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अवन्ती खण्ड · अध्याय 101

च्यवनेश्वर की महिमा

अध्याय 100अध्याय-सूचीअध्याय 102

श्लोक 1 (skanda.5.101.1)

श्रीविश्वनाथ उवाच। त्रिंशत्तमं विजानीहि त्वं देवि च्यवनेश्वरम्। यस्य दर्शनमात्रेण स्वर्गभ्रंशो न जायते

śrīviśvanātha uvāca| triṁśattamaṁ vijānīhi tvaṁ devi cyavaneśvaram| yasya darśanamātreṇa svargabhraṁśo na jāyate

श्री विश्वनाथ ने कहा — हे देवी! तीसवें देव च्यवनेश्वर को जानो, जिनके दर्शनमात्र से स्वर्ग से पतन नहीं होता।

श्लोक 2 (skanda.5.101.2)

भृगोर्महर्षेः पुत्रश्च च्यवनो नाम पार्वति। स्थाणुभूतस्तपस्तेपे निराहारो महामुनिः

bhṛgormaharṣeḥ putraśca cyavano nāma pārvati| sthāṇubhūtastapastepe nirāhāro mahāmuniḥ

हे पार्वती! भृगु महर्षि के पुत्र च्यवन नामक महामुनि स्थाणु के समान स्थिर होकर बिना आहार के तप करते थे।

श्लोक 3 (skanda.5.101.3)

वितस्तायास्तटे रम्ये बहुवर्षगणान्किल। सवल्मीकोऽभवद्विप्रो लताभिरभिसंवृतः

vitastāyāstaṭe ramye bahuvarṣagaṇānkila| savalmīko'bhavadvipro latābhirabhisaṁvṛtaḥ

वितस्ता नदी के रम्य तट पर अनेक वर्षों तक वे विप्र लताओं से आच्छादित बांबी (वल्मीक) से ढक गए।

श्लोक 4 (skanda.5.101.4)

कालेन महता देवि समाकीर्णः पिपीलकैः। तथा स संवृतो धीमान्मृत्पिंड इव सर्वशः

kālena mahatā devi samākīrṇaḥ pipīlakaiḥ| tathā sa saṁvṛto dhīmānmṛtpiṁḍa iva sarvaśaḥ

हे देवी! दीर्घकाल में वे चींटियों से भर गए, और वह बुद्धिमान सर्वथा मिट्टी के पिंड के समान ढक गए।

श्लोक 5 (skanda.5.101.5)

आजगाम तमुद्देशं विहर्तुं वन उत्तमे। शर्यातिर्नाम धर्मात्मा सकुटुंबो मुदान्वितः

ājagāma tamuddeśaṁ vihartuṁ vana uttame| śaryātirnāma dharmātmā sakuṭuṁbo mudānvitaḥ

उस उत्तम वन में विहार करने के लिए धर्मात्मा शर्याति नामक राजा अपने परिवार सहित प्रसन्नतापूर्वक वहाँ आए।

श्लोक 6 (skanda.5.101.6)

तस्य स्त्रीणां सहस्राणि चत्वार्यासन्परिग्रहः। एकैव तु सुता सुभ्रूः सुकन्यानाम नामतः

tasya strīṇāṁ sahasrāṇi catvāryāsanparigrahaḥ| ekaiva tu sutā subhrūḥ sukanyānāma nāmataḥ

उनकी चार हजार स्त्रियाँ परिग्रह में थीं, किंतु सुंदर भौंहों वाली सुकन्या नामक केवल एक ही पुत्री थी।

श्लोक 7 (skanda.5.101.7)

सा सखीभिः परिवृता सर्वाभरणभूषिता। सा भ्रम्यमाणा वल्मीके दृष्ट्वा भार्गवचक्षुषी

sā sakhībhiḥ parivṛtā sarvābharaṇabhūṣitā| sā bhramyamāṇā valmīke dṛṣṭvā bhārgavacakṣuṣī

सखियों से घिरी, समस्त आभूषणों से सुसज्जित वह घूमते हुए वल्मीक में भृगुनंदन के नेत्रों को देख बैठी।

श्लोक 8 (skanda.5.101.8)

