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काशी खण्ड · अध्याय 62

शिव का काशी में महाप्रवेश और कपिल तीर्थ

अध्याय 61अध्याय-सूचीअध्याय 63

श्लोक 1 (skanda.4.62.1)

॥अगस्त्य उवाच॥ श्रुत्वा स्कंद न तृप्तोस्मि तव वक्त्रेरितां कथाम् ॥ अत्याश्चर्यकरं प्रोक्तमाख्यानं बैंदुमाधवम्

||agastya uvāca|| śrutvā skaṁda na tṛptosmi tava vaktreritāṁ kathām || atyāścaryakaraṁ proktamākhyānaṁ baiṁdumādhavam

अगस्त्य ने कहा - "हे स्कन्द, आपके मुख से कहा गया, अत्यन्त आश्चर्यकारी बिन्दुमाधव का आख्यान सुनकर भी मैं तृप्त नहीं हुआ।"

श्लोक 2 (skanda.4.62.2)

इदानीं श्रोतुमिच्छामि देवदेवसमागमम् ॥ तार्क्ष्यात्त्र्यक्षः समाकर्ण्य दिवोदासस्य चेष्टितम्

idānīṁ śrotumicchāmi devadevasamāgamam || tārkṣyāttryakṣaḥ samākarṇya divodāsasya ceṣṭitam

"अब मैं देवदेव के समागम को सुनना चाहता हूँ - तार्क्ष्य से दिवोदास का वृत्तान्त सुनकर त्रिनेत्र ने..."

श्लोक 3 (skanda.4.62.3)

विष्णुमायाप्रपंचं च किमाह गरुडध्वजम् ॥ के के च शंभुना सार्धं समीयुर्मंदराद्गिरेः

viṣṇumāyāprapaṁcaṁ ca kimāha garuḍadhvajam || ke ke ca śaṁbhunā sārdhaṁ samīyurmaṁdarādgireḥ

"...और विष्णु की माया-प्रपंच सुनकर गरुड़ध्वज से क्या कहा? और मन्दराचल से शम्भु के साथ कौन-कौन आए?"

श्लोक 4 (skanda.4.62.4)

ब्रह्मणेशः कथं दृष्टस्त्रपाकुलित चक्षुषा ॥ किमाह देव ब्रह्माणं किमुक्तं भास्वतापि च

brahmaṇeśaḥ kathaṁ dṛṣṭastrapākulita cakṣuṣā || kimāha deva brahmāṇaṁ kimuktaṁ bhāsvatāpi ca

"लज्जा से व्याकुल नेत्रों वाले ब्रह्मा को शिव ने कैसे देखा? देव ने ब्रह्मा से क्या कहा, और सूर्य ने भी क्या कहा?"

श्लोक 5 (skanda.4.62.5)

योगिनीभिः किमाख्यायि गणाह्रीणाः किमब्रुवन् ॥ एतदाख्याहि मे स्कंद महत्कौतूहलं मयि

yoginībhiḥ kimākhyāyi gaṇāhrīṇāḥ kimabruvan || etadākhyāhi me skaṁda mahatkautūhalaṁ mayi

"योगिनियों ने क्या कहा, लज्जित गणों ने क्या कहा? हे स्कन्द, यह सब मुझे बताइए, मुझमें महान् कुतूहल है।"

श्लोक 6 (skanda.4.62.6)

इमं प्रश्नं निशम्यैशिर्मुनेः कलशजन्मनः ॥ प्रत्युवाच नमस्कृत्य शिवौ प्रणतसिद्धिदौ

imaṁ praśnaṁ niśamyaiśirmuneḥ kalaśajanmanaḥ || pratyuvāca namaskṛtya śivau praṇatasiddhidau

ईश्वर के पुत्र स्कन्द ने कलशज मुनि का यह प्रश्न सुनकर, प्रणतों को सिद्धि देने वाले शिव-पार्वती को नमस्कार कर उत्तर दिया -

श्लोक 7 (skanda.4.62.7)

॥स्कंद उवाच॥ मुने शृणु कथामेतां सर्वपातकनाशिनीम् ॥ अशेषविघ्नशमनीं महाश्रेयोभिवर्धिनीम्

||skaṁda uvāca|| mune śṛṇu kathāmetāṁ sarvapātakanāśinīm || aśeṣavighnaśamanīṁ mahāśreyobhivardhinīm

स्कन्द ने कहा - "हे मुने, सम्पूर्ण पातकों का नाश करने वाली, सब विघ्नों को शान्त करने वाली, महान् कल्याण बढ़ाने वाली यह कथा सुनिए।"

श्लोक 8 (skanda.4.62.8)

अथ देवोऽसुररिपुः श्रुत्वा शंभुसमागमम् ॥ द्विजराजाय स मुदा समदात्पारितोषिकम्

atha devo'suraripuḥ śrutvā śaṁbhusamāgamam || dvijarājāya sa mudā samadātpāritoṣikam

तब असुर-शत्रु देव (इन्द्र) ने शम्भु के आगमन का समाचार सुनकर, हर्षपूर्वक द्विजराज (चन्द्रमा) को पारितोषिक दिया -

श्लोक 9 (skanda.4.62.9)

आयानं शंसते शंभोरुपवाराणसिप्रियम् ॥ ब्रह्माणमग्रतः कृत्वा ततश्चाभ्युद्ययौ हरिः

āyānaṁ śaṁsate śaṁbhorupavārāṇasipriyam || brahmāṇamagrataḥ kṛtvā tataścābhyudyayau hariḥ

-जिसने वाराणसी की ओर शम्भु के प्रिय आगमन की सूचना दी। फिर ब्रह्मा को आगे कर, हरि आगे बढ़े।

श्लोक 10 (skanda.4.62.10)

विवस्वता समेतश्च तैर्गणैः परितो वृतः ॥ योगिनीभिरनूद्यातो गणेशमुपसंस्थितः

vivasvatā sametaśca tairgaṇaiḥ parito vṛtaḥ || yoginībhiranūdyāto gaṇeśamupasaṁsthitaḥ

सूर्य के साथ, उन गणों से चारों ओर घिरे हुए, योगिनियों के पीछे-पीछे, वे गणेश (शिव) के समीप पहुँचे।

श्लोक 11 (skanda.4.62.11)

अथनेत्रातिथीकृत्य देवदेवं वृषध्वजम् ॥ मंक्षु तार्क्ष्यादवारुह्य प्रणनाम श्रियः पतिः

athanetrātithīkṛtya devadevaṁ vṛṣadhvajam || maṁkṣu tārkṣyādavāruhya praṇanāma śriyaḥ patiḥ

फिर वृषध्वज देवदेव को नेत्रों का अतिथि बनाकर, श्रीपति (विष्णु) शीघ्र गरुड़ से उतरकर प्रणाम करने लगे।

श्लोक 12 (skanda.4.62.12)

पितामहोपि स्थविरो भृशं नम्रशिरोधरः ॥ प्रणतेन मृडेनैव प्रणमन्विनिवारितः

pitāmahopi sthaviro bhṛśaṁ namraśirodharaḥ || praṇatena mṛḍenaiva praṇamanvinivāritaḥ

वृद्ध पितामह (ब्रह्मा) भी अत्यन्त झुकी हुई गर्दन वाले, पहले ही प्रणाम करने के लिए झुके मृड (शिव) द्वारा प्रणाम करने से रोक दिए गए।

श्लोक 13 (skanda.4.62.13)

स्वस्त्यभ्युदितपाणिश्च रुद्रसूक्तैरमंत्रयत् ॥ अक्षतान्यथ सार्द्राणि दर्शयन्सफलान्यजः

svastyabhyuditapāṇiśca rudrasūktairamaṁtrayat || akṣatānyatha sārdrāṇi darśayansaphalānyajaḥ

और अज (ब्रह्मा) ने आशीर्वाद में हाथ उठाकर रुद्र-सूक्तों से मन्त्र पढ़ते हुए, गीले अक्षत और फल दिखाए।

श्लोक 14 (skanda.4.62.14)

मौलिं पादाब्जयोः कृत्वा गणेशः सत्वरो नतः ॥ मूर्ध्न्युपाजिघ्रयांचक्रे हरो हर्षाद्गजाननम्

mauliṁ pādābjayoḥ kṛtvā gaṇeśaḥ satvaro nataḥ || mūrdhnyupājighrayāṁcakre haro harṣādgajānanam

गणेश ने अपना मुकुट [शिव के] चरणकमलों पर रखकर शीघ्र प्रणाम किया; और हर ने हर्ष से गजानन के मस्तक को सूँघा।

