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अवन्ती खण्ड · अध्याय 103

पत्तनेश्वर की महिमा

अध्याय 102अध्याय-सूचीअध्याय 104

श्लोक 1 (skanda.5.103.1)

ईश्वर उवाच। त्रिषु लोकेषु विख्यातं द्वात्रिंशत्तममुत्तमम्। विद्धि सिद्धिप्रदं पुंसां पत्तनेश्वरमीश्वरम्

īśvara uvāca| triṣu lokeṣu vikhyātaṁ dvātriṁśattamamuttamam| viddhi siddhipradaṁ puṁsāṁ pattaneśvaramīśvaram

ईश्वर ने कहा — हे देवी! तीनों लोकों में विख्यात, बत्तीसवें उत्तम देव पत्तनेश्वर को जानो, जो मनुष्यों को सिद्धि प्रदान करने वाले ईश्वर हैं।

श्लोक 2 (skanda.5.103.2)

पुराऽहं पर्वते देवि मंदरे चारुकन्दर्। क्रीडन्सार्द्धं त्वया पृष्टः कदाचिद्रहसि स्थितः

purā'haṁ parvate devi maṁdare cārukandar| krīḍansārddhaṁ tvayā pṛṣṭaḥ kadācidrahasi sthitaḥ

हे देवी! पूर्वकाल में मंदराचल पर्वत की सुंदर कंदरा में तुम्हारे साथ क्रीड़ा करते हुए, किसी एकांत क्षण में तुमने मुझसे पूछा था —

श्लोक 3 (skanda.5.103.3)

किमर्थं पर्वतं त्यक्त्वा कैलासं रमणीयकम्। मुक्ता फलशिलाशुभ्रं शङ्खचन्द्रांशुनिर्मलम्

kimarthaṁ parvataṁ tyaktvā kailāsaṁ ramaṇīyakam| muktā phalaśilāśubhraṁ śaṅkhacandrāṁśunirmalam

'मोतियों से बनी शिला के समान श्वेत, शंख और चंद्रकिरणों के समान निर्मल, रमणीय कैलास पर्वत को छोड़कर क्यों,'

श्लोक 4 (skanda.5.103.4)

सिद्धचारणगन्धर्वकिंनरोद्गीतनादितम्। सदा पुष्पद्रुमच्छन्नं कदलीवनराजितम्

siddhacāraṇagandharvakiṁnarodgītanāditam| sadā puṣpadrumacchannaṁ kadalīvanarājitam

'सिद्ध, चारण, गंधर्व तथा किन्नरों के गीतनाद से गूँजने वाले, सदा पुष्पित वृक्षों से आच्छादित, कदली-वनों से सुशोभित,'

श्लोक 5 (skanda.5.103.5)

अथ कोकिलचक्राह्वचकोरकुरराकुलम्। पुऽण्यलोकोपमं स्थानं त्रिविष्टपविभूषणम्

atha kokilacakrāhvacakorakurarākulam| pu'ṇyalokopamaṁ sthānaṁ triviṣṭapavibhūṣaṇam

'कोकिल, चक्रवाक, चकोर तथा कुरर पक्षियों से भरे हुए, पुण्यलोक के समान स्थान, स्वर्ग के आभूषणस्वरूप उस पर्वत को छोड़कर,'

श्लोक 6 (skanda.5.103.6)

महाकालवने शून्ये नानागुल्मलतावृते। गजेंद्रगजशार्दूल सिंहशम्बरसंकुले

mahākālavane śūnye nānāgulmalatāvṛte| gajeṁdragajaśārdūla siṁhaśambarasaṁkule

'सूने महाकालवन में, नाना झाड़ियों और लताओं से आच्छादित, गजराज, बाघ, सिंह तथा सांभर हिरणों से भरे हुए,'

श्लोक 7 (skanda.5.103.7)

ऋक्षवानरगोमायुजन्तुकादिविराजिते। मयूरसर्पमार्जारमूषिकादिविराजिते

ṛkṣavānaragomāyujantukādivirājite| mayūrasarpamārjāramūṣikādivirājite

'भालू, वानर, गीदड़ आदि जंतुओं से युक्त, मोर, सर्प, बिलाव, चूहे आदि से भरे हुए स्थान में,'

