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अवन्ती खण्ड · अध्याय 100

रामेश्वर की महिमा

अध्याय 99अध्याय-सूचीअध्याय 101

श्लोक 1 (skanda.5.100.1)

श्रीहर उवाच। एकोनत्रिंशतं विद्धि देवं रामेश्वरं प्रिये। यस्य दर्शनमात्रेण मुच्यते ब्रह्महत्यया

śrīhara uvāca| ekonatriṁśataṁ viddhi devaṁ rāmeśvaraṁ priye| yasya darśanamātreṇa mucyate brahmahatyayā

श्री हर ने कहा — हे प्रिये! उनतीसवें देव रामेश्वर को जानो, जिनके दर्शनमात्र से मनुष्य ब्रह्महत्या से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 2 (skanda.5.100.2)

पुरा त्रेतायुगे देवि रामः शस्त्रभृतां वरः। शूरः सर्वगुणोपेतः पितृभक्तो बभूव ह

purā tretāyuge devi rāmaḥ śastrabhṛtāṁ varaḥ| śūraḥ sarvaguṇopetaḥ pitṛbhakto babhūva ha

पूर्वकाल में त्रेतायुग में, हे देवी! शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ राम शूरवीर, सर्वगुणसंपन्न तथा पितृभक्त हुए।

श्लोक 3 (skanda.5.100.3)

रेणुकागर्भसंभूतः स्वयं रामो बभूव ह। विष्णुरेवावतीर्णोऽसौ भृगोः शापात्सुदुस्तरात्

reṇukāgarbhasaṁbhūtaḥ svayaṁ rāmo babhūva ha| viṣṇurevāvatīrṇo'sau bhṛgoḥ śāpātsudustarāt

रेणुका के गर्भ से उत्पन्न स्वयं राम हुए; वे भृगु के अत्यंत दुस्तर शाप के कारण साक्षात् विष्णु के अवतार थे।

श्लोक 4 (skanda.5.100.4)

स कदाचिन्नियुक्तोऽसौ मुनिना जमदग्निना। शिरश्छिन्धीत्युवाचेदं मातुस्ते विपुलं सुत

sa kadācinniyukto'sau muninā jamadagninā| śiraśchindhītyuvācedaṁ mātuste vipulaṁ suta

एक बार मुनि जमदग्नि ने उन्हें आज्ञा देकर कहा — 'हे महाबली पुत्र! अपनी माता का सिर काट डालो।'

श्लोक 5 (skanda.5.100.5)

स पितुर्वचनं श्रुत्वा भ्रातॄणां मातुरेव च। शिरांसि चिच्छिदे रामो जमदग्निर्वरं ददौ

sa piturvacanaṁ śrutvā bhrātṝṇāṁ mātureva ca| śirāṁsi cicchide rāmo jamadagnirvaraṁ dadau

पिता की तथा भाइयों और माता की भी आज्ञा सुनकर राम ने उनके सिर काट डाले; तब जमदग्नि ने उन्हें वर दिया।

श्लोक 6 (skanda.5.100.6)

सर्वेषां पृथिवीशानां त्वमजेयो भविष्यसि। सर्वक्षयकरो भावी न चिरादेव भार्गव

sarveṣāṁ pṛthivīśānāṁ tvamajeyo bhaviṣyasi| sarvakṣayakaro bhāvī na cirādeva bhārgava

'तुम समस्त पृथ्वीपतियों के लिए अजेय होगे, तथा हे भार्गव! शीघ्र ही समस्त क्षत्रियों का विनाश करने वाले बनोगे।'

श्लोक 7 (skanda.5.100.7)

गृहाण परशुं पुत्र वह्निज्वालोद्भवं दृढम्। अनेन शितशस्त्रेण ततः ख्यातो भवि ष्यति

gṛhāṇa paraśuṁ putra vahnijvālodbhavaṁ dṛḍham| anena śitaśastreṇa tataḥ khyāto bhavi ṣyati