श्लोक 15 (skanda.4.62.15)

अभ्युपावेशयच्चापि परिष्वज्य निजासने ॥ सोमनंदि प्रभृतयः प्रणेमुर्दंडवद्गणाः

abhyupāveśayaccāpi pariṣvajya nijāsane || somanaṁdi prabhṛtayaḥ praṇemurdaṁḍavadgaṇāḥ

और आलिंगन कर उन्हें अपने ही आसन पर बिठाया; सोमनन्दी आदि गणों ने दण्डवत् प्रणाम किया।

श्लोक 16 (skanda.4.62.16)

योगिन्योपि प्रणम्येशं चक्रुर्मंगलगायनम् ॥ तरणिः प्रणनामाथ प्रमथाधिपतिं हरम्

yoginyopi praṇamyeśaṁ cakrurmaṁgalagāyanam || taraṇiḥ praṇanāmātha pramathādhipatiṁ haram

योगिनियों ने भी ईश को प्रणाम कर मंगल-गान किया; फिर सूर्य ने प्रमथों के अधिपति हर को प्रणाम किया।

श्लोक 17 (skanda.4.62.17)

खंडेंदुशेखरश्चाथ उपसिंहासनं हरिम् ॥ समुपावेशयद्वामपार्श्वे मानपुरःसरम्

khaṁḍeṁduśekharaścātha upasiṁhāsanaṁ harim || samupāveśayadvāmapārśve mānapuraḥsaram

फिर खण्डेन्दुशेखर (शिव) ने आदर के साथ हरि को अपने सिंहासन के समीप, बाईं ओर बिठाया।

श्लोक 18 (skanda.4.62.18)

ब्रह्माणं दक्षिणे भागे परिविश्राणितासनम् ॥ दृष्ट्वा संभाविताः सर्वे शर्वेण प्रणता गणाः

brahmāṇaṁ dakṣiṇe bhāge pariviśrāṇitāsanam || dṛṣṭvā saṁbhāvitāḥ sarve śarveṇa praṇatā gaṇāḥ

और दाहिनी ओर ब्रह्मा को श्रेष्ठ आसन दिया गया। यह देखकर सब गण, शर्व द्वारा सम्मानित होकर, प्रणत हो गए।

श्लोक 19 (skanda.4.62.19)

मौलिचालनमात्रेण योगिन्योपि प्रसादिताः ॥ संतोषितो रविश्चापि विशेति करसंज्ञया

maulicālanamātreṇa yoginyopi prasāditāḥ || saṁtoṣito raviścāpi viśeti karasaṁjñayā

मुकुट हिलाने मात्र से ही योगिनियाँ भी प्रसन्न हो गईं; और हाथ के संकेत से भीतर आने का निमंत्रण पाकर सूर्य भी संतुष्ट हुए।

श्लोक 20 (skanda.4.62.20)

अथ शंभुं शतधृतिः प्रबद्धकरसंपुटः ॥ परिविज्ञापयांचक्रे प्रसन्नवदनांबुजम्

atha śaṁbhuṁ śatadhṛtiḥ prabaddhakarasaṁpuṭaḥ || parivijñāpayāṁcakre prasannavadanāṁbujam

फिर शतधृति (ब्रह्मा) ने हाथ जोड़कर, प्रसन्नमुख शम्भु से अपनी बात निवेदित की।

श्लोक 21 (skanda.4.62.21)

॥ब्रह्मोवाच॥ भगवन्देवदेवेश क्षंतव्यं गिरिजापते ॥ वाराणसीं समासाद्य यदहं नागतः पुनः

||brahmovāca|| bhagavandevadeveśa kṣaṁtavyaṁ girijāpate || vārāṇasīṁ samāsādya yadahaṁ nāgataḥ punaḥ

ब्रह्मा ने कहा - "हे भगवन् देवदेवेश, गिरिजापते, क्षमा कीजिए कि एक बार वाराणसी आकर मैं फिर नहीं आ सका।"

श्लोक 22 (skanda.4.62.22)

प्रसंगतोपि कः काशीं प्राप्य चंद्रविभूषण ॥ किंचिद्विधातुं शक्तोपि त्यजेत्स्थविरतां दधत्

prasaṁgatopi kaḥ kāśīṁ prāpya caṁdravibhūṣaṇa || kiṁcidvidhātuṁ śaktopi tyajetsthaviratāṁ dadhat

"हे चन्द्रविभूषण, प्रसंगवश भी काशी पाकर कुछ करने में समर्थ होते हुए भी, वृद्धावस्था धारण करता हुआ कौन उसे छोड़ता है?"

श्लोक 23 (skanda.4.62.23)

स्वरूपतो ब्राह्मणत्वादपाकर्तुं न शक्यते ॥ अथ शक्तो व्यपाकर्तुं कः पुण्ये संचिकीर्षति

svarūpato brāhmaṇatvādapākartuṁ na śakyate || atha śakto vyapākartuṁ kaḥ puṇye saṁcikīrṣati

"स्वरूप से ब्राह्मणत्व के कारण [यह कर्तव्य] नहीं टाला जा सकता; फिर भी यदि टालने में समर्थ हो, तो पुण्य से कौन विमुख होना चाहेगा?"

श्लोक 24 (skanda.4.62.24)

विभोरपि समाज्ञेयं धर्मवर्त्मानुसारिणि ॥ न किंचिदपकर्तव्यं जानता केनचित्क्वचित

vibhorapi samājñeyaṁ dharmavartmānusāriṇi || na kiṁcidapakartavyaṁ jānatā kenacitkvacita

"धर्मपथ का अनुसरण करने वाले शक्तिशाली के प्रति भी यह जानना चाहिए कि जानते हुए किसी को भी कहीं कुछ अपकार नहीं करना चाहिए।"

श्लोक 25 (skanda.4.62.25)

कस्तादृशि महीजानौ पुण्यवर्त्मन्यतंद्रिते ॥ काशीपाले दिवोदासे मनागपि विरुद्धधीः

kastādṛśi mahījānau puṇyavartmanyataṁdrite || kāśīpāle divodāse manāgapi viruddhadhīḥ

"पुण्यमार्ग में सतत तत्पर, काशी-रक्षक ऐसे पृथ्वीपति दिवोदास के प्रति भला कौन तनिक भी विरोधी बुद्धि रख सकता है?"

श्लोक 26 (skanda.4.62.26)

निशम्येति वचस्तुष्टः श्रीकंठोति विशुद्धधीः ॥ हसन्प्रोवाच धातारं ब्रह्मन्सर्वमवैम्यहम्

niśamyeti vacastuṣṭaḥ śrīkaṁṭhoti viśuddhadhīḥ || hasanprovāca dhātāraṁ brahmansarvamavaimyaham

यह सुनकर, प्रसन्न, विशुद्ध बुद्धि वाले श्रीकण्ठ ने हँसते हुए विधाता से कहा - "हे ब्रह्मन्, मैं सब जानता हूँ।"

श्लोक 27 (skanda.4.62.27)

॥देवदेव उवाच॥ आदौ तावददोषं हि ब्रह्मत्वं ब्राह्मणस्य ते ॥ वाजिमेधाध्वराणां च ततोपि दशकं कृतम्

||devadeva uvāca|| ādau tāvadadoṣaṁ hi brahmatvaṁ brāhmaṇasya te || vājimedhādhvarāṇāṁ ca tatopi daśakaṁ kṛtam

देवदेव ने कहा - "पहले तो तुम्हारा ब्राह्मणत्व स्वयं ही निर्दोष है; और उससे भी बढ़कर तुमने दस अश्वमेध यज्ञ किए।"

श्लोक 28 (skanda.4.62.28)

ततोपि विहितं ब्रह्मन्भवता परमं हितम् ॥ अपराधसहस्राणि यल्लिंगं स्थापितं मम

tatopi vihitaṁ brahmanbhavatā paramaṁ hitam || aparādhasahasrāṇi yalliṁgaṁ sthāpitaṁ mama

"और उससे भी बढ़कर, हे ब्रह्मन्, तुमने परम हित किया - कि मेरा एक लिंग स्थापित किया, जो सहस्रों अपराधों को [मिटा देता है]।"

श्लोक 29 (skanda.4.62.29)

येनैकमपि मे लिंगं स्थापितं यत्र कुत्रचित् ॥ तस्यापराधलेशोपि नास्ति सर्वापराधिनः

yenaikamapi me liṁgaṁ sthāpitaṁ yatra kutracit || tasyāparādhaleśopi nāsti sarvāparādhinaḥ

