अवन्ती खण्ड · अध्याय 99
जटेश्वर की महिमा
श्लोक 1 (skanda.5.99.1)
श्रीदेवदेव उवाच। अष्टाविंशतिकं विद्धि विख्यातं च जटेश्वरम्। यस्य दर्शनमात्रेण मुक्तो भवति मानवः
śrīdevadeva uvāca| aṣṭāviṁśatikaṁ viddhi vikhyātaṁ ca jaṭeśvaram| yasya darśanamātreṇa mukto bhavati mānavaḥ
श्रीदेवदेव ने कहा — हे देवी! अट्ठाईसवें देव को विख्यात जटेश्वर जानो, जिनके दर्शनमात्र से मनुष्य मुक्त हो जाता है।
श्लोक 2 (skanda.5.99.2)
पुरा राथंतरे कल्पे वीरधन्वा महीपतिः। धर्मात्मा च यशस्वी च बभूव भुवि विश्रुतः
purā rāthaṁtare kalpe vīradhanvā mahīpatiḥ| dharmātmā ca yaśasvī ca babhūva bhuvi viśrutaḥ
पूर्वकाल में राथंतर कल्प में वीरधन्वा नामक धर्मात्मा तथा यशस्वी राजा पृथ्वी पर विख्यात हुए।
श्लोक 3 (skanda.5.99.3)
स कदाचिद्वनं गत्वा मृगहेतोर्वरानने। व्यापादयन्मृगगणान्धनुषा क्रोधविह्वलः
sa kadācidvanaṁ gatvā mṛgahetorvarānane| vyāpādayanmṛgagaṇāndhanuṣā krodhavihvalaḥ
हे वरानने! एक बार वे मृगों के लिए वन में गए और क्रोधाविष्ट होकर धनुष से मृगसमूहों का वध करने लगे।
श्लोक 4 (skanda.5.99.4)
जगाम तत्र यत्रासन्भ्रातरः पंच सुव्रताः। संवर्तस्य सुता देवि मृगरूपेण संस्थिताः
jagāma tatra yatrāsanbhrātaraḥ paṁca suvratāḥ| saṁvartasya sutā devi mṛgarūpeṇa saṁsthitāḥ
वे वहाँ पहुँचे जहाँ संवर्त के पाँच सुव्रत पुत्र, हे देवी! मृगरूप धारण किए हुए निवास करते थे।
श्लोक 5 (skanda.5.99.5)
ते कदाचिद्वने पंच दृष्ट्वा हरिणपोतकान्। श्वसतो जातमात्रांश्च कौतूहलसमन्विताः
te kadācidvane paṁca dṛṣṭvā hariṇapotakān| śvasato jātamātrāṁśca kautūhalasamanvitāḥ
एक बार उन पाँचों ने वन में नवजात हरिण-शावकों को, जो अभी-अभी जन्मे थे और साँस ले रहे थे, कौतूहलवश देखा।
श्लोक 6 (skanda.5.99.6)
एकैकं जगृहुस्तत्र मृतास्ते त्वतिदुःखिताः। ततः सर्वे च ते पंच ययुर्वै पितुरंतिकम्
ekaikaṁ jagṛhustatra mṛtāste tvatiduḥkhitāḥ| tataḥ sarve ca te paṁca yayurvai pituraṁtikam
प्रत्येक ने एक-एक को उठा लिया; वे मर गए, और वे अत्यंत दुःखी हुए। तब वे सभी पाँचों अपने पिता के पास गए।
श्लोक 7 (skanda.5.99.7)
प्रायश्चित्तं समीहंतः संवर्त्तं सांसदैर्वृतम्। ऊचुस्ते वचनं चेदं मृगहिंसाश्रितं तदा
prāyaścittaṁ samīhaṁtaḥ saṁvarttaṁ sāṁsadairvṛtam| ūcuste vacanaṁ cedaṁ mṛgahiṁsāśritaṁ tadā
सभासदों से घिरे संवर्त के पास प्रायश्चित्त चाहते हुए उन्होंने मृगहिंसा का यह वृत्तांत कहा।
श्लोक 8 (skanda.5.99.8)
जातमात्रा मृगाः पंच अस्माभिर्निहताः प्रभो। अकामतस्ततोऽस्माकं प्रायश्चित्तं विधीयताम्
jātamātrā mṛgāḥ paṁca asmābhirnihatāḥ prabho| akāmatastato'smākaṁ prāyaścittaṁ vidhīyatām
'हे प्रभो! हमने अनजाने में पाँच नवजात मृगों का वध कर दिया है; अतः हमारे लिए प्रायश्चित्त विहित कीजिए।'
श्लोक 9 (skanda.5.99.9)
ऊचे स शुद्धिमाप्नोति प्रायश्चित्ते कृते सति। अनधीत्य धर्मशास्त्रं प्रायश्चित्तं ददाति यः। प्रायश्चित्ती भवेत्पूतः किल्विषं दातरि व्रजेत्
ūce sa śuddhimāpnoti prāyaścitte kṛte sati| anadhītya dharmaśāstraṁ prāyaścittaṁ dadāti yaḥ| prāyaścittī bhavetpūtaḥ kilviṣaṁ dātari vrajet
संवर्त ने कहा — 'प्रायश्चित्त किए जाने पर शुद्धि प्राप्त होती है। किंतु जो धर्मशास्त्र का अध्ययन किए बिना ही प्रायश्चित्त बताता है, वह करने वाला तो शुद्ध हो जाता है, परंतु पाप बताने वाले को लग जाता है।'
श्लोक 10 (skanda.5.99.10)
धर्म शास्त्रसमारूढा वेदखड्गधरा द्विजाः। क्रीडार्थमपि यद्ब्रूयुः स धर्मः परमः स्मृतः
dharma śāstrasamārūḍhā vedakhaḍgadharā dvijāḥ| krīḍārthamapi yadbrūyuḥ sa dharmaḥ paramaḥ smṛtaḥ
'धर्मशास्त्र में पारंगत, वेदरूपी खड्ग धारण करने वाले द्विज जो कुछ भी कहें, चाहे क्रीड़ा के लिए ही क्यों न हो, वही परम धर्म माना जाता है।'
श्लोक 11 (skanda.5.99.11)
ब्रह्मच्छिद्रं जपच्छिद्रं यच्छिद्रं यज्ञकर्मणि। अच्छिद्रं जायते सर्वं ब्राह्मणैरुपपादितम्
brahmacchidraṁ japacchidraṁ yacchidraṁ yajñakarmaṇi| acchidraṁ jāyate sarvaṁ brāhmaṇairupapāditam
'ब्रह्म-पाठ में, जप में अथवा यज्ञकर्म में जो त्रुटि हो, वह सब ब्राह्मणों द्वारा प्रमाणित होने पर निर्दोष हो जाती है।'
श्लोक 12 (skanda.5.99.12)
अच्छिद्रमिति यद्वाक्यं वदंति क्षितिदेवताः। प्रणश्यत्यखिलं पापमग्निष्टोमफलं भवेत्
