमाचरा भूतगणा व्रजाम्यहं विहाय काशीं सुकृतैकराशिम्

svairaṁ hasaṁtvadya vidhāya tālikāṁ mithaḥkareṇāpi karaṁ pragṛhya sīmācarā bhūtagaṇā vrajāmyahaṁ vihāya kāśīṁ sukṛtaikarāśim

"आज सीमा पर रहने वाले भूतगण भले ही परस्पर हाथों में हाथ डालकर तालियाँ बजाते हुए हँस लें, क्योंकि मैं पुण्य की एकमात्र राशि इस काशी को छोड़कर जा रहा हूँ।"

श्लोक 50 (skanda.4.5.50)

इत्थं विलप्य बहुशः स मुनिस्त्वगस्त्यस्तत्क्रौंचयुग्मवदहो अबलासहायः । मूर्च्छामवाप महतीं विरही वजल्पन्हाकाशिकाशि पुनरेहि च देहि दृष्टिम्

itthaṁ vilapya bahuśaḥ sa munistvagastyastatkrauṁcayugmavadaho abalāsahāyaḥ mūrcchāmavāpa mahatīṁ virahī vajalpanhākāśikāśi punarehi ca dehi dṛṣṭim

इस प्रकार बार-बार विलाप करते हुए वे मुनि अगस्त्य, अपनी अबला (पत्नी) के साथ, मानो विरही क्रौंच पक्षी के जोड़े के समान, गहरी मूर्च्छा को प्राप्त हो गए, विरही की भाँति बड़बड़ाते हुए -- "हा काशी! काशी! फिर आओ, मुझे अपना दर्शन दो!"

श्लोक 51 (skanda.4.5.51)

स्थित्वा क्षणं शिवशिवेति शिवेति चोक्त्वा यावःप्रियेति कठिनाहि दिवौकसस्ते। किं न स्मरेस्त्रिजगती सुखदानदक्षं त्र्यक्षं प्रहित्यमदनं यदकारितैस्तु

sthitvā kṣaṇaṁ śivaśiveti śiveti coktvā yāvaḥpriyeti kaṭhināhi divaukasaste kiṁ na smarestrijagatī sukhadānadakṣaṁ tryakṣaṁ prahityamadanaṁ yadakāritaistu

क्षणभर ठहरकर "शिव, शिव" और पुनः "शिव" कहकर, तथा "चलें, प्रिये" कहते हुए मुनि ने कहा -- हे स्वर्गवासी देवगण! तुम कितने कठोर हृदय हो! क्या तुम्हें त्रिलोकी को सुख देने में समर्थ त्र्यंबक (शिव) का स्मरण नहीं होता, जिन्होंने बिना कुछ किए ही मदन को भस्म कर दिया था?

श्लोक 52 (skanda.4.5.52)

यावद्व्रजेत्त्रिचतुराणि पदानि खेदात्स्वेदोदबिंदुकणिकांचितभालदेशः । प्रत्युद्गमाऽकरणतः किल मे विनाशस्तावद्धराभयवरादिव संचुकोच

yāvadvrajettricaturāṇi padāni khedātsvedodabiṁdukaṇikāṁcitabhāladeśaḥ pratyudgamā'karaṇataḥ kila me vināśastāvaddharābhayavarādiva saṁcukoca

ज्यों-ज्यों वे तीन-चार पग चलते, थकान से उनके ललाट पर स्वेद-बिंदु झलक आते; यह सोचते हुए कि "लौटकर न आने से मेरा नाश ही निश्चित है" -- मानो उस भय-वरदान के कारण पृथ्वी भी उतनी ही सिकुड़ गई हो।

श्लोक 53 (skanda.4.5.53)

तपोयानमिवारुह्य निमेषार्धेन वै मुनिः । अग्रे ददर्श तं विंध्यं रुद्धांबरमथोन्नतम्

tapoyānamivāruhya nimeṣārdhena vai muniḥ agre dadarśa taṁ viṁdhyaṁ ruddhāṁbaramathonnatam

मानो तप के ही रथ पर आरूढ़ होकर, मुनि ने आधे निमेष में ही आगे उस विंध्य पर्वत को देखा, जो आकाश को रोकता हुआ अत्यंत ऊँचा उठा हुआ था।

श्लोक 54 (skanda.4.5.54)

चकंपे चाचलस्तूर्णं दृष्ट्वैवाग्रस्थितम मुनिम् । तमगस्त्यं सपत्नीकं वातापील्वल वैरिणम्

cakaṁpe cācalastūrṇaṁ dṛṣṭvaivāgrasthitama munim tamagastyaṁ sapatnīkaṁ vātāpīlvala vairiṇam

अगस्त्य को, अपनी पत्नी सहित, वातापि और इल्वल के उस वैरी को, सामने खड़ा देखते ही वह पर्वत तुरंत काँप उठा।

श्लोक 55 (skanda.4.5.55)

तपःक्रोधसमुत्थाभ्यां काशीविरहजन्मना । प्रलयानलवत्तीव्रं ज्वलंतं त्रिभिरग्निभिः

tapaḥkrodhasamutthābhyāṁ kāśīvirahajanmanā pralayānalavattīvraṁ jvalaṁtaṁ tribhiragnibhiḥ