"जिसने कहीं भी मेरा एक भी लिंग स्थापित किया, चाहे वह सर्वापराधी क्यों न हो, उसमें अपराध का लेशमात्र भी नहीं रहता।"

श्लोक 30 (skanda.4.62.30)

अपराधसहस्रेपि ब्राह्मणं योपराध्नुयात् ॥ दिनैः कतिपयैरेव तस्यैश्वर्यं विनश्यति

aparādhasahasrepi brāhmaṇaṁ yoparādhnuyāt || dinaiḥ katipayaireva tasyaiśvaryaṁ vinaśyati

"किन्तु जो सहस्रों अपराधों में से भी ब्राह्मण का अपराध करता है, उसका ऐश्वर्य कुछ ही दिनों में नष्ट हो जाता है।"

श्लोक 31 (skanda.4.62.31)

इति ब्रुवति देवेशेप्यंतरुच्छ्वसितं गणैः ॥ समातृभिः समंताच्च विलोक्यास्यं परस्परम्

iti bruvati deveśepyaṁtarucchvasitaṁ gaṇaiḥ || samātṛbhiḥ samaṁtācca vilokyāsyaṁ parasparam

देवेश के ऐसा कहने पर, गण और मातृकाएँ भीतर ही भीतर राहत की साँस लेकर, चारों ओर एक-दूसरे का मुख देखने लगे।

श्लोक 32 (skanda.4.62.32)

अर्कोप्यवसरं ज्ञात्वा नत्वा शंभुं व्यजिज्ञपत् ॥ प्रसन्नास्यमुमाकांतं दृष्ट्वा दृष्टचराचरः

arkopyavasaraṁ jñātvā natvā śaṁbhuṁ vyajijñapat || prasannāsyamumākāṁtaṁ dṛṣṭvā dṛṣṭacarācaraḥ

सूर्य ने भी अवसर जानकर, चराचर को देखने वाले शम्भु का प्रसन्न मुख देखकर, प्रणाम कर निवेदन किया -

श्लोक 33 (skanda.4.62.33)

॥अर्क उवाच॥ नाथ काशीमितो गत्वा यथाशक्ति कृतोपधिः ॥ अकिंचित्करतां प्राप्तः सहस्रकरवानपि

||arka uvāca|| nātha kāśīmito gatvā yathāśakti kṛtopadhiḥ || akiṁcitkaratāṁ prāptaḥ sahasrakaravānapi

सूर्य ने कहा - "हे नाथ, यहाँ से काशी जाकर, अपनी शक्ति के अनुसार उपासना करके, सहस्र किरणों वाला होते हुए भी मैं वहाँ कुछ न कर सकने वाला हो गया।"

श्लोक 34 (skanda.4.62.34)

स्वधर्मपालके तस्मिन्दिवोदासे धरापतौ ॥ निश्चितागमनं ज्ञात्वा देवस्याहमिह स्थितः

svadharmapālake tasmindivodāse dharāpatau || niścitāgamanaṁ jñātvā devasyāhamiha sthitaḥ

"स्वधर्म-पालक उस पृथ्वीपति दिवोदास के रहते हुए, हे देव, आपके निश्चित आगमन को जानकर मैं यहीं स्थित रहा।"

श्लोक 35 (skanda.4.62.35)

प्रतीक्षमाणो देवेश त्वदामनमुत्तमम् ॥ विभज्य बहुधात्मानं त्वदाराधनतत्परः

pratīkṣamāṇo deveśa tvadāmanamuttamam || vibhajya bahudhātmānaṁ tvadārādhanatatparaḥ

"हे देवेश, आपके उत्तम आगमन की प्रतीक्षा करते हुए, स्वयं को अनेक रूपों में विभक्त कर, आपकी आराधना में तत्पर रहकर..."

श्लोक 36 (skanda.4.62.36)

मनोरथद्रुमश्चाद्य फलितः श्रीमदीक्षशात् ॥ किंचिद्भक्तिलवांभोभिः सिक्तो ध्यानेन पुष्पितः

manorathadrumaścādya phalitaḥ śrīmadīkṣaśāt || kiṁcidbhaktilavāṁbhobhiḥ sikto dhyānena puṣpitaḥ

"...आज मेरे मनोरथ का वृक्ष आपके शुभ दर्शन से फलित हो गया - थोड़ी-सी भक्ति के जल से सींचा गया, ध्यान से पुष्पित हुआ।"

श्लोक 37 (skanda.4.62.37)

इत्युदीरितमाकर्ण्य रवेर्वैरविलोचनः ॥ प्रोवाच देवदेवेशो नापराध्यसि भास्कर

ityudīritamākarṇya ravervairavilocanaḥ || provāca devadeveśo nāparādhyasi bhāskara

सूर्य की यह बात सुनकर, वैरी की आँख [काम] को जलाने वाले देवदेवेश ने कहा - "हे भास्कर, तुमने कोई अपराध नहीं किया।"

श्लोक 38 (skanda.4.62.38)

ममैव कार्यं विह्तिं त्वं यदत्र व्यवस्थितः ॥ यस्यां सुरप्रवेशो न तस्मिन्राजनि शासति

mamaiva kāryaṁ vihtiṁ tvaṁ yadatra vyavasthitaḥ || yasyāṁ surapraveśo na tasminrājani śāsati

"तुमने मेरा ही कार्य किया कि यहाँ स्थित रहे, क्योंकि जिस राजा के शासन में देवों का प्रवेश नहीं होता था, उस [नगरी] में..."

श्लोक 39 (skanda.4.62.39)

इति सूरं समाश्वास्य देवदेव कृपानिधिः ॥ गणानाश्वासयामास व्रीडा नम्रशिरोधरान्

iti sūraṁ samāśvāsya devadeva kṛpānidhiḥ || gaṇānāśvāsayāmāsa vrīḍā namraśirodharān

इस प्रकार सूर्य को आश्वस्त कर, कृपानिधि देवदेव ने लज्जा से झुकी गर्दन वाले गणों को भी आश्वस्त किया।

श्लोक 40 (skanda.4.62.40)

योगिन्योपि सुदृष्ट्वाथ शंभुना संप्रसादिताः ॥ त्रपाभरसमाक्रांत कंधरा इव सं गताः

yoginyopi sudṛṣṭvātha śaṁbhunā saṁprasāditāḥ || trapābharasamākrāṁta kaṁdharā iva saṁ gatāḥ

शम्भु द्वारा भली भाँति देखी और प्रसन्न की गई योगिनियाँ भी, लज्जा के भार से झुकी गर्दन वाली-सी होकर पास आईं।

श्लोक 41 (skanda.4.62.41)

ततो व्यापारयांचक्रे त्र्यक्षो नेत्राणि चक्रिणि ॥ हरिर्न किंचिदप्यूचे सर्वज्ञाग्रे महामनाः

tato vyāpārayāṁcakre tryakṣo netrāṇi cakriṇi || harirna kiṁcidapyūce sarvajñāgre mahāmanāḥ

फिर त्रिनेत्र ने चक्रधारी (विष्णु) पर अपने नेत्र लगाए; और महामना हरि सर्वज्ञ के आगे कुछ भी नहीं बोले।

श्लोक 42 (skanda.4.62.42)

ईशोपि श्रुतवृत्तांतस्तार्क्ष्याद्गणप शार्ङ्गिणोः ॥ मनसैव प्रसन्नोभून्न किंचित्पर्यभाषत

īśopi śrutavṛttāṁtastārkṣyādgaṇapa śārṅgiṇoḥ || manasaiva prasannobhūnna kiṁcitparyabhāṣata

ईश भी, तार्क्ष्य से गणपति और शार्ङ्गधारी (विष्णु) का वृत्तान्त सुन चुके होने से, मन में ही प्रसन्न हुए, कुछ नहीं बोले।

श्लोक 43 (skanda.4.62.43)

एतस्मिन्नंतरे प्राप्ता गोलोकात्पंच धेनवः ॥ सुनंदा सुमनाश्चापि सुशीला सुरभिस्तथा

etasminnaṁtare prāptā golokātpaṁca dhenavaḥ || sunaṁdā sumanāścāpi suśīlā surabhistathā

इसी बीच गोलोक से पाँच गौएँ आईं - सुनन्दा, सुमना, सुशीला और सुरभि भी...