'हे पुत्र! अग्नि की ज्वाला से उत्पन्न इस दृढ़ फरसे को ग्रहण करो; इसी तीक्ष्ण शस्त्र से तुम विख्यात होओगे।'

श्लोक 8 (skanda.5.100.8)

अथ केनापि कालेन कार्त्तवीर्यार्जुनो नृपः। हैहयानां कुले जातः सहस्रबाहुविश्रुतः

atha kenāpi kālena kārttavīryārjuno nṛpaḥ| haihayānāṁ kule jātaḥ sahasrabāhuviśrutaḥ

तत्पश्चात् किसी समय हैहयवंश में उत्पन्न, सहस्रबाहु के नाम से विख्यात कार्तवीर्यार्जुन नामक राजा हुआ।

श्लोक 9 (skanda.5.100.9)

जघान जमदग्निं तु कामधेनुकृते कुधीः। पितरं निहतं दृष्ट्वा रामः कुद्धोऽब्रवीदिदम्

jaghāna jamadagniṁ tu kāmadhenukṛte kudhīḥ| pitaraṁ nihataṁ dṛṣṭvā rāmaḥ kuddho'bravīdidam

उस दुर्बुद्धि ने कामधेनु के लिए जमदग्नि का वध कर दिया; पिता को मारा गया देखकर राम क्रुद्ध होकर बोले —

श्लोक 10 (skanda.5.100.10)

अथ पश्यंतु मे वीर्यं त्रयो लोकाः सनातनम्। स च पश्यतु दुर्बुद्धिर्ब्रह्महा कृतवीर्यजः

atha paśyaṁtu me vīryaṁ trayo lokāḥ sanātanam| sa ca paśyatu durbuddhirbrahmahā kṛtavīryajaḥ

'अब तीनों सनातन लोक मेरा पराक्रम देखें, तथा वह दुर्बुद्धि कृतवीर्यपुत्र भी देख ले।'

श्लोक 11 (skanda.5.100.11)

मत्पिता निहतो येन सत्कर्मनिरतः सदा। तस्य बाहुसहस्रं तु छेत्स्यामीह न संशयः

matpitā nihato yena satkarmanirataḥ sadā| tasya bāhusahasraṁ tu chetsyāmīha na saṁśayaḥ

'जिसने सदा सत्कर्मरत मेरे पिता को मारा, उसकी सहस्र भुजाओं को मैं निश्चय ही यहीं काट डालूँगा।'

श्लोक 12 (skanda.5.100.12)

इत्युक्त्वा क्रोधरक्ताक्षः कार्त्तवी र्यार्जुनं भुवि। धर्षयित्वा यथाकामं क्रोशमानं पुनःपुनः

ityuktvā krodharaktākṣaḥ kārttavī ryārjunaṁ bhuvi| dharṣayitvā yathākāmaṁ krośamānaṁ punaḥpunaḥ

ऐसा कहकर, क्रोध से लाल नेत्रों वाले राम ने कार्तवीर्यार्जुन को भूमि पर यथेच्छ पराभूत कर, बार-बार चीत्कार करते हुए,

श्लोक 13 (skanda.5.100.13)

कृत्स्नं बाहुसहस्रं च चिच्छेद भृगुनंदनः। परश्वधेन तीक्ष्णेन ज्ञातिभिः सहितं तदा

kṛtsnaṁ bāhusahasraṁ ca ciccheda bhṛgunaṁdanaḥ| paraśvadhena tīkṣṇena jñātibhiḥ sahitaṁ tadā

भृगुनंदन ने तीक्ष्ण फरसे से उसकी संपूर्ण सहस्र भुजाओं को उसके कुटुंबियों सहित काट डाला।

श्लोक 14 (skanda.5.100.14)

रथस्थं पातयामास जघान नृपतिं प्रिये। त्रिःसप्तकृत्वः पृथिवी तेन निःक्षत्रिया कृता

rathasthaṁ pātayāmāsa jaghāna nṛpatiṁ priye| triḥsaptakṛtvaḥ pṛthivī tena niḥkṣatriyā kṛtā