तप और क्रोध से उत्पन्न, तथा काशी-विरह से उत्पन्न -- इन तीन अग्नियों से प्रलयाग्नि के समान तीव्रता से जलते हुए --

श्लोक 56 (skanda.4.5.56)

गिरिः खर्वतरो भूत्वा विविक्षुरवनीमिव । आज्ञाप्रसादः क्रियतां किंकरोस्मीति चाब्रवीत

giriḥ kharvataro bhūtvā vivikṣuravanīmiva ājñāprasādaḥ kriyatāṁ kiṁkarosmīti cābravīta

वह पर्वत और अधिक नीचा होकर, मानो पृथ्वी में समा जाना चाहता हुआ, बोला -- "आज्ञा और अनुग्रह कीजिए, मैं आपका सेवक हूँ।"

श्लोक 57 (skanda.4.5.57)

अगस्त्य उवाच । विंध्य साधुरसि प्राज्ञ मां च जानासि तत्त्वतः । पुनरागमनं चेन्मे तावत्खर्वतरो भव

agastya uvāca viṁdhya sādhurasi prājña māṁ ca jānāsi tattvataḥ punarāgamanaṁ cenme tāvatkharvataro bhava

अगस्त्य ने कहा -- "हे विंध्य! तुम साधु और प्रज्ञावान हो, तुम मुझे यथार्थ रूप में जानते हो। जब तक मैं पुनः लौटकर न आऊँ, तब तक तुम इसी प्रकार नीचे बने रहो।"

श्लोक 58 (skanda.4.5.58)

इत्युक्त्वा दक्षिणामाशां सनाथामकरोन्मुनिः । निजैश्चरणविन्यासैस्तया साध्व्या तपोनिधिः

ityuktvā dakṣiṇāmāśāṁ sanāthāmakaronmuniḥ nijaiścaraṇavinyāsaistayā sādhvyā taponidhiḥ

यह कहकर, वह तपोनिधि मुनि अपनी उस साध्वी पत्नी के साथ, अपने ही चरण-विन्यास से दक्षिण दिशा को सनाथ (स्वामीयुक्त) करते हुए आगे बढ़े।

श्लोक 59 (skanda.4.5.59)

गते तस्मिन्मुनिवरे वेपमानस्तदा गिरिः । पश्यत्युत्कंठमिव च गतश्चेत्साध्वभूत्ततः

gate tasminmunivare vepamānastadā giriḥ paśyatyutkaṁṭhamiva ca gataścetsādhvabhūttataḥ

उन मुनिश्रेष्ठ के चले जाने पर वह पर्वत काँपता हुआ, मानो उत्कंठा से उनकी ओर देखता रहा, और सोचने लगा -- "यदि वे सचमुच चले गए, तो मैं धन्य हो गया।"

श्लोक 60 (skanda.4.5.60)

अद्याजातः पुनरहं न शप्तो यदगस्तिना । न मया सदृशो धन्य इति मेने स वै गिरिः

adyājātaḥ punarahaṁ na śapto yadagastinā na mayā sadṛśo dhanya iti mene sa vai giriḥ

"आज मानो मेरा नया जन्म हुआ है, क्योंकि अगस्त्य ने मुझे शाप नहीं दिया; मेरे समान भाग्यशाली कोई नहीं है" -- उस पर्वत ने ऐसा माना।

श्लोक 61 (skanda.4.5.61)

अरुणोपि च तत्काले कालज्ञो ऽश्वानकालयत् । जगत्स्वास्थ्यमवापोच्चैः पूर्ववद्भानुसंचरैः

aruṇopi ca tatkāle kālajño 'śvānakālayat jagatsvāsthyamavāpoccaiḥ pūrvavadbhānusaṁcaraiḥ

अरुण ने भी काल को जानते हुए उसी समय सूर्य के अश्वों को हाँकना प्रारंभ किया; और सूर्य की गति पूर्ववत हो जाने से संसार को पूर्ण रूप से स्वस्थता प्राप्त हुई।

श्लोक 62 (skanda.4.5.62)

अद्य श्वो वा परश्वो वाप्यागमिप्यति वै मुनिः । इति चिंतामहाभारैर्गिरिराक्रांतवत्स्थितः

adya śvo vā paraśvo vāpyāgamipyati vai muniḥ iti ciṁtāmahābhārairgirirākrāṁtavatsthitaḥ

"आज, कल, या परसों वह मुनि अवश्य आएगा" -- ऐसे भारी चिंता के बोझ से वह पर्वत मानो दबा हुआ-सा खड़ा रहा।

श्लोक 63 (skanda.4.5.63)

नाद्यापि मुनिरायाति नाद्यापिगिरिरेधते । यथा खलजनानां हि मनोरथमहीरुहः

nādyāpi munirāyāti nādyāpigiriredhate yathā khalajanānāṁ hi manorathamahīruhaḥ

अब तक वह मुनि नहीं आया, और अब तक वह पर्वत भी नहीं बढ़ा -- ठीक वैसे ही जैसे दुष्ट जनों का मनोरथ-वृक्ष कभी फलित नहीं होता।

श्लोक 64 (skanda.4.5.64)