श्लोक 8 (skanda.5.103.8)

कथं वासः कृतो देव कौतूहलमिदं मम

kathaṁ vāsaḥ kṛto deva kautūhalamidaṁ mama

'आपने अपना निवास कैसे किया, हे देव? मुझे यही कुतूहल है।'

श्लोक 9 (skanda.5.103.9)

इति पृष्टस्त्वया देवि मंदरे चारुकन्दरे। मया प्रोक्तं प्रसन्नेन पत्तनं च मम प्रिये

iti pṛṣṭastvayā devi maṁdare cārukandare| mayā proktaṁ prasannena pattanaṁ ca mama priye

हे देवी! मंदर की उस सुंदर कंदरा में तुम्हारे इस प्रश्न पर, हे प्रिये! मैंने प्रसन्न होकर तुम्हें अपने पत्तन (नगर) के विषय में बताया —

श्लोक 10 (skanda.5.103.10)

महाकालवनं रम्यं स्वर्गात्सुखकरं परम् ।।.। स्मशानपीठसत्क्षेत्रवनोपरसमाश्रितम्

mahākālavanaṁ ramyaṁ svargātsukhakaraṁ param ||.| smaśānapīṭhasatkṣetravanoparasamāśritam

'रमणीय महाकालवन स्वर्ग से भी अधिक सुखकर है; यह श्मशान-पीठ, पवित्र क्षेत्र, वन तथा पर्वत के आश्रय में स्थित है।'

श्लोक 11 (skanda.5.103.11)

अनौपम्यगुणं विद्धि पत्तनं पर्वतात्मजे। एवं पत्तनदेवो वै न दृष्टो भुवनत्रये। गीतवादित्रचातुर्यैः स्पर्द्धते यः सुरालयम्

anaupamyaguṇaṁ viddhi pattanaṁ parvatātmaje| evaṁ pattanadevo vai na dṛṣṭo bhuvanatraye| gītavāditracāturyaiḥ sparddhate yaḥ surālayam

'हे पर्वतात्मजे! जानो कि मेरा पत्तन अनुपम गुणों वाला है — ऐसा पत्तनदेव तीनों लोकों में कहीं नहीं देखा गया, जो गीत-वाद्य की चतुराई में देवलोक से भी स्पर्धा करता है।'

श्लोक 12 (skanda.5.103.12)

एतस्मिन्नंतरे देवि देवर्षिर्नारदो मुनिः। द्रष्टुकामः समायातो मन्दरे मां यशस्विनि

etasminnaṁtare devi devarṣirnārado muniḥ| draṣṭukāmaḥ samāyāto mandare māṁ yaśasvini

हे यशस्विनी देवी! इसी बीच मुझे देखने की इच्छा से देवर्षि नारद मुनि मंदराचल पर आए।

श्लोक 13 (skanda.5.103.13)

विनोदार्थं मया पृष्टस्त्वत्प्रियार्थं कुतूहलात्। क्व त्वया गमितः कालः कल्पसंख्यो महामुने

vinodārthaṁ mayā pṛṣṭastvatpriyārthaṁ kutūhalāt| kva tvayā gamitaḥ kālaḥ kalpasaṁkhyo mahāmune

तुम्हारे मनोरंजन के लिए तथा कुतूहलवश मैंने पूछा — 'हे महामुने! तुमने कल्प के बराबर काल कहाँ बिताया?'

श्लोक 14 (skanda.5.103.14)

कस्मिन्नाश्रमसंस्थाने तपसः संचयः कृतः। तीर्थानि कानि भ्रांतानि क्व ते रतिरभूच्चिरम्

kasminnāśramasaṁsthāne tapasaḥ saṁcayaḥ kṛtaḥ| tīrthāni kāni bhrāṁtāni kva te ratirabhūcciram

'किस आश्रम में तपस्या का संचय किया? कौन-कौन से तीर्थों में भ्रमण किया? कहाँ तुम्हें दीर्घकाल तक रति (आनंद) मिली?'