acchidramiti yadvākyaṁ vadaṁti kṣitidevatāḥ| praṇaśyatyakhilaṁ pāpamagniṣṭomaphalaṁ bhavet
'यह निर्दोष है — पृथ्वी के देवता (ब्राह्मण) जो ऐसा वचन कहते हैं, उससे समस्त पाप नष्ट हो जाता है और अग्निष्टोम यज्ञ का फल प्राप्त होता है।'
श्लोक 13 (skanda.5.99.13)
इत्येवं वदति श्रेष्ठे संवर्ते द्विजसत्तमे। समागताश्च मुनयो भृग्वत्र्यंगिरसादयः
ityevaṁ vadati śreṣṭhe saṁvarte dvijasattame| samāgatāśca munayo bhṛgvatryaṁgirasādayaḥ
द्विजश्रेष्ठ संवर्त के ऐसा कहते समय भृगु, अत्रि, अंगिरा आदि मुनि वहाँ एकत्र हो गए।
श्लोक 14 (skanda.5.99.14)
तेषामर्थे यथावृत्तं कथयामासुरेव ते। संवर्तस्य सुता दीना भक्तिनम्राः पुनःपुनः
teṣāmarthe yathāvṛttaṁ kathayāmāsureva te| saṁvartasya sutā dīnā bhaktinamrāḥ punaḥpunaḥ
उनके समक्ष संवर्त के दीन पुत्रों ने बार-बार भक्तिपूर्वक नमन करते हुए यथावृत्त सब कह सुनाया।
श्लोक 15 (skanda.5.99.15)
तेऽप्यूचुर्धर्मशास्त्राणि विहितानि यथार्थतः। प्रायश्चित्तं यथोद्दिष्टं देशकालविभागतः
te'pyūcurdharmaśāstrāṇi vihitāni yathārthataḥ| prāyaścittaṁ yathoddiṣṭaṁ deśakālavibhāgataḥ
उन्होंने भी देश-काल के विभाजन के अनुसार यथार्थ रूप से विहित धर्मशास्त्रों के अनुसार प्रायश्चित्त बताया।
श्लोक 16 (skanda.5.99.16)
अशीतिर्यस्य वर्षाणि बालो वाप्यूनषोडशः। प्रायश्चित्तार्द्धमर्हंति स्त्रियो वै व्याधितस्य च
aśītiryasya varṣāṇi bālo vāpyūnaṣoḍaśaḥ| prāyaścittārddhamarhaṁti striyo vai vyādhitasya ca
'जो अस्सी वर्ष का हो, अथवा सोलह वर्ष से कम आयु का बालक हो, अथवा स्त्री हो, अथवा रोगी हो — वे आधे प्रायश्चित्त के अधिकारी हैं।'
श्लोक 17 (skanda.5.99.17)
देशं कालं वयः शक्तिं पापं चावेक्ष्य यत्नतः। प्रायश्चित्तं प्रकल्प्यं स्यादिति धर्मो व्यवस्थितः
deśaṁ kālaṁ vayaḥ śaktiṁ pāpaṁ cāvekṣya yatnataḥ| prāyaścittaṁ prakalpyaṁ syāditi dharmo vyavasthitaḥ
'देश, काल, आयु, शक्ति तथा पाप की गंभीरता को यत्नपूर्वक देखकर प्रायश्चित्त निर्धारित करना चाहिए — ऐसी धर्म-व्यवस्था है।'
श्लोक 18 (skanda.5.99.18)
इदानीं मृगचर्माणि परिधाय धृतव्रताः। चरध्वं पंच वर्षाणि ततः शुद्धा भविष्यथ ।
idānīṁ mṛgacarmāṇi paridhāya dhṛtavratāḥ| caradhvaṁ paṁca varṣāṇi tataḥ śuddhā bhaviṣyatha |
'अब मृगचर्म धारण करके, व्रतधारी होकर, पाँच वर्षों तक विचरण करो; तत्पश्चात् तुम शुद्ध हो जाओगे।'
श्लोक 19 (skanda.5.99.19)
एवमुक्तास्तु ते बाला मृगधर्मोपजीविनः। वनं विविशुरव्यग्रा ध्यायंतो ब्रह्म शाश्वतम्
evamuktāstu te bālā mṛgadharmopajīvinaḥ| vanaṁ viviśuravyagrā dhyāyaṁto brahma śāśvatam
ऐसा कहे जाने पर वे बालक, मृगधर्म का पालन करते हुए, अव्यग्र होकर तथा सनातन ब्रह्म का ध्यान करते हुए वन में प्रविष्ट हुए।
श्लोक 20 (skanda.5.99.20)
ततो वर्षे ह्यतिक्रांते वीरधन्वा महीपतिः। तत्राजगाम यस्मिंस्ते चरंति मृगरूपिणः
tato varṣe hyatikrāṁte vīradhanvā mahīpatiḥ| tatrājagāma yasmiṁste caraṁti mṛgarūpiṇaḥ
तब एक वर्ष बीत जाने पर राजा वीरधन्वा उसी स्थान पर आए जहाँ वे मृगरूपधारी विचरण कर रहे थे।
श्लोक 21 (skanda.5.99.21)
ते चाप्येकतरोर्मूले मृगधर्मोपजीविनः। जपंतः संस्थितास्ते हि राज्ञा दृष्टा मृगा इति
te cāpyekatarormūle mṛgadharmopajīvinaḥ| japaṁtaḥ saṁsthitāste hi rājñā dṛṣṭā mṛgā iti
वे भी मृगधर्म का पालन करते हुए एक वृक्ष के मूल में जप करते हुए बैठे थे; राजा ने उन्हें देखकर मृग समझ लिया।
श्लोक 22 (skanda.5.99.22)
मत्वा विद्धास्तु नाःराचैर्मृतास्ते ब्रह्मवादिनः। तान्दृष्ट्वा च मृतान्राजा ब्राह्मणान्संशितव्रतान्। भयेन वेपमानस्तु देवराताश्रमं ययौ
matvā viddhāstu nāḥrācairmṛtāste brahmavādinaḥ| tāndṛṣṭvā ca mṛtānrājā brāhmaṇānsaṁśitavratān| bhayena vepamānastu devarātāśramaṁ yayau
ऐसा समझकर उन्होंने बाणों से उन्हें बींध दिया, और वे ब्रह्मवादी वहीं मर गए। उन शुद्ध व्रतधारी ब्राह्मणों को मृत देखकर राजा भय से काँपते हुए देवरात के आश्रम को गए।
श्लोक 23 (skanda.5.99.23)
तत्रापृच्छद्ब्रह्मवध्या मम जाता महामुने। आमूलांतं वधांतस्य कथयित्वा नराधिपः
tatrāpṛcchadbrahmavadhyā mama jātā mahāmune| āmūlāṁtaṁ vadhāṁtasya kathayitvā narādhipaḥ
वहाँ उन्होंने पूछा — 'हे महामुने! मुझे ब्रह्महत्या लग गई है।' वध से लेकर अंत तक की सारी घटना कहकर वह राजा...