विवर्धिषति यो नीचः परासूयां समुद्वहन् । दूरे तद्वृद्धिवार्ताऽस्तां प्राग्वृद्धेरपि संशयः

vivardhiṣati yo nīcaḥ parāsūyāṁ samudvahan dūre tadvṛddhivārtā'stāṁ prāgvṛddherapi saṁśayaḥ

जो नीच पुरुष दूसरों के प्रति ईर्ष्या धारण करते हुए बढ़ना चाहता है, उसकी वृद्धि की बात तो दूर, उसकी पहली वृद्धि में भी संदेह ही रहता है।

श्लोक 65 (skanda.4.5.65)

मनोरथा न सिद्ध्येयुः सिद्धा नश्यंत्यपि ध्रुवम् । खलानां तेन कुशलि विश्वं विश्वेशरक्षितम्

manorathā na siddhyeyuḥ siddhā naśyaṁtyapi dhruvam khalānāṁ tena kuśali viśvaṁ viśveśarakṣitam

दुष्टों के मनोरथ सिद्ध नहीं होते, और यदि सिद्ध भी हो जाएँ तो निश्चय ही नष्ट हो जाते हैं; इसीलिए विश्वेश (शिव) द्वारा रक्षित यह सम्पूर्ण संसार कुशलपूर्वक बना रहता है।

श्लोक 66 (skanda.4.5.66)

विधवानां स्तना यद्वद्धृद्येव विलयंति च । उन्नम्योन्नम्य तत्रोच्चैस्तद्वत्खलमनोरथाः

vidhavānāṁ stanā yadvaddhṛdyeva vilayaṁti ca unnamyonnamya tatroccaistadvatkhalamanorathāḥ

जैसे विधवाओं के स्तन उभरकर भी हृदय के पास ही क्षीण हो जाते हैं, वैसे ही दुष्टों के मनोरथ बार-बार उभरकर भी वहीं क्षीण होकर नष्ट हो जाते हैं।

श्लोक 67 (skanda.4.5.67)

भवेत्कूलंकपा यद्वदल्पवर्षेणकन्नदी । खलर्धिरल्पवर्षेण तद्वत्स्यात्स्वकुलंकपा

bhavetkūlaṁkapā yadvadalpavarṣeṇakannadī khalardhiralpavarṣeṇa tadvatsyātsvakulaṁkapā

जैसे थोड़ी वर्षा से भी छोटी नदी के किनारे ढह जाते हैं, वैसे ही दुष्टों की समृद्धि थोड़े ही आघात से अपने कुल के लिए विनाशकारी हो जाती है।

श्लोक 68 (skanda.4.5.68)

अविज्ञायान्य सामर्थ्यं स्वसामर्थ्यं प्रदर्शयेत । उपहासमवाप्नोति तथैवायमिहाचलः

avijñāyānya sāmarthyaṁ svasāmarthyaṁ pradarśayeta upahāsamavāpnoti tathaivāyamihācalaḥ

जो दूसरे के सामर्थ्य को जाने बिना अपना सामर्थ्य दिखाने लगता है, वह उपहास का ही पात्र बनता है -- ठीक वैसा ही यहाँ इस पर्वत के साथ हुआ।

श्लोक 69 (skanda.4.5.69)

व्यास उवाच । गोदावरीतटं रम्यं विचरन्नपि वै मुनिः । न तत्याज च तं तापं काशीविरहजं परम्

vyāsa uvāca godāvarītaṭaṁ ramyaṁ vicarannapi vai muniḥ na tatyāja ca taṁ tāpaṁ kāśīvirahajaṁ param

व्यास जी ने कहा -- गोदावरी के रमणीय तट पर विचरण करते हुए भी वे मुनि काशी-विरह से उत्पन्न उस गहन संताप को नहीं त्याग सके।

श्लोक 70 (skanda.4.5.70)

उदीची दिक्स्पृशमपि स मुनिर्मातरिश्वनम् । प्रसार्य बाहू संश्लिष्य काश्याः पृच्छेदनामयम्

udīcī dikspṛśamapi sa munirmātariśvanam prasārya bāhū saṁśliṣya kāśyāḥ pṛcchedanāmayam

उत्तर दिशा का स्पर्श करने वाले वायु (मातरिश्वा) को भी वे मुनि अपनी दोनों भुजाएँ फैलाकर आलिंगन करते हुए काशी का कुशल-समाचार पूछते थे।

श्लोक 71 (skanda.4.5.71)

लोपामुद्रे न सा मुद्रा कापीह जगतीतले । वाराणस्याः प्रदृश्येत तत्कर्ता न यतो विधिः

lopāmudre na sā mudrā kāpīha jagatītale vārāṇasyāḥ pradṛśyeta tatkartā na yato vidhiḥ

"हे लोपामुद्रे! इस पृथ्वीतल पर वैसी मुद्रा (छाप) अन्यत्र कहीं दिखाई नहीं देती; वाराणसी अन्यत्र दिखाई नहीं दे सकती, क्योंकि उसका रचयिता विधाता नहीं है।"

श्लोक 72 (skanda.4.5.72)