हे प्रिये! उन्होंने रथस्थ राजा को गिराकर उसका वध कर दिया; और उनके द्वारा पृथ्वी इक्कीस बार क्षत्रियविहीन की गई।

श्लोक 15 (skanda.5.100.15)

कृत्वा निःक्षत्रियां चैव भार्गवः स महाबलः। सर्वपापविनाशाय वाजिमेधेन चेष्टवान्

kṛtvā niḥkṣatriyāṁ caiva bhārgavaḥ sa mahābalaḥ| sarvapāpavināśāya vājimedhena ceṣṭavān

पृथ्वी को क्षत्रियविहीन करके उस महाबली भार्गव ने समस्त पापों के नाश हेतु अश्वमेध यज्ञ किया।

श्लोक 16 (skanda.5.100.16)

तस्मिन्यज्ञे महादाने दक्षिणां भृगुनंदनः। मारीचाय ददौ प्रीतः कश्यपाय वसुन्धराम्

tasminyajñe mahādāne dakṣiṇāṁ bhṛgunaṁdanaḥ| mārīcāya dadau prītaḥ kaśyapāya vasundharām

उस महादान वाले यज्ञ में भृगुनंदन ने प्रसन्न होकर दक्षिणा स्वरूप कश्यप के पुत्र मारीच को पृथ्वी अर्पित की।

श्लोक 17 (skanda.5.100.17)

वारुणांस्तुरगाञ्छुभ्रान्रथं च रथिनां वरः। हिरण्यमक्षयं धेनूर्गजेंद्राश्च महामतिः

vāruṇāṁsturagāñchubhrānrathaṁ ca rathināṁ varaḥ| hiraṇyamakṣayaṁ dhenūrgajeṁdrāśca mahāmatiḥ

उस महामति, रथियों में श्रेष्ठ ने वरुण के श्वेत अश्व, रथ, अक्षय स्वर्ण, गौएँ तथा गजराज भी अर्पित किए।

श्लोक 18 (skanda.5.100.18)

तदा तस्मिन्महायज्ञे वाजिमेधे महायशाः। तथापि न गता हत्या ह्यनेकप्राणिसंभवा

tadā tasminmahāyajñe vājimedhe mahāyaśāḥ| tathāpi na gatā hatyā hyanekaprāṇisaṁbhavā

हे महायशस्वी! उस महायज्ञ अश्वमेध में भी, अनेक प्राणियों के वध से उत्पन्न वह हत्या दूर न हुई।

श्लोक 19 (skanda.5.100.19)

एवं किल पुराणेषु सर्वागमभिदादिषु। विश्वस्तघातिनां चैव निष्कृतिः श्रूयते यथा

evaṁ kila purāṇeṣu sarvāgamabhidādiṣu| viśvastaghātināṁ caiva niṣkṛtiḥ śrūyate yathā

इस प्रकार पुराणों में तथा समस्त शास्त्रों में सुना जाता है कि विश्वासघातियों के लिए भी प्रायश्चित्त बताया गया है।

श्लोक 20 (skanda.5.100.20)

अश्वमेधेन यज्ञेन ब्रह्महत्या विनश्यति। अथवा द्वादशाब्देन यद्येकाऽऽस्या कृता भुवि

aśvamedhena yajñena brahmahatyā vinaśyati| athavā dvādaśābdena yadyekā''syā kṛtā bhuvi

अश्वमेध यज्ञ से ब्रह्महत्या नष्ट हो जाती है, अथवा यदि पृथ्वी पर एक ही हत्या की गई हो तो बारह वर्ष के प्रायश्चित्त से।

श्लोक 21 (skanda.5.100.21)

मया पुनर्नृशंसेन बहवः प्राणिनो हताः। विश्वस्ताश्च प्रमत्ताश्च गर्भस्थाश्च पुनःपुनः

mayā punarnṛśaṁsena bahavaḥ prāṇino hatāḥ| viśvastāśca pramattāśca garbhasthāśca punaḥpunaḥ