श्लोक 24 (skanda.5.99.24)
भृशं शोकपरीतात्मा रुरोद भृशदुःखितः। स ऋषिर्देवकल्पस्तु रुदंतं नृपसत्तमम्
bhṛśaṁ śokaparītātmā ruroda bhṛśaduḥkhitaḥ| sa ṛṣirdevakalpastu rudaṁtaṁ nṛpasattamam
...अत्यंत शोकाकुल होकर, अत्यंत दुःखी होकर रोने लगा। देवतुल्य वह ऋषि, उस श्रेष्ठ राजा को रोते हुए देखकर...
श्लोक 25 (skanda.5.99.25)
उवाच मा भैर्नृपते अपनेष्यामि पातकम्। पाताले सुतलाख्ये तु निमज्जंती यथा धरा
uvāca mā bhairnṛpate apaneṣyāmi pātakam| pātāle sutalākhye tu nimajjaṁtī yathā dharā
...बोले — 'हे नृपते! भय मत करो, मैं तुम्हारा पाप दूर करूँगा। जैसे सुतल नामक पाताल में डूबती हुई पृथ्वी को...'
श्लोक 26 (skanda.5.99.26)
उद्धृता देवदेवेन विष्णुना क्रोडमूर्त्तिना। तद्वद्भवंतं राजेंद्र ब्रह्महत्यापरिप्लुतम्। उद्धरिष्यति देवोऽसौ स्वयमेव जनार्दनः
uddhṛtā devadevena viṣṇunā kroḍamūrttinā| tadvadbhavaṁtaṁ rājeṁdra brahmahatyāpariplutam| uddhariṣyati devo'sau svayameva janārdanaḥ
'...देवदेव विष्णु ने वराह-रूप धारण कर उद्धार किया था, वैसे ही, हे राजेंद्र! ब्रह्महत्या में डूबे हुए तुम्हारा भी वह देव जनार्दन स्वयं उद्धार करेंगे।'
श्लोक 27 (skanda.5.99.27)
एवमुक्तस्ततो राजा दुरितो वाक्यमब्रवीत
evamuktastato rājā durito vākyamabravīta
[अनुवादक टिप्पणी: मूल संस्कृत पाठ में यह श्लोक अपूर्ण है — केवल एक पंक्ति प्राप्त है, राजा के वास्तविक वचन मूल स्रोत में उपलब्ध नहीं हैं।] ऐसा कहे जाने पर राजा, पापाकुल होकर, यह वचन बोला — (आगे का अंश मूल पाठ में अनुपलब्ध है)।
श्लोक 28 (skanda.5.99.28)
किमनेन द्विजेनैव निष्प्रभेण दुरात्मना। उद्धर्तुं नैव शक्नोति स्वयमेव द्विजाधमः
kimanena dvijenaiva niṣprabheṇa durātmanā| uddhartuṁ naiva śaknoti svayameva dvijādhamaḥ
'इस निष्प्रभ, दुरात्मा द्विज से क्या लाभ? यह अधम द्विज तो स्वयं को भी उबार नहीं सकता!'
श्लोक 29 (skanda.5.99.29)
इत्युक्त्वा '? खङ्गेनैव जघान तम्। मृतं दृष्ट्वा द्विजं राजा क्रोधेन कलुषीकृतः
ityuktvā '? khaṅgenaiva jaghāna tam| mṛtaṁ dṛṣṭvā dvijaṁ rājā krodhena kaluṣīkṛtaḥ
[अनुवादक टिप्पणी: मूल संस्कृत पाठ में यहाँ स्वयं स्रोत में ही '?' चिह्न से एक त्रुटिपूर्ण/अस्पष्ट अंश अंकित है।] ऐसा कहकर — (मूल में यह अंश त्रुटिपूर्ण/अप्राप्य है) — उसने खड्ग से उस द्विज का वध कर दिया। द्विज को मृत देखकर राजा क्रोध से कलुषित हो गया...