क्वचित्तिष्ठन्क्वचिज्जल्पन्क्वचिद्धावन्क्वचित्स्खलन् । क्वच्चिचोपविशंश्चेति बभ्रामेतस्ततो मुनिः

kvacittiṣṭhankvacijjalpankvaciddhāvankvacitskhalan kvaccicopaviśaṁśceti babhrāmetastato muniḥ

कहीं खड़े होकर, कहीं बड़बड़ाते हुए, कहीं दौड़ते हुए, कहीं ठोकर खाते हुए, कहीं बैठ जाते हुए -- इस प्रकार वे मुनि इधर-उधर भटकते रहे।

श्लोक 73 (skanda.4.5.73)

ततो व्रजन्ददर्शाग्रे पुण्यराशिस्तपोधनः। चंचच्चंद्रगताभासां भाग्यवानिव सुश्रियम्

tato vrajandadarśāgre puṇyarāśistapodhanaḥ caṁcaccaṁdragatābhāsāṁ bhāgyavāniva suśriyam

तब आगे बढ़ते हुए उन तपोधन, पुण्यराशि मुनि ने आगे चंद्रमा की कांति के समान चमकती हुई किसी वस्तु को देखा, मानो कोई भाग्यशाली पुरुष सुंदर श्री (लक्ष्मी) को देख रहा हो।

श्लोक 74 (skanda.4.5.74)

विजित्यभानु नाभानुं दिवापि समुदित्वराम् । निर्वापयंतीमिव तां स्वचेतस्तापसंततिम्

vijityabhānu nābhānuṁ divāpi samuditvarām nirvāpayaṁtīmiva tāṁ svacetastāpasaṁtatim

जो दिन में भी सूर्य की कांति को जीतकर उदित हो रही थी, मानो उनके हृदय में जल रही उस संताप-परंपरा को ही शांत कर रही हो।

श्लोक 75 (skanda.4.5.75)

तत्रागस्त्यो महालक्ष्मीं ददृशे सुचिरं स्थिताम्

tatrāgastyo mahālakṣmīṁ dadṛśe suciraṁ sthitām

वहाँ अगस्त्य ने महालक्ष्मी को देखा, जो दीर्घकाल से वहाँ निवास कर रही थीं।

श्लोक 76 (skanda.4.5.76)

रात्रावब्जेषु संकोचो दर्शेष्वब्जः क्वचिद्व्रजेत्। क्षीरोदे मंदरत्रासात्तदत्राध्युषितामिव

rātrāvabjeṣu saṁkoco darśeṣvabjaḥ kvacidvrajet kṣīrode maṁdaratrāsāttadatrādhyuṣitāmiva

जैसे रात्रि में कमल संकुचित हो जाते हैं और अमावस्या को कमल कहीं-कहीं मुरझा जाता है, वैसे ही मानो वे क्षीरसागर में मंदराचल के भय से यहाँ आकर बस गई हों।

श्लोक 77 (skanda.4.5.77)

यदारभ्य दधारैनां माधवो मानतः किल । तदारभ्य स्थितां नूनं सपत्नीर्ष्यावशादिव

yadārabhya dadhāraināṁ mādhavo mānataḥ kila tadārabhya sthitāṁ nūnaṁ sapatnīrṣyāvaśādiva

जब से माधव (विष्णु) ने आदरपूर्वक उन्हें धारण किया, तभी से मानो सौत की ईर्ष्या के वशीभूत होकर वे यहाँ स्थिर हो गई हों।

श्लोक 78 (skanda.4.5.78)

त्रैलोक्यं कोलरूपेण त्रासयंतं महासुरम्। विनिहत्य स्थितां तत्र रम्ये कोलापुरे पुरे

trailokyaṁ kolarūpeṇa trāsayaṁtaṁ mahāsuram vinihatya sthitāṁ tatra ramye kolāpure pure

जो त्रैलोक्य को वराह-रूप धारण कर त्रस्त करने वाले महान असुर का वध कर, रमणीय कोलापुर नगर में विराजमान हुई थीं।

श्लोक 79 (skanda.4.5.79)

संप्राप्याथ महालक्ष्मीं मुनिवर्यः प्रणम्य च। तुष्टाव वाग्भिरिष्टाभिरिष्टदां हृष्टमानसः

saṁprāpyātha mahālakṣmīṁ munivaryaḥ praṇamya ca tuṣṭāva vāgbhiriṣṭābhiriṣṭadāṁ hṛṣṭamānasaḥ

महालक्ष्मी को प्राप्त कर उन श्रेष्ठ मुनि ने प्रणाम करके, हृष्ट मन से, इष्ट-प्रदायिनी उस देवी की मनोहर वाणी से स्तुति की।

श्लोक 80 (skanda.4.5.80)

अगस्तिरुवाच। मातर्नमामि कमले कमलायताक्षि श्रीविष्णुहृत्कमलवासिनि विश्वमातः । क्षीरोदजे कमलकोमलगर्भ गौरि लक्ष्मि प्रसीद सततं नमतां शरण्ये

agastiruvāca mātarnamāmi kamale kamalāyatākṣi śrīviṣṇuhṛtkamalavāsini viśvamātaḥ kṣīrodaje kamalakomalagarbha gauri lakṣmi prasīda satataṁ namatāṁ śaraṇye