श्लोक 44 (skanda.4.62.44)

पंचमी कपिला चापि सर्वाघौघविघट्टिनी ॥ वात्सल्यदृष्ट्या भर्गस्य तासामूधांसि सुस्रुवुः

paṁcamī kapilā cāpi sarvāghaughavighaṭṭinī || vātsalyadṛṣṭyā bhargasya tāsāmūdhāṁsi susruvuḥ

...और पाँचवीं, सम्पूर्ण पाप-समूह को हरने वाली कपिला भी; भर्ग (शिव) के प्रति वात्सल्यभाव से उनके स्तनों से दूध बहने लगा।

श्लोक 45 (skanda.4.62.45)

ववर्षुः पयसां पूरैस्तदूधांसि पयोधराः ॥ धारासारैरविच्छिन्नैस्तावद्यावद्ध्रदोऽभवत्

vavarṣuḥ payasāṁ pūraistadūdhāṁsi payodharāḥ || dhārāsārairavicchinnaistāvadyāvaddhrado'bhavat

उन स्तनों ने दूध की अविच्छिन्न धाराओं की वृष्टि की, यहाँ तक कि एक ह्रद बन गया।

श्लोक 46 (skanda.4.62.46)

पयःपयोधिरिव स द्वितीयः प्रैक्षि पार्षदैः ॥ देवेश समधिष्ठानात्तत्तीर्थमभवत्परम्

payaḥpayodhiriva sa dvitīyaḥ praikṣi pārṣadaiḥ || deveśa samadhiṣṭhānāttattīrthamabhavatparam

पार्षदों ने उसे मानो दूसरा क्षीरसागर देखा; हे देवेश, वहाँ स्वयं स्थित होने से वह तीर्थ परम हो गया।

श्लोक 47 (skanda.4.62.47)

कपिला ह्रद इत्याख्यां चक्रे तस्य महेश्वरः ॥ ततो देवाज्ञया सर्वे स्नातास्तत्र दिवौकसः

kapilā hrada ityākhyāṁ cakre tasya maheśvaraḥ || tato devājñayā sarve snātāstatra divaukasaḥ

महेश्वर ने उसका नाम 'कपिला-ह्रद' रखा; फिर देव की आज्ञा से सब देवगण वहाँ स्नान करने लगे।

श्लोक 48 (skanda.4.62.48)

आविरासुस्ततस्तीर्थादथ दिव्यपितामहाः ॥ तान्दृष्ट्वा ते सुराः सर्वे तर्पयांचक्रिरे मुदा

āvirāsustatastīrthādatha divyapitāmahāḥ || tāndṛṣṭvā te surāḥ sarve tarpayāṁcakrire mudā

फिर उस तीर्थ से दिव्य पितामह प्रकट हुए; उन्हें देखकर सब देवों ने हर्षपूर्वक उन्हें तर्पण दिया।

श्लोक 49 (skanda.4.62.49)

अग्निष्वात्ता बर्हिषद आज्यपाः सोमपास्तथा ॥ इत्याद्या दिव्यपितरस्तृप्ताः शंभुं व्यजिज्ञपन्

agniṣvāttā barhiṣada ājyapāḥ somapāstathā || ityādyā divyapitarastṛptāḥ śaṁbhuṁ vyajijñapan

अग्निष्वात्त, बर्हिषद, आज्यप और सोमप - इन दिव्य पितरों ने तृप्त होकर शम्भु से निवेदन किया -

श्लोक 50 (skanda.4.62.50)

देवदेव जगन्नाथ भक्तानामभयप्रद ॥ अस्मिंस्तीर्थे त्वदभ्याशाज्जाता नस्तृप्तिरक्षया

devadeva jagannātha bhaktānāmabhayaprada || asmiṁstīrthe tvadabhyāśājjātā nastṛptirakṣayā

"हे देवदेव, जगन्नाथ, भक्तों को अभय देने वाले! इस तीर्थ में आपके सामीप्य से हमें अक्षय तृप्ति प्राप्त हुई है।"

श्लोक 51 (skanda.4.62.51)

तस्माच्छंभो वरं देहि प्रसन्नेनांतरात्मना ॥ इति दिव्यपितॄणां स श्रुत्वा वाक्यं वृषध्वजः

tasmācchaṁbho varaṁ dehi prasannenāṁtarātmanā || iti divyapitṝṇāṁ sa śrutvā vākyaṁ vṛṣadhvajaḥ

"इसलिए, हे शम्भु, प्रसन्न अन्तरात्मा से हमें वर दीजिए।" दिव्य पितरों की यह वाणी सुनकर वृषध्वज ने...

श्लोक 52 (skanda.4.62.52)

शृण्वतां सर्वदेवानामिदं वचनमब्रवीत् ॥ शर्वः सर्वपितॄणां वै परतृप्तिकरं परम्

śṛṇvatāṁ sarvadevānāmidaṁ vacanamabravīt || śarvaḥ sarvapitṝṇāṁ vai paratṛptikaraṁ param

...सम्पूर्ण देवों के सुनते हुए यह वचन कहा - शर्व ने, जो सम्पूर्ण पितरों को परम तृप्ति देने वाले हैं -

श्लोक 53 (skanda.4.62.53)

॥श्रीदेवदेव उवाच॥ शृणु विष्णो महाबाहो शृणु त्वं च पि तामह ॥ एतस्मिन्कापिले तीर्थे कापिलेय पयोभृते

||śrīdevadeva uvāca|| śṛṇu viṣṇo mahābāho śṛṇu tvaṁ ca pi tāmaha || etasminkāpile tīrthe kāpileya payobhṛte

श्रीदेवदेव ने कहा - "हे महाबाहु विष्णु, सुनो; हे पितामह, तुम भी सुनो। इस कपिल-तीर्थ में, कपिला-वंश के दूध से भरे..."

श्लोक 54 (skanda.4.62.54)

ये पिंडान्निर्वपिष्यंति श्रद्धया श्राद्धदानतः ॥ तेषां पितॄणां संतृप्तिर्भविष्यति ममाज्ञया

ye piṁḍānnirvapiṣyaṁti śraddhayā śrāddhadānataḥ || teṣāṁ pitṝṇāṁ saṁtṛptirbhaviṣyati mamājñayā

"...जो श्रद्धापूर्वक श्राद्ध-दान से पिण्ड अर्पित करेंगे, उनके पितरों की तृप्ति मेरी आज्ञा से हो जाएगी।"

श्लोक 55 (skanda.4.62.55)

अन्यं विशेषं वक्ष्यामि महातृप्तिकरं परम् ॥ कुहूसोमसमायोगे दत्तं श्राद्धमिहाक्षयम्

anyaṁ viśeṣaṁ vakṣyāmi mahātṛptikaraṁ param || kuhūsomasamāyoge dattaṁ śrāddhamihākṣayam

"एक और विशेष बात बताता हूँ, महान् तृप्ति देने वाली - अमावस्या-सोमवार के योग में यहाँ किया गया श्राद्ध अक्षय होता है।"

श्लोक 56 (skanda.4.62.56)

संवर्तकाले संप्राप्ते जलराशिर्जलान्यपि ॥ क्षीयंते न क्षयत्यत्र श्राद्धं सोमकुहू कृतम्

saṁvartakāle saṁprāpte jalarāśirjalānyapi || kṣīyaṁte na kṣayatyatra śrāddhaṁ somakuhū kṛtam

"प्रलयकाल आने पर जल-राशि और जल भी क्षीण हो जाते हैं, किन्तु यहाँ सोम-अमावस्या को किया गया श्राद्ध कभी क्षीण नहीं होता।"

श्लोक 57 (skanda.4.62.57)

अमासोमसमायोगे श्राद्धं यद्यत्र लभ्यते ॥ तीर्थे कापिलधारेस्मिन्गयया पुष्करेण किम्

amāsomasamāyoge śrāddhaṁ yadyatra labhyate || tīrthe kāpiladhāresmingayayā puṣkareṇa kim

"अमावस्या-सोमवार के योग में यहाँ जो श्राद्ध-फल मिलता है, उस कपिलधार-तीर्थ में गया और पुष्कर से क्या [प्रयोजन]?"