श्लोक 30 (skanda.5.99.30)
तस्मिन्नेव वने देवि पापसंघेन मोहितः। जघान कपिलां दोग्ध्रीं सवत्सां गालवस्य च
tasminneva vane devi pāpasaṁghena mohitaḥ| jaghāna kapilāṁ dogdhrīṁ savatsāṁ gālavasya ca
...और उसी वन में, हे देवी! पापसमूह से मोहित होकर, उसने गालव मुनि की बछड़े सहित दूध देने वाली कपिला गाय का भी वध कर दिया।
श्लोक 31 (skanda.5.99.31)
क्षुधार्त्तश्च तृषार्त्तश्च बाल्यान्मोहाच्च साहसात्। क्रूरा बुद्धिः समभवज्जटीभूतं च पातकम्
kṣudhārttaśca tṛṣārttaśca bālyānmohācca sāhasāt| krūrā buddhiḥ samabhavajjaṭībhūtaṁ ca pātakam
क्षुधा और तृषा से पीड़ित, बाल्यावस्था के मोह तथा साहस के कारण उसकी बुद्धि क्रूर हो गई, और उसका पाप जटाओं के समान उलझा हुआ (संचित) हो गया।
श्लोक 32 (skanda.5.99.32)
जटीभूतेन पापेन बभ्राम गहने वने। स कदाचित्तुरंगेण हृतो दूरं महद्वनम्
jaṭībhūtena pāpena babhrāma gahane vane| sa kadācitturaṁgeṇa hṛto dūraṁ mahadvanam
उस जटीभूत पाप से भारग्रस्त होकर वह सघन वन में भटकता रहा; एक बार वह अपने घोड़े द्वारा दूर एक विशाल वन में ले जाया गया।
श्लोक 33 (skanda.5.99.33)
व्याघ्रसिंहगजाकीर्णं मृगशंबरसेवितम्। एकाकी तत्र राजासावश्वं मुक्त्वा तरोरधः
vyāghrasiṁhagajākīrṇaṁ mṛgaśaṁbarasevitam| ekākī tatra rājāsāvaśvaṁ muktvā taroradhaḥ
वह वन व्याघ्र, सिंह तथा गजों से व्याप्त था, मृग और सांभरों से सेवित था। वहाँ राजा अकेला अपने अश्व को छोड़कर एक वृक्ष के नीचे...
श्लोक 34 (skanda.5.99.34)
कुशोपरि तदा तत्र सुष्वाप च स निर्भयम्। तत्र व्याधाः समचरन्दृष्ट्वा सुप्तं च निर्भयम्
kuśopari tadā tatra suṣvāpa ca sa nirbhayam| tatra vyādhāḥ samacarandṛṣṭvā suptaṁ ca nirbhayam
...कुश पर निर्भय होकर सो गया। वहाँ शिकारियों ने उसे निर्भय सोया हुआ देखा।
श्लोक 35 (skanda.5.99.35)
ते गतास्त्वरिता व्याधाः स्वभर्तुः कथनाय वै। स्वामिना तेन निर्दिष्टा निग्रहीतुं प्रचक्रमुः
te gatāstvaritā vyādhāḥ svabhartuḥ kathanāya vai| svāminā tena nirdiṣṭā nigrahītuṁ pracakramuḥ
वे शिकारी शीघ्रता से जाकर अपने स्वामी को यह बात कहने गए; स्वामी की आज्ञा से वे उसे पकड़ने के लिए आगे बढ़े।
श्लोक 36 (skanda.5.99.36)
तावद्राज्ञः शरीरात्तु श्वेताऽऽभरणभूषिता। उत्थाय चक्रमादाय तया म्लेच्छाश्च पातिताः
tāvadrājñaḥ śarīrāttu śvetā''bharaṇabhūṣitā| utthāya cakramādāya tayā mlecchāśca pātitāḥ
तभी राजा के शरीर से श्वेत आभूषणों से विभूषित एक देवी उठ खड़ी हुईं, और चक्र लेकर उन्होंने उन म्लेच्छों को गिरा दिया।
श्लोक 37 (skanda.5.99.37)
दस्यून्निहत्य सा देवी तत्रैवादर्शनं गता
dasyūnnihatya sā devī tatraivādarśanaṁ gatā
उन दस्युओं का वध करके वह देवी वहीं अंतर्धान हो गईं।
श्लोक 38 (skanda.5.99.38)
अथ राजा तया मुक्तः प्रतिबुद्धोऽथ तत्क्षणात्। म्लेच्छांश्च निहतान्दृष्ट्वा चिंतयामास पार्थिवः
atha rājā tayā muktaḥ pratibuddho'tha tatkṣaṇāt| mlecchāṁśca nihatāndṛṣṭvā ciṁtayāmāsa pārthivaḥ
तब राजा, उनके द्वारा मुक्त होकर, उसी क्षण जाग उठा; और उन मारे गए म्लेच्छों को देखकर सोचने लगा।
श्लोक 39 (skanda.5.99.39)
गोवध्या ब्रह्मवध्या च वने ह्यस्मिन्सुदारुणा। कथं मया नृशंसेन प्राप्ता पापपरंपरा
govadhyā brahmavadhyā ca vane hyasminsudāruṇā| kathaṁ mayā nṛśaṁsena prāptā pāpaparaṁparā
'इस वन में मुझ नृशंस को गोवध तथा ब्रह्महत्या की यह अत्यंत भीषण पाप-परंपरा कैसे प्राप्त हुई?'
श्लोक 40 (skanda.5.99.40)
एवं स चिंतयित्वाथ निःश्वस्य च पुनःपुनः। तमेवाश्वं समारुह्य वामदेवाश्रमं ययौ
evaṁ sa ciṁtayitvātha niḥśvasya ca punaḥpunaḥ| tamevāśvaṁ samāruhya vāmadevāśramaṁ yayau
ऐसा सोचकर तथा बार-बार दीर्घ निःश्वास लेकर, वह उसी अश्व पर सवार होकर वामदेव के आश्रम को गया।
श्लोक 41 (skanda.5.99.41)
मुनिना वामदेवेन दृष्टो राजा तथाविधः। जटीभूतेन पापेन पीडितो दुःखितस्तदा
muninā vāmadevena dṛṣṭo rājā tathāvidhaḥ| jaṭībhūtena pāpena pīḍito duḥkhitastadā
मुनि वामदेव ने उस राजा को, जटीभूत पाप से पीड़ित तथा दुःखी अवस्था में देखा।
श्लोक 42 (skanda.5.99.42)
वामदेव उवाच। अयं स पुरुषव्याघ्रो वीरधन्वा महीपतिः। सोमवंशसमुत्पन्नो दशां कष्टां समागतः
vāmadeva uvāca| ayaṁ sa puruṣavyāghro vīradhanvā mahīpatiḥ| somavaṁśasamutpanno daśāṁ kaṣṭāṁ samāgataḥ
वामदेव ने मन में कहा — 'यह वही पुरुषव्याघ्र राजा वीरधन्वा है, सोमवंश में उत्पन्न, जो अब इस कष्टपूर्ण दशा को प्राप्त हुआ है।'
श्लोक 43 (skanda.5.99.43)
उद्धरिष्यामि राजानमेनं पुरुषसत्तमम्। इत्यालोच्य तदा विप्रो वामदेवो महातपाः। प्रत्युवाच महीपालं वीरधन्वानमातुरम्
uddhariṣyāmi rājānamenaṁ puruṣasattamam| ityālocya tadā vipro vāmadevo mahātapāḥ| pratyuvāca mahīpālaṁ vīradhanvānamāturam
'मैं इस श्रेष्ठ राजा का उद्धार करूँगा।' ऐसा विचार कर महातपस्वी विप्र वामदेव ने पीड़ित राजा वीरधन्वा से कहा।
श्लोक 44 (skanda.5.99.44)
भोभो राजन्महीपाल वीरधन्वेति विश्रुतः। विदूरथस्य तनयो विख्यातो भुवनत्रये
bhobho rājanmahīpāla vīradhanveti viśrutaḥ| vidūrathasya tanayo vikhyāto bhuvanatraye
'हे राजन्, हे महीपाल! वीरधन्वा नाम से विख्यात, विदूरथ के पुत्र, तीनों लोकों में प्रसिद्ध!'