'किंतु क्रूर मैंने तो अनेक प्राणियों का बार-बार वध किया है — विश्वासी, प्रमादी तथा गर्भस्थ जीवों का भी।'

श्लोक 22 (skanda.5.100.22)

स्त्रियो वृद्धाश्च बालाश्च माता चैव विशेषतः। इति दुःखान्वितो रामो विषादं परमं गतः

striyo vṛddhāśca bālāśca mātā caiva viśeṣataḥ| iti duḥkhānvito rāmo viṣādaṁ paramaṁ gataḥ

'स्त्रियाँ, वृद्ध, बालक तथा विशेषरूप से मेरी अपनी माता भी।' इस प्रकार दुःखयुक्त राम अत्यंत विषाद को प्राप्त हुए।

श्लोक 23 (skanda.5.100.23)

चिंतयित्वा मुहूर्तं तु गतो रैवतकं गिरिम्। तथा तपो ऽतपद्धोरं बहून्वर्षगणान्प्रिये

ciṁtayitvā muhūrtaṁ tu gato raivatakaṁ girim| tathā tapo 'tapaddhoraṁ bahūnvarṣagaṇānpriye

कुछ क्षण विचार कर वे रैवतक पर्वत पर गए, और हे प्रिये! वहाँ अनेक वर्षों तक घोर तप किया।

श्लोक 24 (skanda.5.100.24)

तथापि न गता हत्या ह्यनेकप्राणिसंभवा। अथ रामो जगामाथ महेन्द्रे मलये तथा

tathāpi na gatā hatyā hyanekaprāṇisaṁbhavā| atha rāmo jagāmātha mahendre malaye tathā

फिर भी अनेक प्राणियों के वध से उत्पन्न वह हत्या दूर न हुई; तब राम महेंद्र पर्वत तथा मलय पर्वत को गए।

श्लोक 25 (skanda.5.100.25)

सह्ये हिमालये रम्ये पुण्ये बदरिकाश्रमे। चरित्वा पर्वतान्सर्वान्स्नानार्थं नर्मदां ययौ

sahye himālaye ramye puṇye badarikāśrame| caritvā parvatānsarvānsnānārthaṁ narmadāṁ yayau

सह्य पर्वत, रम्य हिमालय, तथा पवित्र बदरिकाश्रम — सभी पर्वतों में विचरण कर वे स्नान हेतु नर्मदा नदी गए।

श्लोक 26 (skanda.5.100.26)

यमुनां चंद्रभागां च गंगां त्रिपथगामिनीम्। इरावतीं वितस्तां च परां चर्मण्वतीं शुभाम्

yamunāṁ caṁdrabhāgāṁ ca gaṁgāṁ tripathagāminīm| irāvatīṁ vitastāṁ ca parāṁ carmaṇvatīṁ śubhām

यमुना, चंद्रभागा, त्रिपथगामिनी गंगा, इरावती, वितस्ता तथा दूरस्थ पवित्र चर्मण्वती में भी उन्होंने स्नान किया।

श्लोक 27 (skanda.5.100.27)

विशालां कपिलां दुर्गां गंभीरां गोमतीं शिवाम्। गोदावरीं दशार्णां च पुण्यां भीमरथीं तथा

viśālāṁ kapilāṁ durgāṁ gaṁbhīrāṁ gomatīṁ śivām| godāvarīṁ daśārṇāṁ ca puṇyāṁ bhīmarathīṁ tathā

विशाला, कपिला, दुर्गा, गंभीर गोमती, गोदावरी, दशार्णा तथा पवित्र भीमरथी में भी।

श्लोक 28 (skanda.5.100.28)

गयां चैव कुरुक्षेत्रं नैमिषं पुष्करं तथा। अट्टहासं प्रभासं च केदारममरेश्वरम्

gayāṁ caiva kurukṣetraṁ naimiṣaṁ puṣkaraṁ tathā| aṭṭahāsaṁ prabhāsaṁ ca kedāramamareśvaram

गया, कुरुक्षेत्र, नैमिष, पुष्कर, अट्टहास, प्रभास, केदार तथा अमरेश्वर तीर्थों में भी वे गए।