श्लोक 15 (skanda.5.103.15)

कौतुकं दृष्टपूर्वं तु वद मे मुनिसत्तम। इति पृष्टो मया देवि ब्रह्मपुत्रो महामुनिः। कथयामास वृत्तांतं पत्तनस्य प्रयत्नतः

kautukaṁ dṛṣṭapūrvaṁ tu vada me munisattama| iti pṛṣṭo mayā devi brahmaputro mahāmuniḥ| kathayāmāsa vṛttāṁtaṁ pattanasya prayatnataḥ

'मुझे अपना पूर्वदृष्ट कोई कौतुक बताओ, हे मुनिश्रेष्ठ।' हे देवी! मेरे इस प्रश्न पर उस ब्रह्मपुत्र महामुनि ने प्रयत्नपूर्वक पत्तन का वृत्तांत सुनाया —

श्लोक 16 (skanda.5.103.16)

बहूनि संपरिक्रम्य तीर्थान्यायतनानि च। पत्तनानि विचित्राणि देशाश्च नगराणि च

bahūni saṁparikramya tīrthānyāyatanāni ca| pattanāni vicitrāṇi deśāśca nagarāṇi ca

'अनेक तीर्थों, आयतनों, विचित्र नगरों, देशों तथा पत्तनों में भ्रमण करके,'

श्लोक 17 (skanda.5.103.17)

अटनार्थं महादेव जंबूद्वीपे मनोरमे। दृष्टः पत्तनराजश्च सदानंदकरः परः

aṭanārthaṁ mahādeva jaṁbūdvīpe manorame| dṛṣṭaḥ pattanarājaśca sadānaṁdakaraḥ paraḥ

'हे महादेव! भ्रमण हेतु मनोरम जंबूद्वीप में मैंने सदा आनंददायक, सर्वश्रेष्ठ पत्तनराज को देखा —'

श्लोक 18 (skanda.5.103.18)

स्वेच्छाकल्पितविन्यासः प्रासादशतकल्पितः। इच्छाकामफलावाप्तिर निर्देश्यसुखावहः

svecchākalpitavinyāsaḥ prāsādaśatakalpitaḥ| icchākāmaphalāvāptira nirdeśyasukhāvahaḥ

'जो स्वेच्छानुसार रचा गया, सैकड़ों प्रासादों से युक्त, इच्छित कामनाओं के फल को प्राप्त कराने वाला, अवर्णनीय सुख देने वाला था,'

श्लोक 19 (skanda.5.103.19)

सर्वर्तुकुसुमामोदसुखस्पर्शानिलावृतः। वीणावेणुरवैर्घुष्टो मनःप्रह्लादकारकः

sarvartukusumāmodasukhasparśānilāvṛtaḥ| vīṇāveṇuravairghuṣṭo manaḥprahlādakārakaḥ

'सभी ऋतुओं के पुष्पों की सुगंध तथा सुखद स्पर्श वाली वायु से आवृत, वीणा और वेणु की ध्वनि से गुंजायमान, मन को प्रसन्न करने वाला था,'

श्लोक 20 (skanda.5.103.20)

वज्रेंद्रनीलवैडूर्यचन्द्रकांतादिदी पितः। जरामृत्युभयोपेतः सर्वव्याधिविवर्जितः

vajreṁdranīlavaiḍūryacandrakāṁtādidī pitaḥ| jarāmṛtyubhayopetaḥ sarvavyādhivivarjitaḥ

'वज्र, इंद्रनील, वैडूर्य, चंद्रकांत आदि मणियों से देदीप्यमान था — जरा-मृत्यु के भय से छुड़ाने वाला तथा सभी व्याधियों से मुक्त था,'

श्लोक 21 (skanda.5.103.21)

शक्राग्नियमरक्षोब्धिवायुसोमेशसेवितः। ऊर्द्धाधः सप्तलोकेषु पुण्येषु निवसंति हि

śakrāgniyamarakṣobdhivāyusomeśasevitaḥ| ūrddhādhaḥ saptalokeṣu puṇyeṣu nivasaṁti hi

'इंद्र, अग्नि, यम, निर्ऋति, वरुण (समुद्र), वायु तथा सोम द्वारा सेवित था; ऊपर-नीचे सातों पुण्यलोकों में वे निवास करते हैं।'

श्लोक 22 (skanda.5.103.22)

सदा प्रमुदिता देवास्तेऽपि कांक्षंति पत्तनन्न्। तत्र शांता महात्मानो निवसंते महेश्वर

sadā pramuditā devāste'pi kāṁkṣaṁti pattanann| tatra śāṁtā mahātmāno nivasaṁte maheśvara