श्लोक 58 (skanda.4.62.58)

गदाधरभवान्यत्र यत्र त्वं च पितामह ॥ वृषध्वजोस्म्यहं यत्र फल्गुस्तत्र न संशयः

gadādharabhavānyatra yatra tvaṁ ca pitāmaha || vṛṣadhvajosmyahaṁ yatra phalgustatra na saṁśayaḥ

"जहाँ गदाधर और भवानी हैं, जहाँ हे पितामह तुम भी हो, जहाँ वृषध्वज मैं हूँ, वहाँ ही फल्गु है, इसमें संदेह नहीं।"

श्लोक 59 (skanda.4.62.59)

दिव्यांतरिक्षभौमानि यानि तीर्थानि सर्वतः ॥ तान्यत्र निवसिष्यंति दर्शे सोमदिनान्विते

divyāṁtarikṣabhaumāni yāni tīrthāni sarvataḥ || tānyatra nivasiṣyaṁti darśe somadinānvite

"सर्वत्र जितने भी दिव्य, अन्तरिक्ष और भौम तीर्थ हैं, वे सब सोमवार-युक्त अमावस्या को यहाँ निवास करेंगे।"

श्लोक 60 (skanda.4.62.60)

कुरुक्षेत्रे नैमिषे च गंगासागरसंगमे ॥ ग्रहणे श्राद्धतो यत्स्यात्तत्तीर्थे वार्षभध्वजे

kurukṣetre naimiṣe ca gaṁgāsāgarasaṁgame || grahaṇe śrāddhato yatsyāttattīrthe vārṣabhadhvaje

"कुरुक्षेत्र, नैमिष, गंगा-सागर संगम, तथा ग्रहणकाल में श्राद्ध से जो फल मिलता है, वही फल इस वार्षभध्वज-तीर्थ में मिलता है।"

श्लोक 61 (skanda.4.62.61)

अस्य तीर्थस्य नामानि यानि दिव्य पितामहाः ॥ तान्यहं कथयिष्यामि भवतां तृप्तिदान्यलम्

asya tīrthasya nāmāni yāni divya pitāmahāḥ || tānyahaṁ kathayiṣyāmi bhavatāṁ tṛptidānyalam

"हे दिव्य पितामहो, इस तीर्थ के जो नाम हैं, वे मैं तुम्हें बताऊँगा, जो तुम्हें पूर्ण तृप्ति देने वाले हैं।"

श्लोक 62 (skanda.4.62.62)

मधुस्रवेति प्रथममेषा पुष्करिणी स्मृता ॥ कृतकृत्या ततो ज्ञेया ततोऽसौ क्षीरनीरधिः

madhusraveti prathamameṣā puṣkariṇī smṛtā || kṛtakṛtyā tato jñeyā tato'sau kṣīranīradhiḥ

"यह पुष्करिणी पहले 'मधुस्रवा' नाम से स्मरण की जाती है; फिर 'कृतकृत्या' जानी जाती है; फिर वही 'क्षीरनीरधि' है।"

श्लोक 63 (skanda.4.62.63)

वृषभध्वजतीर्थं च तीर्थं पैतामहं ततः ॥ ततो गदाधराख्यं च पितृतीर्थं ततः परम्

vṛṣabhadhvajatīrthaṁ ca tīrthaṁ paitāmahaṁ tataḥ || tato gadādharākhyaṁ ca pitṛtīrthaṁ tataḥ param

"फिर वृषभध्वज-तीर्थ, फिर पैतामह-तीर्थ; फिर गदाधर नामक और फिर पितृ-तीर्थ है।"

श्लोक 64 (skanda.4.62.64)

ततः कापिलधारं वै सुधाखनिरियं पुनः ॥ ततः शिवगयाख्यं च ज्ञेयं तीर्थमिदं शुभम्

tataḥ kāpiladhāraṁ vai sudhākhaniriyaṁ punaḥ || tataḥ śivagayākhyaṁ ca jñeyaṁ tīrthamidaṁ śubham

"फिर कपिलधार, फिर यही 'सुधा की खान' है; और फिर यह शुभ तीर्थ 'शिवगया' नाम से जाना जाता है।"

श्लोक 65 (skanda.4.62.65)

एतानि दश नामानि तीर्थस्यास्य पितामहाः ॥ भवतां तृप्तिकारीणि विनापि श्राद्धतर्पणैः

etāni daśa nāmāni tīrthasyāsya pitāmahāḥ || bhavatāṁ tṛptikārīṇi vināpi śrāddhatarpaṇaiḥ

"हे पितामहो, इस तीर्थ के ये दस नाम, श्राद्ध-तर्पण के बिना भी, तुम्हें तृप्ति देने वाले हैं।"

श्लोक 66 (skanda.4.62.66)

सूर्येंदु संगमे येत्र पितॄणां तृप्तिकामुकाः ॥ ब्राह्मणान्भोजयिष्यंति तेषां श्राद्धमनंतकम्

sūryeṁdu saṁgame yetra pitṝṇāṁ tṛptikāmukāḥ || brāhmaṇānbhojayiṣyaṁti teṣāṁ śrāddhamanaṁtakam

"जो सूर्य-चन्द्र के संगम में, पितरों की तृप्ति चाहते हुए, ब्राह्मणों को भोजन कराएँगे, उनका श्राद्ध अनन्त हो जाएगा।"

श्लोक 67 (skanda.4.62.67)

श्राद्धे पितॄणां संतृप्त्यै दास्यंति कपिलां शुभाम् ॥ येत्र तेषां पितृगणो वसेत्क्षीरोदरोधसि

śrāddhe pitṝṇāṁ saṁtṛptyai dāsyaṁti kapilāṁ śubhām || yetra teṣāṁ pitṛgaṇo vasetkṣīrodarodhasi

"जो श्राद्ध में पितरों की तृप्ति के लिए शुभ कपिला गाय देंगे, उनका पितृगण क्षीरसागर के तट पर निवास करेगा।"

श्लोक 68 (skanda.4.62.68)

वृषोत्सर्गः कृतो यैस्तु तीर्थेस्मिन्वार्षभध्वजे ॥ अश्वमेधपुरोडाशैः पितरस्तेन तर्पिताः

vṛṣotsargaḥ kṛto yaistu tīrthesminvārṣabhadhvaje || aśvamedhapuroḍāśaiḥ pitarastena tarpitāḥ

"जिन्होंने इस वार्षभध्वज-तीर्थ में वृषोत्सर्ग किया, उनके पितर अश्वमेध के पुरोडाश से तृप्त हुए-से हो गए।"

श्लोक 69 (skanda.4.62.69)

गयातोष्टगुणं पुण्यमस्मिंस्तीर्थे पितामहाः ॥ अमायां सोमयुक्तायां श्राद्धैः कापिलधारिके

gayātoṣṭaguṇaṁ puṇyamasmiṁstīrthe pitāmahāḥ || amāyāṁ somayuktāyāṁ śrāddhaiḥ kāpiladhārike

"हे पितामहो, सोमवार-युक्त अमावस्या को कापिलधारिक-तीर्थ में श्राद्ध से गया से आठ गुना पुण्य होता है।"

श्लोक 70 (skanda.4.62.70)

येषां गर्भेऽभवत्स्रावो येऽ दंतजननामृताः ॥ तेषां तृप्तिर्भवेन्नूनं तीर्थे कापिलधारिके

yeṣāṁ garbhe'bhavatsrāvo ye' daṁtajananāmṛtāḥ || teṣāṁ tṛptirbhavennūnaṁ tīrthe kāpiladhārike

"जिनका गर्भपात हुआ हो, जो दाँत निकलने से पहले मरे हों, उनकी तृप्ति निश्चय ही कापिलधारिक-तीर्थ में होती है।"

श्लोक 71 (skanda.4.62.71)

अदत्तमौंजीदाना ये ये चादारपरिग्रहाः ॥ तेभ्यो निर्वापितं पिंडमिह ह्यक्षयतां व्रजेत्

adattamauṁjīdānā ye ye cādāraparigrahāḥ || tebhyo nirvāpitaṁ piṁḍamiha hyakṣayatāṁ vrajet

"जिनका यज्ञोपवीत-संस्कार नहीं हुआ, और जो विवाह से पहले मरे, उनके लिए यहाँ दिया गया पिण्ड अक्षय हो जाता है।"

श्लोक 72 (skanda.4.62.72)

अग्निदाहमृता ये वै नाग्निदाहश्च येषु वै ॥ ते सर्वे तृप्तिमायांति तीर्थे कापिलधारिके

agnidāhamṛtā ye vai nāgnidāhaśca yeṣu vai || te sarve tṛptimāyāṁti tīrthe kāpiladhārike

"जो अग्निदाह से मरे और जिनका अग्निदाह नहीं हुआ, वे सब कापिलधारिक-तीर्थ में तृप्ति प्राप्त करते हैं।"

श्लोक 73 (skanda.4.62.73)