श्लोक 29 (skanda.5.100.29)

कृतयात्रोऽपि दुःखार्त्तश्चिंतयामास भार्गवः। न नूनं तीर्थमाहात्म्यं दृश्यते भुवि सांप्रतम्

kṛtayātro'pi duḥkhārttaściṁtayāmāsa bhārgavaḥ| na nūnaṁ tīrthamāhātmyaṁ dṛśyate bhuvi sāṁpratam

यात्रा पूर्ण करने पर भी दुःखार्त भार्गव ने विचार किया — 'निश्चय ही अब तीर्थों का माहात्म्य पृथ्वी पर दिखाई नहीं देता।'

श्लोक 30 (skanda.5.100.30)

न गता ब्रह्महत्या मे कृतो धर्मो निरर्थकः। मिथ्या तत्कथ्यते शास्त्रे तीर्थदानादिभिः शुभैः। यदि स्यात्सत्यमेतच्च नष्टं जातं कथं मम

na gatā brahmahatyā me kṛto dharmo nirarthakaḥ| mithyā tatkathyate śāstre tīrthadānādibhiḥ śubhaiḥ| yadi syātsatyametacca naṣṭaṁ jātaṁ kathaṁ mama

'मेरी ब्रह्महत्या दूर नहीं हुई, मेरा किया हुआ धर्म व्यर्थ गया। शास्त्रों में तीर्थ, दान आदि शुभ कर्मों के विषय में जो कहा गया है, वह मिथ्या प्रतीत होता है — यदि यह सत्य होता तो मेरा पाप कैसे नष्ट न होता?'

श्लोक 31 (skanda.5.100.31)

एतस्मिन्नेव काले तु नारदो मुनिपुंगवः। आजगाम तमुद्देशं यत्र रामो व्यवस्थितः

etasminneva kāle tu nārado munipuṁgavaḥ| ājagāma tamuddeśaṁ yatra rāmo vyavasthitaḥ

उसी समय मुनिश्रेष्ठ नारद उस स्थान पर आए, जहाँ राम स्थित थे।

श्लोक 32 (skanda.5.100.32)

विषण्णवदनो दीनश्चिंतयानः पुनःपुनः। दृष्ट्वा तथाविधो रामः प्रत्युवाचाथ नारदम्

viṣaṇṇavadano dīnaściṁtayānaḥ punaḥpunaḥ| dṛṣṭvā tathāvidho rāmaḥ pratyuvācātha nāradam

उन्हें विषण्ण मुख वाला, दीन तथा बार-बार चिंतामग्न देखकर राम ने नारद को इस प्रकार उत्तर दिया।

श्लोक 33 (skanda.5.100.33)

भोभो नारद देवर्षे शृणु मे परमं वचः। जननी निहता पूर्वं पितुर्वाक्याहिजोत्तम

bhobho nārada devarṣe śṛṇu me paramaṁ vacaḥ| jananī nihatā pūrvaṁ piturvākyāhijottama

'हे देवर्षि नारद! मेरी परम बात सुनिए — पूर्वकाल में पिता के वचन से मैंने अपनी ही माता का वध किया, हे द्विजोत्तम!'

श्लोक 34 (skanda.5.100.34)

पितुः पराभवाद्भूमौ भृमिपाला मया हताः। गर्भा विदारिताः स्त्रीणां बाला वृद्धाश्च योषितः

pituḥ parābhavādbhūmau bhṛmipālā mayā hatāḥ| garbhā vidāritāḥ strīṇāṁ bālā vṛddhāśca yoṣitaḥ

'पिता के पराभव के कारण मैंने पृथ्वी पर राजाओं का वध किया; स्त्रियों के गर्भ विदीर्ण किए, बालक, वृद्ध तथा स्त्रियाँ भी मारीं।'

श्लोक 35 (skanda.5.100.35)

निरंतरा हता लोका विशोकेनादयालुना। पश्चाद्धृणा समुत्पन्ना परलोकं ममेक्षतः

niraṁtarā hatā lokā viśokenādayālunā| paścāddhṛṇā samutpannā paralokaṁ mamekṣataḥ