श्लोक 45 (skanda.5.99.45)
प्राग्भवे व्याधरूपेण निहिथा विपिने मृगान्। दृढं जागरणं रात्रावामलक्यास्तरोरधः
prāgbhave vyādharūpeṇa nihithā vipine mṛgān| dṛḍhaṁ jāgaraṇaṁ rātrāvāmalakyāstaroradhaḥ
'पूर्वजन्म में तुमने व्याध के रूप में वन में मृगों का वध किया था, फिर भी आमलक वृक्ष के नीचे रात्रि में दृढ़तापूर्वक जागरण किया था...'
श्लोक 46 (skanda.5.99.46)
फाल्गुनामलपक्षे त्वामलक्येकादशी शुभा। पुष्यर्क्षयोगिनी तस्यां जामदग्न्यप्रदक्षिणा
phālgunāmalapakṣe tvāmalakyekādaśī śubhā| puṣyarkṣayoginī tasyāṁ jāmadagnyapradakṣiṇā
'...फाल्गुन मास के शुक्लपक्ष की शुभ आमलकी एकादशी को, जो पुष्य नक्षत्र से युक्त थी, तुमने जामदग्न्य वृक्ष की प्रदक्षिणा की थी।'
श्लोक 47 (skanda.5.99.47)
पूजा लोकैः कृता दृष्टा विस्मयेन त्वया पुरा। अकामादुपवासोऽभूत्तस्यां जागरणं पुनः
pūjā lokaiḥ kṛtā dṛṣṭā vismayena tvayā purā| akāmādupavāso'bhūttasyāṁ jāgaraṇaṁ punaḥ
'तुमने पहले आश्चर्यवश लोगों द्वारा की जाती पूजा देखी थी, और अनजाने ही उस रात्रि उपवास तथा जागरण किया था।'
श्लोक 48 (skanda.5.99.48)
तत्प्रभावादभू राजा महाबलपराक्रमः। तया संरक्षितो राजन्म्लेच्छवर्गाद्वनेऽधुना
tatprabhāvādabhū rājā mahābalaparākramaḥ| tayā saṁrakṣito rājanmlecchavargādvane'dhunā
'उसी के प्रभाव से तुम महाबलपराक्रमी राजा बने; और हे राजन्! उसी शक्ति से अभी-अभी वन में म्लेच्छों के समूह से तुम्हारी रक्षा हुई।'
श्लोक 49 (skanda.5.99.49)
निहताः शत्रवः सर्वे तयैव शुभमाप्स्यसि। पूर्वकर्मविपाकेन ब्रह्महत्या समागता
nihatāḥ śatravaḥ sarve tayaiva śubhamāpsyasi| pūrvakarmavipākena brahmahatyā samāgatā
'सभी शत्रु उसी देवी द्वारा मारे गए; उसी से तुम्हें शुभ प्राप्त होगा। पूर्वकर्म के परिपाक से ही तुम्हें यह ब्रह्महत्या प्राप्त हुई है।'
श्लोक 50 (skanda.5.99.50)
ज्ञाता तपःप्रभावेन मया योगबलेन च। जटीभूतं शरीरं ते पापसंघेन पार्थिव
jñātā tapaḥprabhāvena mayā yogabalena ca| jaṭībhūtaṁ śarīraṁ te pāpasaṁghena pārthiva
'मैंने अपने तप के प्रभाव से तथा योगबल से जान लिया है, हे राजन्! कि पापसमूह से तुम्हारा शरीर जटाग्रस्त हो गया है।'
श्लोक 51 (skanda.5.99.51)
इदानीं पालयिष्यामि शृणु मे वचनं परम्
idānīṁ pālayiṣyāmi śṛṇu me vacanaṁ param
'अब मैं तुम्हारी रक्षा करूँगा; मेरा यह परम वचन सुनो।'
श्लोक 52 (skanda.5.99.52)
इत्युक्तो वामदेवेन् मुनिना स महीपतिः। प्रणम्य प्रयतो भूत्वा पप्रच्छ च पुनःपुनः
ityukto vāmadeven muninā sa mahīpatiḥ| praṇamya prayato bhūtvā papraccha ca punaḥpunaḥ
वामदेव मुनि द्वारा ऐसा कहे जाने पर वह राजा, प्रणाम करके तथा शुद्धचित्त होकर, बार-बार पूछने लगा।
श्लोक 53 (skanda.5.99.53)
कथं यास्यंति मे हत्या गोब्राह्मणसमुद्भवाः। उपदेशप्रदानेन प्रसादं कर्तुमर्हसि
kathaṁ yāsyaṁti me hatyā gobrāhmaṇasamudbhavāḥ| upadeśapradānena prasādaṁ kartumarhasi
'गौ तथा ब्राह्मण से उत्पन्न ये हत्याएँ मुझसे कैसे दूर होंगी? कृपया उपदेश देकर मुझ पर प्रसाद कीजिए।'
श्लोक 54 (skanda.5.99.54)
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा वाम देवो महामुनिः। कथयामास माहात्म्यं लिंगस्यास्य यशस्विनि
tasya tadvacanaṁ śrutvā vāma devo mahāmuniḥ| kathayāmāsa māhātmyaṁ liṁgasyāsya yaśasvini
उसका यह वचन सुनकर महामुनि वामदेव ने, हे यशस्विनि! इस लिंग की महिमा कह सुनाई।
श्लोक 55 (skanda.5.99.55)
महाकालवनं गच्छ महाराज ममाज्ञया। तत्रास्ते देवदेवोऽपि जगद्व्यापी जटेश्वरः
mahākālavanaṁ gaccha mahārāja mamājñayā| tatrāste devadevo'pi jagadvyāpī jaṭeśvaraḥ