अगस्त्य ने कहा -- हे माता कमले! हे कमल के समान विशाल नेत्रोंवाली! हे श्रीविष्णु के हृदय-कमल में निवास करने वाली! हे विश्व की माता! हे क्षीरसागर से उत्पन्न, कमल-सदृश कोमल गर्भवाली, गौरवर्णा लक्ष्मि! मैं तुम्हें नमन करता हूँ; प्रणाम करने वालों की सदा शरणदायिनी होकर प्रसन्न होओ।

श्लोक 81 (skanda.4.5.81)

त्वं श्रीरुपेंद्रसदने मदनैकमातर्ज्योत्स्नासि चंद्रमसि चंद्रमनोहरास्ये। सूर्ये प्रभासि च जगत्त्रितये प्रभासि लक्ष्मि प्रसीद सततं नमतां शरण्ये

tvaṁ śrīrupeṁdrasadane madanaikamātarjyotsnāsi caṁdramasi caṁdramanoharāsye sūrye prabhāsi ca jagattritaye prabhāsi lakṣmi prasīda satataṁ namatāṁ śaraṇye

तुम उपेंद्र (विष्णु) के धाम में साक्षात श्री हो, तुम काम की एकमात्र माता हो; चंद्रमा में तुम ही चांदनी हो, तुम्हीं चंद्र के समान मनोहर मुखवाली हो; सूर्य में भी तुम्हीं प्रकाशमान हो, तुम त्रिभुवन में सर्वत्र प्रभासित होती हो। हे लक्ष्मि, प्रणाम करने वालों की सदा शरणदायिनी होकर प्रसन्न होओ।

श्लोक 82 (skanda.4.5.82)

त्वं जातवेदसि सदा दह्नात्मशक्तिर्वेधास्त्वया जगदिदं विविधं विदध्यात् । विश्वंभरोपि बिभृयादखिलं भवत्या लक्ष्मि प्रसीद सततं नमतां शरण्ये

tvaṁ jātavedasi sadā dahnātmaśaktirvedhāstvayā jagadidaṁ vividhaṁ vidadhyāt viśvaṁbharopi bibhṛyādakhilaṁ bhavatyā lakṣmi prasīda satataṁ namatāṁ śaraṇye

तुम अग्नि में सदा उसकी दहन-शक्ति के रूप में विद्यमान हो; तुम्हारे ही सहारे विधाता इस विविध जगत की रचना करते हैं, और विश्वंभर (विष्णु) भी तुम्हारे ही द्वारा समस्त जगत का भरण-पोषण करते हैं। हे लक्ष्मि, प्रणाम करने वालों की सदा शरणदायिनी होकर प्रसन्न होओ।

श्लोक 83 (skanda.4.5.83)

त्वत्त्यक्तमेतदमले हरते हरोपि त्वं पासि हंसि विदधासि परावरासि । ईड्यो बभूव हरिरप्यमले त्वदाप्त्या लक्ष्मि प्रसीद सततं नमतां शरण्ये

tvattyaktametadamale harate haropi tvaṁ pāsi haṁsi vidadhāsi parāvarāsi īḍyo babhūva harirapyamale tvadāptyā lakṣmi prasīda satataṁ namatāṁ śaraṇye

हे निर्मले! जिसे तुम त्याग देती हो, उसे हर (शिव) भी हर लेते हैं; तुम्हीं रक्षा करती हो, तुम्हीं संहार करती हो, तुम्हीं सृजन करती हो, तुम्हीं परा और अपरा दोनों हो; हे निर्मले, तुम्हें पाकर ही हरि भी स्तुत्य बने। हे लक्ष्मि, प्रणाम करने वालों की सदा शरणदायिनी होकर प्रसन्न होओ।

श्लोक 84 (skanda.4.5.84)

शूरः स एव स गुणी बुधः धन्यो मान्यः स एव कुलशील कलाकलापैः । एकः शुचिः स हि पुमान्सकलेपि लोके यत्रापतेत्तव शुभे करुणाकटाक्षः

śūraḥ sa eva sa guṇī budhaḥ dhanyo mānyaḥ sa eva kulaśīla kalākalāpaiḥ ekaḥ śuciḥ sa hi pumānsakalepi loke yatrāpatettava śubhe karuṇākaṭākṣaḥ

वही वीर है, वही गुणवान है, वही विद्वान है, वही धन्य और वही सम्मानित है, कुल, शील और कलाओं से युक्त; इस सम्पूर्ण जगत में वही एक पवित्र पुरुष है, हे कल्याणि, जिस पर तुम्हारी करुणामयी चितवन पड़ जाए।

श्लोक 85 (skanda.4.5.85)

यस्मिन्वसेः क्षणमहोपुरुषे गजेऽश्वे स्त्रैणे तृणे सरसि देवकुले गृहेऽन्ने। रत्ने पतत्त्रिणि पशौ शयने धरायां सश्रीकमेव सकले तदिहास्तिनान्यत्

yasminvaseḥ kṣaṇamahopuruṣe gaje'śve straiṇe tṛṇe sarasi devakule gṛhe'nne ratne patattriṇi paśau śayane dharāyāṁ saśrīkameva sakale tadihāstinānyat