'निर्दयतापूर्वक निरंतर मैंने प्राणियों को शोकरहित होकर मारा; किंतु पश्चात् परलोक की ओर देखते हुए मुझमें ग्लानि उत्पन्न हुई।'

श्लोक 36 (skanda.5.100.36)

यज्ञः कृतोऽश्वमेधश्च दत्तं दानमनेकधा। स्नातोहं सर्वतीर्थेषु सर्वप्रस्रवणेषु च

yajñaḥ kṛto'śvamedhaśca dattaṁ dānamanekadhā| snātohaṁ sarvatīrtheṣu sarvaprasravaṇeṣu ca

'मैंने अश्वमेध यज्ञ किया, अनेक प्रकार से दान दिया, तथा समस्त तीर्थों और समस्त झरनों में स्नान किया।'

श्लोक 37 (skanda.5.100.37)

पर्वतेषु तपस्तप्तं हुतं जप्तं निरंतरम्। ब्रह्महत्याविनाशार्थंं किं किं नात्र मया कृतम्

parvateṣu tapastaptaṁ hutaṁ japtaṁ niraṁtaram| brahmahatyāvināśārthaṁṁ kiṁ kiṁ nātra mayā kṛtam

'पर्वतों पर तप किया, हवन किया, निरंतर जप किया — ब्रह्महत्या के नाश हेतु मैंने क्या-क्या नहीं किया?'

श्लोक 38 (skanda.5.100.38)

परं नैव गता हत्या तस्मात्सर्वं निरर्थकम्

paraṁ naiva gatā hatyā tasmātsarvaṁ nirarthakam

'फिर भी वह हत्या दूर नहीं हुई; अतः यह सब व्यर्थ ही हुआ।'

श्लोक 39 (skanda.5.100.39)

इति तस्य वचः श्रुत्वा नारदो भगवानृषिः। प्रत्युवाच हितं सत्यं चिरं ध्यात्वा वचस्तदा। भोभो राम किमात्मानं न स्मरस्यधुना हरिम्

iti tasya vacaḥ śrutvā nārado bhagavānṛṣiḥ| pratyuvāca hitaṁ satyaṁ ciraṁ dhyātvā vacastadā| bhobho rāma kimātmānaṁ na smarasyadhunā harim

उसका यह वचन सुनकर भगवान् ऋषि नारद ने बहुत देर तक विचार कर हितकर सत्य वचन कहा — 'हे राम! तुम अब अपने आपको हरि क्यों नहीं स्मरण करते?'

श्लोक 40 (skanda.5.100.40)

त्वयैव कथितं पूर्वं ब्रह्महत्याविनाशनम्। महाकालवने क्षेत्रे क्षेत्राणामुत्तमं परम्। तस्मिन्क्षेत्रे महालिंगं ब्रह्महत्याविनाशनम्

tvayaiva kathitaṁ pūrvaṁ brahmahatyāvināśanam| mahākālavane kṣetre kṣetrāṇāmuttamaṁ param| tasminkṣetre mahāliṁgaṁ brahmahatyāvināśanam

'तुमने ही पूर्वकाल में ब्रह्महत्या के नाश का उपाय बताया था — महाकालवन क्षेत्र, जो समस्त क्षेत्रों में सर्वोत्तम है; उस क्षेत्र में एक महालिंग है, जो ब्रह्महत्या का नाश करने वाला है।'

श्लोक 41 (skanda.5.100.41)

जटेश्वरो महाभाग विद्यते सर्वसिद्धिदम्। कृतावतार राम त्वं तत्र गच्छाविलंबितम। नारदस्य वचः श्रुत्वा स्मृत्वा क्षेत्रमनुत्तमम्

jaṭeśvaro mahābhāga vidyate sarvasiddhidam| kṛtāvatāra rāma tvaṁ tatra gacchāvilaṁbitama| nāradasya vacaḥ śrutvā smṛtvā kṣetramanuttamam