'हे महाराज! मेरी आज्ञा से महाकालवन को जाओ; वहाँ जगद्व्यापी देवदेव जटेश्वर विराजमान हैं।'
श्लोक 56 (skanda.5.99.56)
पापसंघप्रहर्त्ता च सर्ववेदेषु पठ्यते। देवस्यानरकेशस्य उत्तरे स व्यवस्थितः
pāpasaṁghapraharttā ca sarvavedeṣu paṭhyate| devasyānarakeśasya uttare sa vyavasthitaḥ
'वे पापसमूह के विनाशक हैं, समस्त वेदों में उनका वर्णन है; वे अनरकेश्वर देव के उत्तर में स्थित हैं।'
श्लोक 57 (skanda.5.99.57)
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा वामदेवस्य पार्थिवः। आजगाम त्वरायुक्तो महाकालवनोत्तमे
tasya tadvacanaṁ śrutvā vāmadevasya pārthivaḥ| ājagāma tvarāyukto mahākālavanottame
वामदेव के इस वचन को सुनकर राजा शीघ्रतापूर्वक महाकालवन के उत्तम स्थान में पहुँचा।
श्लोक 58 (skanda.5.99.58)
तत्र दृष्ट्वा जगद्वंद्यं देवदेवं जटेश्वरम्। स्तुतिं चकार राजेंद्रो भक्त्या परमया पुनः
tatra dṛṣṭvā jagadvaṁdyaṁ devadevaṁ jaṭeśvaram| stutiṁ cakāra rājeṁdro bhaktyā paramayā punaḥ
वहाँ जगद्वंद्य देवदेव जटेश्वर का दर्शन कर राजा ने परम भक्तिपूर्वक पुनः स्तुति की।
श्लोक 59 (skanda.5.99.59)
शिवाय ते नमो नित्यं विश्वकाय नमोनमः। नमो दिव्याय गुह्याय गूढव्रतशरीरिणे
śivāya te namo nityaṁ viśvakāya namonamaḥ| namo divyāya guhyāya gūḍhavrataśarīriṇe
'हे शिव! आपको नित्य नमस्कार, हे विश्वकर्ता! बार-बार नमस्कार। हे दिव्य, हे गुह्य, गूढ़व्रतधारी को नमस्कार।'
श्लोक 60 (skanda.5.99.60)
नमो जटाय रामाय माययाक्रांतकारिणे। नमोस्तु बहुरूपाय नमो नीलाभरूपिणे
namo jaṭāya rāmāya māyayākrāṁtakāriṇe| namostu bahurūpāya namo nīlābharūpiṇe
'हे जटाधारी, हे रमणीय, माया से जगत् को व्याप्त करने वाले को नमस्कार; बहुरूपधारी को नमस्कार, नीलाभ रूप वाले को नमस्कार।'
श्लोक 61 (skanda.5.99.61)
नमो भोगाय धूम्राय नमोऽस्तु गगनात्मने। नमो वह्निसमूहाय नमस्ते निर्मलाकर
namo bhogāya dhūmrāya namo'stu gaganātmane| namo vahnisamūhāya namaste nirmalākara
'भोगस्वरूप, धूम्रवर्ण को नमस्कार; आकाशस्वरूप को नमस्कार; अग्निसमूह को नमस्कार; हे निर्मलाकर! आपको नमस्कार।'
श्लोक 62 (skanda.5.99.62)
नमो महांधकारार्क नमस्ते शत्रुघातिने। नमः संसारपाराय दिव्यरूपशरीरिणे। नमः कनकवर्णाय नमो मोहितमोहिने
namo mahāṁdhakārārka namaste śatrughātine| namaḥ saṁsārapārāya divyarūpaśarīriṇe| namaḥ kanakavarṇāya namo mohitamohine
'हे महाअंधकार में सूर्य के समान! आपको नमस्कार; शत्रुघातक को नमस्कार; संसार से पार ले जाने वाले, दिव्यरूपधारी को नमस्कार; स्वर्णवर्ण, मोह को भी मोहित करने वाले को नमस्कार।'
श्लोक 63 (skanda.5.99.63)
नमः सुरूपाय सुरार्चिताय नमो विरूपाय प्रकृतेः पराय। नमोनमो रूपनिराश्रयाय श्यामासुरूपाय नमोनमस्ते
namaḥ surūpāya surārcitāya namo virūpāya prakṛteḥ parāya| namonamo rūpanirāśrayāya śyāmāsurūpāya namonamaste
'सुरूप, देवपूजित को नमस्कार; विरूप, प्रकृति से परे को नमस्कार; रूपरहित को बार-बार नमस्कार; श्याम-महारूप वाले को बार-बार नमस्कार।'
श्लोक 64 (skanda.5.99.64)
इति स्तुतस्तदा देवि महादेवो महेश्वरः। जटावेष्टितसर्वांगो लिंगमध्याच्च निस्सृतः
iti stutastadā devi mahādevo maheśvaraḥ| jaṭāveṣṭitasarvāṁgo liṁgamadhyācca nissṛtaḥ
इस प्रकार स्तुत होकर, हे देवी! महादेव महेश्वर, जिनका सारा अंग जटाओं से आवृत था, लिंग के मध्य से प्रकट हुए।
श्लोक 65 (skanda.5.99.65)
भस्मचर्चितसर्वांगो भोगिभोगांगदोज्वलः। हिमराशिनिभाकारो राजताचलनिर्मलः
bhasmacarcitasarvāṁgo bhogibhogāṁgadojvalaḥ| himarāśinibhākāro rājatācalanirmalaḥ
उनका सारा शरीर भस्म से चर्चित था, सर्पों के फणरूपी बाजूबंदों से उज्ज्वल था; उनका रूप हिमराशि के समान तथा रजतगिरि (कैलास) के समान निर्मल था।