हे अद्भुत! तुम जिसमें भी क्षणभर के लिए निवास करती हो -- चाहे वह पुरुष हो, हाथी हो, घोड़ा हो, स्त्री हो, तिनका हो, सरोवर हो, देवालय हो, घर हो, अन्न हो, रत्न हो, पक्षी हो, पशु हो, शय्या हो अथवा पृथ्वी हो -- वही सब में श्रीसंपन्न बन जाता है, इसके अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है।

श्लोक 86 (skanda.4.5.86)

त्वत्स्पृष्टमेव सकलं शुचितां लभेत त्वत्त्यक्तमेव सकलं त्वशुचीह लक्ष्मि । त्वन्नाम यत्र च सुमंगलमेव तत्र श्रीविष्णुपत्नि कमले कमलालयेऽपि

tvatspṛṣṭameva sakalaṁ śucitāṁ labheta tvattyaktameva sakalaṁ tvaśucīha lakṣmi tvannāma yatra ca sumaṁgalameva tatra śrīviṣṇupatni kamale kamalālaye'pi

हे लक्ष्मि! तुमने जिसे स्पर्श किया हो, वही पवित्रता प्राप्त करता है; तुमने जिसे त्याग दिया हो, वही यहाँ अपवित्र है। जहाँ तुम्हारा नाम लिया जाता है, वहीं परम मंगल है, हे कमले, हे कमलालये, हे श्रीविष्णुपत्नि!

श्लोक 87 (skanda.4.5.87)

लक्ष्मीं श्रियं च कमलां कमलालयां च पद्मां रमां नलिनयुग्मकरां च मां च। क्षीरोदजाममृतकुंभकरामिरां च विष्णुप्रियामिति सदाजपतां क्व दुःखम्

lakṣmīṁ śriyaṁ ca kamalāṁ kamalālayāṁ ca padmāṁ ramāṁ nalinayugmakarāṁ ca māṁ ca kṣīrodajāmamṛtakuṁbhakarāmirāṁ ca viṣṇupriyāmiti sadājapatāṁ kva duḥkham

लक्ष्मी, श्री, कमला, कमलालया, पद्मा, रमा, दोनों हाथों में कमल धारण करने वाली, तथा मुझे भी, क्षीरसागर से उत्पन्न, अमृत-कलश धारण करने वाली, इरा, विष्णुप्रिया -- इन नामों का जो सदा जप करते हैं, उनके लिए भला दुःख कहाँ रह जाता है?

श्लोक 88 (skanda.4.5.88)

इति स्तुत्वा भगवतीं महालक्ष्मीं हरिप्रियाम् । प्रणनाम सपत्नीकः साष्टांगं दंडवन्मुनिः

iti stutvā bhagavatīṁ mahālakṣmīṁ haripriyām praṇanāma sapatnīkaḥ sāṣṭāṁgaṁ daṁḍavanmuniḥ

इस प्रकार हरि की प्रिया भगवती महालक्ष्मी की स्तुति करके, मुनि ने अपनी पत्नी सहित दंड की भाँति भूमि पर साष्टांग प्रणाम किया।

श्लोक 89 (skanda.4.5.89)

श्रीरुवाच। उत्तिष्ठोत्तिष्ठ भद्रं ते मित्रावरुणसंभव । पतिव्रते त्वमुत्तिष्ठ लोपामुद्रे शुभव्रते

śrīruvāca uttiṣṭhottiṣṭha bhadraṁ te mitrāvaruṇasaṁbhava pativrate tvamuttiṣṭha lopāmudre śubhavrate

श्री ने कहा -- उठो, उठो, तुम्हारा कल्याण हो, हे मित्रावरुण-पुत्र! हे पतिव्रते लोपामुद्रे, हे शुभव्रते! तुम भी उठो।

श्लोक 90 (skanda.4.5.90)

स्तुत्यानया प्रसन्नोहं व्रियतां यद्धृदीप्सितम् । राजपुत्रि महाभागे त्वमिहोपविशामले

stutyānayā prasannohaṁ vriyatāṁ yaddhṛdīpsitam rājaputri mahābhāge tvamihopaviśāmale

इस स्तुति से मैं प्रसन्न हूँ; तुम्हारे मन में जो अभीष्ट हो, वह माँग लो। हे राजपुत्री, हे महाभागे! तुम यहाँ बैठ जाओ, हे निर्मले।

श्लोक 91 (skanda.4.5.91)

त्वदंगलक्षणैरेभिः सुपवित्रैश्च ते व्रतैः। निर्वापयितुमिच्छामि दैत्यास्त्रैस्तापितां तनुम्

tvadaṁgalakṣaṇairebhiḥ supavitraiśca te vrataiḥ nirvāpayitumicchāmi daityāstraistāpitāṁ tanum

तुम्हारे इन शुभ अंग-लक्षणों से और तुम्हारे इन अति पवित्र व्रतों से मैं दैत्यों के अस्त्रों से संतप्त अपनी देह को शीतल करना चाहती हूँ।

श्लोक 92 (skanda.4.5.92)

इत्युक्त्वा मुनिपत्नीं तां समालिंग्य हरिप्रिया। अलंचकार च प्रीत्या बहुसौभाग्यमंडनैः

ityuktvā munipatnīṁ tāṁ samāliṁgya haripriyā alaṁcakāra ca prītyā bahusaubhāgyamaṁḍanaiḥ