'हे महाभाग! वहाँ जटेश्वर हैं, जो सर्वसिद्धि प्रदान करने वाले हैं। हे अवतार धारण करने वाले राम! वहाँ बिना विलंब किए जाओ।' नारद का वचन सुनकर तथा उस अनुपम क्षेत्र का स्मरण कर,

श्लोक 42 (skanda.5.100.42)

जगाम त्वरितं देवि महाकालवने ततः। लिंगमाराधयामास ततो हत्या गता क्षयम्। लिंगमध्यादहं देवि प्रसन्नो निर्गतस्तदा

jagāma tvaritaṁ devi mahākālavane tataḥ| liṁgamārādhayāmāsa tato hatyā gatā kṣayam| liṁgamadhyādahaṁ devi prasanno nirgatastadā

हे देवी! वे शीघ्र ही महाकालवन गए, और वहाँ लिंग की आराधना की; तब उनकी हत्या का पाप नष्ट हो गया। हे देवी! उसी लिंग के मध्य से मैं प्रसन्न होकर प्रकट हुआ।

श्लोक 43 (skanda.5.100.43)

जामदग्न्यो मया प्रोक्तः कांतकामं ददाम्यहम्। स प्रोवाच ततो रामो भक्तिनम्रात्मकंधरः

jāmadagnyo mayā proktaḥ kāṁtakāmaṁ dadāmyaham| sa provāca tato rāmo bhaktinamrātmakaṁdharaḥ

मैंने जमदग्निपुत्र से कहा — 'मैं तुम्हारी अभीष्ट कामना पूर्ण करूँगा।' तब भक्तिपूर्वक सिर झुकाए हुए राम ने कहा —

श्लोक 44 (skanda.5.100.44)

त्वत्पादपंकजे भूयाद्भक्तिर्मे विपुला सदा। वरमेतं प्रयच्छाद्य यदि तुष्टो महेश्वर

tvatpādapaṁkaje bhūyādbhaktirme vipulā sadā| varametaṁ prayacchādya yadi tuṣṭo maheśvara

'आपके चरणकमलों में मेरी भक्ति सदा प्रचुर बनी रहे; हे महेश्वर! यदि आप प्रसन्न हैं तो आज मुझे यही वर दीजिए।'

श्लोक 45 (skanda.5.100.45)

इत्युक्तोऽहं तदा तेन यथा तुष्टेन पार्वति। तस्मै दत्ता मयाभीष्टा वरा कीर्त्तिकरा स्थितिः

ityukto'haṁ tadā tena yathā tuṣṭena pārvati| tasmai dattā mayābhīṣṭā varā kīrttikarā sthitiḥ

हे पार्वती! उसकी इस प्रसन्नकारी बात से प्रसन्न होकर मैंने उसे यह अभीष्ट तथा कीर्तिदायक वरदान दिया।

श्लोक 46 (skanda.5.100.46)

अद्यप्रभृति ते नाम्ना देवः ख्यातो भविष्यति। तदा रामेश्वर इति त्रिषु लोकेषु गीयते

adyaprabhṛti te nāmnā devaḥ khyāto bhaviṣyati| tadā rāmeśvara iti triṣu lokeṣu gīyate

'आज से यह देव तुम्हारे ही नाम से विख्यात होगा' — तभी से यह 'रामेश्वर' नाम से तीनों लोकों में गाया जाता है।

श्लोक 47 (skanda.5.100.47)

भक्त्या ये पूजयिष्यंति देवं रामेश्वरं परम्। आजन्मप्रभवं पापं तेषां न३यति तत्क्षणात्

bhaktyā ye pūjayiṣyaṁti devaṁ rāmeśvaraṁ param| ājanmaprabhavaṁ pāpaṁ teṣāṁ na3yati tatkṣaṇāt

जो भी भक्तिपूर्वक इस परम देव रामेश्वर की पूजा करते हैं, उनका जन्मजन्मांतर का पाप उसी क्षण नष्ट हो जाता है।

श्लोक 48 (skanda.5.100.48)