सा कौतुकात्कण्टकेन बुद्धिमोहवती तदा। किं नु खल्विदमित्युक्त्वा निर्बिभेदास्य लोचने

sā kautukātkaṇṭakena buddhimohavatī tadā| kiṁ nu khalvidamityuktvā nirbibhedāsya locane

कुतूहलवश, बुद्धि के मोह में पड़कर उसने 'यह क्या है' कहते हुए कांटे से उनके नेत्र बींध दिए।

श्लोक 9 (skanda.5.101.9)

अभवत्स तया विद्धो नेत्रयोः परमार्तिमान्। ततः शर्यातिसैन्यस्य शकृन्मूत्रं समारुणत्

abhavatsa tayā viddho netrayoḥ paramārtimān| tataḥ śaryātisainyasya śakṛnmūtraṁ samāruṇat

उससे बिंधे जाने पर वे नेत्रों में अत्यंत पीड़ित हो उठे; तब उन्होंने शर्याति की सेना का मल-मूत्र रोक दिया।

श्लोक 10 (skanda.5.101.10)

ततो रुद्धे शकृन्मूत्रे पर्यतप्यत पार्थिवः। प्रत्युवाच ततः क्रुद्धो राजा गद्गदया गिरा

tato ruddhe śakṛnmūtre paryatapyata pārthivaḥ| pratyuvāca tataḥ kruddho rājā gadgadayā girā

मल-मूत्र रुक जाने पर राजा संतप्त हो उठे; तब क्रुद्ध होकर राजा ने गद्गद वाणी में कहा —

श्लोक 11 (skanda.5.101.11)

केनापकृतमद्येह भार्गवस्य महात्मनः। तपोनित्यस्य वृद्धस्य रोषणस्य विशेषतः

kenāpakṛtamadyeha bhārgavasya mahātmanaḥ| taponityasya vṛddhasya roṣaṇasya viśeṣataḥ

'आज यहाँ किसने तपस्यारत, वृद्ध तथा विशेषतः क्रोधी महात्मा भार्गव का अपराध किया है?'

श्लोक 12 (skanda.5.101.12)

ज्ञातं वा यदि वाज्ञातं तदिदं ब्रूत मा चिरम्। तमूचुः सैनिकाः सर्वे न विद्मोऽपकृतं वयम्

jñātaṁ vā yadi vājñātaṁ tadidaṁ brūta mā ciram| tamūcuḥ sainikāḥ sarve na vidmo'pakṛtaṁ vayam

'जानकर या अनजाने में जो भी हुआ हो, शीघ्र कहो।' सभी सैनिकों ने कहा — 'हम कोई अपराध नहीं जानते।'

श्लोक 13 (skanda.5.101.13)

ततः स पृथिवीपालः साम्ना चोग्रेण च स्वयम्। पर्यपृच्छत्स्ववर्ग च भूयोभूयः सुदुःखितः

tataḥ sa pṛthivīpālaḥ sāmnā cogreṇa ca svayam| paryapṛcchatsvavarga ca bhūyobhūyaḥ suduḥkhitaḥ

तब उस अत्यंत दुःखी राजा ने स्वयं शांतिपूर्वक तथा उग्रतापूर्वक भी अपने वर्ग से बार-बार पूछा।

श्लोक 14 (skanda.5.101.14)

पितरं दुःखितं दृष्ट्वा सुकन्या तमथाब्रवीत्। मया किंचिच्च वल्मीके दृष्टं सत्त्वमतिच्छवि

pitaraṁ duḥkhitaṁ dṛṣṭvā sukanyā tamathābravīt| mayā kiṁcicca valmīke dṛṣṭaṁ sattvamaticchavi

पिता को दुःखी देखकर सुकन्या ने तब उनसे कहा — 'मैंने वल्मीक में कुछ अत्यंत कांतिमान तेज देखा था।'

श्लोक 15 (skanda.5.101.15)

खद्योतवदभिज्ञातं तन्मया विद्धमंतिकम्। एतच्छ्रुत्वा तु शर्यातिर्वल्मीकं क्षिप्रमभ्यगात्

khadyotavadabhijñātaṁ tanmayā viddhamaṁtikam| etacchrutvā tu śaryātirvalmīkaṁ kṣipramabhyagāt

'खद्योत (जुगनू) के समान जानकर मैंने उसे पास से बींध दिया।' यह सुनकर शर्याति शीघ्र ही वल्मीक के पास गए।