और्द्ध्वदैहिकहीना ये षोडश श्राद्धवर्जिताः ॥ ते तृप्तिमधिगच्छंति घृतकुल्यां निवापतः

aurddhvadaihikahīnā ye ṣoḍaśa śrāddhavarjitāḥ || te tṛptimadhigacchaṁti ghṛtakulyāṁ nivāpataḥ

"जो ऊर्ध्वदैहिक क्रिया से रहित, सोलह श्राद्धों से वंचित रहे, वे यहाँ 'घृतकुल्या' में निवाप से तृप्ति प्राप्त करते हैं।"

श्लोक 74 (skanda.4.62.74)

अपुत्राश्च मृता ये वै येषां नास्त्युकप्रदः ॥ तेपि तृप्तिं परां यांति मधुस्रवसि तर्पिताः

aputrāśca mṛtā ye vai yeṣāṁ nāstyukapradaḥ || tepi tṛptiṁ parāṁ yāṁti madhusravasi tarpitāḥ

"और जो पुत्रहीन मरे, जिनका कोई उदक देने वाला नहीं, वे भी मधुस्रवा में तर्पित होकर परम तृप्ति पाते हैं।"

श्लोक 75 (skanda.4.62.75)

अपमृत्युमृता ये वै चोरविद्युज्जलादिभिः ॥ तेषामिह कृतं श्राद्धं जायते सुगतिप्रदम्

apamṛtyumṛtā ye vai coravidyujjalādibhiḥ || teṣāmiha kṛtaṁ śrāddhaṁ jāyate sugatipradam

"जो चोर, बिजली, जल आदि से अपमृत्यु से मरे, उनके लिए यहाँ किया गया श्राद्ध सद्गति देने वाला होता है।"

श्लोक 76 (skanda.4.62.76)

आत्मघातेन निधनं यैषामिहविकमर्णाम् ॥ तेपि तृप्तिं लभंतेत्र पिंडैः शिवगयाकृतैः

ātmaghātena nidhanaṁ yaiṣāmihavikamarṇām || tepi tṛptiṁ labhaṁtetra piṁḍaiḥ śivagayākṛtaiḥ

"जिनकी मृत्यु यहाँ आत्मघात से हुई हो, वे भी शिवगया में किए गए पिण्डों से तृप्ति प्राप्त करते हैं।"

श्लोक 77 (skanda.4.62.77)

पितृगोत्रे मृता ये वै मातृपक्षे च ये मृताः ॥ तेषामत्र कृतः पिंडो भवेदक्षयतृप्तिदः

pitṛgotre mṛtā ye vai mātṛpakṣe ca ye mṛtāḥ || teṣāmatra kṛtaḥ piṁḍo bhavedakṣayatṛptidaḥ

"पितृ-गोत्र में मरे और मातृ-पक्ष में मरे हुए लोगों के लिए यहाँ दिया गया पिण्ड अक्षय तृप्ति देने वाला होता है।"

श्लोक 78 (skanda.4.62.78)

पत्नीवर्गे मृता ये वै मित्रवर्गे च ये मृताः ॥ ते सर्वे तृप्तिमायांति तर्पिता वार्षभध्वजे

patnīvarge mṛtā ye vai mitravarge ca ye mṛtāḥ || te sarve tṛptimāyāṁti tarpitā vārṣabhadhvaje

"पत्नी-वर्ग में मरे और मित्र-वर्ग में मरे हुए सब लोग, वार्षभध्वज-तीर्थ में तर्पित होकर तृप्ति प्राप्त करते हैं।"

श्लोक 79 (skanda.4.62.79)

ब्रह्मक्षत्रविशां वंशे शूद्रवंशेंऽत्यजेषु च ॥ येषां नामगृहीत्वात्र दीयते ते समुद्धृताः

brahmakṣatraviśāṁ vaṁśe śūdravaṁśeṁ'tyajeṣu ca || yeṣāṁ nāmagṛhītvātra dīyate te samuddhṛtāḥ

"ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य के वंश में, शूद्र-वंश में और अन्त्यजों में जिनका नाम लेकर यहाँ दान दिया जाता है, वे सब उद्धृत हो जाते हैं।"

श्लोक 80 (skanda.4.62.80)

तिर्यग्योनि मृता ये वै ये पिशाचत्वमागताः ॥ तेप्यूर्ध्वगतिमायांति तृप्ताः कापिलधारिके

tiryagyoni mṛtā ye vai ye piśācatvamāgatāḥ || tepyūrdhvagatimāyāṁti tṛptāḥ kāpiladhārike

"जो पशु-योनि में मरे, जो पिशाचत्व को प्राप्त हुए, वे भी कापिलधारिक में तृप्त होकर ऊर्ध्वगति पाते हैं।"

श्लोक 81 (skanda.4.62.81)

ये तु मानुषलोकेस्मिन्पितरो मर्त्ययोनयः ॥ ते दिव्ययोनयः स्युर्वै मधुस्रवसि तर्पिताः

ye tu mānuṣalokesminpitaro martyayonayaḥ || te divyayonayaḥ syurvai madhusravasi tarpitāḥ

"जो पितर इस मनुष्य-लोक में मर्त्य-योनि वाले हैं, वे मधुस्रवा में तर्पित होकर दिव्य-योनि वाले हो जाते हैं।"

श्लोक 82 (skanda.4.62.82)

ये दिव्यलोके पितरः पुण्यैर्देवत्वमागताः ॥ ते ब्रह्मलोके गच्छंति तृप्तास्तीर्थे वृषध्वजे

ye divyaloke pitaraḥ puṇyairdevatvamāgatāḥ || te brahmaloke gacchaṁti tṛptāstīrthe vṛṣadhvaje

"जो पितर दिव्यलोक में पुण्यों से देवत्व को प्राप्त हुए हैं, वे वृषध्वज-तीर्थ में तृप्त होकर ब्रह्मलोक जाते हैं।"

श्लोक 83 (skanda.4.62.83)

कृते क्षीरमयं तीर्थं त्रेतायां मधुमत्पुनः ॥ द्वापरे सर्पिषा पूर्णं कलौ जलमयं भवेत्

kṛte kṣīramayaṁ tīrthaṁ tretāyāṁ madhumatpunaḥ || dvāpare sarpiṣā pūrṇaṁ kalau jalamayaṁ bhavet

"सत्ययुग में यह तीर्थ क्षीरमय है, त्रेता में मधुमय, द्वापर में घृत से पूर्ण, कलियुग में जलमय हो जाता है।"

श्लोक 84 (skanda.4.62.84)

सीमाबहिर्गतमपि ज्ञेयं तीर्थमिदं शुभम् ॥ मध्ये वाराणसि श्रेष्ठं मम सान्निध्यतो नरैः

sīmābahirgatamapi jñeyaṁ tīrthamidaṁ śubham || madhye vārāṇasi śreṣṭhaṁ mama sānnidhyato naraiḥ

"यह शुभ तीर्थ सीमा के बाहर स्थित होते हुए भी, मेरे सान्निध्य से मनुष्यों द्वारा वाराणसी के मध्य में श्रेष्ठ जाना जाएगा।"

श्लोक 85 (skanda.4.62.85)

काशीस्थितैर्यतो दर्शि ध्वजो मेषवृषलांछनः ॥ वृषध्वजेन नाम्नातः स्थास्याम्यत्र पितामहाः

kāśīsthitairyato darśi dhvajo meṣavṛṣalāṁchanaḥ || vṛṣadhvajena nāmnātaḥ sthāsyāmyatra pitāmahāḥ

"चूँकि काशीवासियों द्वारा यहाँ मेष-वृष चिह्न वाली ध्वजा देखी जाती है, इसलिए हे पितामहो, मैं यहाँ 'वृषध्वज' नाम से स्थित रहूँगा।"

श्लोक 86 (skanda.4.62.86)

पितामहेन सहितो गदाधरसमन्वितः ॥ रविणा पार्षदैः सार्धं तुष्टये वः पितामहाः

pitāmahena sahito gadādharasamanvitaḥ || raviṇā pārṣadaiḥ sārdhaṁ tuṣṭaye vaḥ pitāmahāḥ

"पितामह सहित, गदाधर सहित, सूर्य और पार्षदों के साथ, हे पितामहो, तुम्हारी संतुष्टि के लिए [यहाँ रहूँगा]।"

श्लोक 87 (skanda.4.62.87)

इति यावद्वरं दत्ते पितृभ्यो वृषभध्वजः ॥ तावन्नदी समागत्य प्रणम्येशं व्यजिज्ञपत्

iti yāvadvaraṁ datte pitṛbhyo vṛṣabhadhvajaḥ || tāvannadī samāgatya praṇamyeśaṁ vyajijñapat

इस प्रकार वृषभध्वज जब तक पितरों को वर दे रहे थे, तब तक एक नदी वहाँ आकर ईश को प्रणाम कर निवेदन करने लगी -

श्लोक 88 (skanda.4.62.88)

॥नंदिकेश्वर उवाच॥ विहितः स्यदनः सज्जस्ततोस्तु विजयोदयः ॥ अष्टौ कंठीरवा यत्र यत्रोक्ष्णामष्टकं शुभम्

||naṁdikeśvara uvāca|| vihitaḥ syadanaḥ sajjastatostu vijayodayaḥ || aṣṭau kaṁṭhīravā yatra yatrokṣṇāmaṣṭakaṁ śubham

नन्दिकेश्वर ने कहा - "रथ सज्जित कर तैयार किया गया है - अब विजय हो! जिसमें आठ सिंह हैं, जहाँ आठ शुभ बैल हैं..."