'सदा प्रमुदित रहने वाले देवता भी उस पत्तन की कामना करते हैं; हे महेश्वर! वहाँ शांत महात्मा निवास करते हैं।'

श्लोक 23 (skanda.5.103.23)

विद्योतितदिशो दांताः सूर्य वैश्वानरप्रभाः। दिव्यांबरधरा धीरा जगमुकुटधारिणः

vidyotitadiśo dāṁtāḥ sūrya vaiśvānaraprabhāḥ| divyāṁbaradharā dhīrā jagamukuṭadhāriṇaḥ

'दिशाओं को प्रकाशित करने वाले, जितेंद्रिय, सूर्य और अग्नि के समान तेजस्वी, दिव्य वस्त्रधारी, धीर तथा जगत् के मुकुटस्वरूप वहाँ के निवासी हैं।'

श्लोक 24 (skanda.5.103.24)

विप्रा माहेश्वराः पुण्याः क्षत्रिया हरतत्पराः। मुमुक्षवस्तपोनिष्ठा वैश्या शूद्राश्चिरायुपः

viprā māheśvarāḥ puṇyāḥ kṣatriyā haratatparāḥ| mumukṣavastaponiṣṭhā vaiśyā śūdrāścirāyupaḥ

'वहाँ के ब्राह्मण माहेश्वर तथा पुण्यात्मा हैं, क्षत्रिय हरभक्तिपरायण हैं; लोग मुमुक्षु तथा तपोनिष्ठ हैं, वैश्य और शूद्र दीर्घायु हैं।'

श्लोक 25 (skanda.5.103.25)

स शुभ्ररूपः स च लोहिताकृतिः स चापि पीतः ससितेतरः क्वचित्। स नामधेयः स च नामवर्ज्यः सोऽदृ श्यरूपः स च दृष्टरूपः

sa śubhrarūpaḥ sa ca lohitākṛtiḥ sa cāpi pītaḥ sasitetaraḥ kvacit| sa nāmadheyaḥ sa ca nāmavarjyaḥ so'dṛ śyarūpaḥ sa ca dṛṣṭarūpaḥ

'वे कहीं श्वेतवर्ण, कहीं रक्तवर्ण, कहीं पीतवर्ण, तथा कहीं श्याम रूप में हैं; वे नामधारी भी हैं और नामरहित भी; वे अदृश्यरूप भी हैं और दृश्यरूप भी।'

श्लोक 26 (skanda.5.103.26)

क्वचिद्रविसहस्राक्षः क्वचिदेकरविप्रभः। क्वचिच्चन्द्राद्विशिष्येत क्वचिदंगुलिकांतिमान्

kvacidravisahasrākṣaḥ kvacidekaraviprabhaḥ| kvaciccandrādviśiṣyeta kvacidaṁgulikāṁtimān

'कहीं वे सहस्र सूर्यों के समान तेजस्वी हैं, कहीं एक सूर्य के समान प्रभावाले; कहीं चंद्रमा से भी अधिक कांतिमान, कहीं मात्र एक अंगुलि जितनी ही कांति वाले हैं।'

श्लोक 27 (skanda.5.103.27)

जन्म मृत्युजरारोगैर्दुःखानि विविधानि च। प्रयाति विलयं तानि प्रसन्ने पत्तनेश्वरे

janma mṛtyujarārogairduḥkhāni vividhāni ca| prayāti vilayaṁ tāni prasanne pattaneśvare

पत्तनेश्वर के प्रसन्न होने पर जन्म, मृत्यु, जरा तथा रोग से उत्पन्न विविध दुःख विलीन हो जाते हैं।

श्लोक 28 (skanda.5.103.28)

एष ते कथितो देवि प्रभावः पापनाशनः। पत्तनेशस्य देवस्य आनंदेशमतः शृणु

eṣa te kathito devi prabhāvaḥ pāpanāśanaḥ| pattaneśasya devasya ānaṁdeśamataḥ śṛṇu

हे देवी! तुम्हें पत्तनेश देव का यह पापनाशक प्रभाव बताया गया; अब आनंदेश के विषय में सुनो।

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