यह कहकर हरिप्रिया (लक्ष्मी) ने मुनिपत्नी लोपामुद्रा का आलिंगन कर, प्रेमपूर्वक उन्हें अनेक सौभाग्य-चिह्नों से अलंकृत किया।

श्लोक 93 (skanda.4.5.93)

पुनराह मुने जाने तव हृत्तापकारणम् । सचेतनं दुनोत्येव काशीविश्लेषजोऽनलः

punarāha mune jāne tava hṛttāpakāraṇam sacetanaṁ dunotyeva kāśīviśleṣajo'nalaḥ

पुनः उन्होंने कहा -- हे मुने! मैं तुम्हारे हृदय के संताप का कारण जानती हूँ; काशी-वियोग से उत्पन्न वह अग्नि सचेतन प्राणी को भी संतप्त कर ही देती है।

श्लोक 94 (skanda.4.5.94)

यदा स देवो विश्वेशो मंदरं गतवान्पुरा। तदा काशीवियोगेन जाता तस्येदृशी दशा

yadā sa devo viśveśo maṁdaraṁ gatavānpurā tadā kāśīviyogena jātā tasyedṛśī daśā

जब वे भगवान विश्वेश (शिव) पूर्वकाल में मंदराचल गए थे, तब काशी-वियोग के कारण उनकी भी ऐसी ही दशा हुई थी।

श्लोक 95 (skanda.4.5.95)

तत्प्रवृत्तिं पुनर्ज्ञातुं ब्रह्माणं केशवं गणान्। गणेश्वरं च देवांश्च प्रेषयामास शूलधृक्

tatpravṛttiṁ punarjñātuṁ brahmāṇaṁ keśavaṁ gaṇān gaṇeśvaraṁ ca devāṁśca preṣayāmāsa śūladhṛk

उसका फिर से समाचार जानने के लिए शूलधारी शिव ने ब्रह्मा, केशव (विष्णु), गणों, गणेश्वर तथा अन्य देवताओं को भेजा था।

श्लोक 96 (skanda.4.5.96)

ते च काशीगुणान्सर्वे विचार्य च पुनःपुनः। व्रजंत्यद्यापि न क्वापि तादृगस्ति क्व वा पुरी

te ca kāśīguṇānsarve vicārya ca punaḥpunaḥ vrajaṁtyadyāpi na kvāpi tādṛgasti kva vā purī

वे सब भी काशी के समस्त गुणों पर बार-बार विचार करके आज तक कहीं नहीं गए -- क्योंकि ऐसी नगरी अन्यत्र कहीं भी नहीं है।

श्लोक 97 (skanda.4.5.97)

इति श्रुत्वाथ स मुनिः प्रत्युवाच श्रियं ततः। प्रणिपत्य महाभागो भक्तिगर्भमिदं वचः

iti śrutvātha sa muniḥ pratyuvāca śriyaṁ tataḥ praṇipatya mahābhāgo bhaktigarbhamidaṁ vacaḥ

यह सुनकर वे महाभाग मुनि, श्री को प्रणाम करके, भक्तिपूर्ण हृदय से यह वचन बोले।

श्लोक 98 (skanda.4.5.98)

यदि देयो वरो मह्यं वरयोग्योस्म्यहं यदि । तदा वाराणसी प्राप्तिः पुनरस्त्वेष मे वरः

yadi deyo varo mahyaṁ varayogyosmyahaṁ yadi tadā vārāṇasī prāptiḥ punarastveṣa me varaḥ

"यदि मुझे कोई वर देना हो, और यदि मैं वर पाने योग्य हूँ, तो यही मेरा वर हो कि मुझे वाराणसी की पुनः प्राप्ति हो।"

श्लोक 99 (skanda.4.5.99)

ये पठिष्यंति च स्तोत्रं त्वद्भक्त्या मत्कृतं सदा। तेषां कदाचित्संतापो मास्तु मास्तु दरिद्रता

ye paṭhiṣyaṁti ca stotraṁ tvadbhaktyā matkṛtaṁ sadā teṣāṁ kadācitsaṁtāpo māstu māstu daridratā

"जो भी तुम्हारी भक्ति से मेरे द्वारा रचित इस स्तोत्र का सदा पाठ करेंगे, उन्हें कभी संताप न हो, उन्हें कभी दरिद्रता न हो।"

श्लोक 100 (skanda.4.5.100)

मास्तु चेष्टवियोगश्च मास्तु संपत्ति संक्षयः। सर्वत्र विजयश्चास्तु विच्छेदो मास्तु संततेः

māstu ceṣṭaviyogaśca māstu saṁpatti saṁkṣayaḥ sarvatra vijayaścāstu vicchedo māstu saṁtateḥ

"उन्हें कभी इष्ट का वियोग न हो, उनकी संपत्ति का कभी क्षय न हो; सर्वत्र उनकी विजय हो, उनकी संतति का कभी उच्छेद न हो।"

श्लोक 101 (skanda.4.5.101)

श्रीरुवाच । एवमस्तु मुने सर्वं यत्त्वया परिभाषितम् । एतत्स्तोत्रस्य पठनं मम सान्निध्य कारणम्