श्लोक 16 (skanda.5.101.16)

तत्रापश्यत्तपोवृद्धं वयोवृद्धं च भार्गवम्। प्रार्थयामास सैन्यार्थे प्रांजलिः स महीपतिः

tatrāpaśyattapovṛddhaṁ vayovṛddhaṁ ca bhārgavam| prārthayāmāsa sainyārthe prāṁjaliḥ sa mahīpatiḥ

वहाँ उन्होंने तपोवृद्ध तथा वयोवृद्ध भृगुनंदन को देखा; और वह राजा हाथ जोड़कर सेना की ओर से प्रार्थना करने लगे।

श्लोक 17 (skanda.5.101.17)

अज्ञानाद्बालया यत्तेऽपकृतं तु महीसुर। इमामेव च ते कन्यां ददामि सुदृढव्रताम्

ajñānādbālayā yatte'pakṛtaṁ tu mahīsura| imāmeva ca te kanyāṁ dadāmi sudṛḍhavratām

'हे भूदेव! अज्ञानवश बालिका द्वारा जो अपराध हुआ, उसके प्रतिकार में मैं आपको अपनी यही दृढ़व्रता पुत्री देता हूँ।'

श्लोक 18 (skanda.5.101.18)

भार्यार्थे त्वं गृहाणेमां प्रसीद द्विजसत्तम। ततोब्रवीमहीपालं च्यवनो भार्गवस्तथा

bhāryārthe tvaṁ gṛhāṇemāṁ prasīda dvijasattama| tatobravīmahīpālaṁ cyavano bhārgavastathā

'हे द्विजश्रेष्ठ! इसे पत्नी रूप में स्वीकार कीजिए और प्रसन्न होइए।' तब च्यवन भार्गव ने राजा से कहा —

श्लोक 19 (skanda.5.101.19)

यद्येवं प्रतिगृह्यैतां क्षमिष्यामि महीपते। ददौ दुहितरं तस्मै च्यवनाय महीपतिः

yadyevaṁ pratigṛhyaitāṁ kṣamiṣyāmi mahīpate| dadau duhitaraṁ tasmai cyavanāya mahīpatiḥ

'यदि ऐसा ही है तो इसे स्वीकार कर मैं क्षमा करूँगा, हे राजन्!' राजा ने अपनी पुत्री च्यवन को दे दी।

श्लोक 20 (skanda.5.101.20)

प्रतिगृह्य च तां कन्यां भगवान्प्रससाद ह। प्राप्ते प्रसादे राजाथ ससैन्यो विषयं गतः

pratigṛhya ca tāṁ kanyāṁ bhagavānprasasāda ha| prāpte prasāde rājātha sasainyo viṣayaṁ gataḥ

उस कन्या को स्वीकार कर भगवान् प्रसन्न हो गए; प्रसन्नता प्राप्त होने पर राजा सेना सहित अपने राज्य को लौट गए।

श्लोक 21 (skanda.5.101.21)

सुकन्यापि पतिं लब्ध्वा तपस्विनमनिंदिता। नित्यं पर्यचरत्प्रीत्या तपसा नियमेन च

sukanyāpi patiṁ labdhvā tapasvinamaniṁditā| nityaṁ paryacaratprītyā tapasā niyamena ca

निर्दोष सुकन्या भी उस तपस्वी को पति रूप में पाकर प्रेमपूर्वक तप और नियम के साथ नित्य उनकी सेवा करने लगी।

श्लोक 22 (skanda.5.101.22)

कस्यचित्त्वथ कालस्य नासत्यावश्विनौ प्रिये। कृताभिषेकां विवृतां सुकन्यां तामपश्यताम्

kasyacittvatha kālasya nāsatyāvaśvinau priye| kṛtābhiṣekāṁ vivṛtāṁ sukanyāṁ tāmapaśyatām

कुछ काल बीतने पर, हे प्रिये! स्नान करके निर्वस्त्रा सुकन्या को नासत्य नामक दोनों अश्विनीकुमारों ने देखा।

श्लोक 23 (skanda.5.101.23)

तां दृष्ट्वा दर्शनीयांगीं देवराजसुतामिव। ऊचतुः समुपद्रुत्य कस्य त्वमतिशोभने

tāṁ dṛṣṭvā darśanīyāṁgīṁ devarājasutāmiva| ūcatuḥ samupadrutya kasya tvamatiśobhane

देवराज की पुत्री के समान सुंदरांगी उसे देखकर वे निकट आकर बोले — 'हे परम सुंदरी! तुम किसकी हो?'