स एव पुण्यवान्पूज्य इह लोके परत्र च। यः पश्यति नरो भक्त्या देवं रामेश्वरं शिवम्

sa eva puṇyavānpūjya iha loke paratra ca| yaḥ paśyati naro bhaktyā devaṁ rāmeśvaraṁ śivam

वही मनुष्य पुण्यवान् तथा इस लोक और परलोक में पूज्य है, जो भक्तिपूर्वक शिवरूप रामेश्वर देव का दर्शन करता है।

श्लोक 49 (skanda.5.100.49)

येऽनुमोदंति देवस्य दर्शनं यजनं तथा। तेऽपि पापविनिर्मुक्ताः प्रयांति मम मंदिरम्

ye'numodaṁti devasya darśanaṁ yajanaṁ tathā| te'pi pāpavinirmuktāḥ prayāṁti mama maṁdiram

जो लोग देव के दर्शन और पूजन का अनुमोदन करते हैं, वे भी पापमुक्त होकर मेरे मंदिर (धाम) को प्राप्त होते हैं।

श्लोक 50 (skanda.5.100.50)

यच्चापि पातकं घोरं ब्रह्महत्यासहस्रकम्। तत्पापं विलयं याति रामेश्वरसमर्चनात्

yaccāpi pātakaṁ ghoraṁ brahmahatyāsahasrakam| tatpāpaṁ vilayaṁ yāti rāmeśvarasamarcanāt

सहस्र ब्रह्महत्याओं के समान जो घोर पाप हो, वह भी रामेश्वर की पूजा से विलीन हो जाता है।

श्लोक 51 (skanda.5.100.51)

दुष्प्राप्यं यत्फलं विप्रैर्वाजपेयादिभिर्मखैः। प्राप्यते तत्सुखेनैव श्रीरामेश्वरदर्शनात्

duṣprāpyaṁ yatphalaṁ viprairvājapeyādibhirmakhaiḥ| prāpyate tatsukhenaiva śrīrāmeśvaradarśanāt

वाजपेय आदि यज्ञों से भी ब्राह्मणों के लिए जो फल दुष्प्राप्य है, वह श्रीरामेश्वर के दर्शनमात्र से सुखपूर्वक प्राप्त हो जाता है।

श्लोक 52 (skanda.5.100.52)

ये हताभिमुखाः शूरा गोविप्रार्थे रणाजिरे। गतिरभ्यधिका तेभ्यो दृष्ट्वा रामेश्वरं शिवम्

ye hatābhimukhāḥ śūrā goviprārthe raṇājire| gatirabhyadhikā tebhyo dṛṣṭvā rāmeśvaraṁ śivam

गौ और ब्राह्मणों के लिए युद्धभूमि में मृत्यु के सम्मुख खड़े जो शूरवीर हैं, उनसे भी उत्कृष्ट गति शिवरूप रामेश्वर के दर्शन से प्राप्त होती है।

श्लोक 53 (skanda.5.100.53)

जितास्तेन सदा लोका रामेणेव जगत्त्रयम्। दृष्टं येन सदा भक्त्या लिंगं रामेश्वरं शिवम्

jitāstena sadā lokā rāmeṇeva jagattrayam| dṛṣṭaṁ yena sadā bhaktyā liṁgaṁ rāmeśvaraṁ śivam

जिसने सदा भक्तिपूर्वक शिवरूप रामेश्वर लिंग का दर्शन किया, उसने मानो राम के समान ही तीनों लोकों को सदा के लिए जीत लिया।

श्लोक 54 (skanda.5.100.54)

एष ते कथितो देवि प्रभावः पापनाशनः। रामेश्वरस्य देवस्य शृणु त्वं च्यवनेश्वरम्

eṣa te kathito devi prabhāvaḥ pāpanāśanaḥ| rāmeśvarasya devasya śṛṇu tvaṁ cyavaneśvaram

हे देवी! तुम्हें रामेश्वर देव का यह पापनाशक प्रभाव बताया गया; अब च्यवनेश्वर के विषय में सुनो।

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