śrīruvāca evamastu mune sarvaṁ yattvayā paribhāṣitam etatstotrasya paṭhanaṁ mama sānnidhya kāraṇam

श्री ने कहा -- हे मुने! तुमने जो कुछ कहा, वह सब वैसा ही हो। इस स्तोत्र का पाठ ही मेरी निकटता (सान्निध्य) का कारण बनेगा।

श्लोक 102 (skanda.4.5.102)

अलक्ष्मीः कालकर्णी च तद्गेहे न विशेत्क्वचित् । गजाश्वपशुशांत्यर्थमेतत्स्तोत्रं सदा जपेत्

alakṣmīḥ kālakarṇī ca tadgehe na viśetkvacit gajāśvapaśuśāṁtyarthametatstotraṁ sadā japet

अलक्ष्मी और कालकर्णी उस घर में कभी प्रवेश नहीं करेंगी; हाथी, घोड़े और पशुओं की शांति के लिए इस स्तोत्र का सदा जप करना चाहिए।

श्लोक 103 (skanda.4.5.103)

बालग्रहाभिभूतानां वालानांशांतिकृत्परम् । भूर्जपत्रे लिखित्वा तु बध्नीयात्कंठदेशतः

bālagrahābhibhūtānāṁ vālānāṁśāṁtikṛtparam bhūrjapatre likhitvā tu badhnīyātkaṁṭhadeśataḥ

यह बालग्रहों से पीड़ित बालकों की शांति के लिए सर्वश्रेष्ठ उपाय है; इसे भोजपत्र पर लिखकर बालक के गले में बाँध देना चाहिए।

श्लोक 104 (skanda.4.5.104)

इदं बीजरहस्यं मे रक्षणीयं प्रयत्नतः । श्रद्धाहीने न दातव्यं न देयं चाशुचौ क्वचित्

idaṁ bījarahasyaṁ me rakṣaṇīyaṁ prayatnataḥ śraddhāhīne na dātavyaṁ na deyaṁ cāśucau kvacit

यह मेरा बीज-रहस्य है, इसकी रक्षा प्रयत्नपूर्वक करनी चाहिए; इसे श्रद्धाहीन को नहीं देना चाहिए, और न ही इसे कभी किसी अपवित्र व्यक्ति को देना चाहिए।

श्लोक 105 (skanda.4.5.105)

अन्यच्च शृणु विप्रेंद्र भविष्ये द्वापरे भवान् । एकोनत्रिंशके ब्रह्मन्सत्यव्यासो भविष्यति

anyacca śṛṇu vipreṁdra bhaviṣye dvāpare bhavān ekonatriṁśake brahmansatyavyāso bhaviṣyati

और भी सुनो, हे विप्रेंद्र! आने वाले द्वापर युग में, उनतीसवें द्वापर में, हे ब्रह्मन्, तुम सत्यव्यास होओगे।

श्लोक 106 (skanda.4.5.106)

तदा वाराणसीं प्राप्य सिद्धिं प्राप्स्यस्यभीप्सिताम् । व्यस्य वेदान्पुराणानि धर्मा न्समुपदिश्य च

tadā vārāṇasīṁ prāpya siddhiṁ prāpsyasyabhīpsitām vyasya vedānpurāṇāni dharmā nsamupadiśya ca

तब वाराणसी को प्राप्त कर तुम अपनी अभीष्ट सिद्धि पाओगे; वेदों और पुराणों की रचना करके तथा धर्मों का उपदेश देकर --

श्लोक 107 (skanda.4.5.107)

हितं च ते वदाम्येकं सांप्रतं तत्समाचर । पश्य किंचिदितो गत्वा स्कंदमग्रे स्थितं प्रभुम्

hitaṁ ca te vadāmyekaṁ sāṁprataṁ tatsamācara paśya kiṁcidito gatvā skaṁdamagre sthitaṁ prabhum

मैं तुम्हारे हित की एक बात कहती हूँ, अभी उसका पालन करो -- यहाँ से थोड़ा आगे जाकर सामने खड़े प्रभु स्कंद के दर्शन करो।

श्लोक 108 (skanda.4.5.108)

वाराणस्या रहस्यं च यथाव च्छिवभाषितम् । तव तुष्टिकरं ब्रह्मन्कथयिष्यति षण्मुखः

vārāṇasyā rahasyaṁ ca yathāva cchivabhāṣitam tava tuṣṭikaraṁ brahmankathayiṣyati ṣaṇmukhaḥ

वाराणसी का वह रहस्य, जैसा शिव ने कहा है, जो तुम्हें संतोष देने वाला होगा, हे ब्रह्मन्, वह षण्मुख (कार्तिकेय) ही तुमसे कहेंगे।

श्लोक 109 (skanda.4.5.109)

इति लब्ध्वा वरं सोथ महालक्ष्मीं प्रणम्य च । ययावगस्तिर्यत्रास्ति कुमारशिखिवाहनः

iti labdhvā varaṁ sotha mahālakṣmīṁ praṇamya ca yayāvagastiryatrāsti kumāraśikhivāhanaḥ

इस प्रकार वर पाकर, वे मुनि महालक्ष्मी को प्रणाम कर, वहाँ गए जहाँ मयूरवाहन कुमार (कार्तिकेय) विराजमान थे।

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