श्लोक 24 (skanda.5.101.24)

सा प्रोवाच महाभागा पतिव्रतपरायणा। शर्यातितनयां चैव भार्यां च च्यवनस्य हि

sā provāca mahābhāgā pativrataparāyaṇā| śaryātitanayāṁ caiva bhāryāṁ ca cyavanasya hi

उस महाभागा पतिव्रता ने कहा कि वह शर्याति की पुत्री तथा च्यवन की पत्नी है।

श्लोक 25 (skanda.5.101.25)

ततोश्विनौ प्रहस्यैनामब्रूतां पुनरेव तु। कस्मादेवंविधा भूत्वा जराजर्जरितं पतिम्

tatośvinau prahasyaināmabrūtāṁ punareva tu| kasmādevaṁvidhā bhūtvā jarājarjaritaṁ patim

तब हँसते हुए अश्विनीकुमारों ने उससे फिर कहा — 'ऐसी होकर भी तुम इस जरा से जर्जर पति की सेवा क्यों करती हो?'

श्लोक 26 (skanda.5.101.26)

त्वमपास्येह कल्याणि कामभोगबहिष्कृता। वृद्धं च्यवनमुत्सृज्य वरयस्वैकमावयोः

tvamapāsyeha kalyāṇi kāmabhogabahiṣkṛtā| vṛddhaṁ cyavanamutsṛjya varayasvaikamāvayoḥ

'हे कल्याणी! तुम यहाँ कामभोग से वंचित हो; वृद्ध च्यवन को त्यागकर हम दोनों में से किसी एक को पति रूप में चुन लो।'

श्लोक 27 (skanda.5.101.27)

पत्यर्थं देवगर्भाभे मा वृथा यौवनं कृथाः। एवमुक्ता सुकन्या तु दस्रौ ताविदमब्रवीत्

patyarthaṁ devagarbhābhe mā vṛthā yauvanaṁ kṛthāḥ| evamuktā sukanyā tu dasrau tāvidamabravīt

'हे देवकुमारी के समान सुंदरी! पति के लिए अपना यौवन व्यर्थ मत गँवाओ।' ऐसा कहे जाने पर सुकन्या ने उन दोनों अश्विनीकुमारों से कहा —

श्लोक 28 (skanda.5.101.28)

रताहं च्यवने देवे मैवं मा पर्यशंकतम्। ततोऽब्रूतां पुनस्त्वेनामावां देवभिषग्वरौ

ratāhaṁ cyavane deve maivaṁ mā paryaśaṁkatam| tato'brūtāṁ punastvenāmāvāṁ devabhiṣagvarau

'मैं देव च्यवन में अनुरक्त हूँ, ऐसा मत सोचो।' तब देवताओं के श्रेष्ठ वैद्य उन दोनों ने उससे पुनः कहा —

श्लोक 29 (skanda.5.101.29)

युवानं रूपसंपन्नं करिष्यावः पतिं तव। एतेन समयेनावामामंत्रय सुमध्यमे

yuvānaṁ rūpasaṁpannaṁ kariṣyāvaḥ patiṁ tava| etena samayenāvāmāmaṁtraya sumadhyame

'हम तुम्हारे पति को युवा और सुरूप बना देंगे; हे सुमध्यमे! इस शर्त पर हमें बुलाना।'

श्लोक 30 (skanda.5.101.30)

सा तयोर्वचनं श्रुत्वा कथयामास भार्गवे। तच्छ्रुत्वा च्यवनो भार्यां क्रियतामित्यभाषत

sā tayorvacanaṁ śrutvā kathayāmāsa bhārgave| tacchrutvā cyavano bhāryāṁ kriyatāmityabhāṣata

उनकी बात सुनकर उसने भार्गव से कह दिया; यह सुनकर च्यवन ने पत्नी से कहा — 'ऐसा ही किया जाए।'

श्लोक 31 (skanda.5.101.31)