श्लोक 66 (skanda.5.99.66)
मुक्तालतानिभाभिस्तु जटाभिर्भूषितो विभुः। कपिलाभिः करालाभिर्विकटाभिश्च वेष्टितः
muktālatānibhābhistu jaṭābhirbhūṣito vibhuḥ| kapilābhiḥ karālābhirvikaṭābhiśca veṣṭitaḥ
वे प्रभु मुक्तालता के समान जटाओं से विभूषित थे, कपिलवर्ण, विकराल तथा विकट जटाओं से आवृत थे।
श्लोक 67 (skanda.5.99.67)
भोगींद्रफणबद्धाभिः सितपीतादिभिस्तथा। नदीरूपाभिरूताभिः शोभितोऽसौ जटेश्वरः
bhogīṁdraphaṇabaddhābhiḥ sitapītādibhistathā| nadīrūpābhirūtābhiḥ śobhito'sau jaṭeśvaraḥ
नागराज के फणों से बंधी, श्वेत-पीत आदि वर्णों की, नदी के समान बहती जटाओं से वे जटेश्वर सुशोभित हो रहे थे।
श्लोक 68 (skanda.5.99.68)
राजानं प्रत्युवाचेदं वचनं पर्वतात्मजे। स्तोत्रेणानेन राजेंद्र तुष्टोऽहं तोषितस्त्वया
rājānaṁ pratyuvācedaṁ vacanaṁ parvatātmaje| stotreṇānena rājeṁdra tuṣṭo'haṁ toṣitastvayā
हे पर्वतात्मजे! उन्होंने राजा से कहा — 'हे राजेंद्र! इस स्तोत्र से मैं प्रसन्न हूँ, तुमने मुझे संतुष्ट किया है।'
श्लोक 69 (skanda.5.99.69)
जटीभूतं च ते पापं गतं मद्दर्शनेन वै। तस्मात्स्थानं परं गच्छ मदीयं शाश्वतं मुदा
jaṭībhūtaṁ ca te pāpaṁ gataṁ maddarśanena vai| tasmātsthānaṁ paraṁ gaccha madīyaṁ śāśvataṁ mudā
'मेरे दर्शन से तुम्हारा जटीभूत पाप नष्ट हो गया है; अतः अब प्रसन्नतापूर्वक मेरे सनातन परम धाम को जाओ।'
श्लोक 70 (skanda.5.99.70)
इत्युक्तो देवदेवेन वीरधन्वा महीपतिः। जगाम परमं स्थानं दाहप्रलयवर्जितम्
ityukto devadevena vīradhanvā mahīpatiḥ| jagāma paramaṁ sthānaṁ dāhapralayavarjitam
देवदेव द्वारा ऐसा कहे जाने पर राजा वीरधन्वा दाह और प्रलय से रहित उस परम स्थान को गए।
श्लोक 71 (skanda.5.99.71)
कामगेन विमानेन स्तूयमानो गणैः प्रिये। पापसंघेन मुक्तोऽसौ जटीभूतेशदर्शनात्
kāmagena vimānena stūyamāno gaṇaiḥ priye| pāpasaṁghena mukto'sau jaṭībhūteśadarśanāt
हे प्रिये! इच्छानुसार चलने वाले विमान पर, गणों द्वारा स्तुत होते हुए, जटीभूत ईश्वर के दर्शन से पापसमूह से मुक्त होकर वे उस लोक को गए।
श्लोक 72 (skanda.5.99.72)
लिंगश्चातः समाख्यातो नाम्ना देवो जटेश्वरः। जटेश्वरं वरारोहे ये पश्यंति सुभक्तितः। तेषां पापं जटीभूतं तत्क्षणादेव नश्यति
liṁgaścātaḥ samākhyāto nāmnā devo jaṭeśvaraḥ| jaṭeśvaraṁ varārohe ye paśyaṁti subhaktitaḥ| teṣāṁ pāpaṁ jaṭībhūtaṁ tatkṣaṇādeva naśyati
इसीलिए यह लिंग जटेश्वर नाम से प्रसिद्ध हुआ। हे वरारोहे! जो लोग सुभक्तिपूर्वक जटेश्वर का दर्शन करते हैं, उनका जटीभूत पाप उसी क्षण नष्ट हो जाता है।
श्लोक 73 (skanda.5.99.73)
येऽर्चयंति सदा देवि देवदेवं जटेश्वरम्। तेषां बलं प्रभावश्च सौभाग्यं च भविष्यति
ye'rcayaṁti sadā devi devadevaṁ jaṭeśvaram| teṣāṁ balaṁ prabhāvaśca saubhāgyaṁ ca bhaviṣyati
हे देवी! जो सदा देवदेव जटेश्वर की अर्चना करते हैं, उन्हें बल, प्रभाव तथा सौभाग्य प्राप्त होगा।
श्लोक 74 (skanda.5.99.74)
येप्यन्ये देवगन्धर्वा यक्षराक्षस मानवाः। लिंगं च पूजयिष्यंतिं विधिवद्भक्तिभावतः
yepyanye devagandharvā yakṣarākṣasa mānavāḥ| liṁgaṁ ca pūjayiṣyaṁtiṁ vidhivadbhaktibhāvataḥ
जो अन्य देव, गंधर्व, यक्ष, राक्षस अथवा मनुष्य भी विधिपूर्वक भक्तिभाव से इस लिंग की पूजा करेंगे...
श्लोक 75 (skanda.5.99.75)
तेऽपि कामानवाप्स्यन्ति यांश्च कांश्च सुदुर्लभान्। ऐश्वर्यं धर्ममतुलं दीर्घमायुररो गताम्
te'pi kāmānavāpsyanti yāṁśca kāṁśca sudurlabhān| aiśvaryaṁ dharmamatulaṁ dīrghamāyuraro gatām
...वे भी अत्यंत दुर्लभ कामनाओं को प्राप्त करेंगे — अतुल ऐश्वर्य, अनुपम धर्म, रोगरहित दीर्घायु...