श्लोक 89 (skanda.4.62.89)

यत्रेभाः परिभांत्यष्टौ यत्राष्टौ जविनो हयाः ॥ मनः संयमनं यत्र कशापाणि व्यवस्थितम्

yatrebhāḥ paribhāṁtyaṣṭau yatrāṣṭau javino hayāḥ || manaḥ saṁyamanaṁ yatra kaśāpāṇi vyavasthitam

"...जहाँ आठ हाथी चमक रहे हैं, जहाँ आठ वेगवान् घोड़े हैं; जहाँ मन-संयम ही हाथ में कोड़े के रूप में स्थित है..."

श्लोक 90 (skanda.4.62.90)

गंगायमुनयोरीषे चक्रे पवनदेवता ॥ सायंप्रातर्मये चक्रे छत्रं द्यौर्मंडलं शुचि

gaṁgāyamunayorīṣe cakre pavanadevatā || sāyaṁprātarmaye cakre chatraṁ dyaurmaṁḍalaṁ śuci

"...गंगा-यमुना दोनों धुरी हैं, वायुदेव पहिया बने हैं; सन्ध्या-प्रातः मिलकर छत्र बने हैं, शुद्ध आकाश-मण्डल पहिए का घेरा है..."

श्लोक 91 (skanda.4.62.91)

तारावलीमयाः कीला आहेया उपनायकाः ॥ श्रुतयो मार्गदर्शिन्यः स्मृतयो रथगुप्तयः

tārāvalīmayāḥ kīlā āheyā upanāyakāḥ || śrutayo mārgadarśinyaḥ smṛtayo rathaguptayaḥ

"...तारों की पंक्तियाँ कीलें हैं, सर्प रस्सियाँ हैं; वेद मार्गदर्शक हैं, स्मृतियाँ रथ की रक्षक हैं..."

श्लोक 92 (skanda.4.62.92)

दक्षिणाधूर्दृढा यत्र मखा यत्राभिरक्षकाः ॥ आसनं प्रणवो यत्र गायत्रीपादपीठभूः

dakṣiṇādhūrdṛḍhā yatra makhā yatrābhirakṣakāḥ || āsanaṁ praṇavo yatra gāyatrīpādapīṭhabhūḥ

"...यज्ञ दृढ़ दाहिना धुरा हैं, वे ही रक्षक भी हैं; प्रणव आसन है, गायत्री पादपीठ की भूमि है..."

श्लोक 93 (skanda.4.62.93)

सांगा व्याहृतयो यत्र शुभा सोपानवीथिकाः ॥ सूर्याचंद्रमसौ यत्र सततं द्वाररक्षकौ

sāṁgā vyāhṛtayo yatra śubhā sopānavīthikāḥ || sūryācaṁdramasau yatra satataṁ dvārarakṣakau

"...अंगों सहित व्याहृतियाँ शुभ सोपान-पंक्ति हैं; सूर्य-चन्द्र सदा द्वार-रक्षक हैं..."

श्लोक 94 (skanda.4.62.94)

अग्निर्मकरतुंडश्च रथभूः कौमुदीमयी ॥ ध्वजदंडो महामेरुः पताका हस्करप्रभा

agnirmakaratuṁḍaśca rathabhūḥ kaumudīmayī || dhvajadaṁḍo mahāmeruḥ patākā haskaraprabhā

"...अग्नि मकर-मुख [अलंकरण] है, रथ की भूमि चाँदनी से बनी है; ध्वजदण्ड महामेरु है, पताका सूर्य-प्रभा वाली है..."

श्लोक 95 (skanda.4.62.95)

स्वयं वाग्देवता यत्र चंचच्चामरधारिणी ॥ ॥स्कंद उवाच॥ शैलादिनेति विज्ञप्तो देवदेव उमापतिः

svayaṁ vāgdevatā yatra caṁcaccāmaradhāriṇī || ||skaṁda uvāca|| śailādineti vijñapto devadeva umāpatiḥ

"...और स्वयं वाग्देवता चंचल चँवर डुला रही हैं।" स्कन्द ने कहा - इस प्रकार शैलादि (नन्दिकेश्वर) द्वारा निवेदित होने पर देवदेव उमापति ने...

श्लोक 96 (skanda.4.62.96)

कृतनीराजनविधिरष्टभिर्देवमातृभिः ॥ पिनाकपाणिरुत्तस्थौ दत्तहस्तोथ शार्ङ्गिणा

kṛtanīrājanavidhiraṣṭabhirdevamātṛbhiḥ || pinākapāṇiruttasthau dattahastotha śārṅgiṇā

...आठों देवमाताओं द्वारा नीराजन-विधि कराकर, पिनाकपाणि, शार्ङ्गधारी (विष्णु) का हाथ पकड़कर उठे।

श्लोक 97 (skanda.4.62.97)

निनादो दिव्यवाद्यानां रोदसी पर्यपूरयत् ॥ गीतमंगलगीर्भिश्च चारणैरनुवर्धितः

ninādo divyavādyānāṁ rodasī paryapūrayat || gītamaṁgalagīrbhiśca cāraṇairanuvardhitaḥ

दिव्य वाद्यों की गूँज ने आकाश-पृथ्वी को भर दिया, चारणों के मंगल-गीतों से और भी बढ़ गई।

श्लोक 98 (skanda.4.62.98)

तेन दिव्यनिनादेन बधिरीकृतदिङ्मुखाः ॥ आहूता इव आजग्मुर्विष्वग्भुवनवासिनः

tena divyaninādena badhirīkṛtadiṅmukhāḥ || āhūtā iva ājagmurviṣvagbhuvanavāsinaḥ

उस दिव्य ध्वनि से दिशाएँ बहरी-सी हो गईं; मानो बुलाए गए हों, ऐसे सभी लोकों के निवासी वहाँ आ गए।

श्लोक 99 (skanda.4.62.99)

देवाकोट्यस्त्रयस्त्रिंशद्गणाः कोट्ययुतद्वयम् ॥ नवकोट्यस्तु चामुंडा भैरव्यः कोटिसंमिताः

devākoṭyastrayastriṁśadgaṇāḥ koṭyayutadvayam || navakoṭyastu cāmuṁḍā bhairavyaḥ koṭisaṁmitāḥ

तैंतीस करोड़ देव, बीस लाख बीस हज़ार गण, नौ करोड़ चामुण्डा, एक करोड़ भैरवियाँ...

श्लोक 100 (skanda.4.62.100)

षडाननाः कुमाराश्च मयूरवरवाहनाः ॥ ममानुगाः समायाताः कोटयोष्टौ महाबलाः

ṣaḍānanāḥ kumārāśca mayūravaravāhanāḥ || mamānugāḥ samāyātāḥ koṭayoṣṭau mahābalāḥ

...षडानन कुमार, श्रेष्ठ मयूर-वाहन पर सवार, मेरे अनुयायी आठ करोड़ महाबली...

श्लोक 101 (skanda.4.62.101)

आययुः कोटयः सप्त स्फुरत्परशुपाणयः ॥ पिचंडिला महावेगा विघ्नविघ्ना गजाननाः

āyayuḥ koṭayaḥ sapta sphuratparaśupāṇayaḥ || picaṁḍilā mahāvegā vighnavighnā gajānanāḥ

...चमकते परशु हाथ में लिए सात करोड़ आए, महावेगवान् पिचण्डिल, विघ्नविघ्न, गजानन...