ऊचतू राजपुत्रीं तां पतिस्तव विशत्वपः। ततोऽप्सु च्यवनः शीघ्रं रूपार्थी प्रविवेश ह

ūcatū rājaputrīṁ tāṁ patistava viśatvapaḥ| tato'psu cyavanaḥ śīghraṁ rūpārthī praviveśa ha

उन्होंने राजकन्या से कहा — 'तुम्हारा पति जल में प्रवेश करे।' तब रूप की कामना से च्यवन शीघ्र ही जल में प्रविष्ट हुए।

श्लोक 32 (skanda.5.101.32)

अश्विनावपि तत्काले सरः प्राविशतां प्रिये। ततो मुहूर्त्तादुत्तीर्णा सर्वे ते सरसस्तदा

aśvināvapi tatkāle saraḥ prāviśatāṁ priye| tato muhūrttāduttīrṇā sarve te sarasastadā

हे प्रिये! उसी समय अश्विनीकुमार भी सरोवर में प्रविष्ट हुए; फिर क्षणभर में वे तीनों सरोवर से बाहर निकले।

श्लोक 33 (skanda.5.101.33)

दिव्यरूपधराः सर्वे युवानो दिव्यकुंडलाः। तुल्यवेषधराश्चैव मनसः प्रीतिवर्द्धनाः

divyarūpadharāḥ sarve yuvāno divyakuṁḍalāḥ| tulyaveṣadharāścaiva manasaḥ prītivarddhanāḥ

सभी दिव्य रूपधारी, युवा, दिव्य कुंडलों वाले, समान वेषधारी तथा मन को प्रसन्न करने वाले थे।

श्लोक 34 (skanda.5.101.34)

तेऽब्रुवन्सहिताः सर्वे वृणीष्वान्यतमं शुभम्। अस्माकमीप्सितं भद्रे पतित्वे वरवर्णिनि

te'bruvansahitāḥ sarve vṛṇīṣvānyatamaṁ śubham| asmākamīpsitaṁ bhadre patitve varavarṇini

वे सब मिलकर बोले — 'हे शुभे! हम में से किसी एक को चुन लो; हे वरवर्णिनी! यही हमारी अभिलाषा है।'

श्लोक 35 (skanda.5.101.35)

सा समीक्ष्य तु तान्सर्वांस्तुल्यरूपधरा न्स्थितान्। निश्चित्य मनसा बुद्ध्या देवी वव्रे स्वकं पतिम्

sā samīkṣya tu tānsarvāṁstulyarūpadharā nsthitān| niścitya manasā buddhyā devī vavre svakaṁ patim

समान रूपधारी उन सभी को देखकर, बुद्धि और मन से निश्चय कर, उस देवी ने अपने ही पति को (सही पहचान कर) चुन लिया।

श्लोक 36 (skanda.5.101.36)

लब्ध्वा तु च्यवनो भार्यां वयो रूपं तु वांछितम्। हृष्टोऽब्रवीन्महातेजास्तौ नासत्याविदं वचः

labdhvā tu cyavano bhāryāṁ vayo rūpaṁ tu vāṁchitam| hṛṣṭo'bravīnmahātejāstau nāsatyāvidaṁ vacaḥ

वांछित वय और रूप वाली पत्नी को पाकर, महातेजस्वी च्यवन ने प्रसन्न होकर नासत्यद्वय से यह कहा —

श्लोक 37 (skanda.5.101.37)

यदहं रूपसंपन्नो वयसा च समन्वितः। कृतो भवद्भ्यां वृद्धः सन्भार्यां च प्राप्तवानिमाम्

yadahaṁ rūpasaṁpanno vayasā ca samanvitaḥ| kṛto bhavadbhyāṁ vṛddhaḥ sanbhāryāṁ ca prāptavānimām

'चूँकि आप दोनों ने मुझ वृद्ध को रूपसंपन्न और युवावस्था से युक्त कर दिया, तथा मैंने अपनी यह पत्नी पुनः प्राप्त की,'

श्लोक 38 (skanda.5.101.38)

तस्माद्युवां करि ष्यामि प्रीत्याहं सोमपायिनौ। सत्यमेतन्न संदेहो देवराजस्य पश्यतः

tasmādyuvāṁ kari ṣyāmi prītyāhaṁ somapāyinau| satyametanna saṁdeho devarājasya paśyataḥ