श्लोक 76 (skanda.5.99.76)
निःसपत्नत्वमतुलं यच्चान्यत्तदवाप्नुयात्। पापिनः क्रूरकर्माणो येऽपि लिंगं समाश्रिताः। तेपि पापविनिर्मुक्ता भविष्यंति गत ज्वराः
niḥsapatnatvamatulaṁ yaccānyattadavāpnuyāt| pāpinaḥ krūrakarmāṇo ye'pi liṁgaṁ samāśritāḥ| tepi pāpavinirmuktā bhaviṣyaṁti gata jvarāḥ
...अद्वितीय निःसपत्नता तथा अन्य जो कुछ भी वे चाहेंगे, वह सब प्राप्त करेंगे। क्रूरकर्मा पापी भी, जो इस लिंग की शरण लेते हैं, पापमुक्त होकर ज्वररहित हो जाएँगे।
श्लोक 77 (skanda.5.99.77)
जटेश्वरं प्रपश्यंति भक्त्या ये च दिनेदिने। ते धर्मधनसौभाग्यैर्भविष्यंति समन्विताः
jaṭeśvaraṁ prapaśyaṁti bhaktyā ye ca dinedine| te dharmadhanasaubhāgyairbhaviṣyaṁti samanvitāḥ
जो लोग प्रतिदिन भक्तिपूर्वक जटेश्वर का दर्शन करते हैं, वे धर्म, धन तथा सौभाग्य से युक्त होंगे।
श्लोक 78 (skanda.5.99.78)
व्याधितो व्याधिना मुक्तो दुःखी दुःखात्प्रमुच्यते। दर्शनात्तु भवेत्सद्यः सर्वपातकवर्जितः
vyādhito vyādhinā mukto duḥkhī duḥkhātpramucyate| darśanāttu bhavetsadyaḥ sarvapātakavarjitaḥ
रोगी रोग से मुक्त होता है, दुःखी दुःख से मुक्त होता है; दर्शनमात्र से मनुष्य तत्काल समस्त पापों से रहित हो जाता है।
श्लोक 79 (skanda.5.99.79)
जटेश्वरस्य माहात्म्यं ये पठिष्यंति पार्वति। श्रोष्यंति येऽपि मद्भक्त्या प्रयताः श्रद्धयान्विताः
jaṭeśvarasya māhātmyaṁ ye paṭhiṣyaṁti pārvati| śroṣyaṁti ye'pi madbhaktyā prayatāḥ śraddhayānvitāḥ
हे पार्वती! जो लोग जटेश्वर की इस महिमा को पढ़ेंगे, तथा जो मेरे प्रति भक्तिभाव से संयमित एवं श्रद्धायुक्त होकर सुनेंगे...
श्लोक 80 (skanda.5.99.80)
ते सर्वकामानाप्स्यंति गतिमंते च मत्पुरे। या नारी दुर्भगा सापि सौभाग्यं लभते सदा
te sarvakāmānāpsyaṁti gatimaṁte ca matpure| yā nārī durbhagā sāpi saubhāgyaṁ labhate sadā
...वे समस्त कामनाओं को प्राप्त करेंगे और अंत में मेरे पुर को प्राप्त होंगे। जो अभागिनी स्त्री हो, वह भी सदा सौभाग्य प्राप्त करती है।
श्लोक 81 (skanda.5.99.81)
गुर्विणी लभते पुत्रमरोगं श्रुतिभूषणम्। शिशुग्रहाश्च नश्यंति नापमृत्युभयं भवेत्
gurviṇī labhate putramarogaṁ śrutibhūṣaṇam| śiśugrahāśca naśyaṁti nāpamṛtyubhayaṁ bhavet
गर्भवती स्त्री विद्या से भूषित, नीरोग पुत्र प्राप्त करती है; शिशुओं को पीड़ित करने वाले ग्रह नष्ट हो जाते हैं, अकाल मृत्यु का भय नहीं रहता।
श्लोक 82 (skanda.5.99.82)
मांगल्यमिदमायुष्यं धर्मकामाश्रयं महत्। दुःस्वप्नजं भयं घोरं पापजं याति संक्षयम्
māṁgalyamidamāyuṣyaṁ dharmakāmāśrayaṁ mahat| duḥsvapnajaṁ bhayaṁ ghoraṁ pāpajaṁ yāti saṁkṣayam
यह मांगल्यकारी, आयुवर्धक, धर्म-काम का महान् आश्रय है; दुःस्वप्न से उत्पन्न भय तथा पापजनित घोर भय नष्ट हो जाता है।
श्लोक 83 (skanda.5.99.83)
दुर्भुक्तं दुर्जनस्पर्शं यच्चाल्पायुःकरं भवेत्। लिंगाख्यानकथां श्रुत्वा विनश्यति न संशयः
durbhuktaṁ durjanasparśaṁ yaccālpāyuḥkaraṁ bhavet| liṁgākhyānakathāṁ śrutvā vinaśyati na saṁśayaḥ
कुभोजन तथा दुर्जन के स्पर्श से जो अल्पायु उत्पन्न होती है, वह भी इस लिंग की कथा सुनने से निःसंदेह नष्ट हो जाती है।
श्लोक 84 (skanda.5.99.84)
श्राद्धेषु यः पठेदेतां जटेश्वरकथां शुभाम्। तदक्षयं भवेच्छ्राद्धं पितॄणां प्रीतिवर्द्धनम्
śrāddheṣu yaḥ paṭhedetāṁ jaṭeśvarakathāṁ śubhām| tadakṣayaṁ bhavecchrāddhaṁ pitṝṇāṁ prītivarddhanam
श्राद्ध में जो इस शुभ जटेश्वर-कथा को पढ़ता है, वह श्राद्ध अक्षय हो जाता है और पितरों की प्रीति बढ़ाने वाला होता है।
श्लोक 85 (skanda.5.99.85)
एष ते कथितो देवि प्रभावः पापनाशनः। जटेश्वरस्य देवस्य शृणु रामेश्वरं शिवम्
eṣa te kathito devi prabhāvaḥ pāpanāśanaḥ| jaṭeśvarasya devasya śṛṇu rāmeśvaraṁ śivam
यह तुम्हें, हे देवी! पापनाशक प्रभाव बताया गया; अब शिव रामेश्वर की महिमा सुनो।