श्लोक 102 (skanda.4.62.102)

षडशीतिसहस्राणि मुनयो ब्रह्मवादिनः ॥ तावतोपि समाजग्मुस्तत्रत्ये गृहमेधिनः

ṣaḍaśītisahasrāṇi munayo brahmavādinaḥ || tāvatopi samājagmustatratye gṛhamedhinaḥ

...छियासी हज़ार ब्रह्मवादी मुनि, और उतने ही वहाँ के गृहस्थ भी एकत्र हुए।

श्लोक 103 (skanda.4.62.103)

नागानां कोटयस्तिस्रः पातालतलवासिनाम् ॥ दानवानां च दैत्यानां द्वे द्वे कोटी शिवात्मनाम्

nāgānāṁ koṭayastisraḥ pātālatalavāsinām || dānavānāṁ ca daityānāṁ dve dve koṭī śivātmanām

पाताल-निवासी नागों के तीन करोड़, शिवभक्त बने हुए दानवों और दैत्यों के दो-दो करोड़...

श्लोक 104 (skanda.4.62.104)

गंधर्वा नियुतान्यष्टौ कोट्यर्धं यक्षरक्षसाम् ॥ विद्याधराणामयुतं नियुतद्वयसंयुतम्

gaṁdharvā niyutānyaṣṭau koṭyardhaṁ yakṣarakṣasām || vidyādharāṇāmayutaṁ niyutadvayasaṁyutam

...आठ लाख गन्धर्व, आधा करोड़ यक्ष-राक्षस, बारह हज़ार विद्याधर...

श्लोक 105 (skanda.4.62.105)

तथा षष्टिसहस्राणि दिव्याश्चाप्सरसः शुभाः ॥ गोमातरोऽष्टौ लक्षाणि सुपर्णान्ययुतानि षट्

tathā ṣaṣṭisahasrāṇi divyāścāpsarasaḥ śubhāḥ || gomātaro'ṣṭau lakṣāṇi suparṇānyayutāni ṣaṭ

...और साठ हज़ार शुभ दिव्य अप्सराएँ; आठ लाख गौ-माताएँ, साठ हज़ार गरुड़ (पक्षी)...

श्लोक 106 (skanda.4.62.106)

सागराः सप्त संप्राप्ता नानारत्नोपदप्रदाः ॥ सरितां च सहस्राणि त्रीणि पंचायुतानि च

sāgarāḥ sapta saṁprāptā nānāratnopadapradāḥ || saritāṁ ca sahasrāṇi trīṇi paṁcāyutāni ca

...नाना रत्न प्रदान करने वाले सातों समुद्र आए; और तीस लाख पचास हज़ार नदियाँ...

श्लोक 107 (skanda.4.62.107)

गिरयोऽष्टौ सहस्राणि वनस्पतिशतत्रयम् ॥ आजग्मुर्दिग्गजा अष्टौ यत्र देवः पिनाकधृक्

girayo'ṣṭau sahasrāṇi vanaspatiśatatrayam || ājagmurdiggajā aṣṭau yatra devaḥ pinākadhṛk

...आठ हज़ार पर्वत, तीन सौ वनस्पतियाँ, तथा आठों दिग्गज वहाँ आए, जहाँ पिनाकधारी देव थे।

श्लोक 108 (skanda.4.62.108)

एतैः समेतः संतुष्टः परिष्टुत इतस्ततः ॥ श्रीकंठो रथमारुह्य काशीं प्राविशदुत्तमाम्

etaiḥ sametaḥ saṁtuṣṭaḥ pariṣṭuta itastataḥ || śrīkaṁṭho rathamāruhya kāśīṁ prāviśaduttamām

इन सबके साथ, संतुष्ट होकर, चारों ओर से स्तुत होते हुए, श्रीकण्ठ रथ पर चढ़कर उत्तम काशी में प्रविष्ट हुए।

श्लोक 109 (skanda.4.62.109)

स गिरींद्रसुतस्त्र्यक्षो मुदां धाम मुदां खनिः ॥ काशीं प्रैक्षिष्ट संहृष्टस्त्रिविष्टप समुत्कटाम्

sa girīṁdrasutastryakṣo mudāṁ dhāma mudāṁ khaniḥ || kāśīṁ praikṣiṣṭa saṁhṛṣṭastriviṣṭapa samutkaṭām

हर्ष के धाम, हर्ष की खान, उन गिरिराज-पुत्री के पति त्रिनेत्र ने अत्यन्त प्रसन्न होकर, स्वर्ग को भी लजाने वाली काशी को देखा।

श्लोक 110 (skanda.4.62.110)

॥स्कंद उवाच॥ श्रुत्वाख्यानमिदं पुण्यं कोटिजन्माघनाशनम् ॥ पठित्वा पाठयित्वा च शिवसायुज्यमाप्नुयात्

||skaṁda uvāca|| śrutvākhyānamidaṁ puṇyaṁ koṭijanmāghanāśanam || paṭhitvā pāṭhayitvā ca śivasāyujyamāpnuyāt

स्कन्द ने कहा - "करोड़ों जन्मों के पापों को नष्ट करने वाली इस पुण्य कथा को सुनकर, पढ़कर या पढ़वाकर, मनुष्य शिव-सायुज्य प्राप्त करता है।"

श्लोक 111 (skanda.4.62.111)

श्राद्धकाले विशेषेण पठनीयं प्रयत्नतः ॥ अक्षयं तद्भवेच्छ्राद्धं पितृतुष्टिकरं परम्

śrāddhakāle viśeṣeṇa paṭhanīyaṁ prayatnataḥ || akṣayaṁ tadbhavecchrāddhaṁ pitṛtuṣṭikaraṁ param

"श्राद्ध के समय विशेष रूप से यत्नपूर्वक पढ़ना चाहिए; वह श्राद्ध अक्षय हो जाता है, पितरों को परम संतोष देने वाला।"

श्लोक 112 (skanda.4.62.112)

वृषभध्वज माहात्म्यं पठित्वा शिवसन्निधौ ॥ प्रत्यहं वर्षमात्रं तु ह्यपुत्रः पुत्रवान्भवेत्

vṛṣabhadhvaja māhātmyaṁ paṭhitvā śivasannidhau || pratyahaṁ varṣamātraṁ tu hyaputraḥ putravānbhavet

"वृषभध्वज की महिमा को शिव के समक्ष प्रतिदिन एक वर्ष तक पढ़कर, पुत्रहीन भी पुत्रवान् हो जाता है।"

श्लोक 113 (skanda.4.62.113)

विश्वेशितुः संप्रवेशो यः काश्यां समुदाहृतः ॥ परमानंदकंदस्य बीजमेतत्सुनिश्चितम्

viśveśituḥ saṁpraveśo yaḥ kāśyāṁ samudāhṛtaḥ || paramānaṁdakaṁdasya bījametatsuniścitam

"काशी में जो विश्वेश का प्रवेश कहा गया, यह निश्चय ही परमानन्द के मूल का बीज है।"

श्लोक 114 (skanda.4.62.114)

पठित्वैतन्मुदाख्यानं प्रविशेद्यो नवं गृहम् ॥ स सर्वसौख्यनिलयो भवेदेव न संशयः

paṭhitvaitanmudākhyānaṁ praviśedyo navaṁ gṛham || sa sarvasaukhyanilayo bhavedeva na saṁśayaḥ

"इस आनन्ददायक आख्यान को पढ़कर जो नए घर में प्रवेश करता है, वह निश्चय ही सम्पूर्ण सुखों का निवास बन जाता है।"

श्लोक 115 (skanda.4.62.115)

त्रैलोक्यानंदजनकमेतदाख्यानमुत्तमम् ॥ अस्य श्रवणमात्रेण विश्वेशः संप्रसीदति

trailokyānaṁdajanakametadākhyānamuttamam || asya śravaṇamātreṇa viśveśaḥ saṁprasīdati

"त्रैलोक्य को आनन्दित करने वाला यह उत्तम आख्यान, इसके श्रवण मात्र से विश्वेश प्रसन्न हो जाते हैं।"

श्लोक 116 (skanda.4.62.116)

अलभ्यलाभो देवस्य जातोत्र हि यतः परः ॥ ततः काशी प्रवेशाख्यं जप्यमाख्यानमुत्तमम्

alabhyalābho devasya jātotra hi yataḥ paraḥ || tataḥ kāśī praveśākhyaṁ japyamākhyānamuttamam

"क्योंकि यहाँ देव को अलभ्य की प्राप्ति हुई, इसलिए 'काशी-प्रवेश' नामक यह उत्तम आख्यान जपने योग्य है।"

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