'इसलिए मैं प्रीतिपूर्वक आप दोनों को सोमपायी बनाऊँगा — यह सत्य है, इसमें संदेह नहीं, देवराज (इंद्र) के देखते हुए भी।'

श्लोक 39 (skanda.5.101.39)

तच्छ्रुत्वा हृष्टमनसौ दिवं देवौ प्रजग्मतुः। याजयामास सोमार्हौ नासत्यावश्विनाविति

tacchrutvā hṛṣṭamanasau divaṁ devau prajagmatuḥ| yājayāmāsa somārhau nāsatyāvaśvināviti

यह सुनकर वे दोनों देवता प्रसन्नचित्त होकर स्वर्ग को गए; च्यवन ने नासत्य अश्विनीकुमारों को सोमपान के योग्य बना दिया।

श्लोक 40 (skanda.5.101.40)

भिषजौ देवतानां हि कर्मणा तेन गर्हितौ। आभ्यामर्थाय सोमं त्वं प्रदास्यसि यदि स्वयम्

bhiṣajau devatānāṁ hi karmaṇā tena garhitau| ābhyāmarthāya somaṁ tvaṁ pradāsyasi yadi svayam

इंद्र ने कहा — 'ये दोनों देवताओं के वैद्य हैं और उसी कर्म के कारण निंदित हैं; यदि तुम स्वयं इनके लिए सोम प्रदान करोगे,'

श्लोक 41 (skanda.5.101.41)

वज्रं ते प्रहरिष्यामि घोररूपं सुदारुणम्। एवमुक्तः स्मयन्निन्द्रमभिवीक्ष्य स भार्गवः। बलिनं वासवं ज्ञात्वा चिंतयामास सत्वरम्

vajraṁ te prahariṣyāmi ghorarūpaṁ sudāruṇam| evamuktaḥ smayannindramabhivīkṣya sa bhārgavaḥ| balinaṁ vāsavaṁ jñātvā ciṁtayāmāsa satvaram

'तो मैं तुम पर घोर, अत्यंत दारुण वज्र का प्रहार करूँगा।' ऐसा कहे जाने पर भार्गव मुस्कुराते हुए इंद्र की ओर देखकर, वासव के बलवान होने को जानकर शीघ्र विचार करने लगे —

श्लोक 42 (skanda.5.101.42)

देवमाराधयिष्यामि महादेवं महेश्वरम्। यस्य कर्मकरः शक्रो यस्य देवा वशानुगाः। यः समर्थो जगद्गोप्ता सृष्टिसंहारकारकः

devamārādhayiṣyāmi mahādevaṁ maheśvaram| yasya karmakaraḥ śakro yasya devā vaśānugāḥ| yaḥ samartho jagadgoptā sṛṣṭisaṁhārakārakaḥ

'मैं महादेव महेश्वर की आराधना करूँगा, जिनके कर्मकर स्वयं इंद्र हैं, जिनके अधीन सभी देवता हैं, जो जगत् के रक्षक और सृष्टि-संहार करने में समर्थ हैं।'

श्लोक 43 (skanda.5.101.43)

इत्युक्त्वा च्यवनो देवि महाकालवनं गतः। रामेश्वरस्य देवस्य लिंगमीशानतः स्थितम्। श्रद्धयाराधितं तेन च्यवनेन महात्मना

ityuktvā cyavano devi mahākālavanaṁ gataḥ| rāmeśvarasya devasya liṁgamīśānataḥ sthitam| śraddhayārādhitaṁ tena cyavanena mahātmanā

ऐसा कहकर, हे देवी! च्यवन महाकालवन को गए; और रामेश्वर देव के लिंग से ईशान दिशा में स्थित लिंग की उस महात्मा च्यवन ने श्रद्धापूर्वक आराधना की।

श्लोक 44 (skanda.5.101.44)

तस्य प्रसन्नो रुद्रस्तु स वज्रादभयं ददौ। तस्य प्रहरतो बाहुं स्तंभयामास भार्गवः

tasya prasanno rudrastu sa vajrādabhayaṁ dadau| tasya praharato bāhuṁ staṁbhayāmāsa bhārgavaḥ

उससे प्रसन्न होकर रुद्र ने उन्हें वज्र से अभय प्रदान किया; और भार्गव ने प्रहार करते हुए इंद्र की भुजा को स्तंभित कर दिया।

श्लोक 45 (skanda.5.101.45)

समाराधनतुष्टस्य लिंगस्यास्य प्रभावतः। एतस्मिन्नंतरे ज्वाला निःसृता लिंगमध्यतः

samārādhanatuṣṭasya liṁgasyāsya prabhāvataḥ| etasminnaṁtare jvālā niḥsṛtā liṁgamadhyataḥ

आराधना से संतुष्ट इस लिंग के प्रभाव से, उसी समय लिंग के मध्य से एक ज्वाला निकली।

श्लोक 46 (skanda.5.101.46)

तया देवगणाः सर्वे दह्यमाना विचेतसः। प्रोचुर्गद्गदया वाचा धूमेनांधीकृते क्षणाः

tayā devagaṇāḥ sarve dahyamānā vicetasaḥ| procurgadgadayā vācā dhūmenāṁdhīkṛte kṣaṇāḥ

उससे सभी देवगण जलते हुए, चेतनाशून्य होकर, धुएँ से क्षणभर अंधे हुए, गद्गद वाणी में बोल उठे —

श्लोक 47 (skanda.5.101.47)

क्रियेतां सोमपावेतावश्विनौ बलसूदन। देवानां वचनं श्रुत्वा च्यवनं भयपीडितः। प्रत्युवाच ततः शक्रः प्रणामानतकंधरः

kriyetāṁ somapāvetāvaśvinau balasūdana| devānāṁ vacanaṁ śrutvā cyavanaṁ bhayapīḍitaḥ| pratyuvāca tataḥ śakraḥ praṇāmānatakaṁdharaḥ

'हे बलसूदन! इन दोनों अश्विनीकुमारों को सोमपायी बना दिया जाए।' देवताओं का यह वचन सुनकर, भयपीड़ित इंद्र ने प्रणाम करते हुए झुकी हुई गर्दन से च्यवन को उत्तर दिया —

श्लोक 48 (skanda.5.101.48)

सोमपावश्विनावेतावद्यप्रभृति भार्गव। भविष्यतस्ततः सर्वमेतत्सत्यं ब्रवीमि ते

somapāvaśvināvetāvadyaprabhṛti bhārgava| bhaviṣyatastataḥ sarvametatsatyaṁ bravīmi te

'हे भार्गव! आज से ये दोनों अश्विनीकुमार सोमपायी होंगे; यह सब सत्य होगा, मैं तुमसे सत्य कहता हूँ।'

श्लोक 49 (skanda.5.101.49)

मा तेऽतिथ्याभिसंरंभो भविष्यति तपोधन ।।। लिंगस्यास्य प्रभावोऽयं यदहं निष्प्रभीकृतः

mā te'tithyābhisaṁraṁbho bhaviṣyati tapodhana ||| liṁgasyāsya prabhāvo'yaṁ yadahaṁ niṣprabhīkṛtaḥ

'हे तपोधन! अब तुम्हारे प्रति आतिथ्य-विषयक क्रोध नहीं होगा। यह इस लिंग का ही प्रभाव है, जिससे मैं निष्प्रभ कर दिया गया।'

श्लोक 50 (skanda.5.101.50)

ततस्त्वन्नामधेयेन प्रसिद्धिर्भुवि यास्यति। आराधितं यतो देवि च्यवनेन महात्मना

tatastvannāmadheyena prasiddhirbhuvi yāsyati| ārādhitaṁ yato devi cyavanena mahātmanā

'हे देवी! तब से इस लिंग की प्रसिद्धि तुम्हारे ही नाम से पृथ्वी पर होगी, क्योंकि महात्मा च्यवन ने इसकी आराधना की।'

श्लोक 51 (skanda.5.101.51)

च्यवनेश्वरमेतद्वै ख्यातं त्रिभुवनेऽभवत्। भक्ता ये पूजयिष्यंति देवेशं च्यवनेश्वरम्। आजन्मप्रभवं पापं तेषां नश्यति तत्क्षणात्

cyavaneśvarametadvai khyātaṁ tribhuvane'bhavat| bhaktā ye pūjayiṣyaṁti deveśaṁ cyavaneśvaram| ājanmaprabhavaṁ pāpaṁ teṣāṁ naśyati tatkṣaṇāt

यह लिंग तीनों भुवनों में 'च्यवनेश्वर' के नाम से विख्यात हुआ। जो भक्त देवेश च्यवनेश्वर की पूजा करते हैं, उनका जन्म-जन्मांतर का पाप उसी क्षण नष्ट हो जाता है।

श्लोक 52 (skanda.5.101.52)

यः पश्यति नरो नित्यं च्यवनेश्वरसंज्ञकम्। जन्मदुःखजरारोगैर्मुक्तो मुक्तिमवाप्नुयात्

yaḥ paśyati naro nityaṁ cyavaneśvarasaṁjñakam| janmaduḥkhajarārogairmukto muktimavāpnuyāt

जो मनुष्य नित्य च्यवनेश्वर नामक देव का दर्शन करता है, वह जन्म, दुःख, जरा तथा रोगों से मुक्त होकर मुक्ति प्राप्त करता है।

श्लोक 53 (skanda.5.101.53)

यंयं काममभिध्यायेन्मनसाभिमतं नरः। तंतं दुर्लभमाप्नोति च्यवनेश्वरदर्शनात्

yaṁyaṁ kāmamabhidhyāyenmanasābhimataṁ naraḥ| taṁtaṁ durlabhamāpnoti cyavaneśvaradarśanāt

मनुष्य मन में जिस-जिस दुर्लभ कामना का चिंतन करता है, वह च्यवनेश्वर के दर्शन से उसे प्राप्त हो जाती है।

श्लोक 54 (skanda.5.101.54)

नियमेन प्रपश्यंति ये देवं च्यवनेश्वरम्। ते प्रयांति तनुं त्यक्त्वा मदीये भुवने प्रिये

niyamena prapaśyaṁti ye devaṁ cyavaneśvaram| te prayāṁti tanuṁ tyaktvā madīye bhuvane priye

जो नियमपूर्वक च्यवनेश्वर देव का दर्शन करते हैं, वे शरीर त्यागकर, हे प्रिये! मेरे ही लोक को प्राप्त होते हैं।

श्लोक 55 (skanda.5.101.55)

यः शृणोति कथां पुण्यां सर्वपापहरां शुभाम्। स पुण्यात्मा परं स्थानं याति दिव्यं न संशयः

yaḥ śṛṇoti kathāṁ puṇyāṁ sarvapāpaharāṁ śubhām| sa puṇyātmā paraṁ sthānaṁ yāti divyaṁ na saṁśayaḥ

जो इस पवित्र, सर्वपापहारी, शुभ कथा को सुनता है, वह पुण्यात्मा निश्चय ही दिव्य परम स्थान को प्राप्त होता है।

श्लोक 56 (skanda.5.101.56)

भक्तिहीनः क्रियाहीनो यः पश्यति प्रसंगतः। स पुण्यां गतिमाप्नोति योगिगम्यां यशस्विनि

bhaktihīnaḥ kriyāhīno yaḥ paśyati prasaṁgataḥ| sa puṇyāṁ gatimāpnoti yogigamyāṁ yaśasvini

हे यशस्विनी! भक्तिरहित तथा क्रियारहित होकर भी जो प्रसंगवश इसका दर्शन करता है, वह भी योगियों को ही प्राप्त होने योग्य पुण्य गति को प्राप्त करता है।

श्लोक 57 (skanda.5.101.57)

पुष्पैर्विचित्रैर्ये देवं यजंते च्यवनेश्वरम्। संसारार्णवमुल्लंघ्य ते यांति परमं पदम्

puṣpairvicitrairye devaṁ yajaṁte cyavaneśvaram| saṁsārārṇavamullaṁghya te yāṁti paramaṁ padam

जो विचित्र पुष्पों से च्यवनेश्वर देव की पूजा करते हैं, वे संसार-सागर को पार कर परम पद को प्राप्त होते हैं।

श्लोक 58 (skanda.5.101.58)

एष ते कथितो देवि प्रभावः पापनाशनः। च्यवनेश्वरदेवस्य शृणु खंडेश्वरं शिवे

eṣa te kathito devi prabhāvaḥ pāpanāśanaḥ| cyavaneśvaradevasya śṛṇu khaṁḍeśvaraṁ śive

हे देवी! तुम्हें च्यवनेश्वर देव का यह पापनाशक प्रभाव बताया गया; अब हे शिवे! खंडेश्वर के विषय में सुनो।

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